
गीता प्रसाद
गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य
विश्व में तत्त्व को जानने वाले विरले ही होते हैं।
परमात्मा हमारे साथ होते हुए भी दुःखी क्यों?
स्वयं को गुणातीत जानकर मुक्त बनो
तत्त्ववेत्ता की प्राप्ति दुर्लभ है
कामनापूर्ति हेतु भी भगवान की शरण ही जाओ
खण्ड से नहीं, अखण्ड से प्रीति करें.....
अव्यक्त तत्त्व का अनुसंधान करो
परमात्म-प्राप्ति में बाधकः इच्छा और द्वेष
प्रयाणकाल में भी ज्ञान हो जाय तो मुक्ति
नन्द के लाल ! कुर्बान तेरी सूरत पर
श्री
वेदव्यास ने
महाभारत में
गीता का वर्णन
करने के
उपरान्त कहा
हैः
गीता
सुगीता
कर्तव्या
किमन्यैः
शास्त्रविस्तरैः।
या
स्वयं
पद्मनाभस्य
मुखपद्माद्विनिः
सुता।।
'गीता
सुगीता करने
योग्य है
अर्थात् श्री
गीता को भली
प्रकार पढ़कर
अर्थ और भाव
सहित अंतःकरण
में धारण कर
लेना मुख्य
कर्तव्य है,
जो कि स्वयं
श्री पद्मनाभ
विष्णु भगवान
के मुखारविन्द
से निकली हुई
है, फिर अन्य
शास्त्रों के
विस्तार से
क्या प्रयोजन
है?'
गीता
सर्वशास्त्रमयी
है। गीता में
सारे शास्त्रों
का सार भार
हुआ है। इसे
सारे
शास्त्रों का
खजाना कहें तो
भी अत्युक्ति
न होगी। गीता
का भलीभाँति ज्ञान
हो जाने पर सब
शास्त्रों का
तात्त्विक ज्ञान
अपने आप हो
सकता है। उसके
लिए अलग से परिश्रम
करने की
आवश्यकता
नहीं रहती।
वराहपुराण
में गीता का
महिमा का बयान
करते-करते भगवान
ने स्वयं कहा
हैः
गीताश्रयेऽहं
तिष्ठामि
गीता मे
चोत्तमं गृहम्।
गीताज्ञानमुपाश्रित्य
त्रींल्लोकान्पालयाम्यहम्।।
'मैं गीता के आश्रय में रहता हूँ। गीता मेरा श्रेष्ठ घर है। गीता के ज्ञान का सहारा लेकर ही मैं तीनों लोकों का पालन करता हूँ।'
श्रीमद्
भगवदगीता
केवल किसी
विशेष धर्म या
जाति या
व्यक्ति के
लिए ही नहीं,
वरन्
मानवमात्र के
लिए उपयोगी व
हितकारी है।
चाहे किसी भी
देश, वेश,
समुदाय, संप्रदाय,
जाति, वर्ण व
आश्रम का
व्यक्ति
क्यों न हो,
यदि वह इसका
थोड़ा-सा भी
नियमित
पठन-पाठन करें
तो उसे अनेक अनेक
आश्चर्यजनक
लाभ मिलने
लगते हैं।
गीता का
परम लक्ष्य है
मानवमात्र का
कल्याण करना।
किसी भी
स्थिति में
इन्सान को
चाहिए कि वह
ईश्वर-प्राप्ति
से वंचित न रह
जाए क्योंकि ईश्वर
की प्राप्ति
ही मनुष्य
जीवन का परम
उद्देश्य है
लेकिन भ्रमवश
मनुष्य भौतिक
सुख-सुविधाओं
के वशीभूत होकर
नाना प्रकार
से अपनी
इन्द्रियों
को तृप्त करने
के प्रयासों
में उलझ जाता
है और सिवाय दुःखों
के उसे अन्य
कुछ नहीं
मिलता। भगवद्
गीता इसी
भ्रम-भेद को
मिटाकर एक
अत्यधिक सरल,
सहज व
सर्वोच्च
दिव्य
ज्ञानयुक्त
पथ का प्रदर्शन
करती है। गीता
के अमृतवचनों
का आचमन करने
से मनुष्य को
भोग व मोक्ष
दोनों की ही
प्राप्ति
होती है।
कनाडा के
प्राइम
मिनिस्टर मि.
पीअर ट्रुडो
ने जब गीता
पढ़ी तो वे
दंग रहे गये।
मि. पीअर. ट्रुडो
ने कहाः
"मैंने बाइबिल पढ़ी, एंजिल पढ़ा, और भी कई धर्मग्रन्थ पढ़े। सब ग्रन्थ अपनी-अपनी जगह पर ठीक हैं लेकिन हिन्दुओं का यह श्रीमद् भगवद गीता रूपी ग्रन्थ तो अदभुत है ! इसमें किसी भी मत-मजहब, पंथ, संप्रदाय की निंदा स्तुति नहीं है बल्कि इसमें तो मनुष्यमात्र के विकास की बात है। शरीर स्वस्थ, मन प्रसन्न और बुद्धि में समत्व योग का, ब्रह्मज्ञान का प्रकाश जगानेवाला ग्रन्थ भगवद् गीता है... गीता केवल हिन्दुओं का ही धर्मग्रन्थ नहीं है, मानवमात्र का धर्मग्रन्थ है। Geeta is not the Bible of Hindus, but it is the Bible of humanity."
गीता में
ऐसा उत्तम और
सर्वव्यापी
ज्ञान है कि
उसके रचयिता
को हजारों
वर्ष बीत गये
हैं किन्तु उसके
बाद दूसरा ऐसा
एक भी ग्रन्थ
आज तक नहीं लिखा
गया है। 18
अध्याय एवं 700
श्लोकों में
रचित तथा भक्ति,
ज्ञान, योग
एवं
निष्कामता
आदि से भरपूर
यह गीता
ग्रन्थ विश्व
में एकमात्र
ऐसा ग्रन्थ है
जिसकी जयंती
मनायी जाती
है।
गीता
मानव में से
महेश्वर का
निर्माण करने
की शक्ति रखती
है। गीता
मृत्यु के
पश्चात नहीं,
वरन् जीते-जी
मुक्ति का
अनुभव कराने
का सामर्थ्य
रखती है। जहाँ
हाथी चिंघाड़
रहे हों, घोड़े
हिनहिना रहे
हों,
रणभेरियाँ भज
रही हों, अनेकों
योद्धा दूसरे
पक्ष के लिए
प्रतिशोध की
आग में जल रहे
हों ऐसी जगह
पर भगवान श्रीकृष्ण
ने गीता की
शीतल धारा
बहायी है।
भगवान श्रीकृष्ण
ने गीता के
माध्यम से
अरण्य की विद्या
को रण के
मैदान में ला
दिया। शांत
गिरि-गुफाओं
के ध्यानयोग
को युद्ध के
कोलाहल भरे
वातावरण में
भी समझा दिया।
उनकी कितनी
करूणा है ! गीता
भगवान
श्रीकृष्ण के
श्रीमुख से
निकला हुआ वह
परम अमृत है
जिसको पाने के
लिए देवता भी
लालायित रहते
हैं।
.....और गीता
की जरूरत केवल
अर्जुन को हो
थी ऐसी बात
नहीं है। हम
सब भी युद्ध
के मैदान में
ही हैं।
अर्जुन ने तो
थोड़े ही दिन
युद्ध किया
किन्तु हमारा
त सारा जीवन
काम, क्रोध,
लोभ, मोह, भय,
शोक,
मेरा-तेरारूपी
युद्ध के बीच
ही है। अतः
अर्जुन को
गीता की जितनी
जरूरत थी,
शायद उससे भी
ज्यादा आज के
मानव को उसकी
जरूरत है।
श्रीमद्
भगवद् गीता के
ज्ञानामृत के
पान से मनुष्य
के जीवन में
साहस, सरलता,
स्नेह, शांति
और धर्म आदि
दैवी गुण सहज
में ही विकसित
हो उठते हैं।
अधर्म, अन्याय
एवं शोषण
मुकाबला करने
का सामर्थ्य आ
जाता है। भोग
एवं मोक्ष दोनों
ही प्रदान
करने वाला,
निर्भयता आदि
दैवी गुणों को
विकसित
करनेवाला यह
गीता ग्रन्थ
पूरे विश्व
में अद्वितिय
है।
हमें
अत्यन्त
प्रसन्नता है
कि पूज्यपाद
संत श्री
आसाराम जी
महाराज के
पावन
मुखारविन्द
से निःसृत
श्रीमद् भगवद्
गीता के
सातवें
अध्याय की
सरल, सहज एवं
स्पष्ट
व्याख्या को 'गीता
प्रसाद' के रूप
में आपके
समक्ष
प्रस्तुत कर
रहे हैं....
श्री
योग वेदान्त
सेवा समिति,
अमदावाद
आश्रम।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
गीता के सातवें अध्याय का माहात्म्य
भगवान शिव
कहते हैं – पार्वती ! अब
मैं सातवें
अध्याय का
माहात्म्य
बतलाता हूँ,
जिसे सुनकर
कानों में
अमृत-राशि भर
जाती है।
पाटलिपुत्र
नामक एक
दुर्गम नगर
है, जिसका गोपुर
(द्वार) बहुत
ही ऊँचा है।
उस नगर में
शंकुकर्ण
नामक एक ब्राह्मण
रहता था, उसने
वैश्य-वृत्ति
का आश्रय लेकर
बहुत धन
कमाया, किंतु
न तो कभी
पितरों का तर्पण
किया और न
देवताओं का
पूजन ही। वह
धनोपार्जन
में तत्पर
होकर राजाओं
को ही भोज
दिया करता था।
एक समय की
बात है। एक
समय की बात
है। उस ब्राह्मण
ने अपना चौथा
विवाह करने के
लिए पुत्रों
और बन्धुओं के
साथ यात्रा
की। मार्ग में
आधी रात के
समय जब वह सो
रहा था, तब एक सर्प
ने कहीं से
आकर उसकी बाँह
में काट लिया।
उसके काटते ही
ऐसी अवस्था हो
गई कि मणि,
मंत्र और औषधि
आदि से भी
उसके शरीर की
रक्षा असाध्य जान
पड़ी।
तत्पश्चात
कुछ ही क्षणों
में उसके
प्राण पखेरु
उड़ गये और वह
प्रेत बना।
फिर बहुत समय
के बाद वह
प्रेत
सर्पयोनि में
उत्पन्न हुआ।
उसका वित्त धन
की वासना में बँधा
था। उसने
पूर्व
वृत्तान्त को
स्मरण करके
सोचाः
'मैंने घर के बाहर करोड़ों की संख्या में अपना जो धन गाड़ रखा है उससे इन पुत्रों को वंचित करके स्वयं ही उसकी रक्षा करूँगा।'
साँप की
योनि से
पीड़ित होकर
पिता ने एक
दिन स्वप्न
में अपने
पुत्रों के
समक्ष आकर
अपना मनोभाव
बताया। तब
उसके पुत्रों
ने सवेरे उठकर
बड़े विस्मय
के साथ
एक-दूसरे से
स्वप्न की
बातें कही।
उनमें से
मंझला पुत्र
कुदाल हाथ में
लिए घर से
निकला और जहाँ
उसके पिता सर्पयोनि
धारण करके
रहते थे, उस
स्थान पर गया।
यद्यपि उसे धन
के स्थान का
ठीक-ठीक पता
नहीं था तो भी
उसने चिह्नों
से उसका ठीक
निश्चय कर लिया
और लोभबुद्धि
से वहाँ
पहुँचकर
बाँबी को खोदना
आरम्भ किया।
तब उस बाँबी
से बड़ा भयानक
साँप प्रकट
हुआ और बोलाः
'ओ मूढ़ ! तू कौन है? किसलिए आया है? यह बिल क्यों खोद रहा है? किसने तुझे भेजा है? ये सारी बातें मेरे सामने बता।'
पुत्रः "मैं
आपका पुत्र
हूँ। मेरा नाम
शिव है। मैं
रात्रि में
देखे हुए
स्वप्न से
विस्मित होकर
यहाँ का
सुवर्ण लेने
के कौतूहल से
आया हूँ।"
पुत्र की यह वाणी सुनकर वह साँप हँसता हुआ उच्च स्वर से इस प्रकार स्पष्ट वचन बोलाः "यदि तू मेरा पुत्र है तो मुझे शीघ्र ही बन्धन से मुक्त कर। मैं अपने पूर्वजन्म के गाड़े हुए धन के ही लिए सर्पयोनि में उत्पन्न हुआ हूँ।"
पुत्रः "पिता जी! आपकी मुक्ति कैसे होगी? इसका उपाय मुझे बताईये, क्योंकि मैं इस रात में सब लोगों को छोड़कर आपके पास आया हूँ।"
पिताः "बेटा ! गीता के अमृतमय सप्तम अध्याय को छोड़कर मुझे मुक्त करने में तीर्थ, दान, तप और यज्ञ भी सर्वथा समर्थ नहीं हैं। केवल गीता का सातवाँ अध्याय ही प्राणियों के जरा मृत्यु आदि दुःखों को दूर करने वाला है। पुत्र ! मेरे श्राद्ध के दिन गीता के सप्तम अध्याय का पाठ करने वाले ब्राह्मण को श्रद्धापूर्वक भोजन कराओ। इससे निःसन्देह मेरी मुक्ति हो जायेगी। वत्स ! अपनी शक्ति के अनुसार पूर्ण श्रद्धा के साथ निर्व्यसी और वेदविद्या में प्रवीण अन्य ब्राह्मणों को भी भोजन कराना।"
सर्पयोनि
में पड़े हुए
पिता के ये
वचन सुनकर सभी
पुत्रों ने
उसकी
आज्ञानुसार
तथा उससे भी अधिक
किया। तब
शंकुकर्ण ने
अपने
सर्पशरीर को त्यागकर
दिव्य देह
धारण किया और
सारा धन पुत्रों
के अधीन कर
दिया। पिता ने
करोड़ों की
संख्या में जो
धन उनमें बाँट
दिया था, उससे
वे पुत्र बहुत
प्रसन्न हुए।
उनकी बुद्धि
धर्म में लगी
हुई थी, इसलिए
उन्होंने
बावली, कुआँ,
पोखरा, यज्ञ
तथा देवमंदिर के
लिए उस धन का
उपयोग किया और
अन्नशाला भी
बनवायी।
तत्पश्चात
सातवें
अध्याय का सदा
जप करते हुए
उन्होंने
मोक्ष
प्राप्त
किया।
हे पार्वती ! यह तुम्हें सातवें अध्याय का माहात्म्य बतलाया, जिसके श्रवणमात्र से मानव सब पातकों से मुक्त हो जाता है।"
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
नारायण.....
नारायण.....
नारायण....
श्रीमद्
भगवद् गीता के
सातवें
अध्याय के पहले
एवं दूसरे
श्लोक में
भगवान श्री
कृष्ण कहते हैं-
मय्यासक्तमनाः
पार्थ योगं
युंजन्मदाश्रयः।
असंशयं
समग्रं मां
यथा
ज्ञास्यसि
तच्छृणु।।
'हे पार्थ ! मुझमें अनन्य प्रेम से आसक्त हुए मन वाला और अनन्य भाव से मेरे परायण होकर, योग में लगा हुआ मुझको संपूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त सबका आत्मरूप जिस प्रकार संशयरहित जानेगा उसको सुन।'
ज्ञानं
तेऽहं
सविज्ञानमिदं
वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा
नेह
भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यवशिष्यते।।
"मैं तेरे लिए इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञान को संपूर्णता से कहूँगा कि जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहता है।"
मय्यासक्तमनाः
अर्थात्
मुझमें आसक्त
हुए मनवाला।
यहाँ
ध्यान देने
योग्य बात है
कि 'मुझमें' यानि
भगवान के 'मैं' का ठीक
अर्थ समझा
जाये। अगर
भगवान के 'मैं' का सही
अर्थ नहीं
समझा और हममें
आसक्ति है तो
हम भगवान के
किसी रूप को 'भगवान'
समझेंगे। यदि
हममें द्वेष
है तो हम
कहेंगे कि 'भगवान
कितने
अहंकारी हैं?' इस
प्रकार अगर
हमारे चित्त
में राग होगा
तो हम श्री
कृष्ण की
आकृति को
पकड़ेंगे और
अगर द्वेष
होगा तो श्री
कृष्ण को
अहंकारी
समझेंगे।
श्री
कृष्ण कह रहे
हैं 'मुझमें
आसक्त...' जब तक
श्री कृष्ण का
'मैं' समझ में
नहीं आता अथवा
जब तक श्री
कृष्ण के 'मैं' की तरफ
नज़र नहीं है
तब तक श्री
कृष्ण के इशारे
को हम ठीक से
नहीं समझ
सकते। सच पूछो
तो श्री कृष्ण
का 'मैं' वास्तव
में सबका 'मैं' है।
श्रीकृष्ण
ने गीता ने
कही नहीं वरन्
श्री कृष्ण
द्वारा गीता
गूँज गयी। हम
जो कुछ करते
हैं। इस
प्रकार करने
वाले
परिच्छिन्न
को मौजूद रखकर
कुछ कहें।
श्री कृष्ण के
जीवन में
अत्यन्त सहजता
है,
स्वाभाविकता
है। तभी तो वे
कहते सकते
हैं-
'मय्यासक्तमना.....बनो'
'आसक्ति.....
प्रीति....' शब्द तो
छोटे हैं,
बेचारे हैं।
अर्थ हमें लगाना
पड़ता है। जो
हमारी बोलचाल
की भाषा है
वही
श्रीकृष्ण बोलेंगे..
जो हमारी
बोलचाल की
भाषा है वही
गुरु बोलेंगे।
भाषा तो
बेचारी अधूरी
है। अर्थ भी उसमें
हमारी बुद्धि
के अनुसार
लगता है।
लेकिन हमारी बुद्धि
जब हमारे
व्यक्तित्व
का, हमारे देह
के दायरे का
आकर्षण छोड़
देती है तब हम
कुछ-कुछ समझने
के काबिल हो
पाते हैं और
जब समझने का
काबिल होते
हैं तब यही
समझा जाता है
कि हम जो समझते
हैं, वह कुछ
नहीं। आज तक
हमने जो कुछ
जाना है, जो
कुछ समझा है,
वह कुछ नहीं
है। क्योंकि
जिसको जानने
से सब जाना
जाता है उसे अभी
तक हमने नहीं
जाना। जिसको
पाने से सब
पाया जाता है
उसको नहीं
पाया।
बुद्धि
में जब तक
पकड़ होती है
तब तक कुछ
जानकारियाँ
रखकर हम अपने
को जानकर,
विद्वान या
ज्ञानी मान
लेते हैं। अगर
बुद्धि में
परमात्मा के
लिए प्रेम होता
है,
आकांक्षाएँ
नहीं होती हैं
तो हमने जो
कुछ जाना है
उसकी कीमत कुछ
नहीं लगती
वरन् जिससे
जाना जाता है
उसको समझने के
लिए हमारे पास
समता आती है।
भाषा तो हो
सकती है कि हम 'ईश्वर
से प्रेम करते
हैं' किन्तु
सचमुच में
ईश्वर से
प्रेम है कि
पदार्थों को
सुरक्षित रखने
के लिए हम
ईश्वर का
उपयोग करते
हैं? हमारी
आसक्ति
परमात्मा में
है कि नश्वर
चीजों को पाने
में है? जब तक
नश्वर चीजों
में आसक्ति
होगी, नश्वर
चीजों में
प्रीति होगी
और
मिटनेवालों
का आश्रय होगा
तब तक अमिट
तत्त्व का बोध
नहीं होगा और
जब तक अमिट
तत्त्व का बोध
नहीं होगा तब
तक जन्म-मरण क
चक्र भी नहीं
मिटेगा।
श्री
कृष्ण कहते
हैं- मय्यासक्तमनाः
पार्थ.... यदि
सचमुच ईश्वर
में प्रीति हो
जाती है तो
ईश्वर से हम
नश्वर चीजों
की माँग ही
नहीं करते। ईश्वर
से, संत से यदि
स्नेह हो जाये
तो भगवान का जो
भगवद् तत्त्व
है, संत का जो संत
तत्त्व है, वह
हमारे दिल में
भी उभरने लगता
है।
हमारे चित्त में होता तो है संसार का राग और करते हैं भगवान का भजन... इसीलिए लम्बा समय लग जाता है। हम चाहते हैं उस संसार को जो कभी किसी का नहीं रहा, जो कभी किसी का तारणहार नहीं बना और जो कभी किसी के साथ नहीं चला। हम मुख मोड़ लेते हैं उस परमात्मा से जो सदा-सर्वदा-सर्वत्र सबका आत्मा बनकर बैठा है। इसीलिए भगवान कहते हैं- 'यदि तुम्हारा चित्त मुझमें आसक्त हो जाये तो मैं तुम्हें वह आत्मतत्त्व का रहस्य सुना देता हूँ।'
जब तक
ईश्वर में
प्रीति नहीं
होती तब तक वह
रहस्य समझ में
नहीं आता।
श्री वशिष्ठ
जी महाराज कहते
हैं- 'हे राम
जी!
तृष्णावान के
हृदय में संत
के वचन नहीं
ठहरते।
तृष्णावान से तो
वृक्ष भी भय
पाते हैं'
इच्छा-वासना-तृष्णा
आदमी की
बुद्धि को दबा
देती है।
दो प्रकार के लोग होते हैं- एक तो वे जो चाहते हैं कि 'हम कुछ ऐसा पा लें जिसे पाने के बाद कुछ पाना शेष न रहे।' दूसरे वे लोग होते हैं जो चाहते हैं कि 'हम जो चाहें वह हमें मिलता रहे।' अपनी चाह के अनुसार जो पाना चाहते हैं ऐसे व्यक्तियों की इच्छा कभी पूरी नहीं होती क्योंकि एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी इच्छा खड़ी होती है और इस प्रकार इच्छा पूरी करते-करते जीवन ही पूरा हो जाता है। दूसरे वे लोग होते हैं जिनमें यह जिज्ञासा होती है किः 'ऐसा कुछ पा लें कि जिसे पाने के बाद और कुछ पाना शेष न रहे।' ऐसे लोग विरले ही होते हैं। ऐसे लोग ठीक से इस बात को समझते हैं किः 'ईश्वर के सिवाय, उस आत्मदेव के सिवाय और जो कुछ भी हमने जाना है उसकी कीमत दो कौड़ी की भी नहीं है। मृत्यु के झटके में वह सब पराया हो जायेगा।'
पाश्चात्य
जगत बाहर के
रहस्यों को
खोजता है। एक-एक
विषय की एक-एक
कुंजी खोजता
है जबकि भारत का
अध्यात्म जगत
सब विषयों की
एक ही कुंजी
खोजता है, सब
दुःखों की एक
ही दवाई खोजता
है, परमात्मस्वरूप
खोजता है।
सब
दुःखों की एक
दवाई
अपने
आपको जानो
भाई।।
श्री
कृष्ण का
इशारा सब
दुःखों की एक
दवाई पर ही है
जबकि
पाश्चात्य
जगत का
विश्लेषण
एक-एक विषय की
कुंजी
खोजते-खोजते
भिन्न-भिन्न
विषयों और
कुंजियों में बँट
गया।
भारत का
आत्मज्ञान एक
ऐसी कुंजी है
जिससे सब विषयों
के ताले खुल
जाते हैं।
संसार की ही
नहीं, जन्म
मृत्यु की
समस्याएँ भी
खत्म हो जाती
हैं। लेकिन इस
परमात्मस्वरूप
के वे ही
अधिकारी हैं
जिनकी प्रीति
भगवान में हो।
भोगों में जिनकी
प्रीति होती
है और मिटने
वाले का आश्रय
लेते हैं ऐसे
लोगों के लिए
परमात्मस्वरूप
अपना आपा होते
हुए भी पराया
हो जाता है और
भोगों में
जिनकी रूचि
नहीं है,
मिटनेवाले को
मिटनेवाला
समझते हैं एवं
अमिट की जिज्ञासा
है वे अपने
परमात्मस्वरूप
को पा लेते हैं।
यह
परमात्मस्वरूप
कहीं दूर नहीं
है। भविष्य
में मिलेगा
ऐसा भी नहीं
है.... साधक लोग इस
आत्मस्वरूप
को पाने के
लिए अपनी
योग्यता बढ़ाते
हैं। जो अपने
जीवन का मूल्य
समझते हैं ऐसे
साधक अपनी
योग्यता एवं
बुद्धि का
विकास करके,
प्राणायाम
आदि करके,
साधन-भजन-जपादि
करके परमात्म-स्वरूप
को पाने के
काबिल भी हो
जाते हैं।
ध्यान
में जब बैठें
तब दो-चार
गहरी-गहरी
लम्बी श्वास
लें। फिर
श्वास एकदम न
छोड़ दें।
श्वास छोड़ने
के साथ मिटने
वाले
पदार्थों की
आकांक्षा
छोड़ते जाएं...
श्वास छोड़ने
के साथ अपने 'स्व' के
अलावा जो कुछ
जानकारी है
उसे छोड़ते
जायें.... यह
भावना भरते जायें
कि 'अब मैं
निखालस
परमात्मा में
स्थिति पाने
वाला हो गया
हूँ। मेरे
जीवन का
लक्ष्य केवल
परमात्मा है।
जिसकी कृपा से
सारा जहाँ है
उसी की कृपा
से मेरा यह
शरीर है, मन है
बुद्धि है।
मैं उसका हूँ....
वह मेरा है...'
ऐसा सोचकर जो
भगवान का
ध्यान, भजन,
चिन्तन करता
है उसकी
प्रीति भगवान
में होने लगती
है और उसे
परमात्मस्वरूप
मिलने लगता
है।
दूसरी
बातः
मिटनेवाले
पदार्थों के
लिए हजार-हजार
परिश्रम किये
फिर भी जीवन
में परेशानियाँ
तो आती ही हैं...
ऐसा सोचकर
थोड़ा समय
अमिट परमात्मा
के लिए अवश्य
लगायें।
किसी
सेठ के पास एक
नौकर गया। सेठ
ने पूछाः "रोज के
कितने रुपये
लेते हो?"
नौकरः "बाबू जी ! वैसे तो
आठ रूपये लेता
हूँ। फिर आप
जो दे दें।"
सेठः "ठीक है,
आठ रुपये
दूँगा। अभी तो
बैठो। फिर जो
काम होगा, वह
बताऊँगा।"
सेठ जी
किसी दूसरे
काम में लग
गये। उस नये
नौकर को काम
बताने का मौका
नहीं मिल
पाया। जब शाम
हुई तब नौकर
ने कहाः "सेठ जी! लाइये
मेरी मजदूरी।"
सेठः "मैंने
काम तो कुछ
दिया ही नहीं,
फिर मजदूरी किस
बात की?"
नौकरः "बाबू जी ! आपने
भले ही कोई
काम नहीं
बताया किन्तु
मैं बैठा तो
आपके लिए ही
रहा।"
सेठ ने
उसे पैसे दे
दिये।
जब
साधारण मनुष्य
के लिए
खाली-खाली
बैठे रहने पर
भी वह मजदूरी
दे देता है तो
परमात्मा के
लिए खाली बैठे
भी रहोगे तो
वह भी तुम्हें
दे ही देगा। 'मन नहीं
लगता.... क्या
करें?' नहीं,
मन नहीं लगे
तब भी बैठकर
जप करो, स्मरण
करो। बैठोगे
तो उसके लिए
ही न? फिर वह
स्वयं ही
चिंता करेगा।
तीसरी
बातः हम जो
कुछ भी करें,
जो कुछ भी लें,
जो कुछ भी दें,
जो कुछ भी
खायें, जहाँ
कहीं भी जायें....
करें भले ही
अनेक कार्य
किन्तु
लक्ष्य हमारा
एक हो। जैसे
शादी के बाद
बहू सास की
पैरचंपी करती
है। ससुर को
नाश्ता बनाकर
देती है।
जेठानी-देवरानी
का कहा कर लेती
है। घर में
साफ-सफाई भी
करती है, रसोई
भी बनाती है,
परन्तु करती
है किसके नाते? पति के
नाते। पति के
साथ संबंध
होने के कारण
ही सास-ससुर,
देवरानी-जेठानी
आदि नाते हैं।
ऐसे ही तुम भी
जगत के सारे
कार्य तो करो
किन्तु करो उस
परम पति
परमात्मा के
नाते ही। यह
हो गयी भगवान
में प्रीति।
अन्यथा
क्या होगा?
एक ईसाई साध्वी (Nun) सदैव ईसा की पूजा-अर्चना किया करती थी। एक बार उसे कहीं दूसरी जगह जाना पड़ा तो वह ईसा का फोटो एवं पूजादि का सामान लेकर गयी। उस दूसरी जगह पर जब वह पूजा करने बैठी और उसने मोमबत्ती जलाई तो उसे हुआ कि 'इस मोमबत्ती का प्रकाश इधर-उधर चला जायेगा। मेरे ईसा को तो मिल नहीं पायेगा।' अतः उसने इधर-उधर पर्दे लगा दिए ताकि केवल ईसा को ही प्रकाश मिले। तो यह आसक्ति, यह प्रीति ईसा में नहीं, वरन् ईसा की प्रतिमा में हुई। अगर ईसा में प्रीति होती तो ईसा तो सब में है तो फिर प्रकाश भी तो सर्वत्र स्थिर ईसा के लिए ही हुआ न !
चित्त
में अगर राग
होता है और हम
भक्ति करते हैं
तब भी गड़बड़
हो जाती है।
चित्त द्वेष
रखकर भक्ति
करते हैं तब
भी गड़बड़ हो
जाती है। भक्ति
के नाम पर भी
लड़ाई और 'मेरा-तेरा' शुरु हो
जाता है
क्योंकि
भगवान के वास्तविक
'मैं' को हम
जानते ही
नहीं। जब तक
अपने 'मैं' को नहीं
खोजा तब तक
ईश्वर के 'मैं' का पता
भी नहीं चलता।
इसीलए श्री
कृष्ण कहते हैं-
मय्यासक्तमनाः
पार्थ योगं
युंजन्मदाश्रयः।
असंशयं
समग्रं मां
यथा
ज्ञास्यसि
तच्छृणु।।
'संशयरहित
होकर मुझे जिस
प्रकार तुम
जानोगे, वह
सुनो।' भगवान
का समग्र
स्वरूप जब तक
समझ में नहीं
आता तब तक
पूर्ण शान्ति
नहीं मिलती।
ईश्वर के किसी
एक रूप को
प्रारम्भ में
भले आप मानो.......
वह आपके चित्त
की वृत्ति को
एक केन्द्र
में स्थिर
करने में
सहायक हो सकता
है लेकिन
ईश्वर केवल
उतना ही नहीं
जितना आपकी इन
आँखों से
प्रतिमा के
रूप में दिखता
है। आपका
ईश्वर तो अनंत
ब्रह्माण्डो
में फैला हुआ
है, सब
मनुष्यों को,
प्राणियों को,
यहाँ तक कि सब
देवी-देवताओं
को भी सत्ता
देने वाला,
सर्वव्यापक,
सर्वशक्तिमान
और सर्वदा
व्याप्त है।
जो
ईश्वर सर्वदा
है वह अभी भी
है। जो
सर्वत्र है वह
यहाँ भी है।
जो सबमें है
वह आपमें भी
है। जो पूरा
है वह आपमें
भी पूरे का
पूरा है।
जैसे, आकाश
सर्वदा,
सर्वत्र,
सबमें और पूर्ण
है। घड़े में
आकाश घड़े की
उपाधि के कारण
घटाकाश दिखता
है और मठ का
आकाश मठ की
उपाधि होते
हुए भी वह
महाकाश से
मिला जुला है।
ऐसे ही आपके
हृदय में,
आपके घट में
जो घटाकाशरूप
परमात्मा है
वही परमात्मा
पूरे-का-पूरा अनंत
ब्रह्माण्डों
में है। ऐसा
समझकर यदि उस परमात्मा
को प्यार करो
तो आप
परमात्मा के
तत्त्व को
जल्दी समझ जाओगे।
चौथी
बातः जो बीत
गया उसकी
चिन्ता
छोड़ो। सुख बीता
या दुःख बीता...
मित्र की बात
बीती या शत्रु
की बात बीती...
जो बीत गया वह
अब आपके हाथ
में नहीं है
और जो आयेगा
वह भी आपके
हाथ में नहीं
है। अतः भूत
और भविष्य की
कल्पना
छोड़कर सदा
वर्त्तमान
में रहो। मजे
की बात तो यह
है कि काल सदा
वर्त्तमान ही होता
है।
वर्त्तमान
में ठहर कर
आगे की कल्पना
करो तो
भविष्यकाल और
पीछे की
कल्पना करो तो
भूतकाल होता
है। आपकी
वृत्तियाँ
आगे और पीछे
होती हैं तो
भूत और भविष्य
होता है। 'भूत और
भविष्य' जिन
कल्पनाओं से
बनता है उस
कल्पना का
आधार है मेरा
परमात्मा।
ऐसा समझकर भी
उस परमात्मा से
प्रीति करो तो
आप 'मय्यासक्तमना' हो सकते
हो।
पाँचवी
बातः मन चाहे
दुकान पर जाये
या मकान पर,
पुत्र पर जाये
या पत्नी पर,
मंदिर में
जाये या होटल
पर... मन चाहे
कहीं भी जाये
किन्तु आप यही
सोचो कि 'मन गया
तो मेरे प्रभु
की सत्ता से न ! मेरी
आत्मा की
सत्ता से न !' – ऐसा
करके भी उसे
आत्मा में ले
आओ। मन के भी
साक्षी हो
जाओ। इस
प्रकार
बार-बार मन को
उठाकर आत्मा
में ले आओ तो
परमात्मा में
प्रीति बढ़ने
लगेगी।
अगर आप
सड़क पर चल
रहे हो तो
आपकी नज़र बस,
कार, साइकिल
आदि पर पड़ती
ही है। अब, बस
दिखे तो सोचो कि
'बस को
चलाने वाले
ड्राइवर को सत्ता
कहाँ से मिल
रही हैं?
परमात्मा से।
अगर मेरे
परमात्मा की
चेतना न होती
तो ड्राइवर
ड्राइविंग
नहीं कर सकता।
अतः मेरे
परमात्मा की
चेतना से ही
बस भागी जा
रही है...' इस
प्रकार
दिखेगी तो बस
लेकिन आपका मन
यदि ईश्वर में
आसक्त है तो
आपको उस समय
भी ईश्वर की स्मृति
हो सकती है।
छठवीं
बातः निर्भय
बनो। अगर 'मय्यासक्तमना' होना
चाहते हो तो
निर्भयता
होनी ही
चाहिए। भय शरीर
को 'मैं' मानने
से होता है और
मन में होता
है जो एक दिन नष्ट
हो जाने वाला
है, उस शरीर को
नश्वर जानकर एवं
जिसकी सत्ता
से शरीर
कार्यरत है,
उस शाश्वत
परमात्मा को
ही 'मैं' मानकर
निर्भय हुआ जा
सकता है।
सातवीं
बातः प्रेमी
की अपनी कोई
माँग नहीं होती
है। प्रेमी
केवल अपने
प्रेमास्पद
का मंगल ही
चाहता है। 'प्रेमास्पद
को हम कैसे
अनुकूल हो
सकते हैं?' यही
सोचता है
प्रेमी या
भक्त। तभी वह 'मय्यासक्तमना' हो पाता
है। जो अपनी
किसी भी माँग
के बिना अपने
इष्ट के लिए
सब कुछ करने
को तैयार होता
है, ऐसा
व्यक्ति
भगवान के
रहस्य को
समझने का भी
अधिकारी हो
जाता है। तभी
भगवान कहते
हैं-
मय्यासक्तमनाः
पार्थ योगं
युंजन्मदाश्रयः।
असंशयं
समग्रं मां
यथा
ज्ञास्यसि
तच्छृणु।।
'हे
पार्थ ! मुझमें
अनन्य प्रेम
से आसक्त हुए
मन वाला और
अनन्य भाव से
मेरे परायण
होकर, योग में
लगा हुआ मुझको
संपूर्ण
विभूति, बल,
ऐश्वर्यादि
गुणों से युक्त
सबका आत्मरूप
जिस प्रकार
संशयरहित
जानेगा उसको
सुन।'
श्रीमद्
भगवद् गीता के
सातवें
अध्याय के दूसरे
श्लोक में आता
हैः
ज्ञानं
तेऽहं
सविज्ञानमिदं
वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा
नेह
भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यवशिष्यते।।
"मैं तेरे लिए इस विज्ञानसहित तत्त्वज्ञान को संपूर्णता से कहूँगा कि जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रहता है।"
उद्दालक ऋषि का पुत्र श्वेतकेतु अठारह पुराणों एवं वेद की ऋचाओं आदि का अध्ययन करके घर वापस आया। तब पिता उसे देखते ही समझ गये कि, 'यह कुछ अक्ल बढ़ाकर आया है। होम-हवनादि की विधि सीखकर, शास्त्र-पुराणों का अध्ययन आदि करके तो आया है किन्तु जिससे सब जाना जाता है उस परम तत्त्व को इसने अभी तक नहीं जाना है। यह तो विनम्रता छोड़कर पढ़ाई का अहंकार साथ लेकर आया है।'
पिता ने पूछाः "श्वेतकेतु ! तुमने तमाम विद्याओं को जाना है परन्तु क्या उस एक को जानते हो जिसके जानने से सब जान लिया जाता है जिसके द्वारा अश्रुत श्रुत हो जाता है, अमत मत हो जाता है, अविज्ञात ज्ञात हो जाता है?"
येनाश्रुतं
श्रुतं
मतमविज्ञातं
विज्ञातमिति।।
(छान्दोग्योपनिषद्
6.1.3)
पिता का
प्रश्न सुनकर
श्वेतकेतु
अवाक् हो गया।
यह तो उसके
गुरु ने
पढ़ाया ही
नहीं था। उसने
कहाः
"पिताजी ! मैं अपने गुरु के आश्रम में सबका प्रिय रहा हूँ। इसलिए जितना गुरुजी जानते थे, वह सब उन्होंने मुझे पढ़ा दिया है किन्तु आप जो पूछ रहे हैं वह मैं नहीं जानता।"
जब तक उस
एक परम तत्त्व
को न जाना तब
तक बुद्धि में,
मन में केवल
कल्पनाएँ,
सूचनाएँ ही
भरी जाती हैं
और मन-बुद्धि
इतने परेशान
हो जाते हैं कि
उनमें और कुछ
रखने की जगह
ही नहीं बचती।
मन बुद्धि को
जहाँ से सत्ता
मिलती है उन
सत्ताधीश को न
जानकर
मन-बुद्धि में
कल्पनाएँ भर
लीं तो यह हुआ
ऐहिक ज्ञान और
मन-बुद्धि को
जहाँ से सत्ता
मिलती है उस
चैतन्य को 'मैं' रूप में
जान लिया तो
यह हो गया
पारमार्थिक
ज्ञान।
श्वेतकेतु
केवल ऐहिक
विद्या ही पढ़कर
आया था। जब वह
विनम्र बना,
अपनी सीखी हुई
विद्या का
अहंकार थोड़ा
मिटा तब वह उस
पारमार्थिक
ज्ञान पाने का
अधिकारी बना
जिसको जानने से
व्यक्ति
मुक्त हो जाता
है। फिर पिता
ने उसे
ब्रह्मज्ञान
का उपदेश
दिया।
कल्पनाएँ
और सूचनाएँ
एकत्रित करके
आदमी अहंकारी
हो जाता है।
सच्चा ज्ञान,
पारमार्थिक
ज्ञान यदि अर्जित
करता है तो
आदमी का
अहंकार गायब
हो जाता है।
फिर वह समझने
लगता है कि जो
कुछ जानकारी
है उसकी कोई
कीमत नहीं है।
सारी
जानकारियाँ
केवल रोटी
कमाने और शरीर
को सुख दिलाने
के लिए ही हैं।
आज का ज्ञान,
विज्ञान, आज
के प्रमाणपत्र
सब दौड़-धूप
करने के बाद
भी बहुत-से-बहुत
शरीर को
रोटी-कपड़ा-मकान
एवं अन्य ऐहिक
सुख में गरकाव
करने के लिए
है। जिस शरीर
को जला देना
है उसी शरीर
को सँभालने के
लिए ही आज का पूरा
विज्ञान है।'
बड़े से
बड़े
वैज्ञानिक को
बुला लाओ,
अधिक-से-अधिक
वैज्ञानिकों
को एकत्रित कर
लो और उनसे
पूछोः
"भगवान के भक्त अथवा सदगुरु के सत् शिष्य को ध्यान के समय जो सुख मिलता है, वह क्या आज तक आपको मिला है? सत् शिष्य को जो शांति मिलती है या आनंद मिलता है वह आपके विज्ञान के सब साधनों को मिलाकर भी मिल सकता है?"
एक बार
सुकरात से किसी
धनी आदमी ने
कहाः
"आप कहें
तो मैं आपके
लिए लाखों
रूपये, लाखों
डॉलर खर्च कर
सकता हूँ। आप
जो चाहे खरीद
सकते हैं। बस
एक बार मेरे
साथ बाजार में
चलिए।"
सुकरात उस धनी व्यक्ति के साथ बाजार में घूमने गये। बड़े-बड़े दुकान देखे। फिर दुकान से बाहर निकलकर सुकरात खूब नाचने लगे। सुकरात को नाचते हुए देखकर उस धनी व्यक्ति को चिन्ता हो गयी कि कहीं वे पागल तो नहीं हो गये? उसने सुकरात से पूछाः "आप क्यों नाच रहे हैं?"
तब सुकरात बोलेः "तुम मेहनत करके डॉलर कमाते हो। डॉलर खर्च करके वस्तुएँ लाते हो और वस्तुएँ लाकर भी सुखी ही तो होना चाहते हो फिर भी तुम्हारे पास सुख नहीं है जो मुझे इन सबके बिना ही मिल रहा है। इसी बात से प्रसन्न होकर मैं नाच रहा हूँ।"
भारत ने
सदैव ऐसे सुख
पर ही नजर रखी
है जिसके लिए
किसी बाह्य
परिस्थिति की
गुलामी करने
की आवश्यकता न
हो, जिसके लिए
किसी का भय न
हो और जिसके
लिए किसी का
शोषण करने की
ज़रूरत न हो। बाहर
के सुख में तो
अनेकों का
शोषण होता है।
सुख छिन न
जाये इसका भय
होता है और
बाह्य परिस्थितियों
की गुलामी भी
करनी पड़ती
है।
भगवान कहते हैं- 'मैं तेरे लिए विज्ञानसहित ज्ञान को पूर्णतया कहूँगा..."
यह
विज्ञानसहित
ज्ञान क्या है? आत्मा
के बारे में
सुनना ज्ञान
है। आत्मा एकरस,
अखंड, चैतन्य,
शुद्ध-बुद्ध,
सच्चिदानंदरूप
है। देव,
मनुष्य, यक्ष,
गंधर्व,
किन्नर सबमें
सत्ता उसी की
है' – यह है
ज्ञान और इसका
अपरोक्ष रूप
से अनुभव करना
- यह है
विज्ञान।
ज्ञान
तो ऐसे भी मिल
सकता है लेकिन
विज्ञान या
तत्त्वज्ञान
की निष्ठा तो
बुद्ध
पुरुषों के
आगे विनम्र
होकर ही पायी
जा सकती है।
संसार को
जानना है तो
संशय करना पड़ेगा
और सत्य को
जानना हो
संशयरहित
होकर श्रद्धापूर्वक
सदगुरु के
वचनों को
स्वीकार करना पड़ेगा।'
आप गये
मन्दिर में।
भगवान की मूर्ति
को प्रणाम
किया। तब आप
यह नहीं सोचते
कि "ये भगवान
तो कुछ बोलते
ही नहीं हैं...
जयपुर से साढ़े
आठ हजार रूपये
में आये हैं.... 'नहीं
नहीं, वहाँ
आपको संदेह
नहीं होता है
वरन् मूर्ति
को भगवान
मानकर ही
प्रणाम करते
हो क्योंकि
मूर्ति में
प्राणप्रतिष्ठा
हो चुकी है।
धर्म में
सन्देह नहीं,
स्वीकार करना
पड़ता है और
स्वीकार
करते-करते आप
एक ऐसी अवस्था
पर आते हो कि
आपकी अपनी
जकड़-पकड़
छूटती जाती है
एवं आपकी
स्वीकृति
श्रद्धा का
रूप ले लेती
है। श्रद्धा
का रूप जब
किसी सदगुरु
के पास पहुँचता
है तो फिर
श्रद्धा के बल
से आप तत्त्वज्ञान
पाने के भी
अधिकारी हो
जाते हो। यही
है ज्ञानसहित
विज्ञान।
सत्य या तत्त्वज्ञान तर्क से सिद्ध नहीं होता लेकिन सारे तर्क जिससे सिद्ध होते हैं, सारे तर्क जिससे उत्पन्न होकर पुनः जिसमें लीन हो जाते हैं वही है सत्यस्वरूप परमात्मा। उस परमात्मा का ज्ञान तभी होता है जब श्रद्धा होती है, स्वीकार करने की क्षमता होती है और परमात्मा में प्रीति होती है। जिन्हें परमात्मा का ज्ञान हो जाता है फिर वे निर्द्वन्द्व, निःशंक, निःशोक हो जाते हैं। उनका जीवन बड़ा अदभुत एवं रहस्यमय हो जाता है। ऐसे महापुरुष की तुलना किससे की जाये? अष्टावक्रजी महाराज कहते हैं- तस्य तुलना केन जायते। जिन्होंने अपनी आत्मा में विश्रान्ति पा ली है जिन्होंने परम तत्त्व के रहस्य को जान लिया है, जिन्होंने ज्ञान सहित विज्ञान को समझ लिया है, उनकी तुलना किससे करोगे? एकमेवाद्वितीयम् का साक्षात्कार किये हुए महापुरुष की तुलना किससे की जा सकती है?
मनु
महाराज
इक्ष्वाकु
राजा से कहते
हैं- राजन ! तुम
केवल एक बार
आत्मपद में
जाग जाओ। फिर
तुम जो जागतिक
आचार करोगे
उसमें
तुम्हें दोष
नहीं लगेगा।
हे इक्ष्वाकु ! इस
राज्य वैभव को
पाकर भी
तुम्हारे
चित्त में
शांति नहीं है
क्योंकि अनेक
में छुपे हुए
एक को तुमने
नहीं जाना।
जिसको पाने से
सब पाया जाता
है उसको तुमने
नहीं पाया।
इसलिए राजन ! तुम
उसको पा लो
जिसको पाने से
सब पा लिया
जाता है,
जिसको जानने
से सब जान
लिया जाता है।
उस आत्मदेव को
जान लो। फिर
तुम्हें भीतर
कर्त्तापन
नहीं लगेगा।
तुम राज्य तो
करोगे लेकिन
समझोगे कि
बुद्धि मूर्खों
पर अनुशासन कर
रही है और
सज्जनों को सहयोग
दे रही है।
मैं कुछ नहीं
करता.... हे राजन ! ऐसा
ज्ञानवान जिस
ईंट पर पैर
रखता है वह
ईंट भी प्रणाम
करने योग्य हो
जाती है। ऐसा
ज्ञानवान जिस
वस्तु को छूता
है वह वस्तु प्रसाद
बन जाती है।
ऐसा ज्ञानवान
व्यक्ति जिस
पर नजर डालता
है वह व्यक्ति
भी निष्पाप
होने लगता है।
जो
ज्ञान
विज्ञान से
तृप्त हो जाता
है, जो ज्ञान
विज्ञान का
अनुभव कर लेता
है वह फिर
शास्त्र और
शास्त्र के
अर्थ का
उल्लंघन करके
भी अगर विचरता
है तो भी उसको
पाप-पुण्य सता
नहीं सकते
क्योंकि उसको
अपने निज स्वरूप
का बोध हो
चुका है। अब
वह देह,
इन्द्रियाँ, प्राण,
शरीरादि को
कर्त्ता-भोक्ता
देखता है और अपने
को उनसे असंग
देखता है।'
सच पूछो
तो आत्मा
निःसंग है
लेकिन हम
आत्मा को नहीं
जानते हैं और
देह में हमारी
आसक्ति तथा संसार
में प्रीति
होती है
इसीलिए
बुद्धि हमको
संसार में
फँसा देती है,
अहंकार हमें
उलझा देता है और
इच्छाएँ-वासनाएँ
हमको घसीटती
जाती हैं। जब
आत्मपद का रस
आने लगता है
तब संसार का
रस फीका होने
लगता है। फिर
आप खाते-पीते,
चलते-बोलते
दिखोगे सही लेकिन
वैसे ही, जैसे
नट अपना
स्वाँग
दिखाता है।
भीतर से नट
अपने को ज्यों-का-त्यों
जानता है
किन्तु बाहर
कभी राजा तो कभी
भिखारी और कभी
अमलदार का
स्वाँग करता
दिखता है। ऐसे
ही भगवान में
प्रीति होने
से भगवान के
समग्र स्वरूप
को जो जान
लेता है वह
अपने भीतर
ज्ञान
विज्ञान से
तृप्त हो जाता
है किन्तु
बाहर जैसा
अन्न मिलता है
खा लेता है, जैसा
वस्त्र मिलता
है पहन लेता
है, जहाँ जगह
मिलती है सो
लेता है।
हमारी
आसक्ति संसार
में होती है,
संसार के संबंधों
में होती है।
संबंध हमारी
इच्छा के अनुकूल
होते हैं तो
हम सुखी होते
हैं, प्रतिकूल
होते हैं तो
हम दुःखी होते
हैं। किन्तु सुख
दुःख दोनों
आकर चले जाते
हैं। जो चले
जाने वाली
चीजें हैं,
उनमें न बहना
यह ज्ञान है
और चले जाने
वाली वस्तुओं
में,
परिस्थितियों
बह जाना यह
अज्ञान है।
दुःख
में दुःखी और
सुख में सुखी
होने वाला मन लोहे
जैसा है।
सुख-दुःख में
समान रहने वाला
मन हीरे जैसा
है। दुःख सुख
का जो खिलवाड़
मात्र समझता
है वह है
शहंशाह। जैसे
लोहा, सोना, हीरा
सब होते हैं
राजा के ही
नियंत्रण में,
वैसे ही शरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, सुख-दुःखादि
होते हैं
ब्रह्मवेत्ता
के नियंत्रण
में। जो
भगवान के
समग्र स्वरूप
को जान लेता है,
वह
ब्रह्मवेत्ता
हो जाता है और
भगवान के समग्र
स्वरूप को वही
जान सकता है
जिसकी भगवान में
आसक्ति होती
है, जो 'मय्यासक्तमनाः' होता
है।
यहाँ
आसक्ति का
तात्पर्य
पति-पत्नी के
बीच होने वाली
आसक्ति नहीं
है। शब्द तो
आसक्ति है,
लेकिन हमारी
दृष्टि की
आसक्ति नहीं वरन्
श्री कृष्ण की
दृष्टि की
आसक्ति।
एक
दर्जी गया रोम
में पोप को
देखने के लिए।
जब देखकर वापस
आया तब अपने
मित्र से
बोलाः
"मैं रोम
देश में पोप
के दर्शन करके
आया।"
मित्रः "अच्छा.....
पोप कैसे लगे?"
दर्जीः "पतले से
हैं। लम्बी सी
कमीज है। उसकी
चौड़ाई 36 इंच
है। कमीज की
सिलाई में
कटिंग ऐसी ऐसी
है।"
मित्रः "भाई ! पोप के दर्शन किये कि कमीज के?"
ऐसे ही
श्रीकृष्ण के
वचन कमीज जैसे
दिखते हैं।
श्रीकृष्ण के
वचनों में
श्री कृष्ण
छुपे हुए हैं।
दृष्टि बदलती
है तो सृष्टि
बदल जाती है
और भगवान में
प्रीति हो
जाती है तो
दृष्टि बदलना
सुगम हो जाता
है। वासना मैं
प्रीति होती
है तो दृष्टि
नहीं बदलती।
भौतिक
विज्ञान
सृष्टि को
बदलने की
कोशिश करता है
और वेदान्त
दृष्टि को
बदलने की।
सृष्टि कितनी
भी बदल जाये
फिर भी पूर्ण
सुखद नहीं हो
सकती जबकि
दृष्टि जरा-सी
बदल जाये तो
आप परम सुखी
हो सकते हो।
जिसको जानने
से सब जाना
जाता है, वह
परमात्मसुख
वेदान्त से
मिलता है। इस
परमात्म-स्वरूप
को पाकर आप भी
सदा के लिए
मुक्त हो सकते
हो और यह
परमात्मस्वरूप
आपके पास ही
है। फिर भी आप
हजारों-हजारों
दूसरी
कुंजियाँ
खोजते हो सुख-सुविधा
पाने के लिए
लेकिन सदा के
लिए मुक्त कर
देने वाली जो
कुंजी है
आत्मज्ञान उसको
ही नहीं
खोजते।'
एक रोचक
कथा हैः
कोई
सैलानी
समुद्र में
सैर करने गया।
नाव पर सैलानी
ने नाविक से
पूछाः "तू
इंग्लिश
जानता है?"
नाविकः "भैया !
इंग्लिश क्या
होता है?"
सैलानीः
"इंग्लिश
नहीं जानता? तेरी 25
प्रतिशत जिंदगी
बरबाद हो गयी।
अच्छा... यह तो
बता कि अभी
मुख्यमंत्री
कौन है?"
नाविकः "नहीं,
मैं नहीं
जानता।"
सैलानीः
"राजनीति
की बात नहीं
जानता? तेरी 25
प्रतिशत
जिंदगी और भी
बेकार हो गयी।
अच्छा...... लाइट
हाउस में
कौन-सी फिल्म
आयी है, यह बता
दे।"
नाविकः "लाइट
हाउस-वाइट
हाउस वगैरह हम
नहीं जानते।
फिल्में
देखकर चरित्र और
जिंदगी बरबाद
करने वालों
में से हम
नहीं हैं।"
सैलानीः
"अरे ! इतना भी
नहीं जानते? तेरी 25
प्रतिशत
जिंदगी और
बेकार हो गयी।"
इतने
में आया आँधी
तूफान। नाव
डगमगाने लगी।
तब नाविक ने
पूछाः
"साहब ! आप
तैरना जानते हो?"
सैलानीः
"मैं और
तो सब जानता
हूँ, केवल
तैरना नहीं
जानता।"
नाविकः "मेरे
पास तो 25
प्रतिशत
जिंदगी बाकी
है। मैं तैरना
जानता हूँ अतः
किनारे लग
जाऊँगा लेकिन
आपकी तो सौ
प्रतिशत
जिंदगी डूब
जायगी।"
ऐसे ही
जिसने बाकी सब
तो जाना
किन्तु
संसार-सागर को
तरना नहीं जाना
उसका तो पूरा
जीवन ही डूब
गया।
भगवान
कहते हैं-
ज्ञानं
तेऽहं
सविज्ञानमिदं
वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा
नेह
भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यवशिष्यते।।
"मैं
तेरे लिए इस
विज्ञानसहित
तत्त्वज्ञान
को संपूर्णता
से कहूँगा कि
जिसको जानकर
संसार में फिर
और कुछ भी
जानने योग्य
शेष नहीं बचता।"'
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
विश्व में तत्त्व को जानने वाले विरले ही होते हैं।
मनुष्याणां
सहस्रेषु
कश्चिद्यतति
सिद्धये।
यततामपि
सिद्धानां
कश्चिन्मां
वेत्ति तत्त्वतः।।
"हजारों
मनुष्यों में
कोई ही मनुष्य
मेरी प्राप्ति
के लिए यत्न
करता है और उन
यत्न करने वाले
योगियों में
भी कोई ही
पुरुष मेरे
परायण हुआ
मुझको तत्त्व
से जानता है।"
(गीताः
7.3)
चौरासी
लाख योनियों
में मानव योनि
सर्वश्रेष्ठ
है। मानवों
में भी वह
श्रेष्ठ है
जिसे अपने
मानव जीवन की
गरिमा का पता
चलता है। बहुत
जन्मों के
पुण्य-पाप जब
साम्यावस्था
में होते हैं
तब मनुष्य-तन
मिलता है।
देवता ज्ञान
के अधिकारी
नहीं हैं
क्योंकि वे
भोगप्रधान
स्वभाववाले
होते हैं।
दैत्य ज्ञान
के अधिकारी नहीं
हैं क्योंकि
वे
क्रूरताप्रधान
स्वभाव वाले
होते हैं।
मनुष्य ज्ञान
का अधिकारी
होता है
क्योंकि
मनुष्य केवल
भोगों का
भोक्ता ही नहीं,
वरन् सत्कर्म
का कर्त्ता भी
बन सकता है।
किन्तु
मनुष्य देह
धारण करके भी
जो भगवान के
साथ संबंध
नहीं जोड़
सकता वह
मनुष्य के रूप
में पशु ही
है।
इस
प्रकार
लाखों-लाखों
प्राणियों
में, पशुओं में
मनुष्य
प्राणी
श्रेष्ठ है
क्योंकि
मनुष्य देह
तभी मिलती है
जब परमात्मा
की कृपा होती
है। अनंत
जन्मों के
संस्कार मनुष्य
के पास मौजूद
हैं। शुभ
संस्कार भी
मौजूद हैं,
अशुभ संस्कार
भी मौजूद हैं।
चिड़िया
आज से सौ साल
पहले जिस
प्रकार का
घोंसला बनाती
थी उसी प्रकार
का आज भी
बनाती है। बाज
जैसे आकाश में
उड़कर अपना
शिकार खोजता
था, वैसे ही आज
भी खोजता है।
बिल्ली,
कुत्ता, चूहा,
गिलहरी आदि
जिस प्रकार 500
वर्ष पहले
जीते थे वैसे
ही आज भी जीते
हैं क्योंकि
इन सब पर
प्रकृति का
पूरा
नियंत्रण है।
ये सब पशु
पक्षी आदि न
गाली देते हैं
न मुकद्दमा
लड़ते हैं,
फिर भी वैसे
के वैसे हैं
जबकि मनुष्य
झूठ भी बोलता
है, चोरी भी
करता है, गाली
भी देता है,
मुकद्दमा भी
लड़ता है फिर
भी मनुष्य
अन्य सब प्राणियों
से श्रेष्ठ
माना जाता है
क्योंकि वह
निरन्तर
विकास करता
रहता है। मानव
पर ईश्वर की
यह असीम
अनुकंपा है कि
मनुष्य
प्रकृति के
ऊपर भी अपना
प्रभाव डालने
की योग्यता
रखता है। अपनी
योग्यता से
प्रकृति की
प्रतिकूलताओं
को दूर कर
सकता है।
प्रकृति
के, सृष्टि के
नियम में
बारिश आयी तो मनुष्य
ने छाता बना
लिया, ठंड आयी
तो स्वेटर-शॉल
बना लिए,
गर्मी आयी तो
पंखे की खोज
कर ली, आग लगी
तो अग्निशामक
यंत्रों की
व्यवस्था कर
ली..... इस प्रकार मनुष्य
प्रकृति की
प्रतिकूलताओं
को अपने पुरुषार्थ
से रोक लेता
है और अपना
अनुकूल जीवन जी
लेता है।
ऐसे
हजारों
पुरुषार्थी
मनुष्यों में
से भी कोई
विरला ही
सिद्धि के लिए
अर्थात्
अंतःकरण की
शुद्धि के लिए
यत्न करता है
और ऐसे यत्न
करने वाले
हजारों में भी
कोई विरला ही
भगवान का
तत्त्व से
जानने का यत्न
करता है।
सब
मनुष्य भगवान
को जानने का
यत्न क्यों
नहीं कर पाते? मानव का
स्वभाव है जिस
चीज का अभाव
हो उस चीज की
प्राप्ति का
यत्न करना और
जो मौजूद हो
उसकी ओर न
देखना। जो
परमात्मा सदा
मौजूद है उसकी
ओर न देखना।
जो परमात्मा
सदा मौजूद है
उसकी तरफ मन
झुकता नहीं है
और जो संसार
लामौजूद है,
जो कि था नहीं
और बाद में रहेगा
नहीं, उसके
पीछे मन भागता
है। मन की इस
चाल के कारण
ही मानव जल्दी
ईश-प्राप्ति
के लिए यत्न
नहीं करता है।'
दूसरी
बातः माया का
यह बड़ा अटपटा
खेल है कि
संयोगजन्य जो भी
सुख है वे आते
तो भगवान की
सत्ता से हैं
किन्तु
मनुष्य
उन्हें
अज्ञानता से विषयों
में से आते
हुए मान लेता
है और
संयोगजन्य
विषय-सुख में
ही उलझकर रह
जाता है।
आँखें और रूप
के, जिह्वा और
स्वाद के, कान
और शब्द के,
नाक और गंध के,
त्वचा और
स्पर्श के
संयोग में
मनुष्य इतना
उलझ जाता है
कि वास्तविक
ज्ञान पाने की
इच्छा ही नहीं
होती, इसीलिए तत्त्वज्ञान
पाना या
परमात्मा को
पाना कठिन लगता
है।
अगर परमात्म प्राप्ति इतनी सुलभ है तो फिर विश्व में परमात्मा को पाये हुए लोग ज्यादा होने चाहिए। करोड़ों मनुष्य परमात्मा को पाये हुए होने चाहिए और कोई विरला ही परमात्म-प्राप्ति से वंचित रहना चाहिए किन्तु होता है बिल्कुल विपरीत। तभी तो भगवान कहते हैं- 'हजारों यत्न करने वालों में कोई विरला ही मुझे तत्त्व से जानता है।'
हजारों
मनुष्यों में
से कोई विरला
ही सिद्धि के
लिए यत्न करता
है और सिद्धि
मिलने पर वहीं
रुक जाता है,
वहीं संतुष्ट हो
जाता है।
सिद्धि मिलने
पर अर्थात्
अंतःकरण की
शुद्धि होने
पर मनुष्य में
तत्त्वज्ञान
की जिज्ञासा
हो सकती है
किन्तु
मनुष्य
अन्तःकरण की
शुद्धि में ही
रुक जाता है,
अन्तःकरण की
शुद्धि में
होने वाले
छोटे-मोटे
लाभों से ही
संतुष्ट हो
जाता है।
अंतःकरण से
पार होकर तत्त्वज्ञान
की ओर अभिमुख
होने के लिए
उत्सुक नहीं
बनता, तत्त्व
को पाने का
अधिकारी नहीं हो
पाता।
स्वल्पपुण्यवतां
राजन्
विश्वासो नैव
जायते।
अतः
यत्न करके जब
बुद्धि शुद्ध
हो और शुद्ध
बुद्धि में
मैं कौन हूँ
यह प्रश्न उठे
एवं बुद्ध
पुरुषों का
संग हो तभी
मनुष्य
तत्त्व को
पाने का
अधिकारी हो
सकता है।
तत्त्व को
पाये बिना
सारे विश्व का
राज्य मिल
जाये तब भी
व्यर्थ है और
जिसके पास
भोजन के लिए
रोटी का
टुकड़ा न हो,
पहनने को
कपड़ा न हो और
रहने को
झोंपड़ा भी न
हो फिर भी यदि
वह तत्त्व को
जानता है तो
ऐसा पुरुष
विश्वात्मा
होता है। ऐसे
ब्रह्मवेत्ताओं
की तो भगवान
राम लक्ष्मण
भी पैरचंपी
करते हैं।
जिसको
पाये बिना
मनुष्य कंगाल
है, जिसको
पाये बिना
मनुष्य का
जन्म व्यर्थ
है, जिसको
जाने बिना सब
कुछ जाना हुआ
तुच्छ है,
जिससे मिले
बिना सबसे मिलना
व्यर्थ है ऐसा
परमात्मा सदा,
सर्वत्र तथा सबसे
मिला हुआ है
और आज तक उसका
पता नहीं... यह
परम आश्चर्य
है ! मछली
शायद पानी से
बाहर रह जाये
किन्तु मनुष्य
तो परमात्मा
से एक क्षण के
लिए भी दूर
नहीं हो सकता
है। मछली को
तो पानी के
बाहर रहने पर
पानी के
छटपटाहट होती
हैं किन्तु
मनुष्य को
परमात्मा के
लिए छटपटाहट
नहीं होती।
क्यों? मनुष्य
एक क्षण के
लिए भी
परमात्मा से
अलग नहीं होता
इसीलिए शायद
उसे परमात्मा
के लिए छटपटाहट
नहीं होती
होगी! अगर एक
बार भी उसे
परमात्म-प्राप्ति
की तीव्र
छटपटाहट हो
जाये तो फिर
वह उसे जाने
बिना रह भी
नहीं सकता।'
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
भूमिरापोऽनलो
वायुः खं मनो
बुद्धिरेव च।
अहंकार
इतीयं मे
भिन्ना
प्रकृतिरष्टधा।।
अपरेयमितस्त्वन्यां
प्रकृतिं विद्धि
मे पराम्।
जीवभूतां
महाबाहो
ययेदं
धार्यते
जगत्।।
"पृथ्वी,
जल, तेज, वायु
तथा आकाश और
मन, बुद्धि एवं
अहंकार.... ऐसे
यह आठ प्रकार
से विभक्त हुई
मेरी प्रकृति
है। यह आठ
प्रकार के
भेदों वाली तो
अपरा है
अर्थात् मेरी
जड़ प्रकृति
है और हे महाबाहो
! इससे
दूसरी को मेरी
जीवरूपा परा
अर्थात् चेतन
प्रकृति जान
कि जिससे यह
संपूर्ण जगत
धारण किया
जाता है।"
(गीताः 7.4,5)
भगवान
श्रीकृष्ण
यहाँ अपनी दो
प्रकार की प्रकृति
का वर्णन करते
हैं- परा और
अपरा। वे प्रकृति
को लेकर
सृष्टि की
रचना करते
हैं। जिस प्रकृति
को लेकर रचना
करते हैं वह
है उनकी अपरा
प्रकृति एवं
जो उनका ही
अंशरूप जीव है
उसे भगवान परा
प्रकृति कहते
हैं। अपरा
प्रकृति
निकृष्ट, जड़
और परिवर्तनशील
है तथा परा
प्रकृति
श्रेष्ठ, चेतन
और अपरिवर्तनशील
है। भगवान की
परा प्रकृति
द्वारा ही यह
संपूर्ण जगत
धारण किया
जाता है।
प्रवृत्ति
और रचना – यह
अपरा प्रकृति
है, अष्टधा
प्रकृति है,
जिसमें कि
पंचमहाभूत
एवं मन,
बुद्धि तथा
अहंकार इन आठ
चीजों को
समावेश होता
है। भगवान का
ही अंश जीव
परा प्रकृति
है। अपरा
प्रकृति जीव
को परमात्मा
से एक रूप
करने वाली है।
जैसे,
सुबह नींद में
से उठकर सबसे
पहले मैं हूँ
ऐसी स्मृति
उत्पन्न होती
है, यह परा
प्रकृति है
फिर वृत्ति
उत्पन्न होती
है कि मैं
अमुक जगह पर
हूँ.... मैं सोया
था... मैं अभी
जागा हूँ....
मुझे यहाँ
जाना है... मुझे
यह करना है....
मुझे यह पाना
है.... आदि आदि
वृत्तिरूप
अहंकार अपरा प्रकृति
है।
जो जीवभूता
प्रकृति है,
जो
अपरिवर्तनशील
एवं चेतन है
वही भगवान की
परा प्रकृति
है। जीव की
बाल्यावस्था
बदल जाती है,
किशोरावस्था
भी बदल जाती है,
जवानी भी बदल
जाती है,
बुढ़ापा भी
बदल जाता है
एवं मौत के
बाद नया शरीर
प्राप्त हो
जाता.... कई बार
ऐसे शरीर
बदलते रहते
हैं। मन,
बुद्धि
अहंकार भी
बदलता रहता है
किन्तु इन
सबको देखने
वाला कोई है
जो हर अवस्था
में, हर प्रकृति
में अबदल रहता
है। जो अबदल
रहता है वही
सबका
जीवात्मा
होकर बैठा है।
उसका असली
स्वरूप
परमात्मा से
अभिन्न है
लेकिन
अज्ञानवश वह इस
अष्टधा
प्रकृति से
बने शरीर को
मैं एवं उसके
संबंधों को
मेरा मानता है
इसीलिए जन्म-मरण
के चक्र में
फँसा रहता है।
जैसे
विचार दो
प्रकार के
होते हैं-
अच्छे एवं
बुरे। उसी
प्रकार
प्रकृति के भी
दो प्रकार
हैं- अपरा एवं
परा। आप जब
भोग चाहते हो,
संसार के ऐश –
आराम एवं मजे
चाहते हो तो
अपरा प्रकृति
में उलझ जाते
हो। जब आप
संसार के
ऐश-आराम एवं
मौज मस्ती को
नश्वर समझकर
सच्चा सुख
चाहते हो तो परा
प्रकृति आपकी
मदद करती है।
जब परा
प्रकृति मदद
करती है तो
परमेश्वर का
सुख मिलता है,
परमेश्वर का
ज्ञान मिलता
है तथा
परमेश्वर का
अनुभव हो जाता
है। फिर वह
जीवात्मा
समझता है कि,
मैं परमेश्वर
से जुदा नहीं
था, परमेश्वर
मुझसे जुदा
नहीं था। आज
तक जिसको
खोजता-फिरता
था, वही तो
मेरा आत्मा
था।
बंदगी
का था कसूर
बंदा मुझे बना
दिया।
मैं
खुद से था
बेखबर तभी तो
सिर झुका
दिया।।
वे थे
न मुझसे दूर न
मैं उनसे दूर
था।
आता न
था नजर तो नजर का
कसूर था।।
पहले हमारी नजर ऐसी थी की अपरा प्रकृति की चीजों में हम उलझ रहे थे... लगता था कि, 'यह मिले तो सुखी हो जाऊँ, यह भोगूँ तो सुखी हो जाऊँ...' ऐसा करते-करते सुख के पीछे ही मर रहे थे। किन्तु जब पता चला अपने स्वरूप का तो लगा कि 'अरे ! मैं स्वयं ही सुख का सागर हूँ.... सुख के लिए कहाँ-कहाँ भटक रहा था?'
अपरा
प्रकृति में
रहकर कोई पूरा
सुखी हो जाये या
उसकी सभी
समस्याओं का
सदा के लिए
समाधान हो
जाये यह संभव
ही नहीं है।
सभी समस्याएँ
तो तभी हल हो
सकती हैं कि
जब उनसे अपने
पृथकत्व को जान
लिया जाये।
दर्शनशास्त्र
की एक बड़ी
सूक्ष्म बात
है कि जो 'इदं' है वह 'अहं' नहीं
हो सकता।
जैसे यह
किताब है तो
इसका
तात्पर्य यह
है कि मैं
किताब नहीं
हूँ। इसी
प्रकार यह
रूमाल है... तो
मैं रूमाल
नहीं। यह हाथ......
तो मैं हाथ
नहीं। यह सिर...
तो मैं सिर
नहीं। मेरा
पेट दुःखता
है.... तो मैं पेट
नहीं। मेरा
हृदय दुःखी
है... तो मैं हृदय
नहीं। मेरा मन
चंचल है.... तो
मैं मन नहीं।
मेरी बुद्धि
ने बढ़िया
निर्णय दिया....
तो मैं बुद्धि
नहीं। इससे
यही सिद्ध
होता है कि आप
इन सबसे पृथक
हो।
यदि इस
पृथकत्व को
नहीं जाना और
अष्टधा प्रकृति
के शरीर को
मैं और मेरा
मानते रहे तो
चाहे कितनी भी
उपलब्धियाँ
हो जायें फिर
भी मन में और
पाने की, और
जानने की
इच्छा बनी
रहेगी एवं
मिली हुई
चीजें छूट न जायें
इस बात का भय
बना रहेगा।
पृथकत्व को
यदि ठीक से
जान लिया तो
फिर आपका
अनुभव एवं
श्रीकृष्ण का
अनुभव एक हो
जायगा।
एक होती
अविद्या तथा
दूसरी होती है
विद्या।
अविद्या
अविद्यमान
वस्तुओं में
सत्यबुद्धि
करवा कर जीव
को भटकाती है।
अपरा प्रकृति
के खिलौनों में
जीव उलझ जाता
है। जैसे बालक
मिट्टी के आम, सेवफल
आदि से रस
लेने की कोशिश
करता है एवं
छीन लिए जाने
पर रोता भी है
किन्तु यदि माँ
नकली खिलौने
की जगह असली
आम बालक के
होठों पर रख
देती है तो वह
अपने आप नकली
आम को छोड़
देता है। नकली
खिलौना रस
नहीं देता
किन्तु तब तक
अच्छा लगता है
जब तक नकली को
नकली नहीं
जाना। नकली को
नकली तभी जान
सकते हैं जब
असली का स्वाद
मिलता है।
जब असली
का स्वाद आता
है, परा
प्रकृति को
जरा सा प्रसाद
मिलता है, अपने
सहज
स्वाभाविक
आत्मस्वरूप
की स्मृति आ
जाती है तो
बाहर की तू.. तू..
मैं.. मैं... यह
भोगना है... यह पाना
है.. ये सब फीके
हो जाते हैं।
असली को अगर ठीक
से जान लिया
तो नकली को
आकर्षण से
पिण्ड छूट
जाता है। असली
सुख (ईश्वरीय
सुख) को पा लें
तो नकली
(विकारी सुख)
का प्रभाव
समाप्त हो
जाता है। फिर
जीवात्मा विकारी
सुख में रहता
हुआ भले दिखे
किन्तु वह
होता अपने आप
में ही है।
उठत
बैठत वही
उटाने।
कहत
कबीर हम उसी
ठिकाने।
वास्तव
में देखा जाये
तो जीवमात्र
का शुद्ध स्वरूप
परमात्मा ही
है लेकिन
निकृष्ट
(अपरा)
प्रकृति के
साथ तादात्म्य
करके जीव अपना
स्वरूप भूल
जाता है।
भूल्या
जभी आपनूँ तभी
हुआ खराब।
जो जीव
अपरा प्रकृति
में उलझे हुए
हैं वे नहीं
जानते लेकिन
परा का आश्रय
लेकर जो
परब्रह्म में
जगे हैं ऐसे
महापुरुष
जानते हैं कि
सारी प्रकृति
उसी परमात्मा
का विस्तार
है। ऐसे
भगवत्प्राप्त
महापुरुषों
का संग एवं
साधन-भजन
ईश्वरप्राप्ति
में बड़ी मदद
करते हैं।
जीव अगर
साधन भजन छोड़
दे तो शरीर तो
बना है पंचमहाभूत
एवं मन,
बुद्धि तथा
अहंकार इस
निकृष्ट
प्रकृति से।
अतः वह जीव को
निकृष्ट की
तरफ, विषय-विकारों
की तरफ ही
घसीटकर ले
जायेगा।
लेकिन ज्ञान
के द्वारा,
पुण्य के
द्वारा, समझ
के द्वारा निकृष्ट
शरीर में होते
हुए भी
श्रेष्ठ
आत्मा का
अनुभव किया जा
सकता है।
असत्-जड़-दुःखरूप
शरीर में होते
हुए भी
सत्-चित्-आनन्दस्वरूप
ईश्वर का
अनुभव किया जा
सकता है।
मरणधर्मा मानव
शरीर में अमर
आत्मा का
दीदार किया जा
सकता है।
ये परा
और अपरा दोनों
प्रकृति में
सत्ता भगवान
की, चेतना
भगवान की,
आनंद भगवान
का, माधुर्य भगवान
का है। यही
कारण है कि
आपको आनंद एवं
माधुर्य का
अनुभव होता
है। आप भगवान
के साथ उठते हो,
भगवान के साथ
बैठते हो, भगवान
के साथ सोते
हो, भगवान के
साथ खाते-पीते
हो लेकिन यह
भगवान है ऐसा
पता नहीं है।
यही निकृष्ट
प्रकृति का,
अपरा प्रकृति
का स्वभाव है।
जीवभूतां
महाबाहो..... जो
चैतन्य तो जीव
बना देती है,
वह मेरी परा
प्रकृति है।
वही परा
प्रकृति
सम्पूर्ण जगत
को धारण करती
है। अन्यथा वह
जीवात्मा
वास्तव में तो
परमात्मा का
अभिन्न अंग
है। जीवात्मा
सो परमात्मा। भगवान
श्री कृष्ण ने
भी कहा हैः
ममैवांशो
जीवलोके
जीवभूतः
सनातनः
जीवभाव
पैदा कराने
वाली जो
प्रकृति है,
उसे जीवभूता
कहते हैं और
देह को 'मैं' मानकर
भोग में रूचि
पैदा करती है
वह अपरा
प्रकृति है।
भगवान को
जानकर भगवान
में मिल जाऊँ,
यह परा
प्रकृति का
स्वभाव है
जबकि धन कमा
लूँ... ऐसा बन
जाऊँ... वैसा बन
जाऊँ... यह अपरा
प्रकृति का
स्वभाव है।
जीवन
में कभी अपरा
प्रकृति का
जोर लगता है
तो कभी परा
प्रकृति का।
हम जब सत्संग
में होते हैं
तो लगता है कि
यह परमात्मा वाला
रास्ता ठीक
है, लेकिन जब
संसार में
जाते हैं तो
लगता है कि यह
भी तो करना
चाहिए। यह अपरा
प्रकृति का
प्रभाव है।
इस अपरा
प्रकृति से
बचने के लिए
कोई नियम ले लेना
चाहिए कि इतना
जप तो करना ही
है। अपरा प्रकृति
को मिटाने के
लिए कर्मयोग
करो। दूसरों
को सुख देने
के लिए करो।
भोगों की इच्छा
कर्मयोग करने
से मिटती है
और परमात्मा को
जानने की
इच्छा,
जिज्ञासा
ज्ञानयोग से
पूरी होती है।
इस प्रकार
ज्ञानयोग एवं
कर्मयोग का आश्रय
लेकर अपरा
प्रकृति के
प्रभाव से
अपने को छुड़ा
लो एवं परा
प्रकृति को
सहयोग दो।
एक
कल्पति
दृष्टांत
देता हूँ-
दो भाई
नर्मदा
किनारे नहाने
के लिए गये।
बड़ा भाई
नहाकर निकल
गया। छोटा भाई
नहाने के लिए 2-4
कदम आगे चला
गया। इतने में
मगर ने उसका
पैर पकड़
लिया। पानी
में मगर का
जोर ज्यादा
होता है। वह
छोटे भाई को
घसीटने लगा।।
यह देखकर बड़ा
भाई पानी में
गया एवं छोटे
भाई का हाथ
पकड़कर उसे किनारे
की ओर खींचने
लगा। अब छोटा
भाई किधर जायेगा? मगर की
ओर जायेगा कि
बड़े भाई की
ओर? जिधर वह
स्वयं जोर
लगायेगा उधर
की तरफ उसे सहयोग
मिलेगा। ऐसे
ही बड़ा भाई
है परा
प्रकृति एवं
मगर है अपरा
प्रकृति। जीव
है बीच में।
वह कभी सत्संग
की तरफ, योग की
तरफ खिंचता है
और कभी भोग
उसे अपनी ओर
खींचते हैं।
अब जीव स्वयं
जिस ओर
पुरुषार्थ
करता है, वहीं
से उसे सहयोग मिलता
है।
भगवान
कहते हैं- भिन्ना
प्रकृतिरष्टधा।
जैसे दूध और
दूध की सफेदी,
तेल और तेल की
चिकनाहट
अभिन्न है,
वैसा ही परमात्मा
और परमात्मा
की प्रकृति
अभिन्न है।
जैसे आकाश में
बादल एवं
बादलों में
आकाश है किन्तु
बादलों के
मिटने से आकाश
नहीं मिटता,
वह तो अपनी
महिमा में
स्थित रहता
है। ऐसे ही
भगवान की
प्रकृति
बदलती रहती
है, फिर भी
भगवान का कुछ
बनता-बिगड़ता
नहीं है।
प्रकृति
भगवान की
सत्ता के बिना
कार्य नहीं कर
सकती और प्रकृति
के बिना भगवान
की सत्ता का
खेल दिख नहीं
सकता। जैसे
पावर हाउस से
आने वाले
तारों में विद्यतु
होती है लेकिन
विद्युत
दिखती नहीं
है। वह तो
बल्ब आदि
साधनों
द्वारा ही
दिखती है किन्तु
बल्ब आदि के
टूट जाने से
पावर हाउस का
कुछ बनता
बिगड़ता नहीं
है। ऐसे ही
भगवान की
सत्ता सबमें
ओत-प्रोत है,
लेकिन दिखती
और कार्य करती
है प्रकृति
द्वारा। फिर
भी प्रकृति के
बनने बिगड़ने
से भगवान का
कुछ
बनता-बिगड़ता नहीं
है।
प्रकृति
अर्थात्
स्वभाव। जैसे
पुरुष एवं पुरुष
की शक्ति
अभिन्न है,
वैसे ही
परमात्मा और
परमात्मा की
माया अभिन्न
है। यह अष्टधा
प्रकृति
परमात्म-चेतना
से अभिन्न है।
किन्तु जैसे
प्रकाश में
परिवर्तन
होने से सूर्य
में परिवर्तन
नहीं होता,
वैसे ही अष्टधा
प्रकृति में
परिवर्तन
होने से
परमात्मा में,
आत्मा में कोई
परिवर्तन
नहीं होता।
लेकिन
होता क्या है
कि इस अष्टधा
प्रकृति से
बने शरीर में,
मन में
आनेवाले
सुख-दुःख,
चिन्ता-भय, मान-अपमान
आदि के साथ
मानव जुड़
जाता है एवं
सुखी-दुःखी
होता रहता है।
सुख-दुःख को,
चिन्ता-भय को,
मान-अपमान को
अष्टधा
प्रकृति में
होनेवाला
मानकर एवं
उससे अपने को
पृथक जानकर
मुक्त हो
जाना, यही
मानव की सबसे
बड़ी उपलब्धि
है। यह ऐसी
उपलब्धि जहाँ
जगत के सारे
सुख-दुःख
तुच्छ हो जाते
हैं। इस
उपलब्धि को
पाना आसान भी
है किन्तु
पाने की
जिज्ञासा है
तो बताने वाले
नहीं हैं तो
उपलब्धि के
महत्व का पता
नहीं चलता।
जैसे तरंग पानी से भिन्न नहीं, पा