प्रातः स्मरणीय परम
पूज्य
संत श्री आसारामजी बापू
के सत्संग प्रवचनों
में से नवनीत
एकादशी
महात्मय
एकादशी
की रात्रि में
श्रीहरि के समीप
जागरण का माहात्मय
सब धर्मों
के ज्ञाता, वेद और
शास्त्रों के अर्थज्ञान
में पारंगत, सबके हृदय में
रमण करनेवाले श्रीविष्णु
के तत्त्व को जाननेवाले
तथा भगवत्परायण
प्रह्लादजी जब
सुखपूर्वक बैठे
हुए थे, उस समय
उनके समीप स्वधर्म
का पालन करनेवाले
महर्षि कुछ पूछने
के लिए आये ।
महर्षियों
ने कहा : प्रह्रादजी
! आप कोई ऐसा साधन
बताइये,
जिससे ज्ञान,
ध्यान और इन्द्रियनिग्रह
के बिना ही अनायास
भगवान विष्णु का
परम पद प्राप्त
हो जाता है ।
उनके
ऐसा कहने पर संपूर्ण
लोकों के हित के
लिए उद्यत रहनेवाले
विष्णुभक्त महाभाग
प्रह्रादजी ने
संक्षेप में इस
प्रकार कहा : महर्षियों
! जो अठारह पुराणों
का सार से भी सारतर
तत्त्व है, जिसे कार्तिकेयजी
के पूछने पर भगवान
शंकर ने उन्हें
बताया था, उसका
वर्णन करता हूँ,
सुनिये ।
महादेवजी
कार्तिकेय से बोले
: जो कलि में
एकादशी की रात
में जागरण करते
समय वैष्णव शास्त्र
का पाठ करता है, उसके कोटि
जन्मों के किये
हुए चार प्रकार
के पाप नष्ट हो
जाते हैं । जो एकादशी
के दिन वैष्णव
शास्त्र का उपदेश
करता है, उसे
मेरा भक्त जानना
चाहिए ।
जिसे
एकादशी के जागरण
में निद्रा नहीं
आती तथा जो उत्साहपूर्वक
नाचता और गाता
है, वह
मेरा विशेष भक्त
है । मैं उसे उत्तम
ज्ञान देता हूँ
और भगवान विष्णु
मोक्ष प्रदान करते
हैं । अत: मेरे भक्त
को विशेष रुप से
जागरण करना चाहिए
। जो भगवान विष्णु
से वैर करते हैं,
उन्हें पाखण्डी
जानना चाहिए ।
जो एकादशी को जागरण
करते और गाते हैं,
उन्हें आधे निमेष
में अग्निष्टोम
तथा अतिरात्र यज्ञ
के समान फल प्राप्त
होता है । जो रात्रि
जागरण में बारंबार
भगवान विष्णु के
मुखारविंद का दर्शन
करते हैं, उनको
भी वही फल प्राप्त
होता है । जो मानव
द्वादशी तिथि को
भगवान विष्णु के
आगे जागरण करते
हैं, वे यमराज
के पाश से मुक्त
हो जाते हैं ।
जो द्वादशी
को जागरण करते
समय गीता शास्त्र
से मनोविनोद करते
हैं, वे
भी यमराज के बन्धन
से मुक्त हो जाते
हैं । जो प्राणत्याग
हो जाने पर भी द्वादशी
का जागरण नहीं
छोड़ते, वे धन्य
और पुण्यात्मा
हैं । जिनके वंश
के लोग एकादशी
की रात में जागरण
करते हैं, वे
ही धन्य हैं । जिन्होंने
एकादशी को जागरण
किया हैं, उन्होंने
यज्ञ, दान ,
गयाश्राद्ध
और नित्य प्रयागस्नान
कर लिया । उन्हें
संन्यासियों का
पुण्य भी मिल गया
और उनके द्वारा
इष्टापूर्त कर्मों
का भी भलीभाँति
पालन हो गया । षडानन
! भगवान विष्णु
के भक्त जागरणसहित
एकादशी व्रत करते
हैं, इसलिए
वे मुझे सदा ही
विशेष प्रिय हैं
। जिसने वर्द्धिनी
एकादशी की रात
में जागरण किया
है, उसने पुन:
प्राप्त होनेवाले
शरीर को स्वयं
ही भस्म कर दिया
। जिसने त्रिस्पृशा
एकादशी को रात
में जागरण किया
है, वह भगवान
विष्णु के स्वरुप
में लीन हो जाता
है । जिसने हरिबोधिनी
एकादशी की रात
में जागरण किया
है, उसके स्थूल
सूक्ष्म सभी पाप
नष्ट हो जाते हैं
। जो द्वादशी की
रात में जागरण
तथा ताल स्वर के
साथ संगीत का आयोजन
करता है, उसे
महान पुण्य की
प्राप्ति होती
है । जो एकादशी
के दिन ॠषियों
द्वारा बनाये हुए
दिव्य स्तोत्रों
से, ॠग्वेद
, यजुर्वेद
तथा सामवेद के
वैष्णव मन्त्रों
से, संस्कृत
और प्राकृत के
अन्य स्तोत्रों
से व गीत वाद्य
आदि के द्वारा
भगवान विष्णु को
सन्तुष्ट करता
है उसे भगवान विष्णु
भी परमानन्द प्रदान
करते हैं ।
य: पुन:
पठते रात्रौ गातां
नामसहस्रकम् ।
द्वादश्यां
पुरतो विष्णोर्वैष्णवानां
समापत: ।
स गच्छेत्परम
स्थान यत्र नारायण:
त्वयम् ।
जो एकादशी
की रात में भगवान
विष्णु के आगे
वैष्णव भक्तों
के समीप गीता और
विष्णुसहस्रनाम
का पाठ करता है, वह उस परम
धाम में जाता है,
जहाँ साक्षात्
भगवान नारायण विराजमान
हैं ।
पुण्यमय
भागवत तथा स्कन्दपुराण
भगवान विष्णु को
प्रिय हैं । मथुरा
और व्रज में भगवान
विष्णु के बालचरित्र
का जो वर्णन किया
गया है,
उसे जो एकादशी
की रात में भगवान
केशव का पूजन करके
पढ़ता है, उसका
पुण्य कितना है,
यह मैं भी नहीं
जानता । कदाचित्
भगवान विष्णु जानते
हों । बेटा ! भगवान
के समीप गीत, नृत्य तथा स्तोत्रपाठ
आदि से जो फल होता
है, वही कलि
में श्रीहरि के
समीप जागरण करते
समय ‘विष्णुसहस्रनाम, गीता तथा
श्रीमद्भागवत’ का पाठ करने
से सहस्र गुना
होकर मिलता है
।
जो श्रीहरि
के समीप जागरण
करते समय रात में
दीपक जलाता है, उसका पुण्य
सौ कल्पों में
भी नष्ट नहीं होता
। जो जागरणकाल
में मंजरीसहित
तुलसीदल से भक्तिपूर्वक
श्रीहरि का पूजन
करता है, उसका
पुन: इस संसार में
जन्म नहीं होता
। स्नान, चन्दन
, लेप, धूप,
दीप, नैवेघ
और ताम्बूल यह
सब जागरणकाल में
भगवान को समर्पित
किया जाय तो उससे
अक्षय पुण्य होता
है । कार्तिकेय
! जो भक्त मेरा ध्यान
करना चाहता है,
वह एकादशी की
रात्रि में श्रीहरि
के समीप भक्तिपूर्वक
जागरण करे । एकादशी
के दिन जो लोग जागरण
करते हैं उनके
शरीर में इन्द्र
आदि देवता आकर
स्थित होते हैं
। जो जागरणकाल
में महाभारत का
पाठ करते हैं,
वे उस परम धाम
में जाते हैं जहाँ
संन्यासी महात्मा
जाया करते हैं
। जो उस समय श्रीरामचन्द्रजी
का चरित्र, दशकण्ठ वध पढ़ते
हैं वे योगवेत्ताओं
की गति को प्राप्त
होते हैं ।
जिन्होंने
श्रीहरि के समीप
जागरण किया है, उन्होंने
चारों वेदों का
स्वाध्याय, देवताओं का पूजन,
यज्ञों का अनुष्ठान
तथा सब तीर्थों
में स्नान कर लिया
। श्रीकृष्ण से
बढ़कर कोई देवता
नहीं है और एकादशी
व्रत के समान दूसरा
कोई व्रत नहीं
है । जहाँ भागवत
शास्त्र है, भगवान विष्णु
के लिए जहाँ जागरण
किया जाता है और
जहाँ शालग्राम
शिला स्थित होती
है, वहाँ साक्षात्
भगवान विष्णु उपस्थित
होते हैं ।
दशमी
की रात्रि को पूर्ण
ब्रह्मचर्य का
पालन करें तथा
भोग विलास से भी
दूर रहें । प्रात:
एकादशी को लकड़ी
का दातुन तथा पेस्ट
का उपयोग न करें; नींबू,
जामुन या आम
के पत्ते लेकर
चबा लें और उँगली
से कंठ शुद्ध कर
लें । वृक्ष से
पत्ता तोड़ना भी
वर्जित है, अत: स्वयं गिरे
हुए पत्ते का सेवन
करे । यदि यह सम्भव
न हो तो पानी से
बारह कुल्ले कर
लें । फिर स्नानादि
कर मंदिर में जाकर
गीता पाठ करें
या पुरोहितादि
से श्रवण करें
। प्रभु के सामने
इस प्रकार प्रण
करना चाहिए कि:
‘आज मैं
चोर, पाखण्डी
और दुराचारी मनुष्य
से बात नहीं करुँगा
और न ही किसीका
दिल दुखाऊँगा ।
गौ, ब्राह्मण
आदि को फलाहार
व अन्नादि देकर
प्रसन्न करुँगा
। रात्रि को जागरण
कर कीर्तन करुँगा
, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ इस
द्वादश अक्षर मंत्र
अथवा गुरुमंत्र
का जाप करुँगा,
राम, कृष्ण
, नारायण इत्यादि
विष्णुसहस्रनाम
को कण्ठ का भूषण
बनाऊँगा ।’ - ऐसी प्रतिज्ञा
करके श्रीविष्णु
भगवान का स्मरण
कर प्रार्थना करें
कि : ‘हे
त्रिलोकपति ! मेरी
लाज आपके हाथ है, अत: मुझे
इस प्रण को पूरा
करने की शक्ति
प्रदान करें ।’ मौन, जप, शास्त्र पठन
, कीर्तन, रात्रि जागरण
एकादशी व्रत में
विशेष लाभ पँहुचाते
हैं।
एकादशी
के दिन अशुद्ध
द्रव्य से बने
पेय न पीयें । कोल्ड
ड्रिंक्स, एसिड आदि
डाले हुए फलों
के डिब्बाबंद रस
को न पीयें । दो
बार भोजन न करें
। आइसक्रीम व तली
हुई चीजें न खायें
। फल अथवा घर में
निकाला हुआ फल
का रस अथवा थोड़े
दूध या जल पर रहना
विशेष लाभदायक
है । व्रत के (दशमी,
एकादशी और द्वादशी)
-इन तीन दिनों में
काँसे के बर्तन,
मांस, प्याज,
लहसुन, मसूर,
उड़द, चने,
कोदो (एक प्रकार
का धान), शाक,
शहद, तेल
और अत्यम्बुपान
(अधिक जल का सेवन)
- इनका सेवन न करें
। व्रत के पहले
दिन (दशमी को) और
दूसरे दिन (द्वादशी
को) हविष्यान्न
(जौ, गेहूँ,
मूँग, सेंधा
नमक, कालीमिर्च,
शर्करा और गोघृत
आदि) का एक बार भोजन
करें।
फलाहारी
को गोभी,
गाजर, शलजम,
पालक, कुलफा
का साग इत्यादि
सेवन नहीं करना
चाहिए । आम, अंगूर, केला,
बादाम, पिस्ता
इत्यादि अमृत फलों
का सेवन करना चाहिए
।
जुआ, निद्रा,
पान, परायी
निन्दा, चुगली,
चोरी, हिंसा,
मैथुन, क्रोध
तथा झूठ, कपटादि
अन्य कुकर्मों
से नितान्त दूर
रहना चाहिए । बैल
की पीठ पर सवारी
न करें ।
भूलवश
किसी निन्दक से
बात हो जाय तो इस
दोष को दूर करने
के लिए भगवान सूर्य
के दर्शन तथा धूप
दीप से श्रीहरि
की पूजा कर क्षमा
माँग लेनी चाहिए
। एकादशी के दिन
घर में झाडू नहीं
लगायें,
इससे चींटी आदि
सूक्ष्म जीवों
की मृत्यु का भय
रहता है । इस दिन
बाल नहीं कटायें
। मधुर बोलें,
अधिक न बोलें,
अधिक बोलने से
न बोलने योग्य
वचन भी निकल जाते
हैं । सत्य भाषण
करना चाहिए । इस
दिन यथाशक्ति अन्नदान
करें किन्तु स्वयं
किसीका दिया हुआ
अन्न कदापि ग्रहण
न करें । प्रत्येक
वस्तु प्रभु को
भोग लगाकर तथा
तुलसीदल छोड़कर
ग्रहण करनी चाहिए
।
एकादशी
के दिन किसी सम्बन्धी
की मृत्यु हो जाय
तो उस दिन व्रत
रखकर उसका फल संकल्प
करके मृतक को देना
चाहिए और श्रीगंगाजी
में पुष्प (अस्थि)
प्रवाहित करने
पर भी एकादशी व्रत
रखकर व्रत फल प्राणी
के निमित्त दे
देना चाहिए । प्राणिमात्र
को अन्तर्यामी
का अवतार समझकर
किसीसे छल कपट
नहीं करना चाहिए
। अपना अपमान करने
या कटु वचन बोलनेवाले
पर भूलकर भी क्रोध
नहीं करें । सन्तोष
का फल सर्वदा मधुर
होता है । मन में
दया रखनी चाहिए
। इस विधि से व्रत
करनेवाला उत्तम
फल को प्राप्त
करता है । द्वादशी
के दिन ब्राह्मणों
को मिष्टान्न, दक्षिणादि
से प्रसन्न कर
उनकी परिक्रमा
कर लेनी चाहिए
।
द्वादशी
को सेवापूजा की
जगह पर बैठकर भुने
हुए सात चनों के
चौदह टुकड़े करके
अपने सिर के पीछे
फेंकना चाहिए ।
‘मेरे
सात जन्मों के
शारीरिक, वाचिक
और मानसिक पाप
नष्ट हुए’ - यह
भावना करके सात
अंजलि जल पीना
और चने के सात दाने
खाकर व्रत खोलना
चाहिए ।
उत्पत्ति
एकादशी का व्रत
हेमन्त ॠतु में
मार्गशीर्ष मास
के कृष्णपक्ष (
गुजरात महाराष्ट्र
के अनुसार कार्तिक
) को करना चाहिए
। इसकी कथा इस प्रकार
है :
युधिष्ठिर
ने भगवान श्रीकृष्ण
से पूछा : भगवन्
! पुण्यमयी एकादशी
तिथि कैसे उत्पन्न
हुई? इस संसार
में वह क्यों पवित्र
मानी गयी तथा देवताओं
को कैसे प्रिय
हुई?
श्रीभगवान
बोले :
कुन्तीनन्दन !
प्राचीन समय की
बात है । सत्ययुग
में मुर नामक दानव
रहता था । वह बड़ा
ही अदभुत, अत्यन्त रौद्र
तथा सम्पूर्ण देवताओं
के लिए भयंकर था
। उस कालरुपधारी
दुरात्मा महासुर
ने इन्द्र को भी
जीत लिया था । सम्पूर्ण
देवता उससे परास्त
होकर स्वर्ग से
निकाले जा चुके
थे और शंकित तथा
भयभीत होकर पृथ्वी
पर विचरा करते
थे । एक दिन सब देवता
महादेवजी के पास
गये । वहाँ इन्द्र
ने भगवान शिव के
आगे सारा हाल कह
सुनाया ।
इन्द्र
बोले : महेश्वर
! ये देवता स्वर्गलोक
से निकाले जाने
के बाद पृथ्वी
पर विचर रहे हैं
। मनुष्यों के
बीच रहना इन्हें
शोभा नहीं देता
। देव ! कोई उपाय
बतलाइये । देवता
किसका सहारा लें
?
महादेवजी
ने कहा : देवराज ! जहाँ
सबको शरण देनेवाले, सबकी रक्षा
में तत्पर रहने
वाले जगत के स्वामी
भगवान गरुड़ध्वज
विराजमान हैं,
वहाँ जाओ । वे
तुम लोगों की रक्षा
करेंगे ।
भगवान
श्रीकृष्ण कहते
हैं : युधिष्ठिर
! महादेवजी की यह
बात सुनकर परम
बुद्धिमान देवराज
इन्द्र सम्पूर्ण
देवताओं के साथ
क्षीरसागर में
गये जहाँ भगवान
गदाधर सो रहे थे
। इन्द्र ने हाथ
जोड़कर उनकी स्तुति
की ।
इन्द्र
बोले : देवदेवेश्वर
! आपको नमस्कार
है ! देव ! आप ही पति, आप ही मति,
आप ही कर्त्ता
और आप ही कारण हैं
। आप ही सब लोगों
की माता और आप ही
इस जगत के पिता
हैं । देवता और
दानव दोनों ही
आपकी वन्दना करते
हैं । पुण्डरीकाक्ष
! आप दैत्यों के
शत्रु हैं । मधुसूदन
! हम लोगों की रक्षा
कीजिये । प्रभो
! जगन्नाथ ! अत्यन्त
उग्र स्वभाववाले
महाबली मुर नामक
दैत्य ने इन सम्पूर्ण
देवताओं को जीतकर
स्वर्ग से बाहर
निकाल दिया है
। भगवन् ! देवदेवेश्वर
! शरणागतवत्सल
! देवता भयभीत होकर
आपकी शरण में आये
हैं । दानवों का
विनाश करनेवाले
कमलनयन ! भक्तवत्सल
! देवदेवेश्वर
! जनार्दन ! हमारी
रक्षा कीजिये… रक्षा कीजिये
। भगवन् ! शरण में
आये हुए देवताओं
की सहायता कीजिये
।
इन्द्र
की बात सुनकर भगवान
विष्णु बोले : देवराज ! यह
दानव कैसा है ? उसका रुप
और बल कैसा है तथा
उस दुष्ट के रहने
का स्थान कहाँ
है ?
इन्द्र
बोले: देवेश्वर
! पूर्वकाल में
ब्रह्माजी के वंश
में तालजंघ नामक
एक महान असुर उत्पन्न
हुआ था,
जो अत्यन्त भयंकर
था । उसका पुत्र
मुर दानव के नाम
से विख्यात है
। वह भी अत्यन्त
उत्कट, महापराक्रमी
और देवताओं के
लिए भयंकर है ।
चन्द्रावती नाम
से प्रसिद्ध एक
नगरी है, उसीमें
स्थान बनाकर वह
निवास करता है
। उस दैत्य ने समस्त
देवताओं को परास्त
करके उन्हें स्वर्गलोक
से बाहर कर दिया
है । उसने एक दूसरे
ही इन्द्र को स्वर्ग
के सिंहासन पर
बैठाया है । अग्नि,
चन्द्रमा, सूर्य, वायु
तथा वरुण भी उसने
दूसरे ही बनाये
हैं । जनार्दन
! मैं सच्ची बात
बता रहा हूँ । उसने
सब कोई दूसरे ही
कर लिये हैं । देवताओं
को तो उसने उनके
प्रत्येक स्थान
से वंचित कर दिया
है ।
इन्द्र
की यह बात सुनकर
भगवान जनार्दन
को बड़ा क्रोध आया
। उन्होंने देवताओं
को साथ लेकर चन्द्रावती
नगरी में प्रवेश
किया । भगवान गदाधर
ने देखा कि “दैत्यराज
बारंबार गर्जना
कर रहा है और उससे
परास्त होकर सम्पूर्ण
देवता दसों दिशाओं
में भाग रहे हैं
।’ अब वह
दानव भगवान विष्णु
को देखकर बोला
: ‘खड़ा
रह … खड़ा
रह ।’ उसकी
यह ललकार सुनकर
भगवान के नेत्र
क्रोध से लाल हो
गये । वे बोले : ‘ अरे दुराचारी
दानव ! मेरी इन भुजाओं
को देख ।’ यह कहकर श्रीविष्णु
ने अपने दिव्य
बाणों से सामने
आये हुए दुष्ट
दानवों को मारना
आरम्भ किया । दानव
भय से विह्लल हो
उठे । पाण्ड्डनन्दन
! तत्पश्चात् श्रीविष्णु
ने दैत्य सेना
पर चक्र का प्रहार
किया । उससे छिन्न
भिन्न होकर सैकड़ो
योद्धा मौत के
मुख में चले गये
।
इसके
बाद भगवान मधुसूदन
बदरिकाश्रम को
चले गये । वहाँ
सिंहावती नाम की
गुफा थी,
जो बारह योजन
लम्बी थी । पाण्ड्डनन्दन
! उस गुफा में एक
ही दरवाजा था ।
भगवान विष्णु उसीमें
सो गये । वह दानव
मुर भगवान को मार
डालने के उद्योग
में उनके पीछे
पीछे तो लगा ही
था । अत: उसने भी
उसी गुफा में प्रवेश
किया । वहाँ भगवान
को सोते देख उसे
बड़ा हर्ष हुआ ।
उसने सोचा : ‘यह दानवों
को भय देनेवाला
देवता है । अत: नि:सन्देह
इसे मार डालूँगा
।’ युधिष्ठिर
! दानव के इस प्रकार
विचार करते ही
भगवान विष्णु के
शरीर से एक कन्या
प्रकट हुई, जो बड़ी
ही रुपवती, सौभाग्यशालिनी
तथा दिव्य अस्त्र
शस्त्रों से सुसज्जित
थी । वह भगवान के
तेज के अंश से उत्पन्न
हुई थी । उसका बल
और पराक्रम महान
था । युधिष्ठिर
! दानवराज मुर ने
उस कन्या को देखा
। कन्या ने युद्ध
का विचार करके
दानव के साथ युद्ध
के लिए याचना की
। युद्ध छिड़ गया
। कन्या सब प्रकार
की युद्धकला में
निपुण थी । वह मुर
नामक महान असुर
उसके हुंकारमात्र
से राख का ढेर हो
गया । दानव के मारे
जाने पर भगवान
जाग उठे । उन्होंने
दानव को धरती पर
इस प्रकार निष्प्राण
पड़ा देखकर कन्या
से पूछा : ‘मेरा यह शत्रु
अत्यन्त उग्र और
भयंकर था । किसने
इसका वध किया है
?’
कन्या
बोली: स्वामिन्
! आपके ही प्रसाद
से मैंने इस महादैत्य
का वध किया है।
श्रीभगवान
ने कहा : कल्याणी
! तुम्हारे इस कर्म
से तीनों लोकों
के मुनि और देवता
आनन्दित हुए हैं।
अत: तुम्हारे मन
में जैसी इच्छा
हो, उसके
अनुसार मुझसे कोई
वर माँग लो । देवदुर्लभ
होने पर भी वह वर
मैं तुम्हें दूँगा,
इसमें तनिक भी
संदेह नहीं है
।
वह कन्या
साक्षात् एकादशी
ही थी।
उसने
कहा: ‘प्रभो
! यदि आप प्रसन्न
हैं तो मैं आपकी
कृपा से सब तीर्थों
में प्रधान, समस्त
विघ्नों का नाश
करनेवाली तथा सब
प्रकार की सिद्धि
देनेवाली देवी
होऊँ । जनार्दन
! जो लोग आपमें भक्ति
रखते हुए मेरे
दिन को उपवास करेंगे,
उन्हें सब प्रकार
की सिद्धि प्राप्त
हो । माधव ! जो लोग
उपवास, नक्त
भोजन अथवा एकभुक्त
करके मेरे व्रत
का पालन करें,
उन्हें आप धन,
धर्म और मोक्ष
प्रदान कीजिये
।’
श्रीविष्णु
बोले: कल्याणी
! तुम जो कुछ कहती
हो, वह
सब पूर्ण होगा
।
भगवान
श्रीकृष्ण कहते
हैं : युधिष्ठिर
! ऐसा वर पाकर महाव्रता
एकादशी बहुत प्रसन्न
हुई । दोनों पक्षों
की एकादशी समान
रुप से कल्याण
करनेवाली है ।
इसमें शुक्ल और
कृष्ण का भेद नहीं
करना चाहिए । यदि
उदयकाल में थोड़ी
सी एकादशी, मध्य में
पूरी द्वादशी और
अन्त में किंचित्
त्रयोदशी हो तो
वह ‘त्रिस्पृशा
एकादशी’ कहलाती है
। वह भगवान को बहुत
ही प्रिय है । यदि
एक ‘त्रिस्पृशा
एकादशी’ को उपवास
कर लिया जाय तो
एक हजार एकादशी
व्रतों का फल प्राप्त
होता है तथा इसी
प्रकार द्वादशी
में पारण करने
पर हजार गुना फल
माना गया है । अष्टमी, एकादशी,
षष्ठी, तृतीय
और चतुर्दशी - ये
यदि पूर्वतिथि
से विद्ध हों तो
उनमें व्रत नहीं
करना चाहिए । परवर्तिनी
तिथि से युक्त
होने पर ही इनमें
उपवास का विधान
है । पहले दिन में
और रात में भी एकादशी
हो तथा दूसरे दिन
केवल प्रात: काल
एकदण्ड एकादशी
रहे तो पहली तिथि
का परित्याग करके
दूसरे दिन की द्वादशीयुक्त
एकादशी को ही उपवास
करना चाहिए । यह
विधि मैंने दोनों
पक्षों की एकादशी
के लिए बतायी है
।
जो मनुष्य
एकादशी को उपवास
करता है,
वह वैकुण्ठधाम
में जाता है, जहाँ साक्षात्
भगवान गरुड़ध्वज
विराजमान रहते
हैं । जो मानव हर
समय एकादशी के
माहात्मय का पाठ
करता है, उसे
हजार गौदान के
पुण्य का फल प्राप्त
होता है । जो दिन
या रात में भक्तिपूर्वक
इस माहात्म्य का
श्रवण करते हैं,
वे नि:संदेह
ब्रह्महत्या आदि
पापों से मुक्त
हो जाते हैं । एकादशी
के समान पापनाशक
व्रत दूसरा कोई
नहीं है ।
युधिष्ठिर
बोले : देवदेवेश्वर
! मार्गशीर्ष मास
के शुक्लपक्ष में
कौन सी एकादशी
होती है ?
उसकी क्या विधि
है तथा उसमें किस
देवता का पूजन
किया जाता है?
स्वामिन् ! यह
सब यथार्थ रुप
से बताइये ।
श्रीकृष्ण
ने कहा : नृपश्रेष्ठ
! मार्गशीर्ष मास
के शुक्लपक्ष की
एकादशी का वर्णन
करुँगा,
जिसके श्रवणमात्र
से वाजपेय यज्ञ
का फल मिलता है
। उसका नाम ‘मोक्षदा
एकादशी’ है जो सब पापों
का अपहरण करनेवाली
है । राजन् ! उस दिन
यत्नपूर्वक तुलसी
की मंजरी तथा धूप
दीपादि से भगवान
दामोदर का पूजन
करना चाहिए । पूर्वाक्त
विधि से ही दशमी
और एकादशी के नियम
का पालन करना उचित
है । मोक्षदा एकादशी
बड़े बड़े पातकों
का नाश करनेवाली
है । उस दिन रात्रि
में मेरी प्रसन्न्ता
के लिए नृत्य, गीत और
स्तुति के द्वारा
जागरण करना चाहिए
। जिसके पितर पापवश
नीच योनि में पड़े
हों, वे इस एकादशी
का व्रत करके इसका
पुण्यदान अपने
पितरों को करें
तो पितर मोक्ष
को प्राप्त होते
हैं । इसमें तनिक
भी संदेह नहीं
है ।
पूर्वकाल
की बात है, वैष्णवों
से विभूषित परम
रमणीय चम्पक नगर
में वैखानस नामक
राजा रहते थे ।
वे अपनी प्रजा
का पुत्र की भाँति
पालन करते थे ।
इस प्रकार राज्य
करते हुए राजा
ने एक दिन रात को
स्वप्न में अपने
पितरों को नीच
योनि में पड़ा हुआ
देखा । उन सबको
इस अवस्था में
देखकर राजा के
मन में बड़ा विस्मय
हुआ और प्रात: काल
ब्राह्मणों से
उन्होंने उस स्वप्न
का सारा हाल कह
सुनाया ।
राजा
बोले : ब्रह्माणो
! मैने अपने पितरों
को नरक में गिरा
हुआ देखा है । वे
बारंबार रोते हुए
मुझसे यों कह रहे
थे कि : ‘तुम हमारे
तनुज हो,
इसलिए इस नरक
समुद्र से हम लोगों
का उद्धार करो।
’ द्विजवरो
! इस रुप में मुझे
पितरों के दर्शन
हुए हैं इससे मुझे
चैन नहीं मिलता
। क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ?
मेरा हृदय रुँधा
जा रहा है । द्विजोत्तमो
! वह व्रत, वह
तप और वह योग, जिससे मेरे पूर्वज
तत्काल नरक से
छुटकारा पा जायें,
बताने की कृपा
करें । मुझ बलवान
तथा साहसी पुत्र
के जीते जी मेरे
माता पिता घोर
नरक में पड़े हुए
हैं ! अत: ऐसे पुत्र
से क्या लाभ है
?
ब्राह्मण
बोले : राजन्
! यहाँ से निकट ही
पर्वत मुनि का
महान आश्रम है
। वे भूत और भविष्य
के भी ज्ञाता हैं
। नृपश्रेष्ठ !
आप उन्हींके पास
चले जाइये ।
ब्राह्मणों
की बात सुनकर महाराज
वैखानस शीघ्र ही
पर्वत मुनि के
आश्रम पर गये और
वहाँ उन मुनिश्रेष्ठ
को देखकर उन्होंने
दण्डवत् प्रणाम
करके मुनि के चरणों
का स्पर्श किया
। मुनि ने भी राजा
से राज्य के सातों
अंगों की कुशलता
पूछी ।
राजा
बोले: स्वामिन्
! आपकी कृपा से मेरे
राज्य के सातों
अंग सकुशल हैं
किन्तु मैंने स्वप्न
में देखा है कि
मेरे पितर नरक
में पड़े हैं । अत:
बताइये कि किस
पुण्य के प्रभाव
से उनका वहाँ से
छुटकारा होगा ?
राजा
की यह बात सुनकर
मुनिश्रेष्ठ पर्वत
एक मुहूर्त तक
ध्यानस्थ रहे ।
इसके बाद वे राजा
से बोले :
‘महाराज! मार्गशीर्ष
के शुक्लपक्ष में
जो ‘मोक्षदा’ नाम की एकादशी
होती है,
तुम सब लोग उसका
व्रत करो और उसका
पुण्य पितरों को
दे डालो । उस पुण्य
के प्रभाव से उनका
नरक से उद्धार
हो जायेगा ।’
भगवान
श्रीकृष्ण कहते
हैं : युधिष्ठिर
! मुनि की यह बात
सुनकर राजा पुन:
अपने घर लौट आये
। जब उत्तम मार्गशीर्ष
मास आया,
तब राजा वैखानस
ने मुनि के कथनानुसार
‘मोक्षदा
एकादशी’ का व्रत करके
उसका पुण्य समस्त
पितरोंसहित पिता
को दे दिया । पुण्य
देते ही क्षणभर
में आकाश से फूलों
की वर्षा होने
लगी । वैखानस के
पिता पितरोंसहित
नरक से छुटकारा
पा गये और आकाश
में आकर राजा के
प्रति यह पवित्र
वचन बोले: ‘बेटा ! तुम्हारा
कल्याण हो ।’ यह कहकर वे
स्वर्ग में चले
गये ।
राजन्
! जो इस प्रकार कल्याणमयी
‘‘मोक्षदा
एकादशी’ का व्रत करता
है, उसके
पाप नष्ट हो जाते
हैं और मरने के
बाद वह मोक्ष प्राप्त
कर लेता है । यह
मोक्ष देनेवाली
‘मोक्षदा
एकादशी’ मनुष्यों
के लिए चिन्तामणि
के समान समस्त
कामनाओं को पूर्ण
करनेवाली है ।
इस माहात्मय के
पढ़ने और सुनने
से वाजपेय यज्ञ
का फल मिलता है
।
युधिष्ठिर
ने पूछा : स्वामिन्
! पौष मास के कृष्णपक्ष
(गुज., महा.
के लिए मार्गशीर्ष)
में जो एकादशी
होती है, उसका
क्या नाम है? उसकी क्या विधि
है तथा उसमें किस
देवता की पूजा
की जाती है ? यह बताइये ।
भगवान
श्रीकृष्ण कहते
हैं : राजेन्द्र
! बड़ी बड़ी दक्षिणावाले
यज्ञों से भी मुझे
उतना संतोष नहीं
होता, जितना एकादशी
व्रत के अनुष्ठान
से होता है । पौष
मास के कृष्णपक्ष
में ‘सफला’ नाम की एकादशी
होती है । उस दिन
विधिपूर्वक भगवान
नारायण की पूजा
करनी चाहिए । जैसे
नागों में शेषनाग, पक्षियों
में गरुड़ तथा देवताओं
में श्रीविष्णु
श्रेष्ठ हैं,
उसी प्रकार सम्पूर्ण
व्रतों में एकादशी
तिथि श्रेष्ठ है
।
राजन्
! ‘सफला
एकादशी’ को नाम मंत्रों
का उच्चारण करके
नारियल के फल, सुपारी,
बिजौरा तथा जमीरा
नींबू, अनार,
सुन्दर आँवला,
लौंग, बेर
तथा विशेषत: आम
के फलों और धूप
दीप से श्रीहरि
का पूजन करे । ‘सफला एकादशी’ को विशेष
रुप से दीप दान
करने का विधान
है । रात को वैष्णव
पुरुषों के साथ
जागरण करना चाहिए
। जागरण करनेवाले
को जिस फल की प्राप्ति
होती है,
वह हजारों वर्ष
तपस्या करने से
भी नहीं मिलता
।
नृपश्रेष्ठ
! अब ‘सफला
एकादशी’ की शुभकारिणी
कथा सुनो । चम्पावती
नाम से विख्यात
एक पुरी है, जो कभी
राजा माहिष्मत
की राजधानी थी
। राजर्षि माहिष्मत
के पाँच पुत्र
थे । उनमें जो ज्येष्ठ
था, वह सदा पापकर्म
में ही लगा रहता
था । परस्त्रीगामी
और वेश्यासक्त
था । उसने पिता
के धन को पापकर्म
में ही खर्च किया
। वह सदा दुराचारपरायण
तथा वैष्णवों और
देवताओं की निन्दा
किया करता था ।
अपने पुत्र को
ऐसा पापाचारी देखकर
राजा माहिष्मत
ने राजकुमारों
में उसका नाम लुम्भक
रख दिया। फिर पिता
और भाईयों ने मिलकर
उसे राज्य से बाहर
निकाल दिया । लुम्भक
गहन वन में चला
गया । वहीं रहकर
उसने प्राय: समूचे
नगर का धन लूट लिया
। एक दिन जब वह रात
में चोरी करने
के लिए नगर में
आया तो सिपाहियों
ने उसे पकड़ लिया
। किन्तु जब उसने
अपने को राजा माहिष्मत
का पुत्र बतलाया
तो सिपाहियों ने
उसे छोड़ दिया ।
फिर वह वन में लौट
आया और मांस तथा
वृक्षों के फल
खाकर जीवन निर्वाह
करने लगा । उस दुष्ट
का विश्राम स्थान
पीपल वृक्ष बहुत
वर्षों पुराना
था । उस वन में वह
वृक्ष एक महान
देवता माना जाता
था । पापबुद्धि
लुम्भक वहीं निवास
करता था ।
एक दिन
किसी संचित पुण्य
के प्रभाव से उसके
द्वारा एकादशी
के व्रत का पालन
हो गया । पौष मास
में कृष्णपक्ष
की दशमी के दिन
पापिष्ठ लुम्भक
ने वृक्षों के
फल खाये और वस्त्रहीन
होने के कारण रातभर
जाड़े का कष्ट भोगा
। उस समय न तो उसे
नींद आयी और न आराम
ही मिला । वह निष्प्राण
सा हो रहा था । सूर्योदय
होने पर भी उसको
होश नहीं आया ।
‘सफला
एकादशी’ के दिन भी
लुम्भक बेहोश पड़ा
रहा । दोपहर होने
पर उसे चेतना प्राप्त
हुई । फिर इधर उधर
दृष्टि डालकर वह
आसन से उठा और लँगड़े
की भाँति लड़खड़ाता
हुआ वन के भीतर
गया । वह भूख से
दुर्बल और पीड़ित
हो रहा था । राजन्
! लुम्भक बहुत से
फल लेकर जब तक विश्राम
स्थल पर लौटा, तब तक सूर्यदेव
अस्त हो गये । तब
उसने उस पीपल वृक्ष
की जड़ में बहुत
से फल निवेदन करते
हुए कहा: ‘इन फलों से
लक्ष्मीपति भगवान
विष्णु संतुष्ट
हों ।’ यों कहकर लुम्भक
ने रातभर नींद
नहीं ली । इस प्रकार
अनायास ही उसने
इस व्रत का पालन
कर लिया । उस समय
सहसा आकाशवाणी
हुई: ‘राजकुमार
! तुम ‘सफला
एकादशी’ के प्रसाद
से राज्य और पुत्र
प्राप्त करोगे
।’ ‘बहुत
अच्छा’ कहकर उसने
वह वरदान स्वीकार
किया । इसके बाद
उसका रुप दिव्य
हो गया । तबसे उसकी
उत्तम बुद्धि भगवान
विष्णु के भजन
में लग गयी । दिव्य
आभूषणों से सुशोभित
होकर उसने निष्कण्टक
राज्य प्राप्त
किया और पंद्रह
वर्षों तक वह उसका
संचालन करता रहा
। उसको मनोज्ञ
नामक पुत्र उत्पन्न
हुआ । जब वह बड़ा
हुआ, तब
लुम्भक ने तुरंत
ही राज्य की ममता
छोड़कर उसे पुत्र
को सौंप दिया और
वह स्वयं भगवान
श्रीकृष्ण के समीप
चला गया, जहाँ
जाकर मनुष्य कभी
शोक में नहीं पड़ता
।
राजन्
! इस प्रकार जो ‘सफला एकादशी’ का उत्तम
व्रत करता है, वह इस लोक
में सुख भोगकर
मरने के पश्चात्
मोक्ष को प्राप्त
होता है । संसार
में वे मनुष्य
धन्य हैं, जो
‘सफला
एकादशी’ के व्रत में
लगे रहते हैं, उन्हीं
का जन्म सफल है
। महाराज! इसकी
महिमा को पढ़ने,
सुनने तथा उसके
अनुसार आचरण करने
से मनुष्य राजसूय
यज्ञ का फल पाता
है ।
युधिष्ठिर
बोले: श्रीकृष्ण
! कृपा करके पौष
मास के शुक्लपक्ष
की एकादशी का माहात्म्य
बतलाइये । उसका
नाम क्या है? उसे करने
की विधि क्या है
? उसमें किस
देवता का पूजन
किया जाता है ?
भगवान
श्रीकृष्ण ने कहा: राजन्!
पौष मास के शुक्लपक्ष
की जो एकादशी है, उसका नाम
‘पुत्रदा’ है ।
‘पुत्रदा
एकादशी’ को नाम-मंत्रों
का उच्चारण करके
फलों के द्वारा
श्रीहरि का पूजन
करे । नारियल के
फल, सुपारी,
बिजौरा नींबू,
जमीरा नींबू,
अनार, सुन्दर
आँवला, लौंग,
बेर तथा विशेषत:
आम के फलों से देवदेवेश्वर
श्रीहरि की पूजा
करनी चाहिए । इसी
प्रकार धूप दीप
से भी भगवान की
अर्चना करे ।
‘पुत्रदा
एकादशी’ को विशेष
रुप से दीप दान
करने का विधान
है । रात को वैष्णव
पुरुषों के साथ
जागरण करना चाहिए
। जागरण करनेवाले
को जिस फल की प्राप्ति
होति है,
वह हजारों वर्ष
तक तपस्या करने
से भी नहीं मिलता
। यह सब पापों को
हरनेवाली उत्तम
तिथि है ।
चराचर
जगतसहित समस्त
त्रिलोकी में इससे
बढ़कर दूसरी कोई
तिथि नहीं है ।
समस्त कामनाओं
तथा सिद्धियों
के दाता भगवान
नारायण इस तिथि
के अधिदेवता हैं
।
पूर्वकाल
की बात है, भद्रावतीपुरी
में राजा सुकेतुमान
राज्य करते थे
। उनकी रानी का
नाम चम्पा था ।
राजा को बहुत समय
तक कोई वंशधर पुत्र
नहीं प्राप्त हुआ
। इसलिए दोनों
पति पत्नी सदा
चिन्ता और शोक
में डूबे रहते
थे । राजा के पितर
उनके दिये हुए
जल को शोकोच्छ्वास
से गरम करके पीते
थे । ‘राजा के बाद और
कोई ऐसा नहीं दिखायी
देता, जो हम लोगों का
तर्पण करेगा …’ यह सोच सोचकर
पितर दु:खी रहते
थे ।
एक दिन
राजा घोड़े पर सवार
हो गहन वन में चले
गये । पुरोहित
आदि किसीको भी
इस बात का पता न
था । मृग और पक्षियों
से सेवित उस सघन
कानन में राजा
भ्रमण करने लगे
। मार्ग में कहीं
सियार की बोली
सुनायी पड़ती थी
तो कहीं उल्लुओं
की । जहाँ तहाँ
भालू और मृग दृष्टिगोचर
हो रहे थे । इस प्रकार
घूम घूमकर राजा
वन की शोभा देख
रहे थे,
इतने में दोपहर
हो गयी । राजा को
भूख और प्यास सताने
लगी । वे जल की खोज
में इधर उधर भटकने
लगे । किसी पुण्य
के प्रभाव से उन्हें
एक उत्तम सरोवर
दिखायी दिया,
जिसके समीप मुनियों
के बहुत से आश्रम
थे । शोभाशाली
नरेश ने उन आश्रमों
की ओर देखा । उस
समय शुभ की सूचना
देनेवाले शकुन
होने लगे । राजा
का दाहिना नेत्र
और दाहिना हाथ
फड़कने लगा, जो उत्तम फल की
सूचना दे रहा था
। सरोवर के तट पर
बहुत से मुनि वेदपाठ
कर रहे थे । उन्हें
देखकर राजा को
बड़ा हर्ष हुआ ।
वे घोड़े से उतरकर
मुनियों के सामने
खड़े हो गये और पृथक्
पृथक् उन सबकी
वन्दना करने लगे
। वे मुनि उत्तम
व्रत का पालन करनेवाले
थे । जब राजा ने
हाथ जोड़कर बारंबार
दण्डवत् किया,
तब मुनि बोले
: ‘राजन्
! हम लोग तुम पर प्रसन्न
हैं।’
राजा
बोले: आप लोग कौन
हैं ? आपके
नाम क्या हैं तथा
आप लोग किसलिए
यहाँ एकत्रित हुए
हैं? कृपया
यह सब बताइये ।
मुनि
बोले: राजन्
! हम लोग विश्वेदेव
हैं । यहाँ स्नान
के लिए आये हैं
। माघ मास निकट
आया है । आज से पाँचवें
दिन माघ का स्नान
आरम्भ हो जायेगा
। आज ही ‘पुत्रदा’ नाम की एकादशी
है,जो
व्रत करनेवाले
मनुष्यों को पुत्र
देती है ।
राजा
ने कहा: विश्वेदेवगण
! यदि आप लोग प्रसन्न
हैं तो मुझे पुत्र
दीजिये।
मुनि
बोले: राजन्!
आज ‘पुत्रदा’ नाम की एकादशी
है। इसका व्रत
बहुत विख्यात है।
तुम आज इस उत्तम
व्रत का पालन करो
। महाराज! भगवान
केशव के प्रसाद
से तुम्हें पुत्र
अवश्य प्राप्त
होगा ।
भगवान
श्रीकृष्ण कहते
हैं: युधिष्ठिर
! इस प्रकार उन मुनियों
के कहने से राजा
ने उक्त उत्तम
व्रत का पालन किया
। महर्षियों के
उपदेश के अनुसार
विधिपूर्वक ‘पुत्रदा
एकादशी’ का अनुष्ठान
किया । फिर द्वादशी
को पारण करके मुनियों
के चरणों में बारंबार
मस्तक झुकाकर राजा
अपने घर आये । तदनन्तर
रानी ने गर्भधारण
किया । प्रसवकाल
आने पर पुण्यकर्मा
राजा को तेजस्वी
पुत्र प्राप्त
हुआ, जिसने
अपने गुणों से
पिता को संतुष्ट
कर दिया । वह प्रजा
का पालक हुआ ।
इसलिए
राजन्! ‘पुत्रदा’ का उत्तम
व्रत अवश्य करना
चाहिए । मैंने
लोगों के हित के
लिए तुम्हारे सामने
इसका वर्णन किया
है । जो मनुष्य
एकाग्रचित्त होकर
‘पुत्रदा
एकादशी’ का व्रत करते
हैं, वे
इस लोक में पुत्र
पाकर मृत्यु के
पश्चात् स्वर्गगामी
होते हैं। इस माहात्म्य
को पढ़ने और सुनने
से अग्निष्टोम
यज्ञ का फल मिलता
है ।
युधिष्ठिर
ने श्रीकृष्ण से
पूछा: भगवन्
! माघ मास के कृष्णपक्ष
में कौन सी एकादशी
होती है?
उसके लिए कैसी
विधि है तथा उसका
फल क्या है ? कृपा करके ये
सब बातें हमें
बताइये ।
श्रीभगवान
बोले: नृपश्रेष्ठ
! माघ (गुजरात महाराष्ट्र
के अनुसार पौष)
मास के कृष्णपक्ष
की एकादशी ‘षटतिला’ के नाम से विख्यात
है, जो सब
पापों का नाश करनेवाली
है । मुनिश्रेष्ठ
पुलस्त्य ने इसकी
जो पापहारिणी कथा
दाल्भ्य से कही
थी, उसे सुनो
।
दाल्भ्य
ने पूछा: ब्रह्मन्! मृत्युलोक
में आये हुए प्राणी
प्राय: पापकर्म
करते रहते हैं
। उन्हें नरक में
न जाना पड़े इसके
लिए कौन सा उपाय
है? बताने
की कृपा करें ।
पुलस्त्यजी
बोले: महाभाग
! माघ मास आने पर
मनुष्य को चाहिए
कि वह नहा धोकर
पवित्र हो इन्द्रियसंयम
रखते हुए काम, क्रोध, अहंकार ,लोभ
और चुगली आदि बुराइयों
को त्याग दे । देवाधिदेव
भगवान का स्मरण
करके जल से पैर
धोकर भूमि पर पड़े
हुए गोबर का संग्रह
करे । उसमें तिल
और कपास मिलाकर
एक सौ आठ पिंडिकाएँ
बनाये । फिर माघ
में जब आर्द्रा
या मूल नक्षत्र
आये, तब कृष्णपक्ष
की एकादशी करने
के लिए नियम ग्रहण
करें । भली भाँति
स्नान करके पवित्र
हो शुद्ध भाव से
देवाधिदेव श्रीविष्णु
की पूजा करें ।
कोई भूल हो जाने
पर श्रीकृष्ण का
नामोच्चारण करें
। रात को जागरण
और होम करें । चन्दन, अरगजा,
कपूर, नैवेघ
आदि सामग्री से
शंख, चक्र और
गदा धारण करनेवाले
देवदेवेश्वर श्रीहरि
की पूजा करें ।
तत्पश्चात् भगवान
का स्मरण करके
बारंबार श्रीकृष्ण
नाम का उच्चारण
करते हुए कुम्हड़े,
नारियल अथवा
बिजौरे के फल से
भगवान को विधिपूर्वक
पूजकर अर्ध्य दें
। अन्य सब सामग्रियों
के अभाव में सौ
सुपारियों के द्वारा
भी पूजन और अर्ध्यदान
किया जा सकता है
। अर्ध्य का मंत्र
इस प्रकार है:
कृष्ण
कृष्ण कृपालुस्त्वमगतीनां
गतिर्भव ।
संसारार्णवमग्नानां
प्रसीद पुरुषोत्तम
॥
नमस्ते
पुण्डरीकाक्ष
नमस्ते विश्वभावन
।
सुब्रह्मण्य
नमस्तेSस्तु महापुरुष
पूर्वज ॥
गृहाणार्ध्यं
मया दत्तं लक्ष्म्या
सह जगत्पते ।
‘सच्चिदानन्दस्वरुप
श्रीकृष्ण
! आप बड़े दयालु
हैं । हम आश्रयहीन
जीवों के आप आश्रयदाता
होइये । हम संसार
समुद्र में डूब
रहे हैं,
आप हम पर प्रसन्न
होइये । कमलनयन
! विश्वभावन ! सुब्रह्मण्य
! महापुरुष ! सबके
पूर्वज ! आपको नमस्कार
है ! जगत्पते ! मेरा
दिया हुआ अर्ध्य
आप लक्ष्मीजी के
साथ स्वीकार करें
।’
तत्पश्चात्
ब्राह्मण की पूजा
करें । उसे जल का
घड़ा, छाता,
जूता और वस्त्र
दान करें । दान
करते समय ऐसा कहें
: ‘इस दान
के द्वारा भगवान
श्रीकृष्ण मुझ
पर प्रसन्न हों
।’ अपनी
शक्ति के अनुसार
श्रेष्ठ ब्राह्मण
को काली गौ का दान
करें । द्विजश्रेष्ठ
! विद्वान पुरुष
को चाहिए कि वह
तिल से भरा हुआ
पात्र भी दान करे
। उन तिलों के बोने
पर उनसे जितनी
शाखाएँ पैदा हो
सकती हैं, उतने हजार
वर्षों तक वह स्वर्गलोक
में प्रतिष्ठित
होता है । तिल से
स्नान होम करे,
तिल का उबटन
लगाये, तिल
मिलाया हुआ जल
पीये, तिल का
दान करे और तिल
को भोजन के काम
में ले ।’
इस प्रकार
हे नृपश्रेष्ठ
! छ: कामों में तिल
का उपयोग करने
के कारण यह एकादशी
‘षटतिला’ कहलाती है, जो सब पापों
का नाश करनेवाली
है ।
युधिष्ठिर
ने भगवान श्रीकृष्ण
से पूछा : भगवन् ! कृपा
करके यह बताइये
कि माघ मास के शुक्लपक्ष
में कौन सी एकादशी
होती है,
उसकी विधि क्या
है तथा उसमें किस
देवता का पूजन
किया जाता है ?
भगवान
श्रीकृष्ण बोले
: राजेन्द्र
! माघ मास के शुक्लपक्ष
में जो एकादशी
होती है,
उसका नाम ‘जया’ है । वह सब
पापों को हरनेवाली
उत्तम तिथि है
। पवित्र होने
के साथ ही पापों
का नाश करनेवाली
तथा मनुष्यों को
भाग और मोक्ष प्रदान
करनेवाली है ।
इतना ही नहीं , वह ब्रह्महत्या
जैसे पाप तथा पिशाचत्व
का भी विनाश करनेवाली
है । इसका व्रत
करने पर मनुष्यों
को कभी प्रेतयोनि
में नहीं जाना
पड़ता । इसलिए राजन्
! प्रयत्नपूर्वक
‘जया’ नाम की एकादशी
का व्रत करना चाहिए
।
एक समय
की बात है । स्वर्गलोक
में देवराज इन्द्र
राज्य करते थे
। देवगण पारिजात
वृक्षों से युक्त
नंदनवन में अप्सराओं
के साथ विहार कर
रहे थे । पचास करोड़
गन्धर्वों के नायक
देवराज इन्द्र
ने स्वेच्छानुसार
वन में विहार करते
हुए बड़े हर्ष के
साथ नृत्य का आयोजन
किया । गन्धर्व
उसमें गान कर रहे
थे, जिनमें
पुष्पदन्त, चित्रसेन तथा
उसका पुत्र - ये
तीन प्रधान थे
। चित्रसेन की
स्त्री का नाम
मालिनी था । मालिनी
से एक कन्या उत्पन्न
हुई थी, जो पुष्पवन्ती
के नाम से विख्यात
थी । पुष्पदन्त
गन्धर्व का एक
पुत्र था, जिसको
लोग माल्यवान कहते
थे । माल्यवान
पुष्पवन्ती के
रुप पर अत्यन्त
मोहित था । ये दोनों
भी इन्द्र के संतोषार्थ
नृत्य करने के
लिए आये थे । इन
दोनों का गान हो
रहा था । इनके साथ
अप्सराएँ भी थीं
। परस्पर अनुराग
के कारण ये दोनों
मोह के वशीभूत
हो गये । चित्त
में भ्रान्ति आ
गयी इसलिए वे शुद्ध
गान न गा सके । कभी
ताल भंग हो जाता
था तो कभी गीत बंद
हो जाता था । इन्द्र
ने इस प्रमाद पर
विचार किया और
इसे अपना अपमान
समझकर वे कुपित
हो गये ।
अत: इन
दोनों को शाप देते
हुए बोले : ‘ओ मूर्खो
! तुम दोनों को धिक्कार
है ! तुम लोग पतित
और मेरी आज्ञाभंग
करनेवाले हो, अत: पति
पत्नी के रुप में
रहते हुए पिशाच
हो जाओ ।’
इन्द्र
के इस प्रकार शाप
देने पर इन दोनों
के मन में बड़ा दु:ख
हुआ । वे हिमालय
पर्वत पर चले गये
और पिशाचयोनि को
पाकर भयंकर दु:ख
भोगने लगे । शारीरिक
पातक से उत्पन्न
ताप से पीड़ित होकर
दोनों ही पर्वत
की कन्दराओं में
विचरते रहते थे
। एक दिन पिशाच
ने अपनी पत्नी
पिशाची से कहा
: ‘हमने
कौन सा पाप किया
है, जिससे
यह पिशाचयोनि प्राप्त
हुई है ? नरक
का कष्ट अत्यन्त
भयंकर है तथा पिशाचयोनि
भी बहुत दु:ख देनेवाली
है । अत: पूर्ण प्रयत्न
करके पाप से बचना
चाहिए ।’
इस प्रकार
चिन्तामग्न होकर
वे दोनों दु:ख के
कारण सूखते जा
रहे थे । दैवयोग
से उन्हें माघ
मास के शुक्लपक्ष
की एकादशी की तिथि
प्राप्त हो गयी
। ‘जया’ नाम से विख्यात
वह तिथि सब तिथियों
में उत्तम है ।
उस दिन उन दोनों
ने सब प्रकार के
आहार त्याग दिये, जल पान
तक नहीं किया ।
किसी जीव की हिंसा
नहीं की, यहाँ
तक कि खाने के लिए
फल तक नहीं काटा
। निरन्तर दु:ख
से युक्त होकर
वे एक पीपल के समीप
बैठे रहे । सूर्यास्त
हो गया । उनके प्राण
हर लेने वाली भयंकर
रात्रि उपस्थित
हुई । उन्हें नींद
नहीं आयी । वे रति
या और कोई सुख भी
नहीं पा सके ।
सूर्यादय
हुआ, द्वादशी
का दिन आया । इस
प्रकार उस पिशाच
दंपति के द्वारा
‘जया’ के उत्तम
व्रत का पालन हो
गया । उन्होंने
रात में जागरण
भी किया था । उस
व्रत के प्रभाव
से तथा भगवान विष्णु
की शक्ति से उन
दोनों का पिशाचत्व
दूर हो गया । पुष्पवन्ती
और माल्यवान अपने
पूर्वरुप में आ
गये । उनके हृदय
में वही पुराना
स्नेह उमड़ रहा
था । उनके शरीर
पर पहले जैसे ही
अलंकार शोभा पा
रहे थे ।
वे दोनों
मनोहर रुप धारण
करके विमान पर
बैठे और स्वर्गलोक
में चले गये । वहाँ
देवराज इन्द्र
के सामने जाकर
दोनों ने बड़ी प्रसन्नता
के साथ उन्हें
प्रणाम किया ।
उन्हें
इस रुप में उपस्थित
देखकर इन्द्र को
बड़ा विस्मय हुआ
! उन्होंने पूछा:
‘बताओ, किस पुण्य
के प्रभाव से तुम
दोनों का पिशाचत्व
दूर हुआ है? तुम मेरे शाप
को प्राप्त हो
चुके थे, फिर
किस देवता ने तुम्हें
उससे छुटकारा दिलाया
है?’
माल्यवान
बोला : स्वामिन्
! भगवान वासुदेव
की कृपा तथा ‘जया’ नामक एकादशी
के व्रत से हमारा
पिशाचत्व दूर हुआ
है ।
इन्द्र
ने कहा : … तो अब तुम
दोनों मेरे कहने
से सुधापान करो
। जो लोग एकादशी
के व्रत में तत्पर
और भगवान श्रीकृष्ण
के शरणागत होते
हैं, वे
हमारे भी पूजनीय
होते हैं ।
भगवान
श्रीकृष्ण कहते
हैं : राजन्
! इस कारण एकादशी
का व्रत करना चाहिए
। नृपश्रेष्ठ !
‘जया’ ब्रह्महत्या
का पाप भी दूर करनेवाली
है । जिसने ‘जया’ का व्रत किया
है, उसने
सब प्रकार के दान
दे दिये और सम्पूर्ण
यज्ञों का अनुष्ठान
कर लिया । इस माहात्म्य
के पढ़ने और सुनने
से अग्निष्टोम
यज्ञ का फल मिलता
है ।
युधिष्ठिर
ने पूछा: हे वासुदेव!
फाल्गुन (गुजरात
महाराष्ट्र के
अनुसार माघ) के
कृष्णपक्ष में
किस नाम की एकादशी
होती है और उसका
व्रत करने की विधि
क्या है?
कृपा करके बताइये
।
भगवान
श्रीकृष्ण बोले:
युधिष्ठिर
! एक बार नारदजी
ने ब्रह्माजी से
फाल्गुन के कृष्णपक्ष
की ‘विजया
एकादशी’ के व्रत से
होनेवाले पुण्य
के बारे में पूछा
था तथा ब्रह्माजी
ने इस व्रत के बारे
में उन्हें जो
कथा और विधि बतायी
थी, उसे
सुनो :
ब्रह्माजी
ने कहा : नारद ! यह व्रत
बहुत ही प्राचीन, पवित्र
और पाप नाशक है
। यह एकादशी राजाओं
को विजय प्रदान
करती है, इसमें
तनिक भी संदेह
नहीं है ।
त्रेतायुग
में मर्यादा पुरुषोत्तम
श्रीरामचन्द्रजी
जब लंका पर चढ़ाई
करने के लिए समुद्र
के किनारे पहुँचे, तब उन्हें
समुद्र को पार
करने का कोई उपाय
नहीं सूझ रहा था
। उन्होंने लक्ष्मणजी
से पूछा : ‘सुमित्रानन्दन
! किस उपाय से इस
समुद्र को पार
किया जा सकता है
? यह अत्यन्त
अगाध और भयंकर
जल जन्तुओं से
भरा हुआ है । मुझे
ऐसा कोई उपाय नहीं
दिखायी देता,
जिससे इसको सुगमता
से पार किया जा
सके ।‘
लक्ष्मणजी
बोले : हे
प्रभु ! आप ही आदिदेव
और पुराण पुरुष
पुरुषोत्तम हैं
। आपसे क्या छिपा
है? यहाँ
से आधे योजन की
दूरी पर कुमारी
द्वीप में बकदाल्भ्य
नामक मुनि रहते
हैं । आप उन प्राचीन
मुनीश्वर के पास
जाकर उन्हींसे
इसका उपाय पूछिये
।
श्रीरामचन्द्रजी
महामुनि बकदाल्भ्य
के आश्रम पहुँचे
और उन्होंने मुनि
को प्रणाम किया
। महर्षि ने प्रसन्न
होकर श्रीरामजी
के आगमन का कारण
पूछा ।
श्रीरामचन्द्रजी
बोले : ब्रह्मन्
! मैं लंका पर चढ़ाई
करने के उद्धेश्य
से अपनी सेनासहित
यहाँ आया हूँ ।
मुने ! अब जिस प्रकार
समुद्र पार किया
जा सके,
कृपा करके वह
उपाय बताइये ।
बकदाल्भय
मुनि ने कहा : हे श्रीरामजी
! फाल्गुन के कृष्णपक्ष
में जो ‘विजया’ नाम की एकादशी
होती है,
उसका व्रत करने
से आपकी विजय होगी
। निश्चय ही आप
अपनी वानर सेना
के साथ समुद्र
को पार कर लेंगे
। राजन् ! अब इस व्रत
की फलदायक विधि
सुनिये :
दशमी
के दिन सोने, चाँदी,
ताँबे अथवा मिट्टी
का एक कलश स्थापित
कर उस कलश को जल
से भरकर उसमें
पल्लव डाल दें
। उसके ऊपर भगवान
नारायण के सुवर्णमय
विग्रह की स्थापना
करें । फिर एकादशी
के दिन प्रात: काल
स्नान करें । कलश
को पुन: स्थापित
करें । माला, चन्दन, सुपारी
तथा नारियल आदि
के द्वारा विशेष
रुप से उसका पूजन
करें । कलश के ऊपर
सप्तधान्य और जौ
रखें । गन्ध, धूप, दीप और
भाँति भाँति के
नैवेघ से पूजन
करें । कलश के सामने
बैठकर उत्तम कथा
वार्ता आदि के
द्वारा सारा दिन
व्यतीत करें और
रात में भी वहाँ
जागरण करें । अखण्ड
व्रत की सिद्धि
के लिए घी का दीपक
जलायें । फिर द्वादशी
के दिन सूर्योदय
होने पर उस कलश
को किसी जलाशय
के समीप (नदी, झरने या पोखर
के तट पर) स्थापित
करें और उसकी विधिवत्
पूजा करके देव
प्रतिमासहित उस
कलश को वेदवेत्ता
ब्राह्मण के लिए
दान कर दें । कलश
के साथ ही और भी
बड़े बड़े दान देने
चाहिए । श्रीराम
! आप अपने सेनापतियों
के साथ इसी विधि
से प्रयत्नपूर्वक
‘विजया
एकादशी’ का व्रत कीजिये
। इससे आपकी विजय
होगी ।
ब्रह्माजी
कहते हैं : नारद ! यह सुनकर
श्रीरामचन्द्रजी
ने मुनि के कथनानुसार
उस समय ‘विजया एकादशी’ का व्रत किया
। उस व्रत के करने
से श्रीरामचन्द्रजी
विजयी हुए । उन्होंने
संग्राम में रावण
को मारा,
लंका पर विजय
पायी और सीता को
प्राप्त किया ।
बेटा ! जो मनुष्य
इस विधि से व्रत
करते हैं, उन्हें
इस लोक में विजय
प्राप्त होती है
और उनका परलोक
भी अक्षय बना रहता
है ।
भगवान
श्रीकृष्ण कहते
हैं : युधिष्ठिर
! इस कारण ‘विजया’ का व्रत करना
चाहिए । इस प्रसंग
को पढ़ने और सुनने
से वाजपेय यज्ञ
का फल मिलता है
।
युधिष्ठिर
ने भगवान श्रीकृष्ण
से कहा : श्रीकृष्ण
! मुझे फाल्गुन
मास के शुक्लपक्ष
की एकादशी का नाम
और माहात्म्य बताने
की कृपा कीजिये
।
भगवान
श्रीकृष्ण बोले:
महाभाग
धर्मनन्दन ! फाल्गुन
मास के शुक्लपक्ष
की एकादशी का नाम
‘आमलकी’ है । इसका
पवित्र व्रत विष्णुलोक
की प्राप्ति करानेवाला
है । राजा मान्धाता
ने भी महात्मा
वशिष्ठजी से इसी
प्रकार का प्रश्न
पूछा था,
जिसके जवाब में
वशिष्ठजी ने कहा
था :
‘महाभाग ! भगवान विष्णु
के थूकने पर उनके
मुख से चन्द्रमा
के समान कान्तिमान
एक बिन्दु प्रकट
होकर पृथ्वी पर
गिरा । उसीसे आमलक
(आँवले) का महान
वृक्ष उत्पन्न
हुआ, जो
सभी वृक्षों का
आदिभूत कहलाता
है । इसी समय प्रजा
की सृष्टि करने
के लिए भगवान ने
ब्रह्माजी को उत्पन्न
किया और ब्रह्माजी
ने देवता, दानव,
गन्धर्व, यक्ष, राक्षस,
नाग तथा निर्मल
अंतःकरण वाले महर्षियों
को जन्म दिया ।
उनमें से देवता
और ॠषि उस स्थान
पर आये, जहाँ
विष्णुप्रिय आमलक
का वृक्ष था । महाभाग
! उसे देखकर देवताओं
को बड़ा विस्मय
हुआ क्योंकि उस
वृक्ष के बारे
में वे नहीं जानते
थे । उन्हें इस
प्रकार विस्मित
देख आकाशवाणी हुई:
‘महर्षियो
! यह सर्वश्रेष्ठ
आमलक का वृक्ष
है, जो
विष्णु को प्रिय
है । इसके स्मरणमात्र
से गोदान का फल
मिलता है । स्पर्श
करने से इससे दुगना
और फल भक्षण करने
से तिगुना पुण्य
प्राप्त होता है
। यह सब पापों को
हरनेवाला वैष्णव
वृक्ष है । इसके
मूल में विष्णु,
उसके ऊपर ब्रह्मा,
स्कन्ध में परमेश्वर
भगवान रुद्र,
शाखाओं में मुनि,
टहनियों में
देवता, पत्तों
में वसु, फूलों
में मरुद्गण तथा
फलों में समस्त
प्रजापति वास करते
हैं । आमलक सर्वदेवमय
है । अत: विष्णुभक्त
पुरुषों के लिए
यह परम पूज्य है
। इसलिए सदा प्रयत्नपूर्वक
आमलक का सेवन करना
चाहिए ।’
ॠषि
बोले : आप
कौन हैं ?
देवता हैं या
कोई और ? हमें
ठीक ठीक बताइये
।
पुन
: आकाशवाणी हुई
: जो सम्पूर्ण
भूतों के कर्त्ता
और समस्त भुवनों
के स्रष्टा हैं, जिन्हें
विद्वान पुरुष
भी कठिनता से देख
पाते हैं, मैं
वही सनातन विष्णु
हूँ।
देवाधिदेव
भगवान विष्णु का
यह कथन सुनकर वे
ॠषिगण भगवान की
स्तुति करने लगे
। इससे भगवान श्रीहरि
संतुष्ट हुए और
बोले : ‘महर्षियो ! तुम्हें
कौन सा अभीष्ट
वरदान दूँ ?
ॠषि
बोले : भगवन्
! यदि आप संतुष्ट
हैं तो हम लोगों
के हित के लिए कोई
ऐसा व्रत बतलाइये, जो स्वर्ग
और मोक्षरुपी फल
प्रदान करनेवाला
हो ।
श्रीविष्णुजी
बोले : महर्षियो
! फाल्गुन मास के
शुक्लपक्ष में
यदि पुष्य नक्षत्र
से युक्त एकादशी
हो तो वह महान पुण्य
देनेवाली और बड़े
बड़े पातकों का
नाश करनेवाली होती
है । इस दिन आँवले
के वृक्ष के पास
जाकर वहाँ रात्रि
में जागरण करना
चाहिए । इससे मनुष्य
सब पापों से छुट
जाता है और सहस्र
गोदान का फल प्राप्त
करता है । विप्रगण
! यह व्रत सभी व्रतों
में उत्तम है, जिसे मैंने
तुम लोगों को बताया
है ।
ॠषि
बोले : भगवन्
! इस व्रत की विधि
बताइये । इसके
देवता और मंत्र
क्या हैं ? पूजन कैसे
करें? उस समय
स्नान और दान कैसे
किया जाता है?
भगवान
श्रीविष्णुजी
ने कहा : द्विजवरो
! इस एकादशी को व्रती
प्रात:काल दन्तधावन
करके यह संकल्प
करे कि ‘ हे पुण्डरीकाक्ष
! हे अच्युत ! मैं
एकादशी को निराहार
रहकर दुसरे दिन
भोजन करुँगा ।
आप मुझे शरण में
रखें ।’ ऐसा नियम
लेने के बाद पतित, चोर, पाखण्डी, दुराचारी, गुरुपत्नीगामी
तथा मर्यादा भंग
करनेवाले मनुष्यों
से वह वार्तालाप
न करे । अपने मन
को वश में रखते
हुए नदी में, पोखरे में, कुएँ पर अथवा
घर में ही स्नान
करे । स्नान के
पहले शरीर में
मिट्टी लगाये ।
मृत्तिका
लगाने का मंत्र
अश्वक्रान्ते
रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते
वसुन्धरे ।
मृत्तिके
हर मे पापं जन्मकोटयां
समर्जितम् ॥
वसुन्धरे
! तुम्हारे ऊपर
अश्व और रथ चला
करते हैं तथा वामन
अवतार के समय भगवान
विष्णु ने भी तुम्हें
अपने पैरों से
नापा था । मृत्तिके
! मैंने करोड़ों
जन्मों में जो
पाप किये हैं, मेरे उन
सब पापों को हर
लो ।’
स्नान
का मंत्र
त्वं
मात: सर्वभूतानां
जीवनं तत्तु रक्षकम्।
स्वेदजोद्भिज्जजातीनां
रसानां पतये नम:॥
स्नातोSहं
सर्वतीर्थेषु
ह्रदप्रस्रवणेषु
च्।
नदीषु
देवखातेषु इदं
स्नानं तु मे भवेत्॥
‘जल
की अधिष्ठात्री
देवी ! मातः
! तुम सम्पूर्ण
भूतों के लिए जीवन
हो । वही जीवन, जो स्वेदज
और उद्भिज्ज जाति
के जीवों का भी
रक्षक है । तुम
रसों की स्वामिनी
हो । तुम्हें नमस्कार
है । आज मैं सम्पूर्ण
तीर्थों, कुण्डों,
झरनों, नदियों
और देवसम्बन्धी
सरोवरों में स्नान
कर चुका । मेरा
यह स्नान उक्त
सभी स्नानों का
फल देनेवाला हो
।’
विद्वान
पुरुष को चाहिए
कि वह परशुरामजी
की सोने की प्रतिमा
बनवाये । प्रतिमा
अपनी शक्ति और
धन के अनुसार एक
या आधे माशे सुवर्ण
की होनी चाहिए
। स्नान के पश्चात्
घर आकर पूजा और
हवन करे । इसके
बाद सब प्रकार
की सामग्री लेकर
आँवले के वृक्ष
के पास जाय । वहाँ
वृक्ष के चारों
ओर की जमीन झाड़
बुहार,
लीप पोतकर शुद्ध
करे । शुद्ध की
हुई भूमि में मंत्रपाठपूर्वक
जल से भरे हुए नवीन
कलश की स्थापना
करे । कलश में पंचरत्न
और दिव्य गन्ध
आदि छोड़ दे । श्वेत
चन्दन से उसका
लेपन करे । उसके
कण्ठ में फूल की
माला पहनाये ।
सब प्रकार के धूप
की सुगन्ध फैलाये
। जलते हुए दीपकों
की श्रेणी सजाकर
रखे । तात्पर्य
यह है कि सब ओर से
सुन्दर और मनोहर
दृश्य उपस्थित
करे । पूजा के लिए
नवीन छाता, जूता और वस्त्र
भी मँगाकर रखे
। कलश के ऊपर एक
पात्र रखकर उसे
श्रेष्ठ लाजों(खीलों)
से भर दे । फिर उसके
ऊपर परशुरामजी
की मूर्ति (सुवर्ण
की) स्थापित करे।
‘विशोकाय नम:’ कहकर उनके
चरणों की,
‘विश्वरुपिणे
नम:’ से
दोनों घुटनों की,
‘उग्राय नम:’ से जाँघो
की,
‘दामोदराय नम:’ से कटिभाग
की,
‘पधनाभाय नम:’ से उदर की,
‘श्रीवत्सधारिणे
नम:’ से
वक्ष: स्थल की,
‘चक्रिणे नम:’ से बायीं
बाँह की,
‘गदिने नम:’ से दाहिनी
बाँह की,
‘वैकुण्ठाय नम:’ से कण्ठ की,
‘यज्ञमुखाय नम:’ से मुख की,
‘विशोकनिधये
नम:’ से
नासिका की,
‘वासुदेवाय नम:’ से नेत्रों की,
‘वामनाय नम:’ से ललाट की,
‘सर्वात्मने
नम:’ से
संपूर्ण अंगो तथा
मस्तक की पूजा
करे ।
ये ही
पूजा के मंत्र
हैं। तदनन्तर भक्तियुक्त
चित्त से शुद्ध
फल के द्वारा देवाधिदेव
परशुरामजी को अर्ध्य
प्रदान करे । अर्ध्य
का मंत्र इस प्रकार
है :
नमस्ते
देवदेवेश जामदग्न्य
नमोSस्तु ते
।
गृहाणार्ध्यमिमं
दत्तमामलक्या
युतं हरे ॥
‘देवदेवेश्वर ! जमदग्निनन्दन
! श्री विष्णुस्वरुप
परशुरामजी ! आपको
नमस्कार है, नमस्कार
है । आँवले के फल
के साथ दिया हुआ
मेरा यह अर्ध्य
ग्रहण कीजिये ।’
तदनन्तर
भक्तियुक्त चित्त
से जागरण करे ।
नृत्य,
संगीत, वाघ,
धार्मिक उपाख्यान
तथा श्रीविष्णु
संबंधी कथा वार्ता
आदि के द्वारा
वह रात्रि व्यतीत
करे । उसके बाद
भगवान विष्णु के
नाम ले लेकर आमलक
वृक्ष की परिक्रमा
एक सौ आठ या अट्ठाईस
बार करे । फिर सवेरा
होने पर श्रीहरि
की आरती करे । ब्राह्मण
की पूजा करके वहाँ
की सब सामग्री
उसे निवेदित कर
दे । परशुरामजी
का कलश, दो वस्त्र,
जूता आदि सभी
वस्तुएँ दान कर
दे और यह भावना
करे कि : ‘परशुरामजी
के स्वरुप में
भगवान विष्णु मुझ
पर प्रसन्न हों
।’ तत्पश्चात्
आमलक का स्पर्श
करके उसकी प्रदक्षिणा
करे और स्नान करने
के बाद विधिपूर्वक
ब्राह्मणों को
भोजन कराये । तदनन्तर
कुटुम्बियों के
साथ बैठकर स्वयं
भी भोजन करे ।
सम्पूर्ण
तीर्थों के सेवन
से जो पुण्य प्राप्त
होता है तथा सब
प्रकार के दान
देने दे जो फल मिलता
है, वह
सब उपर्युक्त विधि
के पालन से सुलभ
होता है । समस्त
यज्ञों की अपेक्षा
भी अधिक फल मिलता
है, इसमें तनिक
भी संदेह नहीं
है । यह व्रत सब
व्रतों में उत्तम
है ।’
वशिष्ठजी
कहते हैं : महाराज ! इतना
कहकर देवेश्वर
भगवान विष्णु वहीं
अन्तर्धान हो गये
। तत्पश्चात् उन
समस्त महर्षियों
ने उक्त व्रत का
पूर्णरुप से पालन
किया । नृपश्रेष्ठ
! इसी प्रकार तुम्हें
भी इस व्रत का अनुष्ठान
करना चाहिए ।
भगवान
श्रीकृष्ण कहते
हैं : युधिष्ठिर
! यह दुर्धर्ष व्रत
मनुष्य को सब पापों
से मुक्त करनेवाला
है ।
महाराज
युधिष्ठिर ने भगवान
श्रीकृष्ण से चैत्र
(गुजरात महाराष्ट्र
के अनुसार फाल्गुन
) मास के कृष्णपक्ष
की एकादशी के बारे
में जानने की इच्छा
प्रकट की तो वे
बोले : ‘राजेन्द्र ! मैं
तुम्हें इस विषय
में एक पापनाशक
उपाख्यान सुनाऊँगा, जिसे चक्रवर्ती
नरेश मान्धाता
के पूछने पर महर्षि
लोमश ने कहा था
।’
मान्धाता
ने पूछा : भगवन् ! मैं
लोगों के हित की
इच्छा से यह सुनना
चाहता हूँ कि चैत्र
मास के कृष्णपक्ष
में किस नाम की
एकादशी होती है, उसकी क्या
विधि है तथा उससे
किस फल की प्राप्ति
होती है? कृपया
ये सब बातें मुझे
बताइये ।
लोमशजी
ने कहा : नृपश्रेष्ठ
! पूर्वकाल की बात
है । अप्सराओं
से सेवित चैत्ररथ
नामक वन में, जहाँ गन्धर्वों
की कन्याएँ अपने
किंकरो के साथ
बाजे बजाती हुई
विहार करती हैं,
मंजुघोषा नामक
अप्सरा मुनिवर
मेघावी को मोहित
करने के लिए गयी
। वे महर्षि चैत्ररथ
वन में रहकर ब्रह्मचर्य
का पालन करते थे
। मंजुघोषा मुनि
के भय से आश्रम
से एक कोस दूर ही
ठहर गयी और सुन्दर
ढंग से वीणा बजाती
हुई मधुर गीत गाने
लगी । मुनिश्रेष्ठ
मेघावी घूमते हुए
उधर जा निकले और
उस सुन्दर अप्सरा
को इस प्रकार गान
करते देख बरबस
ही मोह के वशीभूत
हो गये । मुनि की
ऐसी अवस्था देख
मंजुघोषा उनके
समीप आयी और वीणा
नीचे रखकर उनका
आलिंगन करने लगी
। मेघावी भी उसके
साथ रमण करने लगे
। रात और दिन का
भी उन्हें भान
न रहा । इस प्रकार
उन्हें बहुत दिन
व्यतीत हो गये
। मंजुघोषा देवलोक
में जाने को तैयार
हुई । जाते समय
उसने मुनिश्रेष्ठ
मेघावी से कहा:
‘ब्रह्मन्
! अब मुझे अपने देश
जाने की आज्ञा
दीजिये ।’
मेघावी
बोले : देवी
! जब तक सवेरे की
संध्या न हो जाय
तब तक मेरे ही पास
ठहरो ।
अप्सरा
ने कहा : विप्रवर
! अब तक न जाने कितनी
ही संध्याँए चली
गयीं ! मुझ पर कृपा
करके बीते हुए
समय का विचार तो
कीजिये !
लोमशजी
ने कहा : राजन् ! अप्सरा
की बात सुनकर मेघावी
चकित हो उठे । उस
समय उन्होंने बीते
हुए समय का हिसाब
लगाया तो मालूम
हुआ कि उसके साथ
रहते हुए उन्हें
सत्तावन वर्ष हो
गये । उसे अपनी
तपस्या का विनाश
करनेवाली जानकर
मुनि को उस पर बड़ा
क्रोध आया । उन्होंने
शाप देते हुए कहा:
‘पापिनी
! तू पिशाची हो जा
।’ मुनि
के शाप से दग्ध
होकर वह विनय से
नतमस्तक हो बोली
: ‘विप्रवर
! मेरे शाप का उद्धार
कीजिये । सात वाक्य
बोलने या सात पद
साथ साथ चलनेमात्र
से ही सत्पुरुषों
के साथ मैत्री
हो जाती है । ब्रह्मन्
! मैं तो आपके साथ
अनेक वर्ष व्यतीत
किये हैं, अत: स्वामिन्
! मुझ पर कृपा कीजिये
।’
मुनि
बोले : भद्रे
! क्या करुँ ? तुमने
मेरी बहुत बड़ी
तपस्या नष्ट कर
डाली है । फिर भी
सुनो । चैत्र कृष्णपक्ष
में जो एकादशी
आती है उसका नाम
है ‘पापमोचनी
।’ वह शाप
से उद्धार करनेवाली
तथा सब पापों का
क्षय करनेवाली
है । सुन्दरी ! उसीका
व्रत करने पर तुम्हारी
पिशाचता दूर होगी
।
ऐसा
कहकर मेघावी अपने
पिता मुनिवर च्यवन
के आश्रम पर गये
। उन्हें आया देख
च्यवन ने पूछा
: ‘बेटा
! यह क्या किया ? तुमने
तो अपने पुण्य
का नाश कर डाला
!’
मेघावी
बोले : पिताजी
! मैंने अप्सरा
के साथ रमण करने
का पातक किया है
। अब आप ही कोई ऐसा
प्रायश्चित बताइये, जिससे
पातक का नाश हो
जाय ।
च्यवन
ने कहा : बेटा ! चैत्र
कृष्णपक्ष में
जो ‘पापमोचनी
एकादशी’ आती है, उसका व्रत
करने पर पापराशि
का विनाश हो जायेगा
।
पिता
का यह कथन सुनकर
मेघावी ने उस व्रत
का अनुष्ठान किया
। इससे उनका पाप
नष्ट हो गया और
वे पुन: तपस्या
से परिपूर्ण हो
गये । इसी प्रकार
मंजुघोषा ने भी
इस उत्तम व्रत
का पालन किया ।
‘पापमोचनी’ का व्रत करने
के कारण वह पिशाचयोनि
से मुक्त हुई और
दिव्य रुपधारिणी
श्रेष्ठ अप्सरा
होकर स्वर्गलोक
में चली गयी ।
भगवान
श्रीकृष्ण कहते
हैं : राजन्
! जो श्रेष्ठ मनुष्य
‘पापमोचनी
एकादशी’ का व्रत करते
हैं उनके सारे
पाप नष्ट हो जाते
हैं । इसको पढ़ने
और सुनने से सहस्र
गौदान का फल मिलता
है । ब्रह्महत्या, सुवर्ण
की चोरी, सुरापान
और गुरुपत्नीगमन
करनेवाले महापातकी
भी इस व्रत को करने
से पापमुक्त हो
जाते हैं । यह व्रत
बहुत पुण्यमय है
।
युधिष्ठिर
ने पूछा: वासुदेव
! आपको नमस्कार
है ! कृपया आप यह
बताइये कि चैत्र
शुक्लपक्ष में
किस नाम की एकादशी
होती है?
भगवान
श्रीकृष्ण बोले
: राजन्
! एकाग्रचित्त
होकर यह पुरातन
कथा सुनो, जिसे वशिष्ठजी
ने राजा दिलीप
के पूछने पर कहा
था ।
वशिष्ठजी
बोले : राजन्
! चैत्र शुक्लपक्ष
में ‘कामदा’ नाम की एकादशी
होती है । वह परम
पुण्यमयी है ।
पापरुपी ईँधन के
लिए तो वह दावानल
ही है ।
प्राचीन
काल की बात है: नागपुर
नाम का एक सुन्दर
नगर था,
जहाँ सोने के
महल बने हुए थे
। उस नगर में पुण्डरीक
आदि महा भयंकर
नाग निवास करते
थे । पुण्डरीक
नाम का नाग उन दिनों
वहाँ राज्य करता
था । गन्धर्व,
किन्नर और अप्सराएँ
भी उस नगरी का सेवन
करती थीं । वहाँ
एक श्रेष्ठ अप्सरा
थी, जिसका नाम
ललिता था । उसके
साथ ललित नामवाला
गन्धर्व भी था
। वे दोनों पति
पत्नी के रुप में
रहते थे । दोनों
ही परस्पर काम
से पीड़ित रहा करते
थे । ललिता के हृदय
में सदा पति की
ही मूर्ति बसी
रहती थी और ललित
के हृदय में सुन्दरी
ललिता का नित्य
निवास था ।
एक दिन
की बात है । नागराज
पुण्डरीक राजसभा
में बैठकर मनोंरंजन
कर रहा था । उस समय
ललित का गान हो
रहा था किन्तु
उसके साथ उसकी
प्यारी ललिता नहीं
थी । गाते गाते
उसे ललिता का स्मरण
हो आया । अत: उसके
पैरों की गति रुक
गयी और जीभ लड़खड़ाने
लगी ।
नागों
में श्रेष्ठ कर्कोटक
को ललित के मन का
सन्ताप ज्ञात हो
गया, अत:
उसने राजा पुण्डरीक
को उसके पैरों
की गति रुकने और
गान में त्रुटि
होने की बात बता
दी । कर्कोटक की
बात सुनकर नागराज
पुण्डरीक की आँखे
क्रोध से लाल हो
गयीं । उसने गाते
हुए कामातुर ललित
को शाप दिया : ‘दुर्बुद्धे
! तू मेरे सामने
गान करते समय भी
पत्नी के वशीभूत
हो गया,
इसलिए राक्षस
हो जा ।’
महाराज
पुण्डरीक के इतना
कहते ही वह गन्धर्व
राक्षस हो गया
। भयंकर मुख, विकराल
आँखें और देखनेमात्र
से भय उपजानेवाला
रुप - ऐसा राक्षस
होकर वह कर्म का
फल भोगने लगा ।
ललिता
अपने पति की विकराल
आकृति देख मन ही
मन बहुत चिन्तित
हुई । भारी दु:ख
से वह कष्ट पाने
लगी । सोचने लगी:
‘क्या
करुँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पति पाप
से कष्ट पा रहे
हैं…’
वह रोती
हुई घने जंगलों
में पति के पीछे
पीछे घूमने लगी
। वन में उसे एक
सुन्दर आश्रम दिखायी
दिया, जहाँ एक मुनि
शान्त बैठे हुए
थे । किसी भी प्राणी
के साथ उनका वैर
विरोध नहीं था
। ललिता शीघ्रता
के साथ वहाँ गयी
और मुनि को प्रणाम
करके उनके सामने
खड़ी हुई । मुनि
बड़े दयालु थे ।
उस दु:खिनी को देखकर
वे इस प्रकार बोले
: ‘शुभे
! तुम कौन हो ? कहाँ से
यहाँ आयी हो? मेरे सामने सच
सच बताओ ।’
ललिता
ने कहा : महामुने
! वीरधन्वा नामवाले
एक गन्धर्व हैं
। मैं उन्हीं महात्मा
की पुत्री हूँ
। मेरा नाम ललिता
है । मेरे स्वामी
अपने पाप दोष के
कारण राक्षस हो
गये हैं । उनकी
यह अवस्था देखकर
मुझे चैन नहीं
है । ब्रह्मन्
! इस समय मेरा जो
कर्त्तव्य हो, वह बताइये
। विप्रवर! जिस
पुण्य के द्वारा
मेरे पति राक्षसभाव
से छुटकारा पा
जायें, उसका
उपदेश कीजिये ।
ॠषि बोले : भद्रे ! इस समय चैत्र मास के शुक्लपक्ष की ‘कामदा’ नामक एकादशी तिथि है, जो सब पापो