daivisampada.JPG


 

प्रातः स्मरणीय परम पूज्य

संत श्री आसारामजी बापू के

सत्संग-प्रवचन

दैवी संपदा

निवेदन

जितने भी दुःख, दर्द, पीड़ाएँ हैं, चित्त को क्षोभ कराने वाले.... जन्मों में भटकानेवाले...... अशांति देने वाले कर्म हैं वे सब सदगुणों के अभाव में ही होते हैं

भगवान श्रीकृष्ण ने जीवन में कैसे सदगुणों की अत्यंत आवश्यकता है यह भगवद् गीता के 'दैवासुरसम्पदाविभागयोग' नाम के सोलहवें अध्याय के प्रथम तीन श्लोंकों में बताया है। उन दैवी सम्पदा के छब्बीस सदगुणों को धारण करने से सुख, शांति, आनन्दमय जीवन जीने की कुंजी मिल जाती है, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, ये चारों पुरुषार्थ सहज में ही सिद्ध हो जाते हैं, क्योंकि दैवी सम्पदा आत्मदेव की है।

इस ग्रंथ में संतों ने सरल और उत्साह-प्रेरक प्रवचनों के द्वारा दैवी सम्पदा में स्थित भक्तों के, संतों के जीवन-प्रसंग पर प्रकाश डालते हुए हमें प्रसाद बाँटा है। आप इस ज्ञान-प्रसाद का पठन-मनन करेंगे तो अवश्य लाभान्वित होंगे।

विनीत,

श्री योग वेदान्त सेवा समिति

अहमदावाद आश्रम

अनुक्रम

निवेदन.. 2

दैवी सम्पदा 1. 3

दैवी सम्पदा 2. 17

दैवी सम्पदा -3. 34

जीवन-विकास और प्राणोपासना... 47

सत्संग संचय.. 61

ज्ञानयोग.. 61

राम के दीवाने.. 64

यमराज का 'डिपार्टमेन्ट' 65

सदगुरु-महिमा... 66

ढाई अक्षर प्रेम का...... 67

सफलता की नींव एकाग्रता.. 68

'गुरुत्यागात् भवेन्मृत्युः.....' 70

पुष्प-चयन.. 73

भक्तिमति रानी रत्नावती.. 74

 

दैवी सम्पदा (१)

(दिनांकः २२-७-१९९० रविवार, अहमदावाद आश्रम)

 

अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।

दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ।।

'भय का सर्वथा अभाव, अंतःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यानयोग में निरंतर दृढ़ स्थिति, सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेदशास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान के नाम और गुणों का संकीर्तन, स्वधर्मपालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अंतःकरण की सरलता – ये सब दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।'

(भगवद् गीताः१६.१)

जीवन में निर्भयता आनी चाहिए। भय पाप है, निर्भयता जीवन है। जीवन में अगर निर्भयता आ जाय तो दुःख, दर्द, शोक, चिन्ताएँ दूर हो जाती हैं। भय अज्ञानमूलक है, अविद्यामूलक है और निर्भयता ब्रह्मविद्यामूलक हैं। जो पापी होता है, अति परिग्रही होता है वह भयभीत रहता है। जो निष्पाप है, परिग्रह रहित है अथवा जिसके जीवन में सत्त्वगुण की प्रधानता है वह निर्भय रहता है।

जिसके जीवन में दैवी लक्षण हैं वह यहाँ भी सुखी रहता है और परलोक भी उसके लिए सुखमय हो जाता है। जिसके जीवन में दैवी लक्षण की कमी है वह यहाँ भी दुःखी रहता है और परलोक में भी दुःख पाता रहता है। जीवन में अगर सुख, चैन, आराम, अमन-चमन चाहिए तो 'अमन होना पड़ेगा। अमन माना मन के संकल्प-विकल्प कम हों। अमनी भाव को प्राप्त हो तो जीवन में चमन बढ़ता है।

मनुष्य की वास्तविक अंतरात्मा इतनी महान् है कि जिसका वर्णन करते वेद भगवान भी 'नेति.... नेति.....' पुकार देते हैं। मानव का वास्तविक तत्त्व, वास्तविक स्वरूप ऐसा महान् है लेकिन भय ने, स्वार्थ ने, रजो-तमोगुण के प्रभाव ने उसे दीन-हीन बना दिया है।

दुःख मनुष्य का स्वभाव नहीं है इसलिए वह दुःख नहीं चाहता है। सुख मनुष्य का स्वभाव है इसलिए वह सुख चाहता है। जैसे, मुँह में दाँत रहना स्वाभाविक है तो कभी ऐसा नहीं होता कि दाँत निकालकर फेंक दूँ। जब तक दाँत तन्दुरुस्त रहते हैं तब तक उन्हें फेंकने की इच्छा नहीं होती। भोजन करते वक्त कुछ अन्न का कण, सब्जी का तिनका दाँतों में फँस जाता है तो लूली (जिह्वा) बार-बार वहाँ लटका करती है। जब तक वह कचरा निकला नहीं जाता तब तक चैन नहीं लेती। क्योंकि दाँतों में वह कचरा रहना स्वाभाविक नहीं है।

ऐसे ही सुख तुम्हारे जीवन में आता है तो कोई हर्ज नहीं है लेकिन दुःख आता है तो उसे निकालने के लिए तुम तत्पर हो जाते हो। दाँतों में तिनका रहना अस्वाभाविक लगता है वैसे हृदय में दुःख रहना तुम्हें अस्वाभाविक लगता है। दुःख होता है रजो-तमोगुण की प्रधानता से।

भगवान कहते हैं कि भय का सर्वथा अभाव कर दें। जीवन में भय न आवे। निर्भय रहें। निर्भय वही हो सकता है जो दूसरों को भयभीत न करें। निर्भय वही रह सकता है जो निष्पाप होने की तत्पर हो जाय। जो विलासरहित हो जायगा वह निर्भय हो जायगा।

निर्भयता ऐसा तत्त्व है कि उससे परमात्म-तत्त्व में पहुँचने की शक्ति आती है। किसी को लगेगा कि 'बड़े-बड़े डाकू लोग, गुन्डा तत्त्व निर्भय होते हैं....' नहीं नहीं..... पापी कभी निर्भय नहीं हो सकता। गुन्डे लोग तो कायरों के आगे रोब मारते हैं। जो लोग मुर्गियाँ खाकर महफिल करते हैं, दारू पीकर नशे में चूर होते हैं, नशे में आकर सीधे-सादे लोगों को डाँटते हैं तो ऐसी डाँट से लोग घबरा जाते हैं। लोगों की घबराहट का फायदा गुन्डे लोग उठाते हैं। वास्तव में चंबल की घाटी का हो चाहे उसका बाप हो लेकिन जिसमें सत्त्वगुण नहीं है अथवा जो आत्मज्ञानी नहीं है वह निर्भय नहीं हो सकता। निर्भय वही आदमी होगा जो सत्त्वगुणी हो। बाकी के निर्भय दिखते हुए लोग डामेच होते हैं, पापी और पामर होते हैं। भयभीत आदमी दूसरे को भयभीत करता है। डरपोक ही दूसरे को डराता है।

जो पूरा निर्भय होता है वह दूसरों को निर्भय नारायण तत्त्व में ले जाता है। जो डर रहा है वह डरपोक है। डामेच और गुंडा स्वभाव का आदमी दूसरों का शोषण करता है। निर्भीक दूसरों का शोषण नहीं करता, पोषण करता है। अतः जीवन में निर्भयता लानी चाहिए।

बंगाल में हुगली जिले के देरे गाँव में खुदीराम नाम के व्यक्ति रहते थे। गाँव के जुल्मी जमींदार ने उन्हें अपने मुकद्दमें में झूठी गवाही देने के लिए दम मारा। उन्हें डराते हुए वह बोलाः

"राजा के आगे मेरे पक्ष मं गवाही दे दो। राजा तुम पर विश्वास करेंगे और मेरा काम बन जायेगा। अगर तुम मेरे पक्ष में नहीं बोले तो जानते हो, मैं कौन हूँ? मैंने कइयों के घरों को बरबाद कर दिया है। तुम्हारा भी वही हाल होगा। देरे गाँव में रहना असंभव हो जाएगा।"

खुदीराम ने निर्भयता से जवाब दे दियाः "गाँव में रहना असंभव हो जाये तो भले हो जाय लेकिन मैं झूठी गवाही हरगिज नहीं दूँगा। मैं तो जो सत्य है वही बोल दूँगा।"

उस दुष्ट ने खुदीराम को परेशान करना शुरु कर दिया। खुदीराम बेचारे सीधे सादे प्रामाणिक इन्सान थे। वे गाँव छोड़कर चले गये। कई बिघा, जमीन, गाय-भैंस, घर-बार की हानि हुई फिर भी सत्य पर खुदीराम अडिग रहे।

लोगों की नजरों में खुदीराम को हानि हुई होगी थोड़ी-बहुत लेकिन सत्य की गवाही देने में अडिग रहने से खुदीराम ईश्वर को, परमात्मा को स्वीकार हो गये। गाँव छोड़ना पड़ा, जमीन छोड़नी पड़ी, निर्भीक रहकर सत्य के पक्ष में रहे, झूठी गवाही नहीं दी ऐसे सज्जन को दुष्ट ने बाह्य हानि पहुँचा दी लेकिन ऐसी बाह्य हानि पहुँचने पर भी भक्त का कभी कुछ नहीं बिगड़ता यह सिद्ध करने के लिये भगवान ने उन्हीं देहाती आदमी खुदीराम के घर एक महान् आत्मा को अवतरित किया। वे महान् आत्मा श्री रामकृष्ण परमहंस होकर प्रसिद्ध हुए। उनकी कृपा पाकर विवेकानन्द विश्वविख्यात हुए। धन्य है उस देहाती खुदीराम की सच्चाई और सत्य निष्ठा।

जीवन में निर्भयता आनी चाहिए। पाप के सामने, अनाचार के सामने कभी बोलना पड़े तो बोल देना चाहिए। समाज में लोग डरपोक होकर गुण्डा तत्त्वों को पोसते रहते हैं और स्वयं शोषे जाते हैं। कुछ अनिष्ट घटता हुआ देखते हैं तो उसका प्रतिकार नहीं करते। 'हमारा क्या..... हमारा क्या.....? करेगा सो भरेगा....।' ऐसी दुर्बल मनोदशा से सिकुड़ जाते हैं। सज्जन लोग सिकुड़ जाते हैं, चुनाव लड़ने वाले नेताओं को भी गुण्डे तत्त्वों को हाथ में रखना पड़ता है। क्योंकि समाज के डरपोक लोगों पर उन्हीं की धाकधमकी चलती है।

अतः अपने जीवन में और सारे समाज में अमन-चमन लाना हो तो भगवान श्रीकृष्ण की बात को आज ध्यान से सुनें।

निर्भयता का यह मतलब नहीं है कि बहू सास का अपमान कर देः 'मैं निर्भय हूँ....।' निर्भयता का यह मतलब नहीं कि छोरा माँ-बाप का कहना माने नहीं। निर्भयता का यह मतलब नहीं कि शिष्य गुरु को कह दे कि, 'मैं निर्भय हूँ, आपकी बात नहीं मानूँगा।' यह तो खड्डे में गिरने का मार्ग है। लोग निर्भयता का ऐसा गलत अर्थ लगा लेते हैं।

हरिद्वार में घाटवाले बाबा वेदान्ती संत थे। सत्संग में बार-बार कहते कि निर्भय रहो। उनकी एक शिष्या ने बाबाजी की यह बात पकड़ ली। वह बूढ़ी थी। दिल्ली से बाबाजी के पास आती थी। एक दिन खट्टे आम की पकौड़ियां बना कर बाबाजी के पास ले आयी। बाबाजी ने कहाः "अभी मैंने दूध पीया है। दूध के ऊपर पकौड़े नहीं खाने चाहिए।"

वह बोलीः बाबाजी ! "मैंने मेहनत करके आपके लिय बनाया है। खाओ न....।"

"मेहनत करके बनाया है तो क्या मैं खाकर बीमार पड़ूँ? नहीं खाना है, ले जा।"

"बाबाजी ! आज कुछ भी हो जाए ,मैं खिलाकर छोडूंगी।"

बाबाजी ने डाँटते हुए कहाः "क्या मतलब?"

"आप ही ने तो कहा है कि निर्भय रहो। मैं निर्भय रहूँगी। आप भले कितना भी डाँटो। मैं तो खिलाकर रहूँगी।" वह महिला बोली।

गुरु शिष्या का वह संवाद मैं सुन रहा था। मैंने सोचाः राम.... राम.... राम....। महापुरुष कैसी निर्भयता बता रहे हैं और मूढ़ लोग कैसी निर्भयता पकड़ लेते हैं ! निर्भय बनने का मतलब यह नहीं कि जो हमें निर्भय बनायें उनका ही विरोध करके अपने और उनके जीवन का ह्रास करें। निर्भयता का मतलब नकट्टा होना नहीं। निर्भयता का मतलब मन का गुलाम होना नहीं। निर्भयता का मतलब है जिसमें भगवद् गीता के मुताबिक दैवी सम्पदा के छब्बीस लक्षण भर जायें।

निर्भय जपे सकल भव मिटे।

संत कृपा ते प्राणी छूटे।।

ऐसे निर्भय नारायण तत्त्व में जगने को निर्भयता चाहिए। इसलिये अंतःकरण में भय का सर्वथा अभाव होना चाहिए।

अंतःकरण निर्मल होगा तो निर्भयता आयेगी। ज्ञानयोग में स्थिति होगी, आत्माकार वृत्ति बनाने में रूचि होगी वह आदमी निर्भय रहेगा। ईश्वर में दृढ़ विश्वास होगा तो निर्भयता आयेगी।

जीवन में दान-पुण्य का भी बड़ा महत्त्व है। दान भक्त भी करता है और ज्ञानी भी करता है। भक्त का दान है रूपया-पैसा, चीज-वस्तुएँ, अन्न-वस्त्रादि। ज्ञानी का दान है निर्भयता का, ज्ञानी का दान है आत्म-जागृति का।

नश्वर चीजों को दान में देकर कोई दानी बन जाय वह भक्त है। अपने आपको, अपने स्व-स्वरूप को समाज में बाँटकर, सबको आत्मानंद का अमृत चखानेवाले ज्ञानी महादानी हो जाते हैं।

दीन-हीन, लूले-लँगड़े, गरीब लोगों को सहायता करना यह दया है। जो लोग विद्वान हैं, बुद्धिमान हैं, सत्त्वगुण प्रधान है। जो ज्ञानदान करते कराते हैं ऐसे लोगों की सेवा में जो चीजें अर्पित की जाती हैं वह दान कहा जाता है। भगवान के मार्ग में चलने वाले लोगों का सहाय रूप होना यह दान है। इतर लोगों को सहाय रूप होना यह दया है। दया धर्म का मूल है। दान सत्त्वगुण बढ़ाता है। जीवन में निर्भयता लाता है।

ज्ञानयोग में निरंतर दृढ़ स्थिति करने के लिए जीवन में दान और इन्द्रिय दमन होना चाहिए। इन्द्रिय दमन का मतलब है जितना आवश्यक हो उतना ही इन्द्रियों को आहार देना। आँख को जितना जरूरी हो उतना ही दृश्य दिखाओ, व्यर्थ में इधर-उधर न भटकाओ। कान को जो जरूरी हो वह सुनाओ। व्यर्थ चर्चा, किसी की निन्दा सुनाकर कान की श्रवण-शक्ति का अपव्यय न करो। बोलने-चखने में जिह्वा का उपयोग जितना जरूरी हो उतना करो। व्यर्थ में इन्द्रियों की शक्ति को बाहर क्षीण मत करो। इन्द्रियों की शक्ति क्षीण करने से जीवन की सूक्ष्म शक्ति का ह्रास होता है। फलतः आदमी बहिर्मुख रहता है, चित्त में शांति नहीं रहती और आत्मा में स्थिति करने का सामर्थ्य क्षीण हो जाता है।

अगर जीवन को दिव्य बनाना है, परम तेजस्वी बनाना है, सब दुःखों से सदा के लिए दूर होकर परम सुख-स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार करना है तो सूक्ष्म शक्तियों की जरूरत पड़ती है। सूक्ष्म शक्तियाँ इन्द्रियों के संयम से विकसित होती हैं, सुरक्षित रहती हैं। इन्द्रियों का असंयम करने से सूक्ष्म शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। रोजी-रोटी के लिए तड़फनेवाले मजदूर में और योगी पुरुष में इतना ही फर्क है। सामान्य आदमी ने अपनी सूक्ष्म शक्तियों का जतन नहीं किया जबकि योगी पुरुष शक्तियों का संयम करके सामर्थ्यवान बन जाते हैं।

चलते-चलते बात करते हैं तो दिमाग की शक्ति कमजोर हो जाती है। न खाने जैसा खा लेते हैं, न भोगने जैसा भोग लेते हैं। वे न संसार का सुख ठीक से भोग जाते हैं न आत्मा का सुख ले पाते हैं। दस-बीस रूपये की लाचारी में दिनभर मेहनत करते हैं। खाने-पीने का ढंग नहीं है, भोगने का ढंग नहीं है तो बेचारे रोगी रहते हैं।

योगी पुरुष इहलोक का ही नहीं, ब्रह्मलोक तक का सुख भी भोगते हैं और मुक्तिलाभ भी लेते हैं। वे जानते हैं कि सूक्ष्म शक्तियों का सदुपयोग कैसे किया जाय।

सूक्ष्म  शक्तियों का संरक्षण और संवर्धन करने के लिए अपने आहार-विहार में सजग रहना जरूरी है। दोपहर को भर पेट भोजन किया हो तो शाम को जरा उपवास जैसा कर लेना चाहिए। दिनभर भूखे रहे तो रात्रि को सोने के दो घण्टे पहले अच्छी तरह भोजन कर लेना चाहिए। भोजन के बीच में पानी पीना पुष्टिदायक है। अजीर्ण में पानी औषध है। भूखे पेट पानी पीना विष हो जाता है। खूब भूख लगी है और गिलास दो गिलास पानी पी लिया तो शरीर दुबला-पतला और कमजोर हो जायगा।

क्या खाना, कब खाना, कितना खाना, कैसे खाना..... क्या बोलना, कब बोलना, कितना बोलना, कैसे बोलना, किससे बोलना.... क्या सुनना, कब सुनना, कितना सुनना, किसका सुनना.... इस प्रकार हमारे स्थूल-सूक्ष्म सब आहार में विवेक रखना चाहिए। भोले भाले लोग बेचारे जिस किसी की जैसी तैसी बातें सुन लेते हैं, निन्दा के भोग बन जाते हैं।

'मैं क्या करूँ.....? वह आदमी मेरे पास आया....। उसने निन्दा सुनाई तो मैंने सुन ली।'

अरे भाई ! तूने निन्दा सुन ली? निन्दकों की पंक्ति में शामिल हो गया?

कबीरा निन्दक ना मिलो पापी मिलो हजार।

एक निन्दक के माथे पर लाख पापीन को भार।।

इस जीवन में अपना ही कर्म कट जाय तो भी काफी है। दूसरों की निन्दा सुनकर क्यों दूसरों के पाप अपने सिर पर लेना? जिसकी निन्दा करते हैं, सुनते है वह तो आइस्क्रीम खाता होगा और हम उसकी निन्दा सुनकर अशांति क्यों मोल लें। कब सुनना, क्या सुनना, किसका सुनना और उस पर कितना विश्वास रखना इसमें भी अक्ल चाहिए। अक्ल बढ़ाने के लिए भी अक्ल चाहिए। तप बढ़ाने के लिए भी तप चाहिए। धन बढ़ाने के लिए भी धन चाहिए। जीवनदाता से मिलने के भी जीवन जीने का सच्चा ढंग चाहिए। जीवन में दैवी संपदा होनी चाहिए। दैवी संपदा के कुछ लक्षण बताते हुए भगवान श्रीकृष्ण यह श्लोक कह रहे हैं-

'भय का सर्वथा अभाव, अंतःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यानयोग में निरंतर दृढ़ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्रादि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेदशास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म-पालन के लिए कष्टसहन और शरीर व इन्द्रियों के सहित, अंतःकरण की सरलता ये सब दैवी सम्पदावान पुरुष के लक्षण हैं।'

भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा से तप-तेज बढ़ता है। भगवान या किसी ब्रह्मवेत्ता सदगुरु के चित्र के समक्ष जब मौका मिले, बैठ जाओ। शरीर को स्थिर करके उन्हें एकटक निहारते जाओ। नेत्र की स्थिरता के द्वारा मन को स्थिर करने का अभ्यास करो। ऐसे तप होता है। तप से तेज बढ़ता है। इन्द्रिय-संयम बढ़ता है। जीवन की शक्तियों में वृद्धि होती है, बुद्धि में सूक्ष्मता आती है। समस्याएँ सुलझाने की प्रेरणा मिलती है। व्यवहार में भी आदमी सफल होता है, परमार्थ में भी आगे बढ़ता है।

जीवन में ऐसा अभ्यास है नहीं, इन्द्रिय-संयम है नहीं और ठाकुरजी के मंदिर में जाता है, घंट बजाता है। फिर भी रोता रहता है। सूद पर रूपये लाता है, आर्थिक बोझ में दबता चला जाता है। शिकायत करता रहता है कि, 'यह दुनियाँ बहुत खराब है। मैं तो आपघात करके मर जाऊँ तो अच्छा।'

अरे, डूबा दे जो जहाजों को उसे तूफान कहते हैं।

जो तूफानों से टक्कर ले उसे इन्सान कहते हैं।।

व्यवहार जगत के तूफान तो क्या, मौत का तूफान आये उससे भी टक्कर लेने का सामर्थ्य आ जाय इसका नाम है साक्षात्कार। इसका नाम है मनुष्य जीवन की सफलता।

जरा जरा-सी बात में डर रहे हैं? जरा जरा-सी बात में सिकुड़ रहे हैं? हो होकर क्या होगा? जो भी हो गया वह देख लिया। जो हो रहा है वह देख रहे हैं। जो होगा वह भी देखा जायेगा। मूँछ पर ताव देते हुए.... भगवान को प्यार करते हुए तुम आगे बढ़ते जाओ।

निर्भय..... निर्भय.... निर्भय.... निर्भय..... निर्भय.....।

अरे, भगवान का दास होकर, गुरु का सेवक होकर, मनुष्य का तन पाकर पापी पामरों से, मुर्गियाँ खानेवाले कबाबी-शराबी लोगों से डर रहे हो? वे अपने आप अपने पापों में डूब रहे हैं, मर रहे हैं। महाभारत में अर्जुन जैसा आदमी दुर्योधन से डर रहा है। सोच रहा है कि ऐसे-ऐसे लोग उसके पक्ष में हैं।

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा किः

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।

क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप।।

'हे अर्जुन ! नपुंसकता को मत प्राप्त हो। तेरे लिये यह उचित नहीं है। हे परंतप ! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्यागकर युद्ध के लिए खड़ा हो जा।'

(गीताः२.३)

समाज में सज्जन लोगों की संख्या ज्यादा है लेकिन सज्जन लो सज्जनता-सज्जनता में सिकड़ जाते हैं और दुर्जन लोग सिर पर सवार हो जाते हैं।

तुम डरो मत। घबराओ मत। अभयं सत्त्वसंशुद्धि.... निर्भय बनो। विकट परिस्थितियों में मार्ग खोजो। मार्ग अगर नहीं मिलता हो तो भगवान अथवा सदगुरु के चित्र के समक्ष बैठ जाओ, ॐकार अथवा स्वस्तिक के चित्र समक्ष बैठ जाओ। एकटक निहारो.... निहारो.... निहारो....। सुबह में सूर्योदय से पहल उठ जाओ, स्नानादि करके पाँच-सात प्राणायाम करो। शरीर की स्थिरता, प्राण और मन की स्थिरता करो। फिर 'प्रोब्लेम का सोल्यूशन' खोजो। यूँ चुटकी बजाते मिल जायेगा।

जितने तुम डरते हो, जितने जितने तुम घबराते हो, जितने जितने तुम विनम्र होकर सिकुड़ते हो उतना ये गुण्डा तत्त्ववाले समझते हैं कि हम बड़े हैं और ये हमसे छोटे हैं। तुम जितना भीतर से निर्भीक होकर जीते हो उतना उन लोगों के आगे सफल होते हो।

हमें मिटा सके ये जमाने में दम नहीं।

हमसे जमाना है जमाने से हम नहीं।।

हमारा चैतन्य-स्वरूप ईश्वर हमारे साथ है, हम ईमानदारी से जीते हैं, दूसरों का हम अहित नहीं करते, अहित नहीं चाहते फिर हमारा बुरा कैसे हो सकता है? बुरा होता हुआ दिखे तो डरो मत। सारी दुनिया उल्टी होकर टँग जाय फिर भी तुम सच्चाई में अडिग रहोगे तो विजय तुम्हारी ही होगी।

तामसी तत्त्वों से, आसुरी तत्त्वों से कभी डरना नहीं चाहिए। भीतर से सत्त्वगुण और निर्भयता बढ़ाकर समाज का अमन-चमन बढ़ाने के लिए यत्न करना चाहिए।

'हमारा क्या.....? जो करेगा सो भरेगा...' ऐसी कायरता प्रायः भगतड़ों में आ जाती है। ऐसे लोग भक्त नहीं कहे जाते, भगतड़े कहे जाते हैं। भक्त तो वह है जो संसार में रहते हुए, माया में रहते हुए माया से पार रहे।

भगत जगत को ठगत है भगत को ठगे न कोई।

एक बार जो भगत ठगे अखण्ड यज्ञ फल होई।।

भक्त उसका नाम नहीं जो भागता रहे। भक्त उसका नाम नहीं जो कायर हो जाय। भक्त उसका नाम नहीं जो मार खाता रहे।

जिसस ने कहा थाः 'तुम्हें कोई एक थप्पड़ मार दे तो दूसरा गाल धर देना, क्योंकि उसकी इच्छा पूरी हो। उसमें भी भगवान है।'

जिसस ने यह कहा, ठीक है। इसलिए कहा था कि कोई आवेश में आ गया हो तो तुम थोड़ी सहन शक्ति जुटा लो, शायद उसका द्वेष मिट जाय, हृदय का परिवर्तन हो जाये।

जिसस का एक प्यारा शिष्य था। किसी गुंडा तत्त्व ने उसका तमाचा ठोक दिया। फिर पूछाः "दूसरा गाल कहाँ है?" शिष्य ने दूसरा गाल धर दिया। उस दुष्ट ने यहाँ भी तमाचा जमा दिया। फिर भी उस असुर को संतोष नहीं हुआ। उसने कहाः

"अब तीसरा कहाँ रखूँ?"

जिसस के शिष्य ने उस दुष्ट के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ दिया और बोलाः "तीसरा गाल यह है।"

"तुम्हारे गुरु ने तो मना किया था। उनका उपदेश नहीं मानते?"

"गुरु ने इसलिए मना किया था कि अहिंसा की सुरक्षा हो। हिंसा न हो। लेकिन तुम्हें दो बार मौका मिला फिर भी तुम्हारा हिंसक स्वभाव नहीं मिटा। तुम असुर हो। सबक सिखाये बिना सीधे नहीं होओगे।"

अनुशासन के बिना आसुरी तत्त्व नियंत्रण में नहीं रहते। रावण और दुर्योधन को ऐसे ही छोड़ देते तो आज हम लोगों का समाज शायद इस अवस्था में न जी पाता। नैतिक और सामाजिक अन्धाधूंधी हो जाती। जब-जब समाज में ऐसा वैसा हो जाय तब सात्त्विक लोगों को सतर्क होकर, हिम्मतवान बनकर तेजस्वी जीवन बिताने का यत्न करना चाहिए। आप निर्भय रहे, दूसरों को निर्भय करे। सत्त्वगुण की वृद्धि करे। जीवन में दैवी बल चाहिए, आध्यात्मिक बल चाहिए। केवल व्यर्थ विलाप नहीं करना चाहिए कि, 'हे मेरे भगवान ! हे मेरे प्रभु " मेरी रक्षा करो... रक्षा करो...।'

मैंने सुनी है एक कहानी।

गुलाम नबीर ने रोजे रखे। थोड़ा बहुत भगत था और ठगतों के साथ दोस्थी भी थी। उसका धन्धा चोरी करने का था। रोजे के दिनों में उसने चोरी छोड़ रखी थी। मित्रों ने समझायाः "ऐसा भगतड़ा बनेगा तो काम कैसे चलेगा? फलाने किसान के वहाँ बढ़िया बैल आये हैं। जा, खोल के ले आ।"

गुलाम नबीर बैल चुराने चला गया। नया सिक्खड़ था। बैल खोलकर ले जाने लगा तो बैल के गले में बँधी हुई घंटियाँ बजने लगीं। लोग जग गये और चोर का पीछा किया। गुलाम नबीर आगे चला तो पीछे हल्ला गुल्ला सुनाई देने लगा। उसने डरके मारे खुदा से प्रार्थना कीः "हे खुदाताला ! मैंने रोजा रखा है, मैं कमजोर हो गया हूँ। तू मुझे सहाय कर। मेरे ऊपर रहमत कर। दुबारा यह धन्धा नहीं करूँगा। इस बार बचा ले।"

उसके हृदयाकाश में आकाशवाणी हुई, प्रेरणा मिली कि, "बैलों को छोड़कर भाग जा तो बच जायगा। दुबारा चोरी मत करना।"

"मालिक ! मैं रोजा रख रहा हूँ। मुझमें दौड़ने की शक्ति नहीं है। दया करके आप ही मुझे बचाओ।"

"अच्छा, तू दौड़ नहीं सकता है तो जल्दी से चलकर सामनेवाली झाड़ी में छुप जा। बैलों को छोड़ दे।"

"मुझमें इतनी भी शक्ति नहीं है। तू रहमत कर.... तू रहमत कर....." गुलाम नबीर इस प्रकार गिड़गिड़ाता रहा। इतने में लोगों ने आकर उसे पकड़ लियाः

"मूर्ख ! बोलता है 'रहमत कर... रहमत कर....?' माल चुराते समय रहमत नही की और अब पकड़ा गया तो रहमत कर.. रहमत कर...?" लोगों ने बराबर मेथीपाक चखाया, रात भर कोठरी में बन्द रखा, सुबह में पुलिस को सौंप दिया।

गुलाम नबीर अंतःप्रेरणा की आवाज सुनकर हिम्मत करता तो बच जाता।

हिम्मते मर्दा तो मददे खुदा।

बेहिम्मत बन्दा तो बेजार खुदा।।

जो नाहिम्मत हो जाता है उसको बचाने में भगवान भी बेजार हो जाते हैं, लाचार हो जाते हैं। अपना पुरुषार्थ जगाना चाहिए, हिम्मतवान बनना चाहिए।

यह कौन-सा उकदा जो हो नहीं सकता?

तेरा जी न चाहे तो हो नहीं सकता।

छोटा-सा कीड़ा पत्थर में घर करे....

इन्सान क्या दिले दिलबर में घर न करे?

तुममें ईश्वर की अथाह शक्ति छुपी है। परमात्मा का अनुपम बल छुपा है। तुम चाहो तो ऐसी ऊँचाई पर पहुँच सकते हो कि तुम्हारा दीदार करके लोग अपना भाग्य बना लें। तुम ब्रह्मवेत्ता बन सकते हो ऐसा तत्त्व तुममें छुपा है। लेकिन अभागे विषयों ने, तुम्हारे नकारात्मक विचारों ने, दुर्बल ख्यालों ने, चुगली, निन्दा और शिकायत की आदतों ने, रजो और तमोगुण ने तुम्हारी शक्ति को बिखेर दिया है। इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं-

अभयं सत्त्वसंशुद्धिः.....।

जीवन में दैवी सम्पदा के लक्षण भरो और निर्भय बनो। जितनी तुम्हारी आध्यात्मिक उन्नति होगी उतनी ठीक से सामाजिक उन्नति भी होगी। अगर आध्यात्मिक उन्नति शून्य है तो नैतिक उन्नति मात्र भाषा होगी। आध्यात्मिक उन्नति के बिना नैतिक उन्नति नहीं हो सकती। नैतिक उन्नति नहीं होगी तो भौतिक उन्नति दिखेगी लेकिन वास्तव में वह उन्नति नहीं होगी, जंजीरें होगी तुम्हारे लिये। लोगों की नजरों में बड़ा मकान, बड़ी गाड़ियाँ, बहुत रूपये-पैसे दिखेंगे लेकिन तुम्हारे भीतर टेन्शन ही टेन्शन होगा, मुसीबतें ही मुसीबतें होगी।

आध्यात्मिक उन्नति जितने अनुपात में होती है उतने अनुपात में नैतिक बल बढ़ता है। जितने अनुपात में नैतिक बल बढ़ता है उतने अनुपात में तुम जागतिक वस्तुओं का ठीक उपयोग और उपभोग कर सकते हो। लोग जगत की वस्तुओं का उपभोग थोड़े ही करते हैं, वे तो भोग बन जाते हैं। वस्तुएँ उन्हें भोग लेती हैं। धन की चिन्ता करते-करते सेठ को 'हार्ट-अटैक' हो गया तो धन ने सेठ को भोग लिया। क्या खाक सेठ ने भोगा धन को? कार में तो ड्रायवर घूम रहा है, सेठ तो पड़े हैं बिस्तर में। लड्डू तो रसोईया उड़ा रहा है, सेठ तो डायबिटीज़ से पीड़ित हैं। भोग तो नौकर-चाकर भोग रहे हैं और सेठ चिन्ता में सूख रहे हैं।

अपने को सेठ, साहब और सुखी कहलानेवाले तथा-कथित बड़े-बड़े लोगों के पास अगर सत्त्वगुण नहीं है तो उनकी वस्तुओं का उपभोग दूसरे लोग करते हैं।

तुम्हारे जीवन में जितने अनुपात में सत्त्वगुण होगा उतने अनुपात में आध्यात्मिक शक्तियाँ विकसित होगी। जितने अनुपात में आध्यात्मिक शक्तियाँ होगी उतने अनुपात में नैतिक बल बढ़ेगा। जितने अनुपात में नैतिक बल होगा उतने अनुपात में व्यवहारिक सच्चाई होगी, चीज-वस्तुओं का व्यावहारिक सदुपयोग होगा। तुम्हारे संपर्क में आनेवालों का हित होगा। जीवन में आध्यात्मिक उन्नति नहीं होगी तो नैतिक बल नहीं आएगा। उतना ही जीवन डावाँडोल रहेगा। डावाँडोल आदमी खुद तो गिरता है, उसका संग करने वाले भी परेशान होते हैं।

इन्द्रियों का दमन नहीं करने से सूक्ष्म शक्तियाँ बिखर जाती हैं तो आध्यात्मिक उन्नति नहीं होती।

वाणी का संयम करना माने चुगली, निन्दा नहीं करना, कटु भाषा न बोलना, झूठ-कपट न करना, यह वाणी का तप है। आचार्य की उपासना करना, भगवान की उपासना करना, यह मन का तप है। शरीर को गलत जगह पर न जाने देना, व्रत-उपवास आदि करना यह शारीरिक तप है।

व्रत-उपवास की महिमा सुनकर कुछ महिलाएँ लम्बे-लम्बे व्रत रखने लग जाती है। जो सुहागिन स्त्रियाँ है, जिनका पति हयात है ऐसी महिलाओं को अधिक मात्रा में व्रत उपवास नहीं करना चाहिए। सुहागिन अगर अधिक उपवास करेगी तो पति की आयु क्षीण होगी। सप्ताह में, पन्द्रह दिन में एक उपवास शरीर के लिए भी ठीक है और व्रत के लिए भी ठीक है।

कुछ लोग रोज-रोज पेट में ठूँस-ठूँसकर खाते हैं, अजीर्ण बना लेते हैं और कुछ लोग खूब भूखामरी करते हैं, सोचते हैं कि मुझे जल्दी भगवान मिल जाय। नहीं, व्यवहार में थोड़ा दक्ष बनने की जरूरत है। कब खाना, क्या खाना, कैसे खाना, कब व्रत रखना, कैसे रखना यह ठीक से समझकर आदमी अगर तपस्वी जीवन बिताता है तो उसका बल, तेज बढ़ता है।

प्राणायाम से मन एकाग्र होता है। प्राणायाम से प्राण की रिधम अगर ठीक हो जाय तो शरीर में वात और कफ नियंत्रित हो जाते हैं। फिर बाहर की दवाइयों की ओर 'मेग्नेट थेरापी' आदि की जरूरत नहीं पड़ती है। इन्जैक्शन की सुइयाँ भोंकाने की भी जरूरत नहीं पड़ती है। केवल अपने प्राणों की गति को ठीक से समझ लो तो काफी झंझटो से छुट्टी हो जायगी।

जप करने से एक प्रकार का आभामण्डल बनता है, सूक्ष्म तेज बनता है। उससे शरीर में स्फूर्ति आती है, मन-बुद्धि में बल बढ़ता है। जप करते समय अगर आसन पर नहीं बैठोगे तो शरीर की विद्युत् शक्ति को अर्थींग मिल जायगा। आभा, तेज, ओज, बल की सुरक्षा नही होगी। अतः आसन पर बैठकर प्राणायाम, जप-तप, ध्यान-भजन करना चाहिए। शरीर तन्दुरुस्त रहेगा, मन एकाग्र बनेगा, बुद्धि तेजस्वी होगी, जीवन में सत्त्वगुण की वृद्धि होगी।

सत्त्वात् संजायते ज्ञानम्।

सत्त्वगुण की वृद्धि से ज्ञान उत्पन्न होता है।

आदमी जितना भी पामर हो, उसमें कितने भी दोष हों, अगर थोड़े ही दिन इन साधनों का अवलंबन ले तो उसके दोष अपने आप निकलने लगेंगे।

सूक्ष्म शक्तियों से स्थूल शक्तियाँ संचालित होती हैं। मोटरकार में पेट्रोल से इंजिन के भीतर थोड़ी-सी आग जलती है। इससे इतनी बड़ी गाड़ी भागती है। ट्रेन के बोइलर में थोड़े गेलन पानी होता है, उबलता है, वाष्प बनता है, उससे हजारों मन, लाखों टन वजन को लेकर इंजिन को भागता है।

ऐसे ही मन जब ध्यान-भजन करके सूक्ष्म होता है तो लाखों मुसीबतों को काटकर अपने भगवत्प्राप्त रूपी मोक्ष के द्वार पर पहुँच जाता है। बाहर की गाड़ी तो वाष्प के बल से तुम्हें अहमदावाद से दिल्ली पहुँचाती है जबकि तुम्हारी दिल की गाड़ी अगर सत्त्वगुण बढ़े तो दिलबर तक परमात्मा तक, पहुँचा देती है।

मनुष्य को कभी भी हताश नहीं होना चाहिए। आध्यात्मिक राह को रोशन करने वाले राहबर मिले हैं, साधना का उत्तम वातावरण मिल रहा है, इन बातों को आत्मसात् करने के लिए श्रद्धा-भक्ति और बुद्धि भी है तो जितना हो सके, अधिक से अधिक चल लेना चाहिए। किसी भी दुःखों से, किसी भी परिस्थितियों से रुकना नहीं चाहिए।

गम की अन्धेरी रात में दिल को न बेकरार कर।

सुबह जरूर आयेगी सुबह का इन्तजार कर।।

घबराहट से तुम्हारी योग्यता क्षीण हो जाती है। जब डर आये तो समझो यह पाप का द्योतक है। पाप की उपज डर है। अविद्या की उपज डर है। अज्ञान की उपज डर है। निर्भयता ज्ञान की उपज है। निर्भयता आती है इन्द्रियों का संयम करने से, आत्मविचार करने से। 'मैं देह नहीं हूँ.... मैं अमर आत्मा हूँ। एक बम ही नहीं, विश्वभर के सब बम मिलकर भी शरीर के ऊपर गिर पड़ें तो भी शरीर के भीतर का जो आत्मचैतन्य है उसका बाल बाँका भी नहीं होता। वह चैतन्य आत्मा मैं हूँ। सोऽहम्.... इस प्रकार आत्मा में जागने का अभ्यास करो। 'सोऽहम् का अजपाजाप करो। अपने सोऽहम् स्वभाव में टिको।

विकारों से ज्यों-ज्यों बचते जाओगे त्यों-त्यों आध्यात्मिक उन्नति होगी, नैतिक बल बढ़ेगा। तुम संसार का सदुपयोग कर पाओगे। अभी संसार का सदुपयोग नहीं होता। सरकनेवाली चीजों का सदुपयोग नहीं होता, उनक दुरुपयोग होता है। साथ ही साथ हमारे मन-इन्द्रियों का भी दुरुपयोग हो जाता है, हमारे जीवन का भी दुरुपयोग हो जाता है। कहाँ तो दुर्लभ मनुष्य जन्म..... देवता लोग भी भारत में मनुष्य जन्म लेने के लिए लालायित रहते हैं... वह मनुष्य जन्म पाकर आदमी दो रोटी के लिए इधर उधर धक्का खा रहा है। दो पैसे के मकान के लिए गिड़गिड़ा रहा है ! चार पैसे की लोन लेने के लिए लाईन में खड़ा है ! साहबों को और एजेन्टों को सलाम करता है, सिकुड़ता रहता है। जितना सिकुड़ता है उतना ज्यादा धक्के खाता है। ज्यादा कमीशन देना पड़ता है। तब कहीं लोन पास होता है। यह क्या मनुष्य का दुर्भाग्य है? मानव जीवन जीने का ढंग ही हम लोगों ने खो दिया है।

विलासिता बढ़ गई है। ऐश-आरामी जीवन (Luxurious Life)  जीकर सुखी रहना चाहते हैं वे लोग ज्यादा दुःखी हैं बेचारे। जो भ्रष्टाचार (Corruption) करके सुखी रहना चाहते हैं उनको अपने बेटों के द्वारा, बेटियों के द्वारा और कोई प्रोब्लेम के द्वारा चित्त में अशांति की आग जलती रहती है।

अगर आराम चाहे तू दे आराम खलकत को।

सताकर गैर लोगों को मिलेगा कब अमन तुझको।।

दूसरों का बाह्य ठाठ-ठठारा देखकर अपने शांतिमय आनन्दमय, तपस्वी और त्यागी जीवन को धुँधला मत करो। सुख-वैभव की वस्तुएँ पाकर जो अपने को सुखी मानते है उन पर तो हमें दया आती है लेकिन ऐसे लोगों को सुखी समझकर उन जैसे होने के लिए जो लोग नीति छोड़कर दुराचार के तरफ लगते हैं उन पर हमें दुगनी दया आती है। ये लोग जीवन जीने का ढंग ही नहीं समझते। बढ़िया मकान हो, बढ़िया गाड़ी हो, बढ़िया यह हो, बढ़िया वह हो तो आदमी सुखी हो जाय? अगर ऐसा होता तो रावण पूरा सुखी हो जाता। दुर्योधन पूरा सुखी हो जाता। नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है।

शक्कर खिला शक्कर मिले टक्कर खिला टक्कर मिले।

नेकी का बदला नेक है बदों को बदी देख ले।

दुनियाँ ने जान इसको मियाँ सागर की यह मझदार है।

औरों का बेड़ा पार तो तेरा बेड़ा पार है।।

कलजुग नहीं करजुग है यह इस हाथ दे उस हाथ ले।।

मैंने सुनी है एक सत्य घटना।

अमदावाद, शाहीबाग में डफनाला के पास हाईकोर्ट के एक जज सुबह में दातुन करते हुए घूमने निकले थे। नदी के तरफ दो रंगरूट जवान आपस में हँसी-मजाक कर रहे थे। एक ने सिगरेट सुलगाने के लिए जज से माचिस माँगा। जज ने इशारे से इन्कार कर दिया। थोड़ी देर इधर-उधर टहलकर जज हवा खाने के लिए कहीं बैठ गये। देख रहे थे उन दोनों को। इतने में वे रंगरूट हँसी-मजाक, तू-मैं-तू-मैं करते हुए लड़ पड़े। एक ने रामपुरी चक्कू निकालकर दूसरे को घुसेड़ दिया, खून कर डाला और पलायन हो गया। जज ने पुलिस को फोन आदि सब किया होगा। खून का केस बना। सेशन कोर्ट से वह केस घूमता घामता कुछ समय के बाद आखिर हाई कोर्ट में उसी जज के पास आया। केस जाँचा। उन्हें पता चला कि केस वही है। उस दिन वाली घटना का उन्हें ठीक स्मरण था। उन्होंने अपराधी को देखा तो पाया कि यह उस दिन वाला अपराधी तो नहीं है।

वे जज कर्मफल के अकाट्य सिद्धान्त को माननेवाले थे। वे समझते थे कि लांच-रिश्वत या और कोई भी अशुभ कर्म उस समय तो अच्छा लगता है लेकिन समय पाकर उसके फल भोगने ही पड़ते हैं। पाप करते समय अच्छा लगता है लेकिन भोगना पड़ता है। कुछ समय के लिए आदमी किन्हीं कारणों से चाहे छूट जाय लेकिन देर सवेर कर्म का फल उसे मिलता है, मिलता है और मिलता ही है।

जज ने देखा कि यह अपराधी तो बूढ़ा है जबकि खून करने वाला रंगरूट तो जवान था। उन्होंने बूढ़े को अपनी चेम्बर में बुलाया। बूढ़ा रोने लगाः

"साहब ! डफनाला के पास, साबरमती का किनारा.... यह सब घटना मैं बिल्कुल जानता ही नहीं हूँ। भगवान की कसम, मैं निर्दोष मारा जा रहा हूँ।"

जज सत्त्वगुणी थे, सज्जन थे, निर्मल विचारों वाले, खुले मन के थे। निर्भय थे। निःस्वार्थी और सात्विक आदमी निर्भय रहता है। उन्होंने बूढ़े से कहाः

"देखो, तुम इस मामले में कुछ नहीं जानते यह ठीक है लेकिन सेशन कोर्ट में तुम पर यह अपराध बिल्कुल फिट हो गया है। हम तो केवल कानून का चुकादा देते हैं। अब हम इसमें और कुछ नहीं कर सकते।

इस केस में तुम नहीं थे ऐसा तो मेरा मन भी कहता है फिर भी यह बात भी उतनी ही निश्चित है कि अगर तुमने जीवनभर कहीं भी किसी इन्सान की हत्या नहीं की होती तो आज सेशन कोर्ट के द्वारा ऐसा जड़बेसलाक केस तुम पर बैठ नहीं सकता था।

काका ! अब सच बताओ, तुमने कहीं न कहीं, कभी न कभी, अपनी जवानी में किसी मनुष्य को मारा था?"

उस बूढ़े ने कबूल कर लियाः "साहब ! अब मेरे आखिरी दिन हैं। आप पूछते हैं तो बता देते हूँ कि आपकी बात सही है मैंने दो खून किये थे। लांच-रिश्वत देकर छूट गया था।"

जज बोलेः "तुम तो देकर छूट गये लेकिन जिन्होंने लिया उनसे फिर उनके बेटे लेंगे, उनकी बेटियाँ लेंगी, कुदरत किसी न किसी हिसाब से बदला लेगी। तुम वहाँ देकर छूटे तो यहाँ फिट हो गये। उस समय लगता है कि छूट गये लेकिन कर्म का फल तो देर-सवेर भोगना ही पड़ता है।"

कर्म का फल जब भोगना ही पड़ता है तो क्यों न बढ़िया कर्म करें ताकि बढ़िया फल मिले? बढ़िया कर्म करके कर्म भगवान को ही क्यों न दे दें ताकि भगवान ही मिल जायें?

नारायण..... नारायण.... नारायण...... नारायण.... नारायण......

सत्त्वसंशुद्धि के लिए, निर्भयता के लिए भगवान का ध्यान भगवन्नाम का जप, भगवान के गुणों का संकीर्तन, भगवान और गुरुजनों का पूजन आदि साधन हैं। अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण करना सत्त्वगुण बढ़ाने के लिए हितावह है। पहले के जमाने में यज्ञ-याग होते थे। फिर उसका स्थान इष्ट की मूर्तिपूजा ने लिया। मूर्तिपूजा भी चित्तशुद्धि का एक बढ़िया साधन है। वेदशास्त्रों का पठन-पाठन, जप, कीर्तन आदि से सत्त्वगुण बढ़ता है। सत्त्वगुण बढ़ने से मनोकामना जल्दी से पूर्ण होती है। हल की कामना करने से तप का खर्च हो जाता है। ऊँचे से ऊँची यह कामना करें कि, 'हे भगवान् ! हमारी कोई कामना न रहे। अगर कोई कामना रहे तो तुझे पाने की ही कामना रहे।' ऐसी कामना से तप घटता नहीं, और चार गुना बढ़ जाता है।

जप-तप करके, भगवन्नाम संकीर्तन से सत्त्वगुण बढ़ाओ। स्वधर्मपालन करने में जो कष्ट सहना पड़े वह सहो। तुम जहाँ जो कर्त्तव्य में लगे हो, वहाँ उसी में बढ़िया काम करो। नौकर हो तो अपनी नौकरी का कर्त्तव्य ठीक से बजाओ। दूसरे लोग आलस्य में या गपशप में समय बरबाद करते हों तो वे जानें लेकिन तुम अपना काम ईमानदारी से उत्साहपूर्वक करो। स्वधर्मपालन करो। महिला हो तो घर को ठीक साफ सुथरा रखो, स्वर्ग जैसा बनाओ। आश्रम के शिष्य हो तो आश्रम को ऐसा सुहावना बनाओ कि आने वालों का चित्त प्रसन्न हो जाय, जल्दी से भगवान के ध्यान-भजन में लग जाय। तुम्हें पुण्य होगा।

अपना स्वधर्म पालने मे कष्ट तो सहना ही पड़ेगा। सर्दी-गर्मी,भूख-प्यास,मान-अपमान सहना पड़ेगा। अरे, चार पैसे कमाने के लिए रातपालीवालों को सहना पड़ता हैता है, दिनपालीवालों को सहना पड़ता है तो 'ईश्वरपाली' करने वाला थोड़ा सा सह ले तो क्या घाटा है भैया?

.....तो स्वधर्मपालन के लिए कष्ट सहें। शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अंतःकरण की सरलता रखें। चित्त में क्रूरता और कुटिलता नहीं रखें। जब-जब ध्यान-भजन में या ऐसे ही बैठें तब सीधे, टट्टार बैठें। झुककर या ऐसे-वैसे बैठने से जीवन-शक्ति का ह्रास होता है। जब बैठें तब हाथ परस्पर मिले हुए हों, पालथी बँधी हुई हो। इससे जीवन-शक्ति का अपव्यय होना रुक जायगा। सूक्ष्म शक्ति की रक्षा होगी। तन तन्दुरुस्त रहेगा। मन प्रसन्न रहेगा। सत्त्वगुण में स्थिति करने में सहाय मिलेगी। स्वधर्मपालन में कष्ट सहने पड़े तो हँसते-हँसते सह लो यह दैवी सम्पदावान पुरुष के लक्षण हैं। ऐसे पुरुष की बुद्धि ब्रह्मसुख में स्थित होने लगती है। जिसकी बुद्धि ब्रह्मसुख में स्थित होने लगती है उसके आगे संसार का सुख पाले हुए कुत्ते की तरह हाजिर हो जाता है। उसकी मौज पड़े तो जरा सा उपयोग कर लेता है, नहीं तो उससे मुँह मोड़ लेता है।

जिसके जीवन में सत्त्वगुण नहीं हैं, दैवी संपत्ति नहीं है वह संसार के सुख के पीछे भटक-भटककर जीवन खत्म कर देता है। सुख तो जरा-सा मिला न मिला लेकिन दुःख और चिन्ताएँ उसके भाग्य में सदा बनी रहती हैं।

सब दुःखों की निवृत्ति और परम सुख की प्राप्ति अगर कोई करना चाहे तो अपने जीवन में सत्त्वगुण की प्रधानता लाये। निर्भयता, दान, इन्द्रियदमन, संयम, सरलता आदि सदगुणों को पुष्ट करे। सदगुणों में प्रीति होगी तो दुर्गुण अपने आप निकल जायेंगे। सदगुणों में प्रीति नहीं है, इसलिए दुर्गुणों को हम पोसते हैं। थोड़ा जमा थोड़ा उधार.... थोड़ा जमा थोड़ा उधार... ऐसा हमारा खाता चलता रहता है। पामरों को, कपटियों को देखकर उनका अनुकरण करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। भ्रष्टाचार करके भी धन इकट्ठा करने की चाह रखते हैं। अरे भैया ! वे लोग जो करते हैं वे भैंसा बन कर भोगेंगे, वृक्ष बनकर कुल्हाड़े के घाव सहेंगे, यह तो बाद में पता चलेगा। उनकी नकल क्यों कर रहे हो?

जीवन में कोई भी परिस्थिति आये तो सोचो कि कबीर होते तो क्या करते? रामजी होते तो क्या करते? लखनलाला होते तो क्या करते? सीताजी होती तो क्या करती? गार्गी होती तो क्या करती? मदालसा होती तो क्या करती? शबरी भीलनी होती तो क्या करती? ऐसा सोचकर अपना जीवन दिव्य बनाना चाहिए। दिव्य जीवन बनाने के लिए दृढ़ संकल्प करना चाहिए। दृढ़ संकल्प के लिए सुबह जल्दी उठो। सूर्योदय से पहले स्नानादि करके थोड़े दिन ही अभ्यास करो, तुम्हारा अंतःकरण पावन होगा। सत्त्वगुण बढ़ेगा। एक गुण दूसरे गुणों को ले आता है। एक अवगुण दूसरे अवगुणों को ले आता है। एक पाप दूसरे पापों को ले आता है और एक पुण्य दूसरे पुण्यों को ले आता है। तुम जिसको सहारा दोगे वह बढ़ेगा। सदगुण को सहारा दोगे तो ज्ञान शोभा देगा।

अनुक्रम

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

दैवी सम्पदा

(दिनांकः २९-७-१९९० रविवार, अहमदावाद आश्रम)

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्।

दया भूतेष्वलोलुप्तवं मार्दवं ह्रीरचापलम्।।

'मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्त्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति अर्थात् चित्त की चंचलता का अभाव, किसी की भी निन्दा आदि न करना, सब भूतप्राणियों में हेतु रहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव (ये दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।)

(भगवद् गीताः १६-२)

साधक को कैसा होना चाहिए, जीवन का सर्वांगी विकास करने के लिए कैसे गुण धारण करने चाहिए, जीवन का सर्वांगी विकास करने के लिए कैसे गुण धारण करने चाहिए इसका वर्णन भगवान श्रीकृष्ण 'दैवीसम्पद्विभागयोग' में करते हैं। कुछ ऐसे महापुरुष होते हैं जिनके जीवन में ये गुण जन्मजात होते हैं। कुछ ऐसे भक्त होते हैं जिनके जीवन में भक्ति-भाव से ये गुण धीरे-धीरे आते हैं। उनको यदि सत्संग मिल जाय, वे थोड़ा पुरुषार्थ करे तो गुण जल्दी से आते हैं। साधक लोग साधन-भजन करके गुण अपने में भर लेते हैं।

दैवी सम्पदा आत्मानुभव की जननी है। दैवी सम्पदा आत्मा के निकट है, आत्मा का स्वभाव है, जिनमें दैवी सम्पदा होती है वे लोग बहुत लोगों के प्यारे होते हैं। दैवी सम्पदा में छब्बीस सदगुण बताये गये हैं।

आपने व्यवहार में भी देखा होगा कि आदमी कितना भी बेईमान हो, बदमाश हो, लुटेरा हो, डाकू हो लेकिन वह नहीं चाहता है कि मेरे साथ दूसरा कोई बदमाशी करे। बेईमान आदमी भी अपना मुनीम ईमानदार चाहता है। बदमाश आदमी भी अपना कोषाध्यक्ष या साथी, संगी ईमानदार चाहता है। ईमानदार लोग तो ईमानदार आदमी को प्यार करते ही हैं लेकिन बेईमान लोगों को भी ईमानदार आदमी की आवश्यकता होती है। अर्थात् दैवी गुण आत्मा के निकटवर्ती हैं इसलिए दैवी गुणवालों को प्रायः सब लोग प्यार करते हैं। आसुरी स्वभाव के लोग भी दैवी गुणवाले के प्रति भीतर से झुके हुए होते हैं, केवल बाहर से फुफकारते हैं। श्रीरामजी के प्रति रावण भीतर से झुका हुआ था लेकिन बाहर से फुफकारते फुफकारते मर गया। कंस श्री कृष्ण के प्रति भीतर से प्रभावित था लेकिन बाहर से दुष्टता करता रहा। इस प्रकार जिसमें दैवी गुण होते हैं उसके कुटुम्बी, पड़ोसी आद बाहर से चाहे उसकी दिल्लगी उड़ायें, उपहास करें लेकिन भीतर में उससे प्रभावित होते जाते हैं। अतः साधक को चाहिए कि अगर आसुरी स्वभाव के दस-बीस लोग उसका मजाक उड़ायें, उसका विरोध करें, उसकी निन्दा करें या कोई आरोप-लांछन लगायें तो साधक को चिंतित नहीं होना चाहिए। साधक को कभी भयभीत नहीं होना चाहिए। उसे सदा याद रखना चाहिए किः

इलजाम लगाने वालों ने इलजाम लगाये लाख मगर।

तेरी सौगात समझ हम सिर पे उठाये जाते हैं।।

ये संत-महात्मा-सत्पुरुष-सदगुरुओं की महानता है। वशिष्ठजी महाराज कहते हैं-

"हे रामजी ! मैं बाजार से गुजरता हूँ तब पापी लोग मेरे लिए क्या क्या बोलते हैं यह सब मैं जानता हूँ लेकिन मेरा दयालु स्वभाव है।"

साधक के जीवन में भी भीतर दया होनी चाहिए। दया का मतलब यह नहीं है कि सदा मूर्ख बना रहे। कभी दुष्टजन के प्रति फूफकार भी कर दे लेकिन भीतर से अपने चित्त को चैतन्य के रस से सराबोर करता जाय।

भगवान श्रीकृष्ण साधक के जीवन में साध्य तत्त्व का जल्दी से साक्षात्कार हो जाय इसलिए दैवी गुणों का वर्णन कर रहे हैं। दैवी सम्पदा के गुण देव की अनुभूति के करीब ले जाते हैं। देव वह परमेश्वर है जो सर्वत्र है, सर्वशक्तिमान है, सूक्ष्मातिसूक्ष्म है। कहा है किः 'मातृदेवो भव..... पितृदेवो भव.... आचार्यदेवो भव.... अतिथिदेवो भव.....।' इन माता, पिता, आचार्य, अतिथि आदि हाथ-पैर, नाक-मुँहवाले देवों में जो वास्तविक देव है, जो अन्तर्यामी देव है वह परमात्मा तुम्हारे अन्तःकरण में भी बैठा है। उस देव का अनुभव करने के लिए दैवी सम्पदा नितान्त आवश्यक है। दैवी सम्पदा आत्मा-परमात्मा के साक्षात्कार तक पहुँचा देती है।

स्थूल-शरीरधारी को सर्वथा अहिंसक होना तो संभव नहीं लेकिन अपने स्वार्थ के कारण किसी के चित्त को, किसी के तन-मन को, किसी के जीवन को कष्ट न देना यह अहिंसा है। डॉक्टर शल्य क्रिया करता है, मरीज को पीड़ा पहुँचाता है लेकिन उसका पीड़ा पहुँचाने का स्वार्थ नहीं है। उसका स्वार्थ है कि मरीज निरोग हो जाय। इसलिय अंगों की काटाकुटी करना, रक्त बहाना डॉक्टर के लिए हिंसा नहीं मानी जाती।

हिंसा का जन्म तमोगुण से होता है। प्रतिहिंसा रजोगुण से पैदा होती है। अहिंसा सत्त्वगुण से पैदा होती है। श्रीकृष्ण की अहिंसा सत्त्व-रजो-तमोगुणजन्य नहीं है। श्रीकृष्ण की अहिंसा यह है कि जिस तत्त्व की कभी मृत्यु नहीं होती उसमें टिककर व्यवहार करना। यह परम अहिंसा है, अहिंसा का सूक्ष्मतम स्वरूप है।

अहिंसा परमो धर्मः।

परम तत्त्व में जो टिक गया, अचल तत्त्व में जो प्रतिष्ठित हो गया वही इस परम धर्म को उपलब्ध होता है।

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।

अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते।।

'वास्तव में सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं तो भी जिसका अंतःकरण अहंकार से मोहित हो रहा है ऐसा अज्ञानी 'मैं कर्त्ता हूँ' ऐसा मानता है।'

(गीताः ३-२७)

प्रकृति में होने वाले कर्मों को जो कर्त्ता बनकर अपने में थोपता है वह कितना भी अहिंसक हो जाय फिर भी उसके द्वारा हिंसा हो जायगी और अपने स्वरूप में टिककर नरो वा कुंजरो वा की लीला करवाकर पापी तत्त्वों को जगत से हटवाते हैं तभी भी श्रीकृष्ण सदा अहिंसक हैं।

सत्य का मतलब है यथार्थ और प्रिय भाषण। अंतःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम है सत्य भाषण। सत्य मधुर और हितकारी होता है। माँ मधुर वचन बोलती है, उसमें बालक हित है लेकिन डाकिनी मधुर वचन बोलती है लेकिन उसका वचन हितकारी नही होता। वेश्या मधुर वचन बोलती है लेकिन उसका वचन आदमी के तेज-ओज-वीर्य का सत्यानाश करने वाला होता है।

'सेल्समैन' मधुर वचन बोलता है तो उसमें अपना सौदा करने का स्वार्थ भरा होता है। माँ मधुर वचन बोलती है तो उसके वचन में अपने संतान-पुत्र-पुत्री-कुटुम्बी का हित छुपा हुआ है। अतः मधुर वचन सत्य होना चाहिए और साथ ही साथ हितकर होना चाहिए। अहिंसा वह है जिसमें मन, कर्म, वचन से किसी के तन-मन-जीवन को स्वार्थ के लिए सताने का प्रयास न किया जाय।

क्रोध का न होना अक्रोध है। श्रीरामचन्द्रजी के चित्त में पूरी शान्ति थी। उनके निकटवर्ती लोगों को चिन्ता हुई कि रामजी इतने शान्त रहेंगे तो रावण मरेगा कैसे? उन्होंने राम जी से विनती की किः "प्रभु ! आप क्रोध कीजिए।" फिर रामजी ने क्रोध का आवाहन कियाः 'हे क्रोध ! अहं त्वं आवाहयामि। मैं तुम्हारा आवाहन करता हूँ।' श्रीरामजी ने उपयोग करने के लिए क्रोध को बुलाया।

परिवार में अनुशासन करने के लिए, व्यवहार-जीवन में फुफकारने के लिए कभी क्रोध करना पड़े यह एक बात है लेकिन हम लोग प्रायः क्रोध का उपयोग नहीं करते अपितु क्रोध से आक्रान्त हो जाते है, क्रोध हमारे ऊपर सवार हो जाता है। क्रोध आग जैसा खतरनाक है। घर में चोरी हो जाय तो कुछ न कुछ सामान बचा रहता है, बाढ़ का पानी आ जाय फिर भी सामान बचा रहता है, बाढ़ का पानी आ जाय फिर भी सामान बचा रहता है लेकिन घर में आग लग जाय तो सब कुछ स्वाहा हो जाता है, कुछ भी बचता नहीं। उसी प्रकार अपने अन्तःकरण में यदि लोभ, मोहरूपी चोर प्रविष्ट हो जाय तो कुछ पुण्य क्षीण हो जाय, फिर भी चित्त में शांति और प्रसन्नता का कुछ अंश बचता है लेकिन अन्तःकरण में क्रोधरूपी आग लग जाय तो सारी शांति भंग हो जाती है, जप-तप-दान आदि पुण्य-प्रभाव क्षीण होने लगता है। इसीलिए भगवान कहते हैं- जीवन में अक्रोध लाना चाहिए। स्वभाव में से क्रोध को विदा करना चाहिए।

प्रश्न होगा कि दुर्वासा आदि इतना क्रोध करते थे फिर भी महान् ऋषि थे। यह कैसे?

दुर्वासा ज्ञानी थे। क्रोध करते हुए दिखते थे, श्राप देते हुए दिखते थे। फिर भी वे अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित थे। ज्ञानी को संसारी तराजू में नहीं तोला जाता। सामान्य आदमी क्रोध करे तो उसका तप क्षीण हो जाता है। उसका वचन सिद्ध नहीं होता।

दुर्वासा कहीं अपनी मस्ती में बैठे थे। आधा मील दूर से कोई ब्राह्मण गुज़र रहा था। दुर्वासा ने चिल्ला कर उसे अपने पास बुलायाः

"एइ.... इधर आ, ब्राह्मण के बच्चे....!"

वह पास आकर हाथ जोड़ते हुए बोलाः

"जी महाराज !"

"कहाँ गया था तू?"

"मैं तप करने गया था। बेटा नहीं हो रहा था। माता जी की प्रसन्नता के लिए मैंने तीन साल तक तप किया। माँ प्रकट हुई, मुझे पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया।"

"हाँ, पुत्र-प्राप्ति का वरदान दिया....! तुझे पता नहीं, दुर्वासा यहाँ बैठे हैं? प्रणाम किये बिना तू उधर से ही चला जाता है? जा, वरदान केन्सल है। तुझे पुत्र नहीं होगा। क्या समझता है..."

दूर से गुजरते हुए आदमी को इस प्रकार श्राप दे देना...! इतना क्रोध होने पर भी दुर्वासा का वचन फलित होता था, क्योंकि दुर्वासा ब्रह्मवेत्ता थे। दुर्वासा क्रोध करते हुए दिखते थे। उस ब्राह्मण के वास्तविक कल्याण के लिए यह होना जरूरी था इसलिए दुर्वासा के द्वारा क्रोध हो गया।

दुर्वासा श्रीकृष्ण के वहाँ अतिथि होकर रहे, चित्र-विचित्र चेष्टाएँ करके उनको उद्विग्न करने का, क्रोधित करने का प्रयास किया लेकिन श्रीकृष्ण अपनी सत्तासमान में स्थित रहे। श्रीकृष्ण की समता का जगत को दर्शन कराने के लिए दुर्वासा ने लीला की थी। उन्हें जिस खण्ड में ठहराया गया था उस खण्ड में जो बढ़िया चीज वस्तुएँ थी, सर-समान था, सुन्दर बिछौने, गद्दी-तकिये, चन्दनकाष्ठ की बनी हुई चीजें आदि सब खण्ड के बीच इकट्ठा करके आग लगा दी। अपने बाल खोलकर वहाँ 'होली... होली....' करके नाचने लगे फिर भी श्री कृष्ण को क्रोध नहीं आया।

दुर्वासा ने खाने के लिए बहुत सारी खीर बनवाई। कुछ खीर खाई। बाकी बची हुई जूठी खीर श्रीकृष्ण को देते हुए आज्ञा कीः 'यह खीर अपने शरीर पर चुपड़ दो।' श्रीकृष्ण ने गुरुदेव की बची हुई खीर उठा कर अपने मुख सहित सर्व अंगों पर चुपड़ दी। दुर्वासा ने देखा कि श्रीकृष्ण के चित्त में कोई शिकायत नहीं है।

मुस्कराकर गम का जहर  जिनको पीना आ गया।

यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया।।

श्रीकृष्ण की प्रसन्नता और मस्ती ज्यों-की-त्यों बनी रही। क्या अदभुत है समता ! किससे व्यवहार करना, कहाँ करना, कब करना, कैसा करना, कितना करना यह श्रीकृष्ण जानते हैं। वे ज्ञान की मूर्ति हैं। दुर्वासा उनको क्रोधित करने के लिए, उद्विग्न करने के लिए चेष्टा करते हैं लेकिन श्रीकृष्ण के चित्त में कोई शिकायत नहीं है। एक बार दुर्वासा ऋषि के आगे सिर झुका दिया, अतिथि देव की आवभगत कर दी फिर उनके लिए शिकायत कैसी?

जो मंजिल चलते हैं वे शिकवा नहीं किया करते।

जो शिकवा किया करते हैं वे मंजिल नहीं पहुँचा करते।।

रूक्मिणी गुरु-शिष्य की लीला देख रही है, मुस्कुरा रही है कि गुरु तो पक्के हैं लेकिन चेले भी कच्चे नहीं हैं, चेले भी गुरु ही हैं। उनका चित्त प्रसन्न हो रहा है कि मेरे कृष्ण का चित्त कितनी समता में स्थित है !

दुर्वासा की नजर रुक्मिणी के हास्य पर गई तो गरज उठेः

"अरे ! तू हँस रही है? इधर आ।"

रुक्मिणी जी के बाल पकड़कर उनके मुख पर दुर्वासा ने अपने हाथ से जूठी खीर चुपड़ दी। फिर तिरछी आँख से श्रीकृष्ण की ओर निहारते हैं। श्रीकृष्ण स्वरूप में शान्त और सम हैं। दुर्वासा ने देखा कि यह बाण भी फेल हो गया। अब नया निशाना ताकाः

"ऐ कृष्ण ! मुझे रथ पर बैठकर नगरयात्रा करनी है। घोड़ों के बदले तुम दोनों रथ खींचोगे।"

"जो आज्ञा।"

श्रीकृष्ण और रुक्मिणी दोनों रथ में जुत गये और दुर्वासा रथारूढ़ हुए। नगर के राजमार्ग से रथ गुजर रहा है। दुर्वासा दोनों पर कोड़े फटकारते जा रहे हैं। कोमल अंगना रुक्मिणी जी की क्या हालत हुई होगी ! बाजार के लोग आश्चर्य में डूबे जा रहे हैं कि द्वारकाधीश श्रीकृष्ण कौन से बाबा के चक्कर में आ गये हैं !

श्रीकृष्ण कहते हैं कि चौरासी के चक्कर से निकलना हो, मन के चक्कर से निकलना हो तो दुर्वासा ऋषि जैसे किसी बह्रमवेत्ता सद्गुरूओं के चरणों में और उनके चक्करों में जरूर आना चाहिए।

कोई स्त्री के चक्कर में है, कोई बच्चों के चक्कर में है, कोई धन के चक्कर में है, कोई सत्ता के चक्कर में है, कोई मन के चक्कर में है। इन सारे चक्करों से निकलने के लिए कन्हैया गुरु के चक्कर में है।

भगवद् गीता का इतना माहात्म्य क्यों है? क्योंकि उसमें श्रीकृष्ण जो कहते हैं वह उनके जीवन में है। अक्रोध माना अक्रोध। क्रोध कहाँ करना चाहिए यह वे भली प्रकार जानते हैं। कंस को आलिंगन करते-करते यमसदन पहुँचा दिया। फिर उसकी उत्तरक्रिया कराने में श्रीकृष्ण के चित्त में द्वेष नहीं है। रावण, कुंभकर्ण और इन्द्रजीत की उत्तरक्रिया कराने में श्रीरामजी को कोई द्वेष नहीं था क्योंकि समता उनका सहज सिद्ध स्वभाव है।

समत्वं योग उच्यते।

हजार वर्ष तक शीर्षासन करो, वर्षों तक पैदल तीर्थयात्रा करो, भूखे रहो, खड़ेश्वरी और तपेश्वरी होकर तपश्चर्या करो फिर भी एक क्षण की चित्त की समता के तप के आगे वह तुम्हारा तप छोटा हो जायगा। अतः चित्त को समता में स्थिर करो।

काम आता है तो पीड़ित कर देता है, क्रोध आता है तो जलाने लगता है, लोभ आता है तो गुगला कर देता है। इन विकारों से आक्रान्त मत हो जाओ। काम का उपयोग करो, क्रोध का उपयोग करो, लोभ का उपयोग करो।

तुम कमरे में बैठे हो। अपनी मौज से भीतर से दरवाजा बन्द करके बैठो यह तुम्हारा स्वातन्त्र्य है। आधा घण्टा बैठो, चाहे दो घण्टा बैठो, चाहे चार घण्टा बैठो, कोई बन्धन नहीं है। अगर दूसरा कोई बाहर से कुंडा लगाकर तुमको कमरे में बन्द कर दे तो यह तुम्हारी पराधीनता है, चाहे वह दस मिनट के लिए ही क्यों न हो।

साधनों का उपयोग करना यह स्वाधीनता है। साधनों से अभिभूत हो जाना, साधनों के गुलाम हो जाना यह पराधीनता है। क्रोध आ गया तो अशांत हो गये, लोभ आ गया तो हम लोभी हो गये, काम आ गया तो हम कामी हो गये,  मोह आया तो हम मोही हो गये। विकार हमारा उपयोग कर लेता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि का स्वतन्त्र ढंग से उपयोग करना चाहिए। जैसे गुलाब का फूल है। उसको सूँघा, अच्छा लगा। ठीक है, उसकी सुगन्ध का उपयोग किया। अगर फूल की सुगन्ध में आसक्ति हुई तो हम बँध गये।

अपने चित्त में किसी भी विकार का आकर्षण नहीं होना चाहिए। विकारों का उपयोग करके स्वयं को और दूसरों को निर्विकार नारायण में पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए, न कि विकारों में फँस मरना चाहिए। कूँआ बनाया है तो शीतल पानी के लिए, न कि उसमें डूब मरने के लिए।

श्रीकृष्ण के चित्त में दुर्वासा की अँगड़ाइयों के कारण क्षोभ नहीं हुआ। दुर्वासा ने देखा कि मैंने इतने-इतने अशान्त करने के बाण फेंके लेकिन श्रीकृष्ण की शांति अनूठी है। आखिर दुर्वासा से रहा नहीं गया। वे बोल उठेः

"कृष्ण ! अब बताओ, तुम क्या चाहते हो?"

"गुरुदेव ! आप सदा मुझ पर प्रसन्न रहें। मेरे लिए दुनिया चाहे कुछ भी बोले, कुछ भी कर ले लेकिन मेरे गुरुदेव मेरे से न रूठें, बस मैं इतना ही चाहता हूँ।"

श्रीकृष्ण गुरु की जगह पर पूरे गुरु हैं। कृष्णं वन्दे जगदगुरुम् और शिष्य की जगह पर पूरे शिष्य हैं।

दुर्वासा ने छलकते हुए आशीर्वाद दियाः "कन्हैया ! मैं तो तेरे पर प्रसन्न हूँ ही लेकिन जो तेरा नाम लेगा वह भी प्रसन्न हो जायेगा। देख भैया ! तूने एक गल्ती की। मैंने तुझे सारे शरीर पर खीर चुपड़ने को कहा था। जहाँ-जहाँ वह खीर लगी वे सब तेरे अंग वज्र जैसे अभेद्य बन गये लेकिन पैरों के तलों को तूने खीर नहीं लगायी। वह भाग कच्चा रह गया। अपने पैरों के तलुवों को बचाना, बाकी सब जगह तुम वज्रकाय बन गये हो।"

हम जानते हैं कि आखिर में उन्हीं  पैर के तलुवे में व्याध का बाण लगा और उसी निमित्त से वे महानिर्वाण को प्राप्त हुए।

श्रीकृष्ण ने भगवदगीता में अक्रोध कह दिया तो वे स्वयं भी अक्रोध होने में उत्तीर्ण हुए हैं। हमारे जीवन में भी जब क्रोध आये तब हम सावधान हों। सोचें कि मेरी जगह पर श्रीकृष्ण होते तो क्या करते? श्रीराम होते तो क्या करते? बुद्ध होते तो क्या करते? कबीरजी होते तो क्या करते?

क्रोध करने की जगह तो उस समय क्रोध करो लेकिन हृदय में क्रोध उत्पन्न न हो, बाहर से क्रोध करने का नाटक हो। अगर क्रोध आता हो तो देखो कि क्रोध आ रहा है। उस समय शांत हो जाओ, स्वस्थ हो जाओ। बाद मे किसी को समझाना हो तो समझाओ, क्रोध का नाटक कर लो, फुफकार मार दो। अपने पर क्रोध को हावी मत होने दो। हम क्या करते हैं? क्रोध को दबाने की कोशिश करते हैं लेकिन क्रोध दबता नहीं और हम भीतर से उलझते रहते हैं, सुलगते रहते हैं, जलते रहते हैं।

जीवन में त्याग कैसा होना चाहिए? जो बीत गया है उसको याद कर-करके अपने चित्त को खराब न करो। उसे भूल जाओ। भोग-सामग्री का अति संग्रह करके अपने चित्त को बोझिल न बनाओ।

त्यागात् शांतिरनन्तरम्।

'त्याग से तत्काल शांति मिलती है।'

(गीता)

जीवन में भीतर से जितना त्याग होगा उतनी ही शांति रहेगी। फिर चाहे तुम्हारे पास सोने की द्वारिका हो और वह डूब रही हो फिर भी चित्त में शोक न होगा। श्रीकृष्ण की द्वारिका समुद्र में डूबी फिर भी उनके चित्त में कोई आसक्ति नहीं थी। उनका चित्त त्याग से पूर्ण था।

गांधारी ने श्रीकृष्ण को शाप दिया कि ३६ साल के बाद तुम्हारे देखते ही तुम्हारा यादव वंश नष्ट-भ्रष्ट हो जायगा और श्रीकृष्ण के देखते-देखते ही यदुवंश का नाश हुआ। फिर भी श्रीकृष्ण उद्विग्न नहीं हुए।

जीवन में त्याग होना चाहिए, शांति होना चाहिए। शांति त्याग का अनुगमन करती हुई अपने आप आ जाती है।

अपैशुनम् का अर्थ है चाड़ी-चुगली न करना। कभी किसी की निन्दा, चाड़ी-चुगली, आलोचना नहीं करना चाहिए। कोई आदमी किसी की निन्दा करता है तो सुनने वाला उसमें अपना अर्थ जोड़ लेता है, कुछ ज्यादा मसाला भर देता है। वह जब तीसरे आदमी के आगे बोलेगा तो वह भी अपने मन का रंग उसमें मिला देता है। वह जब चौथे के आगे बात करेगा तो और कचरा जुड़ जायगा। मूल में बात कोई छोटी-मोटी होती है लेकिन बात करने वालों के अपने-अपने ढंग के विकृत स्वभाव होने से वह बात न जाने कैसा रूप ले लेती है। जरा सी बात ने महाभारत का युद्ध करवा दिया।

अस्त्र-शस्त्र का घाव तो समय पाकर भर जाता है मगर बिना हड्डी की लूली (जिह्वा) का घाव नहीं मिटता, मरने पर भी नहीं मिटता। इसलिए वाणी बोलते समय खूब सावधान रहो।

वाणी ऐसी बोलिये मनवा शीतल होय।

औरन को शीतल करे आपहुँ शीतल होय।।

शाह हाफिज ने कहाः "हे इन्सान ! तू हजार मंदिर तोड़ दे, हजार मस्जिद तोड़ दे लेकिन किसी का जिन्दा दिल मत तोड़ना, क्योंकि उस दिल में दिलबर खुद रहता है।"

कबीर जी ने कहाः

कबीरा निन्दक ना मिलो पापी मिलो हजार।

एक निन्दक के माथे पर लाख पापीन को भार।।

हे इन्सान ! ईश्वर के मार्ग पर जाने वाले साधक की श्रद्धा मत तोड़।

विवेकानन्द कहते थेः 'तुम किसी का मकान छीन लो यह पाप तो है लेकिन इतना नहीं। वह घोर पाप नहीं है। किसी के रूपये छीन लेना पाप है लेकिन किसी की श्रद्धा की डोर तोड़ देना यह सबसे बड़ा घोर पाप है क्योंकि उसी श्रद्धा से वह शांति पाता था, उसी श्रद्धा के सहारे वह भगवान के तरफ जाता था।

तुमने किसी का मकान छीन लिया तो किराये के मकान से वह जीवन गुजार लेगा लेकिन तुमने उसकी श्रद्धा तोड़ दी, श्रद्धा का दुरुपयोग कर दिया, ईश्वर से, शास्त्र से, गुरु से, भगवान के मार्ग से, साधन-भजन से उसको भटका दिया तो वह अपने मकान में होते हुए भी स्मशान में है। रूपयों के बीच होते हुए भी वह बेचारा कंगाल है। उसके दिल की शांति चली गई जीवन से श्रद्धा गई, शांति गई, साधन-भजन गया तो भीतर का खजाना भी गया। बाहर के खजाने में आदमी कितना भी लोट-पोट होता हो लेकिन जिसके पास भक्ति, साधन, भजन, श्रद्धा का खजाना नहीं है वह सचमुच में कंगाल है।

श्रीकृष्ण कहते हैं-

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।

ज्ञानं लब्धवा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति।।

'जितेन्द्रिय, साधनपरायण और श्रद्धावान मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है तथा ज्ञान को प्राप्त होकर वह बिना विलम्ब के तत्काल ही भगवत्प्राप्तिरूप परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है।'

(गीताः ४-३९)

मनुष्य श्रद्धालु हो, तत्पर हो और थोड़ा संयम करे तो जल्दी से बेड़ा पार हो जाय।

जिसस किसी गाँव से गुज़र रहे थे। लोगों ने देखा कि संत आ रहे हैं। सज्जन लोगों ने सत्कार किया, निन्दकों ने निन्दा की। पहले से ही जिसस की अफवाह फैली हुई थी कि 'मेकडेलीन जैसी सुन्दर वैश्या जिसस के पास आती है, इत्र से जिसस के पैर धुलाती है, अपने लम्बे-लम्बे रेशम जैसे बालों से जिसस के पैर पोंछती है।' आदि आदि। कुप्रचार करने वालों ने जोरो का कुप्रचार किया था। इसीलिए जिसस को देर-सबेर क्रॉस पर चढ़ना पड़ा था। हाँ, जिसस तो क्रॉस पर नहीं चढ़े थे, जिसस का शरीर जरूर क्रॉस पर चढ़ा होगा। जिन्होंने कुप्रचार किया था वे लोग न जाने किन नरकों में सड़ते होंगे, जलते होंगे जबकि जिसस को अभी भी लाखों जानते हैं, मानते हैं।

जिसस गाँव में आये तो सज्जन लोग, पवित्र बुद्धिवाले लोग कुप्रचार सुनने के बावजूद भी जिसस का दर्शन करने पहुँचे। जिनकी मलिन मति थी वे जिसस का नाम सुनकर आगबबूला हुए।

सज्जन लोगों ने पूछाः "हे फरिश्ते ! इस इलाके में अकाल पड़ रहा है। खेतों में पानी नहीं बरस रहा है। क्या कारण है?"

जिसस ने क्षणभर शांत होकर कहाः "इस गाँव में कई निन्दक, चुगलखोर लोग रहते हैं। उनके पापों के कारण ऐसा हो रहा है।"

"ऐसे कौन लोग हैं? आप उनके नाम बताइये, हम उनको ठीक कर देंगे या गाँव से निकाल देंगे।" सज्जन लोगों ने जिसस से विनती की।

जिसस ने कहाः "उन लोगों का नाम बताने से मुझे भी चुगलखोर होना पड़ेगा। मैं नहीं बताऊँगा।" जिसस वहाँ से आगे बढ़ गये।

हमारे चित्त में भी दया होनी चाहिए। ज्ञानीजनों का तो दयालु होना स्वतः स्वभाव बन जाता है। जैसे दीवार गई तो दीवार पर अंकित चित्र भी गया, जैसे बीज जल गया तो बीज में छुपा हुआ वृक्ष भी जल गया, ऐसे ही जिसकी देह-वासना गई है, जिसका देहाभ्यास गया है, परिच्छिन्न अहं गया है उनका अपने कर्मों का कर्त्तापन भी चला जाता है। सरिता यह नहीं सोचती कि गाय पानी पी रही है उसको अमृत जैसा जल और शेर पानी पीने आवे उसको विष जैसा पानी बना दूँ। नहीं.... वह तो सभी के लिए कल कल छल छल बहती है, सबको अपने शीतल जल से तृप्त करती है। फिर कोई उसमें डूब जाय तो उसकी मर्जी की बात है, सरिता किसी को कष्ट नहीं देती। ऐसे ही जिनके हृदय में दया भरी हुई है, प्राणीमात्र का जो कल्याण चाहते हैं ऐसे संतों की तरह जिसका दिल है वह वास्तव में दयालुदिल कहा जाता है। जैसे बच्चे का दुःख देखकर माँ का दिल द्रवित हो जाता है ऐसे ही प्राणीमात्र का दुःख देखकर दयालु पुरुषों का दिल द्रवित हो जाता है, उसका दुःख मिटाने के लिए वे प्रयत्न करते हैं। ऐसी दया से चित्त की शुद्धि होती है।

तुमने अगर प्यासे को पानी पिलाया, भूखे को भोजन दिया तो उसकी भूख-प्यास मिटी और तुम्हारे अंतःकरण का निर्माण हुआ। दुःखी जन को तो ऐहिक दुःख मिटा लेकिन तुम्हारा अंतःकरण पवित्र हुआ, जन्म-जन्म के दुःख मिटने का साधन बन गया।

सज्जन के साथ सज्जनता का व्यवहार तो सब कर सकते हैं लेकिन दुर्जन की गहराई में अपने प्रियतम परम सज्जन को देखने की जो आँख है, अपने आत्मा की मधुरता, अपने आत्मा की शाश्वतता, अपने परमेश्वर की अमरता देखने की जो आँख है वह खुल जाय तो दुर्जन के प्रति भी हृदय में करुणा होगी। फिर उसकी योग्यता के अनुसार उसके साथ व्यवहार होगा।

दुर्जन को सज्जनता के मार्ग पर लाना यह भी दया है। दुर्जन को उसके कल्याण के लिए थोड़ा सबक सिखाना यह भी उसके प्रति दया है। लेकिन दुर्जन के प्रति क्रूर होकर उसका विनाश करना यह क्रूरता है। फिर भी, उसकी मृत्यु में भी उसका कल्याण हो ऐसा विचार करके श्रीकृष्ण और श्रीरामचन्द्र जी ने दुर्जनों को मृत्यु दण्ड दे दिया इसमें भी उनकी दया है। क्योंकि उन दुर्जनों की दुर्जनता बिना ऑपरेशन के दूर नहीं हो सकती थी।

डॉक्टर मरीज का हित चाहते हुए बाहर से क्रूर दिखने वाली शस्त्रक्रिया करता है तो भी उसके चित्त में क्रूरता नहीं होती। ऐसे ही जो दयालु पुरुष हैं, माता-पिता, गुरुजन और भगवान आदि के चित्त में कभी, किसी के लिए भी क्रूरता नहीं होती।

एक माँ का बेटा डाकू हो गया था। डकैती में नामचीन हो गया, पकड़ा गया और कई क्रूर अपराधों के कारण फाँसी की सजा मिली। फाँसी से पहले पूछा गया कि तेरी आखिरी इच्छा क्या है? वह बोला कि मुझे मेरी माँ से मिलना है। माँ को नजदीक लाया गया तो उस लड़के ने खूब नज़दीक लपककर अपने दाँतों से माँ का नाक काटकर अलग कर दिया।

न्यायाधीश ने पूछाः "तुझे माँ के प्रति इतना द्वेष और क्रोध क्यों?"

वह बोलाः "इस मेरी माँ ने ही मुझे इतना बड़ा डाकू बनने में सहयोग दिया है। मैं बचपन में जब छोटी-छोटी चोरियाँ करके घर में आता था, किसी की पेन्सिल चुराकर, किसी की रबड़ चुराकर माँ के पास जाता था तब मेरी उन गलतियों के प्रति माँ लापरवाह रही। मेरी गलतियों को पोषण मिलता रहा। ऐसा करते करते मैं बड़ा डाकू हो गया और आज इस फाँसी का फंदा मेरे गले में आ पड़ा है। मेरे जीवन के सत्यानाश के कारणों में माँ का निमित्त बड़ा है।"

खेत में खेती के पौधों के अलावा कई प्रकार का दूसरा घास-फूस भी उग निकलता है। उसके प्रति किसान अगर लापरवाह रहे तो खेत में काम के पौधों के बदले दूसरी ही भीड़-भाड़ हो जाती है, खेती निकम्मी हो जाती है। बगीचा जंगल बन जाता है। ऐसे ही जीवन में थोड़ी-थोड़ी लापरवाही आगे चलकर बड़ी हानिकारक सिद्ध होती है।

एक शिष्य था। गुरुसेवा करता था लेकिन लापरवाह था। गुरु उसको समझाते थे किः "बेटा ! लापरवाही मत कर। थोड़ी सी भी लापरवाही आगे चलकर दुःख देगी।" शिष्य कहताः "इसमें क्या है? थोड़ा-सा दूध ढुल गया तो क्या हुआ? और सेर भर ले आता हूँ।"

यहाँ जरा से दूध की बात नहीं है, आदत बिगड़ती है। दूध का नुकसान ज्यादा नहीं है, जीवन में लापरवाही बड़ा नुकसान कर देगी। यह बात शिष्य के गले नहीं उतरती थी। गुरु ने सोचा कि इसको कोई सबक सिखाना पड़ेगा।

गुरुजी ने कहाः "चलो बेटा ! तीर्थयात्रा को जाएँगे।"

दोनों तीर्थयात्रा करने निकल पड़े। गंगा किनारे पहुँचे, शीतल नीर में गोता मारा। तन-मन शीतल और प्रसन्न हुए। सात्त्विक जल था, एकांत वातावरण था। गुरु ने कहाः

"गंगा बह रही है। शीतल जल में स्नान करने का कितना मजा आता है ! चलो, गहरे पानी में जाकर थोड़ा तैर लेते हैं। तू किराये पर मशक ले आ। मशक के सहारे दूर-दूर तैरेंगे।"

मशकवाले के पास दो ही मशक बची थी। एक अच्छी थी, दूसरी में छोटा-सा सुराख हो गया था। शिष्य ने सोचाः इससे क्या हुआ? चलेगा। छोटे-से सुराख से क्या बिगड़ने वाला है। अच्छी मशक गुरुजी को दी, सुराखवाली मशक खुद ली। दोनों तैरते-तैरते मझधार में गये। धीरे-धीरे सुराखवाली मशक से हवा निकल गई। शिष्य गोते खाने लगा। गुरुजी को पुकाराः

"गुरुजी ! मैं तो डूब रहा हूँ....।"

गुरुजी बोलेः "कोई बात नहीं। जरा-सा सुराख है इससे क्या हुआ?

"गुरुजी, यह जरा सा सुराख तो प्राण ले लेगा। अब बचाओ.... बचाओ.....!"

गुरुजी ने अपनी मशक दे दी और बोलेः "मैं तो तैरना जानता हूँ। तेरे को सबक सिखाने के लिए आया हूँ कि जीवन में थोड़ा-सा भी दोष होगा वह धीरे-धीरे बड़ा हो जायगा और जीवन नैया को डुबाने लगेगा। थोड़ी-सी गलती को पुष्टि मिलती रहेगी, थोड़ी सी लापरवाही को पोषण मिलता रहेगा तो समय पाकर बेड़ा गर्क होगा।"

"एक बीड़ी फूँक ली तो क्या हुआ?..... इतना जरा-सा देख लिया तो क्या हुआ? .... इतना थोड़ा सा खा लिया तो क्या हुआ?...."

अरे ! थोड़ा-थोड़ा करते-करते फिर ज्यादा हो जाता है, पता भी नहीं चलता। जब तक साक्षात्कार नहीं हुआ है तब तक मन धोखा देगा। साक्षात्कार हो गया तो तुम परमात्मा में टिकोगे। धोखे के बीच होते हुए भी भीतर से तुम सुरक्षित होगे।

उठत बैठत वही उटाने।

कहत कबीर हम उसी ठिकाने।।

प्राणायाम करने से कर्मेन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं। श्वासोच्छ्वास को निहारते हुए अजपाजाप करने से मन की चँचलता कम हो जाती है। मन की चँचलता कम होते ही अपनी गलतियाँ निकालने का बल बढ़ जाता है।

मनः एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।

मनुष्यों का मन ही अपने बन्धन और मुक्ति का कारण है।

अगर किसी का उत्कर्ष देखकर चित्त में ईर्ष्या होती है तो समझो अपना चित्त मलिन है। 'उसका यश का प्रारब्ध है तो उसको यश मिलेगा। उसके यश में भी मेरा ही परमात्मा है.... ऐसा सोचकर उसके यश का आनन्द लो। किसी को ऊँचे आसन पर बैठा देखकर उससे ईर्ष्या करने के बजाये तुम भी ऊँचे कर्म करो तो तुम भी ऊँचे आसन पर पहुँच जाओगे।' अभी जी ऊँचे आसन पर बैठे हैं उनमें परमेश्वर की कृपा से ऊँचाई है। वाह प्रभु ! तेरी लीला अपंरपार है....' ऐसा सोचकर तुम ऊँचे चले आओ।

ऊँचे आसन पर बैठने से आदमी ऊँचा नहीं हो जाता। नीचे आसन पर बैठने से आदमी नीचा नहीं हो जाता। नीची समझ है तो आदमी नीचा हो जाता है और ऊँची समझ है तो आदमी ऊँचा हो जाता है। ऊँची समझ उन्हीं की है जिनके स्वभाव में अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शांति आदि दैवी गुणों का विकास होता है।

विषयों में लोलुपता नहीं होनी चाहिए।

रंगअवधूत महाराज नारेश्वरवाले बैठे थे। वलसाड़ से कोई व्यक्ति बहुत बढ़िया किस्म के आम अवधूतजी के समक्ष लाया। आम की भूरी भूरी प्रशंसा करने लगा और काट कर अवधूतजी के सामने रखकर खाने के लिए विनती कीः

"गुरुजी ! ये बहुत बढ़िया आम हैं। आपके लिए वलसाड़ से खास लाये हैं। खाइये।"

अवधूत जी ने कहाः "तुम सहज भाव से दे देते तो मैं खा लेता लेकिन तुमने इनकी इतनी प्रशंसा की कि ये आम ऐसे हैं..... वैसे हैं..... केसरी हैं.... बहुत मीठे हैं.... सुगन्ध आती है.... इतनी प्रशंसा करने पर भी अभी तक मेरे मुँह में पानी नहीं आया। तुम ऐसा कुछ करो कि मेरे मुँह में पानी आ जाय। मैं खाने के लिए लम्पटू हो जाऊँ फिर खाऊँगा, अब नहीं खाता। अपनी श्रद्धा-भक्ति से आम दो, तुम्हारी प्रसन्नता के लिए मैं खा लूँगा लेकिन तुम आम की प्रशंसा करो और मेरे मुँह में पानी आ जाय तो मेरी अवधूती मस्ती को धिक्कार है।"

महादेव गोविन्द रानडे का नाम आपने सुना होगा। उनकी पत्नी ने बढ़िया आम काटकर उन्हें दिया। रानडेजी की एक चीरी खायी फिर हाथ धो लिये। बोलेः

"वह नौकर है न रामा, उसको भी यह आम देना, बच्चों को भी देना, पड़ोस की बच्ची को भी देना।"

"इतना बढ़िया आम है....! आप ही के लिए काटा है। खट्टा है क्या?" पत्नी ने पृच्छा की।

रानडेजी बोलेः "नहीं, आम खट्टा नहीं है, बहुत बढ़िया है, बहुत मीठा है, स्वादिष्ट है।"

"बहुत बढ़िया है, मीठा है तो आप क्यों नहीं खाते?"

"इसलिए नहीं खाता हूँ कि बढ़िया चीज बाँटने के लिए होती है, भोगने के लिए नहीं होती।"

किसी चीज को बढ़िया समझकर भोगने लग गये तो लोलुपता आ जायगी। बढ़िया चीज दूसरों को बाँटो ताकि बढ़िया का आकर्षण घट जाय, लोलुपता चली जाय, अनासक्तियोग सिद्ध हो जाय, बढ़िया से बढ़िया जो आत्मा-परमात्मा है उसमें स्थिति हो जाय। श्रीकृष्ण कहते हैं- अलोलुप्त्वम्।

हम लोग क्या करते हैं? कोई चीज बढ़िया होती है तो ठूँस-ठूँसकर खाते हैं, फिर अजीर्ण हो जाता तो दरकार नहीं। कोई भी चीज बढ़िया मिले तो उसे बाँटना सीखो ताकि उसकी लोलुपता चित्त से हट जाय। लोलुपता बड़ा दुःख देती है।

देह का सौन्दर्य बढ़ाने के लिए लोग क्या-क्या करते हैं। सौन्दर्य-प्रसाधनों का उपयोग किया जाता है वे चीजें बनाने के लिए कई जीव-जन्तु-प्राणियों की हिंसा होती है, हानिकारक रसायनों का प्रयोग किया जाता है। पफ-पावडर, लाली-लिपस्टिक से सजाया हुआ बाहर का दैहिक सौन्दर्य तो उधार का सौन्दर्य। उससे तो तुम्हारा, पति का, तुम पर जिनकी निगाह पड़ती है उनका पतन होता है लेकिन जब हृदय का सौन्दर्य खिलता है तब तुम्हारा, तुम्हारे सम्पर्क में आने वाले का, पति और पड़ोसियों का भी कल्याण होता है। मीरा का सौन्दर्य ऐसा ही था, शबरी का सौन्दर्य ऐसा ही था, गार्गी का सौन्दर्य ऐसा ही था, मदालसा का सौन्दर्य ऐसा ही था। दिल तुम्हारा दिलबर के रँग जाय यह असली सौन्दर्य है। कृत्रिम सौन्दर्य-प्रसाधनों से सजाया हुआ सौन्दर्य कब तक टिकेगा ? सच्चे भक्त के हृदय की पुकार होती है किः

"हे भगवान ! तू ऐसी कृपा कर कि तेरे में मेरा मन लग जाय।" भगवान करे कि भगवान में हमारा मन लग जाय। भगवान में मन लगता है तो सचमुच में मन सुन्दर होता है। भोगों में मन लगता है तो मन भद्दा हो जाता है। जब चैतन्य स्वरूप ईश्वर के ध्यान में, ईश्वर के चिन्तन में, ईश्वर के ज्ञान में हमारा मन लगता है तब मन सुन्दर होता है। ज्यों-ज्यों विकारों में, काम में, क्रोध में, ईर्ष्या में मन लगता है त्यों-त्यों हमारा तन और मन असुन्दर होता है।

ईसरदान नामका एक कवि था। पत्नी चल बसी तो बड़ा दुःखी हो रहा था। काका ने कहा कि चलो, द्वारिका जाकर आयें। देव-दर्शन हो जायेंगे और मन को भी मोड़ जल जायगा।

काका-भतीजा दोनों चले। बीच में जामनगर आता था। वहाँ का राजा जाम कविता-शायरी आदि का बड़ा शौकीन था। इन्होंने सोचा राजा कविता की कद्र करेगा, इनाम मिलेगा तो यात्रा का खर्च भी निकल आयगा और अपना नाम भी हो जायगा।

दोनों राजा जाम के राजदरबार में गये। अपना कवित्व प्रस्तुत किया। कविता-शायरी में राजा की प्रशस्ति अपनी छटादार शैली में सुनायी। राजा झूम उठा। दरबारी लोग वाह वाह पुकार उठे। मंत्री लोग भी चकित हुए कि आज तक ऐसी कविता नहीं सुनी।

कवियों को कितना इनाम देना, कैसी कद्र करना इसका निर्णय करने के लिए राजा ने एक उच्च कोटि के विद्वान राजगुरु पीताम्बरदास भट्ट को आदरपूर्वक अपने दरबार में रखा था। ईसरदान की कविता सुनकर राजा खुश हुए राजा ने कवि को पुरस्कार देने के लिए पीतांबर भट्ट की ओर निहारा।

"जो उचित लगे वह इनाम इस कवि को दे दिया जाय।"

पीतांबर भट्ट ने निर्णय सुना दिया कि इस कवि के सिर पर सात जूते मार दिये जायँ। सुनकर सभा दँग रह गई। पीतांबर भट्ट का सभा में प्रभाव था। उनकी आज्ञा का उल्लंघन कैसे किया जाय? कवि के सिर पर सात जूते मार दिये गये। कवि के दिल में चोट लग गई। 'इतनी बढ़िया कविता सुनाई और पुरस्कार में सात जूते? भरी सभा में ऐसा अपमान? और बिना किसी अपराध के? कुछ भी हो, मैं इस पण्डित को देख लूँगा।' ईसरदान का खून उबल उठा।

कवि सभा छोड़क&