
आश्रम के विरुद्ध किये जा रहे कुप्रचार का पर्दाफाश
गुरुकुल मौत प्रकरण पर संतों के विचार
संतो के सेवा कार्य भी तो दिखाये मीडिया
सुख-शांति व स्वास्थ्य का प्रसाद बाँटने के लिए ही बापू जी का अवतरण हुआ है।
हर व्यक्ति जो निराश है उसे आसाराम जी की ज़रूरत है
बापू नित्य नवीन, नित्य वर्धनीय आनंदस्वरूप हैं
पुण्य संचय व ईश्वर की कृपा का फलः ब्रह्मज्ञान का दिव्य सत्संग
बापू जी का सान्निध्य गंगा के पावन प्रवाह जैसा है
पूज्यश्री के सत्संग में प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयीजी के उदगार
गरीबों व पिछड़ों को ऊपर उठाने के कार्य चालू रहें
सराहनीय प्रयासों की सफलता के लिए बधाई
आपने दिव्य ज्ञान का प्रकाशपुंज प्रस्फुटित किया है
आप समाज की सर्वांगीण उन्नति कर रहे हैं
'योग व उच्च संस्कार शिक्षा हेतु' भारतवर्ष आपका चिरआभारी रहेगा
संतों के मार्गदर्शन में देश चलेगा तो आबाद होगा
सत्य का मार्ग कभी न छूटे ऐसा आशीर्वाद दो
आयुर्वेद का अनमोल उपहार "त्रिफला"
'नीम तेल' के बारे में किये जा रहे कुप्रचार का भंडाफोड़
मेरा दृढ़ विश्वास है – वह अच्छे संस्कारी कुल में फिर से आयेगा
ये घटनाएँ बापू जी और आश्रम के खिलाफ साजिश हैं
संत श्री आसाराम जी आश्रम द्वारा किये जा रहे सेवाकार्यों की एक झलक
(गतांक
से आगे)
संगीत का
प्रभावः विश्व
भर में
सात्त्विक
संगीतकार
प्रायः दीर्घायुषी
पाये जाते
हैं। इसका
रहस्य यह है
कि सात्त्विक
संगीत जीवन
शक्ति को
बढ़ाता है। कान
द्वारा ऐसा
संगीत सुनने
से तो यह लाभ
होता ही है
अपितु किसी
व्यक्ति के
कान बंद करवा
के उसके पास
संगीत बजवाया
जाये तो भी
संगीत के
स्वर, ध्वनि
की तरंगे उसके
शरीर को छूकर
जीवनशक्ति को
बढ़ाती हैं।
इस प्रकार
संगीत
आरोग्यता के
लिए भी लाभ दायी
है।
जलप्रपात,
झरनों की
कल-कल, छल-छल
मधुर ध्वनी से
भी जीवनशक्ति
का विकास होता
है। पक्षियों
के कलरव से भी
प्राणशक्ति
बढ़ती है।
हाँ, संगीत
में एक अपवाद
भी है।
पाश्चात्य
जगत में
प्रसिद्ध रॉक
संगीत (Rock Music)
बजाने वाले और
सुनने वाले की
जीवनशक्ति
क्षीण होती
है। डॉ.
डॉयमंड ने
प्रयोगों से
सिद्ध किया कि
सामान्यतया
हाथ का एक
स्नायु 'डेल्टोइड' 40 से 45
कि.ग्रा. वजन
उठा सकता है।
जब रॉक संगीत
बजता है तो
उसकी क्षमता
केवल 10 से 15
कि.ग्रा. वजन
उठाने की रह
जाती है। इस
प्रकार रॉक
संगीत से जीवनशक्ति
का ह्रास होता
है और अच्छे
सात्त्विक,
पवित्र संगीत
की ध्वनि से
तथा
प्राकृतिक आवाजों
से जीवनशक्ति
का विकास होता
है।
श्रीकृष्ण
बाँसुरी
बजाया करते तो
उसे सुनने वालों
पर उसका क्या
प्रभाव पड़ता
था यह सुविदित
है।
श्रीकृष्ण
जैसा
संगीतज्ञ
विश्व में और
कोई नहीं हुआ।
नारद जी भी
वीणा और करताल
के साथ हरि
स्मरण किया
करते थे। उन
जैसा
मनोवैज्ञानिक
संत मिलना
मुश्किल है।
वे
मनोविज्ञान
की पढ़ाई करने
स्कूल कॉलेजों
में नहीं गये
थे। मन को
जीवनतत्व में
विश्रान्ति
दिलाने से
मनोवैज्ञानिक
योग्यताएँ अपने-आप
विकसित होती
हैं। श्री
शंकराचार्य
जी ने भी कहा
हैः 'चित्त के
प्रसाद से
सारी
योग्यताएँ
विकसित होती
हैं।'
प्रतीक का
प्रभावः विभिन्न
प्रतीकों का
भी जीवनशक्ति
पर गहरा प्रभाव
पड़ता है। डॉ.
डॉयमंड ने
रोमन क्रॉम को
देखने वाले
व्यक्ति की
जीवनशक्ति
क्षीण होती पायी।
वैज्ञानिक
परीक्षणों से
यह भी स्पष्ट
हुआ है कि
स्वस्तिक
समृद्धि व
अच्छे भावी का
सूचक है। उसके
दर्शन से
जीवनशक्ति
बढ़ती है।
जर्मनी में
हिटलर की नाजी
पार्टी का
निशान स्वस्तिक
था। क्रूर
हिटलर ने
लाखों
यहूदियों को मार
डाला था। वह
जब हार गया तो
जिन यहूदियों
की हत्या की
जाने वाली थी
वे सब मुक्त
हो गये। तमाम
यहूदियों का
दिल हिटलर और
उसकी नाजी
पार्टी के लिए
तीव्र घृणा से
युक्त रहे यह
स्वाभाविक
है। उन
दुष्टों का
निशान देखते
ही उनकी
क्रूरता के
दृश्य हृदय को
कुरेदने लगें
यह स्वाभाविक
है। स्वस्तिक
को देखते ही
भय के कारण
यहूदी की
जीवनशक्ति
क्षीण होनी
चाहिए। इस मनोवैज्ञानिक
तथ्य के
बावजूद भी डॉ.
डायमंड के
प्रयोगों ने
बता दिया कि
स्वस्तिक का
दर्शन यहूदी
की जीवनशक्ति
को बढ़ाता है।
स्वस्तिक का
शक्तिवर्धक
प्रभाव इतना
प्रगाढ़ है।
स्वस्तिक के
चित्र पर
पलकें गिराये
बिना, एकटक
निहारते हुए
त्राटक का
अभ्यास करके
जीवनशक्ति का
विकास किया जा
सकता है।
भगवान राम
जी को राज्य
की जगह बनवास
मिला। भरत जी
अयोध्या आये।
उन्होंने
देखा कि
कौसल्याजी
बहुत विलाप कर
रही हैं तो
उन्होंने
उनके पाँव
पकड़ लिए और
बोले कि "माँ ! तुम
मेरी बात
मानो। राम के
राज्याभिषेक
में विघ्न
डालने के लिए
कैकेयी ने जो
कुछ किया है
या दूसरी जो
बाते हैं वे
मैं बिल्कुल
नहीं जानता
हूँ। मेरा
उनसे
अँशमात्र भी
संबंध नहीं है।
मुझे सौ-सौ
ब्रह्महत्याएँ
करने का पाप
हो, यदि मुझे
उनकी कुछ
जानकारी हो या
उनमें मेरी कोई
चेष्टा रही
हो।
अरुन्धती-वसिष्ठ
को मारने से
जो पाप लगेगा,
वह पाप मुझे
लगे।" ऐसी
उन्होंने शपथ
ली और रोने लग
गये। कौसल्या
ने उनको छाती
से लगाया,
बोलीं- "बेटा ! मैं
जानती हूँ।
इसके लिए शपथ
लेने की
ज़रूरत नहीं
है। शोक मत
करो।"
भरतजी आ गये
हैं यह बात
मालूम पड़ने
पर वसिष्ठजी
राजमंदिर में
आये। भरत को
रोते देखकर
वसिष्ठजी
सांत्वनाप्रद
परमोच्च
उपदेश देने
लगेः
"देखो
भरत ! राजा
दशरथ
बड़े-बूढ़े
थे, ज्ञानी
थेष उनका पराक्रम
सत्य था।
उन्होंने
मर्त्यलोक
में जितना सुख
मिलता है सब
भोगा और
बड़ी-बड़ी
दक्षिणाएँ
देकर
अश्वमेधादि
बड़े-बड़े
यज्ञ किये तथा
उनको राम जैसा
परमेश्वर
पुत्र के रूप
में प्राप्त
हुआ। अंत में
वे देवलोक में
गये और उनको
इन्द्र का अर्धासन
मिला। तुम अब
उनके लिए शोक
मत करो। वे शोक
करने योग्य
नहीं हैं, वे
तो मोक्ष के
पात्र हैं।
यह शरीर
अनित्य है और
आत्मा नित्य
है। शरीर का
व्यय होता है
और आत्मा का
व्यय नहीं
होता। शरीर
अशुद्ध है और
आत्मा शुद्ध
है। शरीर का
जन्म-मरण होता
है, आत्मा का
जन्म मरण नहीं
होता। शरीर
अत्यंत जड़
है, अतयंत
अपवित्र है और
अत्यंत
विनश्वर है
तथा आत्मा
चेतन है, परम
पवित्र है और
अविनाशी है।
यदि आत्मा और
अनात्म इन
दोनों के भेद
का विचार किया
जाये तो कहीं
भी शोक का
अवकाश नहीं
है। कोई भी
मरे, चाहे
पिता मरे चाहे
बेटा मरे – पिता व तनयो
वापि यदि
मृत्युवशं
गतः – मनुष्य
का जीवन है तो
उसके सामने
बाप भी मर सकता
है और बेटा भी
मर सकता है।
यदि ऐसा हो
जाये तो उसके
लिए शोक नहीं
करना चाहिए।
अपने आत्मा को
ताड़ना नहीं
देनी चाहिए।
यह संसार
निःसार है।
यदि
ज्ञानियों के
जीवन में कोई
वियोग का अवसर
आता है तो
उनका वैराग्य
और बढ़ता है
उनकी शांति और
बढ़ती हैं,
उनको और सुख
मिलता है, वे
निश्चिंत हो
जाते हैं।
संसार के
व्यक्तियों
और वस्तुओं का
वियोग
समझदारों को
वैराग्य,
शांति, सुख दे
जाता है।
जो संसार
में जन्म लेता
है उसके पीछे
मृत्यु लगी
हुई है। इसलिए
जिसका जन्म है
उसकी मृत्यु
अपरिहार्य
है। स्वकर्मवशतः
सर्वजन्तूनां
प्रभवाप्ययौ
– अपने-अपने
कर्मों के
अनुसार सभी
प्राणियों का
जन्म और मरण
होता है। जो
समझदार हैं वह
इस तरह संसार
में क्यों शोक
करेगा? अब तक
करोड़-करोड़
ब्रह्मांड
बने हैं और
बिगड़ गये हैं
– ब्रह्माण्डकोटयो
नष्टाः
सृष्टयो
बहुशो गताः – न
जाने कितनी
सृष्टियाँ
बदल गयी हैं,
कितने ही
समुद्र सूख
चुके हैं। यह
तो एक बुलबुला
– क्षणमात्र
का जीवन है,
इसके लिए शोक
करने का क्या
कारण है?
मरणं
प्रकृतिः
शरीरिणां
विकृतिर्जीवितमुच्यते
बुधैः।
जैसे पानी
का बुलबुला
पैदा हुआ तो
मिटकर पानी में
मिल जाना यह
उसका स्वभाव
है। यदि वह
थोड़ी देर तक
बना रहता है
तो यह तो पानी
का विकार है। तो
पानी का विकार
बुलबुले का
होना और पानी
का स्वभाव है
बुलबुले का
मिट जाना।
इसलिए मरना स्वभाव
है, जीना
बिल्कुल
विकार है,
इसके लिए
दुःखी होने का
कोई कारण नहीं
है। जैसे पीपल
के पत्ते की
पूँछ पर, उसकी
नोक पर एक
पानी की बूँद
जाकर लटक गयी
हो, अब गिरी-तब
गिरी.... इसी
प्रकार इस
जीवन की
स्थिति है।
आप तीन
विभाग कर लो।
संसार को
देखनेवाला
जीवात्मा,
करोड़-करोड़
अनगिनत
जीवात्माओं
को देखने वाला
एक परमेश्वर
और उस परमेश्वर
का प्रकाशक
स्वयं प्रकाश
साक्षात्
परब्रह्म,
जिसमें ईश्वर,
जीव, जगत का
कोई भेद नहीं
है। वह अपना
अनुभवस्वरूप
है। वह
आनंदस्वरूप
है, बुद्धि
आदि का
साक्षी है।
उसमें सृष्टि
का
उत्पत्ति-लय
बिल्कुल नहीं
है।
महावाक्य के
द्वारा इसकी
वृत्ति
अंतःकरण में
करायी जाती है
और जब वह
अज्ञान को
मिटा देती है
तो उसके साथ
स्वयं मिट
जाती है तथा
आत्मा से
अभिन्न परमात्मा
ही रहता है।
जो सबसे परे
परमात्मा है
वह एक ही है और
अद्वितीय है,
उसके सिवाय
दूसरी कोई
वस्तु नहीं
है, वह सम है।
इस प्रकार
आत्मा का दृढ़
ज्ञान
प्राप्त करे
शोक छोड़ दो
और पिता का
क्रियाकर्म
करो।"
जब गुरुजी
ने ऐसा समझाया
तो भरत जी ने
अज्ञानजनित
शोक छोड़ दिया
और गुरु के
बताये हुए ढंग
से पिता की
अंतक्रिया
की।
गुरु
अंतःकरण में
ज्ञान-वृत्ति
का सर्जन करते
हैं, विभिन्न
दृष्टान्तों
एवं
युक्तियों से
उसे पुष्ट
करते हैं, तथा
अंत में
अज्ञान का
संहार कर
ज्ञानवृत्ति
को भी बाधित
कर देते हैं।
फिर निर्दुःख,
निःशोक
सहजावस्था
में स्थिति हो
जाती है।
इसलिए
शास्त्र कहते
हैं-
गुरुर्ब्रह्मा
गुरुरविष्णुः
गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुर्साक्षात्परब्रह्म
तस्मै
श्रीगुरवे
नमः।।
'स्कन्द
पुराण' के
ब्रह्म खण्ड
के अन्तर्गत 'चातुर्मास्य
माहात्म्य' में
आता हैः
सूर्य के
कर्क राशि पर
स्थित रहते
हुए आषाढ़ शुक्ल
एकादशी से
लेकर कार्तिक
शुक्ल एकादशी
तक
वर्षाकालीन
इन चार महीनों
में भगवान
विष्णु
शेषशय्या पर
शयन करते हैं।
श्री हरि की
आराधना के लिए
यह पवित्र समय
है। सब तीर्थ,
देवस्थान, दान
और पुण्य
चतुर्मास आने
पर भगवान विष्णु
की शरण लेकर
स्थित होते
हैं। जो
मनुष्य चतुर्मास
में नदी में
स्नान करता है
वह सिद्धि को
प्राप्त होता
है। तीर्थ में
स्नान करने पर
पापों का नाश
होता है।
जो मनुष्य
जल में तिल और
आँवले का
मिश्रण अथवा
बिल्वपत्र
डाल कर उस जल
से स्नान करता
है, उसमें दोष
का लेषमात्र
भी नहीं रह
जाता।
चतुर्मास में
बाल्टी में एक
दो बिल्वपत्र
डालकर ॐ
नमः शिवाय का
4-5 बार जप करके
स्नान करें तो
विशेष लाभ
होता है। इससे
वायुप्रकोप
दूर होता है
और स्वास्थ्य की
रक्षा होती
है।
चतुर्मास
में भगवान
नारायण जल में
शयन करते हैं,
अतः जल में
भगवान विष्णु
के तेज का अंश
व्याप्त रहता
है। इसलिए उस
तेज से युक्त
जल का स्नान
समस्त तीर्थों
से भी अधिक फल
देता है।
ग्रहण के
सिवाय के दिनों
में
संध्याकाल
में और रात को
स्नान न करें।
गर्म जल से भी
स्नान नहीं
करना चाहिए।
चतुर्मास सब
गुणों से
युक्त
उत्कृष्ट समय
है, उसमें
श्रद्धापूर्वक
धर्म का
अनुष्ठान करना
चाहिए। यदि
मनुष्य
चतुर्मास में
भक्तिपूर्वक
योग के अभ्यास
में तत्पर न
हुआ तो
निःसंदेह उसके
हाथ से अमृत
गिर गया।
बुद्धिमान
मनुष्य को
सदैव मन को
संयम में रखने
का प्रयत्न
करना चाहिए
क्योंकि मन के
भलीभाँति वश
में होने से ही
पूर्णतः
ज्ञान की
प्राप्ति
होती है।
परद्रव्य का
अपहरण और
परस्त्रीगमन
आदि कर्म सदा
सब मनुष्यों
के लिए वर्जित
है। चतुर्मास
में इनसे
विशेषरूप से
बचना चाहिए।
चतुर्मास
में जीवों पर
दया करना
विशेष धर्म है
तथा अन्न जल व
गौओं का दान,
प्रतिदिन
वेदपाठ और हवन
– ये सब महान फल
देने वाले
हैं। अन्नदान सबसे
उत्तम है।
उसका न रात
में निषेध है
न दिन में।
शत्रुओं को भी
अन्न देना मना
नहीं है।
चतुर्मास
में धर्म का
पालन,
सत्पुरुषों
की सेवा,
संतों के
दर्शन,
सत्संग-श्रवण,
भगवान विष्णु
का पूजन और
दान में
अनुराग
दुर्लभ माना
गया है।
जो चतुर्मास
में भगवान की
प्रीति के लिए
अपने प्रिय
भोग का
प्रयत्नपूर्वक
त्याग करता
है, उसकी
त्यागी हुई
वस्तुएँ उसे
अक्षयरूप में
प्राप्त होती
हैं। जो
मनुष्य
श्रद्धापूर्वक
प्रिय वस्तु
का त्याग करता
है वह अनंत फल का
भागी होता है।
धातु के
पात्रों का
त्याग करके
पलाश के पत्तों
पर भोजन करने
वाला मनुष्य
ब्रह्मभाव को
प्राप्त होता
हैं।
चतुर्मास में
ताँबे के
पात्र में
भोजन करना
विशेष रूप से
त्याज्य है।
चतुर्मास में
काला और नीला
वस्त्र पहनना
हानिकारक है।
इन दिनों में
केशों को
सँवारना(हजामत
करवाना) त्याग
दे तो वह
मनुष्य तीनों
तापों से रहित
हो जाता है।
इन चार महीनों
में भूमि पर
शयन,
ब्रह्मचर्य
का पालन,
पत्तल में
भोजन, उपवास,
मौन, जप, ध्यान,
दान-पुण्य आदि
विशेष
लाभप्रद हैं।
चतुर्मास में
परनिंदा का
विशेषरूप से
त्याग करें।
परनिंदा को सुनने
वाला भी पापी
होता है।
परनिन्दा
महापापं
परनिन्दा
महाभयम्।
परनिन्दा
महद् दुःखं न
तस्याः पातकं
परम्।।
"परनिन्दा
महान पाप है,
परनिंदा महान
भय है,
परनिंदा महान
दुःख है और
परनिंदा से
बढ़कर दूसरा
कोई पातक नहीं
है।"
(स्कं.पु.ब्रा.चा.मा.
4.25)
व्रतों में
सबसे उत्तम
व्रत है –
ब्रह्मचर्य का
पालन।
ब्रह्मचर्य
तपस्या का सार
है और महान फल
देने वाला है।
इसलिए समस्त
कर्मों में
ब्रह्मचर्य
बढ़ायें।
ब्रह्मचर्य
के प्रभाव से
उग्र तपस्या
होती है।
ब्रह्मचर्य
से बढ़कर धर्म
का उत्तम साधन
दूसरा नहीं
है। विशेषतः
चतुर्मास में
यह व्रत संसार
में अधिक
गुणकारक है,
ऐसा जानो।
यदि धीर
पुरुष
चतुर्मास में
नित्य परिमित
अन्न का भोजन
करता है तो वह
सब पातकों का नाश
करके वैकुंठ
धाम को पाता
है। चतुर्मास
में केवल एक
ही अन्न का
भोजन करने
वाला मनुष्य रोगी
नहीं होता। जो
मनुष्य
चतुर्मास में
प्रतिदिन एक
समय भोजन करता
है उसे 'द्वादशाह
यज्ञ' का फल
मिलता है। जो
मनुष्य में
चतुर्मास में केवल
दूध पीकर अथवा
फल खाकर रहता
है, उसके
सहस्रों पाप
तत्काल विलीन
हो जाते हैं।
पंद्रह दिन
में एक दि
संपूर्ण
उपवास करें तो
वह शरीर के
दोषों को जला
देता है और
चौदह दिनों में
भोजन का जो रस
बना है उसे ओज
में बदल देता
है। इसलिए
एकादशी के
उपवास की
महिमा है।
वैसे तो
गृहस्थ को
महीने में
केवल
शुक्लपक्ष की
एकादशी रखनी
चाहिए किंतु
चतुर्मास की
तो दोनों
पक्षों की
एकादशियाँ
रखनी चाहिए।
चतुर्मास
में भगवान
नारायण
योगनिद्रा
में शयन करते
हैं इसलिए चार
मास
शादी-विवाह और
सकाम यज्ञ
नहीं होते। ये
चार मास
तपस्या करने
के हैं।
मेरठ (उ.प्र.)
में
रामनारायण व
जयनारायण नाम
के दो भाई
रहते थे। उनकी
एक छोटी बहन
थी – प्रेमा। उनके
माता-पिता
स्वर्गवासी
हो गये थे।
बड़े भाई
रामनारायण
जमींदार थे और
छोटे भाई
जयनारायण
वकील बन गये
थे।
रामनारायण व
प्रेमा सत्संग,
कीर्तन,
प्रभुभक्ति
में रूचि रखते
थे तथा जयनारायण
पाश्चात्य
जीवन शैली से
प्रभावित थे।
प्रेमा जब
विवाह योग्य
हुई तब दोनों
भाई उसके लिए
सुयोग्य वर
खोजने लगे।
रामनारायण धर्मनिष्ठ
व
सच्चरित्रवान
वर खोजने लगे
व जय नारायण
अपने जैसी
विचारधारा
वाला वर तलाश
करने लगे। इसी
बात को लेकर
दोनों भाइयों
में मनमुटाव
हो गया।
जयनारायण ने
घर छोड़ दिया
और अपनी पत्नी
को लेकर दूसरे
मोहल्ले में
रहने लगे। रामनारायण
ने प्रेमा का
विवाह एक
सच्चरित्र युवक
के साथ कर
दिया।
समय बीता।
एक दिन प्रेमा
ससुराल से
अपने बड़े भाई
के आयी हुई
थी। एक शाम को
वह झूला झूल
रही थी कि
जयनारायण किसी
कार्यवश उधर
से गुजरे।
प्रेमा की
जयनारायण की
तरफ पीठ थी
इसलिए वह भाई
को नहीं देख
पायी परन्तु
उन्होंने बहन
को देख लिया।
वकील बाबू ने
सुना कि
प्रेमा गा रही
हैः
भगीरथ
की
प्रभुप्रीति
तपस्या,
गंगा
धरती पे लायी।
घर-घर
में बहे प्रेम
की गंगा,
रहे न
कोई दिल
खाली।।
हर
दिल बने मंदिर
प्रभु का,
यदि
गुरुज्ञान
ज्योति जगा
ली।
मेरे
भैया दोनों
नारायण,
मैं
हूँ ईश्वर की
लाडली।।
वकील बाबू
ने सोचा, "जिसे
मैंने भुला
दिया था, वह
मुझे अब भी
स्मरण कर रही
है।"
बात हृदय को
चोट कर गयी।
वे बहन और भाई
के लिए तड़पने
लगे। आखिर
संस्कारी खानदान
का खून रगों
में था। अपनी
भूल के लिए
पश्चाताप
करते हुए
जयनारायण
उदास रहने
लगे। खाने-पीने
से भी उनकी
वृत्ति हट
गयी।
उद्विग्नता अत्यंत
बढ़ने के कारण
एक दिन उन्हें
तेज बुखार हो
गया।
एक हफ्ते
बाद प्रेमा ने
सुना कि
जयनारायण
बहुत बीमार
हैं। वह बड़े
भाई के कमरे
में गयी और
बोलीः "छोटे
भैया बहुत
बीमार हैं।"
"मुझे
पता है तुम
उससे मिलने
जाना चाहती हो
लेकिन प्रेमा !
वहाँ तुम्हें
व्यर्थ ही
अपमानित होना
पड़ेगा यह
पहले ही समझ
लेना।"
"भैया !
मान-अपमान आया
जाया करते हैं
पर अपनी
संस्कृति का 'हृदय
की विशालता व
मिल-जुलकर
रहने का
सिद्धान्त
शाश्वत है। आप
ही तो गाया
करते हैं।
सत्य
बोलें झूठ
त्यागें मेल
आपस में करें।
दिव्य
जीवन हो हमारा
यश 'तेरा' गाया
करें।।
"शाबाश !
तुम्हारे
विचारों की
सुवास
जयनारायण के
घर को भी
महकायेगी।"
जयनारायण के
घर पहुँचकर
प्रेमा ने
देखा कि वे
पलंग पर बेहोश
पड़े हैं। एक
ओर रमा भाभी
खड़ी हैं व
दूसरी ओर
डॉक्टर खड़े
हैं।
डॉक्टरः "इनके
शरीर में रक्त
की बहुत कमी
हो गयी है, नसें
तक दिखाई दे
रही हैं।"
रमाः "कुछ भी
खाते पीते
नहीं हैं।
कभी-कभी बस
इतना ही कह
उठते हैं – मेरे भैया
दोनों नारायण,
मै हूँ ईश्वर
की लाडली।।
"यह
सन्निपात का
लक्ष्ण है।"
"डॉक्टर
साहब ! पास जो
कुछ है सब ले
लीजिए परन्तु
इनके प्राण बचा
लीजिए।"
"प्राण
बचाना
परमात्मा के
हाथ में है।
डॉक्टर का काम
तत्काल कोशिश
करना है।
इन्हें
तत्काल खून
चढ़ाना
पड़ेगा।"
"मेरा
खून ले लीजिए।"
"आप
गर्भवती हैं,
आपका खून लेना
ठीक नहीं।"
"डॉक्टर
साहब ! मैं
स्वस्थ हूँ,
मेरा खून ले
लीजिए !" –
दरवाजे में
खड़ी प्रेमा
बोल उठी।
रमाः "नहीं
प्रेमा ! आप रहने
दीजिए।"
"क्यों
भाभी?"
"हमने
आपसे बहुत
गल्त व्यवहार
किया है। आपकी
शादी में भी
हमलोग शामिल
नहीं हुए थे
और एक पैसा भी
हमने खर्च नहीं
किया। आप हमसे
नाराज नहीं
हैं?"
"बहन का
आदर्श यह नहीं
है कि वह किसी
भूल के कारण
अपने भाई से
सदा के लिए
नाराज हो
जाये। मेरे गुरुदेव
कहते हैं-
बीत
गयी सो बीत
गयी,
तकदीर
शिकवा कौन
करे।
जो
तीर कमान से
निकल गया,
उस तीर
का पीछा कौन
करे।।"
डॉक्टर ने
प्रेमा का
ब्लॅड ग्रुप
जाँचकर खून ले
लिया और वकील
साहब को चढ़ा
दिया। एक
हफ्ते में ही
जयनारायण
स्वस्थ हो
गये। वे
रामनारायण के
घर आये। तब
प्रेमा वहीं
थी। जयनारायण ने बड़े
भाई के चरणों
पर अपना सिर
रख दिया व
सिसक-सिसककर
रोने लगे।
रामनारायण ने
उन्हें उठाया
और छाती से
लगा लिया। सभी
की आँखों से
प्रेमाश्रु
बरसने लगे।
"भाई
साहब ! मुझे
क्षमा कर
दीजिए। मुझे
अपने घर में
रहने की
अनुमति
दीजिए।"
"अनुमति?.... यह
तुम्हारा ही
घर है।"
"भैया ! आप
पिता जी के
समान हैं।
आपने मुझे
पढ़ाया-लिखाया,
योग्य बनाया
है और मैंने...."
"दुःखी
मत होओ। सुबह
का भूला शाम
को घर लौट आये तो
उसे भूला नहीं
कहते। तुम आज
ही यहाँ आ
जाओ।"
"प्रेमा !
मेरी हिम्मत
नहीं होती कि
तुम्हारी
नज़र से नज़र
मिला सकूँ।
मैं भाई का
आदर्श भूल गया
परन्तु तुम
बहन का आदर्श
नहीं भूली।"
"हिन्दू संस्कृति
व संतों के
अनुसार बहन का
जो आदर्श है,
उसी का मैंने
पालन किया है।
यह तो मेरा
कर्तव्य ही
था। यदि तारीफ
करनी ही है तो
मेरी नहीं, अपनी
संस्कृति व
संतों की करो।"
दूसरे दिन
जयनारायण
अपनी पत्नी
सहित उस घर में
लौट आये।
सत्संग के
संस्कारों ने,
संस्कृति के आदर्शों
ने टूटे हुए
दिलों को
प्रेम की डोर
से जोड़ दिया।
हे भारत की
धरा ! हे
ऋषिभूनि ! तेरे
कण-कण में अभी
भी कितने पावन
संस्कार हैं ! हे
भारत वासियो ! हे
दिव्य
संस्कृति के
सपूतो ! आप अपने
महापुरुषों
के स्नेह के,
हृदय की विशालता
के संस्कारों
को मत भूलो।
ये संस्कार
घर-घर में
दिल-दिल में
प्रेम की गंगा
प्रकटाने का
सामर्थ्य
रखते हैं।
पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से
आपको दैवयोग से कोई ऊँचा पद मिल जाये, देव की दी हुई सिद्धि, देव का दिया हुआ प्रसाद, गुरुजनों का दिया हुआ प्रसाद-हार, उसका अगर आप आदर नहीं करते तो आपके यहाँ से वह चीज़ चली जाती हैं। गुरु की दी हुई कृपा, तेज, बल, प्रसन्नता का आदर नहीं किया तो चली जायेगी। देवदत्त, गुरुदत्त, ईश्वरदत्त प्रसाद का आदर करते हैं तो बढ़ता है, अगर कद्र नहीं करते तो नष्ट हो जाता है।
गंगा माँ ने जटाशंकर को एक कंगन प्रसाद में दिया था। जटाशंकर ने वह राजा को दे दिया, राजा ने रानी को दे दिया। रानी ने कंगर फेंक के शोक कर दिया कि 'एक कंगन से क्या, ऐसा दूसरा लाओ।' उसने कंगन फेंका तो वह चला गया, अदृश्य हो गया क्योंकि वह देवदत्त वस्तु थी तो देवदत्त चीज़ का आदर न करों तो खिसक जाती है।
गुरु भी दिखते शरीर में हैं लेकिन गुरु का आत्मदेव तो देव ही है न ! और गुरु के हृदय में देव हैं। अगर गुरु के हृदय को ठेस पहुँचायी और उस देव की उफ् आयी तो कहाँ पहुँचा देगी! कितने जन्मों में क्या कर दे ! उनकी दुआ काम कर लेती है, हजारों-लाखों का चित्त पावन कर देती है तो उनकी नाराज़ी भी तो काम करेगी ! छल, छिद्र, कपट से कोई गुरुजी को रिझा ले या गुरुजी को प्रसन्न करे ऐसा नहीं होता। हम कभी ऐसा व्यवहार नहीं करें कि हमारे गुरुजी नाराज हो जायें क्योंकि
गुरुकृपा ही केवलं
शिष्यस्य परं
मंगलम्।
आकल्पजन्मकोटीनां यज्ञव्रततपः
क्रियाः।
ताः सर्वाः सफला देवि गुरुसंतोषमात्रतः।।
आत्मरामी गुरु
के हृदय में
आपके व्यवहार से
संतोष है तो
आपके करोड़ों यज्ञ,
करोड़ों
जन्मों के तप,
व्रत
सबका फल गुरु
की कृपा यूँ डाल
देती है ! हमको
उसी से तो मिला।
कंगला मेहनत
करके कब करोड़पति
बनेगा? समझदार
बच्चा तो
करोड़पति की
गोद में गया तो
करोड़पति बन
गया, ऐसे
ही गुरुकृपा की
झोली में चले
जाते हैं तो उसी
समय
भगवत्प्रसाद !
ऐसा
कुप्रचार
किया जा रहा
है कि पूज्य
संत श्री
आसारामजी
बापू 'वशीकरण
विद्या' आजमाते
हैं। आश्रम
वशीकरण
विद्या की बात
को स्वीकार
नहीं करता।
जिस प्रकार
कोयल अपनी मीठी
वाणी से जगत
को वश में कर लेता
है, उसी
प्रकार पूज्य
बापू जी के
श्रीमुख से
प्रवाहित
गीता, भागवत,
रामायण,
उपनिषद, षडदर्शन
एवं वेदों के
उपदेशों का
अमृत जनमानस
को उनके
सत्संग में
खींच
लाता है।
आभामंडल
विशेषज्ञ डॉ.
तापरला हीरा
ने इस रहस्य
का वैज्ञानिक
प्रमाण खोजने
के लिए पूज्ज
श्री की आभा
का अध्ययन
करके बताया कि
उनकी आभा इतनी
शक्तिशाली और
व्यापक है कि
उसके दिव्य
प्रभाव से लोग
अपने आप उनकी
ओर खिंचे चले
आते हैं।
स्वामी
विवेकानंद और
रामतीर्थ
जैसे
महापुरुषों का
व्यक्तित्व
भी ऐसे भगवदीय
आकर्षण से
सम्पन्न था।
श्री कृष्ण के
बंसीनाद से
प्रभावित होकर
पशु-पक्षी,
मानव सुध-बुध
भूल के वशीभूत
होकर उनकी ओर
खिंचकर चले
आते थे। पूज्य
बापू जी के
श्रीमुख से
उन्हीं भगवान
श्रीकृष्ण की
गीता के
सत्संग की
जहाँ वर्षा
होती हो, वहाँ
लाखों-करोड़ों
साधक-श्रद्धालु
खिंचकर आयें
तथा उसे
कुप्रचार
करने वाले
वशीकरण कहते
हों तो यह
वशीकरण
भारतीय
संस्कृति का
है, भगवान श्रीकृष्ण
का है,
महापुरुषों
का है। ऐसे
ज्ञानोपदेश
के रसपान के
जादू को रोकने
हेतु पिछले पाँच
हजार वर्षों
में इस देश पर
हीन वृत्ति के
लोगों ने,
विधर्मियों
ने और विदेशी
आक्रान्ताओं
ने कई हमले
किये परन्तु
वे सफल नहीं हो
पाये।
आश्रम के
विरुद्ध
कुप्रचार
किया जा रहा
है कि गुरुकुल
के बालकों की
बलि चढ़ायी
गयी होगी। यह
बात इतनी
घृणास्पद व
दुःखद है कि
इससे भारत पर
फैले हुए
सैंकड़ों
आश्रमों एवं
करोड़ों साधकों
व
श्रद्धालुओँ
को आघात
पहुँचा है।
बापू जी के
सत्संग में
आने के बाद और दीक्षा
लेने के बाद
शिष्य-भक्त
मांस, मछली व अंडे
जैसे पदार्थ न
खाने की
प्रतिज्ञा
लेते हैं और
परम्परागत
रूप से पशुबलि
देने वाले कई
समूहों को
पशुबलि न
चढ़ाने के
लिये समझाया
जाता है। ऐसे
में बालकों की
बलि की
घृणास्पद बात
फैलाने वाले
आश्रम द्वारा
चलाये जा रहे
भारतीय सनातन
संस्कृति के
प्रचार
प्रसार के यज्ञ
में हड्डियाँ
डालने जैसी
प्रवृत्ति कर
रहे हैं, जो कि
धर्महित,
देशहित,
समाजहित और
हमारी
संस्कृति के
हित के लिए
बंद होनी
चाहिए। दुनिया
के सैंकड़ों
देशों में
लाखों लोगों
की आकस्मिक
मृत्यु होती
है, फिर भी उस
निमित्त को
इतना विकृत
रूप देकर
मीडिया के
द्वारा राजनैतिक
अस्थिरता
पैदा करना,
निर्दोष जनता
पर पथराव
करना,
गाड़ियाँ
जलाना आदि
किसी भी देश
में नहीं
होता।
भगवान
श्रीकृष्ण को
खत्म करने के
लिए कंस मैदान
में आ गया था,
भगवान बुद्ध व
महावीर को
हैरान,
परेशान, बदनाम
करने के लिए
उनके समकालीन
निंदकों ने
समस्त
दाँव-पेंच
अपनाये थे।
जिन भी
अवतारों,
महापुरुषों
ने वैदिक
सनातन
संस्कृति के
प्रचारक व
प्रहरी का काम
किया है या
समाज-सेवा,
धर्म-सेवा एवं
समाज सुधार का
बिगुल फूँका
है, उनकी
लोकप्रियता
से भयभीत होकर
असमाजिक
तत्त्वों ने
उन्हें बदनाम
करने में
सताने में कोई
कमी नहीं रखी।
मंसूर को सूली
पर चढ़ाया
गया, जीसस को
क्रॉस पर
चढ़ाया गया,
सुकरात को जहर
दिया गया,
मुहम्मद
पैगंबर को
मक्का से
मदीना हिजरत
करने के लिए
विवश किया गया
– इतिहास ऐसे
सैंकड़ों
दृष्टान्तों
से भरा पड़ा
है। ऐसे में
पूज्य आसारामजी
बापू, जिनके
करोड़ों
अनुयायी हैं,
को बदनाम करने
के लिए
विभिन्न रूप
से स्वार्थी तत्त्व
मैदान में आये
हैं तो इसमें
कोई आश्चर्य
नहीं है।
व्यक्ति की
देह से भी
उसके ईश्वर,
अपनी संस्कृति
तथा धर्म के
प्रति
श्रद्धा अधिक
कीमती है। आज
यूरोप,
अमेरिका व
रशिया का
श्रद्धाविहीन
समाज विनाश की
ओर धकेला जा
रहा है। ऐसे
समय में कठोर
परिश्रम के
बाद करोड़ों
व्यक्तियों
के हृदय में
धर्म,
संस्कृति और राष्ट्रहित
के लिए संतों
द्वारा पैदा
की हुई श्रद्धा
को अपने
अहंकार की
पूर्ति के
लिए, क्षुद्र
स्वार्थ के
लिए तोड़ना,
यह लाखों मानवों
की हत्या करने
के समान माना
जायेगा और ऐसा
महापाप करने
वाले
तत्त्वों को
ईश्वर माफ नहीं
करते हैं –
इतिहास
साक्षी है।
आश्रम के
भक्तजन बाल
संस्कार
केन्द्र
चलाते हैं,
संकीर्तन
यात्राओं के
द्वारा
जनजागृति करते
हैं, गरीबों
में भंडारे के
द्वारा उन्हें
अनाज-कपड़े
तथा
जीवनावश्यक
वस्तुओँ का
वितरण करते हैं,
युवाधन
सुरक्षा
अभियान चलाते
हैं, मांसाहार
का निषेध करते
हैं। आश्रम के
द्वारा ऐसी
समाज कल्याण (social welfare) की
सर्वहितकारी (public interest) की सेवा
प्रवृत्तियाँ
होती हैं।
आश्रम के एक-एक
कोने, एक-एक
वृक्ष, एक-एक
कमरे का उपयोग
सभी जाति
वालों के लिए
खुला है।
आश्रम
द्वारा साल
में लाखों
मरीजों की
चिकित्सा
सेवा की जाती
है। लाखों
पिछड़े लोगों,
आदिवासियों,
वंचितों,
गरीबों,
विधवाओँ
अनाथों को भंडारों
के द्वारा
अन्न, वस्त्र,
बर्तन आदि का
दान किया जाता
है। भारत भर
में अनेक
स्थानों पर
लाखों लोगों
को निःशुल्क
अनाज-वितरण
किया जाता है।
आश्रम द्वारा 'पातंजल
योगविज्ञान'
अनुरूप अनेक
तालिमबद्ध
प्रशिक्षकों
द्वारा
सैंकड़ों
शिविरों के
माध्यम से
विद्यार्थियों
को
मार्गदर्शन
दिया जा रहा
है। बड़ी संख्या
में विद्वान,
वैज्ञानिक,
न्यायाधीश,
पत्रकार,
सांसद,
विधायक,
मंत्री एवं
देश का प्रबुद्ध
वर्ग पूज्य
बापूजी के
सत्संग-मार्गदर्शन
से लाभान्वित
होकर अपने को
धन्य कर रहा है।
भक्तों की
विशाल संख्या
को ध्यान में
रखते हुए इस
वर्ष देश के
सात स्थानों
पर
गुरुपुर्णिमा
महोत्सव का
आयोजन किया
गया था, ताकि लोगों
को परिश्रम न
पड़े। हर जगह
पूज्य बापू जी
द्वारा यह
घोषणा की गयी
कि 'चीज़-वस्तु,
रुपया-पैसा,
दान नहीं
चाहिए।
तू तेरा उर
आँगन दे दे,
मैं अमृत की
वर्षा कर दूँ।'
सभी
पार्टियों के
नगरसेवक,
विधायक, सांसद
और मंत्री
बापू जी के
सत्संग में
आते हैं, बापू
जी का आशीर्वाद
पाते हैं और
सफल हो जाते
हैं। बापू जी
के
करोड़ों-करोड़ों
श्रोता हैं।
गुरुपूर्णिमा
पर्व पर अपनी
श्रद्धा-भक्ति
अभिव्यक्त करने
के लिये
प्रत्येक
स्थान में
लाखों-लाखों श्रद्धालु
भक्तों का
मानव समूह
उमड़ पड़ा था।
आश्रम के
बारे में
भ्रामक
प्रचार किया
जा रहा है कि
आश्रम में
तांत्रिक
विद्या का
प्रयोग होता
है। इस बारे
में स्पष्ट
किया जाता है
कि आश्रम में
न तो तांत्रिक
विद्या का
प्रयोग किया
जाता है और न
ही उसे समर्थन
या सहयोग दिया
जाता है।
वेदोक्त संयम
तथा
ब्रह्मचर्य
का प्रचार
किया जाता है।
आश्रम ने गीता
और वेदांत में
प्रशस्त
कर्मयोग,
ज्ञानयोग और
भक्तियोग का
मार्ग अपनाया
है। आश्रम
समाज और
गरीब-गुरबों
की सेवा
द्वारा
कर्मयोग,
ध्यान द्वारा ज्ञानयोग,
आत्मबोध और
सर्वशक्तिमान
एक ईश्वर की
सम्पूर्ण
शरणागति की
साधना द्वारा
भक्तियोग के
प्रचार-प्रसार
में रत है तथा
सदाचरण द्वारा
सर्वांगीण
विकास के
विचारों से
ओतप्रोत है।
इसका
प्रत्यक्ष
प्रमाण पूज्य
बापू जी के
सत्संग है, जो
एक खुली किताब
है, जिसे गत
अनेक वर्षों
से आम जनता
ऑडियो व
विडियो
माध्यमों से
सुन व देख रही
है।
पूज्य बापू
जी ने केवल
यूरोप,
अमेरिका में
ही नहीं,
अपितु पाकिस्तान
में भी भारतीय
संस्कृति की
ध्वजा फहरायी
है। वे
पाकिस्तान के
विभिन्न
स्थानों में हजारों
हिन्दुओँ और
मुसलमानों को
बीच भारत की वैदिक
परम्परा एवं
संत-सूफी
परम्परा की
सत्संग-वर्षा
करने वाले
लोकसंत हैं।
पाकिस्तान के
हिन्दू-मुसलमान
सभी ने उनका
सत्संग पाकर
धन्यता का
अनुभव किया।
सन् 1893 में
शिकागो में 'विश्वधर्म
संसद' में
स्वामी
विवेकानंदजी
ने भारतीय
संस्कृति का
प्रतिनिधित्व
किया था, उसी
प्रकार बापू जी
ने सन् 1993 में
आयोजित 'विश्वधर्म
संसद' में भारत
का
प्रतिनिधित्व
करके समग्र
विश्व में देश
का गौरव
बढ़ाया था।
उपर्युक्त
परिस्थितियों
में जब तक
गुजरात एवं
देश की आम
जनता
कुप्रचार से
गुमराह हुए
बिना, दूध का
दूध और पानी
का पानी करने
के लिए कटिबद्ध
ने हो, तब तक
संतों को
सताने, हमारी
संस्कृति को
मिटाने,
हिन्दू-हिन्दू
को लड़ाने के
ये षडयंत्र
चलते रहेंगे।
वाघेला
परिवार के दो
कुलदीपकों के
आकस्मिक
देहावसान से
उनके परिजनों
को जितना आघात
लगा है, उतना
ही आघात और दुःख
बापू जी सहित
समग्र आश्रम
परिवार को हुआ
है। इस
सम्पूर्ण
घटनाक्रम के
विषय में जाँच
चल रही है।
आश्रम किसी भी
न्यायिक जाँच
के लिए पूरी
तरह सहयोग
देगा और किसी
भी उच्चस्तरीय
एजेन्सी
द्वारा जाँच
का स्वागत
करता है तथा
इस घटना को
लेकर कोई
टिप्पणी करके
न्यायिक
प्रक्रिया
में अवरोधरूप
नहीं बनना
चाहता है।
आश्रम
द्वारा पुलिस
व
प्रचार-माध्यमों
के समक्ष पूरी
पारदर्शिता
रखते हुए पूरी
जानकारियाँ
एवं सहयोग
दिया गया।
पुलिस की
जाँच-प्रक्रिया
चालू है,
निर्णय अभी तक
घोषित नहीं
हुआ। फिर भी
संस्था को
गुनहगार
मानते हुए देश
के कोने-कोने
से आये हुए
निर्दोष,
भगवतप्रेमी
भक्तजनों पर
कुछ असमाजिक
तत्त्वों ने
अपने स्वार्थ
के लिए किराये
के गुंडे लाकर
जिस तरह से पथराव,
बेरहमी से
मारपीट, बहनों
के साथ बीभत्स
व्यवहार किया,
भक्तों के
वाहन जलाये,
उनकी धार्मिक
स्वतन्त्रता
का हनन किया,
उसकी हम कड़े-से-कड़े
शब्दों में
भर्त्सना
करते हैं। निर्दोष,
मासूम बालकों
की चिताओं पर
अपने क्षुद्र
स्वार्थ की
रोटियाँ
सेंकने वालों
के षडयंत्र की
भी
उच्चस्तरीय
जाँच होनी
चाहिए और
दोषियों को
कड़ी-से-कड़ी
सजा दी जानी
चाहिए।
पूज्य बापू
जी ने कहा कि 'अमदावाद
के लोग मुझे
अच्छी तरह
पहचानते हैं। अमदावाद
के लोग सज्जन
व अच्छे हैं,
उनको बदनाम
नहीं होने
दिया जाये।
किराये के
आदमी लाकर असमाजिक
तत्त्वों
द्वारा
बदनियती से यह
साजिश करायी
गयी है। भगवान
सबका मंगल
करे। आप भी
खुश रहें,
सुखी रहें व
दूसरों को भी
खुश करें,
सुखी रखें।
भक्त
परिवार
आश्रम की
जमीनों के
बारे में कुछ
समाचार पत्र-पत्रिकाओं
एवं टी.वी.
चैनलों
द्वारा
भ्रामक प्रचार
किया जा रहा है।
वास्तविकता
यह है किः
दिल्ली में
रीज आश्रम
मनोकामनासिद्ध
हनुमान मंदिर
का ट्रस्ट
बाबा
बालकदासजी का
बनाया हुआ था
व हनुमान
मंदिर उसी
ट्रस्ट के
अन्तर्गत चल
रहा है।
महाराज और
बापूजी मित्र
थे। बाद में
विवादाग्रस्त
भूमि कहकर मा.
सर्वोच्च
न्यायालय तक
मामला चला और
मा. सर्वोच्च
न्यायालय के
आदेश से वहाँ
आश्रम
सत्प्रवृत्तियाँ
कर रहा है।
साधक, हजारों
दर्शनार्थी
उसी प्राचीन
मंदिर का लाभ
लेते हैं।
रजोकरी
आश्रम की जमीन
क्रेशरवालों
व किसानों से
खरीदी गयी है
और रजोकरी
गाँव के
बच्चों को
निःशुल्क
पढ़ाया भी
जाता है और
पौष्टिक आहार
भी दिया जाता
है। गायों के
लिए गौशाला भी
है, जहाँ
गायों की सेवा
होती है।
गौशाला, औषधालयों
में चिकित्सा,
स्कूल में
निःशुल्क आहार
व पढ़ाई – जैसे
सेवाकार्यों
को प्रकाशित
करने के बदले
विकृत ढंग से
लिखकर समाज व
प्रशासन को
क्यों गुमराह
किया जा रहा
है? इस सेवायज्ञ
में क्यों
हड्डियाँ
डालते हो? ऐसे
सेवाकार्यों में
कुप्रचार का
जहर क्यों
घोलते हो?
सूरत की
जमीन कोई 80
करोड़, कोई 125
करोड़ की बता
रहे हैं। यह 10-12
साल पहले
सरकार ने
आश्रम को दी
थी। जमीन की
मूल बाजार
कीमत पर आठ
वर्षों का 12 % ब्याज
जोड़कर सरकार
को पैसा जमा
कराया गया था।
भूमि समतल एवं
विकास खर्च
तथा सारे
पक्के
निर्माण
कार्य – 1625 फुट
लम्बी
रिटेनिंग
दीवाल, शिव
मंदिर, हनुमान
मंदिर, बाल
संस्कार
केन्द्र आदि
के निर्माण के
पश्चात हुई इस
जमीन की बाजार
कीमत मा. उच्च
न्यायालय के
निर्णय के
पृष्ठ क्र. 47 पर 3
से 4 करोड़
बतायी गयी है।
इससे
कुप्रचार का
भंडाफोड़ हो
जाता है।
10-12 साल पहले की
जमीन आज भी
निर्माण सहित
4 करोड़ से
अधिक की होना
मुश्किल है और
जमीनों के भाव
तो बढ़ते रहते
हैं। यह
सम्पदा तो
ट्रस्ट की है।
सभी
सूरतवासियों
के सेवा व
पुण्य-प्रताप
से सभी बम विफल
हो गये,
अप्रिय साजिश
विफल गयी।
सूरतवासियों
की सेवा-भक्ति
और पुण्यमयी
प्रवृत्ति से
सूरत बड़े घात
से बच गया।
जहाँ
सुमति वहाँ
संपति नाना।
जहाँ
कुमति वहाँ
दुःख
निधाना।।
छिन्दवाड़ा
गुरुकुल
शक्ति ट्रस्ट
के अन्तर्गत
है और वह
शक्ति ट्रस्ट
ज्ञानदा देवी
का है और उसमें
पुराने
ट्रस्टी भी
हैं। अपना
तन-मन-धन अर्पित
करके गुरुकुल
चलाने वालों
को धन्यवाद देना
चाहिए, ऐसे
लोगों की
सराहना करनी
चाहिए। बोर्ड
की परीक्षा
में 100 प्रतिशत
परिणाम लाने वाले
इस पिछड़े
इलाके के
विद्यार्थियों
तथा शिक्षकों
व ट्रस्टियों
को
प्रोत्साहित
करना चाहिए।
तन-मन-धन से
सेवा करने
वालों के बारे
में आप भ्रामक
प्रचार क्यों
कर करते हैं ?
क्यों
प्रशासन और
पब्लिक को
परेशान करते
हैं और
सज्जनों का
सेवा-उत्साह
तोड़ते हैं?
भ्रामक
प्रचार करने
से देश की
शक्ति का
ह्रास होता
है। भ्रामक
प्रचार की
लपेट में
प्रशासन और
पब्लिक आये
नहीं, यही
सबके लिये
हितकारी है।
पेढ़माला
(गुजरात) का
पथरीला पहाड़
(100-150 एकड़ जमीन)
किसान से
खरीदा हुआ है।
उसके
दस्तावेज हैं।
थोड़ी सी भूमि
में गायों की
घास, गायों का
वास और गरीबों
की सेवा होती
है।
सारी भूमि
और निर्माण
मिला के जो
चीज़ 1-1.5 करोड़
की नहीं हो
सकती, उसको
अरबों रुपयों
की सम्पत्ति
लिखकर आप
प्रशासन को और
पब्लिक को क्यों
उत्तेजित
करते हो? सरकारी
जन्त्री के
हिसाब से
दस्तावेज हुआ
और पथरीले
पहाड़ का
इलाका सस्ता
होता ही है, आज
भी खुला पड़ा
है। आश्रम
मैनेजमैन्ट
का कहना है कि
अगर यह अरबों रुपये
की सम्पत्ति
है तो आप 1.5
करोड़ रुपये
ले आओ, आपको यह
सेवाकार्य
हेतु अर्पित
कर सकते हैं।
गायों की,
गरीबों की
सेवा चलती रहे
इस शर्त पर,
अरबों-अरबों
रुपये की जमीन
जो आप कहते
हैं, वह आप इस
निर्माण सहित
जो साधक
परिवार के भी
नाम पर है, वह
आपको दे सकते
हैं। केवल 1.5
करोड़ रुपये
देकर
अरबों-अरबों
रुपये की जमीन
ले लीजिये।
'अरबों
रुपये की,
अरबों रुपये
की....
विवादित-विवादित...' न
अरबों रुपये
की है न
विवादित है।
विवाद बनाने
वाले कहीं भी
विवाद बना
सकते हैं।
पुनः प्रार्थना
है कि भ्रामक
प्रचार से
प्रशासन व पब्लिक
परेशान होती
है। उनकी
परेशानी का
पाप क्यों
लेते हैं?
सुशांत
अमदावाद
(विशेष
ब्यूरो)। संत
श्री
आसारामजी बापू
के खिलाफ चल
रहे षड्यंत्र
के बारे में
अपने विचार
व्यक्त करते
हुए काँची के
कामकोटि पीठ
के
शंकराचार्य
जगदगुरु श्री
जयेन्द्र
सरस्वतीजी ने
कहाः 'राजनीति
से गड़बड़ हो
रही है। यह
जल्दी से जल्दी
शांत हो।'
सनातन
संस्कृति के
आधारस्तंभ
संत महापुरुषों
को बार-बार
आरोपित कर
श्रद्धालू
भक्तों की श्रद्धा
को आहत करने
के
षड्यंत्रकारियों
के कुप्रयासों
को विफल करने
की आवश्यकता
पर जोर देते
हुए उन्होंने
कहाः 'हम लोग
बोल रहे हैं,
कर रहे हैं, और
ज्यादा करना है।
सभी संत लोग
शामिल होने के
लिए प्रयास
करके सभी जगह
संतों द्वारा,
गाँव-गाँव और
नगर-नगर प्रचार-प्रसार
होना अत्यंत
आवश्यक है। संघे
शक्ति
कलियुगे। सब
लोग मिलकर
करना। सभी संत
लोग, महाराज
लोग, सब लोग मिलकर
काम करने से
कुप्रचारक
दुर्जन भयभीत
होंगे। इसलिए
सब लोग मिलने
का प्रयास
करना।'
'प्रेस
की ताकत' के
पत्रकार ने इस
प्रकरण के
बारे में
स्थानीय
संतों से
बातचीत की तो जगन्नाथ
मंदिर, अमदावाद
के महंत श्री
रामेश्वरदास
जी महाराज ने
कहा कि 'आसारामजी
बापू की
संस्था को
बदनाम किया जा
रहा है, यह तो
गलत बात है।
राजनीति करने
वाले धर्म को
भी बदनाम करते
हैं, धार्मिक
लोगों को भी बदनाम
करते हैं तथा
अपनी राजनीति
करने के लिए देश
की संस्कृति
का पोषण करने
वालों के लिए
भी षड्यंत्र करते
हैं।"
वहीं
सुप्रसिद्ध
स्वामीनारायण
मंदिर, अमदावाद
के श्री
हरिहरानन्दजी,
महाराज ने
मीडिया के रोल
के बारे में
कहा कि 'हम तो
इतना कहना
चाहते हैं कि
यह हिन्दू
संस्कृति जो
है, उसको नष्ट
कर देने के
लिए कुछ लोग
ऐसे सब
षड्यंत्र
बनाते हैं।
किसी का समाज
में मान होता
है तो वे देख
नहीं पाते,
ऐसे झूठे आरोप
डालकर अर्थ का
अनर्थ करते
हैं। बाकी जो
कर्त्तव्य
जिनका है वे
तो करते हैं।
हकीकत, जो
रीयल स्टोरी
है, वह जब
सामने आयेगी,
उसके बाद आप
छाप सकते हैं।"
गीता मंदिर,
अमदावाद के
श्री
शिवानन्दजी
सरस्वती ने 'प्रेस
की ताकत' के
पत्रकार को एक
विशेष भेंट
में कहा कि 'ये
दंगा मचा रहे
हैं, किसको
जला रहे हैं? बस
को जला रहे
हैं। घाटा
किसको है? किसको
भोगना पड़ेगा?
अपने आपको ही
भोगना
पड़ेगा।
टैक्स लगेगा,
ये लगेगा...
सरकार किसकी
है? अपनी ही है न! कोई
भी सरकार हो,
चाहे
काँग्रेस हो,
भाजपा हो, कोई
भी हो लेकिन
घाटा तो अपने
को ही है।
महँगाई
बढ़ेगी। तो
ऐसा पेपर
पढ़ने वालों
को सोचना चाहिए
कि क्या सही
है, क्या सही
नहीं है। इसको
ध्यान में
रखें, फिर बात
कहनी चाहिए।
उसने तो दे
दिया है लेकिन
सही क्या है
उसका इंतज़ार
भी करना पड़ता
है। देखना
चाहिए, फिर उसकी
खोज करो कि यह
सही है-नहीं
है और जो सही
नहीं है उसका
विरोध करो।"
जब 'प्रेस की
ताकत' के
पत्रकार
राकेश
अग्रवाल ने
गीता मंदिर,
अमदावाद के
श्री
भास्करानंदजी
महाराज से
उनके विचार
जानने चाहे तो
उन्होंने कहा
कि 'जो दुर्घटना
हुई, बच्चे
मरे यह
दुर्घटना
कैसे भी हो
सकती है।
उसमें आश्रम
का हाथ हो या न
हो, मंदिर का
इतना बवाल
हुआ,
तोड़-फोड़
हुई, हानि
अपने हिन्दू-हिन्दू
में ही....। यह
बवाल एकदम गलत
है, नहीं होना
चाहिए
क्योंकि
इसमें
राजनीति या फिर
कोई दूसरी
पार्टी का हाथ
था, पूरा
विश्वास है कि
ऐसा ही था।
मैं सब लोगों
से कहना चाहता
हूँ कि इस
प्रकार अपने
ही आप में ऐसे
भ्रमित होकर
किसी पर बहुत
आरोप नहीं
लगाना चाहिए
और यह गलत ही
बात है कि ये
जो लोग भड़क रहे
हैं, दंगा कर
रहे हैं, रैली
निकाल रहे
हैं, धर्म के
प्रति,
आसारामजी के
प्रति या
आश्रम के प्रति
यह बात सिद्ध
नहीं हुई है कि
आसारामजी
बापू के
साधकों ने
मर्डर किया। यह
निराधार बात
जब सिद्ध हो
जाये, उसके
बाद ही किसी
पर आरोप लगा
सकते हैं।'
('प्रेस की
ताकत' से साभार)
दोस्तो
तुम प्रदर्शन
करने आये,
सोचो
क्या तुमने
हासिल किय।
अगर तुम
दर्शन करने
आये होते,
तो शायद
कुछ और बात
होती।।
भाव-भंगिमा
से लगता है
द्वेषपूर्ण
रोष,
व्याप्त
था तुम्हारे
शरीर में।
थोड़ा सा
प्रेम लेकर
आये होते,
तो कुछ और
बात होती।।
समाज के
प्रति फर्ज
नहीं देता,
किसी को
अभद्रता का
अधिकार।
विघटनकारी
शक्तियों के
इशारों पर,
कठपुतलियों
की तरह नाचते
हो।
अपने
विवेक के
प्रखर कर
पाते,
तो शायद
कुछ और बात
होती।।
कसूर
तुम्हारा भी
नहीं है शायद,
तुम्हारा
धंधा है सनसनी
फैलाना।
तथ्यों
की जहमत को
जानने की जहमत
करते,
तो शायद
कुछ और बात
होती।।
नारायण
को साधारण नर
जाना,
मुजरिम
समझ कर किया
अपमाना।
लोक
कल्याण में
सहयोग कर
पाते,
तो शायद
कुछ और बात
होती।।
ब्रह्मज्ञानी
की अवमानना के
बदले,
जाने
प्रकृति कैसा
कोप ढाये।
पड़ जाते
सत्संग के चार
छींटे,
तो शायद
कुछ और बात
होती।।
कोमलचित्त
संत तुम्हारी
उद्दंडता को
भी,
अपने
चित्त नहीं धरते।
तुम उनसे
स्वयं
क्षमा-प्रार्थना
कर पाते,
तो शायद
कुछ और बात
होती।।
जानता
हूँ तुम अपने
वाक्-चातुर्य
से,
हर बात
काटने को हो
आतुर।
बातें
तुम्हारे हित
की हैं यह जान
पाते,
तो कुछ और
बात होती।।
अशोक
भाटिया
बहुत
दिनों की
साजिश है,
स्थिति
नहीं बनी
अकस्मात।
भारत की
संस्कृति पर
नित्य हो रहा,
भीषण
कुठाराघात।।
जयचन्द
हर युग में
होने का,
सिलसिला
जारी है आज
तक।
तोड़ो
लोगों की
धार्मिक
श्रद्धा,
कुचल
डालो उनके
जज्बात।।
संत करते
प्राणिमात्र
की,
कुशलता
के प्रयास दिन
रात।
कृतज्ञ्न
समाज डालता
है,
उनकी
झोली में
लाँछनों की
सौगात।।
ब्रह्मज्ञानी
सदगुरु
कभी-कभी,
अवतरित
होते हैं धरती
पर।
उनके
सान्निध्य का
लाभ ले लो,
जब तक
महापुरुष हैं
हयात।।
ब्रह्मवेत्ता
महापुरुष
बददुआ नहीं
देंगे,
किंतु
प्रकृति चुप
नहीं रहेगी।
कहीं कोई
ठौर नहीं
मिलेगा तब,
आत्मा
करेगी लानत की
बरसात।।
अभी भी
कुछ नहीं
बिगड़ा,
मेरी
मानो तो क्षमा
प्रार्थना कर
लो।
वक्त चूक
गया तो फिर,
भैया! मलते रह
जाओगे खाली
हाथ।।
अशोक
भाटिया
साध्वी
ऋतम्भरा
भारत के संत
समाज के
विरुद्ध
अन्तर्राष्ट्रीय
स्तर पर एक
बहुत ही सोचा
समझा और
नियोजित
षडयंत्र रचा
गया है। कभी
कथित हत्या के
आरोप तो कभी
योग से विश्व
भर को निरोगी
करने के एक
योगी के
प्रयासों को
झूठा सिद्ध करने
एवं उनकी
दवाओं में
पशुओं की
हड्डियाँ होने
संबंधी
आरोपों के
कुत्सित
समाचारों से
चारों ओर
सनसनी फैली
हुई है। बहुत
गहराई से
विचार करने पर
यही सत्य
सामने आता है
कि यह सब कुछ
और नहीं, कोका
कोला जैसी
बहुराष्ट्रीय
कम्पनियों की
बोतलों से
निकला वह
जिन्न है जिसका
बाबा
रामदेवजी
महाराज जैसे
संतों ने
पर्दाफाश
किया है। उसके
बाद जिस
प्रकार कम से
कम उस कोका
कोला बनाम
टायलेट
क्लीनर की
बिक्री को
तगड़ा झटका
लगा, उसके बाद
यह तो तय ही था
कि भारत के
संत समाज के
विरुद्ध कोई न
कोई साजिश तो
रची ही
जायेगी।
मैं
पत्रकारिता
जगत का पूर्ण
सम्मान करती
हूँ, लोकतंत्र
का चौथा
स्तम्भ होने
के नाते उसकी
अपनी एक
महत्त्वपूर्ण
भूमिका भी है।
मगर मैं
पत्रकार जगत
को पूछना
चाहती हूँ कि
जिस सजगता और
सक्रियता से 'स्टिंग
आप्रेशन' कर रहे
हैं, काले और
सफेद धन की
पड़ताल कर रहे
हैं, क्या
उतनी ही सजगता
के साथ आपके
गुप्त कैमरों
ने कभी उन
दृश्यों को भी
अपने स्टिंग
आप्रेशन में
कैद किया है
जिनमें भारत
के संत इस देश
के वनवसियों,
गिरिवासियों
एवं वंचितों
के उत्थान के
प्रयास करते
दिखायी देते
हैं? क्या
आपके कैमरों
की लाईटें कभी
वहाँ भी चमकती
हैं जहाँ
संतजन अपने
सेवाकार्यों
की रोशनी से
गरीबी एवं
विवशता के
अँधेरों को
मिटाने का भरसक
प्रयास कर रहे
हैं?
मैं पूछना
चाहती हूँ कि
टेलिविज़न
चैनलों से कि
जिस तरह आप
चौबीसों घंटे
एक ऐसे स्टिंग
आप्रेशन को
बार-बार देश
को दिखाते
रहते हैं
जिसकी सत्यता
की जाँच होनी
बाकी हो, क्या
कभी आपने चौबीसों
घंटे संतों के
किसी
चिकित्सालय
में चल रहे
निःशुल्क
सेवाकार्यों
का प्रसारण
देशवासियों
को दिखाया? क्या
संतों के अथक
परिश्रम से
गढ़े गये
वात्साल्य के
उन मंदिरों पर
आपने कैमरों
को केन्द्रित
किया, जहाँ
दिन रात
विशुद्ध
सेवाभाव से समाज
के उपेक्षित
एवं
निराश्रित
बचपन को सुसंस्कारित
दिशा देने के
प्रयास किये
जा रहे हैं?
नहीं.... ऐसा कभी-कभी
ही किया करते
हैं आप लोग
क्योंकि इसमें
कोई सनसनी
नहीं होती।
कभी यदि यह
दिखाया भी गया
होगा तो कुछ
मिनटों का
वृत्तचित्र
दिखाकर
इतिश्री कर ली
गयी होगी। मैं
मीडिया पर
दोषोरोपण
नहीं कर रही
हूँ कि कैसे
सनसनी फैलाने
के समाचारों
का संकलन और
दृश्यों का
फिल्मांकन
किया जाता है।
मुझे आज भी वह
भयानक रौंगटे
खड़े कर देने
वाला दृश्य
स्मरण आता है
जब दिल्ली में
आरक्षण
विरोधी एक
छात्र के
आत्मदाह का
दृश्य मैंने
टेलिविज़न पर
समाचारों में
देखा था –
स्वयं पर
पेट्रोल
डालकर धू-धू
करके जलता वह
छात्र और उसके
पीछे
दौड़-दौड़कर उस
दृश्य को
फिल्माते
चैनलों के
कैमरामैन! कल्पना
कीजिये कैसा
क्रूरतम
दृश्य था कि
चार-पाँच लोग
दौड़ कर जलते
हुए उस असहाय
छात्र को शूट
कर रहे हैं
लेकिन किसी के
मन में भी यह
दया नहीं आयी
कि अपना कैमरा
रखकर कहीं से
बाल्टी भर
पानी उड़ेलकर
उसकी आग
बुझाने का
प्रयास किया
जाय। मैं
पूछना चाहती
हूँ कि अगर वह
छात्र उन
छायाकारों
में से किसी
का बेटा या
भाई होता तब
भी क्या वह
उसे जलता हुआ
देखकर केवल तस्वीरें
ही उतारता
रहता? ऐसी
भयावह
एक्सलूसिव
तस्वीरें
दिखाकर आप देश
को कहाँ ले
जाना चाहते
हैं?
आज
विश्वगुरु
बनने की ओर
अग्रसर भारत
के प्राचीन
सांस्कृतिक
मूल्यों,
जिन्हें भारत
का संत समाज
आज भी सहेजे
हुए है, को नष्ट
करने का
कुत्सित
प्रयास किया
जा रहा है।
हिन्दुओं की
सदाशयता
(उदारता,
सज्जनता) का
लाभ उठाकर
उनके
मानबिन्दुओं
पर हमला किया
जा रहा है।
कभी मुस्लिम
अथवा ईसाई
पंथों पर कोई
टिप्पणी करके
देखिये, उनके
अनुयायी
सड़कों पर उतर
आयेंगे। मैं
इलैक्ट्रॉनिक
मीडियाकर्मीयों
से निवदेन
करती हूँ कि
कभी किसी कटती
हुई गाय का भी
स्टिंग
आप्रेशन
कीजिये और उसे
बार-बार अपने
चैनलों पर
दिखाइये। देश
की जनता के बताइये
कि वह जो गाय
काटी जा रही
है, उसका देश
की
अर्थव्यवस्था
में कितना
बड़ा योगदान
था!
कभी स्टिंग
आप्रेशन
कीजिए उन
मदरसों का,
जहाँ मजहबी
शिक्षा के नाम
पर किस तरह से
नयी पीढ़ी की
रगों में नफरत
का जहर भरा जा
रहा है। उन
घनघोर जंगलों
और पहाड़ों
में जाकर अपने
स्टिंग आप्रेशन
का जौहर
दिखाइये जहाँ
भूखे वनवासियों
को मुट्ठी भर
चावल देकर किस
तरह से मतान्तरित
किया जा रहा
है। कभी अपने
अत्याधुनिक कैमरों
को सूदूर
पूर्वोत्तर
भारत के उन
सुलगते
प्रान्तों की
ओर भी घुमाइये
जहाँ अलगाववाद
की आग भड़कायी
जा रही है।
मैं निवेदन
करना चाहती
हूँ भारत के
पत्रकार जगत
से कि आप लोग
अच्छी तरह से
जानते हैं कि
भारत को बनाये
रखने के लिए
कटिबद्ध संत
समाज को
जनमानस से काट
देने के कैसे
कुत्सित और
अन्तर्राष्ट्रीय
प्रयास किये
जा रहे हैं!
आप उन
षडयन्त्रों
का पीछा
कीजिये जो
कोका कोला के
जहर को उजागर
करने वाले एक
संत को रास्ते
से हटाने के
कथित मंसूबे
पाले हुए हैं।
सारे संत-समाज
की छवि को
नकारात्मक
बनाया जाना
अन्यायपूर्ण
है और ऐसे
प्रयासों को
रोकने का
उत्तरदायित्व
भी मीडियाकर्मियों
का ही है।
"मेरे
अत्यन्त
प्रिय मित्र
श्री आसाराम
जी बापू से
मैं पूर्वकाल
से
हृदयपूर्वक
परिचित हूँ।
संसार में
सुखी रहने के
लिए समस्त
जनता को शारीरिक
स्वास्थ्य और
मानसिक शांति
दोनों आवश्यक
हैं।
सुख-शांति व
स्वास्थ्य का
प्रसाद बाँटने
के लिए ही इन
संत का,
महापुरुष का
अवतरण हुआ है।
आज के संतों-महापुरुषों
में प्रमुख
मेरे प्रिय मित्र
बापूजी हमारे
भारत देश के,
हिन्दू जनता
के, आम जनता के,
विश्ववासियों
के उद्धार के
लिए रात-दिन
घूम-घूमकर
सत्संग, भजन,
कीर्तन आदि
द्वारा सभी
विषयों पर
मार्गदर्शन
दे रहें हैं।
अभी में गले
में थोड़ी
तकलीफ है तो
उन्होंने
तुरन्त मुझे
दवा बताई। इस
प्रकार सबके स्वास्थ्य
और मानसिक
शांति, दोनों
के लिए उनका
जीवन समर्पित
है। वे धनभागी
हैं जो लोगों
को बापूजी के
सत्संग व
सान्निध्य
में लाने का
दैवी कार्य
करते हैं।"
काँची
कामकोटि पीठ के
शंकराचार्य
जगदगुरु श्री
जयेन्द्र
सरस्वती जी
महाराज।