श्रीयोगवाशिष्ठ पञ्चम उपशम प्रकरण

अनुक्रम

श्रीयोगवाशिष्ठ पञ्चम उपशम प्रकरण प्रारम्भ.... 2

पूर्वदिनवर्णन.. 2

उपदेशानुसार वर्णन.. 2

सभास्थानवर्ण.. 2

राघववचन.. 2

प्रथम उपदेश.. 2

क्रमोपदेशवर्णन.. 2

क्रमसूचन.. 2

सिद्धगीतावर्णन.. 2

जनकविचार. 2

जनकनिश्चयवर्णन.. 2

चित्तानुशासन.. 2

प्राज्ञमहिमा वर्णन.. 2

मननिर्वाणवर्णन.. 2

चित्तचैत्यरूपवर्णन.. 2

तृष्णावर्णन.. 2

तृष्णाचिकित्सोपदेशो... 2

तृष्णाउपदेश.. 2

जीवन्मुक्त वर्णन.. 2

पावनबोधवर्णन.. 2

पावनबोध.. 2

तृष्णाचिकित्सोपदेश.. 2

विरोचनवर्णन.. 2

बलिवृत्तान्तविरोचन गाथा.. 2

बल्युपाख्याने चित्तचिकित्सोपदेश.. 2

बलिचिन्तासिद्धान्तोपदेशं.. 2

बुल्युपदेश.. 2

बलिविश्रान्तिवर्णन.. 2

बलिविज्ञान प्राप्ति... 2

बल्युपाख्यानसमाप्ति वर्णन.. 2

हिरण्यकशिपुवध.. 2

प्रह्लादविज्ञान.. 2

विविध व्यतिरेक.. 2

प्रह्लादाष्टकानन्तरनारायणागमन.. 2

प्रह्लादोपदेश.. 2

आत्मलाभचिन्तन.. 2

प्रह्लादोपाख्याने संस्तवन.. 2

दैत्यपुरी प्रभञ्जनवर्णन.. 2

भगवान्‌चितविवेक.. 2

प्रह्लादोपाख्याने नारायणवनोपन्यासयोग.. 2

प्रह्लादबोध.. 2

प्रह्लादाभिषेक.. 2

प्रह्लादव्यवस्थावर्णन.. 2

प्रह्लादविश्रान्तिवर्णन.. 2

गालवोपाख्यानेचाण्डाल.. 2

राजप्रध्वंसवर्णन.. 2

गाधिबोधप्राप्तिवर्णन.. 2

राघवसेवनवर्णन.. 2

उद्दालकविचार. 2

उद्दालक विश्रान्तिवर्णन.. 2

उद्दालकनिर्वाणवर्णन.. 2

ध्यानविचार. 2

भेदनिराशावर्णन.. 2

सुरथवृत्तान्तमाण्डवोपदेश.. 2

सुरथवृत्तान्तवर्णन.. 2

सुरथवृत्तान्तसमाप्ति... 2

सुरथपरघसमागमवर्णन.. 2

समाधिनिश्चयवर्णन.. 2

सुरथपरघनिश्चयवर्णन.. 2

कारणोपदेश.. 2

भासविलासवृत्तान्तवर्णन.. 2

अन्तरप्रसंग.. 2

अन्तरप्रसंग.. 2

अन्तरासंगविचार. 2

संसक्तविचार. 2

शान्तसमाचारयोगोपदेश.. 2

संसक्तचिकित्सा.... 2

संसारयोगोपदेश.. 2

मोक्षस्वरूपोपदेश.. 2

आत्म विचार. 2

नीरास्पदमौनविचार. 2

मुक्तामुक्तविचार. 2

संसारसागरयोगोपदेश.. 2

जीवन्‌मुक्तवर्णन.. 2

जीवन्मुक्तज्ञानबन्ध... 2

सम्यक्‌ज्ञानवर्णन.. 2

चित्तउपशम.. 2

चित्तउपशम.. 2

चित्तशान्तिप्रतिपादन.. 2

चित्तानुशासन.. 2

अनुशासनयोगोपदेश.. 2

चितोपदेश.. 2

वीतवमनोयज्ञवर्णन.. 2

वीतवसमाधियोगोपदेश.. 2

वीतवनिर्वाणयोगोपदेश.. 2

वीतवविश्रान्तिसमाप्ति... 2

सिद्धिलाभविचार. 2

ज्ञानविचार. 2

स्मृतिबीजविचार. 2

देवदूतोक्तमहारामायण मोक्षोपाय.. 2

 

श्रीयोगवाशिष्ठ पञ्चम उपशम प्रकरण प्रारम्भ

पूर्वदिनवर्णन

इतना कहकर वाल्मीकि बोले, हे साधो! अब स्थितिप्रकरण के अनन्तर उपशम प्रकरण कहता हूँ जिसके जानने से निर्वाणता पावोगे । जब वशिष्ठजी ने इस प्रकार वचन कहे तब सब सभा ऐसी शोभित हुई जैसे शरत्‌काल के आकाश में तारागण शोभते हैं । वशिष्ठजी के वचन परमानन्द के कारण हैं । ऐसे पावन वचन सुनके सब मौन हो गये और जैसे कमल की पंक्ति कमल की खानि में स्थित हो तैसे ही सभा के लोग और राजा स्थित हुए । स्त्रियाँ जो झरोखों में बैठी थीं उनके महाविलास की चञ्चलता शान्त हो गई और घड़ियालों के शब्द जो गृह में होते थे वे भी शान्त हो गये । शीश पर चमर करनेवाले भी मूर्तिवत् अचल हो गये और राजा से आदि लेकर जो लोग थे वे कथा के सम्मुख हुए । रामजी बड़े विकास को प्राप्त हुए-जैसे प्रातःकाल में कमल विकासमान होता है और वशिष्ठजी की कही वाणी से राजा दशरथ ऐसा प्रसन्न हुआ जैसे मेघ की वर्षा से मोर प्रसन्न होता है । सबके चञ्चल वानररूपी मन विषय भोग से रहित हो स्थित हुए और मन्त्री भी सुनके स्थित हो रहे और अपने स्वरूप को जानने लगे । जैसे चन्द्रमा की कला प्रकाशती है तैसे ही आत्मकला प्रकाशित हुई और लक्ष्मण ने अपने लक्षस्वरूप को देखके तीव्रबुद्धि से वशिष्ठजी के उपदेश को जाना। शत्रुघ्न जो शत्रुओं को मारनेवाले थे उनका चित्त अति आनन्द से पूर्ण हुआ और जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा स्थित होता है तैसे मन्त्रियों के हृदय में मित्रता हो गई और मन शीतल और हृदय प्रफुल्लित हुआ । जैसे सूर्य के उदय हुए कमल तत्काल विकासमान होता है । और और जो मुनि, राजा और ब्राह्माण स्थित थे उनके रत्नरूपी चित्त स्वच्छ और निर्मल हो गये । जब मध्याह्न काल का समय हुआ और बाजे बजकर उनके ऐसे शब्द हुए जैसे प्रलयकाल में मेघों के शब्द होते हैं और उन बड़े शब्दों से मुनीश्वरों का शब्द आच्छादित हो गया- जैसे मेघ के शब्द से कोकिला का शब्द दब जाता है तब वशिष्ठजी चुप होगये और एक मुहूर्त्तपर्यन्त शब्द होता रहा । जब घनशब्द शान्त हुआ तब मुनीश्वर ने रामजी से कहा, हे रामजी! जो कुछ आज मुझे कहना था वह मैं कह चुका अब कल फिर कहूँगा । यह सुन सर्वसभा के लोग अपने-अपने स्थानों को गये और वशिष्ठजी ने राजा से लेकर रामजी आदि से कहा कि तुम भी अपने-अपने घरों में जावो । सबने चरणवन्दना और नमस्कार किया और जो नभचारी, वनचारी और जलचारी थे उन सबको विदाकर आप भी अपने-अपने स्थानों को गये और ब्राह्मण की सुन्दरवाणी को विचारते और अपने-अपने अधिकार की क्रिया दिन को करते रहे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे पूर्वदिनवर्णनन्नाम प्रथमस्सर्गः ॥1

अनुक्रम

 


उपदेशानुसार वर्णन

इतना कहकर फिर वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज! इस प्रकार अपने अपने स्थानों में सब यथाउचित क्रिया करने लगे । वशिष्ठजी राजा, राघव, मुनि और ब्राह्मणों ने अपने-अपने स्थानों में स्नान आदिक क्रिया की और गौ, सुवर्ण, अन्न, पृथ्वी, वस्त्र, भोजन आदिक ब्राह्मणों को यथायोग्य पात्र दान दिये । सुवर्ण और रत्नों से जड़े स्थानों में आकर राजा ने देवताओं का पूजन किया और कोई विष्णु का और सदाशिव का, कोई अग्नि का और किसी ने सूर्य आदिक का पूजन किया । तदनन्तर पुत्र, पौत्र, सुहृद, मित्र, बान्धव संयुक्त नानाप्रकार के उचित भोजन किये । इतने में दिन का तीसरा पहर आया तब सबने अपने सम्बन्धियों संयुक्त और और क्रिया की और जब साँझ हुई और सूर्य अस्त हुआ तब सायंकाल की विधि की और अघमर्षण गायत्री आदिक का जाप किया और पाठस्त्रोत और मनोहर कथा मुनीश्वरों की कही । फिर रात्रि हुई तब स्त्रियों ने शय्या बिछाई और उन पर वे विराजे पर रामजी बिना सबको रात्रि एक मुहूर्तवत् व्यतीत हुई । रामजी स्थित होकर वशिष्ठजी के वचन की पंक्तियों को विचारने लगे कि जिसका नाम संसार है इसमें भ्रमने का पात्र कौन है, नाना प्रकार के भूतजात कहाँ से आते हैं, कहाँ जाते हैं, मन का स्वरूप क्या है, शान्ति कैसे होती है, यह माया कहाँ से उठी है, और कैसे निवृत्त होती है, निवृत्त हुए विशेषता क्या होती है, नष्ट किसकी होती है, अनन्तरूप जो विस्तृत आत्मा है उसमें अहंकार कैसे होता है, मन के क्षय होने और इन्द्रियों के जीतने में मुनीश्वरों ने क्या कहा है और आत्मा के पाने में क्या युक्ति कही है? जीव, चित्त, मन और माया सब ही एकरूप है, विस्ताररूप संसार इसने रचा है और जैसे ग्राह ने हाथी को बाँधा था और वह कष्ट पाता था तैसे ही असत्‌रूप संसार में बँधकर जो जीव कष्ट पाते हैं उस दुःख के नाश करने के निमित्त कौन औषध है । भोगरूपी मेघमाला में मोहित हुई मेरी बुद्धि मलिन हो गई है, इसको मैं किस प्रकार शुद्ध करूँ । यह तो भोग के साथ तन्मय हो गई है और मुझको भोगों के त्यागने की सामर्थ्य भी नहीं, भोगों के त्यागने के बिना बड़ी आपदा है और उनके संहारने की भी सामर्थ्य नहीं । बड़ा आश्चर्य है और हमको बड़ा कष्ट प्राप्त हुआ है । आत्मपद की प्राप्ति मन के जीतने से होती है और वेदशास्त्र के कहने का प्रयोजन भी यही है । गुरु के वचनों से भ्रम नष्ट हो जाता है-जैसे बालक को पर छाहीं में वैताल भासता है- उस भ्रम को जैसे बुद्धिमान दूर करता है तैसे ही मनरूपी भ्रम को गुरु दूर करते हैं । वह कौन समय होगा कि मैं शान्ति पाऊँगा और संसारभ्रम नष्ट हो जावेगा । जैसे यौवनवान् स्त्री प्रियपति को पाके सुख से विश्राम करती है, तैसे, ही मेरी बुद्धिआत्मा को पाके कब विश्रामवान् होगी । नाना प्रकार के संसार के आरम्भ मेरे कब शान्त होंगे और कब मैं आदि अन्त से रहित पद में विश्रान्तवान् होऊँगा मेरा मन कब पावन होगा और पूर्णमासी के चन्द्रमावत् सम्पूर्ण कला से सम्पन्न होकर स्वच्छ, शीतल और प्रकाशरूप पद में कब स्थित होऊँगा । मैं कब जगत् को देखके हँसूँगा और कब मलीन कलना को त्याग के आत्म पद में स्थित होऊँगा । कब मैं मन को संकल्प विकल्प से रहित शान्त रूप देखूँगा-जैसे तरंग से रहित नदी शान्तरूप दीखती है । तृष्णा रूपी तरंग से व्याकुल जो संसार समुद्र है वह मायाजाल से पूर्ण है और राग द्वेषरूपी मच्छों से संयुक्त है, उसको त्याग के मैं वीतज्वर कब होऊँगा । उस उपशम सिद्धपद को मैं कब पाऊँगा जो बुद्धिमानों ने मूढ़ता को त्याग के पाया है । मैं कब निर्दोष और समदर्शी होऊँगा और अज्ञानरूपी ताप मेरा कब नाश होगा जिससे सम्पूर्ण अंग मेरे तपते हैं । सब धातु क्षोभरूप हो गई हैं और उनसे बड़ा दीर्घज्वर हुआ है इससे कब मेरा चित्त शान्तवान् होगा-जैसे वायु बिना दीपक होता है । कब मैं भ्रम त्याग के प्रकाशवान् हूँगा और कब मैं लीला करके इन्द्रियों के दुःखों को तर जाऊँगा । दुर्गन्धरूप देह से मैं कब न्यारा होऊँगा और अहं’ ‘त्वंआदिक मिथ्याभ्रम का नाश मैं कब देखूँगा । जिस पद के आगे इन्द्रादिकों का सुख ऐश्वर्य मन्दारादिक वृक्षों की सुगन्ध और नाना प्रकार के भोग तृणवत् भासते हैं वह आत्मसुख हमको कब प्राप्त होगा वीतराग मुनीश्वर ने जो हमसे ज्ञान की निर्बल दृष्टि कही है उसको पाके मन विश्राम वान् होता है । संसार तो दुःखरूप है मन तू किस पदार्थ को पाकै विश्रामवान् हुआ है । माता, पिता, पुत्रादिक जो सम्बन्धी है उनका पात्र मैं नहीं हूँ इनका पात्र भोगी होता है । बुद्धि तू मेरी बहन है, तू मेरा ही अर्थ भ्राता की नाईं पूर्ण कर कि तुम हम दोनों दुःख से मुक्त हों । मुनीश्वर के वचनों को विचार के हमारी आपदा नाश होगी, हम भी परमपद को प्राप्त होंगे और तुझको भी शान्ति होगी । हे मेरी बुद्धि! तू ज्यों स्मरण कर कि वशिष्ठजी ने क्या कहा है । प्रथम तो वैराग्य कहा, फिर मोक्षव्यवहार कहा है, फिर उत्पत्ति प्रकरण कहा है कि संसार की उत्पत्ति इस क्रम से हुई है और फिर स्थिति प्रकरण कहा है कि ईश्वर से जगत् की स्थिति है और नाना प्रकार के दृष्टान्तों से उसे निरूपण किया है । निदान जितने प्रकरण कहे हैं वे ज्ञान विज्ञानसंयुक्त हैं । हे बुद्धे! जिस प्रकार वशिष्ठजी ने कहा है तैसे तू स्मरण कर और अनेकबार विचार कर बुद्धि में निश्चय न हो तो वह क्रिया भी निष्फल है । जैसे शरत्‌काल का मेघ बड़ा घन भी दृष्टि आता है परन्तु वर्षा से रहित निष्फल होता है तैसे ही धारणा से रहित विचार किया हुआ निष्फल होता है । जब धारणा कीजिये वह विचार सफल होता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे उपदेशानुसार वर्णनन्नाम द्वितीयस्सर्गः ॥2

अनुक्रम

 


सभास्थानवर्ण

वाल्मीकिजी बोले, हे भारद्वाज! जब इस प्रकार बड़े उदार आत्मा रामजी ने चित्त संयुक्त रात्रि व्यतीत की तो कुछ तम संयुक्त तारागण हुए और दिशा भासने लगीं । प्रातःकाल के नगारे नौबत बजने लगे तब रामजी ऐसे उठे जैसे कमलों की खानि से कमल उठे और भाइयों के साथ प्रातःकाल के सन्ध्यादिक कर्म करके कुछ मनुष्यों से संयुक्त वसिष्ठजी के आश्रम में आये । वशिष्ठजी एकान्त समाधि में स्थित थे उनको दूर से देख रामजी ने नमस्कारसहित चरणवन्दना की और प्रणाम करके हाथ बाँधे खड़े रहे । जब दिशा का तम नष्ट हुआ तब राजा और राजपुत्र , ऋषि, ब्राह्मण जैसे ब्रह्मलोक में देवता आवें तैसे आये । वशिष्ठजी का आश्रम जनों से पूर्ण हो गया और हाथी, घोड़े, रथ, प्यादा चार प्रकार की सेना से स्थान शौभित हुआ । तब तत्काल वशिष्ठजी समाधि से उतरे और सर्व लोगों ने प्रणाम किया । वशिष्ठजी ने उन सबका प्रणाम यथायोग्य ग्रहण किया और विश्वा- -मित्र को संग लेकर सबसे आगे चले । बाहर निकलकर रथ पर आरूढ़ हुए-जैसे पद्म में ब्रह्मा बैठे और दशरथ के गृह को चले । जैसे ब्रह्माजी बड़ी सेना से वेष्टित इन्द्र पुरी को आते हैं तैसे ही वशिष्ठजी बड़ी सेना से वेष्टित दशरथ के गृह आये और जो विस्तृत रमणीय सभा थी उसमें प्रवेश किया जैसे राजहंस कमलों में प्रवेश करे । तब राजा दशरथ ने जो बड़े सिंहासन पर बैठै थै उठकर आगे जा चरणवन्दना की और नम्र होकर चरण चूमे । वशिष्ठजी सबके आगे होकर शोभित हुए और अनेक मुनि, ऋषि और ब्राह्मण आये । दशरथ से लेकर राजा सर्वमन्त्री और बन्दीजन और रामजी से आदि लेकर राजपुत्र, मण्ड- -लेश्वर, जगत् के अधिष्ठाता और मालव आदि सर्व भृत्य और टहलुये आकर यथायोग्य अपने आपमें आसन पर बैठे और सबकी दृष्टि वशिष्ठजी की ओर गई । बन्दीजन जो स्तुति करते थे और सर्वलोक जो शब्द करते थे चुप हो गये निदान सूर्य उदय हुआ । और किरणों ने झुककर झरोखों से प्रवेश किया, कमल खिल आये, पुष्पों से स्थान पूर्ण हो गये और उनकी महासुगन्ध फैली, झरोखों में स्त्रियाँ चञ्चलता त्यागकर मौन हो बैठीं और चमरकरनेवाली मौन होकर शीश पर चमर करने लगीं और सब वशिष्ठजी की महासुन्दर कोमल मधुरवाणी को स्मरणकर आपस में आश्चर्यवान् होने लगे । तब आकाश से राजऋषि, सिद्ध, विद्याधर और मुनि आये और वशिष्ठजी को प्रणाम किया पर गम्भीरता से मुख से न बोले और यथायोग्य आसन पर बैठ गये । पुष्पों की सुगन्धयुक्त वायु चली और अगर चन्दनादि की सभा में बड़ी सुगन्ध फैल गई । भँवरे शब्द करते फिरते थे और कमलों को देखकर प्रसन्न होते थे । रत्न मणि भूषण जो राजा और राजपुत्रों ने पहिने थे उन पर सूर्य की किरणें पड़ने से बड़ा प्रकाश होता था ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सभास्थानवर्णन्नाम तृतीयस्सर्गः ॥3

अनुक्रम

 

राघववचन

वाल्मीकिजी बोले कि उस समय दशरथजी ने वशिष्ठजी से कहा, हे भगवन्! कल के श्रम से आप आश्रित हैं और आपका शरीर गरमी से अति कृश सा हो गया है इस निमित्त विश्राम कीजिये । हे मुनीश्वर! आप जो आनन्दित वचन कहते हैं वे प्रकटरूप हैं और आपके उपदेश रूपी अमृत की वर्षा से हम आनन्दवान् हुए हैं । हमारे हृदय का तम दूर होकर शीतल चित्त हुआ है-जैसे चन्द्रमा की किरणों से तम और तपन दोनों निवृत्त होते हैं तैसे ही आपके बचनों से हम अज्ञानरूपी तम और तपन से रहित हुए हैं । आपके वचन अमृतवत् अपूर्व रस का आनन्द देते हैं और ज्यों ज्यों ग्रहण करिये त्यों-त्यों विशेष रस आनन्द आता है । ये वचन शोकरूपी तप्त को दूर करनेवाले और अमृत की वर्षारूप हैं । आत्मारूपी रत्न को दिखानेवाले परमार्थरूपी दीपक हैं, सन्तजनरूपी वृक्ष की बेलि हैं और दुरिच्छा और दुष्ट आचरण के नाश करनेवाले हैं । जैसे तम को दूर करने और शीतलता करने को शान्तरूप चन्द्रमा है तैसे ही सन्तजनरूपी चन्द्रमा को किरणरूपी वचनों से अज्ञान रूपी तप्त का नाश करते हैं । हे मुनीश्वर! तृष्णा और लोभादिक विकार आपकी वाणी से ऐसे नष्ट हो गये हैं जैसे शरत्काल का पवन मेघ को नष्ट करता है और आपके वचनों से हम निराश हुए हैं । आत्मदर्शन के निमित् हम प्रवर्त्तते हैं । आपने हमको परम अञ्जन दिया है उससे हम सचक्षु हुए हैं और संसाररूपी कुहिरा हमारा निवृत्त हुआ है जैसे कल्पवृक्ष की लता और अमृत का स्नान आनन्द देता है तैसे ही उदारबुद्धि की वाणी आनन्ददायक होती है । इतना कहकर बाल्मीकिजी बोले कि ऐसे वशिष्ठजी से कहकर रामजी की ओर मुख करके दशरथजी ने कहा, हे राघव! जो काल सन्तों की संगति में व्यतीत होता है वही सफल होता है और जो दिन सत्संग बिना व्यतीत होता है वह वृथा जाता है । हे कमलनयन, रामजी! तुम फिर वशिष्ठजी से कुछ पूछो तो वे फिर उपदेश करें-वे हमारा कल्याण चाहते हैं । बाल्मीकिजी बोले कि जब इस प्रकार राजा दशरथ ने कहा तब रामजी की ओर मुख करके उदार आत्मा वशिष्ठ भगवान् बोले कि हे राघव! अपने कुलरूपी आकाश के चन्द्रमा! मैंने जो वचन कहे थे तुमको स्मरण आते हैं उन वाक्यों का अर्थ स्मरण में है और पूर्व और अपर का कुछ विचार किया है? हे महाबोधवान्, महाबाहो! और अज्ञानरूपी शत्रु के नाशकर्ता! सात्त्विक, राजस और तामस गुणों के भेद की उत्पत्ति जो विचित्ररूप है वह मैंने कही है । तुम्हारे चित्त में है सर्व भी वही है, असर्व भी वही है सत्य भी वही है और असत्य भी वही है और सदा शान्त अद्वैतरूप है । परमात्मादेव का विस्तृतरूप स्मरण है । जैसे विश्व ईश्वर से उदय हुआ है वह स्मरण है, यह जो देववाणी है इसका पात्र शुद्ध चित्त है, अशुद्ध नहीं । हे सत्यबुद्धे, रामजी! अविद्या जो विस्तृत रूप भासती है उसका रूप स्मरण है? अर्थ से शून्य, क्षणभंगुररूप, सम्यक् दर्शन से रहित निर्जीव है यह जो लवण के विचार द्वारा मैंने प्रतिपादन किया है वह भली भाँति स्मरण है? और वाक्यों का समूह जो मैंने तुमसे कहा है उनको रात्रि में विचार के हृदय में धारा है? जब पुरुष बारम्बार विचारते हैं और तात्पर्य हृदय में धारते हैं तब बड़ा फल पाते हैं और जो अवज्ञा से अर्थ का विस्मरण करते हैं तो फल नहीं पाते । हे रामजी! तुम तो इन वचनों के पात्र हो जैसे उत्तम बाँस में मोती फलीभूत होते हैं और में नहीं उपजते तैसे ही जो विवेकी उदार आत्मचित्त पुरुष हैं उनके हृदय में ये वचन फलीभूत होते हैं । वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब ब्रह्माजी के पुत्र वशिष्ठजी ने कहा तब महा ओजवान् गम्भीर रामजी अवकाश पाके बोले, हे भगवन्! सब धर्मों के वेत्ता और आपने जो परम उदार वचन कहे हैं उनसे मैं बोधवान् हुआ हूँ और जैसे आप कहते हैं तैसे ही सत्य है, अन्यथा नहीं । हे भगवन्! मैंने समस्त रात्रि आपके वाक्यों के विचार में व्यतीत की है । आप तो हृदय के अज्ञानरूपी तम के नाशकर्ता पृथ्वी पर सूर्यरूप बिचरते हैं । हे भगवन्! आपने जो व्यतीत दिन में आनन्ददायक, प्रकाशरूपी, रमणीय और पवित्र वचन कहे थे, व मैंने सब अपने हृदय में भली प्रकार धरे हैं । जैसे समुद्र से नाना प्रकार के रत्न निकलते हैं तैसे ही आपके वचन कल्याणकर्ता और बोधवान् हैं अर्थात् सबके सहायक और हृदयगम्य आनन्द का कारण हैं । वह कौन है जो आपकी आज्ञा सिर पर न धरे? जो मुमुक्षु जीव हैं वे सब आपकी आज्ञा शीश पर धरते हैं और अपने कल्याण के निमित्त जानते हैं । हे मुनीश्वर! आपके वचनों से मेरे संशय निवृत्त हुए हैं-जैसे शरत्‌काल में मेघ और कुहिरा नष्ट हो जाता है और निर्मल आकाश भासता है । यह संसार आपात रमणीय भासता है, जब तक पदार्थों का विभाग नहीं होता तब तक सुखदायक भासते हैं, और जब विषय इन्द्रियों से दूर होते हैं तब दुःखदायक हो जाते हैं आपके वचन ऐसे हैं कि जिनके आदि में भी यत्न कुछ नहीं सुगम मधुर आरम्भ है, मध्य में सौभाग्य मधुर है अर्थात् कल्याण करता है और पीछे से अनुत्तमपद को प्राप्त करते हैं जिसके समान और कोई पद नहीं । यह आपके पुण्यरूप वचनों का फल है और आपके वचनरूपी पुष्प सदा कमल समान खिले हुए निर्मल आनन्द के देनेवाले हैं और उदित फूल हैं, उनका फल हमको प्राप्त होगा । सब शास्त्रों में जो पुण्यरूपी जल है उसका यह समुद्र है, अब मैं निष्पाप हुआ हूँ मुझको उपदेश करो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे राघववचनन्नाम चतुर्थस्सर्गः ॥4

अनुक्रम

 


प्रथम उपदेश

वशिष्ठजी बोले, हे सुन्दरमूर्ते, रामजी यह सुन्दर सिद्धान्त जो उपशम प्रकरण है उसे सुनो, तुम्हारे कल्याण के निमित्त मैं कहता हूँ । यह संसार महादीर्घ रूप है और जैसे दृढ़थम्भ के आश्रय गृह होता है तैसे ही राजसी जीवों का आश्रय संसार मायारूप है । तुम सरीखे जो सात्त्विक में स्थित हैं वे शूरमे हैं, जो वैराग, विवेक आदिक गुणों से सम्पन्न हैं वे लीला करके यत्न बिना ही संसार माया को त्याग देते हैं औष जो बुद्धि मान् सात्त्विक जागे हुए हैं और जो राजस और सात्त्विक हैं वे भी उत्तम पुरुष हैं । वे पुरुष जगत् के पूर्व अपूर्व को विचारते हैं । जो सन्तजन और सत्‌शास्त्रों का संग करता है उसके आचरणपूर्वक वे बिचरते हैं और उससे ईश्वर परमात्मा के देखने की उन्हें बुद्धि उपजती है और दीपकवत् ज्ञानप्रकाश उपजता है । हे रामजी! जब तक मनुष्य अपने विचार से अपना स्वरूप नहीं पहिचानता तब तक उसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता । जो उत्तम कुल, निष्पाप, सात्त्विक-राजसी जीव हैं उन्हीं को विचार उपजता है और उस विचार से वे अपने आपसे आपको पाते हैं । वे दीर्घदर्शी संसार के जो नाना प्रकार के आरम्भ हैं उनको बिचारते हैं और बिचार द्वारा आत्मपद पाते हैं और परमानन्द सुख में प्राप्त होते हैं । इससे तुम इसी को विचारो कि सत्य क्या है और असत्य क्या है? ऐसे विचार से असत्य का त्याग करो और सत्य का आश्रय करो । जो पदार्थ आदि में न हो और अन्त में भी न रहे उसे मध्य में भी असत्य जानिये । जो आदि, अन्त एकरस है उसको सत्य जानिये और जो आदि अन्त में नाशरूप है उसमें जिसको प्रीति है और उसके राग से जो रञ्जित है वह मूढ़ पशु है, उसको विवेक का रंग नहीं लगता । मन ही उपजता है और मनही बढ़ता है, सम्यक् ज्ञान के उदय हुए मन निर्वाण हो जाता है । मनरूपी संसार है और आत्मसत्ता ज्यों की त्यों है । रामजी ने पूछा हे ब्रह्मन्! जो कुछ आप कहते हैं वह मैंने जाना कि यह संसार मनरूप है और जरा मरण आदिक विकार का पात्र भी मन ही है । उसके तरने का उपाय निश्चय करके कहो । हम सब रघुवंशियों के कुल के अज्ञानरूपी तम को हृदय से दूर करने को आप ज्ञान के सूर्य हैं । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! प्रथम तो जीव को विचारपूर्वक वैराग कहा है कि सन्तजनों का संग और सत्‌शास्त्रों से मन को निर्मल करे । जब मन को निर्मल करेगा तब स्वजनता से सम्पन्न होगा और वैराग्य उपजेगा । जब वैराग प्राप्त होगा तब ज्ञानवान् गुरु के निकट जावेगा और जब वह उपदेश करेंगे तब ध्यान, अर्चनादि के क्रम से परमपद को प्राप्त होगा । जब निर्मल विचार उपजता है तब अपने आपको आपसे देखता है-जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अपने बिम्ब को आपसे देखता है । जब तक विचाररूपी तट का आश्रय नहीं लिया तब तक संसार में तृणवत् भ्रमता है और जब विचार करके ज्यों का त्यों वस्तु-जानता है तब सब दुःख नष्ट हो जाते हैं । जैसे सोमजल के नीचे रेत जा रहती है तैसे ही आधी पीड़ा उसकी निवृत्त हो जाती है फिर उत्पन्न नही होती । जैसे जब तक सुवर्ण और राख मिली हुई है तब तक सोनार संशय में रहता है और जब सुवर्ण और राख भिन्न हो जाती है तब संशय रहित सुवर्ण को प्रत्यक्ष देखता है और तभी निःसंशय होता है, तैसे ही अज्ञान से जीवों को मोह उत्पन्न होता है और देह इन्द्रियों से मिला हुआ संशय में रहता है जब विचार से भिन्न-भिन्न जाने तब मोह नष्ट हो और तभी संशय से रहित शुद्ध अविनाशीरूप आत्मा को देखता है । विचार किये मोह का अवसर नहीं रहता-जैसे अज्ञानी पुरुष चिन्ता मणि की कीमत नहीं जान सकता, जब उसको ज्ञान प्राप्त होता है तब ज्यों का त्यों जानता है और मोह संशय निवृत्त हो जाता है, तैसे ही जीव जब तक आत्मतत्त्व को नहीं जानता तब तक दुःख का भागी होता है और सब ज्यों का त्यों जानता है तब शुद्ध शान्ति को प्राप्त होता है । हे रामजी! आत्मा देह से मिश्रित भासता है पर वास्तव में कुछ मिश्रित नहीं, इससे अपने स्वरूप में शीघ्र ही स्थित हो जावो । निर्मल स्वरूप जो आत्मा है उसको रञ्चकमात्र भी देह से सम्बन्ध नहीं-जैसे सुवर्ण कीच में मिश्रित भासता है तो भी सुवर्ण को कीच का लेप नहीं निर्लेप रहता है तैसे ही जीव को देह से कुछ सम्बन्ध नहीं निर्लेप ही रहता है-आत्मा भिन्न है, देह भिन्न है । जैसे जल और कमल भिन्न रहते हैं । मैं ऊँची भुजा करके पुकारता हूँ, मेरा कहा मूर्ख नहीं मानते कि संकल्प से होना परम कल्याण है । यही भावना हृदय में क्यों नहीं करते? जब तक जड़ धर्मी है अर्थात् विषय भोगों में आस्था करता है और आत्मतत्त्व से शून्य रहता है तब तक मूढ़ रहता है, जबतक स्वरूप का प्रमाद है तबतक हृदय से संसार का तम और किसी प्रकार दूर नहीं होता । चन्द्रमा उदय हो और अग्नि का समूह हो वा द्वादश सूर्य इकट्ठे उदय हो तो भी हृदय का तम किंचित्मात्र भी दूर नहीं होता और जब स्वरूप को जानकर आत्मा में स्थित हो तब हृदय का तम नष्ट हो जावेगा । जैसे सूर्य के उदय हुये जगत् का अन्धकार नष्ट होता है । जब तक आत्मपद का बोध नहीं होता और भोगों में मन तद्रूप है तबतक संसार समुद्र में बहे जावोगे और दुःख का अन्त न आवेगा । जैसे आकाश में धूलि भासती है परन्तु आकाश को धूलि का सम्बन्ध कुछ नहीं और जैसे जल में कमल भासता है परन्तु जल से स्पर्श नहीं करता, सदा निर्लेप रहता है, तैसे ही आत्मा देह से मिश्रित भासता है परन्तु देह से आत्मा का कुछ स्पर्श नहीं, सदा विलक्षण रहता है जैसे सुवर्ण कीच और मल से अलेप रहता है । देह जड़ है आत्मा उससे भिन्न है और सुख दुःख का अभिमान आत्मा में भासता है वह भ्रममात्र असत्यरूप है । जैसे आकाश में दूसरा चन्द्रमा और नीलता असत्यरूप है तैसे ही आत्मा में सुख दुःखादि असत्यरूप हैं । सुख दुःख देह को होता है, सबसे अतीत आत्मा में सुख दुःख का अभाव है । यह अज्ञान करके कल्पित है, देह के नाश हुए आत्मा का नाश नहीं होता, इससे सुख दुःख भी आत्मा में कोई नहीं, सर्वात्मामय शान्तरूप है । यह जो विस्तृत रूप जगत् दृष्टि आता है वह मायामय है, जैसे जल में तरंग और आकाश में आकाश में तरवरे भासते हैं तैसे ही आत्मा में जो जगत् भासता है सो आत्मा ही है, न एक है, न दो है, सब आभास हैं और मिथ्या दृष्टि से आकार भासते हैं । जैसे मणि का प्रकाश मणि से भिन्न नहीं और जैसे अपनी छाया दृष्टि आती है तैसे ही आत्मा का प्रकाशरूप जो जगत् भासता है वह सब ब्रह्मरूप है । मैं और हूँ, यह जगत् और है, इस भ्रम को त्याग करो, विस्तृतरूप ब्रह्मघनसत्ता में और कोई कल्पना नहीं । जैसे जल में तरंग कुछ भिन्न वस्तु नहीं जलरूप ही है; तैसे सर्वरूप आत्मा एक है, उसमें द्वितीय कल्पना कोई नहीं । जैसे अग्नि में बरफ के कणके नहीं होते, तैसे ही ब्रह्म में दूसरी वस्तु कुछ नहीं । इससे अपने स्वरूप की आपही भावना करो कि मैं चिन्मात्ररूप हूँ’ "जगतजाल सब मेरा ही स्वरूप है" और मैं ही विस्तृतरूप हूँजो कुछ है वह देव देवही है, न शोक है, न मोह है, न जन्म है, न देह है । ऐसे जानकर विगतज्वर हो जावो, तुम्हारी स्थिरबुद्धि है और तुम शान्तरूप , श्रेष्ठ, मणिवत निर्मल हो । हे राघव! तुम निर्द्वन्द्व होकर नित्यस्वरूप में स्थित हो जावो और सत्य संकल्प, धैर्य सहित हो, यथा, प्राप्ति में बर्तो । तुम वीतराग, निर्यत्न, निर्मल, वीतकल्मष हो, न देते हो, न लेते हो, ग्रहण त्याग से रहित शान्तरुप हो । विश्व से अतीति जो पद है उसमें प्राप्त होकर जो पाने योग्य पद है उसको पाकर परि पूर्ण समुद्रवत् अक्षोभरूप, सन्ताप से रहित बिचरो । हे रामजी! संकल्पजाल से मुक्त और मायाजाल से रहित अपने आपसे तृप्त और विगतज्वर हो जावो । आत्मवेत्ता का शरीर अनन्त है और तुम भी आदि अन्त से रहित पर्वत के शिखरवत् विगतज्वर हो । हे रामजी! तुम अपने आपसे उदार होकर अपने आप आनन्द से आनन्दी होवो । जैसे समुद्र और पूर्णमासी का चन्द्रमा अपने आनन्द से आनन्दवान् है तैसे ही तुम भी आनन्दवान् हो । यह जो प्रपञ्चरचना भासती है सो असत्य है, जो ज्ञानवान् हैं वे असत्य जानकर इसकी ओर नहीं धावते । तुम तो ज्ञानवान् हो असत्य कल्पना त्याग करके दुःख से रहित हो और नित्य, उदित, शान्तरूप, शुभगुण संयुक्त उपदेश द्वारा चक्रवर्ती होकर पृथ्वी का राज्य करो, प्रजा की पालना कर और समदृष्टि से बिचरो। बाहर से यथाशास्त्र शुभ चेष्टा करो और राज्य की मर्यादा रक्खो पर हृदय से निर्लेप रहना । तुमको त्याग और ग्रहण से कुछ प्रयोजन नहीं और ग्रहण त्याग में समदृष्टि होकर राज्य करो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशम प्रकरणे प्रथम उपदेशोनाम पञ्चमस्सर्गः ॥5

अनुक्रम

 


क्रमोपदेशवर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जिसकी हृदय से वासना नष्ट हुई है वह पुरुष जो कार्यों में बर्तता है तो भी मुक्त है । हमारे मत में बन्धन का कारण वासना है, जिसकी वासना क्षय हुई है वह मुक्तस्वरूप है और जिसकी वासना पदार्थों में सत्य है वह बन्ध में है कोई पुरुष अपने पुरुषार्थ का आश्रय कर कर्तव्य भी करते हैं और प्रीति करके प्रवर्त ते हैं तो वे अपनी वासना से स्वर्ग में जाते हैं और फिर स्वर्ग को त्यागकर दुःख और नरक भोगते हैं । वे अपनी वासना से बँधे हुए पशु आदिक और स्थावर योनि को प्राप्त होते हैं और कोई आत्मवेत्ता पुण्यवान् पुरुष मन की दशा को विचारते हैं और तृष्णा रूपी बन्धनको काटकर निर्मल आत्मपद को प्राप्त होते हैं । जो पुरुष पूर्वजन्मों को भोगकर इस जन्म में मुक्त होते हैं वे राजस-सात्त्विकी होते हैं । जिनका यह जन्म अन्त का होता है वे क्रम करके पूर्ण पद को प्राप्त होते हैं-जैसे शुक्लपक्ष का चन्द्रमा क्रम से पूर्णमासी का होता है और सब कलाओं से पूर्ण होता है । जैसे वर्षा काल में कण्टक वृक्ष की मञ्जरी बढ़ जाती है तैसे ही सौभाग्य और लक्ष्मी उनकी बड़ती जाती है । हे रामजी! जिनका यह जन्म अन्त का होता है उनमें निर्मल गुण जो वेद ने कहे हैं अर्थात् मैत्री, सौम्यता, मुक्तता, ज्ञातव्यता और आर्यता प्रवेश करते हैं । सब जीवों पर दया करनी मैत्री है, हृदय में सदा समताभाव रहना और कोई क्षोभ न उठना मुक्ततता कहाता है, सदा प्रसन्न रहना सौम्यता है, यथा शास्त्र आचार करना आर्यता है और ज्ञान का नाम ज्ञातव्यता है । जैसे राजा के अन्तःपुर में अंगना आ प्रवेश करती हैं तैसे ही जिसको अन्त का यही जन्म है सो राजस-सात्त्विकी है और उसके हृदय में मैत्री आदिक सर्वगुण आ प्रवेश करते हैं । ब्रह्मज्ञानी सब कार्यों को करता है परन्तु उसके हृदयमें लाभ अलाभ राग द्वेष नहीं होता और सर्वदाकाल समभाव रहता है । वह न तोषवान् होता है और न शोकवान् होता है । जैसे सूर्य के उदय हुए तम नष्ट हो जाता है तैसे ही आत्मभाव से राग द्वेष नष्ट हो जाते हैं और सर्वगुण सिद्धता को प्राप्त होते हैं । जैसे शरत्‌काल का आकाश शुद्ध होता है तैसे ही वह कोमल और सुन्दर होता है और उसका मधुर आचार होता है, सब जीव उसके आचार की वाञ्छा करते हैं और उसको देखके मोहित हो जाते हैं । जैसे मेघ की ध्वनि से बगुले आ प्रवेश करते हैं तैसे ही उस पुरुष में सब गुण प्रवेश करते हैं और गुणों से पूर्ण होकर वह गुरु की शरण जाता है । तब वह उसे विवेक का उपदेश करता है और उस विवेक से वह परमपद में स्थित होता है । हे रामजी! जो वैराग्य और विचार से सम्पन्न चित्त है वह आत्मदेव को देखता है उसको दुःख स्पर्श नहीं करता, वह यथार्थ एक आत्मरूप को देखता है । तुम विचार का आश्रय करके मन को जगाओ, जिसमें मनन ही मथन है अर्थात् सदा प्रपञ्च दृश्य का मननभाव करता है जो अन्त का जन्मवान् पुरुष है वह मनरूपी मृग को जगाता है । प्रथम तो साधा रण गुणों से जगाता है फिर बड़े गुणों से जगाता है और फिर जानके सेवन का यत्न करता है । उस विचार से जगत् को आत्मरूप देखता है और आत्मा के प्रकाश (विचार) से अविद्या मल नष्ट हो जाता है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे क्रमोपदेशवर्णनन्नाम षष्ठस्सर्गः ॥6

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क्रमसूचन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! यह तुमसे मैंने क्रम कहा सो वह सब जीवों को समान है इससे जो विशेष है वह तुम सुनो । इस जगत् के आरम्भ में जो देहधारी जीव हैं उन जीवों का आत्मप्रकाश से मोक्ष होता है । एक उत्तम क्रम है और एक समान क्रम है । जो गुरु के निकट जावे और वह उपदेश करे तो उस उपदेश के धारण से शनैः शनैः एक जन्म से अथवा अनेक जन्मों से सिद्धता प्राप्त होती है और दूसरा क्रम यही है जो अपने आपसे वह उत्पन्न होती है अर्थात् समझ लेता है । जैसे वृक्ष से फल गिरे और किसी को आ प्राप्त हो तैसे ही ज्ञान प्राप्त होता है । इसी पर पूर्व का वृतान्त मैं तुमसे कहता हूँ सो तुम सुनो । वह महा पुरुषों का वृत्तान्त है शुभ अशुभ गुणों के समूह जिनके नष्ट हुए हैं और अकस्मात् फल जिनका प्राप्त हुआ है उनका निर्मल क्रम सुनो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे क्रमसूचनानाम सप्तमस्सर्गः ॥7

अनुक्रम

 

 


सिद्धगीतावर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जिसकी सब सम्पदा उदय हुई थी और सब आपदा नष्ट हुई थी, ऐसा एक उदार बुद्धि विदेहनगर का राजा जनक हुआ है । वह बड़ा धैर्यवान् था, अर्थी का अर्थ कल्पवृक्ष की नाईं पूर्ण करे, मित्ररूपी कमलों को सूर्यवत् प्रफुल्लित करे, बान्धवरूपी पुष्पों को वसन्त ऋतुवत् और स्त्रियों को कामदेववत् था । ब्रह्मरूपी चन्द्रमुखी कमल का वह शीतल चन्द्रमा था, दुष्टरूपी तम का नाशकर्त्ता सूर्य था और स्वजनरूपी रत्नों का समुद्र पृथ्वी में मानों विष्णुसूर्य स्थित हुआ था ऐसा राजा जनक अरक समय लीला करके अपने बाग में जिसमें मीठे फल लगे थे और नाना प्रकार के सुन्दर बेलों पर कोकिला शब्द करती थीं इस भाँति गया जैसे नन्दनवन में इन्द्र प्रवेश करे । उस सुन्दर वन में पुष्पों से सुगन्ध फैल रही थी राजा अपने संग के अनुचरों को दूर त्यागकर आप अकेला कुञ्जों में विचरने लगा । वहाँ शाल्मली नामक एक वृक्ष था उसके नीचे राजा ने शब्द सुना कि अदृष्टसिद्ध जो विरक्त चित्त और नित्य पर्वतों में विचरनेवाले हैं आत्मगीता का उच्चारण करते हैं जिससे आत्मबोध प्राप्त होता है । उस गीता को राजा ने सुना कि पहला सिद्ध बोला, यह दृष्टा जो पुरुष है और दृश्य जो जगत् है उस दृष्टा और दृश्य के मिलाप में जो बुद्धि में निश्चित आनन्द होता है और इष्ट के संयोग और अनिष्ट के वियोग का जो आनन्द चित्त में दृढ़ होता है वह आनन्द आत्मतत्त्व से उदय होता है । उस आत्मा की हम उपासना करते हैं । दूसरा सिद्ध बोला कि दृष्टा, दर्शन और दृश्य को वासना सहित त्याग करो । जो दर्शन से प्रथम प्रकाशरूप है और जिसके प्रकाश से यह तीनों प्रकाशते हैं उस आत्मा की हम उपासना करते हैं । तीसरा सिद्ध बोला जो निराभास और निर्मल है,जिसमें मन का अभाव है, अर्थात् अद्वैतरूप है उसकी हम उपासना करते हैं । चौथा सिद्ध बोला कि जो दृष्टा, दृश्य दोनों के मध्य में है और अस्ति नास्ति दोनों पक्षों से रहित प्रकाशरुप सत्ता है और सूर्य आदिक को भी प्रकाशता है उस आत्मा की हम उपासना करते हैं । पञ्चम सिद्ध बोला कि जो ईश्वर सकार और हकार है अर्थात् सकार जिसके आदि में है और हकार जिसके अन्त में है सो अन्त से रहित, आनन्द, अनन्त, शिव, परमात्मा सर्वजीवों के हृदय में स्थित है और निरन्तर जो अहंकार होकर उच्चार होता है उस आत्मा की हम उपासना करते है । छठा सिद्ध बोला कि हृदय में स्थित जो ईश्वर है उसको त्यागकर जो और देव के पाने का यत्न करते हैं वे पुरुष कौस्तुभमणि को त्यागकर और रत्नों की वाञ्छा करते हैं । सातवाँ सिद्ध बोला कि जो सब आशा त्यागता है उसको फल प्राप्त होता है और आशारूपी विष की बेल वह मूल संयुक्त नष्ट हो जाती है अर्थात् जन्म मरण आदिक दुःख नष्ट हो जाते हैं और फिर नहीं उपजते हैं । जो पदार्थों को अत्यन्त विरसरूप जानता है और फिर उनमें आशा बाँधता है वह दुर्बुद्धि गर्दभ है-मनुष्य नहीं । जहाँ जहाँ विषयों की ओर दृष्टि उठती है उनको विवेक से नष्ट करो-जैसे इन्द्र ने वज्र से पर्वतों को नष्ट किया था । जब इस प्रकार शुद्ध आचरण करोगे तब समभाव को प्राप्त होगे और उससे मन उपशम आत्मपद को प्राप्त होकर अक्षय अविनाशी पद पावोगे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे सिद्धगीतावर्णनन्नाम अष्टमस्सर्गः ॥8

अनुक्रम

 

 


जनकविचार

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! महीपति इस प्रकार सिद्धों की गीता सुनकर जैसे संग्राम में कायर विषाद को प्राप्त होता है तैसे ही विषाद को प्राप्त हुआ और सेना संयुक्त अपने गृह में आया । नौकर और सब लोग किनारे खड़े रहे और राजा उनको छोड़कर चौखण्डे पर गया और झरोखे में संसार की चञ्चल गति को इधर उधर देखकर विलाप करने लगा कि बड़ा कष्ट है कि मैं भी संसार में लोगों की चञ्चल दशा से आस्था बाँध रहा हूँ ये तो सब जीव जड़रूप हैं, चैतन्य कोई नहीं, जैसे और जीव पाषाणरूप हैं तैसे ही मैं भी इनमें जड़रूप हो रहा हूँ । काल अन्त से रहित अनन्त है और उसके कुछ अंश में मेरा जीना है-इस जीने में मैं आस्था कर रहा हूँ । मुझको धिक्कार है कि मैं अधम चेतन हूँ । ये मेरे मन्त्री और राज्य और जीना सब क्षणभंगुर हैं । ये जो सुख हैं वे दुःख रूप हैं, इनसे रहित मैं किस प्रकार स्थित होऊँ-जैसे महापुरुष बुद्धिमान् स्थित होते हैं जीवन आदि अन्त में तुच्छरूप हैं और मध्य में पैलवरूप हैं उनमें क्या मिथ्या आस्था बाँधी है-जैसे बालक चित्र के चन्द्रमा को देख चन्द्रमा मानकर आस्था बाँधे । यह प्रपञ्रचना इन्द्रजाल की बाजीवत् है, बड़ा कष्ट है इसमें मैं क्यों मोहित हुआ हूँ! जो वस्तु उचित, रमणीय, उदार और अकृत्रिम है वह इस संसार में रञ्चक भी नहीं, मेरी बुद्धि क्यों नष्ट हुई हुई है । यदि पदार्थ दूर हो और उसके पाने का मेरे मन में यत्न हो तो वह प्राप्त हो ही जावेगा । यह निश्चय करो अथवा अर्थाकार जो संसार के पदार्थ हैं उनकी आस्था मैं त्यागता हूँ । ये लोग सब आगमापायी हैं अर्थात् उदय होते और मिट जाते हैं और जल के तरंगों के दृश्य सब पदार्थ क्षणभंगुर हैं । जितने सुख दृष्टि आते हैं वे दुःख से मिश्रित हैं, उनमें मैने क्या आस्था बाँधी है । सुख कदाचित् दिन, पक्ष, मास, वर्षा दिक में आते हैं और दुःख बारम्बार आते हैं मैं किस सुख से जीने की आस्था बाँधू? जो बड़े बड़े हुए हैं वे सब नष्ट हो गये हैं और स्थिर कोई न रहेगा । मैं बारम्बार विचार कर देखता हूँ इससे मैंने जाना है कि इस जगत् में सत्य पदार्थ कोई नहीं-सब नाश रूप हैं । ऐसा कौन पदार्थ है कि जिसमें आस्था बाधे? जो अब बड़े ऐश्वर्यवान् विराजते हैं सो कुछ दिन पीछे नीचे गिर पड़ेंगे । हे चित्त! बड़ा खेद है तूने किस बढ़ाई में आस्था बाँधी है और मैं किसमें बँधा हुआ कलंकित हुआ हूँ? ऊँचे पद में स्थिर होके भी मैं अधः को गिरा हूँ बड़ा कष्ट है कि मैं आत्मा हूँ और नाश को प्राप्त होता हूँ । किस कारण अकस्मात् मुझको मोह आया है और मेरी बुद्धि को इसने उपहत किया है-जैसे सूर्य के आगे मेघ आता है और सूर्य नहीं भासता तैसे ही मुझे आत्मा नहीं भासता । भोगों से मेरा क्या है और बाँधवों से मेरा क्या है? इनमें मैं क्यों मोहित हुआ हूँ? देह अभिमान से जीव आपही बन्धायमान होता है । देह में अहंकार ही जरा मरणादिक विचारों का कारण होता है, इससे इनसे मेरा क्या प्रयोजन है । इन अर्थों में क्या बड़ाई है और राज्य में मैं क्यों धैर्य करके बैठा हूँ । ये सब पदार्थ क्षोभ के कारण हैं और ये ज्यों के त्यों रहते हैं । इनमें न मुझको ममता है न संग है- ये सर्व असत्यरूप हैं । संसार के सुख विषरूप हैं और इनमें आस्था करनी मिथ्या है, जो बड़े-बड़े ऐश्वर्यवान् और बड़े पराक्रमी गुणवान् हुए हैं वे सब परिवार संयुक्त मर गये हैं तो वर्तमान में क्या धैर्य करना है । कहाँ वह धन और राज और कहाँ उस ब्रह्मा का जगत् । कई पुरुषों की पंक्ति बीत गई है हमको उनसे क्या विश्वास है । देवताओं के नायक अनेक इन्द्र नष्ट हो गये हैं- जैसे जल में बुदबुदे उपजकर नष्ट हो जाते हैं-तो मैं क्या इस संसार में आस्था बाँधकर जीऊँगा । सन्तजन मुझको हँसेगे, कई ब्रह्मा हो गये हैं, कई पर्वत हो गये हैं और कई धूल की कणिकावत् राजा हो गये हैं तो मुझको इस जीने में क्या धैर्य है? संसाररूपी रात्रि में देहरूपी शून्य दृष्टि स्वप्ना है, उस भ्रमरूप में जो मैंने आस्था बाँधी है इससे मुझको धिक्कार है । यह, वह और मैं इत्यादिक भ्रम आत्मा में मिथ्या कल्पना उठी है और अज्ञानियों की नाईं मैं स्थित हुआ हैं । अहंकाररूपी पिशाच करके क्षण क्षण मैं आयु व्यतीत होती है, देखते हुए भी नहीं दीखती काल की सूक्ष्मगति है जो सबको चरण के नीचे धरे है, सदाशिव और विष्णु को जिसने खेलने का गेंद किया है और वह सबको भोजन करता है इससे मुझको जीने में क्या आस्था बाँधनी है? जितने पदार्थ हैं वे निरन्तर नाश होते हैं, कोई दिन में कोई पक्ष में और कोई वर्ष में नष्ट हो जाता है । जो अविनाशी वस्तु है वह अब तक नहीं देखी वर्षों व्यतीत हो गये हैं, जीवों की चित्त रूपी नदी में भोगों की तृष्णारूपी तरंग उछलती है, शान्त कदाचित नहीं होती-जैसे वायु से नदी में तरंग उछलती हैं और सोमता से रहित हो जाते हैं । जिनको चित्त में भोगों की अभिलाषा है उनको अतुच्छपद दृष्टि नहीं आता और वे कष्ट से कष्ट को प्राप्त होते हैं और उन्हें दुःख से दुःखान्तर प्राप्त होता है। अब तक मैं विरक्त नहीं हुआ इससे मुझको धिक्कार है । जिसका अन्तःकरण नीच है उसने जिस जिस वस्तु में कल्याणरूप जान के आस्था बाँधी है वह नष्ट होती दीखती है । यह शरीर अस्थि-माँस से बना है और यदि अन्त संयुक्त इसका आकार है, मध्य में कुछ रमणीय भासता है परन्तु सब अपवित्र पदार्थों से रचा विनाशरूप है, स्पर्श करने के भी योग्य नहीं उससे मुझको क्या प्रयो जन है । जिस जिस पदार्थ से लोग आस्था बाँधते हैं उस उस में मैं दुःख ही देखता हूँ और ये जीव ऐसे जड़ मूढ़ हैं कि सदा इसमें लगे रहते हैं कल यह पदार्थ मुझको प्राप्त होगा, अगले दिन यह मिलेगा । दिन दिन पाप करते और खेद पाते हैं तो भी त्याग नहीं करते बालक अग्नि में पूरी मूढ़ता से विचारते हैं, यौवन अवस्था कामादि विकार से मिश्रित है और शेष जो वृद्धावस्था है उसमें चित्त से दुःखी होता है तो यह जड़ मूर्ख परमार्थ कार्य को किस काल में साधेगा । ये सब जगत् के पदार्थ आगमापायी विरस हैं और विषम दशा से दूषित हैं अर्थात् एक भाव में नहीं रहते । सब जगत् असाररूप है और सत्यबुद्धि से रहित असत्यरूप है, सारपदार्थ इसमें कोई नहीं । जो राजसूय और अश्वमेध आदि यज्ञ करते हैं वे महाकल्पके किसी अंशकाल में स्वर्ग पाते हैं अधिक तो नहीं भोगते? जो अश्वमेध यज्ञ करता है वह इन्द्र होता है पर जो ब्रह्मा का एक दिन होता है उसमें चतुर्दृश इन्द्रराज्य भोगकर नष्ट हो जाते हैं । सहस्त्त चौकड़ी युगों की व्यतीत होती हैं तब ब्रह्माका एक दिन होता है ऐसे तीस दिनों का एक मास और द्वादश मास का एक वर्ष होता है । सौ वर्ष की आयु है उस आयु को भोगकर ब्रह्माजी भी अन्तर्धान हो जाते हैं उसका नाम महाप्रलय है । उस महाप्रलय के अन्त में इसने स्वर्ग भोग किया तो असर सुख की आस्था क्या योग्य है? ऐसा सुख स्वर्ग में कोई नहीं, न पृथ्वी में है और न पाताल में है जो आपदा और दुख से मिश्रित न हो । सब लोक आपदा संयुक्त है और सब दुःखों का मूल चित्त है जो शरीररूपी बाँबी में सर्पवत् रहता और आधिव्याधि बड़े दुःख रूपी विष देता है । यह जब किसी प्रकार निवृत्त हो तब सुखी हो । इससे सब जीव नीच प्रकृति के हो रहे हैं, कोई बिरला साधु है जिसके हृदय में चित्तरूपी सर्वभोगों की तृष्णारूप विषसंयुक्त नहीं होता । ये जगत् के पदार्थ असत्य हैं, जो रमणीय भासता है उसके मस्तक पर अरमणीयता स्थित है और जो सुखरूप है उसके मस्तक पर दुःख स्थित है जिसका मैं आश्रय करूँ वह दुःख से मिश्रित है दुःख तो दुःख से मिश्रित क्या कहिये वह तो आप ही दुःख है और जो सुख सम्पदा हैं सो आपदा दुःख से मिश्रित है, फिर मैं किस का आश्रय करूँ? ये जीव जन्मते और मरते हैं, इन में कोई बिरला दुःख से रहित है । सुन्दर स्त्रियाँ जिनके नील कमलवत् नेत्र हैं और परम हास्य विलास आदिक भूषणों से संयुक्त हैं, इनको देखके मुझको हँसी आती है कि ये तो अस्थि-माँस की पुतली हैं और क्षणमात्र इनकी स्थिति है । जिन पुरुषों के निमेष खोलने से जगत् होता है और उनमेष मूँदने से जगत् का अभाव हो जाता है वे भी नष्ट हुए हैं तो हमारी क्या गिनती है? जो जो पदार्थ बड़े रमणीय भासते हैं वे स्थित रूप हैं उन पदार्थों की चिन्ता और क्या इच्छा करनी है? नाना प्रकार की सम्पदा प्राप्त होती हैं पर इनमें जब कोई चित्त को आ लगता है तब सब सम्पदा आपदारूप हो जाती हैं और जो बड़ी आपदा आ प्राप्त होती है और चित्त में क्षोभ नहीं होता शान्तरूप है तब वे ही आपदा सम्पदारूप है? इससे यही सिद्ध हुआ कि सब मन के फुरनेमात्र है । क्षणभंगुररूप मन की वृत्ति है अकस्मात् जगत् में इसकी स्थिति भई है और अज्ञान से अहं की कल्पना है उसमें त्याग और ग्रहण की भावना मिथ्या है । क्षीणरूप संसार में सुख आदि अन्तसंयुक्त है । जो सुख जानकर जीव इसकी ओर धावता है वह सुख फिर नष्ट हो जाता है-तैसे पतंग दीपशिखा को सुखरूप जानकर उसकी ओर धावता है तो दग्ध हो जाता है तैसे ही संसार के सुख ग्रहण करनेवाले तृष्णा से दग्ध हुए हैं । जैसे नरक की अग्नि दग्ध करती है पर वह भी श्रेष्ठ है परन्तु क्षणभंगुर जो संसार के सुख हैं वे महानीच हैं-नष्ट हुए भी दुःख दे जाते हैं । और दुःखों की सीमा हैं पर जो इस संसारसमुद्र में गिरते हैं वे सुख नहीं पाते । संसार में दुःख स्वाभाविक हैं और दुःख से मिश्रित है । मैं भी अज्ञानी की नाईं काष्ठलोष्ठवत् स्थित हो रहा हूँ और बड़ा खेद है कि अज्ञानीवत् शमादिक सुख को त्याग करके क्षणभंगुर संसार के सुख निमित्त यत्न करता हूँ । जैसे बरफ से अग्नि नहीं उपजती तैसे ही संसार सुख नहीं उप जते, जितने जीव हैं वे जड़ धर्मात्मक हैं संसार रूपी एक वृक्ष है और सहस्त्रों अंकुर, शाखा, पत्र, फल, फूलों से पूर्ण है । उस संसाररूपी वृक्ष का मूल मन है उसके संकल्परूपी जल से विस्तार को प्राप्त हुआ है और संकल्प के उपशम हुए नष्ट हो जाता है । इससे जिस प्रकार यह नष्ट हो वही उपाय मैं करूँगा । संसार में भोग देखनेमात्र सुन्दर भासते हैं और भीतर से दुःखरूप हैं । मन मर्कटवत् चञ्चल रूप है उसने यह रचना रची है । जब तक इसको वास्तव में नहीं जाना तब तक चञ्चल है और जब विचार से जानता है तब पदार्थों की रमणीयता सहित मन का अभाव हो जाता है, इसमें मैं नाशरूप पदार्थों में नहीं रमता । संसार की वृत्ति अनेक फाँसियों से मिश्रित है उसमें गिरके जीव फिर उछलते हैं और शान्त कदाचित नहीं होते । ऐसी संसार की वृत्ति को मैंने चिरकाल पर्यन्त भोगा है अब मैं भोग से रहित होकर ब्रह्म ही होता हूँ । इस संसार में बारम्बार जन्म मरण होता है और शोक ही प्राप्त होता है इसमें अब संसार की वृत्ति से रहित हो शोच से रहित होता हूँ अब मैं प्रबुद्ध और हर्षवान् हुआ हूँ । मैंने अपने चोर आपही देखे हैं । जिनका नाम मन है इसी को मारूँगा । इस मन से मुझको चिरपर्यन्त मारा है इतने काल पर्यन्त मेरा मनरूपी मोती अबेध रहा था अब मैंने इसको बेधा है अर्थात् आत्मविचार से रहित था सो अब उसको आत्मविचार में लगाया है और अब यह आत्मज्ञान के योग्य है । मनरूपी एक बरफ का कण जड़ता को प्राप्त हुआ था अब विवेकरूपी सूर्य से गल गया है और अब मैं अक्षय शान्ति को प्राप्त हुआ हूँ । अनेक प्रकार के वचनों से साधुरूप जो सिद्ध थे उन्होंने मुझको जगाया है और अब मैं आत्मपद को प्राप्त हुआ हूँ । परमानन्द से अब मैं आत्मरूपी चिन्तामणि को पाकर एकान्त सुखी होकर स्थित होऊँगा । जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल होता है तैसे होऊँगा । मन रूपी शत्रु ने मुझको भ्रम दिखाया था वह अब विवेक से नाश किया है और उपशम को प्राप्त हुआ हूँ । हे विवेक! तुझको नमस्कार है ।

 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे जनकविचारो नाम नवमस्सर्गः ॥9

अनुक्रम

 

 


जनकनिश्चयवर्णन

वशिष्ठझी बोले, हे रामजी । इस प्रकार जब राजा चिन्तन करता था तब तक दासी ने राजा के निकट आकर कहा, हे देव! अब उठिये और दिन का उचित विचार अर्थात् स्नानादिक कीजिये । स्नानशाला में पुष्प केसर और गंगाजल आदि के कलशे लेकर स्त्रियाँ खड़ी हैं और कमल पुष्प उनमें पड़े हैं जिन पर भँवरे फिरते हैं, छत्र, चमर पड़े हैं, स्नान का समय है । हे देव! पूजन के निमित्त सब सामग्री आई है और रत्न और औषध ले आये हैं। हाथों में ब्राह्मण स्नान करके और पवित्रे डालकर अघमर्षण जाप कर रहे हैं और आपके आग मन की राह देखते हैं । हाथों में चमर लेकर सुन्दर कान्ता तुम्हारे सेवन के निमित्त खड़ी हैं और भोजन शाला में भोजन सिद्ध हो रहा है इससे शीघ्र उठिये और जो कार्य है वह कीजिये, जैसा काल होता है उसके अनुसार कर्म बड़े पुरुष करते हैं उनका त्याग नहीं करते । इससे काल व्यतीत न कीजिये । हे रामजी! जब इस प्रकार दासी ने कहा तब राजा ने कहा तब राजा ने विचारा कि संसार की जो विचित्र स्थिति है वह कितेक मात्र है राजसुखों से मुझको कुछ प्रयोजन नहीं, यह क्षणभंगुर है, इस सम्पूर्ण मिथ्या आडम्बर को त्यागके मैं एकान्त जा बैठता हूँ जैसे समुद्र तरंगों से रहित शान्तरूप होता है तैसे ही शान्तरूप होऊँगा । यह जो नाना प्रकार के राजभोग और क्रिया कर्म हैं उनमें अब मैं तृप्त हुआ हूँ और सब कर्मों को त्यागकर केवल सुख में स्थित होऊँगा । मेरा चित्त जिन भोगों से चञ्चल था वे भोग तो भ्रमरूप है इनसे शान्ति नहीं होती और तृष्णा बढ़ती जाती है । जैसे जल पर सेवाल बढ़ती जाती है और जल को ढाँप लेती लेती है । अब मैं इसको त्याग करता हूँ । हे चित्त! तू जिस जिस दशा में गिरा है और जो जो भोग भोगे हैं वे सब मिथ्या हैं, तृप्ति तो किसी से न हुई? इससे भ्रमरूप भोगों को जब मैं त्यागूँगा तब मैं परम सुखी होऊँगा बहुत उचित अनुचित भोग बारम्बार भोगे हैं परन्तु तृप्ति कभी न हुई, इससे हे चित्त! इनको त्याग करके परमपद के आश्रय हो जा जैसे बालक एक को त्यागकर दूसरे को अंगीकार करता है तैसे ही यत्न बिना तू भी कर । जब इन तुच्छ भोगों को त्यागेगा और परमपद का आश्रय करेगा तन आनन्दी तृप्ति को प्राप्त होगा और उसको पाकर फिर संसारी न होगा । हे रामजी! इस प्रकार चिन्तन करके जनक तूष्णीम हो रहा और मन की चपलता त्याग करके सोमाकार से स्थित हुआ जैसे-मूर्ति लिखी होती है तैसे ही हो गया और प्रतिहारी भी भयभीत होकर फिर कुछ न कह सकी इसके अनन्तर मन की समता के निमित्त फिर राजा ने चिन्तन किया कि मुझको ग्रहण और त्याग करने योग्य कुछ नहीं है, किसको मैं साधूँ और किस वस्तु में मैं धैर्य धारूँ, सब पदार्थ नाशरूप हैं मुझको करने से क्या प्रयोजन है और न करने से क्या हानि है । जो कुछ कर्तव्य है वह शरीर करता है निर्मल अचलरूप चैतन्य न करता है, न भोगता है । इससे मुझको कर्त्तव्य नहीं । जो त्याग करूँगा तो शरीर करने से रहित होगा और जो करूँगा तो भी शरीर करेगा, मुझको क्या प्रयोजन है? इससे करने और न करने में मुझको लाभ हानि कुछ नहीं जो कुछ प्राप्त हुआ है उसमें बिचरता हूँ अप्राप्त की मैं वाञ्चा नहीं करता और प्राप्त में त्याग नहीं करता अपने स्वरूप में स्थित होकर स्वस्थ होऊँ गा और जो कुछ प्राप्त कर्म है वही करता हूँ, न कुछ मुझको करने में अर्थ है और न करने में दोष है जो क्रिया हो सो हो, करूँ अथवा न करूँ और युक्त हो अथवा अयुक्त हो मुझको ग्रहण त्याग करने योग्य कुछ नहीं । इससे जो कुछ प्राप्त करने योग्य कर्म हैं वे ही करूँगा । कर्म का करना प्राकृत शरीर से होता है, आत्मा को तो कुछ कर्तव्य नहीं, इससे मैं इनमें निस्संग हो रहूँगा । जो निःस्पन्द चेष्टा हो तो क्या सिद्ध हुआ और क्या किया । जो मन कामना से रहित स्थित विगतज्वर हुआ अर्थात् हृदय में राग द्वेष मलीनता न उपजा तो देह से कर्म हो तो भी इष्ट अनिष्ट विषय की प्राप्ति में तुलना रहेगी और जो देह से मिलकर मन कर्म करता है तब कर्त्ता भोक्ता है और इष्ट अनिष्ट की प्राप्ति में राग द्वेषवान् होता है । जब मन का मनन उपशम होता है तब कर्तव्य में भी अकर्तव्य है । जैसा निश्चय हृदय में दृढ़ होता है वह रूप पुरुष का होता है, जिसके हृदय में अहंकृत नहीं है और बाहर कर्म चेष्टा करता है तो भी उसने कुछ नहीं किया और जिसके हृदय में अहंकृत अभिमान है वह बाहर से अकर्त्ता भासता है तो भी अनेक कर्म करता है । इससे जैसा निश्चय हृदय में दृढ़ होता है तैसा ही फल होता है जो बाहर कर्ता है परन्तु हृदय में कर्तव्य का अभिमान नहीं रखता तो वह धैर्यवान् पुरुष अनामय पद को प्राप्त होता है ।

 

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे जनकनिश्चयवर्णनन्नाम दशमस्सर्गः ॥10

अनुक्रम

 

 

 


चित्तानुशासन

वशिष्ठजी बोले , हे राम! इस प्रकार विचारके राजा यथाप्राप्त क्रिया के करने को उठ खड़ा हुआ और जो इष्ट हुआ और जो इष्ट अनिष्ट की वासना थी वह चित्त से त्याग दी । जैसे सुषुप्तिरूप पुरुष होता है तैसे ही वह जाग्रत में हो रहा । निदान दिन को यथा शास्त्र किया करे और रात्रि को लीला करके ध्यान में स्थित हो । मन को समरस कर जब रात्रि क्षीण हुई तब इस प्रकार चित्त को बोध किया कि हे चञ्चलरुप , चित्त! परमा नन्द स्वरूप जो आत्मा है वह क्या तुमको सुखदायक नहीं भासता जो इस मिथ्या संसारसुख की इच्छा करता है । जब तेरी इच्छा शान्त हो जावेगी तब तू सार सुख आत्मपद को प्राप्त होगा ।ज्यों-ज्यों तू संकल्प लीला से उठता है त्यों त्यों संसार जाल विस्तार होता जाता है । इस दुःखरूप संसार से तुझको क्या प्रयोजन है? हे मूर्ख, चित्त! ज्यों- ज्यों संकल्प (इच्छा) करता है त्यों-त्यों संसार का दुःख बढ़ता जाता है । जैसे जल सींचने से वृक्ष की शाखायें बढ़ती हैं तैसे ही संसार के सुखों से परिणाम में अधिक दुःख प्राप्त होता है । ऐसे दुःखरूप भोगों की इच्छा क्यों करता है? यह संसार चित्त जाल से उपजा है, जब तू इसका त्याग करेगा तब दुःख मिट जावेगा । फुरने का नाम दुःख है इसके मिटे से दुःख भी कोई न रहेगा । यह महाचंचल संसार देखने में सुन्दर है वास्तव में कुछ नहीं । जो तुझको इससे कुछ सार प्राप्त हो तो इसका आश्रय कर पर यह तो क्षणभंगुर है और दुःख की खानि है, इसकी आस्था त्याग, आत्मतत्त्व का आश्रय कर और शुद्ध निर्मल होकर जगत् में विचर, तब तुझको दुःख स्पर्श न करेगा । जगत् स्थित हो अथवा शान्त हो इसके उदय अस्त की वासना से इसके गुण-अवगुण में आसक्त मत हो । जो अविद्यमान असत्यरूप हो उसकी आस्था क्या करनी? यह असत्य रूप है और तू सत्यरूप है, असत्य और सत्य का सम्बन्ध कैसे हो? मृतक और जीते का कभी सम्बन्ध हुआ है? जो तू कहे कि चेतनतत्त्व ही दृश्यरूप होता है तो दोनों सत्यस्वरूप हैं और विस्तृत रुप आत्मा ही हुआ तो हर्ष विषाद किसका करता है? इससे तू मूढ़ मत हो, समुद्र की नाईं अक्षोभरूप अपने आपमें स्थित हो और संसार की भावना त्याग करके मान मोह मल को त्याग कर । इसकी इच्छा ही दुःख का कारण है, इसको त्याग करके आत्मतत्त्व में स्थित हो तब पूर्ण पद को प्राप्त होगा । इसलिये बल करके इसका चञ्चलता को त्याग ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे उपशमप्रकरणे चित्तानुशासनन्नाम एकादशस्सर्गः ॥11

अनुक्रम

 

 


प्राज्ञमहिमा वर्णन

वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार विचार करके राजा ने सब काम किये और आनन्दवृति में उसका प्रबोधवान् मन मोह को न प्राप्त हुआ। वह इष्ट में हर्षवान् न हो और अनिष्ट में द्वेषवान् न हो केवल सम और स्वच्छ अपने स्वरूप में स्थित हुआ और जगत् में विच- -रने लगा, न कुछ त्याग करे, न कुछ ग्रहण करे और न कुछ अंगीकार करे, केवल वीत शोक होकर सन्ताप से रहित वर्तमान में कार्य करे और उसके हृदय में कोई कल्पना स्पर्श न करे-जैसे आकाश को धूल की मलीनता स्पर्श नहीं करती । मलीनता से रहित अपने स्वरूप के अनुसंधान और सम्यक् ज्ञान के अनन्त प्रकाश में उसका मन निश्चलता को प्राप्त हुआ, मन की जो संकल्पवृत्ति थी वह नष्ट हो गई और महाप्रकाशरूप चेतन आत्मा अनामय हृदय में प्रकाशित हुआ । जैसे आकाश में सूर्य प्रकाशता है तैसे ही अनन्त आत्मा प्रकट हुआ और सम्पूर्ण पदार्थ उसमें प्रतिबिम्बित देखे । जैसे शुद्ध मणि में प्रतिबिम्ब भासता है तैसे ही उसने सब पदार्थ अपने स्वरूप में आत्मभूत देखे, इन्द्रियों के इष्ट अनिष्ट विषयों की प्रीति में हर्ष खेद मिट गया और सर्वदा समान हो प्रकृत व्यवहार कर के जीवन्मुक्त हो विचरने लगा । हे रामजी! जनक को ज्ञानकी दृढ़ता हुई उससे लोकों के परावर को जानकर उसने विदेहनगर का राज्य किया और जीवों की पालना में हर्ष विषाद को न प्राप्त हुआ । वह संताप से रहित होकर कोई अर्थ उदय हो अथवा अस्त हो जावे परन्तु हर्ष शोक कदाचित् न करे और कार्यकर्त्ता दृष्टि आवे परन्तु हृदय से कुछ न करे । हे रामजी! तैसे ही तुम भी सब कार्य करो परन्तु निरन्तर आत्मस्वरूप में स्थित रहो । तुम जीवन्मुक्त वपु हो । राजा जनक की सब पदार्थ भावना अस्त हो गई थी, उसकी सुषुप्तिवत् वृत्ति हुई थी, भविष्यत् की इच्छा नहीं करता था । और व्यतीत की चिन्तना नहीं करता था जो वर्तमान कार्य प्राप्त हो उसको यथाशास्त्र करे और अपने विचार के वश से उसने पाने योग्य पद पाया और इच्छा कुछ न की । हे रामजी! जीव आत्मपद को तभी तक नहीं प्राप्त होता जब तक हृदय में अपना पुरुषार्थ रूपी विचार नहीं उपजा, जब अपने आपमें अपना विचाररूप पुरुषार्थ जागे तब सब दुःख मिट जावे और परम समता को प्राप्त हो ऐसा पद शास्त्र अर्थ और पुण्य क्रिया से नहीं प्राप्त होता जैसा अपने हृदय में विचार करने से होता है । वह पद निर्मल और स्वच्छ है और हृदय की तपन को निवृत्त करता है । बुद्धि के विचाररूपी प्रकाश से हृदय का अज्ञान नष्ट हो जाता है, और किसी उपाय से नहीं नष्ट होता । जो बड़ा आपदारूप दुःख तरने को कठिन है वह अपनी बुद्धि से तरना सुगम होता है-जैसे जहाज से समुद्र को पार करता है जो बुद्धि से रहित मूर्ख है उसको थोड़ी आपदा भी बड़ा दुःख देती है-जैसे थोड़ा पवन भी तृण को बहुत भ्रमाता है । जो बुद्धिमान है उसको बड़ी आपदा भी दुःख नहीं देती-जैसे बड़ा वायु भी पर्वत को चला सकता । इसी कारण प्रथम चाहिये कि सन्तों का संग और सत्शास्त्रोंका विचार करे और बुद्धि बढ़ावे । जब बुद्धि सत्यमार्गकी ओर बढ़ेगी तब परमबोध प्राप्त होगा -जैसे जल के सींचने और रखने से फूल फल प्राप्त होता है तैसे ही जब बुद्धि सत्यमार्ग की ओर धावती है तब परमानन्द प्राप्त होता । जैसे शुक्लपक्ष का चन्द्रमा पूर्णमासी को बहुत प्रकाशता है, जितने जीव संसार के निमित्त यत्न करते हैं वही यत्न सत्यमार्ग की ओर करें तो दुःख से मुक्त हों और परम संपदा के भण्डार को पावें । संसाररूपी वृक्ष का बीज बुद्धि की मूढ़ता है, इससे मूढ़ता से रहित होना बड़ा लाभ है । स्वर्ग पाताल का राज आदिक जो कुछ पदार्थ प्राप्त होते हैं सो अपने प्रयत्न से मिलते हैं । संसाररूपी समुद्र के तरने को अपनी बुद्धि रुपी जहाज है और तप तीर्थ आदिक शुभआचार से जहाज चलता है । बोधरूपी पुष्पलता के बढ़ाने को दैवीसंपदा जल है उसके बढ़ने से सुन्दर फल प्राप्त होता है । जो बोध से रहित चल ऐश्वर्य से बड़ा भी है उसको तुच्छ अज्ञान नाश कर डालता है-जैसे बल से रहित सिंह को गीदड़ हरिण भी जीत लेते हैं । इससे जो कुछ प्राप्त होता दृष्टि आता है वह अपने प्रयत्न से होता है । अपनी बोधरूपी चिन्तामणि हृदय में स्थित है उससे विवेकरूपी फल मिलता है-जैसे कल्पलता से जो माँगिये वह पाते हैं तैसे ही सब फल बोध से पाते हैं । जैसे जानने वाला केवट समुद्र से पार करता है अजान नहीं उतार सकता तैसे ही सम्यक् बोध संसारसमुद्र से पार करता है और असम्यक बोध जड़ता में डालता है । जो अल्प भी बुद्धि सत्यमार्ग की ओर होती है तो बड़े संकट दूर करती है-जैसे छोटी नाव भी नदी से उतार देती है । हे रामजी! जो पुरुष बोधवान् है उसको संसार के दुःख नहीं बेध सकते- जैसे लोहे आदिक का कवच पहने हो तो उसको बाण बेध नहीं सकते । बुद्धि से मनुष्य सर्वात्मपद को प्राप्त होता है, जिस पद के पाने से हर्ष, विषाद, संपदा, आपदा कोई &#