बाल संस्कार

अनुक्रम

 

संत श्री आसारामजी बापू का जीवन परिचय.. 3

बाल संस्कार केन्द्र माने क्या? जानते हो?. 6

प्रार्थना... 6

सरस्वती-वंदना... 7

सदुगुरू महिमा... 8

दिनचर्या... 9

प्रातः पानी प्रयोग.. 10

स्मरण शक्ति बढ़ाने के उपाय.. 10

प्राणायाम.. 12

ध्यान-त्राटक-जप-मौन-संध्या तथा मंत्र-महिमा... 14

ध्यान महिमा... 14

त्राटक.. 14

जप-महिमा... 15

मौनः शक्तिसंचय का महान स्रोत.. 15

त्रिकाल संध्या..... 16

मंत्र-महिमा... 17

सूर्यनमस्कार. 18

यौगिक चक्र.. 22

कुछ उपयोगी मुद्राएँ.. 23

योगासन.. 25

प्राणवान पंक्तियाँ... 29

एक-दो की संख्या द्वारा ज्ञान.. 30

आदर्श बालक की पहचान.. 32

याद रखें.. 34

शास्त्र के अनुसार श्लोकों का पाठ.. 34

साखियाँ... 35

भारतीय संस्कृति की परम्पराओं का महत्त्व... 36

तिलकः बुद्धिबल सत्त्वबलवर्द्धक.. 37

दीपक.. 38

कलश.. 38

स्वस्तिक.. 39

शंख.. 40

तिरंगा-झंडा.. 42

परीक्षा में सफलता कैसे पायें?. 42

विद्यार्थी छुट्टियाँ कैसे मनायें?. 43

जन्मदिन कैसे मनायें?. 44

शिष्टाचार जीवनोपयोगी नियम.. 45

शिष्टाचार के नियम.. 45

सदगुणों के फायदे. 46

जीवन में उपयोगी नियम.. 46

बाल-कहानियाँ... 51

गुरू-आज्ञापालन का चमत्कार. 51

एकाग्रता का प्रभाव.. 51

असंभव कुछ भी नहीं.. 52

बालक श्रीराम.. 53

बालक ध्रुव.. 53

गुरू गोविंद सिंह के वीर सपूत.. 54

स्वधर्मे निधनं श्रेयः... 58

दाँतो और हड्डियों के दुश्मनः बाजारू शीतल पेय.. 60

चाय-काफी में दस प्रकार के जहर. 61

आधुनिक खान-पान से छोटे हो रहे हैं बच्चों के जबड़े. 61

सौन्दर्य-प्रसाधनों में छिपी हैं अनेक प्राणियों की मूक चीखें और हत्या..... 62

बाजारू आइसक्रीम-कितनी खतरनाक, कितनी अखाद्य?. 63

मांसाहारः गंभीर बीमारियों को आमंत्रण.. 64

आप चाकलेट खा रहे हैं या निर्दोष बछड़ों का मांस?. 65

अधिकांश टूथपेस्टों में पाया जाने वाला फ्लोराइड कैंसर को आमंत्रण देता है....... 66

दाँतों की सुरक्षा पर ध्यान दें. 67

अण्डा जहर है. 68

मौत का दूसरा नाम गुटखा पान मसाला... 70

टी.वी.-फिल्मों का प्रभाव.. 70

बच्चों के सोने के आठ ढंग.. 71

ब्रह्मनिष्ठ संत श्री आसाराम जी बापू का संदेश.. 73

मेरी वासना उपासना में बदली... 75

यौवन सुरक्षा पुस्तक नहीं, अपितु एक शिक्षा ग्रंथ है. 75

माँ-बाप को भूलना नहीं.. 75

बाल-गीत.. 76

हम भारत देश के वासी हैं...... 77

शौर्य-गीत.. 78

कदम अपना आगे बढ़ाता चला जा...... 78

बच्चों की पुकार. 79

आरती... 79

 

संत श्री आसारामजी बापू का जीवन परिचय

किसी भी देश की सच्ची संपत्ति संतजन ही होते हैं। विश्व के कल्याण हेतु जिस समय जिस धर्म की आवश्यकता होती है उसका आदर्श स्थापित करने के लिए स्वयं भगवान ही तत्कालीन संतों के रूप में अवतार लेकर प्रगट होते हैं।

वर्तमान युग में संत श्री आसाराम जी बापू एक ऐसे ही संत हैं, जिनकी जीवनलीला हमारे लिए मार्गदर्शनरूप है।

 

जन्मः विक्रम संवत 1998, चैत्र वद षष्ठी (गुजराती माह अनुसार), (हिन्दी माह अनुसार वैशाख कृष्णपक्ष छः)।

जन्मस्थानः सिंध देश के नवाब जिले का बेराणी गाँव।

माताः महँगीबा।

पिताः थाउमल जी।

बचपनः जन्म से ही चमत्कारिक घटनाओं के साथ तेजस्वी बालक के रूप में विद्यार्थी जीवन।

युवावस्थाः तीव्र वैराग्य, साधना और विवाह-बंधन।

पत्नीः लक्ष्मीदेवी जी।

साधनाकालः गृहत्याग, ईश्वरप्राप्ति के लिए जंगल, गिरि-गुफाओं और अनेक तीर्थों में परिभ्रमण।

गुरूजीः परम पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज।

साक्षात्कार दिनः  विक्रम संवत 2021, आश्विन शुक्ल द्वितिया। आसुमल में से संत श्री आसारामजी महाराज बने।

लोक-कल्याण के उद्देश्यः संसार के लोगों को पाप-ताप, रोग, शोक, दुःख से मु्क्तकर उनमें आध्यात्मिक प्रसाद लुटाने संसार-जीवन में पुनरागमन।

पुत्रः श्री नारायण साँईँ।

पुत्रीः भारती देवी।

प्रवृत्तियाँ: कर्म, ज्ञान और भक्तियोग द्वारा परमात्म-प्रसाद का अनुभव कराने हेतु देश-विदेशों में करीब 130 से अधिक आश्रम एवं 1100 श्री योग वेदान्त सेवा समितयों द्वारा समाज में रचनात्मक एवं आध्यात्मिक सेवाकार्य।


 

प्रस्तावना

मनुष्य के भावी जीवन का आधार उसके बाल्यकाल के संस्कार एवं चारित्र्यनिर्माण पर निर्भर करता है। बालक आगे चलकर नेता जी सुभाषचन्द्र बोस जैसे वीरों, एकनाथजी जैसे संत-महापुरूषों एवं श्रवण कुमार जैसे मातृ-पितृभक्तों के जीवन का अनुसरण करके सर्वांगीण उन्नति कर सकें इस हेतु बालकों में उत्तम संस्कार का सिंचन बहुत आवश्यक है। बचपन में देखे हुए हरिश्चन्द्र नाटक की महात्मा गाँधी के चित्त पर बहुत अच्छी असर पड़ी, यह दुनिया जानती है।

हँसते-खेलते बालकों में शुभ संस्कारों का सिंचन किया जा सकता है। नन्हा बालक कोमल पौधे की तरह होता है, उसे जिस ओर मोड़ना चाहें, मोड़ सकते हैं। बच्चों में अगर बचपन से ही शुभ संस्कारों का सिंचन किया जाए तो आगे चलकर वे बालक विशाल वटवृक्ष के समान विकसित होकर भारतीय संस्कृति के गौरव की रक्षा करने में समर्थ हो सकते हैं।

विद्यार्थी भारत का भविष्य, विश्व का गौरव एवं अपने माता-पिता की शान है। उसके अंदर सामर्थ्य का असीम भंडार छुपा हुआ है। उसे प्रगट करने हेतु आवश्यक है सुसंस्कारों का सिंचन, उत्तम चारित्र्य-निर्माण और भारतीय संस्कृति के गौरव का परिचय। पूज्यपाद संत श्री आसारामजी महाराज द्वारा समय-समय पर इन्हीं विषयों पर प्रकाश डाला गया है। उन्हीं के आधार पर सरल, सुबौध शैली में बालापयोगी सामग्री का संकलन करके बाल संस्कार नाम दिया गया है। यह पुस्तक प्रत्येक माता-पिता एवं बालकों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी, ऐसी आशा है।

विनीत

-          श्री योग वेदान्त सेवा समिति।


बाल संस्कार केन्द्र माने क्या? जानते हो?

बाः बापू के प्यारे बालक जहाँ पढ़ते हैं वह स्थान।

लः लक्ष्यभेदी बनाने वाला।

सं- संस्कृति के रक्षक बनाने वाला।

स्- स्वाध्यायी और स्वाश्रयी बनानेवाला।

काः कार्यकुशल बनाने वाला।

रः रचनात्मक शैली द्वारा मानव-रत्न तराशनेवाला।

केः केसरी सिंह के समान निर्भय बनाने वाला।

न्- न्यायप्रिय बनाने वाला।

द्रः हृदय को द्रवीभूत, और जीवन को दृढ़ मनोबलवाला बनाने की शिक्षा देने वाला स्थान।

प्रार्थना

 

गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।

गुरूर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।

अर्थः गुरू ही ब्रह्मा हैं, गुरू ही विष्णु हैं। गुरूदेव ही शिव हैं तथा गुरूदेव ही साक्षात् साकार स्वरूप आदिब्रह्म हैं। मैं उन्हीं गुरूदेव के नमस्कार करता हूँ।

 

ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामलं गुरोः पदम्।

मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा।।

अर्थः ध्यान का आधार गुरू की मूरत है, पूजा का आधार गुरू के श्रीचरण हैं, गुरूदेव के श्रीमुख से निकले हुए वचन मंत्र के आधार हैं तथा गुरू की कृपा ही मोक्ष का द्वार है।

 

अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।

तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

अर्थः जो सारे ब्रह्माण्ड में जड़ और चेतन सबमें व्याप्त हैं, उन परम पिता के श्री चरणों को देखकर मैं उनको नमस्कार करता हूँ।

 

त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव।।

अर्थः तुम ही माता हो, तुम ही पिता हो, तुम ही बन्धु हो, तुम ही सखा हो, तुम ही विद्या हो, तुम ही धन हो। हे देवताओं के देव! सदगुरूदेव! तुम ही मेरा सब कुछ हो।

 

ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं

द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम्।

एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतं

भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरूं तं नमामि।।

 

अर्थः जो ब्रह्मानन्द स्वरूप हैं, परम सुख देने वाले हैं, जो केवल ज्ञानस्वरूप हैं, (सुख-दुःख, शीत-उष्ण आदि) द्वंद्वों से रहित हैं, आकाश के समान सूक्ष्म और सर्वव्यापक हैं, तत्त्वमसि आदि महावाक्यों के लक्ष्यार्थ हैं, एक हैं, नित्य हैं, मलरहित हैं, अचल हैं, सर्व बुद्धियों के साक्षी हैं, सत्त्व, रज, और तम तीनों गुणों के रहित हैं ऐसे श्री सदगुरूदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।

सरस्वती-वंदना

माँ सरस्वती विद्या की देवी है। गुरूवंदना के पश्चात बच्चों को सरस्वती वंदना करनी चाहिए।

 

या कुन्देन्दुतषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाङयापहा।।

अर्थः जो कुंद के फूल, चन्द्रमा, बर्फ और हार के समान श्वेत हैं, जो शुभ्र वस्त्र पहनती हैं, जिनके हाथ उत्तम वीणा से सुशोभित हैं, जो श्वेत कमल के आसन पर बैठती हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा स्तुति करते हैं और जो सब प्रकार की जड़ता हर लेती हैं, वे भगवती सरस्वती मेरा पालन करें।

 

शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगदव्यापिनीं

वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाङयान्धकारापहाम्।

हस्ते स्फाटिकमालिकां च दधतीं पद्मासने संस्थितां

वन्दे तां परमेश्वरीं भगवती बुद्धिप्रदां शारदाम्।।

अर्थः जिनका रूप श्वेत है, जो ब्रह्मविचार की परमतत्त्व हैं, जो सब संसार में व्याप्त रही हैं, जो हाथों में वीणा और पुस्तक धारण किये रहती हैं, अभय देती हैं, मूर्खतारूपी अंधकार को दूर करती हैं, हाथ में स्फटिक मणि की माला लिये रहती हैं, कमल के आसन पर विराजमान हैं और बुद्धि देनेवाली हैं, उन आद्या परमेश्वरी भगवती सरस्वती की मैं वंदना करता हूँ।

सदुगुरू महिमा

श्री रामचरितमानस में आता हैः

गुरू बिन भवनिधि तरहिं न कोई। जौं बिरंधि संकर सम होई।।

भले ही कोई भगवान शंकर या ब्रह्मा जी के समान ही क्यों न हो किन्तु गुरू के बिना भवसागर नहीं तर सकता।

सदगुरू का अर्थ शिक्षक या आचार्य नहीं है। शिक्षक अथवा आचार्य हमें थोड़ा बहुत एहिक ज्ञान देते हैं लेकिन सदगुरू तो हमें निजस्वरूप का ज्ञान दे देते हैं। जिस ज्ञान की प्राप्ति के मोह पैदा न हो, दुःख का प्रभाव न पड़े एवं परब्रह्म की प्राप्ति हो जाय ऐसा ज्ञान गुरूकृपा से ही मिलता है। उसे प्राप्त करने की भूख जगानी चाहिए। इसीलिए कहा गया हैः

 

गुरूगोविंद दोनों खड़े, किसको लागूँ पाय।

बलिहारी गुरू आपकी, जो गोविंद दियो दिखाय।।

 

गुरू और सदगुरू में भी बड़ा अंतर है। सदगुरू अर्थात् जिनके दर्शन और सान्निध्य मात्र से हमें भूले हुए शिवस्वरूप परमात्मा की याद आ जाय, जिनकी आँखों में हमें करूणा, प्रेम एवं निश्चिंतता छलकती दिखे, जिनकी वाणी हमारे हृदय में उतर जाय, जिनकी उपस्थिति में हमारा जीवत्व मिटने लगे और हमारे भीतर सोई हुई विराट संभावना जग उठे, जिनकी शरण में जाकर हम अपना अहं मिटाने को तैयार हो जायें, ऐसे सदगुरू हममें हिम्मत और साहस भर देते हैं, आत्मविश्वास जगा देते हैं और फिर मार्ग बताते हैं जिससे हम उस मार्ग पर चलने में सफल हो जायें, अंतर्मुख होकर अनंत की यात्रा करने चल पड़ें और शाश्वत शांति के, परम निर्भयता के मालिक बन जायें।

 

जिन सदगुरू मिल जाय, तिन भगवान मिलो न मिलो।

जिन सदगरु की पूजा कियो, तिन औरों की पूजा कियो न कियो।

जिन सदगुरू की सेवा कियो, तिन तिरथ-व्रत कियो न कियो।

जिन सदगुरू को प्यार कियो, तिन प्रभु को प्यार कियो न कियो।

दिनचर्या

1.                            बालकों को प्रातः सूर्योदय से पहले ही उठ जाना चाहिए। उठकर भगवान को मनोमन प्रणाम करके दोनों हाथों की हथेलियों को देखकर इस श्लोक का उच्चारण करना चाहिएः कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्यै सरस्वती। करमूले तु गोविन्दः प्रभाते करदर्शनम्।।

अर्थः हाथ के अग्रभाग में लक्ष्मी का निवास है, मध्य भाग में विद्यादेवी सरस्वती का निवास है एवं मूल भाग में भगवान गोविन्द का निवास है। अतः प्रभात में करदर्शन करना चाहिए।

 

2.                            शौच-स्नानादि से निवृत्त होकर प्राणायाम, जप, ध्यान, त्राटक, भगवदगीता का पाठ करना चाहिए।

 

3.                            माता-पिता एवं गुरूजनों को प्रणाम करना चाहिए।

 

4.                            नियमित रूप से योगासन करना चाहिए।

 

5.                            अध्ययन से पहले थोड़ी देर ध्यान में बैठें। इससे पढ़ा हुआ सरलता से याद रह जाएगा। जो भी विषय पढ़ो वह पूर्ण एकाग्रता से पढ़ो।

 

6.                            भोजन करने से पूर्व हाथ-पैर धो लें। भगवान के नाम का इस प्रकार स्मरण करें- ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना।।

प्रसन्नचित्त होकर भोजन करना चाहिए। बाजारू चीज़ नहीं खानी चाहिए। भोजन में हरी सब्जी का उपयोग करना चाहिए।

 

7.                            बच्चों को स्कूल में नियमित रूप से जाना चाहिए। अभ्याम में पूर्ण रूप से ध्यान देना चाहिए। स्कूल में रोज-का-रोज कार्य कर लेना चाहिए।

 

8.                            शाम को संध्या के समय प्राणायाम, जप, ध्यान एवं सत्साहित्य का पठन करना चाहिए।

 

9.                            रात्रि के देर तक नहीं जागना चाहिए। पूर्व और दक्षिण दिशा की ओर सिर रखकर सोने से आयु बढ़ती है। भगवन्नाम का स्मरण करते-करते सोना चाहिए।

प्रातः पानी प्रयोग

प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठकर, मुँह धोये बिना, मंजन या दातुन करने से पूर्व हर रोज करीब सवा लीटर (चार बड़े गिलास) रात्रि का रखा हुआ पानी पीयें। उसके बाद 45 मिनट तक कुछ भी खायें-पीयें नहीं। पानी पीने के बाद मुँह धो सकते हैं, दातुन कर सकते हैं। जब यह प्रयोग चलता हो उन दिनों में नाश्ता या भोजन के दो घण्टे के बाद ही पानी पीयें।

प्रातः पानी प्रयोग करने से हृदय, लीवर, पेट, आँत के रोग एवं सिरदर्द, पथरी, मोटापा, वात-पित्त-कफ आदि अनेक रोग दूर होते हैं। मानसिक दुर्बलता दूर होती है और बुद्धि तेजस्वी बनती है। शरीर में कांति एवं स्फूर्ति बढ़ती है।

 

नोटः बच्चे एक-दो गिलास पानी पी सकते हैं।

 

स्मरण शक्ति बढ़ाने के उपाय

बच्चों की स्मरण शक्ति बढ़ाने के कई उपाय हैं, उसमें कुछ मुख्य उपाय इस प्रकार हैं-

1.      भ्रामरी प्राणायामः

विधिः सर्वप्रथम दोनों हाथों की उँगलियों को कन्धों के पास ऊँचा ले जायें। दोनों हाथों की उँगलियाँ कान के पास रखें। गहरा श्वास लेकर तर्जनी उँगली से दोनों कानों को इस प्रकार बंद करें कि बाहर का कुछ सुनाई न दे। अब होंठ बंद करके भँवरे जैसा गुंजन करें। श्वास खाली होने पर उँगलियाँ बाहर निकालें।

 

लाभः वैज्ञानिकों ने सिद्ध किया है कि भ्रामरी प्राणायाम करते समय भँवरे की तरह गुंजन करने से छोटे मस्तिष्क में स्पंदन पैदा होते हैं। इससे एसीटाईलकोलीन, डोपामीन और प्रोटीन के बीच होने वाली रासायनिक प्रक्रिया को उत्तेजना मिलती है। इससे स्मृतिशक्ति का विकास होता है। यह प्राणायाम करने से मस्तिष्क के रोग निर्मूल होते हैं। अतः हर रोज़ सुबह 8-10 प्राणायाम करने चाहिए।

 

2.      सारस्वत्य मंत्रदीक्षाः समर्थ सदगुरूदेव से सारस्वत्यमंत्र की दीक्षा लेकर मंत्र का नियमित रूप से जप करने से और उसका अनुष्ठान करने से बालक की स्मरणशक्ति चमत्कारिक ढंग से बढ़ती है।

 

3.      सूर्य को अर्घ्यः सूर्योदय के कुछ समय बाद जल से भरा ताँबे का कलश हाथ में लेकर सूर्य की ओर मुख करके किसी स्वच्छ स्थान पर खड़े हों। कलश को छाती के समक्ष बीचोबीच लाकर कलश में भरे जल की धारा धीरे-धीरे प्रवाहित करें। इस समय कलश के धारा वाले किनारे पर दृष्टिपात करेंगे तो हमें हमें सूर्य का प्रतिबिम्ब एक छोटे से बिंदु के रूप में दिखेगा। उस बिंदु पर दृष्टि एकाग्र करने से हमें सप्तरंगों का वलय दिखेगा। इस तरह सूर्य के प्रतिबिम्ब (बिंदु) पर दृष्टि एकाग्र करें। सूर्य बुद्धिशक्ति के स्वामी हैं। अतः सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देने से बुद्धि तीव्र बनती है।

 

4.      सूर्योदय के बाद तुलसी के पाँच-सात पत्ते चबा-चबाकर खाने एवं एक ग्लास पानी पीने से भी बच्चों की स्मृतिशक्ति बढती है। तुलसी खाकर तुरंत दूध न पीयें। यदि दूध पीना हो तो तुलसी पत्ते खाने के एक घण्टे के बाद पीय़ें।

 

5.      रात को देर रात तक पढ़ने के बजाय सुबह जल्दी उठकर, पाँच मिनट ध्यान में बैठने के बाद पढ़ने से बालक जो पढ़ता है वह तुरंत याद हो जाता है।

 

प्राणायाम

प्राणायाम शब्द का अर्थ हैः प्राण+आयाम।

प्राण अर्थात् जीवनशक्ति और आयाम अर्थात नियमन। श्वासोच्छ्वास की प्रक्रिया का नियमन करने का कार्य़ प्राणायाम करता है।

जिस प्रकार एलौपैथी में बीमारियों का कारण जीवाणु, प्राकृतिक चिकित्सा में विजातीय तत्त्व एवं आयुर्वेद में आम रस (आहार न पचने पर नस-नाड़ियों में जमा कच्चा रस) माना गया है उसी प्रकार प्राण चिकित्सा में रोगों का कारण निर्बल प्राण माना गया है। प्राण के निर्बल हो जाने से शरीर के अंग-प्रत्यंग ढीले पड़ जाने के कारण ठीक से कार्य नहीं कर पाते। शरीर में रक्त का संचार प्राणों के द्वारा ही होता है। अतः प्राण निर्बल होने से रक्त संचार मंद पड़ जाता है। पर्याप्त रक्त न मिलने पर कोशिकाएँ क्रमशः कमजोर और मृत हो जाती हैं तथा रक्त ठीक तरह से हृदय में न पहुँचने के कारण उसमें विजातीय द्रव्य अधिक हो जाते हैं। इन सबके परिणामस्वरूप विभिन्न रोग उत्पन्न होते हैं।

यह व्यवहारिक जगत में देखा जाता है कि उच्च प्राणबलवाले व्यक्ति को रोग उतना परेशान नहीं करते जितना कमजोर प्राणबलवाले को। प्राणायाम के द्वारा भारत के योगी हजारों वर्षों तक निरोगी जीवन जीते थे, यह बात तो सनातन धर्म के अनेक ग्रन्थों में है। योग चिकित्सा में दवाओं को बाहरी उपचार माना गया है जबकि प्राणायाम को आन्तरिक उपचार एवं मूल औषधि बताया गया है। जाबाल्योपनिषद् में प्राणायाम को समस्त रोगों का नाशकर्ता बताया गया है।

शरीर के किसी भाग में प्राण ज़्यादा होता है तो किसी भाग में कम। जहाँ ज़्यादा है वहाँ से प्राणों को हटाकर जहाँ उसका अभाव या कमी है वहाँ प्राण भर देने से शरीर के रोग दूर हो जाते हैं। सुषुप्त शक्तियों को जगाकर जीवनशक्ति के विकास में प्राणायाम का बड़ा मह्त्त्व है।

प्राणायाम के लाभः

1.                            प्राणायाम में गहरे श्वास लेने से फेफड़ों के बंद छिद्र खुल जाते हैं तथा रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है। इससे रक्त, नाड़ियों एवं मन भी शुद्ध होता है।

2.                            त्रिकाल संध्या के समय सतत चालीस दिन तक 10-10 प्राणायाम करने से प्रसन्नता, आरोग्यता बढ़ती है एवं स्मरणशक्ति का भी विकास होता है।

3.                            प्राणायाम करने से पाप कटते हैं। जैसे मेहनत करने से कंगाली नहीं रहती है, ऐसे ही प्राणायाम करने से पाप नहीं रहते हैं।

प्राणायाम में श्वास को लेने का, अंदर रोकने का, छोड़ने का और बाहर रोकने के समय का प्रमाण क्रमशः इस प्रकार हैः 1-4-2-2 अर्थात यदि 5 सैकेण्ड श्वास लेने में लगायें तो 20 सैकेण्ड रोकें और 10 सैकेण्ड उसे छोड़ने में लगाएं तथा 10 सैकेण्ड बाहर रोकें यह आदर्श अनुपात है। धीरे-धीरे नियमित अभ्यास द्वारा इस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है।

प्राणायाम के कुछ प्रमुख अंगः

1.      रेचकः अर्थात श्वास को बाहर छोड़ना।

2.      पूरकः अर्थात श्वास को भीतर लेना।

3.      कुंभकः अर्थात श्वास को रोकना। श्वास को भीतर रोकने कि क्रिया को आंतर कुंभक तथा बाहर रोकने की क्रिया को बहिर्कुंभक कहते हैं।

 

विद्यार्थियों के लिए अन्य उपयोगी प्राणायाम

1.      अनलोम-विलोम प्राणायामः इस प्राणायाम में सर्वप्रथम दोनों नथुनों से पूरा श्वास बाहर निकाल दें। इसके बाद दाहिने हाथ के अँगूठे से नाक के दाहिने नथुने को बन्द करके बाँए नथुने से सुखपूर्वक दीर्घ श्वास लें। अब यथाशक्ति श्वास को रोके रखें। फिर बाँए नथुने को मध्यमा अँगुली से बन्द करके श्वास को दाहिने नथुने से धीरे-धीरे छोड़ें। इस प्रकार श्वास के पूरा बाहर निकाल दें और फिर दोनों नथुनों को बन्द करके श्वास को बाहर ही सुखपूर्वक कुछ देर तक रोके रखें। अब पुनः दाहिने नथुने से श्वास लें और फिर थोड़े समय तक रोककर बाँए नथुने से श्वास धीरे-धीरे छोड़ें। पूरा श्वास बाहर निकल जाने के बाद कुछ समय तक रोके रखें। यह एक प्राणायाम हुआ।

 

2.      ऊर्जायी प्राणायामः इसको करने से हमें विशेष ऊर्जा (शक्ति) मिलती है, इसलिए इसे ऊर्जायी प्राणायाम कहते हैं। इसकी विधि हैः

पद्मासन या सुखासन में बैठ कर गुदा का संकोचन करके मूलबंध लगाएं। फिर नथुनों, कंठ और छाती पर श्वास लेने का प्रभाव पड़े उस रीति से जल्दी श्वास लें। अब नथुनों को खुला रखकर संभव हो सके उतने गहरे श्वास लेकर नाभि तक के प्रदेश को श्वास से भर दें। इसके बाद एकाध मिनट कुंभक करके बाँयें नथुने से श्वास धीरे-धीरे छोड़ें। ऐसे दस ऊर्जायी प्राणायाम करें। इससे पेट का शूल, वीर्यविकार, स्वप्नदोष, प्रदर रोग जैसे धातु संबंधी रोग मिटते हैं।

ध्यान-त्राटक-जप-मौन-संध्या तथा मंत्र-महिमा

 

ध्यान महिमा

नास्ति ध्यानसमं तीर्थम्।

नास्ति ध्यानसमं दानम्।

नास्ति ध्यानसमं यज्ञम्।

नास्ति ध्यानसमं तपम्।

तस्मात् ध्यानं समाचरेत्।

ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं। ध्यान के समान कोई दान नहीं। ध्यान के समान कोई यज्ञ नहीं। ध्यान के समान कोई तप नहीं। अतः हर रोज़ ध्यान करना चाहिए।

सुबह सूर्योदय से पहले उठकर, नित्यकर्म करके गरम कंबल अथवा टाट का आसन बिछाकर पद्मासन में बैठें। अपने सामने भगवान अथवा गुरूदेव का चित्र रखें। धूप-दीप-अगरबत्ती जलायें। फिर दोनों हाथों को ज्ञानमुद्रा में घुटनों पर रखें। थोड़ी देर तक चित्र को देखते-देखते त्राटक करें। पहले खुली आँख आज्ञाचक्र में ध्यान करें। फिर आँखें

 

बंद करके ध्यान करें। बाद में गहरा श्वास लेकर थोड़ी देर अंदर रोक रखें, फिर हरि ॐ..... दीर्घ उच्चारण करते हुए श्वास को धीरे-धीरे बाहर छोड़ें। श्वास को भीतर लेते समय मन में भावना करें- मैं सदगुण, भक्ति, निरोगता, माधुर्य, आनंद को अपने भीतर भर रहा हूँ। और श्वास को बाहर छोड़ते समय ऐसी भावना करें- मैं दुःख, चिंता, रोग, भय को अपने भीतर से बाहर निकाल रहा हूँ। इस प्रकार सात बार  करें। ध्यान करने के बाद पाँच-सात मिनट शाँत भाव से बैठे रहें।

लाभः इससे मन शाँत रहता है, एकाग्रता व स्मरणशक्ति बढ़ती है, बुद्धि सूक्ष्म होती है, शरीर निरोग रहता है, सभी दुःख दूर होते हैं, परम शाँति का अनुभव होता है और परमात्मा के साथ संबंध स्थापित किया जा सकता है।

त्राटक

एकाग्रता बढ़ाने के लिए त्राटक बहुत मदद करता है। त्राटक अर्थात दृष्टि के ज़रा सा भी हिलाए बिना एक ही स्थान पर स्थित करना। बच्चों की स्मृतिशक्ति बढ़ाने में त्राटक उपयोगी है। त्राटक की विधि इस प्रकार है।

एक फुट के चौरस गत्ते पर एक सफेद कागज़ लगा दें। उसके केन्द्र में एक रूपये का सिक्के के बराबर का एक गोलाकार चिन्ह बनायें। इस गोलाकार चिह्न के केंद्र में एक तिलभर बिन्दु छोड़कर बाकी के भाग में काला कर दें। बीचवाले बिन्दु में पीला रंग भर दें। अब उस गत्ते को दीवार पर ऐसे रखो कि गोलाकार चिह्न आँखों की सीधी रेखा में रहे। नित्य एक ही स्थान में तथा एक निश्चित समय में गत्ते के सामने बैठ जायें। आँख और

गत्ते के बीच का अंतर तीन फीट का रखें। पलकें गिराये बिना अपनी दृष्टि उस गोलाकार चिह्न के पील केन्द्र पर टिकायें।

पहले 5-10 मिनट तक बैठें। प्रारम्भ में आँखें जलती हुई मालूम पड़ेंगी लेकिन घबरायें नहीं। धीरे-धीरे अभ्यास द्वारा आधा घण्टा तक बैठने से एकाग्रता में बहुत मदद मिलती है। फिर जो कुछ भी पढ़ेंगे वह याद रह जाएगा। इसके अलावा चन्द्रमा, भगवान या गुरूदेव जी के चित्र पर, स्वस्तिक, ॐ या दीपक की ज्योत पर भी त्राटक कर सकते हैं। इष्टदेव या गुरूदेव के चित्र पर त्राटक करने से विशेष लाभ मिलता है।

जप-महिमा

भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है, यज्ञानाम् जपयज्ञो अस्मि। यज्ञों में जपयज्ञ मैं हूँ। श्री राम चरित मानस में भी आता हैः

कलियुग केवल नाम आधारा, जपत नर उतरे सिंधु पारा।

इस कलयुग में भगवान का नाम ही आधार है। जो लोग भगवान के नाम का जप करते हैं, वे इस संसार सागर से तर जाते हैं।

जप अर्थात क्या? = जन्म का नाश, प = पापों का नाश।

पापों का नाश करके जन्म-मरण करके चक्कर से छुड़ा दे उसे जप कहते हैं। परमात्मा के साथ संबंध जोड़ने की एक कला का नाम है जप। एक विचार पूरा हुआ और दूसरा अभी उठने को है उसके बीच के अवकाश में परम शांति का अनुभव होता है। ऐसी स्थिति लाने के लिए जप बहुत उपयोगी साधन है। इसीलिए कहा जाता हैः

अधिकम् जपं अधिकं फलम्।

 

मौनः शक्तिसंचय का महान स्रोत

मौन शब्द की संधि विच्छेद की जाय तो म++न होता है। म = मन, उ = उत्कृष्ट और न = नकार। मन को संसार की ओर उत्कृष्ट न होने देना और परमात्मा के स्वरूप में लीन करना ही वास्तविक अर्थ में मौन कहा जाता है।

वाणी के संयम हेतु मौन अनिवार्य साधन है। मनु्ष्य अन्य इन्द्रियों के उपयोग से जैसे अपनी शक्ति खर्च करता है ऐसे ही बोलकर भी वह अपनी शक्ति का बहुत व्यय करता है।

मनुष्य वाणी के संयम द्वारा अपनी शक्तियों को विकसित कर सकता है। मौन से आंतरिक शक्तियों का बहुत विकास होता है। अपनी शक्ति को अपने भीतर संचित करने के लिए मौन धारण करने की आवश्यकता है। कहावत है कि न बोलने में नौ गुण।

ये नौ गुण इस प्रकार हैं। 1. किसी की निंदा नहीं होगी। 2. असत्य बोलने से बचेंगे। 3. किसी से वैर नहीं होगा। 4. किसी से क्षमा नहीं माँगनी पड़ेगी। 5. बाद में आपको पछताना नहीं पड़ेगा। 6. समय का दुरूपयोग नहीं होगा। 7. किसी कार्य का बंधन नहीं रहेगा। 8. अपने वास्तविक ज्ञान की रक्षा होगी। अपना अज्ञान मिटेगा। 9. अंतःकरण की शाँति भंग नहीं होगी।

 

मौन के विषय में महापुरूष कहते हैं।

सुषुप्त शक्तियों को विकसित करने का अमोघ साधन है मौन। योग्यता विकसित करने के लिए मौन जैसा सुगम साधन मैंने दूसरा कोई नहीं देखा।

-          परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू

 

ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों का भूषण मौन है। - भर्तृहरि

 

बोलना एक सुंदर कला है। मौन उससे भी ऊँची कला है। कभी-कभी मौन कितने ही अनर्थों को रोकने का उपाय बन जाता है। क्रोध को जीतने में मौन जितना मददरूप है उतना मददरूप और कोई उपाय नहीं। अतः हो सके तब तक मौन ही रहना चाहिए।

-          महात्मा गाँधी

 

त्रिकाल संध्या

प्रातः सूर्योदय के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक, दोपहर के 12 बजे से 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक एवं शाम को सूर्यास्त के 10 मिनट पहले से 10 मिनट बाद तक का समय संधिकाल कहलाता है। इड़ा और पिंगला नाड़ी के बीच में जो सुषुम्ना नाड़ी है, उसे अध्यात्म की नाड़ी भी कहा जाता है। उसका मुख संधिकाल में उर्ध्वगामी होने से इस समय प्राणायाम, जप, ध्यान करने से सहज में ज़्यादा लाभ होता है।

अतः सुबह, दोपहर एवं सांय- इन तीनों समय संध्या करनी चाहिए। त्रिकाल संध्या करने वालों को अमिट पुण्यपुंज प्राप्त होता है। त्रिकाल संध्या में प्राणायाम, जप, ध्यान का समावेश होता है। इस समय महापुरूषों के सत्संग की कैसेट भी सुन सकते हैं। आध्यात्मिक उन्नति के लिए त्रिकाल संध्या का नियम बहुत उपयोगी है। त्रिकाल संध्या करने वाले को कभी रोज़ी-रोटी की चिंता नहीं करनी पड़ती। त्रिकाल संध्या करने से असाध्य रोग भी मिट जाते हैं। ओज़, तेज, बुद्धि एवं जीवनशक्ति का विकास होता है। हमारे ऋषि-मुनि एवं श्रीराम तथा श्रीकृष्ण आदि भी त्रिकाल संध्या करते थे। इसलिए हमें भी त्रिकाल संध्या करने का नियम लेना चाहिए।

 

मंत्र-महिमा

मन की मनन करने की शक्ति अर्थात एकाग्रता प्रदान करके जप द्वारा सभी भयों का विनाश करके, पूर्ण रूप से रक्षा करनेवाले शब्दों को मंत्र कहा जाता है। ऐसे कुछ मंत्र और उनकी शक्ति निम्न प्रकार हैः

1.      हरि

ह्रीं शब्द बोलने से यकृत पर गहरा प्रभाव पड़ता है और हरि के साथ यदि ॐ मिला कर उच्चारण किया जाए तो हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों पर अच्छी असर पड़ती है। सात बार हरि ॐ का गुंजन करने से मूलाधार केन्द्र पर स्पंदन होते हैं और कई रोगों को कीटाणु भाग जाते हैं।

 

2.      रामः

रमन्ते योगीनः यस्मिन् स रामः। जिसमें योगी लोग रमण करते हैं वह है राम। रोम रोम में जो चैतन्य आत्मा है वह है राम। राम... राम... का हररोज एक घण्टे तक जप करने से रोग प्रतिकारक शक्ति बढ़ती है, मन पवित्र होता है, निराशा, हताशा और मानसिक दुर्बलता दूर होने से शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त होता है।

 

3.      सूर्यमंत्रः सूर्याय नमः।

इस मँत्र के जप से स्वास्थ्य, दीर्घायु, वीर्य एवं ओज की प्राप्ति होती है। यह मंत्र शरीर एवं चक्षु के सारे रोग दूर करता है। इस मंत्र के जप करने से जापक के शत्रु उसका कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते।

 

4.      सारस्वत्य मंत्रः सारस्वत्यै नमः।

इस मंत्र के जप से ज्ञान और तीव्र बुद्धि प्राप्त होती है।

 

5.      लक्ष्मी मंत्रः श्री महालक्ष्म्यै नमः।

इस मंत्र के जप से धन की प्राप्ति होती है और निर्धनता का निवारण होता है।

 

6.      गणेष मंत्रः श्री गणेषाय नमः। गं गणपतये नमः।

इन मंत्रों के जप से कोई भी कार्य पूर्ण करने में आने वाले विघ्नों का नाश होता है।

7.      हनुमान मंत्रः श्री हनुमते नमः।

इस मंत्र के जप से विजय और बल की प्राप्ति होती है।

 

8.      सुब्रह्मण्यमंत्रः श्री शरणभवाय नमः।

इस मंत्र के जप से कार्यों में सफलता मिलती है। यह मंत्र प्रेतात्मा के दुष्प्रभाव को दूर करता है।

 

9. सगुण मंत्रः श्री रामाय नमः। नमो भगवते वासुदेवाय। नमः शिवाय।

ये सगुण मंत्र हैं, जो कि पहले सगुण साक्षातकार कराते हैं और अंत में निर्गुण साक्षात्कार।

 

10. मोक्षमंत्रः , सोsहम्, शिवोsहम्, अहं ब्रह्मास्मि।

ये मोक्ष मंत्र हैं, जो आत्म-साक्षात्कार में मदद करते हैं।

 

सूर्यनमस्कार

महत्त्वः हमारे ऋषियों ने मंत्र और व्यायामसहित एक ऐसी प्रणाली विकसित की है जिसमें सूर्योपासना का समन्वय हो जाता है। इसे सूर्यनमस्कार कहते हैं। इसमें कुल 10 आसनों का समावेश है। हमारी शारीरिक शक्ति की उत्पत्ति, स्थिति एव वृद्धि सूर्य पर आधारित है। जो लोग सूर्यस्नान करते हैं, सूर्योपासना करते हैं वे सदैव स्वस्थ रहते हैं। सूर्यनमस्कार से शरीर की रक्तसंचरण प्रणाली, श्वास-प्रश्वास की कार्यप्रणाली और पाचन-प्रणाली आदि पर असरकारक प्रभाव पड़ता है। यह अनेक प्रकार के रोगों के कारणों को दूर करने में मदद करता है। सूर्यनमस्कार के नियमित अभ्यास के शारीरिक एवं मानसिक स्फूर्ति के साथ विचारशक्ति और स्मरणशक्ति तीव्र होती है।

पश्चिमी वैज्ञानिक गार्डनर रॉनी ने कहाः सूर्य श्रैष्ठ औषध है। उससे सर्दी, खाँसी, न्युमोनिया और कोढ़ जैसे रोग भी दूर हो जाते हैं।

डॉक्टर सोले ने कहाः सूर्य में जितनी रोगनाशक शक्ति है उतनी संसार की अन्य किसी चीज़ में नहीं।

प्रातःकाल शौच स्नानादि से निवृत होकर कंबल या टाट (कंतान) का आसन बिछाकर पूर्वाभिमुख खड़े हो जायें। चित्र के अनुसार सिद्ध स्थिति में हाथ जोड़ कर, आँखें बन्द करके, हृदय में भक्तिभाव भरकर भगवान आदिनारायण का ध्यान करें-

ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः।

केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपर्धृतशंखचक्रः।।

सवितृमण्डल के भीतर रहने वाले, पद्मासन में बैठे हुए, केयूर, मकर कुण्डल किरीटधारी तथा हार पहने हुए, शंख-चक्रधारी, स्वर्ण के सदृश देदीप्यमान शरीर वाले भगवान नारायण का सदा ध्यान करना चाहिए। - (आदित्य हृदयः 938)

 

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर। दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोsस्तु ते।।

हे आदिदेव सूर्यनारायण! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे प्रकाश प्रदान करने वाले देव! आप मुझ पर प्रसन्न हों। हे दिवाकर देव! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे तेजोमय देव! आपको मेरा नमस्कार है।

 

यह प्रार्थना करने के बाद सूर्य के तेरह मंत्रों में से प्रथम मंत्र मित्राय नमः। के स्पष्ट उच्चारण के साथ हाथ जोड़ कर, सिर झुका कर सूर्य को नमस्कार करें। फिर चित्रों कें निर्दिष्ट 10 स्थितियों का क्रमशः आवर्तन करें। यह एक सूर्य नमस्कार हुआ।

इस मंत्र द्वारा प्रार्थना करने के बाद निम्नांकित मंत्र में से एक-एक मंत्र का स्पष्ट उच्चारण करते हुए सूर्यनमस्कार की दसों स्थितियों का क्रमबद्ध अनुसरण करें।

1. मित्राय नमः।

2. रवये नमः।

3. सूर्याय नमः।

4. भानवे नमः।

5. खगाय नमः।

6. पूष्णे नमः।

7. हिरण्यगर्भाय नमः।

8. मरीचये नमः।

9. आदित्याय नमः।

10. सवित्रे नमः।

11. अकीय नमः।

12. भास्कराय नमः।

13. श्रीसवितृ-सूर्यनारायणाय नमः।

सिद्ध स्थितिः

सिद्ध स्थिति

दोनों पैरों की एडियों और अंगूठे

परस्पर लगे हुए,संपूर्ण शरीर तना हुआ,

दृष्टि नासिकाग्र, दोनोंहथेलियाँ

नमस्कार की मुद्रा में,

अंगूठे सीने से लगे हुए।

पहली स्थितिः

पहलीस्थिति

 

नमस्कार की स्थिति में ही दोनों भुजाएँ सिर

के ऊपर, हाथ सीधे, कोहनियाँ तनी हुईं, सिर

और कमर से ऊपर का शरीर पीछे की झुका

हुआ, दृष्टि करमूल में, पैर सीधे, घुटने तने

दूसरी स्थिति

हुए, इस स्थिति में आते हुए श्वास भीतर भरें।

 

दूसरी स्थितिः  हाथ को कोहनियों से न मोड़ते

      हुए सामने से नीचे की ओर झुकें, दोनों हाथ-पैर सीधे, दोनों      घुटनेऔर कोहनियाँतनी हुईं, दोनों हथेलियाँ दोनों पैरों के पास जमीन के पासलगी हुईं,ललाट घुटनों से लगा हुआ, ठोड़ी उरोस्थि से लगी हुई, इस स्थितिमें श्वास को बाहर छोड़ें।

तीसरी स्थिति

तीसरी स्थितिः बायाँ पैर पीछे, उसका पंजा और  घुटना धरतीसे लगा हुआ, दायाँ घुटना मुड़ा हुआ, दोनों हथेलियाँ पूर्ववत्, भुजाएँ सीधी-कोहनियाँ तनी हुईं, कन्धे और मस्तक पीछे खींचेहुए, दृष्टि ऊपर, बाएँ पैर को पीछे ले जाते समय श्वास को भीतर खींचे।

चौथी स्थिति

चौथी स्थितिः दाहिना पैर पीछे लेकर बाएँ पैर के पास, दोनों हाथ

पैर सीधे, एड़ियाँ जमीन से लगी हुईं, दोनों घुटने और कोहनियाँ

तनी हुईं, कमर ऊपर उठी हुई, सिर घुटनों की ओर खींचा हुआ,

ठोड़ी छाती से लगी हुई, कटि और कलाईयाँ इनमें त्रिकोण, दृष्टि

घुटनों की ओर, कमर को ऊपर उठाते समय श्वास को छोड़ें।

पाँचवीं स्थिति

 

पाँचवीं स्थितिः साष्टांग नमस्कार, ललाट, छाती, दोनों हथेलियाँ, दोनों घुटने, दोनों पैरों के पंजे, ये आठ अंग धरती पर टिके हुए, कमर ऊपर उठाई हुई, कोहनियाँ एक दूसरे की ओर खींची हुईं, चौथी स्थिति में श्वास बाहर ही छोड़ कर रखें।

छठी स्थिति

 

छठी स्थितिः घुटने और जाँघे धरती से सटी हुईं, हाथ

सीधे, कोहनियाँ तनी हुईं, शरीर कमर से ऊपर उठा हुआ

मस्तक पीछे की ओर झुका हुआ, दृष्टि ऊपर, कमर

हथेलियों की ओर खींची हुई, पैरों के पंजे स्थिर, मेरूदंड

धनुषाकार, शरीर को ऊपर उठाते समय श्वास भीतर लें।

सातवीं स्थिति

सातवीं स्थितिः यह स्थिति चौथी स्थिति की पुनरावृत्ति है।

कमर ऊपर उठाई हुई, दोनों हाथ पैर सीधे, दोनों घुटने

और कोहनियाँ तनी हुईं, दोनों एड़ियाँ धरती पर टिकी हुईं,

मस्तक घुटनों की ओर खींचा हुआ, ठोड़ी उरोस्थि से लगी

हुई, एड़ियाँ, कटि और कलाईयाँ इनमें त्रिकोण, श्वास

को बाहर छोड़ें।

आठवीं स्थिति

आठवीं स्थितिः बायाँ पैर आगे लाकर पैर का पंजा दोनों

हथेलियों के बीच पूर्व स्थान पर, दाहिने पैर का पंजा और

घुटना धरती पर टिका हुआ, दृष्टि ऊपर की ओर, इस स्थिति

में आते समय श्वास भीतर को लें। (तीसरी और आठवीं

स्थिति मे पीछे-आगे जाने वाला पैर प्रत्येक सूर्यनमस्कार

में बदलें।)

नौवीं स्थिति

नौवीं स्थितिः यह स्थिति दूसरी की पुनरावृत्ति है, दाहिना

पैर आगे लाकर बाएँ के पास पूर्व स्थान पर रखें, दोनों

हथेलियाँ दोनों पैरों के पास धरती पर टिकी हुईं, ललाट

घुटनों से लगा हुआ, ठोड़ी उरोस्थि से लगी हुई, दोनों हाथ

पैर सीधे, दोनों घुटने और कोहनियाँ तनी हुईं, इस स्थिति में आते समय श्वास को बाहर छोड़ें।

दसवीं स्थिति

दसवीं स्थितिः प्रारम्भिक सिद्ध स्थिति के अनुसार समपूर्ण

शरीर तना हुआ, दोनों पैरों की एड़ियाँ और अँगूठे परस्पर

लगे हुए, दृष्टि नासिकाग्र, दोनों हथेलियाँ नमस्कार की मुद्रा

में, अँगूठे छाती से लगे हुए, श्वास को भीतर भरें, इस प्रकार

दस स्थितयों में एक सूर्यनमस्कार पूर्ण होता है। (यह दसवीं

स्थिति ही आगामी सूर्यनमस्कार की सिद्ध स्थिति बनती

है।)

यौगिक चक्र

चक्रः चक्र आध्यात्मिक शक्तियों के केन्द्र हैं। स्थूल शरीर में ये चक्र चर्मचक्षुओं से नहीं दिखते हैं। क्योंकि ये चक्र हमारे सूक्ष्म शरीर में होते हैं। फिर भी स्थूल शरीर के ज्ञानतंतुओं-स्नायुकेन्द्रों के साथ समानता स्थापित करके उनका निर्देश किया जाता है।

हमारे शरीर में सात चक्र हैं और उनके स्थान निम्नांकित हैं-

1. मूलाधार चक्रः गुदा के नज़दीक मेरूदण्ड के आखिरी बिन्दु के पास यह चक्र होता है।

2. स्वाधिष्ठान चक्रः नाभि से नीचे के भाग में यह चक्र होता है।

3. मणिपुर चक्रः यह चक्र नाभि केन्द्र पर स्थित होता है।

4. अनाहत चक्रः इस चक्र का स्थान हृदय मे होता है।

5. विशुद्धाख्य चक्रः कंठकूप में होता है।

6. आज्ञाचक्रः यह चक्र दोनों भौहों (भवों) के बीच में होता है।

7. सहस्रार चक्रः सिर के ऊपर के भाग में जहाँ शिखा रखी जाती है वहाँ यह चक्र होता है।

 

कुछ उपयोगी मुद्राएँ

प्रातः स्नान आदि के बाद आसन बिछा कर हो सके तो पद्मासन में अथवा सुखासन में बैठें। पाँच-दस गहरे साँस लें और धीरे-धीरे छोड़ें। उसके बाद शांतचित्त होकर निम्न मुद्राओं को दोनों हाथों से करें। विशेष परिस्थिति में इन्हें कभी भी कर सकते हैं।

लिंग मुद्रा

लिंग मुद्राः दोनों हाथों की उँगलियाँ परस्पर

भींचकर अन्दर की ओर रहते हुए अँगूठे को

ऊपर की ओर सीधा खड़ा करें।

लाभः शरीर में ऊष्णता बढ़ती है, खाँसी मिटती

है और कफ का नाश करती है।

 

 

शून्य मुद्राः सबसे लम्बी उँगली (मध्यमा) को

शून्य मुद्रा

अंदपर की ओर मोड़कर उसके नख के ऊपर वाले

भाग पर अँगूठे का गद्दीवाला भाग स्पर्श करायें। शेष

तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः कान का दर्द मिट जाता है। कान में से पस

निकलता हो अथवा बहरापन हो तो यह मुद्रा 4 से 5

मिनट तक करनी चाहिए।

पृथ्वी मुद्रा

पृथ्वी मुद्राः कनिष्ठिका यानि सबसे छोटी उँगली को

अँगूठे के नुकीले भाग से स्पर्श करायें। शेष तीनों

उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः शारीरिक दुर्बलता दूर करने के लिए, ताजगी

व स्फूर्ति के लिए यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक है।

इससे तेज बढ़ता है।

सूर्यमुद्रा

सूर्यमुद्राः अनामिका अर्थात सबसे छोटी उँगली के

पास वाली उँगली को मोड़कर उसके नख के ऊपर

वाले भाग को अँगूठे से स्पर्श करायें। शेष तीनों

उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः शरीर में एकत्रित अनावश्यक चर्बी एवं स्थूलता

को दूर करने के लिए यह एक उत्तम मुद्रा है।

ज्ञान मुद्रा

ज्ञान मुद्राः तर्जनी अर्थात प्रथम उँगली को अँगूठे के

नुकीले भाग से स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ

सीधी रहें।

लाभः मानसिक रोग जैसे कि अनिद्रा अथवा अति

निद्रा, कमजोर यादशक्ति, क्रोधी स्वभाव आदि हो तो

यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक सिद्ध होगी। यह मुद्रा

करने से पूजा पाठ, ध्यान-भजन में मन लगता है।

वरुण मुद्रा

इस मुद्रा का प्रतिदिन 30 मिनठ तक अभ्यास करना चाहिए।

      वरुण मुद्राः मध्यमा अर्थात सबसे बड़ी उँगली के मोड़ कर

उसके नुकीले भाग को अँगूठे के नुकीले भाग पर स्पर्श करायें। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः यह मुद्रा करने से जल तत्त्व की कमी के कारण होने

वाले रोग जैसे कि रक्तविकार और उसके फलस्वरूप होने

वाले चर्मरोग व पाण्डुरोग (एनीमिया) आदि दूर होते है।

प्राण मुद्राः कनिष्ठिका, अनामिका और अँगूठे के ऊपरी भाग

प्राण मुद्राः

को परस्पर एक साथ स्पर्श करायें। शेष दो उँगलियाँ

सीधी रहें।

लाभः यह मुद्रा प्राण शक्ति का केंद्र है। इससे शरीर

निरोगी रहता है। आँखों के रोग मिटाने के लिए व चश्मे

का नंबर घटाने के लिए यह मुद्रा अत्यंत लाभदायक है।

वायु मुद्राः तर्जनी अर्थात प्रथम उँगली को मोड़कर

ऊपर से उसके प्रथम पोर पर अँगूठे की गद्दी

वायु मुद्राः

स्पर्श कराओ। शेष तीनों उँगलियाँ सीधी रहें।

लाभः हाथ-पैर के जोड़ों में दर्द, लकवा, पक्षाघात,

हिस्टीरिया आदि रोगों में लाभ होता है। इस मुद्रा

के साथ प्राण मुद्रा करने से शीघ्र लाभ मिलता है।

अपानवायु मुद्राः अँगूठे के पास वाली पहली उँगली

को अँगूठे के मूल में लगाकर अँगूठे के अग्रभाग की

बीच की दोनों उँगलियों के अग्रभाग के साथ मिलाकर

सबसे छोटी उँगली (कनिष्ठिका) को अलग से सीधी

रखें। इस स्थिति को अपानवायु मुद्रा कहते हैं। अगर

अपानवायु मुद्रा

किसी को हृदयघात आये या हृदय में अचानक

पीड़ा होने लगे तब तुरन्त ही यह मुद्रा करने से

हृदयघात को भी रोका जा सकता है।

लाभः हृदयरोगों जैसे कि हृदय की घबराहट,

हृदय की तीव्र या मंद गति, हृदय का धीरे-धीरे

बैठ जाना आदि में थोड़े समय में लाभ होता है।

पेट की गैस, मेद की वृद्धि एवं हृदय तथा पूरे

शरीर की बेचैनी इस मुद्रा के अभ्यास से दूर होती है। आवश्यकतानुसार हर रोज़ 20 से 30 मिनट तक इस मुद्रा का अभ्यास किया जा सकता है।

 

योगासन

योगासन के नियमित अभ्यास से शरीर तंदरूस्त और मन प्रसन्न रहता है। कुछ प्रमुख आसन इस प्रकार हैं-

पद्मासन

1 पद्मासनः इस आसन से पैरों का आकार पद्म

अर्थात कमल जैसा बनने से इसको पद्मासन या

कमलासन कहा जाता है। पद्मासन के अभ्यास

से उत्साह में वृद्धि होती है, स्वभाव में प्रसन्नता

बढ़ती है, मुख तेजस्वी बनता है, बुद्धि का अलौकिक

विकास होता है तथा स्थूलता घटती है।

उग्रासन (पादपश्चिमोत्तानासन)

 

2. उग्रासन (पादपश्चिमोत्तानासन)- सब आसनों में यह

सर्वश्रेष्ठ है। इस आसन से शरीर का कद बढ़ता है।

शरीर में अधिक स्थूलता हो तो कम होती है।

दुर्बलता दूर होती है, शरीर के सब तंत्र बराबर

कार्यशील होते हैं और रोगों का नाश होता है।

इस आसन से ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है।

 

3. सर्वांगासनः भूमि पर सोकर समस्त शरीर

सर्वांगासन

को ऊपर उठाया जाता है इसलिए इसे

सर्वांगासन कहते हैं। सर्वांगासन के नित्य अभ्यास

से जठराग्नि तेज होती है। शरीर की त्वचा ढीली

नहीं होती। बाल सफेद होकर गिरते नहीं हैं।

मेधाशक्ति बढ़ती है। नेत्र और मस्तक के रोग

दूर होते हैं।

हलासन

 

4. हलासनः इस आसन में शरीर का आकार हल

जैसा बनता है इसलिए इसको हलासन कहा जाता

है। इस आसन से लीवर ठीक हो जाता है। छाती

का विकास होता है। श्वसनक्रिया तेज होकर अधिक

आक्सीजन मिलने से रक्त शुद्ध बनता है। गले के

दर्द, पेट की बीमारी, संधिवात आदि दूर होते हैं।पेट की चर्बी कम होती है। सिरदर्द दूर होता है। रीढ़ लचीली बनती है।

 

5. चक्रासनः इस आसन में शरीर की स्थिति

चक्रासन

चक्र जैसी बनती है इसलिए इसे चक्रासन कहते

हैं। मेरूदण्ड तथा शरीर की समस्त नाड़ियों का

शुद्धिकरण होकर यौगिक चक्र जाग्रत होते हैं।

लकवा तथा शरीर की कमजोरियाँ दूर होती हैं।

इस आसन से मस्तक, गर्दन, पेट, कमर, हाथ,

पैर, घुटने आदि सब अंग बनते हैं। संधì