होली
निराली
गुरुज्ञान की
होली निराली,
मिटी
अविद्या,
अहंता काली,
जीवन
धन की हो
रखवाली,
आयी
है ऋतु बसंत
बहार ।
पलाश के
रंग हैं
प्यारे,
भर-भर
गुरु पिचकारी
मारे,
भीगे
भक्त-हृदय
प्रभु प्यारे,
बरसी
सात्त्विक
रंगों की
बौछार ।
रामनाम रँगी
चित्त-होली,
भस्म
हो भेदभाव की
खोली,
जली
ईर्ष्या, राग
द्वेष की
होली,
घट-घट
में वही
सिरजनहार ।
ब्रज में
मनमोहन ने
खेली,
ग्वाल-गोपियाँ
साथी हमजोली,
उमड़ा
आनंद, चित्त
चेतना डोली,
छलकी
परम स्नेह रसधार ।
प्रकट
थंभ से
नरसिंह अवतार,
हिरण्यकश्यप
का किया
संहार,
भक्त
प्रह्लाद के
रक्षक करतार,
हरि
दीनबंधु हैं
प्राण आधार ।
प्रभुप्रीति
भक्ति का रंग
गुलाल,
मिटे
चिंता, चाहत,
रंज, मलाल,
शील
धर्म हो, हृदय
विशाल,
‘साक्षी’
साहिब हैं
सत्य सार।
- जानकी
(साक्षी) स्रोत
ऋषि
प्रसाद मार्च
2008