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प्रातःस्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू के

सत्संग-प्रवचन

आत्मयोग

पूज्य बापू का पावन संदेश

हम धनवान होगे या नहीं, चुनाव जीतेंगे या नहीं इसमें शंका हो सकती है परंतु भैया ! हम मरेंगे या नहीं, इसमें कोई शंका है? विमान उड़ने का समय निश्चित होता है, बस चलने का समय निश्चित होता है, गाड़ी छूटने का समय निश्चित होता है परंतु इस जीवन की गाड़ी छूटने का कोई निश्चित समय है?

आज तक आपने जगत में जो कुछ जाना है, जो कुछ प्राप्त किया है.... आज के बाद जो जानोगे और प्राप्त करोगे, प्यारे भैया ! वह सब मृत्यु के एक ही झटके में छूट जायेगा, जाना अनजाना हो जायेगा, प्राप्ति अप्राप्ति में बदल जायेगी।

अतः सावधान हो जाओ। अन्तर्मुख होकर अपने अविचल आत्मा को, निजस्वरूप के अगाध आनन्द को, शाश्वत शांति को प्राप्त कर लो। फिर तो आप ही अविनाशी आत्मा हो।

जागो.... उठो.... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ। सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा में अथाह सामर्थ्य है। अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके।

सदा स्मरण रहे कि इधर-उधर भटकती वृत्तियों के साथ तुम्हारी शक्ति भी बिखरती रहती है। अतः वृत्तियों को बहकाओ नहीं। तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ और व्यवहार-काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठ में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।

अनुक्रम

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प्रास्ताविक

इस नन्हीं सी पुस्तक में भक्ति, योग और ज्ञानमार्ग के पवित्र आत्माओं के लिए सहज में अन्तस्तल से स्फुरित महापुरूषों की वाणी निहित है जिसमें गीता, भागवत, रामायण आदि के प्रमाण सहित उन सत्पुरूषों के अनुभव छलकते हैं।

जितना गूढ़ विषय है उतना ही सरल भी है। चाहे भक्त हो चाहे योगी हो चाहे ज्ञानमार्गी हो, चाहे किसी भी धर्म, मत, पंथ, विचारों को माननेवाला हो, सबको इस ओजपूर्ण, अनुभव-संपन्न, 'आत्मयोग' कराने वाली दिव्य वाणी से लाभ होगा और उन पवित्र आत्माओं के द्वारा ये अनुभव-संपन्न वचन औरों तक भी पहुँचेंगे।

सत्पुरूषों के वचन को लिपिबद्ध करने में अगर कोई त्रुटि रह गई हो तो वाचक कृपा करके हमें सूचित करें, हम आभारी होंगे।

विनीत,

श्री योग वेदान्त सेवा समिति,

अमदावाद आश्रम

अनुक्रम

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ब्रह्मचर्य-रक्षा का मंत्र

ॐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाय

मनोभिलाषितं मनः स्तंभ कुरू कुरू स्वाहा।

रोज दूध में निहार कर 21 बार इस मंत्र का जप करें और दूध पी लें। इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है। स्वभाव में आत्मसात् कर लेने जैसा नियम है।

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अनुक्रम

पूज्य बापू का पावन संदेश.. 2

प्रास्ताविक.. 3

ब्रह्मचर्य-रक्षा का मंत्र. 3

आत्मयोग.. 4

जागो अपनी महिमा में.. 8

भवसागर का किनाराः वैराग्य... 10

आत्म-अवगाहन.. 14

चित्त का निर्माण.. 23

'परिप्रश्नेन....' 25

जनक-विचार. 34

मामेकं शरणं व्रज.. 37

क्षण का भी प्रमाद मृत्यु है. 46

ना करो नींद से प्यार................... 47

आत्म-निष्ठा.. 48

ध्यान-संकेत. 49

चित्तविश्रान्ति-प्रयोग.. 50

प्रार्थना-निर्झर. 51

हो गई रहेमत तेरी...... 53

 

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आत्मयोग

भगवान के प्यारे भक्त दृढ़ निश्चयी हुआ करते हैं। वे बार-बार प्रभु से प्रार्थना किया करते हैं और अपने निश्चय को दुहराकर संसार की वासनाओं को, कल्पनाओं को शिथिल किया करते हैं। परमात्मा के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए वे कहते हैं-

'हम जन्म-मृत्यु के धक्के-मुक्के अब न खायेंगे। अब आत्माराम में आराम पायेंगे। मेरा कोई पुत्र नहीं, मेरी कोई पत्नी नहीं, मेरा कोई पति नही, मेरा कोई भाई नहीं। मेरा मन नहीं, मेरी बुद्धि नहीं, चित्त नहीं, अहंकार नहीं। मैं पंचभौतिक शरीर नहीं।

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।

मोह, ममता के सम्बन्धों में मैं कई बार जन्मा हूँ और मरा हूँ। अब दूर फेंक रहा हूँ ममता को। मोह को अब ज्ञान की कैंची से काट रहा हूँ। लोभ को ॐ की गदा से मारकर भगा रहा हूँ।

मेरा रोम-रोम संतों की, गुरू की कृपा और करूणा से पवित्र हो रहा है। आनन्दोऽहम्..... शान्तोऽहम्..... शुद्धोऽहम्..... निर्विकल्पोऽहम्.... निराकारोऽहम्। मेरा चित्त प्रसन्न हो रहा है।

'हम राम के थे, राम के हैं और राम के ही रहेंगे। ॐ राम..... ॐ राम.... ॐ राम....।'

कोई भी चिन्ता किये बिना जो प्रभु में मस्त रहता है वह सहनशील है, वह साधुबुद्धि है।

'आज' ईश्वर है। 'कल' संसार है। ईश्वर कल नहीं हो सकता। ईश्वर सदा है। संसार पहले नहीं था। संसार पाया जाता है, ईश्वर पाया नहीं जाता। केवल स्मृति आ जाय ईश्वरत्व की तो वह मौजूद है। स्मृति मात्रेण.....। ईश्वर, परमात्मा हमारे से कभी दूर गये ही नहीं। उनकी केवल विस्मृति हो गई। आने वाले कल की चिन्ता छोड़ते हुए अपने शुद्ध आत्मा के भाव में जिस क्षण आ जाओ उसी क्षण ईश्वरीय आनन्द या आत्म-खजाना मौजूद है।

भगवान को पदार्थ अर्पण करना, सुवर्ण के बर्तनों में भगवान को भोग लगाना, अच्छे वस्त्रालंकार से भगवान की सेवा करना यह सब के बस की बात नहीं है। लेकिन अन्तर्यामी भगवान को प्यार करना सब के बस की बात है। धनवान शायद धन से भगवान की थोड़ी-बहुत सेवा कर सकता है लेकिन निर्धन भी भगवान को प्रेम से प्रसन्न कर सकता है। धनवानों का धन शायद भगवान तक न भी पहुँचे लेकिन प्रेमियों का प्रेम तो परमात्मा तक तुरन्त पहुँच जाता है।

अपने हृदय-मंदिर में बैठे हुए अन्तरात्मारूपी परमात्मा को प्यार करते जाओ। इसी समय परमात्मा तुम्हारे प्रेमप्रसाद को ग्रहण करते जायेंगे और तुम्हारा रोम-रोम पवित्र होता जायगा। कल की चिन्ता छोड़ दो। बीती हुई कल्पनाओं को, बीती हुई घटनाओं को स्वप्न समझो। आने वाली घटना भी स्वप्न है। वर्त्तमान भी स्वप्न है। एक अन्तर्यामी अपना है। उसी को प्रेम करते जाओ और अहंकार को डुबाते जाओ उस परमात्मा की शान्ति में।

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हम शांत सुखस्वरूप आत्मा हैं। तूफान से सरोवर में लहरें उठ रही थीं। तूफान शान्त हो गया। सरोवर निस्तरंग हो गया। अब जल अपने स्वभाव में शान्त स्थित है। इसी प्रकार अहंकार और इच्छाओं का तूफान शान्त हो गया। मेरा चित्तरूपी सरोवर अहंकार और इच्छाओं से रहित शान्त हो गया। अब हम बिल्कुल निःस्पंद अपनी महिमा में मस्त हैं।

मन की मनसा मिट गई भरम गया सब दूर।

गगन मण्डल में घर किया काल रहा सिर कूट।।

इच्छा मात्र, चाहे वह राजसिक हो या सात्त्विक हो, हमको अपने स्वरूप से दूर ले जाती है। ज्ञानवान इच्छारहित पद में स्थित होते हैं। चिन्ताओं और कामनाओं के शान्त होने पर ही स्वतंत्र वायुमण्डल का जन्म होता है।

हम वासी उस देश के जहाँ पार ब्रह्म का खेल।

दीया जले अगम का बिन बाती बिन तेल।।

आनन्द का सागर मेरे पास था मुझे पता न था। अनन्त प्रेम का दरिया मेरे भीतर लहरा रहा था और मैं भटक रहा था संसार के तुच्छ सुखों में।

ऐ दुनियाँदारों ! ऐ बोतल की शराब के प्यारों ! बोतल की शराब तुम्हें मुबारक है। हमने तो अब फकीरों की प्यालियाँ पी ली हैं..... हमने अब रामनाम की शराब पी ली है।

दूर हटो दुनियाँ की झंझटों ! दूर हटो रिश्तेनातों की जालों ! हमने राम से रिश्ता अपना बना लिया है।

हम उसी परम प्यारे को प्यार किये जा रहे हैं जो वास्तव में हमारा है।

'आत्मज्ञान में प्रीति, निरन्तर आत्मविचार और सत्पुरूषों का सान्निध्य' – यही आत्म-साक्षात्कार की कुँजियाँ हैं।

हम निःसंकल्प आत्म-प्रसाद में प्रवेश कर रहे हैं। जिस प्रसाद में योगेश्वरों का चित्त प्रसाद पाता है, जिस प्रसाद में मुनियों का चित्त मननशील होता है उस प्रसाद में हम आराम पाये जा रहे हैं।

तुम्हें मृत्युदण्ड की सजा मिलने की तैयारी हो, न्यायाधीश सजा देने के लिए कलम उठा रहा हो, उस एक क्षण के लिए भी यदि तुम अपने आत्मा में स्थित हो जाओ तो न्यायाधीश से वही लिखा जायेगा जो परमात्मा के साथ तुम्हारी नूतन स्थिति के अनुकूल होगा, तुम्हारे कल्याण के अनुकूल होगा।

दुःख का पहाड़ गिरता हो और तुम परमात्मा में डट जाओ तो वह पहाड़ रास्ता बदले बिना नहीं रह सकता। दुःख का पहाड़ प्रकृति की चीज है। तुम परमात्मा में स्थित हो तो प्रकृति परमात्मा के खिलाफ कभी कदम नहीं उठाती। ध्यान में जब परमात्म-स्वरूप में गोता मारो तो भय, चिन्ता, शोक, मुसीबत ये सब काफूर हो जाते हैं। जैसे टॉर्च का प्रकाश पड़ते ही ठूँठे में दिखता हुआ चोर भाग जाता है वैसे ही आत्मविचार करने से, आत्म-भाव में आने मात्र से भय, शोक, चिन्ता, मुसीबत, पापरूपी चोर पलायन हो जाते हैं। आत्म-ध्यान में गोता लगाने से कई जन्मों के कर्म कटने लगते हैं। अभी तो लगेगा कि थोड़ी शान्ति मिली, मन पवित्र हुआ लेकिन कितना अमाप लाभ हुआ, कितना कल्याण हुआ इसकी तुम कल्पना तक नहीं कर सकते। आत्म ध्यान की युक्ति आ गयी तो कभी भी विकट परिस्थितियों के समय ध्यान में गोता मार सकते हो।

मूलबन्ध, उड्डियान बन्ध और जालंधर बन्ध, यह तीन बन्ध करके प्राणायाम करें, ध्यान करें तो थोड़े ही दिनों में अदभुत चमत्कारिक लाभ हो जायगा। जीवन में बल आ जायगा। डरपोक होना, भयभीत होना, छोटी-छोटी बातों में रो पड़ना, जरा-जरा बातों में चिन्तातुर हो जाना यह सब मन की दुर्बलताएँ हैं, जीवन के दोष हैं। इन दोषों की निकालने के लिए ॐ का जप करना चाहिए। प्राणायाम करना चाहिए। सत्पुरूषों का संग करना चाहिए।

जो तुम्हें शरीर से, मन से, बुद्धि से दुर्बल बनाये वह पाप है। पुण्य हमेशा बलप्रद होता है। सत्य हमेशा बलप्रद होता है। तन से, मन से, बुद्धि से और धन से जो तुम्हें खोखला करे वह राक्षस है। जो तुम्हें तन-मन-बुद्धि से महान् बनायें वे संत हैं।

जो आदमी डरता है उसे डराने वाले मिलते हैं।

त्रिबन्ध के साथ प्राणायाम करने से चित्त के दोष दूर होने लगते हैं, पाप पलायन होने लगते हैं, हृदय में शान्ति और आनन्द आने लगता है, बुद्धि में निर्मलता आने लगती है। विघ्न, बाधाएँ, मुसीबतें किनारा करने लगती हैं।

तुम ईश्वर में डट जाओ। तुम्हारा दुश्मन वही करेगा जो तुम्हारे हित में होगा। ॐ का जप करने से और सच्चे आत्मवेत्ता संतों की शरण में जाने से कुदरत ऐसा रंग बदल देती है कि भविष्य ऊँचा उठ जाता है।

अचल संकल्प-शक्ति, दृढ़ निश्चय और निर्भयता होनी चाहिए। इससे बाधाएँ ऐसी भागती हैं जैसे आँधी से बादल। आँधी चली तो बादल क्या टिकेंगे ?

मुँह पर बैठी मक्खी जरा-से हाथ के इशारे से उड़ जाती है ऐसे ही चिन्ता, क्लेश, दुःख हृदय में आयें तब जरा सा ध्यान का इशारा करो तो वे भाग जायेंगे। यह तो अनुभव की बात है। डरपोक होने से तो मर जाना अच्छा है। डरपोक होकर जिये तो क्या जिये ? मूर्ख होकर जिये तो क्या जिये ? भोगी होकर जिये तो क्या खाक जिये ? योगी होकर जियो। ब्रह्मवेत्ता होकर जियो। ईश्वर के साथ खेलते हुए जियो।

कंजूस होकर जिये तो क्या जिये ? शिशुपाल होकर जिये तो क्या जिये ? शिशुपाल यानी जो शिशुओं को, अपने बच्चों को पालने-पोसने में ही अपना जीवन पूरा कर दे। भले चार दिन की जिन्दगी हो, चार पल की जिन्दगी हो लेकिन हो आत्मभाव की। चार सौ साल जिया लेकिन अज्ञानी होकर जिया तो क्या खाक जिया ? मजदूरी की और मरा। जिन्दगी जीना तो आत्मज्ञान की।

भूतकाल जो गुजर गया उसके लिये उदास मत हो। भविष्य की चिन्ता मत करो। जो बीत गया उसे भुला दो। जो आता है उसे हँसते हुए गुजारो। जो आयेगा उसके लिए विमोहित न हो। आज के दिन मजे में रहो। आज का दिन ईश्वर के लिए। आज खुश रहो। आज निर्भय रहो। यह पक्का कर दो। 'आज रोकड़ा.... काले उधार।' इसी प्रकार आज निर्भय....। आज नहीं डरते। कल तो आयेगी नहीं। जब कल नहीं आयेगी तो परसों कहाँ से आयेगी ? जब आयेगी तो आज होकर ही आयेगी।

आदमी पहले भीतर से गिरता है फिर बाहर से गिरता है। भीतर से उठता है तब बाहर से उठता है। बाहर कुछ भी हो जाय लेकिन भीतर से नहीं गिरो तो बाहर की परिस्थितियाँ तुम्हारे अनुकूल हो जायेंगी।

विघ्न, बाधाएँ, दुःख, संघर्ष, विरोध आते हैं वे तुम्हारी भीतर की शक्ति जगाने कि लिए आते है। जिस पेड़ ने आँधी-तूफान नहीं सहे उस पेड़ की जड़ें जमीन के भीतर मजबूत नहीं होंगी। जिस पेड़ ने जितने अधिक आँधी तूफान सहे और खड़ा रहा है उतनी ही उसकी नींव मजबूत है। ऐसे ही दुःख, अपमान, विरोध आयें तो ईश्वर का सहारा लेकर अपने ज्ञान की नींव मजबूत करते जाना चाहिए। दुःख, विघ्न, बाधाएँ इसलिए आती हैं कि तुम्हारे ज्ञान की जड़ें गहरी जायें। लेकिन हम लोग डर जाते है। ज्ञान के मूल को उखाड़ देते हैं।

अनुक्रम

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जागो अपनी महिमा में

स्वामी रामतीर्थ के बोलने का स्वभाव था किः "मैं बादशाह हूँ, मैं शाहों का शाह हूँ।" अमेरिका के लोगों ने पूछाः "आपके पास है तो कुछ नहीं, सिर्फ दो जोड़ी गेरूए कपड़े हैं। राज्य नहीं, सत्ता नहीं, कुछ नहीं, फिर आप शाहों के शाह कैसे ?"

रामतीर्थ ने कहाः "मेरे पास कुछ नहीं इसलिए तो मैं बादशाह हूँ। तुम मेरी आँखों में निहारो.... मेरे दिल में निहारो। मैं ही सच्चा बादशाह हूँ। बिना ताज का बादशाह हूँ। बिना वस्तुओं का बादशाह हूँ। मुझ जैसा बादशाह कहाँ ? जो चीजों का, विषयों का गुलाम है उसे तुम बादशाह कहते हो पागलों ! जो अपने आप में आनन्दित है वही तो बादशाह है। विश्व का सम्राट तुम्हारे पास से गुजर रहा है। ऐ दुनियाँदारों ! वस्तुओं का बादशाह होना तो अहंकार की निशानी है लेकिन अपने मन का बादशाह होना अपने प्रियतम की खबर पाना है। मेरी आँखों में तो निहारो ! मेरे दिल में तो गोता मार के जरा देखो ! मेरे जैसा बादशाह और कहाँ मिलेगा ? मैं अपना राज्य, अपना वैभव बिना शर्त के दिये जा रहा हूँ.... लुटाये जा रहा हूँ।"

जो स्वार्थ के लिए कुछ दे वह तो कंगाल है लेकिन जो अपना प्यारा समझकर लुटाता रहे वही तो सच्चा बादशाह है।

'मुझ बादशाह को अपने आपसे दूरी कहाँ ?'

किसी ने पूछाः "तुम बादशाह हो ?"

"हाँ...."

"तुम आत्मा हो ?"

"हाँ।"

"तुम God  हो?"

"हाँ....। इन चाँद सितारों में मेरी ही चमक है। हवाओं में मेरी ही अठखेलियाँ हैं। फूलों में मेरी ही सुगन्ध और चेतना है।"

"ये तुमने बनाये ?"

"हाँ.... जबसे बनाये हैं तब से उसी नियम से चले आ रहे हैं। यह अपना शरीर भी मैंने ही बनाया है, मैं वह बादशाह हूँ।"

जो अपने को आत्मा मानता है, अपने को बादशाहों की जगह पर नियुक्त करता है वह अपने बादशाही स्वभाव को पा लेता है। जो राग-द्वेष के चिन्तन में फँसता है वह ऐसे ही कल्पनाओं के नीचे पीसा जाता है।

मैं चैतन्यस्वरूप आत्मा हूँ। आत्मा ही तो बादशाह है.... बादशाहों का बादशाह है। सब बादशाहों को नचानेवाला जो बादशाहों का बादशाह है वह आत्मा हूँ मैं।

अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो

विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।

सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।

मुक्ति और बन्धन तन और मन को होते है। मैं तो सदा मुक्त आत्मा हूँ। अब मुझे कुछ पता चल रहा है अपने घर का। मैं अपने गाँव जाने वाली गाड़ी में बैठा तब मुझे अपने घर की शीतलता आ रही है। योगियों की गाड़ी मैं बैठा तो लगता है कि अब घर बहुत नजदीक है। भोगियों की गाड़ियों में सदियों तक घूमता रहा तो घर दूर होता जा रहा था। अपने घर में कैसे आया जाता है, मस्ती कैसे लूटी जाती है यह मैंने अब जान लिया।

मस्तों के साथ मिलकर मस्ताना हो रहा हूँ।

शाहों के साथ मिलकर शाहाना हो रहा हूँ।।

कोई काम का दीवाना, कोई दाम का दीवाना, कोई चाम का दीवाना, कोई नाम का दीवाना, लेकिन कोई कोई होता है जो राम का दीवाना होता है।

दाम दीवाना दाम न पायो। हर जन्म में दाम को छोड़कर मरता रहा। चाम दीवाना चाम न पायो, नाम दीवाना नाम न पायो लेकिन राम दीवाना राम समायो। मैं वही दीवाना हूँ।

ऐसा महसूस करो कि मैं राम का दीवाना हूँ। लोभी धन का दीवाना है, मोही परिवार का दीवाना है, अहंकारी पद का दीवाना है, विषयी विषय का दीवाना है। साधक तो राम दीवाना ही हुआ करता है। उसका चिन्तन होता है किः

चातक मीन पतंग जब पिया बन नहीं रह पाय।

साध्य को पाये बिना साधक क्यों रह जाय ?

हम अपने साध्य तक पहुँचने के लिए जेट विमान की यात्रा किये जा रहे हैं। जिन्हें पसन्द हो, इस जेट का उपयोग करें, नहीं तो लोकल ट्रेन में लटकते रहें, मौज उन्हीं की है।

यह सिद्धयोग, यह कुण्डलिनी योग, यह आत्मयोग, जेट विमान की यात्रा है, विहंग मार्ग है। बैलगाड़ीवाला चाहे पच्चीस साल से चलता हो लेकिन जेटवाला दो ही घण्टों में दरियापार की खबरें सुना देगा। हम दरियापार माने संसारपार की खबरों में पहुँच रहे हैं।

ऐ मन रूपी घोड़े ! तू और छलांग मार। ऐ नील गगन के घोड़े ! तू और उड़ान ले। आत्म-गगन  के विशाल मैदान में विहार कर। खुले विचारों में मस्ती लूट। देह के पिंजरे में कब तक छटपटाता रहेगा ? कब तक विचारों की जाल में तड़पता रहेगा ? ओ आत्मपंछी ! तू और छलांग मार। और खुले आकाश में खोल अपने पंख। निकल अण्डे से बाहर। कब तक कोचले में पड़ा रहेगा ? फोड़ इस अण्डे को। तोड़ इस देहाध्यास को। हटा इस कल्पना को। नहीं हटती तो ॐ की गदा से चकनाचूर कर दे।

अनुक्रम

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भवसागर का किनाराः वैराग्य

आत्मा परमात्मा विषयक ज्ञान प्राप्त करके नित्य आत्मा की भावना करें। अपने शाश्वत स्वरूप की भावना करें। अपने अन्तर्यामी परमात्मा में आनन्द पायें। अपने उस अखण्ड एकरस में, उस आनन्दकन्द प्रभु में, उस अद्वैत-सत्ता में अपनी चित्तवृत्ति को स्थापित करें। रूप, अवलोक, मनस्कार तथा दृश्य, दृष्टा, दर्शन ये चित्त के फुरने से होते हैं। विश्व, तैजस, प्राज्ञ, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति ये सब जिससे प्रकाशित होते हैं उस सबसे परे और सबका अधिष्ठान जो परमात्मा है उस परमात्मा में जब प्रीति होती है, तब जीव निर्वासनिक पद को प्राप्त होता है। निर्वासनिक होते ही वह ईश्वरत्व में प्रतिष्ठित होता है। फिर बाहर जो भी चेष्टा करे लेकिन भीतर से शिला की नाईं सदा शान्त है। वशिष्ठजी कहते हैं- "हे राम जी ! ऐसे ज्ञानवान पुरूष जिस पद में प्रतिष्ठित होते हैं उसी में तुम भी प्रतिष्ठित हो जाओ।"

जिसका चित्त थोड़ी-थोड़ी बातों में उद्विग्न हो जाता है, घृणा, राग, द्वेष, हिंसा या तिरस्कार से भर जाता है वह अज्ञानी है। ज्ञानी का हृदय शान्त, शीतल, अद्वैत आत्मा में प्रतिष्ठित होता है। हम लोगों ने वह प्रसंग सुना है किः

मंकी ऋषि ने खूब तप किया, तीर्थयात्रा की। उनके कषाय परिपक्व हुए अर्थात् अन्तःकरण शुद्ध हुआ। पाप जल गये। वे जा रहे थे और वशिष्ठजी के दर्शन हुए। उनके मन में था कि सामने धीवरों के पाँच-सात घर हैं। वहाँ जाकर जलपान करूँगा, वृक्ष के नीचे आराम पाऊँगा।

वशिष्ठजी ने कहाः "हे मार्ग के मीत ! अज्ञानी जो आप जलते हैं, राग-द्वेष में, हेय-उपादेय में जलते हैं उनके पास जाकर तुमको क्या शान्ति मिलेगी ? " जैसे किसी को आग लगे और पेट्रोल पंप के फुव्वारे के नीचे जाकर आग बुझाना चाहे तो वह मूर्ख है। ऐसे ही जो आपस में राग-द्वेष से जलते हैं, जो संसार की आसक्तियों से बँधे हैं, उनके संपर्क में और उनकी बातों में आकर हे जिज्ञासु ! तेरी तपन नहीं मिटेगी। तेरी तपन और राग-द्वेष और बढ़ेंगे।

हे मंकी ऋषि ! तुम ज्ञानवानों का संग करो। मैं तुम्हारे हृदय की तपन मिटा दूँगा और अकृत्रिम शान्ति दूँगा। संसार के भोगों से, संसार के सम्बन्धों से जो शान्ति मिलती है वह कृत्रिम शान्ति है। जब जीव अन्तर्मुख होता है, जब परमात्माभिमुख होता है, चित्त शान्त होता है तब जो शान्ति मिलती है वह आत्मिक शान्ति है।"

वासनावाले को अशान्ति है। वासना के अनुरूप वस्तु उसे मिलती है तो थोड़ी देर के लिए शान्ति होती है। लोभी को रूपयों से लगाव है। रूपये मिल गये तो खुशी हो गयी। भोगी को भोग मिले तो खुशी हो गयी। साधक ऐसी कृत्रिम शान्ति पाकर अपने को भाग्यवान नहीं मानता। साधक तो बाहर की चीजें मिले या न मिले फिर भी भीतर का परमात्म-पद पाकर अपना जीवन धन्य करता है। वह अकृत्रिम शान्ति प्राप्त करता है।

संसार का तट वैराग्य है। विवेक पैदा होते ही वैराग्य का जन्म होता है। जिसके जीवन में वैराग्यरूपी धन आ गया है वह धन्य है।

वशिष्ठजी कहते हैं- "हे मंकी ऋषि ! तुम संसार के तट पर आ गये हो। अब तुम मेरे वचनों के अधिकारी हो।"

ब्रह्मवेत्ता महापुरूषों के वचनों का अधिकारी वही हो सकता है जिसने विवेक और वैराग्यरूपी संपत्ति पा ली है, जिसने विवेक से संसार की असारता देख ली है, जिसने विवेक से शरीर की क्षणभंगुरता देख ली है। ऐसा विवेकप्रधान जो साधक होता है उसको वैराग्य उत्पन्न होता है। वैराग्यरूपी धन से जिसका चित्त संस्कृत हो गया है उसे आत्मज्ञान के वचन लगते हैं। जो मूढ़ हैं, पामर हैं, वे ज्ञानवानों के वचनों से उतना लाभ नहीं ले पाते जितना विवेकी और वैराग्यवान ले पाता है।

मंकी ऋषि विवेक-वैराग्य से संपन्न थे। वशिष्ठजी का दर्शन करके उनको अकृत्रिम शान्ति का एहसास हुआ। वे कहने लगेः

"भगवन् ! आप सशरीर दिख पड़ते हो लेकिन आकाश की नाईं शून्य रूप हो। आप चेष्टा करते दिख पड़ते हो लेकिन आप चेष्टा से रहित हो। आप साकार दिखाई देते हो लेकिन आप अनंत ब्रह्माण्डों में फैले हुए निराकार तत्त्व हो। हे मुनिशार्दूल ! आपके दर्शन से चित्त में प्रसन्नता छा जाती है और आकर्षण पैदा होता है। वह आकर्षण निर्दोष आकर्षण है। संसारियों की मुलाकात से चित्त में क्षोभ पैदा होता है। सूर्य का तेज होता है वह तपाता है जबकि आपका तेज हृदय में परम शान्ति देता है। विषयों का और संसारी लोगों का आकर्षण चित्त में क्षोभ पैदा करता है और आप जैसे ज्ञानवान का आकर्षण चित्त में शान्ति पैदा करता है जबकि ज्ञानी का आकर्षण परमात्मा के गीत गुँजाता है, भीतर की शान्ति देता है आनन्द देता है, परमात्मा के प्रसाद से हृदय को भर देता है।

हे मुनीश्वर ! आपका तेज हृदय की तपन को मिटाता है। आपका आकर्षण भोगों के आकर्षण से बचाता है। आपका संग परमात्मा का संग करानेवाला है। अज्ञानियों का संग दुःखों और पापों का संग कराने वाला है। जो घड़ियाँ ज्ञानी की निगाहों में बीत गई, जो घड़ियाँ परमात्मा के ध्यान में बीत गईं, जो घड़ियाँ मौन में बीत गईं, जो घड़ियाँ परमात्मा के प्रसाद में बीत गईं वे अकृत्रिम शान्ति की घड़ियाँ हैं, वे घड़ियाँ जीवन की बहुमूल्य घड़ियाँ हैं।

हे मुनिशार्दूल ! आप कौन हैं ? यदि मुझसे पूछते हो तो मैं माण्डव्य ऋषि के कुल में उत्पन्न हुआ मंकी नामक ब्राह्मण हूँ। संसार की नश्वरता देखकर, संसार के जीवों को हेय और उपादेय, ग्रहण और त्याग (छोड़ना-पकड़ना) से जलते देखकर मैं सत्य को खोजने गया। कई तीर्थों में गया, कितने ही जप-तप किये, कई व्रत और नियम किये फिर भी हृदय की तपन न मिटी।

जप, तप, व्रत और तीर्थ से पाप दूर होते हैं, कषाय परिपक्व होते हैं। कषाय परिपक्व हुए, पाप दूर हुए तो ज्ञानी का संग होते ही अकृत्रिम शान्ति मिलने लगती है, आनन्द आने लगता, मौन में प्रवेश होने लगता है। साधक अलख पुरूष में जगने के योग्य होता है।

मंकी ऋषि वशिष्ठजी का संग पाकर अकृत्रिम शांति को प्राप्त हुए, भीतर के प्रसाद को उपलब्ध हुए, परमात्मा-विश्रान्ति पायी। परमात्म-विश्रान्ति से बढ़कर जगत में और कोई सुख नहीं और कोई धन नहीं और कोई साम्राज्य नहीं।

वे घड़ियाँ धन्य हैं जिन घड़ियों में परमात्मा की प्रीति, परमात्मा का चिन्तन और परमात्मा का ध्यान होता है।

प्रतिदिन अपने अन्तःकरण का निर्माण करना चाहिए। अपने अन्तःकरण में परमात्मा का ज्ञान भरकर उसका चिन्तन करने से अन्तःकरण का निर्माण होता है। अज्ञान से, अज्ञानियों के संग से, अज्ञानियों की बातों से अन्तःकरण में अविद्या का निर्माण होता है और जीव दुःख का भागी बनता है।

चित्त में और व्यवहार में जितनी चंचलता होगी, जितनी अज्ञानियों के बीच घुसफुस होगी, जितनी बातचीत होगी उतना अज्ञान बढ़ेगा। जितनी आत्मचर्चा होगी, जितना त्याग होगा, दूसरों के दोष देखने के बजाय गुण देखने की प्रवृत्ति होगी उतना अपने जीवन का कल्याण होगा।

अगर हम अपने जीवन की मीमांसा करके जानना चाहें कि हमारा भविष्य अन्धकारमय है कि प्रकाशमय है, तो हम जान सकते हैं, देख सकते हैं। किसी व्यक्ति को देखते हैं, उससे व्यवहार करते हैं तब उसके दोष दिखते हैं तो समझो हमारा जीवन अन्धकारमय है। कोई कितना भी हमारे साथ अनुचित व्यवहार करता है फिर भी हमें अपना दोष दिखे और उसके गुण दिखें तो समझ लेना कि हमारा भविष्य उज्जवल है। इससे भी उज्जवल जीवन वह है जिसमें न गुण दिखें न दोष दिखें, संसार स्वप्न जैसा भासने लगे। संसार को स्वप्न-सा देखने वाला अपना आपा परमात्मा में विश्राम पावे, ऐसी प्यास पैदा हो जाय तो समझ लेना कि भविष्य बड़ा सुहावना है, बड़ा मंगलकारी है। इस बात पर बार-बार ध्यान दिया जाय।

देवताओं में चर्चा चली कि इस समय पृथ्वी पर सबसे श्रेष्ठ पुरूष कौन है ? सर्वगुण-सम्पन्न कौन है ? प्राणी मात्र में गुण देखनेवाला कौन है ? सर्वश्रेष्ठ व्यक्तित्व रखने वाला कौन है ?

इन्द्र ने कहा किः "इस समय पृथ्वी पर ऐसे परम श्रेष्ठ पुरूष श्रीकृष्ण हैं। उनको किसी के दोष नहीं दिखते अपितु गुण ही दिखते हैं। वे प्राणी मात्र का हित चाहते हैं। उनके मन में किसी के प्रति वैर नहीं। श्रीकृष्ण जैसा अदभुत व्यक्तित्व, श्रीकृष्ण जैसा गुणग्राहीपन इस समय पृथ्वी पर और किसी के पास नहीं है।" इस प्रकार इन्द्र ने श्रीकृष्ण की दृष्टि का, उनके व्यक्तित्व का खूब आदर से वर्णन किया।

एक देव को कुतूहल हुआ कि श्रीकृष्ण किस प्रकार अनंत दोषों में भी गुण ढूँढ निकालते हैं ! वह देवता पृथ्वी पर आया और जहाँ से श्रीकृष्ण ग्वालों के साथ गुजरने वाले थे उस रास्ते में बीमार रोगी कुत्ता होकर भूमि पर पड़ गया। पीड़ा से कराहने लगा। चमड़ी पर घाव थे। मक्खियाँ भिनभिना रहीं थीं। मुँह फटा रह गया था। दुर्गन्ध आ रही थी। उसे देखकर ग्वालों ने कहाः "छिः छिः ! यह कुत्ता कितना अभागा है ! इसके कितने पाप हैं जो दुःख भोग रहा है !''

श्रीकृष्ण ने कहाः "देखो, इसके दाँत कितने अच्छे चमकदार हैं ! यह इसके पुण्यों का फल है।"

ऐसे ही दुःख-दर्द में, रोग में, परेशानी में, विद्रोह में और अशांति के मौके पर भी जिसमें गुण और परम शान्त परमात्मा देखने की उत्सुकता है, जिसके पास ऐसी विधायक निगाहें हैं वह आदमी ठीक निर्णायक होता है, ठीक विचारक होता है। लेकिन जो किसी पर दोषारोपण करता है, भोगियों की हाँ मैं हाँ मिलता है, ज्ञानवानों की बातों पर ध्यान नहीं देता, संसार में आसक्ति करता है, अपने हठ और दुराग्रह को नहीं छोड़ता उस आदमी का भविष्य अन्धकारमय हो जाता है।

शास्त्र ने कहाः बुद्धेः फलं अनाग्रहः। बुद्धि का फल क्या है ? बुद्धि का फल है भोगों में और संसार की घटनाओं में आग्रह नहीं रहना। बड़ा सिद्ध हो, त्रिकाल ज्ञानी हो लेकिन हेय और उपादेय बुद्धि हो तो वह तुच्छ है।

हेय और उपादेय बुद्धि क्या है ? हेय माने त्याज्य। उपादेय माने ग्राह्य। जब जगत ही मिथ्या है तो उसमें 'यह पाना है, यह छोड़ना है, यह करना है, यह नहीं करना है....' ऐसी बुद्धि जब तक बनी रहेगी तब तक वह बुद्धि अकृत्रिम शान्ति में टिकेगी नहीं। अकृत्रिम शान्ति में टिकने के लिए हेयोपादेय बुद्धि का त्याग करना पड़ता है। त्याज्य और ग्राह्य की पकड़ न हो।

फूल खिला है। ठीक है, देख लिया। बुलबुल गीत गा रही है। ठीक है, सुन लिया। लेकिन 'कल भी फूल खिला हुआ रहे, बुलबुल गाती हुई सुनाई पड़े, रोटी ऐसी ही मिलती रहे, फलाना आदमी ऐसा ही व्यवहार करे, फलानी घटना ऐसी ही घटे.....' ऐसा आग्रह नहीं। जब जगत ही मिथ्या है तो उसकी घटनाएँ कैसे सत्य हो सकती है। जब घटनाएँ ही सत्य नहीं तो उसके परिणाम कैसे सत्य हो सकते हैं। जो भी परिणाम आयेंगे वे बदलते जायेंगे। ऐसी ज्ञान-दृष्टि जिसने पा ली, गुरूओं के ज्ञानयुक्त वचनों को जिसने पकड़ लिया, वह साधक भीतर की यात्रा में सफल हो जाता है।

ब्रह्मवेत्ता की अध्यात्म-विद्या बरसती रहे लेकिन साधक में अगर विवेक-वैराग्य नहीं है तो उतना लाभ नहीं होता। बरसात सड़कों पर बरसती रहे तो न खेती होती है न हरियाली होती है। ऐसे ही जिनका चित्त दोषों से, अहंकार से, भोगों से कठोर हो गया है उन पर संतों के वचन इतनी हरियाली नहीं पैदा करते। जिनक चित्त विवेक-वैराग्य से जीता गया है उनको ज्ञानी संतों के दो वचन भी, घड़ीभर की मुलाकात भी हृदय में बड़ी शान्ति प्रदान करती है।

मंकी ऋषि का हृदय विवेक वैराग्य से जीता हुआ था। वशिष्ठजी की मुलाकात  होते ही उनके चित्त में अकृत्रिम शान्ति, आनन्द आने लगा। जितनी घड़ियाँ चित्त शान्त होता है उतनी घड़ियाँ महातप होता है। चित्त की विश्रान्ति बहुत ऊँची चीज है। हेयोपादेय बुद्धिवाले को चित्त की विश्रान्ति नहीं मिलती। 'यह छोड़ कर वहाँ जाऊँ और सुखी होऊँ...' यह हेय-उपादेय बुद्धि है। जो जहाँ है वहीं रहकर हेयोपादेय बुद्धि छोड़कर भीतर की यात्रा करता है तो वह ऊँचे पद को पाता है। जो छोड़ने पकड़ने में लगा है तो वह वैकुण्ठ में जाने के बाद भी शान्ति नहीं पाता।

इसलिये हेयपादेय बुद्धि छोड़ दें। जिस समय जो फर्ज पड़े, जिस समय गुरू और शास्त्र के संकेत के अनुसार जो कर्त्तव्य करने का हो वह यंत्र की पतली की नाईं कर लिया लेकिन दूसरे ही क्षण अपने को कर्त्ता-धर्त्ता न मानें। जैसे मिट्टी में बैठते हैं, फिर कपड़े झाड़ कर चल देते हैं, इसी प्रकार व्यवहार करके सब छोड़ दो। कर्तृत्त्व चित्त  में न आ जाय। कर्तृत्त्वभव और भोक्तृत्वभाव अगर है तो समाधि होने के बाद भी पतन की कोई संभावना नहीं। अष्टावक्र मुनि कहते हैं-

अकर्तृत्वं अभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा।

तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः।।

"जब पुरूष अपने आत्मा के अकर्त्तापने को और अभोक्तापन को मानता है तब उसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्तियाँ करके नाश होती हैं।"

चित्त में जब अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व कि निष्ठा जमने लगती है तो वासनाएँ क्षीण होने लगती हैं। फिर वह ज्ञानी यंत्र की पुतली की नाईं चेष्टा करता है।

अनुक्रम

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आत्म-अवगाहन

तुम्हारी जितनी घड़ियाँ परमात्मा के ध्यान में बीत जायें वे सार्थक हैं। जितनी देर मौन हो जायें वह कल्याणप्रद है। श्वास की गति जितनी देर धीमी हो जाय वह हितावह है, मंगलकारी है।

बैठते वक्त हमारा श्वास नासिका से बारह उंगल तक बाहर जाता है, चलते समय अठारह, सोते समय चौबीस उंगल तक श्वास का फुफकार जाता है और मैथुन के समय तीस उंगल तक श्वास की ऊर्जा खत्म होती है। बैठने की अपेक्षा ध्यान में श्वास बहुत कम खर्च होती है। इससे मन भी शान्त होता है, आयुष्य भी बढ़ता है। कुछ श्वास कम खर्च होने के कारण मानसिक व बौद्धिक थकान भी उतरती है।

जितनी देर हो सके उतनी देर शान्त बैठे रहो। तुम्हारे श्वास की गति मन्द होती चली जायेगी, सत्त्वगुण बढ़ता जायगा। संकल्प फलित होने लगेंगे। ध्यान करते-करते श्वास की लंबाई कम हो  जाय, बारह उंगल के बदले दस उंगल हो जाय तो तुम्हें दादुरी आदि सिद्धियाँ प्राप्त होने लगती हैं, नौ उंगल तक श्वास चलने लगे तो थोड़ा-सा ही निहारने मात्र से शास्त्रों के रहस्य समझने लग जाओगे। आठ उंगल तक श्वास की लम्बाई रह जाय तो तुम देवताओं की मसलत को जानने लग जाओगे। दूसरों के चित्त को पढ़ लो ऐसी योग्यता निखरने लगती है।

पाँच-छः उंगल तक फुफकार पहुँचे ऐसा श्वास बन जाय तो तुम्हारा चित्त खूब शान्ति और आनन्द का अनुभव करने लगेगा। तुम्हारे शरीर के वायब्रेशन सत्त्वप्रधान होने लगेंगे। श्वास की गति चार उंगल तक आ जाय तो अनुपम ओज की प्राप्ति होती है। तीन या दो उंगल तक श्वास की लंबाई आ जाय तो सविकल्प समाधि लग सकती है। एक उंगल तक श्वास आ जाय तो आनन्दानुगत समाधि की उपलब्धि हो जाती है। अगर श्वास भीतर ही थम जाय तो केवली कुम्भक की उच्च दशा, निर्विकल्प समाधि तक प्राप्त हो जाती है। तब साधना करने वाला साधक नहीं बचता। वह सिद्ध हो जाता है।

ध्यान करते वक्त देखने में तो तुम चुप बैठे हो लेकिन भीतर बहुत कुछ यात्रा कर रहे हो। बाहर से नासमझ लोग बोलेंगे कि यह कुछ नहीं कर रहा है लेकिन आपके द्वारा वास्तव में बहुत कुछ बढ़िया हो रहा है। वर्षों तक मजदूरी करके, बाहर का अथक परिश्रम करके जो न कमा सके हो वह इन ध्यान के क्षणों में कमा लेते हो। युगों तक जन्मते-मरते आये हो लेकिन उस सत्यस्वरूप परमात्मा के करीब नहीं जा पाये हो। वहाँ अब बैठे-बैठे मौन और ध्यान के क्षणों में जा रहे हो। चुपचाप बैठे-बैठे तुम्हारा मन उस आनन्द के सागर परमात्मा के करीब जा रहा है।

ध्यानावस्थित तद् गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनः।

येषां तं न विदुः सुरासुरगणाः देवाय तस्मै नमः।।

ध्यान करते समय श्वासोच्छवास की गति को निहारते जाओ। दृढ़ संकल्प दोहराते जाओ कि मेरा चित्त परमात्मा में शान्त हो रहा है। मेरे चित्त की चंचलता मिट रही है। पाप और संताप मिट रहे हैं। कर्मों के कुसंस्कार परमात्मा के पवित्र ध्यान में धुल रहे हैं। मेरे दिल की चुनरिया रंगी जा रही है परमात्मा के रंग से।

मेरे साहेब है रंगरेज चुनरी मोरी रंग डारी।

धोए से छूटे नहीं दिन दिन होत सुरंग।।

दो भौहों के बीच आज्ञाचक्र में ध्यान करते जाओ। वहाँ अपने इष्ट देवी-देवता या किसी प्रिय पीर, फकीर अथवा प्यारे सदगुरू के विग्रह के ध्यान करो।  ॐकार की रक्तवर्णी आकृति का भी ध्यान कर सकते हो।

आज्ञाचक्र में धारणा करने से बहुत सारी शक्तियों का विकास होता है। ज्ञान का अथाह खजाना खुलने की कुँजी वहाँ छुपी है। वहाँ ध्यान करते हुए ॐकार का दीर्घ स्वर से गुंजन करते जाओ। पूरी निर्भयता और साहस को अपने रोम-रोम में भर जाने दो। चिन्ता, भय, शोक, अशान्ति की कल्पनाओं को ॐकार की पवित्र गदा से भगा दो।

"ऐ भय ! ऐ चिन्ता ! ऐ परेशानी ! दूर हटो। अब हमें आत्म-खजाना मिल रहा है। ॐकार की पवित्र गदा हमारे हाथ में है। ऐ चिन्ताएँ ! तुम्हें हम चकनाचूर कर देंगे। ॐ....

ऐ दुर्बल विचार ! ऐ दुर्बल चित्त ! तुझमें ॐकार का सामर्थ्य भरा जा रहा है। अब दुर्बलता छोड़। ॐ.....

ओ नकारात्मक विचार ! ओ असफलता की कल्पनाएँ !  दूर हटो। अनन्त ब्रह्माण्डों का स्वामी परमात्मा हमारे साथ और हम भयभीत ? ईश्वर की असीम शक्तियाँ हमसे जुड़ी हुई और हम चिन्तित ? नहीं...कभी नहीं। ॐ....ॐ....ॐ....ॐ.....ॐ.....

ऐ चिन्ताएँ ! ऐ दुर्बल विचार ! दूर हटो। हम पवित्र ॐकार की गदा लेकर तुम्हें कुचल डालेंगे। हमारे साथ जगतनियन्ता परमात्मा..... हमारे हृदय में सर्वशक्तिमान ईश्वर और ऐ दुर्बल विचार ! तू हमें दुर्बल किये जा रहा है ? ॐ.....ॐ.....

भय, शोक, चिन्ता को जरा भी स्थान नहीं। सदैव तुम्हारे चित्त में परमात्मा की शक्ति मौजूद है। अपना चित्त प्रसन्न रखो। फिर तुमसे पवित्र कार्य अपने आप होने लगेंगे। अपने चित्त को परमात्मा के साथ जोड़ा करो। फिर तुम जो भी करोगे वह परमात्मा की पूजा हो जायेगी। वासनाओं को दूर फेंक दो। चिन्ताओं और निर्बलताओं को दूर भगा दो। उस प्रेमास्पद परमात्मा में अपने चित्त को परितृप्त होने दो। ॐआनंद..... ॐआनन्द.... ॐ......ॐ....ॐ......

मैं छूई मूई का पेड़ नहीं,

जो छूने से मुरझा जाता है।

मैं वो माई का लाल नहीं,

जो हौवा से डर जाता है।।

भय ! आकांक्षा ! घृणा ! चिन्ता ! तुम दूर हटो। हे हिंसा ! तू दूर हट। मुझे प्रेम के पवित्र सिंहासन पर विराजमान होने दे। ऐ संसार की आसक्ति ! अब दूर हट। हम अपने आत्मभाव में जग जा रहे हैं। ॐ....ॐ......ॐ.......

बल ही जीवन है। दुर्बलता ही मौत है। दुर्बल विचारों को दूर हटाते जाओ। आत्मबल.... आज का प्रभात आत्मप्रकाश का प्रभात हो रहा है। ॐ....ॐ.....ॐ.....

ऐ चित्त की चंचलता और मन की मलिनता ! अब तू ॐकार के पावन प्रकाश के आगे क्या टिकेगी ? ॐ.....ॐ....ॐ.....

निर्भयता.....निश्चिंतता.... निष्फिकरता..... बेपरवाही..... पूरी खुदाई....जय जय....।

जब तक नहीं जाना था तब तक ईश्वर था और जब जाना तो मेरे...आत्मा का ही वह नाम था।

ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे ना शेष।

मोह कभी ना ठग सके इच्छा नहीं लवलेश।।

नश्वर दुनियाँ की क्या इच्छा करना ? अपने राम में मस्त। ॐ.....ॐ.....ॐ.....

बरस रही है भगवान की कृपा। बरस रही है ईश्वर की अमीदृष्टि, खुदाई नूर। तुम्हारा रोम-रोम आत्मबल से जगता जाय। ॐ.....ॐ.......ॐ.....

भावना करो कि हवाई जहाज की नाईं शरीर में शक्ति ऊपर उठ रही है। आप चिदाकाश की ओर ऊपर उठ रहे हैं। नासमझी के कारण भय, शोक और चिन्ताओं ने हमारे मन को घेर रखा था। हम मन के भी दृष्टा और सृष्टा हैं। हम इन्द्रियों और मन के स्वामी हैं। हम देह  में रहते हुए भी विदेही आत्मा हैं। हम चैतन्य हैं। जो कबीर में गुनगुनाया था, जो श्रीकृष्ण में मुस्कराया था, जो रामदास में चमका था, जो रामकृष्ण में ध्यान का रस टपका रहा था वही आत्मा हमारे पास है। नहीं.... नहीं... वही आत्मा हम हैं। ॐ......ॐ.....ॐ......

ऐ इन्सान ! राहनुमा गुरूलोग तुझे अपनी असलियत में जगाते हैं, तू इन्कार मत करना। वे तुझे अपनी महिमा में जगाते हैं, तू सन्देह मत कर, भय और चिन्ता मत कर। ॐ.....ॐ......ॐ.....

जीवन की सुषुप्त शक्तियाँ जग रही हैं। जीवन का अधोगमन बदलकर ऊर्ध्वगमन हो रहा है। हम ऊपर की ओर उठ रहे हैं। हमारा तन और मन आत्मिक बल से सराबोर हो रहा है। आज के पावन पर्व पर आत्मस्वरूप में जगने का संकल्प करेंगे। तुम्हारे में अथाह संकल्प का साम्राज्य है। ईश्वर की अदभुत संकल्प की सामर्थ्यलीला तुम्हारे में छुपी हुई है। तुम उसे जगने दो। कभी दुर्बल विचार मत आने दो, कभी नकारात्मक विचार मत आने दो। ॐ......ॐ......ॐ......

जब तक देहाभिमान की नालियों में पड़े रहोगे तब तक चिन्ताओं के बन्डल तुम्हारे सिर पर लदे रहेंगे। तुम्हारा अवतार चिन्ताओं के जाल में फँस मरने के लिए नहीं हुआ है। तुम्हारा जन्म संसार की मजदूरी करने के लिए नहीं हुआ है, हरि का प्यारा होने के लिए हुआ है। हरि को भजे सो हरि का होय। ख्वामखाह चाचा मिटकर भतीजा हो रहे हो ? दुर्बल विचारों और कल्पनाओं की जाल में बँध रहे हो ? कब तक ऐसी नादानी करते रहोगे तुम ? ॐ..ॐ...ॐ...

विद्युतशक्ति, गुरूत्वाकर्षण की शक्ति, इलेक्ट्रानिक्स की शक्ति तथा अन्य कई शक्तियाँ दुनियाँ में सुनी गई हैं लेकिन आत्मशक्ति के आगे ये शक्तियाँ कुछ नहीं। वह आत्मशक्ति हम हैं। ॐ.....ॐ......ॐ.......

अपने दिल में आत्म-सन्देह, असंभावना या विपरीत भावना होने के कारण हम उस हक से जुदा हो गये हैं।

तीन प्रकार के आवरण होते हैं। असत्त्वापादक आवरण, अभानापादक आवरण और अनानन्दापादक आवरण।

असत्त्वापादक आवरण शास्त्र के श्रवण से दूर होता है। अभानापादक आवरण मनन से दूर होता है। अनानन्दापादक आवरण आत्सस्वरूप में गोता लगाने से दूर हो जाता है। ॐ....ॐ.....ॐ.....

बल.... हिम्मत.....शक्ति....। गिड़गिड़ाना नहीं है, बलवान होना है। ॐ....ॐ.....ॐ......

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मानसिक ढंग से ॐकार का जप करते जाओ। ॐकार की आनन्ददायी शान्ति में खोते जाओ। भ्रूमध्य में सर्वपातक-नाशक, आत्मबल-वर्धक, आत्मज्ञान का प्रकाश करने वाले ॐ का ध्यान करते जाओ। भावना से भ्रूमध्य के गगनपट पर लाल रंग के ॐकार को अंकित कर दो। आन्तर मन में ॐकार का गूंजन होता जाये।

खूब शान्ति में डूबते जाओ। अपने शान्त स्वभाव में ब्रह्मभाव में परमात्म-स्वभाव में, परितृप्ति स्वभाव में शान्त होते जाओ। अनुभव करते जाओ किः सर्वोऽहम.... शिवोऽहम्... आत्मस्वरूपोऽहम्... चैतन्यऽहम्...। मैं चैतन्य हूँ। मैं सर्वत्र हूँ। मैं सबमें हूँ। मैं परिपूर्ण हूँ। मैं शांत हूँ। ॐ......ॐ......ॐ.......

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साधक को अपने दोष दिखने लग जाय तो समझो  उसके दोष दूर हो रहे हैं। दोष अपने आप में होते तो नहीं दिखते। अपने से पृथक हैं इसलिए दिख रहे हैं। जो भी दोष तुम्हारे जीवन में हो गये हों उनको आप अपने से दूर देखो। ॐ की गदा से उनको कुचल डालो। आत्मशान्ति के प्रवाह में उन्हें डुबा दो।

ॐ का गुंजन भीतर होता जाय अथवा ॐ शान्ति... ॐ शान्ति.... शान्ति..... शान्ति..... ऐसा मानसिक जप करते हुए आत्मा में विश्रान्ति पाते जाओ।

ॐ के अर्थ का चिन्तन करो। इससे मनोराज, निद्रा, तन्द्रा, रासास्वाद आदि विघ्नों से बच जाओगे।

आत्मशान्ति में चित्त को डुबाते जाओ। चित्त की विश्रान्ति सामर्थ्य की जननी है। चित्त की विश्रान्ति अपने स्वरूप की खबर देने वाली है। चित्त की विश्रान्ति सदियों से भटकते हुए जीव को अपने शिव-स्वभाव में जगा देती है। हजार तीर्थों में जाने से, हजारों हवन करने से, हजार व्रत रखने से वह पद नहीं मिलता जो चित्त की विश्रान्ति से मिलता है।

उपदेश व सत्संग सुनने का, ध्यान करने का फल यही है कि सुने हुए सत्यस्वरूप परमात्मा के करीब ले जाने वाले वचन ध्यान के द्वारा दृढ़ होते जायें। सुनी हुई आत्मा-परमात्मा की महिमा ध्यान के द्वारा अनुभव में आने लग जाय। सुना हुआ सत्संग केवल सुनाने वाले का ही न रहे, वह हमारा भी हो जाय। यही तो ध्यान का प्रयोजन है।

मैं कितना शान्तस्वरूप था, मुझे पता न था। मैं कितना प्रेमस्वरूप था, मुझे पता न था।

स्वर्ग के देवों को कुछ पाने के लिए कर्म करना है तो उन्हें पृथ्वी पर आना पड़ता है। यह कर्मभूमि है। सब कर्मों का जो सार है उसे सारभूत मोक्षमार्ग में हम लगे हैं। सारे कर्म-धर्मों का अर्क है आत्मशान्ति। हम उस परमानन्द पद की यात्रा में संलग्न हो रहे हैं। ध्यान का एक-एक क्षण अदभुत पुण्य अर्जित करा रही है, परमात्मा में डूबने का सुअवसर दे रही है।

अपने इष्ट को, अपने पुण्यों को धन्यवाद दो। ॐ....ॐ.....ॐ.....

जो बुद्धिमान हैं वे जानते हैं कि कब बोलना, कितना बोलना। प्रज्ञावान लोग शान्ति और आनन्द के लिए बोलते हैं, प्रेम और प्रसाद के लिए बोलते हैं। प्रेम तो केवल परमात्मा में हो सकता है और प्रसाद केवल उसी का वास्तविक प्रसाद है जिससे सब दुःख निवृत्त हो जाते हैं।

दृढ़ भावना करो किः "मैं सब हूँ। विशाल आकाश की नाईं सर्वव्यापक हो रहा है। मैं चिदाकाश-स्वरूप हूँ। सूर्य और चाँद मुझमें लटक रहे हैं। मैं चिदाकाश स्वरूप हूँ। सूर्य और चाँद मुझमें लटक रहे हैं। सब तारे मुझमें टिमटिमा रहे हैं इतना मैं विशाल हूँ। कई राजा-महाराजा इस आकाशस्वरूप चैतन्य में आ-आकर चले गये। मैं वह आकाश हूँ। मैं सर्वव्यापक हूँ। मैं कोई परिस्थिति नहीं हूँ लेकिन सब परिस्थितियों को पहचाननेवाला आधारस्वरूप आत्मा हूँ। आनन्द और शान्ति मेरा अपना स्वभाव है।

इस प्रकार अपनी वृत्ति को विशाल... विशाल गगनगामी होने दो।

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

अपने दिल में ॐका, परम पावन बीजमंत्र का, अत्यंत पवित्र परमात्मस्वरूप का ध्यान करते हुए हृदय को परम चैतन्य अवस्था से, शीतल आनन्द से परिपूर्ण करते जाओ। जैसे किसी कोठरी में प्रकाश फैल जाता है ऐसे ही हृदय में चिदाकाश-स्वरूप चिदघन परमात्मा-स्वरूप ॐ का चिन्तन करते ही हृदय निर्मल चिदाकाशवत् स्वच्छ हो रहा है।

दिल में शान्ति व प्रसन्नता व्याप्त हो रही है ऐसी दृढ़ भावना के साथ आत्म-शान्ति में..... आत्मानंद में डूबते जाओ... अदभुत ईश्वरीय आह्लाद को भीतर भरते जाओ। वाह.... वाह.... !

चिदानंदरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।

प्रेमस्वरूप परमात्म-रस में हृदय परितृप्ति का अनुभव करता जाय। ध्यान नहीं करना। अपने आनन्दमय स्वभाव को याद करके जग जाना है, स्वस्थ हो जाना है।

मैं आनन्दस्वरूप, सुखस्वरू, चैतन्यस्वरूप अपने स्वभाव में जग रहा हूँ। वाह वाह....! मेरा स्वभाव ही प्रसन्नतापूर्ण है। अन्तःकरण जब मेरा चिन्तन करता है तब प्रसन्न होता है। अन्तःकरण जब मेरे करीब आता है तब आनन्दित होता है। आनन्दो ब्रह्म। ब्रह्मेति परमात्मनः। आनन्द ही ब्रह्म है। कीर्तन के द्वारा आनन्द आये, योग के द्वारा आनन्द आये, विद्या के द्वारा आनन्द आये, ज्ञान के द्वारा आनन्द आये। ये सब मेरे ही स्वरूप हैं।

हृदय जब मेरे करीब होता है, मेरे चिन्तन में होता है तो मैं उसे आनन्द से भर देता हूँ। हृदय जब अन्य विषयों की ओर जाता है तब मैं सर्वव्यापक आनन्दस्वरूप होते हुए भी वह आनन्द नहीं ले पाता। ॐ.....ॐ......ॐ.....

मुझमें राग कहाँ ? मुझमें द्वेष कहाँ ? मुझमें कर्त्तापन कहाँ ? मुझमें भोक्तापन कहाँ ? मुझमें नात और जात कहाँ ? ये सब मन की कल्पनाएँ थी। मनीराम का खिलवाड़ था। मन का बुना हुआ जाल था। अपने आत्म-सिंहासन पर बैठकर निहारता हूँ तो मन के जाल का कोई प्रभाव नहीं है, मन की कोई सत्ता नहीं है। मेरी सत्ता लेकर मन जाल बुन रहा था। मेरी दृष्टि उस पर पड़ते ही वह शर्मा गया। जाल बुनना छोड़ दिया। ॐ.....ॐ......ॐ.....

चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्. शिवोऽहम्।

पूर्णोऽहम्.... परमानन्दस्वरूपोऽहम्।।

रोम-रोम पावन हो रहा है मेरे अपने स्वभाव से। यह शरीर भी पावन हो रहा है मेरे चिदानन्द स्वभाव से। इस शरीर से छूकर जो हवाएँ जाती हैं वे भी पवित्रता, शीतलता, प्रेम और आनन्द टपका रही हैं।

मैं आत्मा था, मैं चैतन्य था, मैं प्रेम स्वरूप था, मैं आनन्दस्वरूप था लेकिन संकल्प विकल्पों ने मुझे ढक रखा था। अब वे कुछ स्थगित हुए हैं तो परितृप्ति का अनुभव हो रहा है। मैं तो पहले से ही ऐसा था।

हीरा धूल में ढक गया था तब भी वैसा ही चमकदार था लेकिन लोगों को दिखता नहीं था। मैंने मन को, बुद्धि को, इन्द्रियों को, तन को पवित्र किया, प्रकाशित किया तब वे आनन्द को प्राप्त हुए। मैं तो उसके पहले भी ऐसा ही आनन्दस्वरूप था। वाह.... वाह.... !

चित्त की चंचलता होगी तब मेरा यह आनन्दस्वभाव चित्त से छुप जायगा, तब भी मैं होऊँगा वैसा ही।

मैं बोधस्वरूप हूँ। मैं जब जानने वाला चैतन्य चिदात्मा हूँ। स्वप्न की तरंगे आयी और विलय हो गई, जाग्रत के विचार व कर्म आये और बदल गये लेकिन मैं अबदल आत्मा हूँ। बचपन आया और बदल गया, मैं अबदल आत्मा हूँ। किशोरावस्था आयी और बदल गई, लेकिन मैं अबदल आत्मा वही का वही। युवावस्था आ रही है और जा रही है लेकिन मैं वही का वही। वृद्धावस्था आयेगी और जायेगी लेकिन मैं वही का वही। मैं दृष्टा मात्र चिदघन चैतन्य हूँ। ॐ.... ॐ..... ॐ.....

मैं प्रसन्न, आनन्दस्वरूप चैतन्य हूँ। नाहक दुःखद विचार करके, विरोधी विचार करके मैंने अपने स्वरूप पर विचारों की मलिन चद्दर ढक दी थी। अब ॐकार की, उस अद्वैत आनन्दस्वरूप परमात्मा की एक सुहावनी लहर द्वारा मैंने उस कल्पनाओं की चद्दर को हटाया तो मैं अपने आप में परितृप्त हो रहा हूँ। योगानन्द का अमृत, योग के द्वारा आत्मानन्द का अमृत मेरे हृदय में भरा जा रहा है।

चिन्ता, भय, विकार, मोह, माया इनको मैं जानता ही नहीं हूँ। ये सब तो मेरा मदोन्मत्त मनरूपी वजीर जानता होगा।

कैसा आनन्द ! कौन किससे कहे ! मानो, गूँगे ने गुड़ खाया।

ध्यान करने की चालाकी छोड़ दो। सत्संग में बैठने के बाद सयानापन छोड़ दो। इस मनुभाई (मन) को ध्यान करने की बहुत इच्छा होती है। वह चालाक बनता है कि 'मैं ध्यान करूँ।' अरे मनुभाई ! तू चुप हो जा। बैठा रह अपनी जगह।

अब ध्यान करेंगे तो मन अड़चन डालेगा। गाड़ी में बैठने के बाद अपनी गठरियाँ सिर पर उठाने जैसा होगा। अब तो सदगुरू कृपा की मोक्षगाड़ी में बैठ गये तो आराम फरमाओ ! ब्रह्मानन्द की गाड़ी अपने आप ले  जा रही है।

आनन्द और शान्ति मेरा स्वभाव था, मुझे पता न था। प्रेम और प्रसन्नता मेरा जन्मसिद्ध स्वभाव था लेकिन कल्पनाओं ने, नादानी के विचारों ने ढक रखा था मेरे स्वभाव को। अब सन्तों के, शास्त्रों के, सदगुरू के वचनों से नादानी छूट गई। ॐकार की झाड़ू से, कुछ अहोभाव के धक्के से, कुछ श्रद्धा से विचारों की पर्तें हट गईं, कचरा साफ हो गया। तत्त्ववस्तु ज्यों की त्यों दिखने लगी, आनन्द छलकने लगा। अब खुली आँखों से मैं सर्वत्र अपने को निहार सकता हूँ। 'सब में एक, एक में सब' का अनुभव कर सकता हूँ। खुली आँखों से भी मैं मस्ती में रह सकता हूँ। अपने स्वभाव में परितृप्त हो सकता है। ॐ.....ॐ......ॐ.....

मेरी सुनी हुई सब कथाएँ फल गई। मेरे किये हुए सब जब-तप फलित हो गये। मेरी सेवा और पुण्य फलित हो रहे हैं। देहाभिमान का कचरा हटता जा रहा है और आत्मस्वभाव का नशा चढ़ा जा रहा है।

अब कुछ करने का संकल्प उठे तो ॐ की झाड़ू से उसे हटा दो। मकान बनवाना है.... दवाखाना खोलना है..... धन्धा करना है.... दूर हटो ये सब संकल्प। ये सब झील की सतह पर काई है। एक हाथ यूँ मारा, दूसरा हाथ यूँ मारा तो माया की काई दूर। फिर निर्मल पानी ही पानी। ब्रह्मानन्द ही ब्रह्मानन्द।

जगन्नियन्ता परमात्मा होकर भी चपरासी की नौकरी करनी है ? साहब को सलाम करना है ? जिसको गरज होग वह सलाम करने आयेगा। चाचा मिटकर भतीजे क्यों होते हो ? ॐ.... ॐ...... ॐ......

मुझ पूर्ण चैतन्य को किसकी आवश्यकता है ? मुझमें कर्त्तापन कहाँ ? आवश्यकताएँ तो देह की होती हैं। लाखों करोड़ों देह हुई और उनकी सब आवश्यकताएँ पूरी करते रहे फिर भी मरती ही रही। हर जन्म में बना-बनाकर छोड़ते आये जब तक नहीं किया तब तक लगता है कि मकान बनायें, बड़े भवन बनायें, भव्य आश्रम खोलें लेकिन करने के बाद लगता है कि इसको कोई सँभाल ले तो अच्छा है, हमें नहीं चाहिए।

अब करने-धरने के संकल्प सब छोड़ दो। यह ब्रह्माण्ड अपने बिना कुछ किये ही धमाधम चलता रहेगा। कितने ही मजदूर लोग बहुत कुछ कर रहे हैं बेचारे। अपने को कर्त्ता क्यों बना रहे हो ? आत्मानन्द से मुँह क्यों मोड़ रहे हो ?

'नहीं, मैं अपने को कर्त्ता मानकर नहीं कर रहा हूँ....'

अरे कर्त्ता नहीं मानते तो करने की इच्छा कैसे होती है ? ईमानदारी से खोजो। खोजकर पकड़ो कि क्या इच्छा है। उस इच्छा को यूँ किनारे लगा दो और तुम प्रकट हो जाओ। इच्छाओं के आवरण के पीछे कब तक मुँह छिपाये बैठे रहोगे ? यश की इच्छा है ? मारो धक्का। प्रसिद्धि की इच्छा है ? मार दो फूँक। अच्छा कहलाने की इच्छा है ? मारो लात। इतना कर लिया तो सब शास्त्रों, वेदों, उपनिषदों का अभ्यास, जप-तप-तीर्थ-अनुष्ठान और सब सेवाएँ फलित हो गईं।

लेकिन सावधान ! आलस्य या अकर्मण्यता नहीं लानी है। इच्छारहित होने का अभ्यास करके आत्मदेव का साक्षात्कार करना है। फिर तुम्हारे द्वारा बहुत सारे कर्म होने लगेंगे लेकिन तुममें कर्तृत्व की बू न रहेगी।

इच्छा की पर्तों ने तुम्हें ढाँक रखा है और कुछ नहीं है... कुछ नहीं है। बहुत सरल है। सरल नहीं होता तो यह आनन्द कैसे लेते अपने स्वभाव का ? बिल्कुल सरल.... मुफ्त में।

श्री वशिष्ठजी महाराज कहते हैं- "हे रामजी ! फूल और पत्ते को मसलने में देर है, अपने स्वरूप को देखने में क्या देर है ?"

किसी देवी-देवता के दर्शन की इच्छा नहीं है। उनमें भी हमारा ही आत्मचैतन्य विलास कर रहा है। किसी परिस्थिति की इच्छा नहीं है। कुछ होना नहीं है। कुछ प्राप्त करना नहीं है। प्रभु भी नहीं चाहिए, चलो। प्रभु हमस अलग हों तो चाहिए न ? हमारा शुद्ध-स्वरूप आत्मा ही परमात्मा है। एक अद्वैत आत्मा-परमात्मा के सिवा जो कुछ दिखता है वह सब मन की कल्पनाएँ हैं। इच्छा करके कल्पनाओं के पीछे कब तक भागते फिरेंगे ?

खोजो अपने में। कोई इच्छा दिखे तो पकड़कर निकाल दो। जैसे महिलाएँ बालों में से जुएँ पकड़-पकड़कर निकालती है ऐसे चित्त में से इच्छाएँ पकड़-पकड़कर निकाल दो। अभी तो सिर जुओं से ढक गया है। कुछ भी करके इच्छाओंरूपी जुएँ हटा दो। ये इच्छाएँ हट गई तो फिर...

संकर सहज स्वरूप संभारा।

लागी समाधि अखण्ड अपारा।।

अपना स्वरूप विचारने मात्र से, सँभालने मात्र से प्रकट होता है। संस्कार घुस गये हैं कि यह करेंगे, वह करेंगे, यह पायेंगे, यह छोड़ेंगे। संकल्पों और इच्छाओं की खिचड़ी हो गई हैं।

"अब हम क्या करें ?"

कुछ नहीं करो।

"भजन करें ?"

नहीं करो भजन।

"ध्यान करें ?"

नहीं करो ध्यान भी।

"यात्रा करें ?"

कोई जरूरत नहीं।

"दुकान खोलें ?"

कभी नहीं खोलना।

"नौकरी करें ?"

नहीं।

"रसोई बनायें ?"

कोई आवश्यकता नहीं है।

कुछ नहीं करना है। प्रकृति में हो रहा है। शास्त्र की मर्यादा के मुताबिक होने दो। करने का नया संकल्प मत बनाओ। परहित के लिए होने दो।

अनुक्रम

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चित्त का निर्माण

एक समय था जब बूँद भी दरिया होकर डुबाया करती थी, गौ का खुर भी खाई होकर गिराया करता था लेकिन जब सत्संग में गये, गुरूओं की कृपा को पचाया तब अनुकूलता और प्रतिकूलता के दरिये भी बूँद से मालूम होते हैं। आत्मज्ञान की महिमा ऐसी है। साधक जब आत्मभाव में प्रतिष्ठित होता है तब जीवन से सारे दुःख विदा होने लगते हैं।

ध्यान का मतलब केवल चुपचाप हो जाना नहीं है। ध्यान में चित्त अत्यंत एकाग्र हो जाय, शान्त हो जाय, स्थिर हो जाय उससे भी वह ऊँची अवस्था है कि चित्त का निर्माण हो। चित्त का शान्त होना एक बात है और चित्त का निर्माण होना दूसरी बात है। चित्त शान्त हो जायेगा उतनी देर शान्ति मिलेगी, आनन्द आयेगा, बाद में फिर जगत सच्चा भासेगा, थोड़ा सा सुख आकर्षित कर देगा, थोड़ा सा दुःख दबा देगा। लेकिन ध्यान में अगर आत्मविचार आता है, ब्रह्मविचार आता है, परमात्मभाव के संस्कारों को दुहराकर आत्माकार भाव पैदा होते हैं तो उससे चित्त का निर्माण होता है। चित्त के शान्त हो जाने से भी चित्त का निर्माण होना ऊँची बात है।

गलत ढंग से चित्त का निर्माण हो जाता है तो वह बन्धन व दुःख का कारण बन जायगा। जैसे, चित्त का निर्माण हो गया कि मैं अमुक जाति का हूँ, यह मेरा नाम है, मैं स्त्री हूँ या पुरूष हूँ। इस प्रकार के चित्त का निर्माण हो गया तो उसके लिए आदर के दो शब्द जीवन बन जाते हैं और अनादर के दो शब्द मौत बन जाते हैं। झूठे संस्कारों से चित्त का निर्माण हो गया। वे भी दिन थे कि जब बूँद भी दरिया होकर दिखती थी और हमें डुबा ले जाती थी। जरा सा अपमान भी दरिया होकर दिखता था। जरा सा हवा का झोंका भी आँधी की नाईं दिखता था। लेकिन जब सत्संग और गुरूदेव की कृपा से, आत्मवेत्ता महापुरूष के उपदेश की कृपा से बड़े-बड़े दरिये भी कतरों की नाईं दिखते हैं। क्योंकि जो कुछ नाम-रूप हैं, सुख-दुःख हैं, अनुकूलता-प्रतिकूलता हैं वे सब माया में खिलवाड़ मात्र हैं। मायामात्रं इदं द्वैतम्। यह सारा प्रपंच जो दिख रहा है वह सब माया मात्र है।

देखिये सुनिये गुनिये मन माँहि।

मोहमूल परमारथ नाँही।।

चित्त का अज्ञान से निर्माण हुआ इसीलिए यह जगत सत्य भासता है और जरा-जरा सी बातें सुख-दुःख, आकर्षण, परेशानी देकर हमें नोंच रही हैं।

ध्यान के द्वारा, सत्संग के द्वारा चित्त का ठीक रूप में निर्माण करना है, चित्त का परिमार्जन करना है। चित्त शान्त हो गया तो उसके संस्कार दब गये। जब उठे तो संस्कार फिर चालू हो गये। नींद में गये ते मैं यह हूँ.... मैं वह हूँ... ये सब संस्कार दब गये। नींद में कर्जे की चिन्ता नहीं रहती। लेकिन ये दुःख दूर नहीं हुए क्योंकि चित्त में जो संस्कार पड़े हैं वे गये नहीं। ये संस्कार दबे हैं। नींद से उठने पर सारा प्रपंच चालू हो जायगा, सारी चिन्ताएँ सिर पर सवार हो जायगी।

ध्यान-भजन का लक्ष्य यह नहीं है कि तुम्हारा चित्त केवल स्थिर हो जाय, बस। ध्यान-भजन का लक्ष्य है चित्त स्थिर हो और साथ ही साथ चित्त का निर्माण हो। ब्रह्माकार वृत्ति से, ब्रह्माकार भाव से चित्त का निर्माण होगा तो तुम्हारे चित्त पर कल्पित संसार के सुख-दुःख की ठोकर नहीं लगेगी। मिथ्या संसार का आकर्षण नहीं होगा। तुम्हारे हृदय में संसार का आकर्षण नहीं होगा तो वासना नहीं उठेगा। वासना नहीं उठेगी तो दुबारा जन्म लेने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपका मोक्ष हो जायगा, बेड़ा पार हो जायगा।

पूजा करते हैं ठाकुरजी की, मंदिर में जाते हैं, मस्जिद में जाते हैं, गिरजाघर में जाते हैं लेकिन चित्त का निर्माण नहीं करते हैं तो संसारयात्रा का अन्त नहीं आता। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

निर्मानमोहा जितसंगदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।

द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञैर्गच्छन्त्यमूढ़ाः पदमव्ययं तत्।।

'जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं' – वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानी जन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते है।

चित्त के साथ, मन-इन्द्रियों के साथ तादात्म्य का जो संग है, संसार के सम्बन्धों से जो दोष लग जाता है वह गिरा देता है। चित्त का ठीक से निर्माण हो जाय तो अध्यात्म में नित्य रमण हो जाय, कामनाएँ निवृत्त हो जायें, द्वन्द्वों से मुक्ति हो जाये। सुख और दुःख, मान और अपमान, अनुकूलता और प्रतिकूलता यश और अपयश, तन्दुरूस्ती और बीमारी, जीवन और मृत्यु, ये सब द्वन्द्व हैं। जो तन्दुरूस्ती से सुखी है वह बीमारी से दुःखी होगा। जो यश से सुखी होता है वह अपयश से दुःखी होगा। जो जीने में सुख मानेगा वह मरने में दुःखी होगा। लेकिन जीना मरना, मान-अपमान ये सब चित्त में देहात्मभाव के संस्कार पड़े हैं। अगर चित्त का निर्माण हो गया कि जीना मरना ये सब मेरा नहीं, माया का है, मेरा नहीं, इस देहरूपी खिलौने का है, यह देहरूपी खिलौने कई बार जीते हुए दिखते है, कई बार मरते हुए दिखते हैं फिर भी मेरी कभी मौत नहीं होती, तो शूली पर चढ़ते हुए भी दुःख नहीं होगा। लोगों को लगेगा कि मनसूर शूली पर चढ़े, ईसा क्रॉस पर चढ़े, अमुक बुद्ध पुरूष ने ध्यान करते हुए शरीर छोड़ा और मर गये। लोगों को ऐसा लगेगा लेकिन उन महापुरूषों का अनुभव है कि वे कभी मरते नहीं। वे कभी बिगड़ते नहीं, कभी बनते नहीं। वास्तव में जीवमात्र का जो असली स्वरूप है वह बनने बिगड़ने से बहुत ऊँचा है। बनता बिगड़ता तुम्हारा शरीर है, बनता बिगड़ता तुम्हारा मन है, बनता बिगड़ता तुम्हारा भाव है लेकिन तुम्हारा स्वरूप, तुम्हारा आत्मा कभी बनता बिगड़ता नहीं।

चित्त का निर्माण होता है आत्मविचार से। ध्यान करें और शून्यमनस्क नहीं लेकिन अनात्मप्रवाह का तिरस्कार करें और आत्मप्रवाह को चलायें। आत्मभाव को चलायें और देहभाव को हटायें। ब्रह्मभाव को जगाना और देहभाव को अलविदा देना, यह है चित्त के निर्माण की पद्धति। इस प्रकार ध्यान होगा तो मस्त हो जायेंगे। ध्यान के वक्त भी मस्त और ध्यान के बाद भी मस्त। इस प्रकार चित्त का निर्माण हो जायगा तो जो संसार बूँद होकर भी दरिया बनकर डूबता था वह अब दरिया होकर आयेगा तो भी बून्द होकर भासेगा। जरा-जरा बात से सुख-दुःखादि द्वन्द्व परेशान कर रहे थे वे अब प्रभाव नहीं डालेंगे। जितने प्रमाण में चित्त का निर्माण होता जायेगा उतने प्रमाण में द्वन्द्वैर्विमुक्ताः होते जायेंगे।

सारे जप, तप, सेवा, पूजा, यज्ञ, होम, हवन, दान, पुण्य ये सब चित्त को शुद्ध करते हैं, चित्त में पवित्र संस्कार भरते हैं। प्रतिदिन कुछ समय अवश्य निष्काम कर्म करना चाहिए। चित्त के कोष में कुछ आध्यात्मिकता की भरती हो। तिजोरी को भरने के लिए हम दिनरात दौड़ते हैं। जेब को भरने के लिए छटपटाते हैं लेकिन तिजोरी और जेब तो यहीं रह जायेंगे। हृदय की तिजोरी साथ में चलेगी। इस आध्यात्मिक कोष को भरने के लिए दिन भर में कुछ समय अवश्य निकालना चाहिए। संध्या-वन्दन, पूजा-प्रार्थना, ध्यान-जप, निष्काम कर्म इत्यादि के द्वारा चित्त का निर्माण कीजिये।

उच्च विचार करते हुए हृदय में खुले आकाश की विशालता भर जाने दो। ॐकार का पवित्र जप करते-करते हृदय को विशाल होता अनुभव करो। शान्ति और आनन्द से हृदय भरा जा रहा है। यह आत्मानन्द की... विशुद्ध परमात्मा की, चिदानन्द-स्वरूप परमात्मा की झलक पाने का तरीका है।

अनुक्रम

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'परिप्रश्नेन....'

प्र. इन्द्रियों को विषयों से कैसे बचायें ?

उ. भोजन छोड़ने से, उपवास करने से, गाय-भैंस का दूध छोड़कर बकरी का दूध पीने से, रोटी छोड़कर मूँग भिगोकर खाने से शरीर में शक्ति नहीं होती तो विषयवासना शान्त हो जाती है। लेकिन इस उपाय से संसार में सुखबुद्धि नहीं जाती। ब्रह्मवेत्ताओं को आत्मा-परमात्मा का सुख मिल जाता है इसलिए संसार में रहते हुए भी संसार में उनकी सुखबुद्धि नहीं होती।

साँप ठण्ड में ठिठुर जाता है तो शान्त पड़ा रहता है, काटता नहीं। सूर्य की धूप निकलते ही वह कब काट ले, कोई पता नहीं। ऐसे ही अमुक आहार व नियमों से मन को थोड़ा शान्त कर लेते हैं। फिर जब मौका मिल जाता है तो मन फिर भड़क उठता है। मन को विषयों से शान्त कर देना अच्छा है, संयम करना ही चाहिए लेकिन साथ ही साथ परमात्मा का रस पा लेना चाहिए।

मनोवैज्ञानिकों ने कुछ प्रयोग किये। जो अति जातीय आवेगवाले कामी युवक थे उनका खान-पान ऐसा रखा कि वीर्य बने ही नहीं। फिर उनको लड़कियों के बीच रखा तो बड़े ब्रह्मचारी दिखे। शान्त रहे। आवेग की कोई चेष्टा नहीं की। कुत्तों पर भी प्रयोग किये गये। वे भी ऐसे रहे। फिर जब उनको पौष्टिक भोजन देना शुरू किया तो वे ही कुत्ते पूँछ हिलाते कुत्तियों के पीछे भागने लगे। वे युवक भी पौष्टिक भोजन के आहार से पहले जैसे ही कामातुर होने लगे।

'मजबूरी का नाम महात्मा गाँधी' – ऐसा नहीं होना चाहिए। जीवन में, शरीर में शक्ति न हो, इन्द्रियों में बल न हो तो सब ब्रह्मचारी हैं। आप शत्रु को परास्त नहीं कर सकते और माफ कर दिया तो क्या बड़ी बात है ? उसको छिन्न भिन्न करने का सामर्थ्य है फिर भी माफ कर दिया तो बड़ी बात है। क्षमा वीरों को शोभा देती है, कायरों को थोड़े ही शोभा देती है !

ऐसे ही बलवानों को ब्रह्मचर्य शोभा देता है।

कोई कहे किः 'मेरे को धन का अभिमान नहीं।'

अच्छा ! कितना धन है तुम्हारे पास ?

"पहले बहुत था लेकिन अभी... अभी तो कर्जा होगा पच्चीस हजार का।"

तो धन का अभिमान क्या करेगा तू ?

सावन के पवित्र महीने में भागवत की कथा हो रही थी। एक दिन एक संत मंच पर पधारे। श्रोताओं से बोले किः "आप लोग भगवान के भक्त हो। भागवत की, रामायण की कथाएँ वर्षों से सुनते आये हो। पुण्य कमाते आये हो। आपमें से जिसको मित्रों में राग और शत्रु में द्वेषबुद्धि न हो ऐसे राग-द्वेषरहित चित्तवाले लोग खड़े हो जायें। मैं अभी-अभी उन्हें भगवान का दर्शन करा दूँ।"

संत ने एक बार, दो बार, तीन बार दुहराया। कथाकार को भी चिन्ता होने लगी कि हजारों श्रोताओं में से कोई नहीं उठता ! संत बार-बार कहने लगे किः "आप लोगों में से राग-द्वेष से रहित लोग खड़े हो जायें। मैं उन्हें आत्म-साक्षात्कार करा दूँगा, भगवान के दर्शन करा दूँगा। उसके दर्शन से दूसरों का भी भला हो जायेगा।"

सब लोग सिर झुकाकर बैठे रहे। सभा मण्डप में सन्नाटा छा गया। इज्जत का सवाल हो गया। आखिर में एक नब्बे साल का बूढ़ा उठ खड़ा हुआ। बोलाः "बाबा जी ! मैं हूँ।"

"अच्छा ! इतने लोगों में एक भी मिल गया तो भी ठीक है। आप तो निहाल हो जाओगे, आपके दर्शन से और लोग निहाल होने लगेंगे। अच्छा ! अब बताओ कि आपने राग-द्वेष कैसे निवृत्त किये ?"

"बाबा जी ! मेरी उम्र नब्बे साल की है। मेरी पत्नी मर चुकी है। मेरा इकलौता बेटा था वह भी प्रभु को प्यारा हो गया। सब मित्र-साथी भी एक-एक करके चल बसे। परिवार में और मित्रमण्डल में कोई नहीं और शत्रु भी कमबख्त सब मर मिट गये। अब मुझे किसी से राग-द्वेष नहीं है।"

स्नेही और शत्रु मर गये लेकिन राग-द्वेष तो नहीं मरा। वह जिन्दा है। कोई चीज नहीं है इसलिए उसका रस अपने भीतर नहीं है ऐसी बात नहीं है।

निराहार रहने से विकार तो शान्त हो जाते हैं लेकिन जगत में सुखबुद्धि का, संसार में रस का अभाव नहीं होता। रस पाने की इच्छा, सुखी होने की इच्छा भीतर से नहीं जाती। ठण्ड से ठिठुरे हुए साँप का विष अमृत में बदला नहीं। जब तक परमात्मा का साक्षात्कार नहीं होता तब तक भीतर के विकार निर्विकारता का रूप नहीं लेते।

ऐसा भी नहीं कि साक्षात्कार हो जाने के बाद ज्ञानी संसार से उपराम हो जायगा। नहीं, वह खायेगा, पियेगा, करेगा, धरेगा, बेटे को जन्म देगा, काम-क्रोध-लोभ-मोह-अहंकार ये सब मसाला उसके पास होगा लेकिन वह उन सबका उपयोग करेगा, उनमें सुखबुद्धि से उनके आधीन नहीं होगा। इसीलिए ज्ञानी को जीवन्मुक्त कहते है। साधारण लोग सुख भोगने के लिए विषय विकारों के आधीन हो जाते हैं और ज्ञानी स्वाधीन रहकर उनका उपयोग कर लेगा।

श्रीवशिष्ठजी महाराज के सौ बेटे थे। श्रीकृष्ण ने सुदर्शन उठाया। श्रीराम ने धनुष उठाया। बिना क्रोध के कंस और रावण को कैसे मारा ? उन्होंने क्रोध का उपयोग किया।

तुम कमरा बन्द करके, अन्दर से कुण्डा लगाकर बैठो तब स्वतन्त्र हो। जब चाहो, दरवाजा खोलकर बाहर निकल सकते हो। लेकिन बाहर से कोई दरवाजा बन्द कर दे तो तुम हो गये पराधीन। ऐसे ही विकारों के, परिस्थितियों के आधीन जीना पराधीनता है। विकार  परिस्थितियों को अपने आदेश में चलाना स्वाधीनता है। इसीलिए श्रीकृष्ण को सोलह हजार एक सौ आठ स्त्रियाँ होते हुए भी उनका इतना ज्ञान कि आज भी उनकी गीता पूजी जा रही है। संसारी की दो पत्नियाँ भी आ जाय तो भी बेड़ा गर्क। अरे, एक पत्नी भी नाक में दम कर देती है।

ज्ञानी को जगत में से रसबुद्धि चली जाती है। उसको आत्मसुख मिलता है तो विषयों में सुखबुद्धि नहीं रहती। जो लोग रसबुद्धि से विषय भोगते हैं वे फँसते हैं। स्वाभाविक उपयोग कर लिया तो कोई बात नहीं। आपको भूख लगी। आपका उद्देश्य था पेट भरना। किसी ने आकर बढ़िया भोजन आपको खिला दिया। इसमें कोई दोष नहीं। लेकिन आपका पेट भरा है फिर भी स्वाद लेने के लिए व्यंजन बनवाये, मजदूरी की और करवाई तो यह भोजन में रसबुद्धि अनिष्ट का कारण है।

असली रस तो परमात्मा का है वह रस मिल गया तो ऐसी कौन-सी चीज है जो ज्ञानी को संसार में आकर्षित करे ? ठीक है, व्यवहार में बोले, चले, लिया, दिया, लेकिन ज्ञानी व्यवहार में बँधता नहीं। मामूली आदमी पाँच सौ की नौकरी में बँध जाता है लेकिन जो सम्राट है उसको पाँच हजार की नौकरी भी क्या आकर्षित करेगी ?

कबीर के आगे कई ललनाएँ आयीं। शिष्य होकर आयी तो ठीक है, बातें करें, मिलें-जुलें लेकिन वे समझें कि अपने नखरे करके कबीर को फँसायेंगे तो गलती में हैं।

चलरी ठगनी ! ठुमक ठुमक नयननको क्यों ठुमकावे।

तेरे हाथ कबीरो नहीं आवे।।

कोई समझे कि मैं रूप लावण्य से, अलंकार-आभूषणों से किसी ज्ञानी को फँसाऊँ, पैसे देकर ज्ञानी को अपना बनाऊँ, धौंस देकर ज्ञानी से आशीर्वाद ले लूँ, तो वह धोखे में है। जिसको आत्मज्ञान हो गया, आत्मरस मिल गया वह किसी रस से, किसी ज्ञान से, किसी बल से प्रभावित नहीं होगा। चार पैसे के चने लेकर खाने लगे हैं यह मौज की बात है। दरिद्र आदमी चना खाता है वह अलग बात है लेकिन अमीर आदमी चना खाता है तो मौज है, विनोद है। ऐसे ही ज्ञानी के लिए सारा संसार विनोद मात्र है। ....और हम लोग संसार में फँस मरते हैं।

जो रसबुद्धि से विषय-भोग भोगता है वह विवेकी होगा तो भी उसकी इन्द्रियाँ उसके मन को बलपूर्वक हर लेती हैं। मजा लेने के लिए भोग भोगा तो सजा जरूर भोगेगा। ऐसा कोई सुख नहीं जो बाद में दुःखी न करे। इसलिए हे अन्नदाता ! संसार से सुख लेने की इच्छा ही छोड़ दो। संसार में सुख का तो लेबल है, अन्दर दुःख भरा है।

एक आदमी ने गुलाब के पौधे पर सुन्दर खिला हुआ फूल देखा। झट से तोड़ कर नाक पर रख दिया। फूल में बैठी थी ततैया। फट से मार दिया डंक उसके नाक पर। 'ओ बाप रे !'

ऐसे ही संसार के विषयों में दिखती सुन्दरता है लेकिन अन्दर ततैया बैठी होती है। दिखता सुख है लेकिन भरी हैं मुसीबतें। प्रारम्भ में लगता है कि संसार में सुख है लेकिन बाद में सारी जिन्दगी संसार की गाड़ी खीँचते खीँचते दम निकलता है। मनुष्य आखिर में पश्चाताप करता हुआ मर जाता है।

दुःख को हम लोग आमंत्रित करते हैं। वास्तव में दुःख है नहीं। दुःख बनाने की फैक्टरी हमारे साथ लगी हुई है। कैसे ? हम सुखी होने के लिए भागते हैं बाहर। यह बाहर भागना ही दुःख को आमन्त्रण देता है। जितनी तेजी से भागे उतनी ही तेजी से दुःख मिलेगा। ज्ञानी सुख लेने के लिए बाहर भागते नहीं। वे दुःख मिटाने के लिए भी बाहर भागते नहीं। बल पाने के लिए भी बाहर नहीं भागते।

एक जगह पर ज्ञानी सत्संग कर रहे थे। एकाएक जोरों से आँधी चली। छत के टीन छटपटाने लगे। भक्त लोग सब भाग गये। पक्के मकानों में आश्रय ले लिया। थोड़ी देर में आँधी शान्त हो गई। वापस आकर देखा तो स्वामी जी वैसे ही बैठे हैं। पूछाः

"बाबाजी ! इतनी आँधी चली, हम भाग गये। आप नहीं भागे ?"

"हम भी भागे। तुम बाहर भागे, हम भीतर भागे।"

अन्तर्यामी परमात्मा से जुड़ जाओ तो प्रकृति की सेवा पाना कोई बड़ी बात नहीं है। परमात्मा से मिल जाओ, ईश्वर में डूब जाओ। तुम नहीं कर सकते, ईश्वर सब कुछ कर सकता है।

तुममें और ईश्वर में क्या फर्क होता है ?

तुम जब संसार से सुख लेने की इच्छा करते हो तो दो पैसे के हो जाते हो। संसार से सुख लेने की इच्छा छोड़कर ईश्वर में गोता मारते हो तो ईश्वर हो जाते हो। यह महापुरूषों का अनुभव है, शास्त्रों का प्रमाण है। भगवान श्रीकृष्ण भी कह रहे हैं-

प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।

आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।

''हे अर्जुन ! जिस काल में पुरूष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भली भाँति त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।"

जो अपने आप में तृप्त है, अपने आप में आनन्दित है, अपने आपमें खुश है वह स्थितप्रज्ञ है। तस्य तुलना केन जायते ? उसकी तुलना और किससे करें ? वह ऐसा महान हो जाता है। ऐसे महापुरूष का तो देवता लोग भी दर्शन करके अपना भाग्य बना लेते हैं। तैंतीस करोड़ देवता भी ऐसे महापुरूष का आदर करते हैं तो औरों की क्या बात है ?

ईश्वर में सुखबुद्धि होनी चाहिए। संसार में सुख लेने की जो हमारी आदत है वह हमें बुरी तरह दुःख में डाल देती है। वह आदत पुरानी है, कई जन्मों की है। इसलिए अभ्यास करना पड़ता है। साधन-भजन इसीलिए करने पड़ते हैं कि गन्दी आदतें पड़ गई हैं। नहीं तो ईश्वर दूर थोड़े ही हैं कि उसको पाने के लिए अभ्यास की जरूरत पड़े ! गन्दी आदतें मिटाने के लिये साधन-भजन-ध्यान करना पड़ता है। बाहर सुख लेने की आदतें ही वे गन्दी आदतें हैं।

कोई वाह वाह करे तो कान का सुख मिले, अच्छा खायें तो जीभ का सुख मिले, बढ़िया फिल्म देखें तो आँख का सुख मिले। बढ़िया शय्या हो, फूल बिछे हों, इत्र-तेल-फुलेल को छिड़काव हो, रानि साहिबा पैर दबा रहीं हैं, आहाहा.....! यह चमड़ी का सुख हुआ। ये सब ê