
ब्रह्मलीन
ब्रह्मनिष्ठ स्वामी
श्री
लीलाशाहजी
महाराज के
पावन
वचनामृत
गागर में
सागर
ब्रह्मलीन ब्रह्मनिष्ठ स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज के सत्संग प्रवचनों का यह संकलन 'गागर में सागर' आपके करकमलों में अर्पित करते हुए श्री योग वेदान्त सेवा समिति कृतार्थ हो रही है।
वेदों को सागर की उपमा दी गयी है। वे ज्ञान के सिधु तो हैं किंतु जन सामान्य के उपयोग में नहीं आते। उस अथाह ज्ञानराशि को अपने स्वाध्याय-तप एवं आत्मानुभव की ऊष्मा से बादलों का रूप लेकर फिर भक्तवत्सलता के शीतल पवन के बहने पर अमृतवाणी की धाराओं से बरसाते हैं ब्रह्मनिष्ठ लोकसंत। ऐसे संतों की वाणी में साधना की सुगम रीति मिलती है, आत्मज्ञान की समझ मिलती है। सच्चे सुख की कुंजी मिलती है, शरीर-स्वास्थ्य के नुस्खे मिलते है और उन्नत जीवन जीने की सर्वांगसम्पूर्ण कला ही मिल जाती है। सागररूपी शास्त्रों का सार मनुष्य की छोटी समझरूपी बुद्धि की गागर में उतारने की क्षमता इस छोटी सी सत्संग पुस्तिका में है। आप सभी इसका लाभ लें एवं औरों को भी दिलायें।
श्री योग वेदान्त सेवा समिति,
अमदावाद आश्रम।
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सर्वदा आनन्द
में, शांतमना होकर
रहो5
जगत से प्रीति
हटाकर आत्मा में
लगायें.. 6
नश्वर से सुखी
होने की इच्छा
छोड़ते ही परम
सुखी8
अज्ञान-नशे
को उतारना ही सबसे
श्रेष्ठ उपलब्धि.... 14
विकारों से
बचने हेतु संकल्प-साधना... 17
..........तो दुनिया
में नहीं फँसोगे
!21
आर्य वीरो ! अब तो जागो...... 22
वेदान्त का
सार ब्रह्मज्ञान
के सत्संग में.. 27
सभी शास्त्रों
का सार.............. 29
बिनु सत्संग
विवेक न होई...... 33
जन्म-मरण का
मूलः तृष्णा.... 35
स्वतंत्रता
माने उच्छ्रंखलता
नहीं36
अविद्या का
पर्दा हटा कर देखें
!37
निन्दा-स्तुति
की उपेक्षा करें. 41
.....नहीं तो सिर
धुन-धुनकर पछताना
पड़ेगा... 41
सत्संग-विचार
ही जीवन का निर्माता.. 42
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दो नाविक थे। वे नाव द्वारा नदी की सैर करके सायंकाल तट पर पहुँचे और एक-दूसरे से कुशलता का समाचार एवं अनुभव पूछने लगे। पहले नाविक ने कहाः "भाई ! मैं तो ऐसा चतुर हूँ कि जब नाव भँवर के पास जाती है, तब चतुराई से उसे तत्काल बाहर निकाल लेता हूँ।" तब दूसरा नाविक बोलाः "मैं ऐसा कुशल नाविक हूँ कि नाव को भँवर के पास जाने ही नहीं देता।"
अब दोनों में से श्रेष्ठ नाविक कौन है ? स्पष्टतः दूसरा नाविक ही श्रेष्ठ है क्योंकि वह भँवर के पास जाता ही नहीं। पहला नाविक तो किसी न किसी दिन भँवर का शिकार हो ही जायगा।
इसी प्रकार सत्य के मार्ग अर्थात् ईश्वर-प्राप्ति के मार्ग पर चलने वाले पथिकों के लिए विषय विकार एवं कुसंगरूपी भँवरों के पास न जाना ही श्रेयस्कर है।
अगर
आग के नजदीक
बैठोगे जाकर,
उठोगे एक दिन
कपड़े जलाकर।
माना
कि दामन बचाते
रहे तुम, मगर
सेंक हरदम लाते
रहे तुम।।
कोई जुआ नहीं खेलता, किंतु देखता है तो देखते-देखते वह जुआ खेलना भी सीख जायगा और एक समय ऐसा आयगा कि वह जुआ खेले बिना रह नहीं पायेगा।
इसी प्रकार अन्य विषयों के संदर्भ में भी समझना चाहिए और विषय विकारों एवं कुसंग से दूर ही रहना चाहिए। जो विषय एवं कुसंग से दूर रहते हैं, वे बड़े भाग्यवान हैं।
जिस प्रकार धुआँ सफेद मकान को काला कर देता है, उसी प्रकार विषय-विकार एवं कुसंग नेक व्यक्ति का भी पतन कर देते है।
'सत्संग
तारे, कुसंग
डुबोवे।'
जैसे हरी लता पर बैठने वाला कीड़ा लता की भाँति हरे रंग का हो जाता है, उसी प्रकार विषय-विकार एवं कुसंग से मन मलिन हो जाता है। इसलिए विषय-विकारों और कुसंग से बचने के लिए संतों का संग अधिकाधिक करना चाहिए। कबीर जी ने कहाः
संगत
कीजै साधु की,
होवे दिन-दिन
हेत।
साकुट
काली कामली,
धोते होय न
सेत।।
कबीर
संगत साध की,
दिन-दिन दूना
हेत।
साकत
कारे कानेबरे,
धोए होय न
सेत।।
अर्थात् संत-महापुरूषों की ही संगति करनी चाहिए क्योंकि वे अंत में निहाल कर देते हैं। दुष्टों की संगति नहीं करनी चाहिए क्योंकि उनके संपर्क में जाते ही मनुष्य का पतन हो जाता है।
संतों की संगति से सदैव हित होता है, जबकि दुष्ट लोगों की संगति गुणवान मनुष्यों का भी पतन हो जाता है।
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सुख-दुःख,
मान-अपमान,
हर्ष-शोक आदि
द्वन्द्व शरीर
के धर्म हैं।
जब तक शरीर है,
तब तक ये आते
जाते रहेंगे,
कभी कम तो कभी
अधिक होते
रहेंगे। उनके
आने पर तुम
व्याकुल मत
होना। तुम
पूर्ण आत्मा
हो, अविनाशी
हो और सुख-दुःख
आने जाने वाले
हैं। वे भला
तुम्हें कैसे
चलायमान कर
सकते हैं ? उनका तो
अपना कोई
अस्तित्व ही
नहीं है।
वस्तुतः, वे
तो तुम्हारे
अस्तित्व का
आधार लेकर प्रतीत
होते हैं। तुम
उनसे भिन्न हो
और उन्हें प्रकाशित
करने वाले हो।
अतः उन्हें
देखते रहो,
सहन करो और गुजरने
दो। सर्वदा
आनंद में रहो
एवं शांतमना होकर
रहो, सहन करो
और गुजरने दो।
सुख-दुःख देने
वाले कोई
पदार्थ नहीं
होते हैं वरन्
तुम्हारे मन
के भाव ही
सुख-दुःख पैदा
करते हैं। इस
विचार को सत्
वस्तु में
लगाकर
अपने-आपमें
मग्न रहो और
सदैव
प्रसन्नचित्त
रहो। उद्यम न त्यागो।
प्रारब्ध पर
भरोसा करना
कमजोरी का लक्षण
है।
अतः
अपनी और
दूसरों की
भलाई के लिए
सत्कर्म करते
रहो। फल की
इच्छा से ऊपर
उठ जाओ
क्योंकि इच्छा
बंधन में
डालती है।
सदैव
भलाई के कार्य
करते रहो एवं
दूसरों को भी
अच्छे कार्य
करने के लिए
प्रेरित करो।
ऐसा कोई भी काम
न करो, जिसे
करने से
तुम्हारा मन
मलिन हो। यदि
नेक कार्य
करते रहोगे तो
भगवान
तुम्हें सदैव
अपनी अनन्त
शक्ति प्रदान
करते रहेंगे।
हमारे
शास्त्रों
में कहा गया
हैः
मातृदेवो
भव। पितृदेवो
भव।
आचार्यदेवो
भव।
माता,
पिता एवं गुरू
को ईश्वर के
समान पूजनीय
समझो। उनके
प्रति अपने
कर्त्तव्य का
पालन अवश्य
करो, जो कर्त्तव्यपालन
ठीक से करता
है वही
श्रेष्ठ है।
माता, पिता
एवं सच्चे
सदगुरू की
सेवा बड़े-में-बड़ा
धर्म है।
गरीबों की
यथासम्भव
सहायता करो।
रास्ते से
भटके हुए
लोगों को
सन्मार्ग की
ओर चलने की
प्रेरणा दो
परंतु यह सब
करने के साथ
उस ईश्वर को
भी सदैव याद
करते रहो जो हम
सभी का
सर्जनहार,
पालनहार एवं
तारणहार है। उसके
स्मरण से ही
सच्ची शांति,
समृद्धि तथा
सच्चा सुख
प्राप्त
होगा।
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मन पर पूर्ण संयम रखना चाहिए। बुरे संकल्पों सदा दूर रहना चाहिए। किसी भी बुरे विचार का बार-बार चिंतन नहीं करना चाहिए, अपितु उसकी स्मृति ही पूर्णतः मिटा देनी चाहिए। मन की दौड़ बाहर नहीं हो तो समझ लो कि आपके अभ्यास का मन पर प्रभाव पड़ रहा है। समुद्र के बीचोबीच चल रहे जहाज पर कोई पक्षी बैठा हो तो वह कहाँ जायेगा ? उड़ते-उड़ते इधर-उधर घूमता हुआ थककर वापस जहाज पर ही आकर बैठेगा। इसी प्रकार मन भी भले दौड़े, थककर स्वयं आत्मिक शांति में स्थिर होगा।
मन को अपना गुलाम बनाकर उससे मोक्ष का काम लेना चाहिए। मन को कामना, विषय, इच्छा और तृष्णा आदि से खाली करके उसमें ईश्वरीय प्रेम भरना चाहिए। सदैव चौकस होकर मन पर निगरानी रखनी चाहिए तथा आत्मसुख को पाकर उसी में मस्त रहना चाहिए। मन कोई वस्तु नहीं है। मन तुम्हारी ही शक्ति से कार्य करता है। तुम मन से भिन्न ज्योतिस्वरूप आत्मा हो। ये सूरज, चाँद, तारे – सभी तुम्हारे प्रकाश से ही प्रकाशित हो रहे हैं। वे आभासमात्र अल्प हैं। सूर्य दिन में है तो रात में नहीं और चंद्रमा रात को है तो दिन में नहीं, परंतु तुम वह ज्योति हो जो तीनों कालों में प्रकाशित हो रही है। वही तुम्हारा असली स्वरूप है।
जिस प्रकार वस्त्र शरीर से भिन्न हैं, वैसे ही आत्मा शरीर से भिन्न हैं, आकाश की तरह सबमें व्यापक हैं। शरीर को जो इन्द्रियाँ मिली हुई हैं, उनके द्वारा शुभ कर्म करने चाहिए। सदैव शुभ देखना, सुनना एवं बोलना चाहिए।
जिसने शुभ कर्मों से मन को जीता है, समझो उसने जग को जीत लिया। यदि मन को वश में नहीं किया तो पाँच विषयों में ही फँसकर सम्पूर्ण जीवन निकल जायगा। फिर वह चौरासी लाख योनियों में भटकायेगा। अखण्ड सुख और शाश्वत सुख प्राप्त नहीं हो सकेगा। जब मन को विषयों से छुड़ायेंगे तभी आत्मा का सुख मिलेगा।
जो मनुष्य निष्काम कर्म करता है उसे आत्मा में प्रीति होती है, उसे संसार से वैराग्य उपजता है और वैराग्य की अग्नि से उसके सारे पाप तथा कुसंस्कार जल जाते हैं। इस प्रकार जब हृदय शुद्ध भगवद् शांति, ईश्वरीय आनंद का स्रोत अपने भीतर ही फूट पड़ता है। जैसे बारूद का ढेर बना दिया जाय तो एक दियासिलाई से ही विस्फोट हो जाता है, ऐसे ही जब साधक वैराग्यवान होकर मन को वश में करता है तब उसे सदगुरू का थोड़ा सा उपदेश भी परमात्म पद में प्रतिष्ठित कर देता है।
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जैसी प्रीति संसार के पदार्थों में है, वैसी अगर आत्मज्ञान, आत्मध्यान, आत्मानंद में करें तो बेड़ा पार हो जाय। जगत के पदार्थों एवं वासना, काम, क्रोध आदि से प्रीति हटाकर आत्मा में लगायें तो तत्काल मोक्ष हो जाना आश्चर्य की बात नहीं है।
काहे
एक बिना चित्त
लाइये ?
ऊठत
बैठत सोवत
जागत, सदा सदा
हरि ध्याइये।
हे भाई ! एक परमात्मा के अतिरिक्त अन्य किसी से क्यों चित्त लगाता है ? उठते-बैठते, सोते-जागते तुझे सदैव उसी का ध्यान करना चाहिए।
यह शरीर सुन्दर नहीं है। यदि ऐसा होता तो प्राण निकल जाने के बाद भी यह सुन्दर लगता। हाड़-मांस, मल-मूत्र से भरे इस शरीर को अंत में वहाँ छोड़कर आयेंगे जहाँ कौए बीट छोड़ते हैं।
मन के समक्ष बार-बार उपर्युक्त विचार रखने चाहिए। शरीर को असत्, मल-मूत्र का भण्डार तथा दुःखरूप जानकर देहाभिमान का त्याग करके सदैव आत्मनिश्चय करना चाहिए। यह शरीर एक मकान से सदृश है, जो कुछ समय के लिए मिला है। जिसमें ममता रखकर आप उसे अपना मकान समझ बैठे हैं, वह आपका नहीं है। शरीर तो पंचतत्वों का बना हुआ है। आप तो स्वयं को शरीर मान बैठे हो, परंतु जब सत्य का पता लगेगा तब कहोगे कि 'हाय ! मैं कितनी बड़ी भूल कर बैठा था कि शरीर को 'मैं' मानने लगा था।' जब आप ज्ञान में जागोगे तब समझ में आयेगा कि मैं पंचतत्वों का बना यह घर नही हूँ, मैं तो इससे भिन्न सत्-चित्-आनन्दस्वरूप हूँ। यह ज्ञान ही जिज्ञासु के लिए उत्तम खुराक है।
संसार में कोई भी किसी का वैरी नहीं है। मन ही मनुष्य का वैरी और मित्र है। मन को जीतोगे तो वह तुम्हारा मित्र बनेगा। मन वश में हुआ तो इन्द्रियाँ भी वश में होंगी।
श्रीगौड़पादाचार्यजी ने कहा हैः 'समस्त योगी पुरूषों के भवबंधन का नाश, मन की वासनाओं का नाश करने से ही होता है। इस प्रकार दुःख की निवृत्ति तथा ज्ञान और अक्षय शांति की प्राप्ति भी मन को वश करने में ही है।'
मन को वश करने के कई उपाय हैं। जैसे, भगवन्नाम का जप, सत्पुरूषों का सत्संग, प्राणायाम आदि।
इनमें अच्छा उपाय है भगवन्नाम जपना। भगवान को अपने हृदय में विराजमान किया जाय तथा गर्भ का दुःख, जन्म का दुःख, बीमारियों का दुःख, मृत्यु का दुःख एवं चौरासी लाख योनियों का दुःख, मन को याद दिलाया जाय। मन से ऐसा भी कहा जाय कि 'आत्मा के कारण तू अजर, अमर है।' ऐसे दैनिक अभ्यास से मन अपनी बदमाशियाँ छोड़कर तुम्हारा हितैषी बनेगा। जब मन भगवन्नाम का उच्चारण 200 बार माला फेरकर करने के बजाय 100 माला फेरकर बीच में ही जप छोड़ दे तो समझो कि अब मन चंचल हुआ है और यदि 200 बार माला फेरे तो समझो कि अब मन स्थिर हुआ है।
जो सच्चा जिज्ञासु है, वह मोक्ष को अवश्य प्राप्त करता है। लगातार अभ्यास चिंतन तथा ध्यान करने से साधक आत्मनिश्चय में टिक जाता है। अतः लगातार अभ्यास, चिंतन, ध्यान करते रहना चाहिए, फिर निश्चय ही सब दुःखों से मुक्ति और परमानंद की प्राप्ति हो जायेगी। मोक्ष प्राप्त हो जायेगा।
अपनी शक्ल को देखने के लिए तीन वस्तुओं की आवश्यकता होती है – एक निर्मल दर्पण, दूसरी आँख और तीसरा प्रकाश। इसी प्रकार शम, दम, तितिक्षा, ध्यान तथा सदगुरू के अद्वैत ज्ञान के उपदेश द्वारा अपने आत्मस्वरूप का दर्शन हो जाता है।
शरीर को मैं कहकर बड़े-बड़े महाराजे भी भिखारियों की नाँई संसार से चले गये, परंतु जिसने अपने आत्मा के मैं को धारण कर लिया वह सारे ब्रह्माण्डों का सम्राट बन गया। उसने अक्षय राज्य, निष्कंटक राज्य पा लिया।
हम परमानंदस्वरूप परब्रह्म हैं। सबमें हमारा ही रूप है। जो आनंद संसार में भासता है, वह वास्तव में आत्मा के आनंद की ही एक झलकमात्र होती है। तुम्हारे भीतर का आनंद ही अज्ञान से बाहर के विषयों में प्रतीत होता है।
हम आनंदरूप पहले भी थे, अभी भी हैं और बाद में भी रहेंगे। यह जगत न पहले था, न बाद में रहेगा, किंतु बीच में जो दिखता है वह भी अज्ञानमात्र है। आरम्भ में केवल आनंदतत्व था, वैसे ही अभी भी ब्रह्म का ही अस्तित्व है।
जैसे सोना जब खान के अन्दर था तब भी सोना था, अब उसमें से आभूषण बने तो भी वह सोना ही है और जब आभूषण नष्ट हो जायेंगे तब भी वह सोना ही रहेगा, वैसे ही केवल आनंदस्वरूप परब्रह्म ही सत्य है।
चाहे शरीर रहे अथवा न रहे, जगत रहे अथवा न रहे, परंतु आत्मतत्त्व तो सदा एक-का-एक, ज्यों का त्यों है।
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जिस प्रकार पानी में दिखने वाला सूर्य का प्रतिबिम्ब वास्तविक सूर्य नहीं है अपितु सूर्य का आभासमात्र है, उसी प्रकार विषय-भोगों में जो आनंद दिखता है वह आभास मात्र ही है, सच्चा आनंद नहीं है। वह ईश्वरीय आनंद का ही आभासमात्र है। एक परब्रह्म परमेश्वर ही सत्, चित् तथा आनंदस्वरूप है। वही एक तत्त्व किसी में सत् रूप में भास रहा है, किसी में चेतनरूप में तो किसी में आनंदरूप में। किंतु जिसका हृदय शुद्ध है उसे ईश्वर एक ही अभेदरूप में प्रतीत होता है। वह सत् भी स्वयं है, चेतन भी स्वयं है और आनंद भी स्वयं है।
स्वामी रामतीर्थ से एक व्यक्ति ने प्रार्थना कीः "स्वामी जी ! मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मैं दुनिया का राजा बन जाऊँ।"
स्वामी रामतीर्थः "दुनिया का राजा बनकर क्या करोगे ?"
"व्यक्तिः "मुझे आनंद मिलेगा, प्रसन्नता होगी।"
स्वामी रामतीर्थ बोलेः "समझो, तुम राजा हो गये परंतु राजा होने के बाद भी कई दुःख आयेंगे क्योंकि तुम ऐसे पदार्थों से सुखी होना चाहते हो जो नश्वर हैं। वे सदा किसी के पास नहीं रहते तो तुम्हारे पास कहाँ से रहेंगे ? इससे बढ़िया, यदि तुम नश्वर पदार्थों से सुखी होने की इच्छा ही छोड़ दो तो इसी क्षण परम सुखी हो जाओगे। तुम्हें अपने भीतर आनंद के अतिरिक्त दूसरी कोई वस्तु मिलेगी ही नहीं। जिस आनंद की प्राप्ति के लिए तुम राज्य माँग रहे हो, उससे अधिक आनंद तो वस्तुओं अथवा परिस्थितियों की इच्छा निवृत्ति में है।"
हम भोगों को नहीं भोगते बल्कि भोग ही हमें भोग डालते हैं। क्षणिक सुख के लिए हम बल, बुद्धि, आयु और स्वास्थ्य को नष्ट कर देते हैं। वह क्षणिक सुख भी भोग का फल नहीं होता बल्कि हमारे मन की स्थिरता तथा भोग को पाने की इच्छा के शांत होने का परिणाम होता है। वह आनंद हमारे आत्मा का होता है, भोग भोगने का नहीं।
इच्छा की निवृत्ति से मन शांत होता है और आनंद मिलता है। अतः इच्छाओं और वासनाओं का त्याग करो तो मन शांत होगा तथा अक्षय आनंद की प्राप्ति होगी। इच्छाओं को त्यागने में ही सच्ची शांति है।
संतोषी व्यक्ति ही सुखी रह सकता है। भले ही कोई व्यक्ति करोड़पति क्यों न हो किंतु यदि उसे संतोष नहीं हो तो वह कंगाल है। संतोषी व्यक्ति ही सबसे अधिक धनवान है। उसी को शांति प्राप्त होती है, जिसे प्राप्त वस्तु अथवा परिस्थिति में संतोष होता है।
इच्छा-वासनाओं का त्याग और प्राप्त वस्तुओं में संतुष्टि का अवलंबन मनुष्य को महान बना देता है। अतः वासनाओं का त्याग करके प्राप्त वस्तुओं में संतुष्ट रहो तथा अपने मन को परमात्मा में लगाओ तो आप सुख और आनंद को बाँटने वाले बन सकते हो।
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भोगे रोग भयं। भोगों में रोगों का डर रहता ही है। भोग भोगने का परिणाम रोग ही होता है। भोग बुरी बला है। भोग भोगने के पश्चात् चित्त कदापि तृप्त नहीं होता, सदैव व्याकुल रहता है। भोगों का सुख अनित्य होता है। दिल चाहता है कि बार-बार भोग भोगूँ। अतः मन में शांति नहीं रहती। जैसे घी को अग्नि में डालते समय पहले तो अग्नि बुझने लगती है, परंतु बाद में भड़क उठती है, वैसे ही भोग भी हैं। भोगते समय थोड़ी प्रसन्नता एवं तृप्ति होती है, परंतु बाद में भोग-वासना भड़ककर मनुष्य को जलाती, मनुष्य को सदैव अपना गुलाम बनाकर रखना चाहती है। 'गुरूग्रन्थ साहिब' के राग आसा, वाणी श्री रविदास शब्द में आता हैः
म्रिग
मीन भ्रिंग
पतंग कुंचर,
एक दोख बिनास।
पंच
दोख असाध जा
महि, ता कि
केतक आस।।
श्री रविदासजी फरमाते हैं कि 'हिरन केवल शब्दों पर रीझकर शिकारी के वश में हो जाता है, मछली खाने के लोभ में धीवर के जाल में फँसती है, भ्रमर फूल की सुगंध पर आसक्त होकर अपनी जान गँवा देता है, पतंग दीपक की ज्योति पर मस्त होकर अपने को जलाकर समाप्त कर देता है, हाथी काम के वश होकर गड्ढे में गिरता है। अर्थात् मनुष्येतर प्राणी एक-एक विषय के वश में होकर स्वयं को नष्ट कर देता है, जबकि मनुष्य तो पाँचों विषयों में फँसा हुआ है। अतः उसके बचने की कौन सी आशा होगी ? अवश्य ही वह नष्ट होगा।
भोग को सदैव रोग समझो। विषय-विकारों में डूबकर सुख-शांति की अभिलाषा कर रहे हो। शोक तुम्हारे ऐसे जीने पर !
स्मरण रखो कि तुम्हें धर्मराज के समक्ष आँखें नीची करनी पड़ेंगी। कबीर साहब ने फरमाया हैः
धर्मराय
जब लेखा
माँगे, क्या
मुख ले के
जायेगा ?
कहत
कबीर सुनो रे
साधो, साध
संगत तर
जायेगा।।
भूलो नहीं कि वहाँ कर्म का प्रत्येक अंश प्रकट होगा, प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्मों के लिए उत्तरदायी रहेगा। तुम्हें वहाँ अपना सिर नीचा करना पड़ेगा। अतः सोचो, अभी भी समय गया नहीं है। सामी साहब कहते हैं कि 'जो समय बीत गया सो बीत गया, शेष समय तो अच्छा आचरण करो। अपने अंतःकरण में अपने प्रियतम को देखो।' मनुष्य-देह वापस नहीं मिलेगी।
अतः आज अपने मन में दृढ़ निश्चय कर लो कि मैं सत्पुरूषों के संग से, सत्शास्त्रों के अध्ययन से, विवेक एवं वैराग्य का आश्रय लेकर किसी श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ महापुरूष की शरण में जाकर तथा अपने कर्त्तव्यों का पालन करके इस मनुष्य-योनि में ही मोक्ष प्राप्त करूँगा, इस अमूल्य मनुष्य जन्म को विषय भोगों में बरबाद नहीं करूँगा, इस मानव जीवन को सार्थक बनाऊँगा तथा आत्मज्ञान (मोक्ष) प्राप्त कर जन्म-मरण के चक्र से निकल जाऊँगा, जीवन को सफल बनाऊँगा।
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इन्द्रियाँ मन को अपने-अपने विषय की ओर खींचती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय का प्रवाह वायु के प्रवाह से भी कई गुना अधिक तेज होता है। इन विषयों के प्रवृत्तिरूपी प्रवाह से मन एक क्षण में एक ओर आकर्षित होता है तो दूसरे क्षण दूसरी ओर। इन्द्रियों के विभिन्न विषयों में इस प्रकार खिंचा हुआ मन कभी एक जगह स्थिर नहीं रह सकता, सदैव चंचल बना रहता है। यह मन की पराधीनता है। पराधीन होना ही सब दुःखों का कारण है। जो इन्द्रियों के वश में होकर विषयों के पीछे पड़ा हुआ है, वह पराधीन ही है। पराधीनता का अर्थ है दूसरे के वश में होना अथवा गुलाम होना।
तृष्णा
जहाँ होवे
वहाँ ही, जान
ले संसार है।
होवे
नहीं तृष्णा
जहाँ, संसार
का सो पार
है।।
वैराग्य
पक्का धार कर,
मत भूल
विषयासक्त
हो।
तृष्णा
न कर हो जा
सुखी, मत भोग
में आसक्त
हो।।
जो व्यक्ति ज्ञानरहित होता है और जो अपने मन को योग के द्वारा शांत नहीं करता, उसकी इन्द्रियाँ उसके वश में नहीं रहतीं। उस व्यक्ति की दशा बलवान घोड़ोंवाले रथ पर बैठे नये-नये रथवान जैसी भयानक होती है, किंतु जिसने अपने मन को वश में किया है उसे परम सुख प्राप्त होता है। वह उस पद को प्राप्त कर लेता है जहाँ से पुनः गिरना नहीं पड़ता। वह जन्म-मृत्यु के पार हो जाता है। जिसके इन्द्रियरूप घोड़ों की मनरूपी लगाम अपने वश में है, वही रास्ता पार कर सकता है, परम पद को प्राप्त कर सकता है परंतु मनमुख अर्थात् पराधीन मनुष्यों को सर्वदा दुःखी ही रहना पड़ता है।
पराधीन
सपनेहूँ सुख
नाहीं।
अतः प्रत्येक मनुष्य को उचित है कि वह अपने मन को सदैव वश में रखे। जिसकी इन्द्रियाँ विषयों से हर प्रकार से निवृत्त रहती हैं, उसकी बुद्धि स्थिर, शांत और गंभीर रहती है। उसे ही सब सुख प्राप्त होते हैं। इन्द्रियों को स्वच्छन्द कर देने से अपनी शक्ति क्षीण हो जाती है और इसी निर्बलता के कारण मनुष्य को दुःख भोगना पड़ता है। जो व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को संयम में रखता है अर्थात् इन्द्रियों को स्वच्छंद न कर अपने वश में रखता है और उन्हें विषयों के जंगल में नहीं भटकने देता, उसकी शक्ति उसके भीतर ही सुरक्षित रहती है। अपनी इसी शक्ति के बल से वह परम सुख को प्राप्त कर लेता है। अपनी भीतर शक्ति की अधिकता ही सुख है।
यदि सुख भोगना चाहते हो तो मन, बुद्धि और इन्द्रियों को अपने दास बनाओ। उनके अधीन होकर अपना अमूल्य जीवन नष्ट मत करो।
धिक्कार
है उस अर्थ को,
धिक्कार है उस
कर्म को।
धिक्कार
है उस काम को,
धिक्कार है उस
धर्म को।।
जिससे
न होवे शांति, उस
व्यापार में
क्यों सक्त
हो।
पुरूषार्थ
अंतिम सिद्ध
कर, मत भोग में
आसक्त हो।।
इसलिए जो व्यक्ति सुख का इच्छुक है, उसे अपने मन को विषयों से हटाकर अपने वश में रखने का उद्यम करना चाहिए।
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यह समस्त दुनिया तो एक मुसाफिरखाना(सराय) है। दुनियारूपी सराय में रहते हुए भी उससे निर्लेप रहा करो। जैसे कमल का फूल पानी में रहता है परंतु पानी की एक बूँद भी उस पर नहीं ठहरती, उसी प्रकार संसार में रहो।
तुलसीदासजी कहते हैं-
तुलसी
इस संसार में
भांति भांति
के लोग।
हिलिये
मिलिये प्रेम
सों नदी नाव
संयोग।।
जैसे नौका में कई लोग चढ़ते, बैठते और उतरते हैं परंतु कोई भी उसमें ममता या आसक्ति नहीं रखता, उसे अपना रहने का स्थान नहीं समझता, ऐसे ही हम भी संसार में सबसे हिल-मिलकर रहे परंतु संसार में आसक्त न बनें। जैसे, मुसाफिरखाने में कई चीजें रखी रहती हैं किंतु मुसाफिर उनसे केवल अपना काम निकाल सकता है, उन्हें अपना मानकर ले नहीं जा सकता। वैसे ही संसार के पदार्थों का शास्त्रानुसार उपयोग तो करो किंतु उनमें मोह-ममता न रखो। वे पदार्थ काम निकालने के लिए हैं, उनमें आसक्ति रखकर अपना जीवन बरबाद करने के लिए नहीं हैं।
सपने
के संसार पर,
क्यों मोहित
किया मन
मस्ताना है ?
घर
मकान महल न
अपने, तन मन धन
बेगाना है,
चार
दिनों का चैत
चमन में,
बुलबुल के लिए
बहाना है,
आयी
खिजाँ हुई
पतझड़, था
जहाँ जंगल,
वहाँ वीराना
है,
जाग
मुसाफिर कर
तैयारी, होना
आखिर रवाना
है,
दुनिया
जिसे कहते
हैं, वह तो
स्वयं
मुसाफिरखाना
है।
अपना असली वतन आत्मा है। उसे अच्छी तरह से जाने बिन शांति नहीं मिलेगी और न ही यह पता लगेगा कि 'मैं कौन हूँ'। जिन्होंने स्वयं को पहचाना है, उन्होंने ईश्वर को जाना है।
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जब तक मन नहीं मरा, तब तक वेदान्त का ज्ञान अच्छा नहीं लगता। विद्यारण्य स्वामी अपनी पुस्तक 'जीवन्मुक्त विवेक' में कहते हैं कि 'सहस्र अंकुरों, टहनियों और पत्तोंवाले संसाररूपी वृक्ष की जड़ मन ही है। यह आवश्यक है कि संकल्प को दबाने के लिए मन का रक्त बलपूर्वक सुखा देना चाहिए, उसका नाश कर देना चाहिए। ऐसा करने से यह संसाररूपी वृक्ष सूख जायेगा।'
वसिष्ठजी कहते हैं- 'मन का स्वच्छंद होना ही पतन का कारण है एवं उसका निग्रह होना ही उन्नति का कारण है। अतः अनेक प्रकार की अशांति के फलदाता संसाररूपी वृक्ष को जड़ से उखाड़ने का तथा अपने मन को वश करने का उपाय केवल मनोनिग्रह ही है।
हृदयरूपी वन में फन उठाकर बैठा साँप मन है। इसमें संकल्प-विकल्परूपी घातक विष भरे होते हैं। ऐसा मनरूपी साँप जिसने मारा है, उस पूर्णिमा के पूर्ण चन्द्रमा की तरह पूर्ण हुए निर्विकार पुरूष को मैं नमस्कार करता हूँ।
ज्ञानी का मन नाश को प्राप्त होता है परंतु अज्ञानी का मन उसे बाँधने वाली एक जंजीर है। जब तक परम तत्त्व के दृढ़ अभ्यास से अपने मन को जीता नहीं जाता, तब तक वह आधी रात में नृत्य करने वाले प्रेत, पिशाच आदि की तरह नाचता रहता है।
वर्तमान परिवर्तनशील जीवन में मनुष्य को सत्ता एवं प्रभुता से प्रीति हो गयी है। इसका मूल कारण है, अपने में अपूर्णता का अनुभव करना। 'मैं शरीर हूँ' यह भावना मिट जाने से देह की आसक्ति हट जाती है। देह में आसक्ति हट जाने से देह तथा उससे सम्बन्धित पदार्थों और सम्बन्धों में किंचित् भी ममता नहीं रहती।
जिसके चित्त से अभिमान नष्ट हो गया, जो संसार की वस्तुओं में मैं-मेरा का भाव नहीं रखता उसके मन में वासनाएँ कैसे ठहर सकती हैं ? उसकी भोग-वासनाएँ शरद ऋतु के कमल के फूल की तरह नष्ट हो जाती हैं। जिसकी वासनाएँ नष्ट हो गयीं वह मुक्त ही तो है।
जो हाथ से दबाकर, दाँतों से दाँतों को भींचकर, कमर कसकर अपने मन-इन्द्रियों को वश में कर लेते हैं, वे ही इस संसार में बुद्धिमान एवं भाग्यवान है। उनकी ही गिनती देवपुरूषों में होती है।
इस संसाररूपी वन का बीज चित्त है। जिसने इस बीज को नष्ट कर लिया, उसे फिर कोई भी भय-बाधा नहीं रहती। जैसे, केसरी सिंह जंगल के विभिन्न प्रकार के खूँखार प्राणियों के बीच भी निर्भय होकर विचरता है, उसी प्रकार वह पुरूष भी संसार की विघ्न-बाधाओं, दुःख-सुख तथा मान-अपमान के बीच भी निर्भय एवं निर्द्वन्द्व होकर आनंदपूर्वक विचरण करता है।
सभी लोग सदा सुखी, आनंदित एवं शांतिपूर्ण जीवन जीना चाहते हैं परंतु अपने मन को वश में नहीं करते। मन को वश करने से ये सभी वस्तुएँ सहज में ही प्राप्त हो जाती हैं परंतु लोग मन को वश न करके मन के वश हो जाते हैं। जो मन में आया वही खाया, मन में आया वही किया। संत एवं शास्त्र सच्चा मार्ग बताते हैं परंतु उनके वचनों आदर-आचरण नहीं करते और मन के गुलाम हो जाते है। परंतु जो संत एवं शास्त्र के ज्ञान को पूरी तरह से पचा लेता है वह मुक्त हो जाता है। वह सिर्फ मन का ही नहीं अपितु त्रिलोकी का स्वामी हो जाता है।
अतः महापुरूषों द्वारा बतायी हुई युक्तियों से मन को वश में करो। 'जिसने मन जीता, उसने जग जीता'। क्योंकि जगत का मूल मन ही है। जब मन अमनीभाव को प्राप्त होगा तब तुम्हारा जीवन सुखमय, आनंदमय, परोपकारमय हो जायगा।
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परमात्मा और परमात्मप्राप्त महापुरूषों के प्रति सदैव प्रेम रखना चाहिए, यही कल्याण का मार्ग है। परंतु प्यारे ! यह प्रेम जितना भीतर से रखा जायगा, उतना ही अधिक लाभ होगा। आत्मदर्शी महापुरूष को भूलकर भी शरीर की भावना से नहीं देखना चाहिए, अपितु उन्हें पूर्ण सच्चिदानंदस्वरूप समझना चाहिए।
तत्त्वदृष्टि से देखें तो वे महापुरूष और हम एक ही हैं, जरा भी भेद नहीं है परंतु वे स्वयं को परमात्मा से अभिन्न जानते हैं, जबकि हम स्वयं को ईश्वर से अलग(शरीर) मानते हैं और यही हमारे दुःख का कारण है।
हमारे सामने यह उद्देश्य होना चाहिए की हम स्वयं को पहचान लें, विकारों-वासनाओं की दलदल से ऊपर उठकर परमेश्वरीय सुख पायें, जन्म-मरण आदि दुःखों से सदा के लिए छुटकारा पाकर मुक्त हो जायें तथा जीवन्मुक्ति का आनंद लें। जीवात्मा और परमात्मा दो भिन्न वस्तुएँ नहीं हैं। जैसे, एक बोरे में गेहूँ पड़ा है तथा उसी के पास एक अन्य डिब्बे में गेहूँ पड़ा है। यदि डिब्बे और बोरे का विचार छोड़ दो तो शेष गेहूँ ही बचेगा।
एक व्यक्ति भालू का अभिनय कर रहा था। उसे अधिक भाँग पिला दी गयी, जिससे उसे कोई होश नहीं रहा। वह स्वयं को सचमुच का भालू समझकर लोगों को काटने की चेष्टा करने लगा। जब उसे खटाई खिलाई गयी और उसे होश आया, तब वह अपने द्वारा की गई मूर्खता पर हँसने लगा। इसी प्रकार हमें भी अज्ञानरूपी नशा चढ़ा हुआ है। हम स्वयं को देह समझ बैठे हैं। अतः हमें ऐसे ब्रह्मज्ञानी गुरू की आवश्यकता है, जो अपनी ज्ञानरूपी खटाई खिलाकर हमारे अज्ञानरूपी नशे को उतार दें और हमें अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान हो जाय।
शरीर की आसक्ति ही जीव को दुःख देती है। अर्जुन बड़े मोह में पड़ गया था। जब श्रीकृष्ण ने गीता का ज्ञान दिया, तब उसे समझ में आया कि जैसे स्वप्न की सृष्टि है वैसे ही यह भी मुझ साक्षी, द्रष्टा के सपने की सृष्टि है, बाजी है।
बाजीगर
जैसे बाजी
पाये, लोग
तमाशे आये।
बार-बार आत्मचिंतन करने से आत्मा में हमारी स्थिति हो सकती है। जो (अपने को) शिष्य कहलाता है वह यदि शिष्य बनकर ही रहा, गुरून बना तो शिष्य बनकर क्या किया ? अर्थात् यदि वह पूर्ण ज्ञानी नहीं बना और सदैव अज्ञान के अंधकार में ही रहा अर्थात् अपने को हाड़-मांस एवं मल मूत्र से भरी हुई देह ही समझता रहा तो फिर उसे शिष्य बनने का पूर्ण लाभ नहीं मिला।
ज्ञानी गुरू की शरण में रहते हुए उनकी ज्ञानरूपी खटाई को पचाकर अपने अज्ञान के नशे को उतारना, यही मनुष्य-देह की सबसे श्रेष्ठ उपलब्धि है। यही परम कल्याण है। यही परम शांति, परमानंद एवं परम पद की प्राप्ति है।