श्रीयोगवाशिष्ठ चतुर्थ
स्थिति
प्रकरण
श्रीयोगवाशिष्ठ चतुर्थ
स्थिति प्रकरण
प्रारम्भ
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयारूप वर्णन
दामव्यालकटोपाख्याने
देशाचारवर्णन
दाम, व्याल, कटोपाख्यानसमाप्ति वर्णन
वशिष्ठजी
बोले, हे रामजी!
अब
स्थितिप्रकरण
सुनिये जिसके
सुनने से जगत्
निर्वाणता को प्राप्त
हो । कैसा
जगत् है कि
जिसके आदि
अहन्ता है ।
ऐसा जो
दृश्यरूप
जगत् है सो भ्रान्तिमात्र
है । जैसे
आकाश में नाना
प्रकार के
रंगों सहित
इन्द्रधनुष
असत्रूप है
तैसे ही यह
जगत् है ।
जैसे दृर्टा
बिना अनुभव
होता है और
निद्रा बिना
स्वप्न और भविष्यत्
नगर भासता है
तैसे जगत्
स्थित हुआ है
। जैसे वानर
रेत इकट्ठी
करके अग्नि की
कल्पना हैं पर
उससे शीत
निवृत्त नहीं
होती, भावनामात्र
अग्नि होती है,
तैसे ही यह
जगत्
भावनामात्र
है । जैसे
आकाश में रत्न
मणि का प्रकाश
और
गन्धर्वनगर
भासता है और
जैसे
मृगतृष्णा की
नदी भासती है
तैसे ही यह
असत्रूप
जगत् भ्रम से
सत्रूप हो भासता
है । जैसे दृढ़
अनुभव से
संकल्प भासता
है पर वह असत्रूप
है और जैसे
कथा के अर्थ
चित्त में
भासते हैं
तैसे ही
निःसार रूप जगत्
चित्त में
साररूप हो
भासता है । जैसे
स्वप्न में
पहाड़ और
नदियाँ भास
आती हैं, तैसे
ही सब भूत बड़े
भी भासते हैं
पर आकाशवत्
शून्यरूप हैं
। स्वप्न में
अंगना से प्रेम
करना अर्थ से
रहित और असत्
रुप है सिद्ध
नहीं होता
तैसे ही यह भी
प्रत्यक्ष भासता
है परन्तु
वास्तव में
कुछ नहीं, अर्थ
से रहित है
जैसे चित्र की
लिखी कमलिनी
सुगन्ध से
रहित होती है
तैसे ही यह
जगत् शून्यरूप
है । जैसे
आकाश में
इन्द्रधनुष
और केले का
थम्भ सुन्दर
भासता है
परन्तु उस में
कुछ सार नहीं
निकलता तैसे
ही यह जगत्
देखने में
रमणीय भासता
है परन्तु
अत्यन्त असत्रूप
है, इसमें
सार कुछ नहीं
निकलता । देखने
में प्रत्यक्ष
अनुभव होता है
परन्तु
मृगतृष्णा की
नदीवत् असत्रूप
है । रामजी ने
पूछा, हे
भगवन्!सर्व
संशयों के
नाशकर्ता! जब
महाकल्प क्षय
होता है तब
दृश्यमान सब
जगत् आत्मरूप
बीज में लीन
होता है ।
जैसे बीज में
अंकुर रहता है,
उससे उपजता
है उसी में
स्थित होता है
और फिर उसी
में लीन होता
है । यह
बुद्धि ज्ञान
की है अथवा अज्ञान
की? सर्व
संशयों की
निवृत्ति के
अर्थ मुझसे
स्पष्ट करके
कहिये ।
वशिष्ठजी बोले,
हे रामजी!
इस प्रकार
महाकल्प के
क्षय होने पर
बीजरूप आत्मा
में जगत्
स्थित होता है
। जो ऐसा कहते
हैं वह परम
अज्ञानी और महामूर्ख
बालक हैं जो
ब्रह्म को
जगत् का कारण
बीज से अंकुर
की नाईं कहते
हैं वह मूर्ख
हैं । बीज तो
दृश्यरूप
इन्द्रिय का विषय
होता है ।
जैसे बटबीज से
अंकुर होता है
और फिर
विस्तार पाता
है सो
इन्द्रियों का
विषय है और जो
मन सहित षट्
इन्द्रियों
से अतीत है, अर्थात्
इन्द्रियों
का विषय नहीं,
आकाश से भी
अधिक निर्मल
है, उसको
जगत् का बीज
कैसे कहिये? जो आकाश से
भी अधिक
सूक्ष्म, परम
उत्तम अनुभव
से उपलब्ध और
नित्य
प्राप्त है
उसको बीजभाव कहना
नहीं बनता ।
हे रामजी!
जोकि शान्त, सूक्ष्म, सदा
प्रकाशसत्ता
है और जिसमें दृश्य
जगत् असत्रूप
है उसको
बीजरूप कैसे
कहिये? और
जब बीजरूप
कहना नहीं बनता
तब उसे जगत्
कैसे कहिये? आकाश से भी
अधिक सूक्ष्म
निर्मल परमपद
में सुमेरु, समुद्र, आकाश
आदिक जगत्
नहीं बनता ।
जो किञ्चन और
अकिञ्चन है और
निराकार, सूक्ष्म
सत्ता है
उसमें
विद्यमान
जगत् कैसे हो?
वह महासूक्ष्मरूप
है और दृश्य
उससे विरुद्धरूप
है जैसे धूप
में छाया नहीं,
जैसे सूर्य
में अंधकार
नहीं, जैसे
अग्नि में बरफ
नहीं, और
जैसे अणु में
सुमेरु नहीं
होता, तैसे
ही आत्मामें
जगत् नहीं
होता । सत्यरूप
आत्मा में
असत्यरूप
जगत् कैसे हो?
वट का बीज
साकाररूप
होता है और निराकाररूप
आत्मा में
साकाररूप
जगत् होना अयुक्त
है! हे रामजी!
कारण दो
प्रकार का
होता है-एक
समवाय कारण और
दूसरा
निमित्तकारण,
आत्मा
दोनों कारणों
से रहित है । निमित्तकारण
तब होता है जब
कार्य से
कर्त्ता भिन्न
हो, पर
आत्मा तो
अद्वैत है, उसके निकट
दूसरी वस्तु
नहीं, वह
कर्त्ता कैसे
हो और किसका हो,
सहकारी भी
नहीं जिससे
कार्य करे, वह तो मन और
इन्द्रियों
से रहित
निराकार अविकृ
तरूप है । और
समवाय कारण भी
परिणाम से
होता है ।
जैसे वट बीज
परिणाम से
वृक्ष होता है,
पर आत्मा तो
अच्युतरूप है ,
परिणाम को
कदाचित् नहीं
प्राप्त होता
तो समवाय कारण
कैसे हो? जायते,
अस्ति, वर्धते,
विपरिणमते,
क्षियते, नश्यति, इनषट्
विकारों से रहित
निर्विकार
आत्मा जगत् का
कारण कैसे हो?
इससे यह
जगत्
अकारणरूप
भ्रान्ति से भासता
है । जैसे
आकाश में
नीलता,सीप
में रूपा और
निद्रादोष से
स्वप्न
दृष्टि भासते हैं
तैसे ही यह
जगत्
भ्रान्ति से
भासता है । और
जब स्वरूप में
जागे तब जगत्भ्रम
मिट जाता है ।
इससे
कारणकार्य
भ्रम को
त्यागकर तुम
अपने स्वरूप
में स्थित हो
। दुर्बोध से
संकल्प रचना
हुई है उसको
त्याग करो और
आदि, मध्य
और अन्त से
रहित जो सत्ता
है उसी में
स्थित हो तब जगत्भ्रम
मिट जावेगा ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
जगत् निराकरणन्नाम
प्रथमस्सर्ग
॥1॥
अनुक्रम
वशिष्ठजी
बोले, हे
देवताओं में
श्रेष्ठ, रामजी!
बीज से
अंकुरित्
आत्मा से जगत्
का होना
अंगीकार
कीजिये तो भी
नहीं बनता, क्योंकि
आत्मा
सर्वकल्पनाओं
से रहित महा चैतन्य
और निर्मल
अकाशवत् है, उसको जगत्
का बीज कैसे
मानिये? बीज
के परिणाम में
अंकुर होता है,
और कारण
समवायों से
होता है, आत्मा
में समवाय और
निमित्त
सहकारी कदाचित्
नहीं बनते ।
जैसे बन्ध्या
स्त्री की सन्तान
किसी ने नहीं
देखी तैसे ही आत्मा
से जगत् नहीं
होता । जो
समवाय और
निमित्तकारण
बिना पदार्थ
भासे तो
जानिये कि यह
है नहीं, भ्रान्तिमात्र
भासता है ।
आत्मसत्ता
अपने आप में
स्थित है । और सृष्टि
स्थिति, प्रलय
से
ब्रह्मसत्ता
ही अपने आप
में स्थित है
। जो इस
प्रकार स्थिति
है तो कारण
कार्य का क्रम
कैसे हो और जो
कारण कार्य भाव
न हुआ तो पृथ्वी
आदिक भूत कहाँ
से उपजे? और
जो कारण कार्य
मानिये तो
पूर्व जो
विकार कहे हैं
उनका दूषण आता
है । उससे न
कोई कारण है
और न कार्य है,
कारण कार्य
बिना जो पदार्थ
भासे उसको सत्रूप
जाने । वह
मूर्ख बालक और
विवेक रहित है
जो उसे कार्य
कारण मानता
है- इससे यह
जगत् न आगे था,
न अब है और न
पीछे
होगा-स्वच्छ
चिदाकाशसत्ता
अपने आप में
स्थित है । जब
जगत् का
अत्यन्त अभाव
होता है तब
सम्पूर्ण
ब्रह्म ही
दृष्टि आता है
। जैसे समुद्द
में तरंग
भासते हैं
तैसे ही आत्मा
में जगत्
भासता
है-अन्यथा कारण
कार्यभाव कोई
नहीं और न
प्राग्भाव, प्रध्वंसाभाव
और
अन्योन्याभाव
ही है । प्राग्भाव
उसे कहते हैं
कि जो प्रथम न
हो, जैसे
प्रथम पुत्र
नहीं होता और
पीछे उत्पन्न
होता है । और
जैसे
मृत्तिका से
घट उत्पन्न
होता है ।
प्रध्वंसाभाव
वह है जो प्रथम
होकर नष्ट हो
जाता है, जैसे
घट था और नष्ट
हो गया ।
अन्योन्याभाव
वह है, जैसे
घट में पट का
अभाव है और पट
में घट का
अभाव है । ये
तीन प्रकार के
अभाव जिसके
हृदय में उसको
जगत् दृढ़ होता
है और उसको
शान्ति नहीं
होती । जब
जगत् का
अत्यन्ताभाव
दीखता है तब
चित्त शान्तिमान्
होता है ।
जगत् के
अत्यन्ताभाव
के सिवाय और
कोई उपाय नहीं
और अशेष जगत्
की निवृत्ति
बिना मुक्ति
नहीं होती
सूर्य आदि
लेकर जो कुछ
प्रकाश
पृथ्वी आदिक
तत्त्व, क्षण,
वर्ष, कल्प
आदिक काल और
मैं , यह
रूप, अवलोक,
मनस्कार
इत्यादिक
जगत् सब
संकल्पमात्र
है और कल्प, कल्पक, ब्रह्माण्ड,
ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र,
इन्द्र से
कीट
आदिपर्यन्त
जो कुछ जगत्
जाल है वह उपज
उपजकर
अन्तर्धान हो
जाता है ।
महाचैतन्य
परम आकाश में
अनन्त वृत्ति
उठती है जैसे
जगत् के पूर्व
शान्त सत्ता
थी तैसे ही तुम
अब भी जानो और
कुछ नहीं हुआ
। पर माणु के
सहस्त्रांश
की नाईं
सूक्ष्म
चित्तकला है,
उस
चित्तकला में
अनन्त कोटि सृष्टियाँ
स्थित हैं,वही
चित्तसत्ता
फुरने से जगत्रूप
हो भासती है
और प्रकाशरूप
और निराकार
शान्तरूप है,
न उदय होता
है, न अस्त
होता है, न
आता है और न
जाता है । जैसे
शिला में रेखा
होती है तैसे
आत्मा में
जगत् है। जैसे
आकाश में
आकाशसत्ता फुरती
है तैसे ही
आत्मा में
जगत् फुरता है
और आत्मा ही
में स्थित है
। निराकार
निर्विकार रूप
विज्ञान
घनसत्ता अपने
आप में स्थित
और उदय और
अस्त से रहित,
विस्तृतरूप
है । हे रामजी!
जो सहकारी
कारण कोई न
हुआ तो जगत्
शून्य हुआ ऐसे
जानने से सर्व
कलंक कलना
शान्त हो जाती
है । हे रामजी!
तुम दीर्घ
निद्रा में
सोये हो, उस
निद्रा का अभाव
करके
ज्ञानभूमिका
को प्राप्त हो
जाओ । जागे से
निःशोक पद
प्राप्त होगा
।
इति
श्रौयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
स्मृतिबीजोपयासोनाम
द्वितीयस्सर्गः
॥2॥
रामजी
ने पूछा, हे भगवन्!
महाप्रलय के
अन्त और
सृष्टि के आदि
में जो प्रजापति
होता है वह
जगत् को पूर्व
की स्मृति से
उसी भाँति रचता
है तो ये जगत्
स्मृति रूप
क्यों न होवे?
वशिष्ठजी
बोले कि हे
रामजी!
महाप्रलय के
आदि में
प्रजापति
स्मरण करके
पूर्व की नाईं
जगत् रचता है
जो ऐसे मानिये
तो नहीं बनता,
क्योंकि
महाप्रलय में
प्रजापति कहाँ
रहता? जो
आप ही न रहे
उसकी स्मृति
कैसे मानिये?
जैसे आकाश
में वृक्ष
नहीं होता
तैसे ही
महाप्रलय में
प्रजापति
नहीं होता ।
फिर रामजी ने
पूछा, हे
ब्रह्मण्य! जगत्
के आदि में जो
ब्रह्मा था
उसने जगत् रचा,
महाप्रलय
में उसकी
स्मृति का नाश
तो नहीं होता,
वह तो फिर
स्मृति से
जगत् रचता है
आप कैसे कहते
हैं कि नहीं
बनता? वशिष्ठजी
बोले, हे
शुभव्रत, रामजी!
महाप्रलय के
पूर्व जो
ब्रह्मादिक
होते हैं वह महाप्रलय
में सब निर्वाण
हो जाते हैं
अर्थात्
विदेहमुक्त
होते हैं । जो
स्मृति करने वाले
अन्तर्धान हो
गये स्मृति
कहाँ रही और
जो स्मृति
निर्मूल हुई
तो उसको जगत्
का कारण कैसे
कहिये? महाप्रलय
उसका नाम है
जहाँ सर्व
शब्द अर्थ सहित
निर्मूल हो
जाते हैं, जहाँ
सब अन्तर्धान
हो गये तहाँ
स्मृति किसकी
कहिए और जो
स्मृति का
अभाव हुआ तो कारण
किसका किसकी
नाईं कहिये? इससे
सर्वजगत्
चित्त के
फुरने मात्र
है । जब महा प्रलय
होता है तब सब
यत्न बिना ही
मोक्षभागी होते
हैं और जो
आत्मज्ञान हो
तो जगत् के
होते भी
मोक्षभागी
होते हैं पर
जो आत्मज्ञान
नहीं होता तो
जगत् दृढ़ होता
है, निवृत्त
नहीं होता ।
जब दृश्य जगत्
का अभाव होता
है तब स्वच्छ
चैतन्य सत्ता
जो आदि अन्त
से रहित है
प्रकाशती है
और सब जगत् भी
वही रूप भासता
है सर्व में
अनादि सिद्ध ब्रह्मतत्त्व
प्रकाशित है,
उसमें जो
आदि संवेदन
फुरता है वह
ब्रह्मरूप है
और अन्तवाहक
देह विराट्
जगत हो भासता है
। उसका एक
प्रमाणरूप यह
तीनों जगत् है,
उसमें देश,
काल, क्रिया,
द्रव्य, दिन,
रात्रि
क्रम हुआ है ।
उसके अणु में
जो जगत् फुरते
हैं सो क्या
हैं? सब
संकल्परूप है
और
ब्रह्मसत्ता
का प्रकाश है
। जो प्रबुद्ध
आत्मज्ञानी
है उसको सब
जगत् एक ब्रह्मरूप
ही भासता है
और जो अज्ञानी
है उसके चित्त
में अनेक
प्रकार जगत्
की भावना होती
है । द्वैत
भावना से यह
भ्रमता है ।
जैसे ब्रह्माण्ड
के अनेक
परमाणु होते
हैं, उनके
भीतर अनन्त
सृष्टियाँ
हैं और उनके
अन्तर और
अनन्त सृष्टि
हैं तैसे ही
और जो अनन्त सृष्टि
हैं उनके
अन्तर और
अनन्त
सृष्टियाँ फुरती
हैं सो सब
ब्रह्मतत्त्व
का ही प्रकाश
है ।
ब्रह्मरूपी
महासुमेरु है,
उसके भीतर
अनेक जगत्रूपी
परमाणु हैं सो
सब अभिन्न रूप
है । हे रामजी!
सूर्य की
किरणों के
समूह में जो
सूक्ष्म त्रसरेणु
होते हैं उनकी
संख्या
कदाचित् कोई
कर भी सके
परन्तु आदि
अन्त से रहित
जो आत्मरूपी सूर्य
है उसकी
त्रिलोकी
रूपी किरणों
की संख्या कोई
नहीं कर सकता
। जैसे समुद्र
में जल और
पृथ्वी में
धूलि के
असंख्य
परमाणु हैं तैसे
ही आत्मा में
असंख्य
परमाणुरूप सृष्टियाँ
हैं । जैसे
आकाश
शून्यरूप है
तैसे ही आत्मा
चिदाकाश जगत्रूप
है, यह जो मैंने
उसकी सृष्टि
कही है जो
इनको तुम जगत्
शब्द से
जानोगे तो
अज्ञान
बुद्धि है और दुःख
और भ्रम
देखोगे जो
इनको
ब्रह्मशब्द
का अर्थ
जानोगे तो इस
बुद्धि से
परमसार को प्राप्त
होगे ।
सर्वविश्व
ब्रह्म से
फुरता है और
विज्ञानघन
ब्रह्मरूप ही
है, द्वैत नहीं
। जब जागोगे
तब तुमको ऐसे
ही भासेगा ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
जगदनन्तवर्णनन्नाम
तृतीयस्सर्गः
॥3॥
वशिष्ठजी
बोले, हे रामजी!
इन्द्रियों
का जीतना
मोक्ष का कारण
है और किसी
क्रम तथा उपाय
से
संसारसमुद्र
नहीं तरा जाता
। सन्तों के
संग और सत्शास्त्रों
के विचार से जब
आत्मतत्त्व
का बोध होता
है । जब तक
संसार का
अत्यन्त अभाव
नहीं होता तब
तक आत्मबोध
नहीं होता ।
यह मैंने
तुमसे क्रम
कहा है सो
संसारसमुद्र
तरने का उपाय
है । बहुत
कहने से क्या
है सब कर्मों
का बीज मन है, मन में छेदे
से ही सब जगत्
का छेदन होता
है । जब
मनरूपी बीज
नष्ट होता है
तब जगत्रूपी
अंकुर भी नष्ट
हो जाता है ।
सब जगत् मन का
रूप है, इसके
अभाव का उपाय
करो । मलीन मन
से अनेक जन्म के
समूह उत्पन्न
होते हैं और
इसके जीतने से
सब लोकों में
जय होती है ।
सब जगत् मन से
हुआ है, मन
के रहित हुए
से देह भी
नहीं भासती, जब मन से
दृश्य का अभाव
होता है तब मन भी
मृतक हो जाता
है, इसके
सिवाय कोई
उपाय नहीं ।
हे रामजी!
मनरूपी पिशाच
का नाश और
किसी उपाय से
नहीं होता ।
अनेक कल्प बीत
गये और बीत
जायँगे तब भी
मन का नाश न
होगा । इससे
जब तक जगत्
दृश्यमान है
तब तक इसका
उपाय करे ।
जगत् का
अत्यन्त अभाव
चिन्तना और
स्वरूप आत्मा
का अभ्यास
करना यही परम
औषध है । इस उपाय
से मनरूपी
दृष्टा नष्ट
होता है जब तक
मन नष्ट नहीं
होता तब तक मन
के मोह से जन्म
मरण होता है
और जब ईश्वर
परमात्मा की
प्रसन्नता
होती है तब मन
बन्धन से मुक्त
होता है
सम्पूर्ण
जगत्, मन
के फुरने से
भासता है जैसै
आकाश में
शून्यता और
गन्धर्व नगर
भासते हैं
तैसे ही
संपूर्ण जगत्
मन में भासता
है । जैसे
पुष्प में
सुगन्ध, तिलों
में तेल, गुणी
में गुण और
धर्मी में
धर्म रहते हैं
तैसे ही यह
सत् असत्,स्थूल
सूक्ष्म, कारण,
कार्यरूपी
जगत- मन में
रहता है ।
जैसे समुद्र में
तरंग आकाश में
दूसरा
चन्द्रमा और
मरुस्थल में
मृगतृष्णा का
जल फुरता है
तैसे ही चित्त
में जगत् फुरता
है । जैसे
सूर्य में
किरणें, तेज
में प्रकाश और
अग्नि में
उष्णता है तैसे
ही मन में
जगत् है ।
जैसे बरफ में
शीतलता, आकाश
में शून्यता
और पवन में
स्पन्दता है
तैसे ही मन
में जगत् ।
सम्पूर्ण
जगत् मनरूप है,
मन जगत्रूप
है और परस्पर एकरूप
हैं, दोनों
में से एक
नष्ट हो तब
दोनों नष्ट हो
जाते हैं । जब
जगत् नष्ट हो तब
मन भी नष्ट हो
जाता है ।
जैसे वृक्ष के
नष्ट होने से
पत्र, टास,
फूल, फल
नष्ट हो जाते
हैं और इनके
नष्ट होने से
वृक्ष नष्ट
नहीं होता ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
अंकुरवर्णनन्नाम
चतुर्थस्सर्गः
॥4॥
रामजी
ने पूछा, हे भगवन्!
आप
सर्वधर्मों
के वेत्ता और
पूर्व अपर के
ज्ञाता हैं, मन के फुरने
से जगत् कैसे
होता है और
कैसे हुआ है? दृष्टान्त
सहित मुझसे
कहिये । वशिष्ठजी
बोले, हे
रामजी! जैसे
इन्द्र
ब्राह्मण के
पुत्रों की दश
सृष्टि हुईं
और दश ही
ब्रह्मा हुए
सो मन के
फुरने से ही
उपजकर मन के
फुरने में
स्थित हुए और
जैसे लवण राजा
को इन्द्रजाल
की माया से
चाण्डाल की प्रतिमा
दृढ़ होकर भासी
तैसे ही यह जगत्
मन में स्थित
हुआ है । जैसे
मन के फुरने से
चिरकाल
स्वर्ग को
भोगते रहे और अनेक
भ्रम देखे, तैसे ही यह
जगत् मन के
भ्रम से स्थित
हुआ है । रामजी
ने पूछा हे भग वन्!
भृगु ऋषीश्वर
के पुत्र ने
मन के भ्रम से
कैसे स्वर्गसुख
भोगे, यह
कैसे भोग का अधिपति
हुआ है और
कैसे संसार
भ्रम देखा? वशिष्ठजी
बोले, हे
रामजी! भृगु
के पुत्र का
वृत्तान्त
सुनो । भृगु
और काल का
संवाद मंदराचल
पर्वतमें हुआ
है । एक समय
भृगु मन्दराचल
पर्वत में
जहाँ
कल्पवृक्ष और
मन्दार आदिक वृक्ष,
बहुत
सुन्दर स्थान
और दिव्यमूर्ति
हैं तप करते
थे और शुक्रजी
उनकी टहल करते
थे । जब
भृगुजी
निर्विकल्प समाधि
में स्थित हुए
तब निर्मल
मूर्ति शुक्र एकान्त
जा बैठै । वे
कण्ठ में
मन्दार और
कल्पवृक्षों
के फूलों की माला
पहिरे हुए
विद्या और
अविद्या के
मध्य में स्थित
थे जैसे
त्रिशंकु
राजा चाण्डाल
था, पर
विश्वामित्र
के वर को पाके
जब स्वर्ग में
गया तब
देवताओं ने
अनादर कर उसे
स्वर्ग से
गिरा दिया और
विश्वामित्र
ने देखके कहा
कि वहीं खड़ा
रह इससे वह
भूमि और आकाश
के मध्य में स्थित
रहा, तैसे
ही शुक्र बैठै
तो क्या देखा
कि एक
महासुन्दर
अप्सरा उसके
ऊर्ध्व
स्वर्ग की ओर
चली जाती है ।
जैसे लक्ष्मी
की ओर
विष्णुजी
देखें तैसे ही
अप्सरा को
शुक्र ने देखा
कि
महासुन्दरी
और अनेक
प्रकार के
भूषण और
वस्त्र पहिने
हुए महासुगन्धित
है और
महासुन्दर आकाशमार्ग
भी उससे
सुगन्धित हुआ
है । पवन भी
उसकी स्पर्श
करके सुगन्ध
पसारती है और
महामद से उसके
पूर्ण नेत्र
हैं । ऐसी
अप्सरा को
देखके शुक्र
का मन
क्षोभायमान
हुआ और जैसे पूर्णमासी
के चन्द्रमा
को देखके
क्षीरसमुद्र
क्षोभित होता
है तैसे ही
उसकी वृत्ति अप्सरा
में जा स्थित
हुई और कामदेव
का वाण आ लगा ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
भार्गवसंविद्गमनन्नाम
पञ्चमस्सर्गः
॥5॥
वशिष्ठ
जी बोले, हे रामजी!
इस प्रकार
उसने अप्सरा
को देखके
नेत्र मूँदे और
मनोराज को
फैलाकर चिन्तने
लगा कि यह
मृगनयनी ललना
जो स्वर्ग को
गई है मैं भी
उसके निकट पहुँचू
। ऐसे विचार
के वह उसके
पीछे चला और
जाते जाते मन
से स्वर्ग में
पहुँचा । वहाँ
सुगन्ध सहित
मन्दार और
कल्पतरु, द्रव
स्वर्ण की
नाईं देवताओं
के शरीर और
हास विलास
संयुक्त
स्त्रियाँ
जिनके हरिण की
नाईं नेत्र
हैं देखे ।
मणियों के
समूह की परस्पर
उनमें
प्रतिबिम्ब
पड़ते हैं और
विश्वरूप की
उपमा स्वर्ग
लोक में देखी
। मन्द मन्द
पवन चलती है, मन्दार
वृक्षों में
मञ्जरी
प्रफुल्लित
हैं और
अप्सरागण
विचरती हैं ।
इन्द्र के
सम्मुख गया तो
देखा कि ऐरावत
हस्ती जिसने
युद्ध में
दाँतों से दैत्य
चूर्ण किये
हैं बड़े मद
सहित खड़ा है, देवताओं के
आगे अप्सरा
गान करती हैं,
सुवर्ण के
कमल लगे हुए
हैं । ब्रह्मा
के हंस और
सारस पक्षी
विचरते हैं और
देवताओं के
नायक विश्राम
करते हैं, फिर
लोकपाल, यम,
चन्द्रमा, सूर्य, इन्द्र,
वायु और अग्नि
के स्थान देखे
जिनका
महाज्वालवत्
प्रकाश है ।
ऐरावत् के
दाँतों में
दैत्यों की पंक्ति
देखी, देवता
देखे जो
विमानों पर
आरूढ़ भूषण
पहिने हुए
फिरते हैं और
उनके हार मणियों
से जड़े हुए
हैं । कहीं
सुन्दर
विमानों की
पंक्ति
विचरती हैं, कहीं मन्दार
वृक्ष हैं, कहीं कल्पवृक्ष
हैं, उनमें
सुन्दर लता
हैं, कहीं
गंगा का
प्रवाह चलता है,
उस पर
अप्सरागण
बैठी हैं, कहीं
सुगन्धता
सहित पवन चलता
है, कहीं
झरने में से
जल चलता है, कहीं सुन्दर
नन्दन वन हैं,
कहीं
अप्सरा बैठी
हैं, कहीं
नारद आदिक
बैठे हैं और
कहीं जिन
लोगों ने
पुण्य किये
हैं वे बैठे
सुख भोगते हैं
और विमानों पर
आरूढ़ हुए
फिरते हैं ।
कहीं इन्द्र की
अप्सरा
कामदेव से
मस्त हैं और जैसे
कल्पवृक्ष
में पक्के फल
लगते हैं तैसे
ही रत्न और
चिन्तामणि
लगे हैं, और
कहीं चन्द्रकान्तिमणि
स्रवती है ।
इस प्रकार शुक्र
ने मन से
स्वर्ग की
रचना देखा, मानों त्रिलोक
की रचना यही
है । शुक्र को
देखके इन्द्र
खड़ा हुआ कि
दूसरा भृगु
आया है और बड़े
प्रकाश
संयुक्त
शुक्र की
मूर्ति को
प्रणाम किया
और हाथ पकड़ के
अपने पास बैठा
के बोला, हे
शुक्रजी! आज
हमारे धन्य
भाग है जो तुम
आये । आज
हमारा स्वर्ग
तुम्हारे आने
से सफल, शोभित
और निर्मल हुआ
है । अब तुम
चिरपर्यन्त
यहीं रहो । जब
ऐसे इन्द्र ने
कहा तब
शुक्रजी
शोभित हुए और
उसको देखके
सुरों के समूह
ने प्रणाम
किया कि भृगु
के पुत्र शुक्रजी
आये हैं ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरण
भार्गवमनोराजवर्णनन्नाम
षष्ठस्सर्गः
॥6॥
वसिष्ठजी
बोले, हे रामजी!
जब इस प्रकार
शुक्रजी
इन्द्र के पास
जा बैठे तब
अपना जो निज
भाव था उसको
भुला दिया ।
वह जो
मन्दराचल पर्वत
पर अपना शरीर
था सो भूल गया और
वासना से
मनोराज का
शरीर दृढ़ हो
गया । एक मुहूर्त्त
पर्यन्त
इन्द्र के पास
बैठै रहे
परन्तु चित्त
उस अप्सरा में
रहा । इसके अनन्तर
उठ खड़े हुए और
स्वर्ग को
देखने लगे तब
देवताओं ने
कहा कि चलो
स्वर्ग की
रचना देखो ।
तब शुक्रजी
देखते-देखते
जहाँ वह
अप्सरा थी
वहाँ गये ।
बहुत-सी
अप्सराओं में
वह बैठी थी, उसको
शुक्रजी ने इस
भाँति देखा
जैसे
चन्द्रमा
चाँदनी को
देखे । उसे
देखके शुक्र का
शरीर
द्रवीभूत
होकर प्रस्वेद
से पूर्ण हुआ
जैसे
चन्द्रमा को
देखके
चन्द्रकान्तिमणि
द्रवीभूत
होती है, और
कामदेव के बाण
उसके हृदय में
आ लगे उससे व्याकुल
हो गया ।
शुक्र को देख
के उसका चित्
भी मोहित हो
गया-जैसे
वर्षाकाल की
नदी जल से
पूर्ण होती है
तैसे ही परस्पर
स्नेह बढ़ा ।
तब शुक्रजी ने
मन से तम रचा
उससे सब
स्थानों में
तम हो गया जैसे
लोकालोक
पर्वत के तम
होता है तैसे
ही सूर्य का
अभाव हो गया ।
तब भूतजात सब
अपने अपने
स्थानों में
गये जैसे दिन
के अभाव हुए
पशु-पक्षी
अपने अपने गृह
को जाते हैं
और वह अप्सरा
शुक्र के निकट
आई । शुक्रजी
श्वेत आसन पर
बैठ गये और
अप्सरा भी जो
सुन्दर
वस्त्र और
भूषण पहिने
हुए थी चरणों
के निकट बैठी
और स्नेह से
दोनों कामवश
हुए । तब
अप्सरा ने
मधुर वाणी से
कहा, हे
नाथ! मैं
निर्बल होकर
तुम्हारे शरण
आई हूँ मुझको
कामदेव दहन
करता है, तुम
रक्षा करो, मैं इससे
पूर्ण हो गई
हूँ । स्नेहरूपी
रस को वही
जानता है
जिसको
प्राप्त हुआ
है, जिसको
रस का स्वाद
नहीं आया वह क्या
जाने । हे
साधो! ऐसा सुख
त्रिलोकी में
और कुछ नहीं
जैसा सुख परस्पर
स्नेह से होता
है ।अब
तुम्हारे
चरणों को पाके
मैं
आनन्दवान्
हुई हूँ और
जैसे चन्द्रमा
को पाके
कमलिनी और
चन्द्रमा की
किरणों को
पाके चकोर
आनन्दवान्
होते हैं तैसे
ही मुझको स्पर्श
करके आप आनन्द
होंगे । जब इस
प्रकार अप्सरा
ने कह तब
दोनों काम के
वश होकर क्रीड़ा
करने लगे ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
भार्गवसंगमोनामसप्तमस्सर्गः
॥7॥
वशिष्ठजी
बोले, हे रामजी!
इस प्रकार
उसको पाके
शुक्र ने आपको
आनन्दवान्
मान, मन्दार
और कल्पवृक्ष
के नीचे
क्रीड़ा की और
दिव्य-वस्त्र,
भूषण और
फूलों की माला
पहिनकर वन, बगीचे और
किनारों में
क्रीड़ा करते
और चन्द्रमा
की किरणों के
मार्ग से अमृत
पान करते रहे
। फिर
विद्याधरों
के गणों के
साथ रह उनके
स्थानों और
नन्दनवन इत्यादि
में क्रीड़ा
करते कैलाश
पर्वत पर गये और
अप्सरा सहित
वन कुञ्ज में
फिरते रहे ।
फिर लोकालोक
पर्वत पर
क्रीड़ा की फिर
मन्दराचल
पर्वत के
कुञ्च में
विचर अर्ध शत
युगपर्यन्त
श्वेतद्वीप
में रहे । फिर
गन्धर्वों के
नगरों में रहे
और फिर इन्द्र
के वन में रहे
। इसी प्रकार
बत्तीस युग
पर्यन्त
स्वर्ग में
रहे, जब
पुण्य क्षीण
हुआ तब
भूमि-लोक में
गिरा दिये गये
और
गिरते-गिरते
उनका शरीर टूट
गया । जैसे झरने
में से जल
बन्द हो तैसे
ही शरीर
अन्तर्धान हो
गया । तब उसकी
चिन्तासंयुक्त
पुर्यष्टक
आकाश में
निराधार हो
रही और वासनारूपी
दोनों
चन्द्रमा की
किरणों में जा
स्थित हुए ।
फिर शुक्र ने
तो किरणों
द्वारा धान्य
में आ निवास
किया और उस
धान्य को दशारण्य
नाम ब्राह्मण
ने भोजन किया
तो वीर्य होकर
ब्राह्मणी के
गर्भ में जा
रहा और उस
धान्य को मालव
देश के राजा
ने भी भोजन
किया उसके
वीर्यद्वारा
वह अप्सरा
उसकी स्त्री
के उदर में जा
स्थित हुई ।
निदान दशारण्य
ब्राह्मण के
गृह में शुक्र
पुत्र हुआ और
मालवदेश के
राजा के यहाँ
अप्सरा
पुत्री हुई ।
क्रम से जब
षोडश वर्ष की
हुई तो महादेव
की पूजा कर यह
प्रार्थना की
कि हे देव! मुझको
पूर्व के
भर्त्ता की
प्राप्ति हो
इस प्रकार वह
नित्य पूजन
करे और वर
माँगे । निदान
वहाँ वह
यौवनवान् हुआ
यहाँ यह
यौवनवती हुई ।
तब राजा ने
यज्ञ को
प्रारम्भ किया
और उसमें सब
राजा और
ब्राह्मण आये
। दशारण्य
ब्राह्मण भी
पुत्रसहित
वहाँ आया तब
उस पूर्वजन्म
के भर्त्ता को
देखकर स्नेह से
राजपुत्री के
नेत्रों से जल
चलने लगा और
उसके कण्ठ में
फूल की माला
डालके उसे
अपना भर्त्ता
किया । राजा
यह देखके आश्चर्यमान
हुआ और निश्चय
किया कि भला
हुआ । फिर
क्रम से विवाह
किया और
पुत्री और
जामातृ को
राज्य देके आप
वन में तप
करने के लिए
चला गया ।
यहाँ ये पुरुष
और स्त्री
मालवदेश का
राज्य करने
लगे और चिरकाल
तक राज्य करते
रहे । निदान
दोनों वृद्ध हुए
और उनका शरीर
जर्जरीभूत हो
गया । तब उसको वैराग्य
हुआ कि स्त्री
महादुःखरूप
है पर उसे
सामान्य
वैराग्य हुआ
था इससे
जर्जरीभूत
अंग में सेवने
से तो अशक्त
हुआ परन्तु
तृष्णा
निवृत्त न हुई
। निदान मृतक
हुआ और
बान्धवों ने
जला दिया तब
ज्ञान की प्राप्ति
बिना
महाअन्धकूप
मोह में जा
पड़े । हे
रामजी!
मृत्यु-मूर्च्छा
के अनन्तर उसको
परलोक भासि
आया और वहाँ
कर्म के
अनुसार सुख
दुःख भोग के
अंग वंग देश
में धीवर हुआ
और अपने
धीवरकर्म
करता रहा ।
फिर जब वृद्ध
अवस्था आई तब
शरीर में
वैराग्य हुआ कि
यह संसार
महादुःखरूप
है ऐसे जानके
सूर्य भगवान्
का तप करने
लगा और जब
मृतक हुआ तब तप
के वश से
सूर्यवंश में
राजा होकर
भावना के वश
से कुछ
ज्ञानवान्
हुआ । इस जन्म में
वह योग करने
और वेद पढ़ने
लगा और योग की
भावना से जब
शरीर छूटा तब
बड़ा गुरू हुआ
और सबको उपदेश
करने लगा, मन्त्र
सिद्ध किया और
वेद में बहुत
परिपक्व हुआ ।
मन्त्र के वश
से वह
विद्याधर हुआ
और एक कल्प
पर्यन्त
विद्याधर रहा
। जब कल्प का अन्त
हुआ तब शरीर
अन्तर्धान हो
गया और पवनरूपी
वासना सहित हो
रहा । जब
ब्रह्मा की रात्रि
क्षय हुई, दिन
हुआ और
ब्रह्मा ने
सृष्टि रची तब
वह एक मुनीश्वर
के गृह में पुत्र
हुआ और वहाँ
उसने बड़ा तप
किया । वह
सुमेरु पर्वत
पर जाकर स्थित
हुआ और एक मन्वन्तर
पर्यन्त वहाँ
रहा । जब
इकहत्तर चौयुगी
बीती तब वह
भोगों के वश
हरिणी का पुत्र
हुआ और मनुष्य
के आकार से
वहाँ रहा और पुत्र
के स्नेह से
मोह को
प्राप्त हो निरन्तर
यही चिन्तना
करने लगा कि
मेरे पुत्र को
बहुत धन, गुण,
आयु, बल
हो, इस
कारण तप के
भ्रष्ट होने
से अपने धर्म
से विरक्त हुआ,
आयुष्य
क्षीण हुई और
मृत्युरूप
सर्प ने ग्रस
तप की अभिलाषा
से शरीर छूटा
इस कारण भोग
की चिन्ता
संयुक्त
मद्रदेश के
राजा के गृह
में उत्पन्न
हुआ, फिर
उस देश का
राजा हुआ और
चिरपर्यन्त
राज्य भोग के
वृद्धावस्था
को प्राप्त
हुआ और शरीर
जर्जरीभूत हो
गया । वहाँ तप
के अभिलाषा
में उसका शरीर
छूटा उससे
तपेश्वर के
गृह में पुत्र
हुआ और सन्ताप
से रहित होकर
गंगाजी के
किनारे पर तप
करने लगा । हे
रामजी । इस
प्रकार मन के
फुरने से
शुक्र ने अनेक
शरीर भोगे ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
भार्गवोपाख्याने
बिविधजन्म
वर्णनन्नाम अष्टमस्सर्गः
॥8॥
वशिष्ठजी
बोले, हे रामजी!
इस प्रकार
शुक्र मन से
भ्रमता फिरा ।
भृगु के पास
जो उसका शरीर
पड़ा था सो
निर्जीव हुआ
पुर्यष्टक निकल
गई थी और पवन
और धूप से शरीर
जर्जरीभूत हो
गया जैसे मूल
से काटा वृक्ष
गिर पड़ता है, तैसे ही
शरीर गिर पड़ा चञ्चल
मन भोग की
तृष्णा से
वहाँ गया था ।
जैसे हरिण वन
में भ्रमता है
और चक्र पर चढ़ा
वासन भ्रमता
है तैसे ही
उसने भ्रम से
भ्रमान्तर
देखा, पर
जब मुनीश्वर
के गृह में
जन्म लिया तब
चित्त में
विश्राम हुआ
और गंगा के तट पर
तप करने लगा ।
निदान मन्दराचल
पर्वतवाला
शुक्र का शरीर
नीरस हो गया
शरीर
चर्ममात्र
शेष रह गया और
लोहू सूख गया
। जब शरीर के
रन्ध्र मार्ग
से पवन चले तब
बाँसुरीवत्
शब्द हो, मानो
चेष्टा को
त्याग के
आनन्दवान्
हुआ है । जब
बड़ा पवन चले
तब भूमि में
लोटने लगे, नेत्र आदिक
जो रन्ध्र थे
सो गर्तवत् हो
गये और मुख फैल
गया-मानो अपने
पूर्व स्वभाव
को देख के
हँसता है, जब
वर्षाकाल आवे
तब वह शरीर जल
से पूर्ण हो
जावे और जल
उसमें प्रवेश करके
रन्ध्रों के
मार्ग से ऐसे
निकले जैसे झरने
से निकलता है
और जब उष्णकाल
आवे तब
महाकाष्ठ की
नाईं धूप से
सूख जावे ।
निदान वह शरीर
वन में मौनरूप
होकर स्थित रहा
। और
पशु-पक्षियों
ने भी उस शरीर
को नष्ट न
किया । उसका
एक तो यह कारण
था कि
राग-द्वैष से
रहित पुण्य
आश्रम था-और
दूसरे भृगुजी
महातपस्वी
तेजवान् के
निकट कोई आ न
सकता था ।
तीसरे उनके
संस्कार शेष
थे । इस कारण
उस देह को कोई
नष्ट न कर सका
। यहाँ तो
शरीर की यह
दशा हुई और
वहाँ शुक्र
पवन के शरीर
से चेष्टा
करता रहा ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठेस्थितिप्रकरणे
भार्गवकलेवरवर्णनन्नाम
नवमस्सर्गः ॥9॥
वशिष्ठजी
बोले, हे रामजी!
जब सहस्त्र
वर्ष अर्थात्
भूमिलोक के
तीनलाख साठ
सहस्त्र वर्ष
बीते तब
भगवान्
भृगुजी समाधि
से उतरे तो उन्हें
शुक्र दृष्टि
न आया । जब भले प्रकार
नेत्र फैलाकर
देखा तब मालूम
हुआ कि उसका
शरीर कृश हो
के गिर पड़ा है
। यह दशा देख
उन्होंने
जाना कि काल
ने इसको भक्षण
किया है और
धूप वायु और
मेघ से शरीर जर्जरीभूत
हो गया है, नेत्र
गढ़ेरूप हो गये
हैं, शरीर
में कीड़े पड़
गये हैं और जीवों
ने उसमें आलय
बनाये हैं ।
घुराण अर्थात्
कुसवारी और
मक्खियाँ
उसमें
आती-जाती हैं,
श्वेत दाँत
निकल आये हैं-मानों
शरीर की दशा
को देखके
हँसते हैं और मुख
और ग्रीवा
महाभयानकरूप,
खपर श्वेत
और नासिका और
श्रवण स्थान
सब जर्जरीभूत
हो गये हैं । उस
शरीर की यह
दशा देख के
भृगुजी उठ खड़े
हुए और क्रोधवान्
होकर कहने लगे
कि काल ने
क्या समझा जो
मेरे पुत्र को
मारा । शुक्र
परम तपस्वी और
सृष्टिपर्यन्त
रहने वाला था
सो बिना काल, काल ने मेरे
पुत्र को
क्यों मारा, यह कौन रीति
है? मैं
काल को शाप
देकर भस्म
करूँगा । तब
महाकाल का रूप
काल अद्भुत
शरीर धरकर आया
। उसके षटमुख,
षटभुजा, हाथ
में खग, त्रिशूल
और फाँसी और
कानों में
मोती पहिने हुए,
मुख से
ज्वाला
निकलती थी, महाश्याम
शरीर
अग्निवत्
जिह्वा और
त्रिशूल के
अग्निकी लपटें
निकलती थीं ।
जैसे
प्रलयकाल की
अग्नि से धूम
निकलता है
तैसे ही उसका
श्याम शरीर और
बड़े पहाड़ की
नाईं उग्ररूप
था और जहाँ वह
चरण रखता था
वहाँ पृथ्वी
और पहाड़
काँपने लगते
थे । निदान
भृगुजी
महाप्रलय के
समुद्रवत्
क्रोध पूर्ण थे,
उनसे कहने
लगा,हे
मुनीश्वर! जो
मर्यादा और
परावर
परमात्मा के
वेत्ता हैं वे
क्रोध नहीं
करते और जो
कोई क्रोध करे
तो भी वे मोह
के वश होकर
क्रोधवान्
नहीं होते ।
तुम कारण बिना
क्यों मोहित होकर
क्रोध को
प्राप्त हुए
हो? तुम
ब्रह्मतनय
तपस्वी हो और
हम नीति के
पालक हैं। तुम
हमारे पूजने
योग्य हो- यही
योग्य हो-यही
नीति की इच्छा
है और तप के बल से
तुम क्षोभ मत
करो, तुम्हारे
शाप से मैं
भस्म भी नहीं
होता । प्रलयकाल
की अग्नि भी
मुझको दग्ध
नहीं कर सकती
तो तुम्हारे
शाप से मैं कब
भस्म हो सकता
हूँ । हे मुनीश्वर!
मैं तो अनेक ब्रह्माण्ड
भक्षण कर गया
हूँ, और कई
कोटि ब्रह्मा,
विष्णु और रुद्र
मैंने ग्रास
लिये हैं, तुम्हारा
शाप मुझको
क्या कर सकता
है? जैसे
आदि नीति ईश्वर
ने रची है
तैसे ही स्थित
है । हम सबके
भोक्ता हुए
हैं और तुमसे
ऋषि हमारे भोग
हुए हैं, यही
आदि नीति है ।
हे मुनीश्वर!
अग्नि स्वभाव
से ऊर्ध्व को
जाता है और जल स्वभाव
से अधः को
जाता है, भोक्ता
को भोग
प्राप्त होता
और सब सृष्टि
काल के मुख
में प्राप्त
होती है । आदि
परमात्मा की
नीति ऐसे ही
हुई है और
जैसे रची है
तैसे ही स्थिति
है पर जो निष्कलंक
ज्ञानदृष्टि
से देखिये तो
न कोई कर्त्ता
है,न
भोक्ता है,न
कारण है, न
कार्य है, एक
अद्वैतसत्ता
ही है और जो
अज्ञान
कलंकदृष्टि
से देखिये तो कर्ता
भोक्ता अनेक
प्रकार भ्रम
भासते हैं, हे ब्राह्मण!
कर्त्ता
भोक्ता आदिक
भ्रम असम्यक्
ज्ञान से होता
है, जब
सम्यक् ज्ञान
होता है तब
कर्त्ता, कार्य
और भोक्ता कोई
नहीं रहता ।
जैसे वृक्ष
में पुष्प
स्वभाव से उपज
आते हैं और
स्वभाव से ही नष्ट
हो जाते हैं
तैसे ही भूत
प्राणी
सृष्टि में
स्वाभाविक
फुर आते हैं
और फिर स्वाभाविक
रीति से ही
नष्ट हो जाते
हैं । ब्रह्मा
उत्पन्न करता
है और नष्ट भी करता
है । जैसे
चन्द्रमा का
प्रतिबिम्ब
जल के हिलने
से हिलता
भासता है और
ठहरने से ठहरा
भासता है तैसे
ही मन के
फुरने से
आत्मा में कर्त्तव्य
भोक्तव्य
भासता है वास्तव
में कुछ नहीं,
सब मिथ्या
है । जैसे
रस्सी में
सर्प भ्रम से
भासता है तैसे
ही आत्मा में
कर्त्तव्य
भोक्तव्य
भ्रम से भासता
है । इससे
क्रोध मत करो,
यह
दुष्टकर्म आपदा
का कारण है । हे
मुनीश्वर! मैं
तुमको यह वचन
अपनी विभूति
और अभिमान से
नहीं कहता ।
यह स्वतः ईश्वर
की नीति है और
हम उसमें
स्थित हैं ।
जो बोधवान्
पुरुष हैं वे
अपने प्रकृत आचार
में विचरते
हैं और अभिमान
नहीं करते ।
जो कर्त्तव्य
के वेत्ता हैं
वे बाहर से प्रकृत
आचार करते हैं
और हृदय से
सुषुप्ति की नाईं
स्थित रहते
हैं । वह
ज्ञानदृष्टि धैर्य
और उदार
दृष्टि कहाँ
गई जो शास्त्र
में प्रसिद्ध
है? तुम
क्यों अन्धे
की नाई स्थित
रहते हैं । वह
ज्ञान दृष्टि,
धैर्य और
उदार दृष्टि
कहाँ गई जो
शास्त्र में प्रसिद्ध
है? तुम
क्यों अन्धे
की नाईं
मोहमार्ग में
मोहित होते हो?
हे साधो!
तुम तो
त्रिकालदर्शी
हो, अविचार
से मूर्ख की
नाईं जगत् में
क्यों मोह को
प्राप्त होते हो?
तुम्हारा
पुत्र अपने
कर्मों के फल
को प्राप्त
हुआ है और तुम
मूर्ख की नाईं
मुझको शाप देना
चाहते हो । हे
मुनीश्वर! इस
लोक में सब
जीवों के
दो-दो शरीर
हैं- एक मनरूप
और दूसरा
आधिभौतिक ।
आधिभौतिक
शरीर अत्यन्त
विनाशी है और
जहाँ इसको मन
प्रेरता है
वहाँ चला जाता
है-आपसे कुछ
कर नहीं सकता
। जैसे सारथी
भला होता है
तो रथ को भले
स्थान को ले
जाता है और जो
सारथी भला नहीं
होता तो रथ को
दुःख के स्थान
में ले जाता
है तैसे ही
यदि जो मन भला
होता है तो
उत्तम लोक में
जाता है जो
दुष्ट होता है
तो नीच स्थान
में जाता है ।
जिसको मन असत्
करता है सो
असत् भासता है
और जिसको मन
सत् करता है
वह सत् भासता
है । जैसे
मिट्टी की
सेना बालक
बनाते और फिर
भंग करते हैं,
कभी सत्
करते, कभी
असत् करते हैं
और जैसे करते
हैं तैसे ही देखते
हैं, तैसे
ही मन की
कल्पना है ।
हे साधो!
चित्तरूपी
पुरुष है, जो
चित्त करता है
वह होता है और
जो चित्त नहीं
करता वह नहीं
होता । यह जो
फुरना है कि
यह देह है, ये
नेत्र हैं; ये अंग हैं
इत्यादिक सब
मनरूप हैं ।
जीव भी मन का
नाम है और मन
का जीना जीव
है । वही मन की
वृत्ति जब
निश्चयरूप होती
है तब उसका
नाम बुद्धि
होता है, जब
अहंरूप धारती
है तब उसका
नाम अहंकार
होता है और जब
देह को स्मरण
करती है तब उसका
नाम चित्त
होता है ।
इससे पृथ्वी
रूपी शरीर कोई
नहीं, मन
ही दृढ़ भावना
से शरीररूप
होता है और
वही आधिभौतिक
हो भासता है और
जब शरीर की
भावना को
त्यागता है तब
चित्तपरमपद
को प्राप्त
होता है । जो
कुछ जगत है वह
मन के फुरने
में स्थित है,
जैसा मन फुरता
है तैसा ही
रूप हो भासता है
। तुम्हारे
पुत्र शुक्र
ने भी मन के
फुरने से अनेक
स्थान देखे
हैं । जब तुम समाधि
में स्थित थे
तब वह
विश्वाची
अप्सरा के पीछे
मन से चला गया
और स्वर्ग में
जा पहुँचा
।फिर देवता
होकर
मन्दारवृक्षों
में अप्सरा के
साथ विचरने
लगा और फिर
पारिजात तमाल
वृक्ष और
नन्दन वन में
विचरता रहा ।
इसी प्रकार
बत्तीस युग
पर्यन्त
विश्वाची अप्सरा
के साथ
लोकपालों के
स्थान
इत्यादिक में
विचरता रहा और
जैसे भँवरा
कमल को सेवता
है तैसे ही
तीव्र संवेग
से भोग भोगता
रहा । जब
पुण्य क्षीण
हुआ तब वहाँ
से इस भाँति
गिरा जैसे
पक्का फल
वृक्ष से
गिरता है । तब
देवता का शरीर
आकाशमार्ग
में अन्तर्धान
हो गया और
भूमिलोक में आ
पड़ा । फिर धान
में आकर
ब्राह्मण के
वीर्य द्वारा
ब्राह्मणी का
पुत्र हुआ, फिर मालवदेश
का राज्य किया
और फिर धीवर
का जन्म पाया
। फिर
सूर्यवंशी
राजा हुआ, फिर
विद्याधर हुआ
और कल्प
पर्यन्त
विद्याधरों
में विद्यमान
रहा और फिर
विन्ध्याचल
पर्वत में लय
होकर क्रान्त
देश में धीवर
हुआ । फिर तरंगीत
देश में राजा
हुआ,फिर
क्रान्तदेश
में हरिण हुआ
और वनमें
विचरा और फिर विद्यामान्
गुरु हुआ ।
निदान
श्रीमान्
विद्याधर हुआ
और कुण्डलादि
भूषणों से
सम्पन्न बड़ा
ऐश्वर्यवान्
गन्धर्वों का
मुनिनायक हुआ
और कल्प
पर्यन्त वहाँ
रहा । जब
प्रलय होने
लगी तब पूर्व
के सब लोक
भस्म हो
गये-जैसे अग्नि
में पतंग भस्म
होते हैं-तब तुम्हारा
पुत्र
निराधार और
निराकार
वासना से
आकाशमार्ग
में भ्रमता
रहा । जैसे
आलय बिना
पक्षी रहता है
तैसे ही वह
रहा और जब
ब्रह्मा की
रात्रि
व्यतीत हुई और
सृष्टि की
रचना बनी तब
वह सतयुग में
ब्राह्मण का
बालक
वसुदेवनाम हो
गंगा के तट पर
तप करने लगा
।अब उसे आठसौ
वर्ष तप करते
बीते हैं, जो
तुम भी
ज्ञानदृष्टि
से देखोगे तो सब
वृत्तान्त
तुमको भास आवेगा
। इससे देखो
कि इसी प्रकार
है अथवा किसी
और प्रकार है
।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
कालवाक्यन्नामदशमस्सर्गः
॥10॥
काल
बोले, हे
मुनीश्वर? ऐसी
गंगा के तट पर
जिसमें
महातरंग
उछलते और झनकार
शब्द होते हैं
तुम्हारा
पुत्र तप करता
है । शिर पर
उसके बड़ी जटा
हैं और सर्व
इन्द्रियों को
उसने जीत लिया
है । जो तुमको
उसके मन के
विस्तार
देखने की
इच्छा है तो
इन नेत्रों को
मूँदकर ज्ञान
के नेत्रों से
देखो । हे
रामजी! जब इस
प्रकार जगत के
ईश्वर काल ने,
जिसकी
समदृष्टि है,
कहा, तब
मुनीश्वर ने
नेत्रों को
मूँदकर, जैसे
कोई अपनी
बुद्धि में
प्रतिबिम्ब
देखे,
ज्ञाननेत्रों
से एक
मुहूर्त्त
में अपने पुत्र
का सब
वृत्तान्त
देखा और फिर
मन्दराचल
पर्वत पर जो
भृगुशरीर पड़ा
था उसमें
प्रवेशकर अन्तवाहक
शरीर से अपने
अग्रभाग में
काल भगवान् को
देखकर पुत्र
को गंगा के तट
पर देखा । यह
दशा देख वह
आश्चर्य को
प्राप्त हुआ और
विकारदृष्टि
को त्यागकर
निर्मलभाव से
वचन कहे । हे
भगवन्! तीनों
काल के ज्ञाता
ईश्वर! हम
बालक हैं , इसी
से निर्दोष हैं
। तुम सरीखे
बुद्धिमान्
और तीन काल
अमलदर्शी हैं
। हे भगवन्!
ईश्वर की माया
महाआश्चर्यरूप
है जो जीवों
को अनेक भ्रम
दिखाती है और
बुद्धिमान्
को भी मोह
करती है तो
मूर्खों की
क्या बात है? तुम सब कुछ
जानते हो, जीवों
की सब
वार्त्ता
तुम्हारे अन्तर्गत
है । जैसी
जीवों के मन
की वृत्ति होती
है उसके
अनुसार वे
भ्रमते हैं ।
वह मन की सब
तुम्हारे
अन्तर्गत
फुरती है ।
जैसे इन्द्रजाली
अपनी बाजी का
वेत्ता होता है
तैसे ही तुम
इन सबों के
वेत्ता हो ।
हे भगवन्!
मैंने भ्रम को
प्राप्त होकर क्रोध
इस कारण से
किया कि मेरे
पुत्र की
मृत्यु न थी
वह चिरञ्जीवी
था और उसको
मैं मृतक हुआ
देखके भ्रम को
प्राप्त हुआ ।
हमारा क्रोध
आपदा का कारण
नहीं था , क्योंकि
जब मैंने
पुत्र का शरीर
निर्जीव देखा
तब कहा कि
अकारण मृतक
हुआ इस कारण
क्रोध हुआ । क्रोध
भी नीतिरूप है
अर्थात् जो
क्रोध का स्थान
हो वहाँ क्रोध
चाहिए । मैंने
विचार के
क्रोध नहीं
किया है
अर्थात्
पुत्र की अवस्था
देख के क्रोध
किया,निर्जीव
शरीर को देखके
क्रोध किया, इसी से यह
क्रोध आपदा का
कारण नहीं ।
अयुक्ति कारण
से जो क्रोध
होता वह आपदा
का कारण है और
युक्ति से जो
क्रोध है वह
सम्पदा का
कारण है यह
कर्त्तव्य
संसार की
सत्ता में
स्थित है । यह
नीति है कि जब
तक जीव है तबतक
जगत् क्रम है
जैसे जब तक
अग्नि है तब
तक उष्णता भी
है । जो
कर्तव्य है वह
करना है और जो त्यागने
योग्य है वह
त्यागना है । यह
नीति जगत् में
स्थित है । जो
हेयोपादेय
नहीं जानता
उसको त्यागना
योग्य है ।
इससे मैंने
पुत्र की
अकालमृत्यु
देखके क्रोध
किया था
परन्तु विचार
करके जब तुमने
स्मरण कराया
तब मैंने
विचार करके
देखा कि मेरा
पुत्र अनेक
भ्रम पाकर अब
गंगा के तट पर
तप करता है ।
हे भगवन्!
तुमने तो कहा
कि सब जीवों
के दो-दो शरीर
हैं-एक मनोमय
और दूसरा
आधिभौतिक, पर
मैं तो यह
मानता हूँ कि
केवल मन ही एक
शरीर है, दूसरा
कोई नहीं ।
मनही का किया
सफल होता है, शरीर का
नहीं होता ।
काल बोले, हे
मुनीश्वर! तुमने
यथार्थ कहा, शरीर एक मन
ही है । जैसे
घट को कुलाल
रचता है, तैसे
ही मन भी देह को
रचता है ।जो
मन शरीर से
रहित निराकार
होता है तो
क्षण में आकार
को रच लेता है
। जैसे बालक
परछाहीं में
वैताल को भ्रम
से रचता है।
मन में जो
फुरनसत्ता है
वह स्वप्न भ्रम
दिखाती है और
उसमें बड़े
आकार और
गन्धर्व नगर
भासि आते हैं
पर वह मन ही की सत्ता
है । स्थूल
दृष्टि से
जीवों को दो
शरीर भासते
हैं बोधवान्
को तीनों जगत्
मन रूप भासते
हैं और सब मन
से रचे हैं ।
जब भेदवासना
होती हे तब
असत्रूप
जगत् नाना प्रकार
हो भासता है ।
जैसे असम्यक्
दृष्टि से दो
चन्द्रमा
भासते हैं
तैसे ही
सम्यक् दर्शी
को एक
चन्द्रमावत्
सब शान्तरूप
आत्मा ही
भासता है और
भेदभावना से
घट पट आदिक अनेक
पदार्थ भासते
हैं कि मैं
दुर्बल हूँ व
मोटा हूँ,सुखी
हूँ व दुःखी
हूँ, यह
जगत् है यह
काल है, इत्यादिक
सो संसार
वासनामात्र
है । जब मन शरीर
की वासनाको
त्यागकर परमार्थ
की ओर आता है
तब भ्रम को
नहीं प्राप्त
होता । हे
मुनिवर!
समुद्र से
तरंग उठकर
उर्ध्व को
जाता है, जो
वह जाने मैं
तरंग होता हूँ
तो मूर्ख
है-यही अज्ञान
दृष्टि है ।
ऊर्ध्व को
जावेगा तब
जानेगा मैं ऊर्ध्व
को गया हूँ, नीचे जावेगा
तब जानेगा मैं
पाताल को गया
हूँ, यह
कल्पना ही
अज्ञान है, वास्तव नहीं
। वास्तव
दृष्टि यह है
जो अधः हो
अथवा उर्ध्व
हो परन्तु
आपको जलरूप
जाने । तैसे
ही जो पुरुष
परिच्छेद
देहादिक में
अहं प्रतीत
करता है सो
अनेक भ्रम
देखता है,सम्यक्दर्शी
सब आत्मरूप
जानता है ।
सर्व जीव
आत्मरूप समुद्र
के तरंग हैं, अज्ञान से
भिन्न हैं और
ज्ञान से वही
रूप है ।
आत्मारूपी
समुद्र सम, स्वच्छ, शुद्ध
आदि रूप, शीतल,
अवि नाशी और
विस्तृत अपनी
महिमा में
स्थित है और सदा
आनन्दरूप है
जैसे कोई जल
में स्थित हो
और तट पर
पहाड़में
अग्नि लगी हो
तो उस अग्नि का
प्रतिबिम्ब
जल में देख वह
कहे कि मैं
दग्ध होता हूँ
। जैसे भ्रम
से उसको
ज्वलनता
भासती है तैसे
ही जीव को
आभासरूप जगत्
दुःखदायक
भासता है ।
जैसे तट के
वृक्ष, पर्वतादि
पदार्थ जल में
नाना प्रकार
प्रतिबिम्बवत्
भासते हैं
तैसे ही
आभासरूप जगत्
को जीव नाना
रूप मानते हैं
। जैसे एक
समुद्र में
नाना तरंग
भासते हैं
तैसे ही आत्मा
में अनेक आकार
जगत् भासता है,
वास्तव में
द्वैत कुछ
नहीं सर्व
शक्तिरूप ब्रह्मसत्ता
ही है उसी से विचित्ररूप
चञ्चल भासता है
पर वह एकरूप
अपने आपमें
स्थित है ।
ब्रह्म में
जगत् फुरता है
और उसी में
लीन होता है ।
जैसे समुद्र
में तरंग
उपजते हैं और
फिर उसी में लीन
होते हैं, कुछ
भेद नहीं, पूर्ण
में पूर्ण ही
स्थित है जैसे
जल से तरंग और
ईश्वर से जगत्
और पत्र, डाल,
फूल, फल,
वृक्षरूप
हैं तैसे ही
सब जगत्
आत्मरूप है और
वह आत्मा अनेक
शक्तिरूप हैं
। जैसे एक
पुरुष अनेक
कर्म का
कर्त्ता होता
है और जैसा कर्म
करता है तैसे
ही संग को
पाता है
अर्थात् पाठ
करने से पाठक
और पाक करने
से पाचक और
जाप करने से
जापक आदि अनेक
नाम धरता है, तैसे ही एक
आत्मा अनेक शक्ति
धारता है । जैसे
जिस आकार की
परछाहीं पड़ती
है तैसा ही
आकार भासता है
और एक मेघ में
अनेक रंग सहित
इन्द्रधनुष
भासता है तैसे
ही यह अनेक भ्रम
पाता है । हे
साधो! सब जगत् ब्रह्मा
से फुरा है और
जो जड़ भासते
हैं वे भी चैतन्यसत्ता
से फुरे हैं ।
जैसे मकड़ी
अपने मुख से
जाला निकालकर
आप ही ग्रास
लेती है तैसे
ही चैतन्य से
जड़ उत्पन्न होके
फिर लीन हो
जाते हैं ।
चैतन्य जीव से
सुषुप्ति
जड़ता उपजती है
और फिर उसी
में निवृत्त
होती है । इससे
अपनी इच्छा से
यह पुरुष
बन्धवान्
होता है और
अपनी इच्छा से
ही मुक्त होता
है । जब
बहिर्मुख देहादिक
अभिमान से
मिलता है तब
आपको बन्धवान्
करता है-जैसे
घुरान आप ही गृह
रचके
बन्धवान्
होता है और जब
पुरुषार्थ करके
अन्तर्मुख
होता है तब
मुक्ति पाता है
। जैसे अपने
हाथ के बल से
बन्धन को तोड़
के कोई बली
निकल जाता है
। हे साधो! ईश्वर
की
विचित्ररूप
शक्ति है, जैसी
शक्ति फुरती
है तैसा ही
रूप दिखाती है
। जैसे ओस
आकाश में
उपजती है और
उसी को ढाँप
लेती है तैसे
ही आत्मा में
जो
इच्छाशक्ति उपजती
है वही आवरण
कर लेती है और
उसी में तन्मयरूप
होजाती है ।
वास्तव में
जीव को बन्धन
और मोक्ष नहीं
है, बन्ध
और मोक्ष
दोनों शब्द
भ्रान्तिमात्र
हैं, मैं
नहीं जानता कि
बन्ध और मोक्ष
लोक में
कहाँसे आये हैं
। आत्मा को न
बन्धन है और न
मोक्ष है, ऐसे
सत्रूप को
असत्यरूप ने
ग्रास कर लिया
है जो कहता है
कि मैं दुःखी
व सुखी हूँ, दुबला हूँ व
मोटा हूँ
इत्यादि माया
महाआश्चर्यरूप
है जिसने जगत्
को मोहित किया
है । हे
मुनिश्वर! जब
चित्तसंवित्
कलनारूप होता
है तब कुसवारी
की नाईं आप ही
आपको बन्धन
करता है और जब
दृश्य से रहित
अन्तर्मुख होता
है तब शुद्ध
मोक्षरूप
भासता है । बन्ध
और मुक्ति
दोनों मन की
शक्ति हैं, जैसा-जैसा
मन फुरता है
तैसा तैसा रूप
भासता है ।
अनेक शक्ति
आत्मा से
अनन्यरूप है,
सब आत्मा से
उपजा है और
आत्मा में ही स्थित
है । जैसे
समुद्र में
तरंग उपजते
हैं और उसी
में स्थित
होकर लीन हो
जाते हैं और
चन्द्रमा से
किरणें उदय
होकर भिन्न
भासतीं पर फिर
उसी में लीन
होती हैं तैसे
ही जीव उपज कर
लीन हो जाते
हैं । परमात्मारूपी
महासमुद्र है,
चेतनतारूपी
उसमें जल है जिससे
जीवरूपी अनेक
तरंग उपजते
हैं और उसी में
स्थित होकर
फिर लीन हो
जाते हैं । कोई
तरंग
ब्रह्मारूप, कोई विष्णु,
कोई रुद्र
होकर
प्रकाशते हैं
और कोई लहर
प्रमाद से
रहित यम, कुबेर,
इन्द्र, सूर्य,
अग्नि, मनुष्य,
देवता, गन्धर्व,
विद्याधर, यक्ष, किन्नर
आदिक रूप होकर
उपजते हैं और
फिर लीन हो
जाते हैं । कोई
स्थित होकर
चिरकाल
पर्यन्त रहते
हैं-जैसे
ब्रह्मादिक, कोई उपजकर
और कुछ काल रहकर
विध्वंस हो
जाते हैं-जैसे
देवता, मनुष्यादिक
और कोई कीट
सर्प आदिक
फुरते हैं और
चिरकाल भी रहते
हैं और
अल्पकाल में
भी नष्ट हो
जाते हैं । कोई
ब्रह्मादिक
उपजकर अप्रमादी
रहते हैं और
कोई प्रमादी
हो जाते हैं
और तुच्छ शरीर
होते हैं यह
संसार स्वप्न
आरम्भ है और
दृढ़ होकर
भासता है ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठेस्थितिप्रकरणे
संसारावर्तवर्णन्नामैकादशस्सर्गः
॥11॥
काल
बोले, हे
मुनीश्वर!
देवता, दैत्य,
मनुष्यादिक
आकार ब्रह्म
से अभिन्नरूप
हैं और यह सत्
है । जब
मिथ्या
संकल्प से जीव
कलंकित होता
है तब जानता
है कि "मैं
ब्रह्म नहीं "
इस निश्चय को
पाके मोहित
होता है और मोहित
हुआ अधः को
चला जाता है । यद्यपि
वह ब्रह्म से
अभिन्न रूप है
और उसमें स्तित
है तो भी
भावना के वश
से आपको भिन्न
जानके मोह को
प्राप्त होता
है। शुद्ध ब्रह्म
में जो संवित्
का उल्लेख
होता है वही
कलंकितरूप
कर्म का बीज
है, उससे
आगे विस्तार
को पावता है ।
जैसे जल जिस जिस
बीज से मिलता
है उसी रस को
प्राप्त होता
है तैसे ही
संवित् का
फुरना जैसे
कर्म से मिलता
है तैसी गति
को प्राप्त
होता है । संकल्प
से कलंकित हुआ
अनेक दुःख
पाता है । यह
प्रमादरूप
कर्म कञ्ज के
बीज सा है जिसको
जो मुट्ठी भर
भर बोता है सो अपने
दुःख का कारण
है और यह जगत्
आत्मरूप
समुद्र की लहर
है जो विस्तार
से फुरती है
और कोई ऊर्ध्व
को जाती है और
कोई अधः को
जाती है फिर
लीन हो जाती
है । ब्रह्मा आदि
तृण पर्यन्त
इन सबका यही
धर्म है जैसे
पवन का स्पन्द
धर्म है तैसे
ही इनका भी है,
पर उनमें
कोई निर्मल
पूजने योग्य
ब्रह्मा, विष्णु,
रुद्रादिक
हैं, कुछ
मोह संयुक्त
है- जैसे
देवता, मनुष्य,
सर्प, कोई
अनन्त मोह में
स्थित
हैं-जैसे
पर्वत वृक्षादिक,
कोई अज्ञान
से मूढ़ हैं-
जैसे कृमि, कीटादिक
योनि, ये
दूर से दूर
चले गये हैं ।
जैसे जल के
प्रवाह से तृण
चला जाता है
तैसे ही देवता,
मनुष्य, सर्पादिक
कितने
भ्रमवान् भी
होते हैं और
कोई तट के
निकट आके फिर
बह जाते हैं
अर्थात्
सत्संग और
सत्शास्त्रों
को पाके फिर
माया के
व्यवहार में
बह जाते हैं
और यमरूप चूहा
उनको काटता है
। एक अल्प मोह
को प्राप्त
होकर फिर
ब्रह्मसमुद्र
में लीन हुए
है, कोई
अन्त र्गत
ब्रह्मसमुद्र
को जानके
स्थित हुए हैं
और तम अज्ञान
से तरे हैं, कोई अनेक
कोटि जन्म में
प्राप्त होते
हैं और अधः से
ऊर्ध्व को चले
जाते हैं । और
फिर ऊर्ध्व से
अधः को चले
आते हैं । इसी
प्रकार
प्रमाद से जीव
अनेक योनि
दुःख भोगते
हैं । जब आत्मज्ञान
होता है तब आपदा
से छूट के
शान्तिमान
होते हैं ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
उत्पत्तिविस्तारवर्णनन्नाम
द्वादशस्सर्गः
॥12॥
काल
बोले हे साधो!
ये जितने जगत्
भूतजाति
विस्तार हैं
वे सब आत्मरूप
समुद्र के तरंग
हैं-एक ही
अनेक विचित्र
विस्तार को
प्राप्त हुआ
है । जैसे वसन्त
ऋतु में एक ही रस
अनेक प्रकार
के फल फूलों
को धारता है
इन जीवों में
जिसने मन को
जीतकर
सर्वात्मा ब्रह्म
का दर्शन किया
है वह
जीवन्मुक्त
हुआ है ।
मनुष्य देवता, यक्ष,
किन्नर, गन्धर्वादिक
सब भ्रमते हैं,
इनसे इतर
स्थावर मूढ़
अवस्था में
हैं उनकी क्या
बात करनी है ।
लोकों में तीन
प्रकार के जीव
हैं-एक अज्ञानी
जो महामूढ़ हैं
दूसरे जिज्ञासु
हैं और तीसरे
ज्ञानवान्
।जो मूढ़ है उनको
शास्त्र में
श्रवण और
विचार में कुछ
रुचि नहीं
होती और जो
जिज्ञासु हैं
उनके निमित्त
ज्ञानवानों
ने शास्त्र
रचे हैं जिस
जिस मार्ग से
वे प्रबुध
आत्मा हुए हैं
उस उस प्रकार
के उन्होंने
शास्त्र रचे हैं
और उससे और
जीव भी
मोक्षभागी
होते हैं । हे
मुनीश्वर!
सत्शास्त्र
जो ज्ञान वानों
ने रचे हैं
उनको जब
निष्पाप
पुरुष विचारता
है तब उसको
निर्मल बोध
उपजकर मोह
निवृत्त होता
है और जब
निर्मल
बुद्धि होती
है तब सूर्य के
प्रकाश से तम
नष्ट होता है
तैसे ही सत्शास्त्र
के अभ्यास से
मोह नष्ट होता
है । जो मूढ़
अज्ञानी हैं वे
आत्मा में
प्रमाद और
विषय की
तृष्णा से मोह
को प्राप्त
होते हैं ।
जैसे अँधेरी रात्रि
हो और ऊपर से
कुहिरा भी
गिरता हो तब
तम से तम होता
है तैसे ही
मूढ़ मोह से
मोह को
प्राप्त होते
हैं और अपने
संकल्प से आप
ही दुःखी होते
हैं । जैसे
बालक अपनी
परछाईं में
वैताल कल्पकर
आप ही दुःखी
होता है इससे
जितने भूतजात हैं
उन सबके
सुख-दुःख का
कारण मन रूपी
शरीर है, जैसे
वह फुरता है
तैसीगति को प्राप्त
होता है ।
माँसमय शरीर
का किया कुछ
सफल नहीं होता
और असत् माँस
आदिक का मिला
हुआ जो
आधिभौतिक
शरीर है वह मन
के संकल्प से
रचा है-वास्तव
में कुछ नहीं
। संकल्प की
दृढ़ता से जो
आधिभौतिक
भासने लगा है वह
स्वप्न शरीर
की नाईं है ।
मन रूपी शरीर
से जो तेरे पुत्र
ने किया है
उसी गति को वह
प्राप्त हुआ
है । इसमें
हमारा कुछ अपराध
नहीं है । हे
मुनीश्वर!
अपनी वासना के
अनुसार जैसा
कोई कर्म करता
है तैसे ही फल
को प्राप्त
होता है ।
माँसमय शरीर
से कुछ नहीं
होता ।
जैसी-जैसी
तीव्र भावना
से तेरे पुत्र
का मन फुरता
गया है तैसी-तैसी
गति वह पाता
गया है । बहुत
कहने से क्या है,
उठो अब वहाँ
चलो जहाँ वह
ब्राह्मण का
पुत्र होकर
गंगा के तट पर
तप करने लगा है
। इतना कहकर
वाल्मीकिजी
बोले, हे
भारद्वाज! इस
प्रकार जब काल
भगवान् ने कहा
तब दोनों जगत्
की गति को
हँसके उठ खड़े
हुए और हाथ से
हाथ पकड़के
कहने लगे कि
ईश्वर की नीति
आश्चर्यरूप
है जो जीवों
को बड़े भ्रम दिखाती
है । जैसे
उदयाचल पर्वत
से सूर्य उदय
होकर
आकाशमार्ग
में चलता है
तैसे ही
प्रकाश की
निधि उदार
आत्मा दोनों चले
। इस प्रकार
जब वशिष्ठजी
ने रामजी से
कहा तब सूर्य
अस्त हुआ और
सर्व सभा अपने
अपने स्थानको
गई । दिन हुए
फिर अपने अपने
आसन पर आन
बैठे ।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
भृगुआसनन्नाम
त्रयोदशस्सर्गः
॥13॥
वशिष्ठजी
बोले, हे रामजी!
काल और भृगुजी
दोनों
मन्दराचल
पर्वत से भूमि
पर उतरे और देवताओं
के महासुन्दर
स्थानों को
लाँघते लाँघते
वहाँ गये जहाँ
ब्राह्मण
शरीर से गंगा
के किनारे
शुक्र समाधि
में लगा था
उसका मन रूपी
मृग अचल होकर
विश्राम को प्राप्त
हुआ था । जैसे
चिरकाल का थका
चिरकाल पर्यन्त
विश्राम करता
है तैसे ही
उसने विश्राम
पाया । वह अनेक
जन्मों की
चिन्तना में
भटकता भटकता
अब तप में लगा
था और राग-द्वेष
से रहित होकर
परमानन्दपद
में स्थित था
। उसको देख के
काल ने बड़े
शब्द से कहा, हे भृगो! देख,
यह समाधि
में स्थित है
अब इसे जगाइये
। तब उसकी
कलना फुरने से
और बाहर शब्द से,
जैसे मेघ के
शब्द से मोर जागे
तैसे ही
शुक्रजी जागे
और
अर्धोन्मीलित
नेत्र खोलके
काल और भृगु
को अपने आगे
देखा पर पहिचाना
नहीं । उसने
देखा कि दोनों
के श्याम आकार
और बड़े
प्रकाशरूप
हैं-मानों साक्षात्
विष्णु और
सदाशिवजी हैं
। उन्हें देख
वह उठ खड़ा हुआ
और
प्रीतिपूर्वक
चरण वन्दना और
नम्रतासहित
आदर करके कहा
कि मेरे बड़े
भाग्य हैं जो
प्रभु के चरण
इस स्थान में
आये । वहाँ एक
शिला पड़ी थी
उस पर वे दोनों
बैठ गये तब
वसुदेव नाम
शुक्र, जिसका
तप के संयोग
से पीछे
सातातप नाम
हुआ था उस
शान्त हृदय
तपसी ने अगम
वचन काल और
भृगु से कहे ।
वह बोला, हे
प्रभु! मैं
तुम्हारे
दर्शन से
शान्तिमान्
हुआ हूँ । तुम
सूर्य और
चन्द्रमा
इकट्ठे मेरे
आश्रम में आये
हो और
तुम्हारे आने
से मेरे मन का
मोह नष्ट हो
गया जो
शास्त्रों और
तप से भी
निवृत्त होना
कठिन है । हे
साधो! जैसा
सुख
महापुरुषों
के दर्शन से
होता है वैसा
किसी ऐश्वर्य
और अमृत की
वर्षा से भी नहीं
होता । तुम
ज्ञान के
सूर्य और
चन्द्रमा हो ।
हे ऋषिश्वरों!
तुमने हमारा
स्थान पवित्र
किया और मैं
शान्तात्मा
हुआ । तुम कौन हो
जो प्रकाशरूप,
उदार आत्मा
मेरे स्थान पर
आये हो? जब
इस प्रकार
जन्मान्तर के
पुत्र ने
भृगुजी से
पूछा तब
भृगुजी ने कहा,
हे साधो! तू
आपको स्मरण कर
कि कौन है? अज्ञानी
तो नहीं, तू
तो प्रबोध
आत्मा है । जब
इस प्रकार
भृगुजी ने कहा
तब नेत्र मूँदकर
शुक्र ध्यान
में लगा और एक मुहूर्त्त
में अपना सब
वृत्तान्त
देखके नेत्र
खोले और
विस्मय होकर
कहने लगा कि ईश्वर
की गति
विचित्ररूप
है इसके वश
होकर मैंने
बड़े भ्रम देखे
हैं और जगत् रूपी
चक्र पर आरूढ़
हुआ मैं
अनन्तजन्म
भ्रमा हूँ । उन
सबको स्मरण
करके मैं
आश्चर्यवान् होता
हूँ कि मैंने
बहुत दुःख और
अनेक अवस्थाएँ
भोगी हैं ।
स्वर्ग और
मन्दार, कल्प
वृक्ष, सुमेरु,कैलाश आदिक
वनकुञ्जों
में मैं रहा
और ऐसा कोई
पदार्थ नहीं
जो मैंने नहीं
पाया, ऐसा
कोई कार्य
नहीं जो मैंने
नहीं किया और
ऐसा कोई इष्ट
अनिष्ट
नरक-स्वर्ग
नहीं जो मैंने
नहीं देखा ।
जो कुछ जानने
योग्य है वह क्या
है? अब मैं
आत्मतत्त्व
मैं विश्रामवान्
हुआ हूँ और
संकल्प भ्रम
मेरा नष्ट हो
गया है । अब आप
वहाँ चलिये
जहाँ मन्दराचल
पर्वत पर मेरा
शरीर पड़ा है ।
हे भगवन्! अब
मुझको कुछ
इच्छा नहीं है
। यद्यपि
हेयोपादेय
मुझको कुछ
नहीं रहा
तथापि नीति की
रचना देखके
कहता हूँ । जो
बोध वान् हैं
वह प्रकृत
आचार में
विचरते हैं, आगे जैसी
इच्छा हो तैसे
कीजिये ।
बोधवान् उसी आचार
को अंगीकार
करते हैं ।
इससे अपने
प्रकृत आचार
को ग्रहण करके
व्यवहार में विचरे
।
इति
श्रीयोगवाशिष्ठे
स्थितिप्रकरणे
भार्गवजन्मातरवर्णनन्नाम
चतुर्द्दशस्सर्गः
॥14॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार विचार करके तीनों आकाश मार्ग को चले और शीघ्र ही मेघमण्डल को उल्लंघ के सिद्धों के मार्ग से मन्दराचल पर्वत पर स्वर्ण की कन्दरा में पहुँचे और पूर्व शरीर को देख शुक्र ने कहा, हे तात! मेरे पूर्व शरीर को देखो, जिसे तुमने बहुत पालन किया था । जो शरीर कपूरसुगन्ध से शोभित था और फूलों की शय्या पर शयन करता था, वह अब माटी में लपटा पड़ा है और सूख गया है । जिस शरीर को देख के देव स्त्रियाँ मोहित होती थीं और कण्ठ में मुक्त माला ऐसी शोभित थीं मानों तारों की पंक्ति हैं वह शरीर अब पृथ्वी पर गिर पड़ा है । नन्दन वन में इसने अनेक भोग भोगे हैं और आत्मरूप जान के इसको मैं पुष्ट करता था अब मुझको भयानक भासता है । जो शरीर देवाङ्गनाओं से मिलता और रागवान् होता था वह अब उन की चिन्ता में सूख गया है । जिन जिन विलासों को चाहता था उनको वह करता था और अब वही चित्त से रहित महाअभागी हुआ धूप से सूख गया है और महाविकराल भयानक सा भासता है । जिसको मैं आत्मरूप जानता था, जिसमें अहंकार से विलास करता था और जिसमें फूल कमल पड़ते और तारागण प्रकाशते थे उसमें अब चींटियाँ फिरती हैं । जो शरीर द्रव स्वर्णवत् सुन्दर प्रकाशरूप था वह अब धूप से सूखा भयानक भासता है और सब गुण इसको छोड़ गये हैं- मानों विरक्त आत्मा हुआ और विषय से मुक्त निर्विकल्प समाधि में स्थित हुआ है । हे शरीर! तू अदृष्टि तन को प्राप्त हुआ है, अब तेरे में कोई क्षोभ नहीं रहा । अब चित्तरूपी वैताल तेरे में शान्त हो गया है और आने जाने से रहित विश्रामवान् हुआ है, सब कल्पना तेरी नष्ट हुई है और सुख से सोया है । चित्तरूपी मर्कट से रहित शरीररूपी वृक्ष ठहर गया है और अब अनर्थ से रहित पहाड़ की नाईं अचल हुआ है । यह देह अब सर्वदुःख से रहित परमानन्द में स्थित है । हे साधो! सब अनर्थों का कारण चित्त है । जब तक चित्त शान्तिमान् नहीं होता तब तक जीव को आनन्द नहीं मिलता । जब अमन शक्तिपद को प्राप्त होता है तब महा आधि व्याधि जगत् के दुःखों को तर के विगत परमानन्द को प्राप्त होता है । रामजी ने पूछा, हे भगवन्! सर्व धर्मों के वेत्ताभृगु का जो शुक्र पुत्र था उसने तो अनेक शरीर धरे थे और बहुत भोग भोगे थे तो भृगु से जो शरीर उत्पन्न था तिसको देख बहुत शोच किया और देहों का चिन्तन क्यों न किया? इसका क्या कारण है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! शुक्र की संवेदन कलना जो जीवभाव को प्राप्त हुई थी सो कर्मात्मक होकर भृगु से उपजी । सुनो, आदि परमात्मतत्त्व से चित्तकला फुरकर भूताकाश को प्राप्त हुई और वही वातकला में स्थित होकर प्राण, अपान के मार्ग से भृगु के हृदय में प्रवेश कर गई और वीर्य के स्थान को प्राप्त होकर गर्भमार्ग से उत्पन्न हो क्रम करके बड़ी हुई जिससे विद्या और गुणसम्पन्न शुक्र का शरीर हुआ । उस शरीर को जो उसने चिरकाल सेवन किया था इससे उसका शोचकिया । यद्यपि वह वीतराग और निरिच्छित था तो भी चिरकाल जो अभ्यास किया था वही फुर आया । हे रामजी! ज्ञानी हो अथवा अज्ञानी, व्यवहार दोनों का तुल्