
प्रातः
स्मरणीय
पूज्यपाद
संत
श्री
आसारामजी
बापू के
सत्संग-प्रवचन
अनन्य
योग
हम धनवान होंगे या नहीं, यशस्वी होंगे या नहीं, चुनाव जीतेंगे या नहीं इसमें शंका हो सकती है परंतु भैया ! हम मरेंगे या नहीं, इसमें कोई शंका है ? विमान उड़ने का समय निश्चित होता है, बस चलने का समय निश्चित होता है, गाड़ी छूटने का समय निश्चित होता है परंतु इस जीवन की गाड़ी छूटने का कोई निश्चित समय है?
आज तक आपने जगत का जो कुछ जाना है, जो कुछ प्राप्त किया है.... आज के बाद जो जानोगे और प्राप्त करोगे, प्यारे भैया ! वह सब मृत्यु के एक ही झटके में छूट जायेगा, जाना अनजाना हो जायेगा, प्राप्ति अप्राप्ति में बदल जायेगी।
अतः सावधान हो जाओ। अन्तर्मुख होकर अपने अविचल आत्मा को, निजस्वरूप के अगाध आनन्द को, शाश्वत शांति को प्राप्त कर लो। फिर तो आप ही अविनाशी आत्मा हो।
जागो.... उठो.... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ। सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा में अथाह सामर्थ्य है। अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके।
सदा स्मरण रहे कि इधर-उधर भटकती वृत्तियों के साथ तुम्हारी शक्ति भी बिखरती रहती है। अतः वृत्तियों को बहकाओ नहीं। तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ और व्यवहार-काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठा में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।
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हजारों-हजारों भक्तजनों, जिज्ञासु साधकों के लिये प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू की जीवन-उद्धारक अमृतवाणी नित्य निरन्तर बहा करती है। हृदय की गहराई से उठने वाली उनकी योगवाणी श्रोताजनों के हृदयों में उतर जाती है, उन्हें ईश्वरीय आह्लाद से मधुर बना देती है। पूज्यश्री की सहज बोल-चाल में तात्त्विक अनुभव, जीवन की मीमांसा, वेदान्त के अनुभूतिमूलक मर्म प्रकट हो जाया करते हैं। उनका पावन दर्शन और सान्निध्य पाकर हजारों-हजारों मनुष्यों के जीवन-उद्यान नवपल्लवित-पुष्पित हो जाते हैं। उनकी अगाध ज्ञानगंगा से कुछ आचमन लेकर प्रस्तुत पुस्तक में संकलित करके आपकी सेवा में उपस्थित करते हुए हम आनन्दित हो रहे हैं.....।
विनीत,
श्री
योग वेदान्त
सेवा समिति
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तर्क्यताम्..... मा कुतर्क्यताम्
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मयि
चानन्ययोगेन
भक्तिरव्यभिचारिणी
।
विवक्तदेशसेवित्वरतिर्जनसंसदि
।।
"मुझ परमेश्वर में अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना (यह ज्ञान है)।"
(भगवद् गीताः १३-१०)
अनन्य भक्ति और अव्यभिचारिणी भक्ति अगर भगवान में हो जाय, तो भगवत्प्राप्ति कठिन नहीं है। भगवान प्राणी मात्र का अपना आपा है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पति के सिवाय अन्य पुरूष में पतिभाव नहीं रखती, ऐसे ही जिसको भगवत्प्राप्ति के सिवाय और कोई सार वस्तु नहीं दिखती, ऐसा जिसका विवेक जाग गया है, उसके लिए भगवत्प्राप्ति सुगम हो जाती है। वास्तव में, भगवत्प्राप्ति ही सार है। माँ आनन्दमयी कहा करती थी - "हरिकथा ही कथा...... बाकी सब जगव्यथा।"
मेरे अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति का होना, एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव होना और जन समुदाय में प्रीति न होना.... इस प्रकार की जिसकी भक्ति होती है, उसे ज्ञान में रूचि होती है। ऐसा साधक अध्यात्मज्ञान में नित्य रमण करता है। तत्त्वज्ञान के अर्थस्वरूप परमात्मा को सब जगह देखता है। इस प्रकार जो है, वह ज्ञान है। इससे जो विपरीत है, वह अज्ञान है।
हरिरस को, हरिज्ञान को, हरिविश्रान्ति को पाये बिना जिसको बाकी सब व्यर्थ व्यथा लगती है, ऐसे साधक की अनन्य भक्ति जगती है। जिसकी अनन्य भक्ति है भगवान में, जिसका अनन्य योग हो गया है उसको जनसंपर्क में रूचि नहीं रहती। सामान्य इच्छाओं को पूर्ण करने में, सामान्य भोग भोगने में जो जीवन नष्ट करते है, ऐसे लोगों में सच्चे भक्त को रूचि नहीं होती। पहले रूचि हुई तब हुई, किन्तु जब अनन्य भक्ति मिली तो फिर उपरामता आ जायेगी। व्यवहार चलाने के लिए लोगों के साथ 'हूँ...हाँ...' कर लेगा, पर भीतर महसूस करेगा कि यह सब जल्दी निपट जाय तो अच्छा।
अनन्य भक्ति जब हृदय में प्रकट होती है, तब पहले का जो कुछ किया होता है वह बेगार-सा लगता है। एकान्त देश में रहने की रूचि होती है। जन-संपर्क से वह दूर भागता है। आश्रम में सत्संग कार्यक्रम, साधना शिविरें आदि को जन-संसर्ग नहीं कहा जा सकता। जो लोग साधन-भजन के विपरीत दिशा में जा रहे हैं, देहाध्यास बढ़ा रहे हैं, उनका संसर्ग साधक के लिए बाधक है। जिससे आत्मज्ञान मिलता है वह जनसंपर्क तो साधन मार्ग का पोषक है। जन-साधारण के बीच साधक रहता है तो देह की याद आती है, देहाध्यास बढ़ता है, देहाभिमान बढ़ता है। देहाभिमान बढ़ने पर साधक परमार्थ तत्त्व से च्युत हो जाता है, परम तत्त्व में शीघ्र गति नहीं कर सकता। जितना देहाभिमान, देहाध्यास गलता है, उतना वह आत्मवैभव को पाता है। यही बात श्रीमद् आद्य शंकराचार्य ने कहीः
गलिते
देहाध्यासे
विज्ञाते
परमात्मनि।
यत्र
यत्र मनो याति
तत्र तत्र
समाधयः।।
जब देहाध्यास गलित हो जाता है, परमात्मा का ज्ञान हो जाता है, तब जहाँ-जहाँ मन जाता है, वहाँ-वहाँ समाधि का अनुभव होता है, समाधि का आनन्द आता है।
देहाध्यास गलाने के लिए ही सारी साधनाएँ हैं। परमात्मा-प्राप्ति के लिये जिसको तड़प होती है, जो अनन्य भाव से भगवान को भजता है, 'परमात्मा से हम परमात्मा ही चाहते हैं.... और कुछ नहीं चाहते.....' ऐसी अव्यभिचारिणी भक्ति जिसके हृदय में है, उसके हृदय में भगवान ज्ञान का प्रकाश भर देते हैं।
जो धन से सुख चाहते हैं, वैभव से सुख चाहते हैं, अथवा परिश्रम करके, साधना करके कुछ पाना चाहते हैं वे लोग साधना और परिश्रम के बल पर रहते हैं लेकिन जो भगवान के बल पर भी भगवान को पाना चाहते हैं, भगवान की कृपा से ही भगवान को पाना चाहते हैं, ऐसे भक्त अनन्य भक्त हैं।
गोरा कुम्हार भगवान का कीर्तन करते थे। कीर्तन करते-करते देहाध्यास भूल गये। मिट्टी रोंदते-रोंदते मिट्टी के साथ बालक भी रोंदा गया। पता नहीं चला। पत्नी की निगाह पड़ी। वह बोल उठीः
"आज के बाद मुझे स्पर्श मत करना।"
"अच्छा ठीक है....।"
भगवान में अनन्य भाव था तो पत्नी नाराज हो गई फिर भी दिल को ठेस नहीं पहुँची। ‘स्पर्श नहीं करना...’ तो नहीं करेंगे। पत्नी को बड़ा पश्चाताप हुआ कि गलती हो गई। अब वंश कैसे चलेगा ? अपने पिता से कहकर अपनी बहन की शादी करवाई। सब विधि सम्पन्न करके जब वर-वधू विदा हो रहे थे, तब पिता ने अपने दामाद गोरा कुम्हार से कहाः
"मेरी पहली बेटी को जैसे रखा है, ऐसे ही इसको भी रखना।"
"हाँ.. जो आज्ञा।"
भगवान से जिसका अनन्य योग है, वह तो स्वीकार ही कर लेगा। गोरा कुम्हार दोनों पत्नियों को समान भाव से देखने लगे। दोनों पत्नियाँ दुःखी होने लगीं। अब इनको कैसे समझाएं? तर्क-वितर्क देकर पति को संसार में लाना चाहती थीं लेकिन गोरा कुम्हार का अनन्य भाव भगवान में जुड़ चुका था।
आखिर दोनों बहनों ने एक रात्रि को अपने पति का हाथ पकड़कर जबरदस्ती अपने शरीर तक लाया। गोरा कुम्हार ने सोचा कि मेरा हाथ अपवित्र हो गया। उन्होंने हाथ को सजा कर दी।
भगवान ने अनन्य भाव होना चाहिए। अनन्य भाव माने : जैसे पतिव्रता स्त्री और किसी पुरूष को पतिभाव से नहीं देखती ऐसे ही भक्त या साधक भी और किसी साधन से अपना कल्याण होगा और किसी व्यक्ति के बल से अपना मोक्ष होगा ऐसा नहीं सोचता । 'हमें तो भगवान की कृपा से भगवान के स्वरूप का ज्ञान होगा तभी हमारा कल्याण होगा। भगवान की कृपा ही एकमात्र सहारा है, इसके अलावा और किसी साधन में हम नहीं रूकेंगे.... हे प्रभु ! हमें तो केवल तेरी कृपा और तेरे स्वरूप की प्राप्ति चाहिए.... और कुछ नहीं चाहिए।' भगवान पर जब ऐसा अनन्य भाव होता है तब भगवान कृपा करके भक्त के अन्तःकरण की पर्तें हटाने लगते हैं।
हमारा अपना आपा कोई गैर नहीं है, दूर नहीं है, पराया नहीं है और भविष्य में मिलेगा ऐसा भी नहीं है। वह अपना राम, अपना आपा अभी है, अपना ही है। इस प्रकार का बोध सुनने की और इस बोध में ठहरने की रूचि हो जायेगी। अनन्य भाव से भगवान का भजन यह परिणाम लाता है।
अनन्य भाव माने अन्य-अन्य को देखे, पर भीतर से समझे कि इन सबका अस्तित्त्व एक भगवान पर ही आधारित है। आँख अन्य को देखती है, कान अन्य को सुनते हैं, जिह्वा अन्य को चखती है, नासिका अन्य को सूँघती है, त्वचा अन्य को स्पर्श करती है। उसके साक्षी दृष्टा मन को जोड़ दो, तो मन एक है। मन के भी अन्य-अन्य विचार हैं। उनमें भी मन का अधिष्ठान, आधारभूत अनन्य चैतन्य आत्मा है। उसी आत्मा परमात्मा को पाना है। न मन की चाल में आना है न इन्द्रियों के आकर्षण में आना है।
इस प्रकार की तरतीव्र जिज्ञासावाला भक्त, अनन्य योग करने वाला साधक हल्की रूचियों और हल्की आसक्तियों वाले लोगों से अपनी तुलना नहीं करता।
चैतन्य महाप्रभु को किसी ने पूछाः "हरि का नाम एक बार लेने से क्या लाभ होता है ?"
"एक बार अनन्य भाव से हरि का नाम ले लेंगे तो सारे पातक नष्ट हो जायेंगे।"
"दूसरी बार लें तो ?"
"दूसरी बार लेंगे तो हरि का आनन्द प्रकट होने लगेगा। नाम लो तो अनन्य भाव से लो। वैसे तो भीखमंगे लोग सारा दिन हरि का नाम लेते हैं, ऐसों की बात नहीं है। अनन्य भाव से केवल एक बार भी हरि का नाम ले लिया जाये तो सारे पातक नष्ट हो जाएँ।
लोग सोचते हैं कि हम भगवान की भक्ति करते हैं फिर भी हमारा बेटा ठीक नहीं होता है। अन्तर्यामी भगवान देख रहे हैं कि यह तो बेटे का भगत है।
'हे भगवान ! मेरे इतने लाख रूपये हो जायें तो उन्हें फिक्स करके आराम से भजन करूँगा.....' अथवा 'मेरा इतना पेन्शन हो जाय, फिर मैं भजन करूँगा...' तो आश्रय फिक्स डिपोजिट का हुआ अथवा पेन्शन का हुआ। भगवान पर तो आश्रित नहीं हुआ। यह अनन्य भक्ति नहीं है। नरसिंह मेहता ने कहा है:
भोंय
सुवाडुं भूखे
मारूँ उपरथी
मारूं मार ।
एटलुं
करतां हरि भजे
तो करी नाखुं
निहाल ।।
जीवन में कुछ असुविधा आ जाती है तो भगवान से प्रार्थना करते हैं- 'यह दुःख दूर को दो प्रभु !' हम भगवान के नहीं सुविधा के भगत हैं। भगवान का उपयोग भी असुविधा हटाने के लिए करते हैं। असुविधा हट गई, सुविधा हो गई तो उसमें लेपायमान हो जाते हैं। सोचते हैं, बाद में भजन करेंगे। यह भगवान की अनन्य भक्ति नहीं है। भगवान की भक्ति अनन्य भाव से की जाय तो तत्त्वज्ञान का दर्शन होने लगे। आत्मज्ञान प्राप्त करने की जिज्ञासा जाग उठे। जन-संसर्ग से विरक्ति होने लगे।
एकान्तवासो
लघुभोजनादि ।
मौनं निराशा
करणावरोधः।।
मुनेरसोः
संयमनं षडेते ।
चित्तप्रसादं
जनयन्ति
शीघ्रम् ।।
'एकान्त में रहना, अल्पाहार, मौन, कोई आशा न रखना, इन्द्रिय-संयम और प्राणायाम, ये छः मुनि को शीघ्र ही चित्तप्रसाद की प्राप्ति कराते हैं।'
एकान्तवास, इन्द्रियों को अल्प आहार, मौन, साधना में तत्परता, आत्मविचार में प्रवृत्ति... इससे कुछ ही दिनों में आत्मप्रसाद की प्राप्ति हो जाती है।
हमारी भक्ति अनन्य नहीं होती, इसलिए समय ज्यादा लग जाता है। कुछ यह कर लूं... कुछ यह देख लूं... कुछ यह पा लूं.... इस प्रकार जीवन-शक्ति बिखर जाती है।
स्वामी रामतीर्थ एक कहानी सुनाया करते थेः
एटलान्टा नामक विदेशी लड़की दौड़ लगाने में बड़ी तेज थी। उसने घोषणा की थी कि जो युवक मुझे दौड़ में हरा देगा, मैं अपनी संपत्ति के साथ उसकी हो जाऊंगी। उसके साथ स्पर्धा में कई युवक उतरे, लेकिन सब हार गये। सब लोग हारकर लौट जाते थे।
एक युवक ने अपने इष्टदेव ज्युपीटर को प्रार्थना की। इष्टदेव ने उसे युक्ति बता दी। दौड़ने का दिन निश्चित किया गया। एटलान्टा बड़ी तेजी से दौड़नेवाली लड़की थी। यह युवक स्वप्न में भी उसकी बराबरी नहीं कर सकता था फिर भी देव ने कुछ युक्ति बता दी थी।
दौड़ का प्रारंभ हुआ। घड़ी भर में एटलान्टा कहीं दूर निकल गई। युवक पीछे रह गया। एटलान्टा कुछ आगे गई तो मार्ग में सुवर्णमुद्राएं बिखरी हुई देखी । सोचा कि युवक पीछे रह गया है। वह आवे, तब तक मुद्राएं बटोर लूं। वह रूकी... मुद्राएं इकट्ठी की। तब तक युवक नजदीक आ गया। वह झट से आगे दौड़ी। उसको पीछे कर दिया। और आगे गई तो मार्ग में और सुवर्णमुद्राएं देखी। वह भी ले ली। उसके पास वजन बढ़ गया। युवक भी तब तक नजदीक आ गया था। फिर लड़की ने तेज दौड़ लगाई। आगे गई तो और सुवर्णमुद्राएँ दिखी। उसने उसे भी ले ली। इस प्रकार एटलान्टा के पास बोझ बढ़ गया। दौड़ की रफ्तार कम हो गई। आखिर वह युवक उससे आगे निकल गया। सारी संपत्ति और रास्ते में बटोरी हुई सुवर्णमुद्राओं के साथ एटलान्टा को उसने जीत लिया।
एटलान्टा तेज दौड़ने वाली लड़की थी पर उसका ध्यान सुवर्णमुद्राओं में अटकता रहा। विजेता होने की योग्यता होते हुए भी अनन्य भाव से नहीं दौड़ पायी, इससे वह हार गई।
ऐसे ही मनुष्य मात्र में परब्रह्म परमात्मा को पाने की योग्यता है। परमात्मा ने मनुष्य को ऐसी बुद्धि इसीलिए दे रखी है कि उसको आत्मा-परमात्मा के ज्ञान की जिज्ञासा जाग जाय, आत्मसाक्षात्कार हो जाय। रोटी कमाने की और बच्चों को पालने की बुद्धि तो पशु-पक्षियों को भी दी है। मनुष्य की बुद्धि सारे पशु-पक्षी-प्राणी जगत से विशेष है ताकि वह बुद्धिदाता का साक्षात्कार कर सके। बुद्धि जहाँ से सत्ता-स्फूर्ति लाती है उस परब्रह्म-परमात्मा का साक्षात्कार करके जीव ब्रह्म हो जाय। केवल कुर्सी-टेबल पर बैठकर कलम चलाने के लिए ही बुद्धि नहीं मिली है। बुद्धिपूर्वक कलम तो भले चलाओ लेकिन बुद्धि का उपयोग केवल रोटी कमाकर पेट भरना ही नहीं है। कलम भी चलाओ तो परमात्मा को रिझाने के लिये और कुदाली चलाओ तो भी उसीको रिझाने के लिए।
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ऐसा कोई मनुष्य नहीं मिलेगा, जिसके पास कुछ भी योग्यता न हो, जो किसी को मानता न हो। हर मनुष्य जरूर किसी न किसी को मानता है। ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिसमें जानने की जिज्ञासा न हो। वह कुछ न कुछ जानने की कोशिश तो करता ही है। करने की, मानने की और जानने की यह स्वतः सिद्ध पूँजी है हम सबके पास। किसी के पास थोड़ी है तो किसी के पास ज्यादा है, लेकिन है जरूर। खाली कोई भी नहीं।
हम लोग जो कुछ करते हैं, अपनी रूचि के अनुसार करते हैं। गलती क्या होती है कि हम आवश्यकता के अनुसार नहीं करते। रूचि के अनुसार मानते हैं, आवश्यकता के अनुसार नहीं मानते हैं। रूचि के अनुसार जानते हैं, आवश्यकता के अनुसार नहीं जानते । बस, यही एक गलती करते हैं। इसे अगर हम सुधार लें तो किसी भी क्षेत्र में आराम से, बिल्कुल मजे से सफल हो सकते हैं। केवल यह एक बात कृपा करके जान लो।
एक होती है रूचि और दूसरी होती है आवश्यकता। शरीर को भोजन करने की आवश्यकता है। वह तन्दुरूस्त कैसे रहेगा, इसकी आवश्यकता समझकर आप भोजन करें तो आपकी बुद्धि शुद्ध रहेगी। रूचि के अनुसार भोजन करेंगे तो बीमारी होगी। अगर रूचि की आसक्ति से बन्धायमान होकर आप भोजन करेंगें तो कभी रुचि के अनुसार भोजन नहीं मिलेगा और यदि भोजन मिलेगा तो रूचि नहीं होगी। जिसको रूचि हो और वस्तु न हो तो कितना दुःख ! वस्तु हो और रूचि न हो तो कितनी व्यर्थता !
खूब ध्यान देना कि हमारे पास जानने की, मानने की और करने की शक्ति है। इसको आवश्यकता के अनुसार लगा दें तो हम आराम से मुक्त हो सकते हैं और रूचि के अनुसार लगा दें तो एक जन्म नहीं, करोड़ों जन्मों में भी काम नहीं बनता। कीट, पतंग, साधारण मनुष्यों में और महापुरूषों में इतना ही फर्क है कि महापुरूष माँग के अनुसार करते हैं और साधारण मनुष्य रूचि के अनुसार करते हैं।
जीवन की माँग है योग। जीवन की माँग है शाश्वत सुख। जीवन की माँग है अखण्डता। जीवन की माँग है पूर्णता।
आप मरना नहीं चाहते, यह जीवन की माँग है। आप अपमान नहीं चाहते। भले सह लेते हैं पर चाहते नहीं। यह जीवन की माँग है। तो अपमान जिसका न हो सके, वह ब्रह्म है। अतः वास्तव में आपको ब्रह्म होने की माँग है। आप मुक्ति चाहते हैं। जो मुक्त स्वरूप है, उसमें अड़चन आती है काम, क्रोध आदि विकारों से।
काम एष
क्रोध एष
रजोगुणसमुदभव: ।
महाशनो
महापाप्मा
विद्धयेनमिह वैरिणम्।।
'रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला अर्थात् भोगों से कभी न अघाने वाला और बड़ा पापी है, इसको ही तू इस विषय में वैरी जान।'
(भगवद् गीताः ३-३७)
काम और क्रोध महाशत्रु हैं और इसमें स्मृतिभ्रम होता है, स्मृतिभ्रम से बुद्धिनाश होता है। बुद्धिनाश से सर्वनाश हो जाता है। अगर रूचि को पोसते हैं तो स्मृति क्षीण होती है। स्मृति क्षीण हुई तो सर्वनाश।
एक लड़के की निगाह पड़ोस की किसी लड़की पर गई और लड़की की निगाह लड़के पर गई। अब उनकी एक दूसरे के प्रति रूचि हुई। विवाह योग्य उम्र है तो माँग भी हुई शादी की। अगर हमने माँग की ओर, कुल शिष्टाचार की ओर ध्यान नहीं दिया और लड़का लड़की को ले भागा अथवा लड़की लड़के को ले भागी तो मुँह दिखाने के काबिल नहीं रहे। किसी होटल में रहे, कभी कहाँ रहे – अखबारों में नाम छपा गया, 'पुलिस पीछे पड़ेगी,' डर लग गया। इस प्रकार रूचि में अन्धे होकर कूदे तो परेशान हुए। अगर विवाह योग्य उम्र हो गई है, गृहस्थ जीवन की माँग है, एक दूसरे का स्वभाव मिलता है तो माँ-बाप से कह दिया और माँ-बाप ने खुशी से समझौता करके दोनों की शादी करा दी। यह हो गई माँग की पूर्ति और वह थी रूचि की पूर्ति। रूचि की पूर्ति में जब अन्धी दौड़ लगती है तो परेशानी होती है, अपनी और अपने रिश्तेदारों की बदनामी होती है। ...तो शादी करने में बुद्धि चाहिए कि रूचि की पूर्ति के साथ माँग की पूर्ति हो।
माँग आसानी से पूरी हो सकती है और रूचि जल्दी पूरी होती नहीं। जब होती है तब निवृत्त नहीं होती, अपितु और गहरी उतरती है अथवा उबान और विषाद में बदलती है। रूचि के अनुसार सदा सब चीजें होंगी नहीं, रूचि के अनुसार सब लोग तुम्हारी बात मानेंगें नहीं। रूचि के अनुसार सदा तुम्हारा शरीर टिकेगा नहीं। अन्त में रूचि बच जायेगी, शरीर चला जायगा। रूचि बच गई तो कामना बच गई। जातीय सुख की कामना, धन की कामना, सत्ता की कामना, सौन्दर्य की कामना, वाहवाही की कामना, इन कामनाओं से सम्मोह होता है। सम्मोह से बुद्धिभ्रम होता है, बुद्धिभ्रम से विनाश होता है।
करने की, मानने की और जानने की शक्ति को अगर रूचि के अनुसार लगाते हैं तो करने का अंत नहीं होगा, मानने का अंत नहीं होगा, जानने का अंत नहीं होगा। इन तीनों योग्यताओं को आप अगर यथा योग्य जगह पर लगा देंगे तो आपका जीवन सफल हो जायगा।
अतः यह बात सिद्ध है कि आवश्यकता पूरी करने में शास्त्र, गुरू, समाज और भगवान आपका सहयोग करेंगे। आपकी आवश्यकता पूरी करने में प्रकृति भी सहयोग देती है। बेटा माँ की गोद में आता है, उसकी आवश्यकता होती है दूध की। प्रकृति सहयोग देकर दूध तैयार कर देती है। बेटा बड़ा होता है और उसकी आवश्यकता होती है दाँतों की तो दाँत आ जाते हैं।
मनुष्य की आवश्यकता है हवा की, जल की, अन्न की। यह आवश्यकता आसानी से यथायोग्य पूरी हो जाती है। आपको अगर रूचि है शराब की, अगर उस रूचि पूर्ति में लगे तो वह जीवन का विनाश करती है। शरीर के लिए शराब की आवश्यकता नहीं है। रूचि की पूर्ति कष्टसाध्य है और आवश्यकता की पूर्ति सहजसाध्य है।
आपके पास जो करने की शक्ति है, उसे रूचि के अनुसार न लगाकर समाज के लिए लगा दो। अर्थात् तन को, मन को, धन को, अन्न को, अथवा कुछ भी करने की शक्ति को 'बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय' में लगा दो।
आपको होगा कि अगर हम अपना जो कुछ है, वह समाज के लिए लगा दें तो फिर हमारी आवश्यकताएँ कैसे पूरी होंगी?
आप समाज के काम में आओगे तो आपकी सेवा में सारा समाज तत्पर रहेगा। एक मोटरसाइकल काम में आती है तो उसको संभालने वाले होते हैं कि नहीं ? घोड़ा गधा काम में आता है तो उसको भी खिलाने वाले होते हैं। आप तो मनुष्य हो। आप अगर लोगों के काम आओगे तो हजार-हजार लोग आपकी आवश्यकता पूरी करने के लिए लालायित हो जायेंगे। आप जितना-जितना अपनी रूचि को छोड़ोगे, उतनी उतनी उन्नति करते जाओगे।
जो लोग रूचि के अनुसार सेवा करना चाहते हैं, उनके जीवन मे बरकत नहीं आती। किन्तु जो आवश्यकता के अनुसार सेवा करते हैं, उनकी सेवा रूचि मिटाकर योग बन जाती है। पतिव्रता स्त्री जंगल में नहीं जाती, गुफा में नहीं बैठती। वह अपनी रूचि पति की सेवा में लगा देती है। उसकी अपनी रूचि बचती ही नहीं है। अतः उसका चित्त स्वयमेव योग में आ जाता है। वह जो बोलती है, ऐसा प्रकृति करने लगती है।
तोटकाचार्य, पूरणपोडा, सलूका-मलूका, बाला-मरदाना जैसे सत् शिष्यों ने गुरू की सेवा में, गुरू की दैवी कार्यों में अपने करने की, मानने की और जानने की शक्ति लगा दी तो उनको सहज में मुक्तिफल मिल गया। गुरूओं को भी ऐसा सहज में नहीं मिला था जैसा इन शिष्यों को मिल गया। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य को गुरूप्राप्ति के लिए कितना कितना परिश्रम करना पड़ा ! कहाँ से पैदल यात्रा करनी पड़ी ! ज्ञानप्राप्ति के लिए भी कैसी-कैसी साधनाएँ करनी पड़ी ! जबकि उनके शिष्य तोटकाचार्य ने तो केवल अपने गुरूदेव के बर्तन माँजते-माँजते ही प्राप्तव्य पा लिया।
अपनी करने की शक्ति को स्वार्थ में नहीं अपितु परहित में लगाओ तो करना तुम्हारा योग हो जायेगा। मानने की शक्ति है तो विश्वनियंता को मानो। वह परम सुहृद है और सर्वत्र है, अपना आपा भी है और प्राणी मात्र का आधार भी है। जो लोग अपने को अनाथ मानते हैं, वे परमात्मा का अनादर करते हैं। जो बहन अपने को विधवा मानती है, वह परमात्मा का अनादर करती है। अरे ! जगतपति परमात्मा विद्यमान होते हुए तू विधवा कैसे हो सकती है ? विश्व का नाथ साथ में होते हुए तुम अनाथ कैसे हो सकते हो ? अगर तुम अपने को अनाथ, असहाय, विधवा इत्यादि मानते हो तो तुमने अपने मानने की शक्ति का दुरूपयोग किया। विश्वपति सदा मौजूद है और तुम आँसू बहाते हो ?
"मेरे पिता जी स्वर्गवास हो गये.... मैं अनाथ हो गया.........।"
"गुरुजी आप चले जायेंगे... हम अनाथ हो जाएँगे....।"
नहीं नहीं....। तू वीर पिता का पुत्र है। निर्भय गुरू का चेला है। तू तो वीरता से कह दे कि, 'आप आराम से अपनी यात्रा करो। हम आपकी उत्तरक्रिया करेंगे और आपके आदर्शों को, आपके विचारों को समाज की सेवा में लगाएँगे ताकि आपकी सेवा हो जाय।' यह सुपुत्र और सत् शिष्य का कर्त्तव्य होता है। अपने स्वार्थ के लिये रोना, यह न पत्नी के लिए ठीक है न पति के लिए ठीक है, न पुत्र के लिए ठीक है न शिष्य के लिए ठीक है और न मित्र के लिए ठीक है।
पैगंबर मुहम्मद परमात्मा को अपना दोस्त मानते थे, जीसस परमात्मा को अपना पिता मानते थे और मीरा परमात्मा को अपना पति मानती थी। परमात्मा को चाहे पति मानो चाहे दोस्त मानो, चाहे पिता मानो चाहे बेटा मानो, वह है मौजूद और तुम बोलते हो कि मेरे पास बेटा नहीं है.... मेरी गोद खाली है। तो तुम ईश्वर का अनादर करते हो। तुम्हारी हृदय की गोद में परमात्मा बैठा है, तुम्हारी इन्द्रियों की गोद में परमात्मा में बैठा है।
तुम मानते तो हो लेकिन अपनी रूचि के अनुसार मानते हो, इसलिए रोते रहते हो। माँग के अनुसार मानते हो तो आराम पाते हो। महिला आँसू बहा रही है कि रूचि के अनुसार बेटा अपने पास नहीं रहा। उसकी जहाँ आवश्यकता थी, परमात्मा ने उसको वहाँ रख लिया क्योंकि उसकी सृष्टि केवल उस महिला की गोद या उसका घर ही नहीं है। सारी सृष्टि, सारा ब्रह्माण्ड उस परमात्मा की गोद में है। तो वह बेटा कहीं भी हो, वह परमात्मा की गोद में ही है। अगर हम रूचि के अनुसार मन को बहने देते हैं तो दुःख बना रहता है।
रूचि के अनुसार तुम करते रहोगे तो समय बीत जायगा, रूचि नहीं मिटेगी। यह रूचि है कि जरा-सा पा लें..... जरा सा भोग लें तो रूचि पूरी हो जाय। किन्तु ऐसा नहीं है। भोगने से रूचि गहरी उतर जायगी। जगत का ऐसा कोई पदार्थ नहीं जो रूचिकर हो और मिलता भी रहे। या तो पदार्थ नष्ट हो जाएगा या उससे उबान आ जाएगी।
रूचि को पोसना नहीं है, निवृत्त करना है। रूचि निवृत्त हो गई तो काम बन गया, फिर ईश्वर दूर नहीं रहेगा। हम गलती यह करते हैं कि रूचि के अनुसार सब करते रहते हैं। पाँच-दस व्यक्ति ही नहीं, पूरा समाज इसी ढाँचे में चल रहा है। अपनी आवश्यकता को ठीक से समझते नहीं और रूचि पूरी करने में लगे रहते हैं। ईश्वर तो अपना आपा है, अपना स्वरूप है। वशिष्ठजी महाराज कहते हैं-
"हे रामजी ! फूल, पत्ते और टहनी तोड़ने में तो परिश्रम है, किन्तु अपने आत्मा-परमात्मा को जानने में क्या परिश्रम है ? जो अविचार से चलते हैं, उनके लिए संसार सागर तरना महा कठिन है, अगम्य है। तुम सरीखे जो बुद्धिमान हैं उनके लिए संसार सागर गोपद की तरह तरना आसान है। शिष्य में जो सदगुण होने चाहिए वे तुम में हैं और गुरू में जो सामर्थ्य होना चाहिए वह हममें है। अब थोड़ा सा विचार करो, तुरन्त बेड़ा पार हो जायगा।"
हमारी आवश्यकता है योग की और जीते हैं रूचि के अनुसार। कोई हमारी बात नहीं मानता तो हम गर्म हो जाते हैं, लड़ने-झगड़ने लगते हैं। हमारी रूचि है अहं पोसने की और आवश्यकता है अहं को विसर्जित करने की। रूचि है अनुशासन करने की, कुछ विशेष हुक्म चलाने की और आवश्यकता है सबमें छुपे हुए विशेष को पाने की।
आप अपनी आवश्यकताएँ पूरी करो, रूचि को पूरी मत करो। जब आवश्यकताएँ पूरी करने में लगेंगे तो रूचि मिटने लगेगी। रूचि मिट जायगी तो शहंशाह हो जाओगे। आपमें करने की, मानने की, जानने की शक्ति है। रूचि के अनुसार उसका उपयोग करते हो तो सत्यानाश होता है। आवश्यकता के अनुसार उसका उपयोग करोगे तो बेड़ा पार होगा।
आवश्यकता है अपने को जानने की और रूचि है लंदन, न्यूयार्क, मास्को में क्या हुआ, यह जानने की।
'इसने क्या किया... उसने क्या किया.... फलाने की बारात में कितने लोग थे.... उसकी बहू कैसी आयी....' यह सब जानने की आवश्यकता नहीं है। यह तुम्हारी रूचि है। अगर रूचि के अनुसार मन को भटकाते रहोगे तो मन जीवित रहेगा और आवश्यकता के अनुसार मन का उपयोग करोगे तो मन अमनीभाव को प्राप्त होगा। उसके संकल्प-विकल्प कम होंगे। बुद्धि को परिश्रम कम होगा तो वह मेधावी होगी। रूचि है आलस्य में और आवश्यकता है स्फूर्ति की। रूचि है थोड़ा करके ज्यादा लाभ लेने में और आवश्यकता है ज्यादा करके कुछ भी न लेने की। जो भी मिलेगा वह नाशवान होगा, कुछ भी नहीं लोगे तो अपना आपा प्रकट हो जायगा।
कुछ पाने की, कुछ भोगने की जो रूचि है, वही हमें सर्वेश्वर की प्राप्ति से वंचित कर देती है। आवश्यकता है 'नेकी कर कुएँ में फेंक'। लेकिन रूचि होती है, 'नेकी थोड़ी करूँ और चमकूँ ज्यादा। बदी बहुत करूँ और छुपाकर रखूँ।' इसीलिए रास्ता कठिन हो गया है। वास्तव में ईश्वर-प्राप्ति का रास्ता रास्ता ही नहीं है, क्योंकि रास्ता तब होता है जब कोई चीज वहाँ और हम यहाँ। दोनों के बीच में दूरी हो। हकीकत में ईश्वर ऐसा नहीं है कि हम यहाँ हों और ईश्वर कहीं दूर हो। आपके और ईश्वर के बीच एक इंच का भी फासला नहीं, एक बाल जितना भी अंतर नहीं लेकिन अभागी रूचि ने आपको और ईश्वर को पराया कर दिया है। जो पराया संसार है, मिटने वाला शरीर है, उसको अपना महसूस कराया। यह शरीर पराया है, आपका नहीं है। पराया शरीर अपना लगता है। मकान है ईंट-चूने-लक्कड़-पत्थर का और पराया है लेकिन रूचि कहती है कि मकान मेरा है।
स्वामी रामतीर्थ कहते हैं-
"हे मूर्ख मनुष्यों ! अपना धन, बल व शक्ति बड़े-बड़े भवन बनाने में मत खर्चो, रूचि की पूर्ति में मत खर्चो। अपनी आवश्यकता के अनुसार सीधा सादा निवास स्थान बनाओ और बाकी का अमूल्य समय जो आपकी असली आवश्यकता है योग की, उसमें लगाओ। ढेर सारी डिजाइनों के वस्त्रों की कतारें अपनी अलमारी में मत रखो लेकिन तुम्हारे दिल की अलमारी में आने का समय बचा लो। जितनी आवश्यकता हो उतने ही वस्त्र रखो, बाकी का समय योग में लग जायेगा। योग ही तुम्हारी आवश्यकता है। विश्रान्ति तुम्हारी आवश्यकता है। अपने आपको जानना तुम्हारी आवश्यकता है। जगत की सेवा करना तुम्हारी आवश्यकता है क्योंकि जगत से शरीर बना है तो जगत के लिए करोगे तो तुम्हारी आवश्यकता अपने आप पूरी हो जायगी।
ईश्वर को आवश्यकता है तुम्हारे प्यार की, जगत को आवश्यकता है तुम्हारी सेवा की और तुम्हें आवश्यकता है अपने आपको जानने की।
शरीर को जगत की सेवा में लगा दो, दिल में परमात्मा का प्यार भर दो और बुद्धि को अपना स्वरूप जानने में लगा दो। आपका बेड़ा पार हो जायगा। यह सीधा गणित है।
मानना, करना और जानना रूचि के अनुसार नहीं बल्कि, आवश्यकता के अनुसार ही हो जाना चाहिए। आवश्यकता पूरी करने में नहीं कोई पाप, नहीं कोई दोष। रूचि पूरी करने में तो हमें कई हथकंडे अपनाने पड़ते हैं। जीवन खप जाता है किन्तु रूचि खत्म नहीं होती, बदलती रहती है। रूचिकर पदार्थ आप भोगते रहें तो भोगने का सामर्थ्य कम हो जायगा और रूचि रह जायगी। देखने की शक्ति खत्म हो जाय और देखने की इच्छा बनी रहे तो कितना दुःख होगा ! सुनने की शक्ति खत्म हो जाय और सुनने की इच्छा बनी रहे तो कितना दुर्भाग्य ! जीने की शक्ति क्षीण हो जाय और जीने की रूचि बनी रहे तो कितना दुःख होगा ! इसलिए मरते समय दुःख होता है। जिनकी रूचि नहीं होती उन आत्मरामी पुरूषों को क्या दुःख ? श्रीकृष्ण को देखते-देखते भीष्म पितामह ने प्राण ऊपर चढ़ा दिये। उन्हें मरने का कोई दुःख नहीं।
सूँघने की रूचि बनी रहे और नाक काम न करे तो ? यात्रा की रूचि बनी रहे और पैर जवाब दे दें तो ? पैसों की रूचि बनी रहे और पैसे न हों तो कितना दुःख ? वाहवाही की रूचि है और वाहवाही न मिली तो ?
अगर रूचि के अनुसार वाहवाही मिल भी जाय तो क्या रूचि पूरी हो जायगी ? नहीं, और ज्यादा वाहवाही की इच्छा होगी। हम जानते ही हैं कि जिसकी वाहवाही होती है उसकी निन्दा भी होती है। अतः वाहवाही से रूचिपूर्ति का सुख मिलता है तो निन्दा से उतना ही दुःख होगा। और इतने ही निन्दा करने वालों के प्रति अन्यायकारी विचार उठेंगे। अन्यायकारी विचार जिस हृदय में उठेंगे, उसी हृदय को पहले खराब करेंगे। अतः हम अपना ही नुकसान करेंगे।
एक होता है अनुशासन, दूसरा होता है क्रोध। जिन्हें अपने सुख की कोई रूचि नहीं, जो सुख देना चाहते हैं, जिन्हें अपने भोग की कोई इच्छा नहीं है, उनकी आवश्यकता सहज में पूरी होती है। जो दूसरों की आवश्यकता पूरी करने में लगे हैं, वे अगर डाँटते भी हैं तो वह अनुशासन हो जाता है। जो रूचिपूर्ति के लिए डाँटते हैं वह क्रोध हो जाता है। आवश्यकतापूर्ति के लिए अगर पिटाई भी कर दी जाय तो भी प्रसाद बन जाता है।
माँ को आवश्यकता है बेटे को दवाई पिलाने की तो माँ थप्पड़ भी मारती है, झूठ भी बोलती है, गाली भी देती है फिर भी उसे कोई पाप नहीं लगता। दूसरा कोई आदमी अपनी रूचि पूर्ति के लिए ऐसा ही व्यवहार उसके बेटे से करे तो देखो, माँ या दूसरे लोग भी उसकी कैसी खबर ले लेते हैं ! किसी की आवश्यकतापूर्ति के लिए किया हुआ क्रोध भी अनुशासन बन जाता है। रूचि पूर्ति के लिए किया हुआ क्रोध कई मुसीबतें खड़ी कर देता है।
एक विनोदी बात है। किसी जाट ने एक सूदखोर बनिये से सौ रूपये उधार लिये थे। काफी समय बीत जाने पर भी जब उसने पैसे नहीं लौटाये तो बनिया अकुलाकर उसके पास वसूली के लिए गया।
"भाई ! तू ब्याज मत दे, मूल रकम सौ रूपये तो दे दे। कितना समय हो गया ?"
जाट घुर्राकर बोलाः "तुम मुझे जानते हो न ? मैं कौन हूँ?"
"इसीलिए तो कहता हूँ कि ब्याज मत दो। केवल सौ रूपये दे दो।"
"सौ-वौ नहीं मिलेंगे। मेरा कहना मानो तो कुछ मिलेगा।"
बनिये ने सोचा कि खाली हाथ लौटने से बेहतर है, जो कुछ मिले वही ले लूँ।
अच्छा, तो तू जितना चाहे उतना दे दे ।
जाट ने कहाः "देखो, मगर आपको पैसे लेने हो तो मेरी इतनी सी बात मानो। आपके सौ रूपयें हैं ?"
"हाँ"।
"तो सौ के कर दो साठ।"
"ठीक है, साठ दे दो।"
"ठहरो, मुझे बात पूरी कर लेने दो। सौ के कर दो साठ.... आधा कर दो काट.. दस देंगे... दस छुड़ायेंगे और दस के जोड़ेंगे हाथ। अभी दुकान पर पहुँच जाओ।"
मिला क्या ? बनिया खाली हाथ लौट गया।
ऐसे ही मन की जो इच्छाएँ होती हैं, उसको कहेंगे कि भाई ! इच्छाएँ पूरी करेंगे लेकिन अभी तो सौ की साठ कर दे, और उसमें से आधा काट कर दे। दस इच्छाएँ तेरी पूरी करेंगे धर्मानुसार आवश्यकता के अनुसार। दस इच्छाओं की तो कोई आवश्यकता ही नहीं है और शेष दस से जोड़ेंगे हाथ। अभी तो भजन में लगेंगे, औरों की आवश्यकता पूरी करने में लगेंगे।
जो दूसरों की आवश्यकता पूरी करने में लगता है, उसकी रूचि अपने आप मिटती है और आवश्यकता पूरी होने लगती है। आपको पता है कि जब सेठ का नौकर सेठ की आवश्यकताएँ पूरी करने लगता है तो उसके रहने की आवश्यकता की पूर्ति सेठ के घर में हो जाती है। उसकी अन्न-वस्त्रादि की आवश्यकताएँ पूरी होने लगती हैं। ड्रायवर अपने मालिक की आवश्यकता पूरी करता है तो उसकी घर चलाने की आवश्यकतापूर्ति मालिक करता ही है। फिर वह आवश्यकता बढ़ा दे और विलासी जीवन जीना चाहे तो गड़बड़ हो जायगी, अन्यथा उसकी आवश्यकता जो है उसकी पूर्ति तो हो ही जाती है। आवश्यकता पूर्ति में और रूचि की निवृत्ति में लग जाय तो ड्रायवर भी मुक्त हो सकता है, सेठ भी मुक्त हो सकता है, अनपढ़ भी मुक्त हो सकता है, शिक्षित भी मुक्त हो सकता, निर्धन भी मुक्त हो सकता है, धनवान भी मुक्त हो सकता है, देशी भी मुक्त हो सकता है, परदेशी भी मुक्त हो सकता है। अरे, डाकू भी मुक्त हो सकता है।
आपके पास ज्ञान है, उस ज्ञान का आदर करो। फिर चाहे गंगा के किनारे बैठकर आदर करो या यमुना के किनारे बैठकर आदर करो या समाज में रहकर आदर करो। ज्ञान का उपयोग करने की कला का नाम है सत्संग।
सबके पास ज्ञान है। वह ज्ञानस्वरूप चैतन्य ही सबका अपना आपा है। लेकिन बुद्धि के विकास का फर्क है। ज्ञान तो मच्छर के पास भी है। बुद्धि की मंदता के कारण रूचिपूर्ति में ही हम जीवन खर्च किये जाते हैं। जिसको हम जीवन कहते हैं, वह शरीर हमारा जीवन नहीं है। वास्तव में ज्ञान ही हमारा जीवन है, चैतन्य आत्मा ही हमारा जीवन है।
ॐकार का जप करने से आपकी आवश्यकतापूर्ति की योग्यता बढ़ती है और रूचि की निवृत्ति में मदद मिलती है। इसलिए ॐकार (प्रणव) मंत्र सर्वोपरि माना जाता है। हालांकि संसारी दृष्टि से देखा जाय तो महिलाओं को एवं गृहस्थियों को अकेला ॐकार का जप नहीं करना चाहिए, क्योंकि उन्होंने रूचियों को आवश्यकता का जामा पहनाकर ऐसा विस्तार कर रखा है कि एकाएक अगर वह सब टूटने लगेगा तो वे लोग घबरा उठेंगे। एक तरफ अपनी पुरानी रूचि खींचेगी और दूसरी तरफ अपनी मूलभूत आवश्यकता – एकांत की, आत्मसाक्षात्कार की इच्छा आकर्षित करेगी। प्रणव के अधिक जप से मुक्ति की इच्छा जोर मारेगी। इससे गृहस्थी के इर्द-गिर्द जो रूचि पूर्ति करने वाले मंडराते रहते हैं, उन सबको धक्का लगेगा। इसलिए गृहस्थियों को कहते हैं कि अकेले ॐ का जप मत करो। ऋषियों ने कितना सूक्ष्म अध्ययन किया है।
समाज को आपके प्रेम की, सान्त्वना की, स्नेह की और निष्काम कर्म की आवश्यकता है। आपके पास करने की शक्ति है तो उसे समाज की आवश्यकतापूर्ति में लगा दो। आपकी आवश्यकता माँ, बाप, गुरू और भगवान पूरी कर देंगे। अन्न, जल और वस्त्र आसानी से मिल जायेंगे। पर टेरीकोटन कपड़ा चाहिए, पफ-पॉवडर चाहिए तो यह रूचि है। रूचि के अनुसार जो चीजें मिलती हैं, वे हमारी हानि करती हैं। आवश्यकतानुसार चीजें हमारी तन्दुरूस्ती की भी रक्षा करती है। जो आदमी ज्यादा बीमार है, उसकी बुद्धि सुमति नहीं है।
चरक-संहिता के रचयिता ने अपने शिष्य को कहा कि तंदुरूस्ती के लिए भी बुद्धि चाहिए। सामाजिक जीवन जीने के लिए भी बुद्धि चाहिए और मरने के लिय भी बुद्धि चाहिए। मरते समय भी अगर बुद्धि का उपयोग किया जाय कि, 'मौत हो रही है इस देह की, मैं तो आत्मा चैतन्य व्यापक हूँ।' ॐकार का जप करके मौत का भी साक्षी बन जायें। जो मृत्यु को भी देखता है उसकी मृत्यु नहीं होती। क्रोध को देखने वाले हो जाओ तो क्रोध शांत हो जायेगा। यह बुद्धि का उपयोग है। जैसे आप गाड़ी चलाते हो और देखते हुए चलाते हो तो खड्डे में नहीं गिरती और आँख बन्द करके चलाते हो तो बचती भी नहीं। ऐसे ही क्रोध आया और हमने बुद्धि का उपयोग नहीं किया तो बह जायेंगे। काम, लोभ और मोहादि आयें और सतर्क रहकर बुद्धि से काम नहीं लिया तो ये विकार हमें बहा ले जायेंगे।
लोभ आये तो विचारों कि आखिर कब तक इन पद-पदार्थों को संभालते रहोगे। आवश्यकता तो यह है कि बहुजन-हिताय, बहुजन-सुखाय इनका उपयोग किया जाये और रूचि है इनका अम्बार लगाने की। अगर रूचि अनुसार किया तो मुसीबतें पैदा कर लोगे। ऐसे ही आवश्यकता है कहीं पर अनुशासन की और आपने क्रोध की फूफकार मार दिया तो जाँच करो कि उस समय आपका हृदय तपता तो नहीं। सामने वाले का अहित हो जाये तो हो जाये किन्तु आपकी बात अडिग रहे – यह क्रोध है। सामने वाला का हित हो, अहित तनिक भी न हो, अगर यह भावना गहराई में हो तो फिर वह क्रोध नहीं, अनुशासन है। अगर जलन महसूस होती है तो क्रोध घुस गया। काम बुरा नहीं है, क्रोध बुरा नहीं है, लोभ-मोह और अहंकार बुरा नहीं है। धर्मानुकूल सबकी आवश्यकता है। अगर बुरा होता तो सृष्टिकर्ता बनाता ही क्यों ? जीवन-विकास के लिए इनकी आवश्यकता है। दुःख बुरा नहीं है। निन्दा, अपमान, रोग बुरा नहीं है। रोग आता है तो सावधान करता है कि रूचियाँ मत बढ़ाओ। बेपरवाही मत करो। अपमान भी सिखाता है कि मान की इच्छा है, इसलिए दुःख होता है। शुकदेव जी को मान में रूचि नहीं है, इसलिए कोई लोग अपमान कर रहे हैं फिर भी उन्हें दुःख नहीं होता। रहुगण राजा कितना अपमान करते हैं, किन्तु जड़भरत शांतचित्त रहते हैं।
अपमान का दुःख बताता है कि आपको मान में रूचि है। दुःख का भाव बताता है कि सुख में रूचि है। कृपा करके अपनी रूचि परमात्मा में ही रखो।
सुख, मान और यश में नहीं फँसोगे तो आप बिल्कुल स्वतंत्र हो जाओगे। योगी का योग सिद्ध हो जायेगा, तपी का तप और भक्त की भक्ति सफल हो जायगी। बात अगर जँचती है तो इसे अपनी बना लेना। तुम दूसरा कुछ नहीं तो कम से कम अपने अनुभव का तो आदर करो। आपको रूचि अनुसार भोग मिलते हैं तो भोग भोगते-भोगते आप थक जाते हैं कि नहीं ? ऊबान आ जाती है कि नहीं ? ... तो इस ज्ञान का आदर करो। योगमार्ग पर चलते हुए या आवश्कतानुसार 'बहुजनहिताय-बहुजनसुखाय' काम करते हो तो आपको आनन्द आता है। आपका मन एवं बुद्धि विकसित होती है। यह भी आपका अनुभव है। सत्संग के बाद आपको यह महसूस होता है कि बढ़िया कार्य किया। शांति, सुख एवं सुमति मिली। ....तो अपने अनुभव की बात को आप पक्की करके हृदय की गहराई में उतार लो कि रूचि की निवृत्ति में ही आनन्द है और आवश्यकता तो स्वतः पूरी हो जायेगी।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
जो अपने को शुद्ध-बुद्ध निष्कलंक नारायणस्वरूप मानता है, उसके सारे कल्मष मिट जाते हैं, ब्रह्महत्या जैसे पाप भी दूर हो जाते हैं और अंतरतम चैतन्य स्वरूप का सुख प्रकट होने लगता है। देवताओं से वह पूजित होने लगता है। यक्ष, गंधर्व, किन्नर उसके दीदार करके अपना भाग्य बना लेते हैं।
मुनिशार्दूल वशिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं- "जीव को अपना परम कल्याण करना हो तो प्रारम्भ में दो प्रहर (छः घण्टे) आजीविका के निमित्त यत्न करे और दो प्रहर साधुसमागम, सत्शास्त्रों का अवलोकन और परमात्मा का ध्यान करें। प्रारम्भ में जब आधा समय ध्यान, भजन और शास्त्र विचार में लगायेगा तब उसकी अंतरचेतना जागेगी। फिर उसे पूरा समय आत्म-साक्षात्कार या ईश्वर-प्राप्ति में लगा देना चाहिए।"
श्रीकृष्ण ने गीता में भी कहाः
यस्त्वात्मरतिरेव
स्यादात्मतृप्तश्च
मानवः ।
आत्मन्येव
च
संतुष्टस्तस्य
कार्यं न विद्यते
।।
'जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट हो, उसके लिए कोई कर्त्तव्य नहीं है।'
(भगवद् गीताः ३-१७)
आत्मरति, आत्मतृप्ति और आत्मप्रीति जिसको मिल गई, उसके लिए बाह्य जगत का कोई कर्त्तव्य रहता नहीं। उसका आत्मविश्रांति में रहना ही सब जीवों का, राष्ट्र का और विश्व का कल्याण करना है। जो पुरूष विगतस्पृहा है, विगतदुःख है, विगतज्वर है, उसके अस्तित्व मात्र से वातावरण में बहुत-बहुत मधुरता आती है। प्रकृति उनके अनुकूल होती है। तरतीव्र प्रारब्धवेग से उनके जीवन में प्रतिकूलता आती है तो वे उद्विग्न नहीं होते। ऐसे स्थितप्रज्ञ महापुरूष के निकट रहने वाले साधक को चाहिए कि वह दिन का चार भाग कर दे। एक भाग वेदान्त शास्त्र का विचार करे। एक भाग परमात्मा के ध्यान में लगावे। परमात्मा का ध्यान कैसे ? 'मन को, इन्द्रियों को, चित्त को जो चेतना दे रहा है वह चैतन्य आत्मा मैं हूँ। मैं वास्तव में जन्मने-मरने वाला जड़ शरीर नहीं हूँ। क्षण क्षण में सुखी-दुखी होने वाला मैं नही हूँ। बार-बार बदलने वाली बुद्धि वृति मैं नही हूँ। देह में अहं करके जीने वाला जीव मैं नहीं हूँ।अंहकार भी मैं नहीं हूँ। मैं इन सबसे परे, शुद्ध-बुद्ध सनातन सत्य चैतन्य आत्मा हूँ। आनन्द स्वरूप हूँ, शांत स्वरूप हूँ। मैं बोध स्वरूप हूँ.... ज्ञान स्वरूप हूँ।' जो ऐसा चिन्तन करता है वह वास्तव में अपने ईश्वरत्व का चिंतन करता है, अपने ब्रह्मत्व का चिंतन करता है। इसी चिन्तन में निमग्न रहकर अपने चित्त को ब्रह्ममय बना दे।
फिर तीसरा प्रहर संतसेवा, सदगुरूसेवा में लगावे। आधी अविद्या तो सदगुरू की सेवा से ही दूर हो जाती है। बाकी की आधी अविद्या ध्यान, जप और शास्त्रविचार इन तीन साधनों से दूर करके जीव मुक्त हो जाता है।
बड़े में बड़ा बन्धन है कि अविद्या में रस आ रहा है। इसलिए ईश्वर प्राप्ति के लिये छटपटाहट नहीं होती। अविद्या उसे कहते हैं, जो अविद्यमान वस्तु हो।
वस्तुएँ दो हैं- एक अविघमान वस्तु और दूसरी विद्यमान वस्तु। अविद्यमान वस्तु प्रतीत होती है। विद्यमान वस्तु प्राप्त होती है। जो प्रतीत होती है, उसमें धोखा होता है और जो प्राप्त होती है, उसमें पूर्णता होती है। जैसे, स्वप्न में भिखारी को प्रतीत होता है कि मैं राजा हूँ। इन्द्र को स्वप्न आ जाय कि मैं भिखारी हूँ। स्वप्न में भिखारी होना भी धोखा है, राजा होना भी धोखा है। धोखे के समय प्रतीति सच्ची लगती है। प्रतीति ऐसे ढंग से होती है कि प्रतीति प्राप्ति लगती है। भिखारी सोया है सड़ी-गली छत के नीचे फटी हुई गुदड़ी पर। स्वप्न में हो गया राजा। तेजबहादुर सोया है अपने महल में और स्वप्न में हो गया भिखारी। जिस समय भिखारी होने का स्वप्न चालू है, उस समय तेजबहादुर को कोई कह दे कि तू भिखारी नहीं है, बादशाह है तो वह नहीं मानेगा, क्योंकि प्रतीति प्राप्ति लगती है। वास्तविक प्राप्ति हुई नहीं इसलिए प्रतीति प्राप्ति लगती है। वास्तविक प्राप्ति क्या है ? वे दोनों स्वप्न से जाग जायें तो अपने को जान लें कि वास्तविक क्या हैं।
नींद में दिखने वाली स्वप्न जगत की माया हिता नाम की नाड़ी में दिखती है। जाग्रत की माया विता नाम की नाड़ी में दिखती है। यह केवल प्रतीति हो रही है। प्रतीति तब तक नहीं मिटती, जब तक प्राप्ति नहीं हुई। प्राप्ति होती है नित्य वस्तु की। प्रतीति होती है अनित्य वस्तु की। 'मैं M.B.B.S. हूँ' यह प्रतीति है। मृत्यु का झटका आया, डिग्री खत्म हो गई। 'मैं M.D. हूँ... मैं L.L.B. हूँ... मैं उद्योगपति हूँ, मैं बड़ा धनवान हूँ... मैं कंगाल हूँ, मैं पटेल हूँ... मैं गुजराती हूँ... मैं सिंधी हूँ... मुझे यह समस्या है... मुझे यह पाना है.. मुझे यह पकड़ना है.. मुझे यह छोड़ना है..." ये सब प्रतीति है। प्रतीति जब तक सत्य लगती रहेगी, प्रतीति में प्रतीति का दर्शन नहीं होगा, प्रतीति में प्राप्ति का दर्शन होगा, तब तक दुःखों का अंत नहीं आयगा।
कभी न
छूटे पिण्ड
दुःखों से।
जिसे
ब्रह्म का
ज्ञान नहीं।।
एक दुःख नहीं, हजार दुःख मिटा दो, फिर भी कोई न कोई दुःख रह जाता है। जब प्राप्ति होती है, तब हजार विघ्न आ जायें फिर भी उद्विग्न नहीं करते, सुख में स्पृहा नहीं कराते।
प्रतीति होती है माया में और प्राप्ति होती है अपने परब्रह्म परमात्मा-स्वभाव की। प्राप्त होने वाली एक ही चीज है, प्राप्त होने वाला एक ही तत्त्व है और वह है परमात्म-तत्त्व। उसकी ही केवल प्राप्ति होती है।
प्रतीति होती है वृत्तियों से।
आज 20 मई है। अगले वर्ष की 20 मई के दिन आपको लगा होगा कि, 'मुझे यह सुख मिला.... मैंने यह खाया... वह पिया... सुबह में चाय मिली.. दोपहर को भोजन मिला....' आदि आदि। लेकिन अब बताओ, उसमें से अब आपके पास कुछ है ? गत वर्ष के कई महीने की २० तारीख को जो कुछ सुख-दुःख मिला, मान-अपमान मिला, अरे पूरे मई महीने में जो कुछ सुख-दुःख, मान-अपमान मिले वे अभी हैं ? वह सब प्रतीति थी। सब प्रतीत होकर बह गया। प्रतीति का साक्षी दृष्टा चैतन्य परमात्मा रह गया।
जो रह गया, वह जीवन है और जो बह गया, वह मृत्यु है। एक दिन शरीर भी बह जायेगा मृत्यु की धारा में लेकिन तुम रह जाओगे। अगर अपने को जानोगे तो सदा के लिए निर्बंध नारायण स्वरूप में स्थित हो जाओगे।
जो बाहर से मिलेगा, वह सब प्रतीति मात्र होगा। शरीर भी प्रतीति मात्र है कि 'मैं फलाना हूँ..... मैं न्यायाधीश हूँ......... मैं उद्योगपति हूँ....' यह व्यवहार काल में केवल प्रतीति है। 'मैं गरीब हूँ...' यह प्रतीति है।
जैसे स्वप्न की चीजों को साथ में लेकर आदमी जाग नहीं सकता, ऐसे ही प्रतीति को सच्चा मानकर परमात्म-तत्त्व में जाग नहीं सकता। शिवजी पार्वती से कहते हैं-
उमा
कहों मैं
अनुभव अपना ।
सत्य
हरि भजन जगत
सब सपना ।।
स्वप्न में जो कुछ मिलता है, वह सचमुच में प्राप्त होता है कि मिलने की मात्र प्रतीति होती है ? प्रतीति होती है।
बचपन में आपको खिलौने मिले थे, सुख-दुःख मिले थे, मान-अपमान मिला था वह प्राप्त हुआ था कि प्रतीत हुआ था ? प्रतीत हुआ था। कल जो कुछ सुख-दुःख मिला, वह भी प्रतीत हुआ। ऐसे ही आज भी जो कुछ मिलेगा, वह भी प्रतीति मात्र होगा।
बचपन भी प्रतीति, युवानी भी प्रतीति, बुढ़ापा भी प्रतीति तो जीवन भी प्रतीति और मृत्यु भी प्रतीति। यह वास्तव में प्रतीति हो रही है। इस प्रतीति को सच्चा मान रहे हैं.... प्राप्ति मान रहे हैं, इसलिए प्राप्ति पर परदा पड़ा है।
प्राप्ति होती है परमात्मा की। प्रतीति होती है परमात्मा की माया की। जैसे जल के ऊपर तरंगे उछलती हैं, ऐसे ही प्राप्ति की सत्ता से प्रतीति की तरंगे उछलती हैं। तरंग को कितना भी संभालकर रखो, लेकिन तरंग तो तरंग ही है। ऐसे ही प्रतीति को कितना भी संभालकर रखो, प्रतीति तो प्रतीति ही है।
अब हमें क्या करना चाहिए ?
प्रतीति को जब प्रतीति समझेंगे, तब अनुपम लाभ होगा। प्रतीति को अगर ठीक से प्रतीति मान लिया, प्रतीति जान लिया तो प्राप्ति हो जायेगी अथवा प्राप्ति तत्त्व को ठीक से जान लिया तो प्रतीति का आकर्षण छूट जायेगा। प्राप्ति में टिक गये तो प्रतीति का आकर्षण छूट जायेगा।
प्राप्ति होती है परमात्मा की और प्रतीति होती है माया की। प्रतीति में सत्यबुद्धि होने से उसका आकर्षण रहता है। उसको कहते हैं वासना। वासना पूर्ण करने में कोई बड़ा आदमी विघ्न डालता है तो भय लगता है, छोटा आदमी विघ्न डालता है तो क्रोध आता है और बराबरी का आदमी विघ्न डालता है तो ईर्ष्या होती है।
प्रतीति की वासना थोड़ी बहुत पूरी हुई तो 'और मिल जाय' ऐसी आशा बनती है। फिर 'और मिले... और मिले....' ऐसे लोभ बनता है। प्रतीति में सत्यबुद्धि होने से ही आशा, तृष्णा, वासना, भय, क्रोध, ईर्ष्या, उद्वेग आदि सारी मुसीबतें आती हैं। प्रतीति को सत्य मानने में, प्रतीति को प्राप्ति मानने में सारे दोष आते हैं।
भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते है-
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः
सुखेषु
विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः
स्थितधीर्मुनिरूच्यते।।
'दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में जो सर्वथा निःस्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गये है, ऐसा मुनि स्थिरबुद्धि कहा जाता है।'
(भगवद् गीताः २.५६)
दुःख आये तो मन को उद्विग्न मत करो। सुख की स्पृहा मत करो।
मुनि माने जो सावधानी से मनन करता है कि प्रतीति में कहीं उलझ तो नहीं रहा हूँ ? जो छूटने वाला है, उसको सच्चा समझकर अछूट से कहीं बाहर तो नहीं जा रहा हूँ ? अछूट में टिका हूँ या छूटने वाले में उलझ रहा हूँ ? इस प्रकार सावधानी से जो मनन करता है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है। उसकी प्रज्ञा प्राप्ति में प्रतिष्ठित हो जाती है, परमात्मामय बन जाती है।
भक्तमाल में एक कथा आती है।
अमरदास नाम के एक संत हो गये। वे जब तीन साल के थे, तब माँ की गोद में बैठे-बैठे कुछ प्रश्न पूछने लगेः
"माँ ! मैं कौन हूँ ?"
बेटा ! तू मेरा बेटा है ?
"तेरा बेटा कहाँ है?"
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखकर, उसके बाल सहलाते हुए कहाः "यह रहा मेरा बेटा।"
"ये तो सिर और बाल है।"
माँ ने दोनों गालों को स्पर्श करते हुए कहाः "यह है मेरा गुलड़ू।"
"ये तो गाल हैं।"
हाथ को छूकर माँ ने कहाः "यह है मेरा बेटा।"
"ये तो हाथ है।"
अमरदास वास्तव में गत जन्म के प्राप्ति की ओर चलने वाले साधक रहे होंगे। इसीलिए तीन साल की उम्र में ऐसा प्रश्न उठा रहे थे। साधक का हृदय तो पावन होता है। जिसका हृदय पावन होता है, वह आदमी अच्छा लगता है। पापी चित्तवाला आदमी आता है, उसको देखकर चित्त उद्विग्न होता है। श्रेष्ठ आत्मा आता है, पुण्यात्मा आता है तो उसको देखकर हृदय पुलकित होता है। इसी बात को तुलसीदासजी ने इस प्रकार कहा हैः
एक
मिलत दारूण
दुःख देवहिं।
दूसर
बिछुड़त
प्राण हरी
लेवहिं।।
क्रूर आदमी आता है तो चित्त में दुःख होने लगता है। सदगुणी, सज्जन जब हमसे बिछुड़ता है, दूर होता है, तब मानो हमारे प्राण लिये जा रहा है। अमरदास ऐसा ही मधुर बालक था। माँ का इतना वात्सल्य और फिर इतना समझदार बेटा ! तीन वर्ष की उम्र में ऐसे-ऐसे प्रश्न करे ! हृदय में पूर्ण निर्दोषता है। निर्दोष बच्चा प्यारा लगता ही है। माँ ने अमरदास को छाती से लगा लिया।
"यह है मेरा बेटा।"
"यह तो शरीर है। यह शरीर कब से तेरे पास है ?"
"यह तो शादी के बाद आया मेरे पास ।"
"तो माँ ! उसके पहले मैं कहाँ था ? शादी के बाद तेरे पास मैं नहीं आया। तुम्हारे शरीर से मेरे शरीर का जन्म हुआ। तुम्हारी शादी के पहले भी कहीं था। इसका अर्थ है कि शरीर मैं नहीं हूँ। यह शरीर नहीं था, तब भी मैं था। शरीर नहीं रहेगा, तब भी मैं रहूँगा। तो वह मैं कौन हूँ ?"
'मैं कौन हूँ ?' इसकी खोज प्राप्ति में पहुँचा देती है। 'मैं आसाराम हूँ..... मैं गोविन्दभाई हूँ...' यह प्रतीति है। यह शरीर भी प्रतीति है, शरीर के सम्बन्ध भी प्रतीति हैं, शरीर से सम्बन्धित जड़ वस्तु या चेतन व्यक्ति आदि सब प्रतीति मात्र हैं। प्रतीति जिसकी सत्ता से हो रही है वह है प्राप्ति।
शरीर भी प्रतीति, इन्द्रियाँ भी प्रतीति। हाथ भी प्रतीति, आँख भी प्रतीति, कान भी प्रतीति। आँख ठीक से देख रही है कि नहीं देख रही है, कान ठीक से सुन रहे हैं कि नहीं सुन रहे हैं, यह भी प्रतीति हो रही है। मन में शान्ति है कि अशान्ति, इसकी भी प्रतीति हो रही है। बुद्धि में याद रहता है कि नहीं रहता इसकी भी प्रतीति हो रही है।
प्रतीति जिसको होती है, उसको अगर खोजोगे तो प्राप्ति हो जायेगी, बेड़ा पार हो जायेगा।
हम लोग गलती करते हैं कि प्रतीति के साथ अपने को जोड़ देते हैं। प्रतीति होने वाले शरीर को 'मैं' मान लेते हैं। हम क्या हैं ? हम प्राप्ति तत्त्व है, उधर ध्यान नहीं जाता।
मंदिर वाले मंदिर में जा-