
अगर
तुम ठान लो, तारे
गगन के तोड़
सकते हो।
अगर
तुम ठान लो, तूफान
का मुख मोड़
सकते हो।।
कहने
का तात्पर्य
यही है कि
जीवन में ऐसा
कोई कार्य
नहीं जिसे
मानव न कर
सके। जीवन में
ऐसी कोई
समस्या नहीं
जिसका समाधान
न हो।
जीवन
में संयम,
सदाचार,
प्रेम,
सहिष्णुता,
निर्भयता,
पवित्रता,
दृढ़
आत्मविश्वास,
सत्साहित्य
का पठन, उत्तम
संग और
महापुरुषों
का मार्गदर्शन
हो तो हमारे
लिए अपना
लक्षय
प्राप्त करना
आसान हो जाता
है। जीवन को
इन सदगुणों से
युक्त बनाने
के लिए तथा
जीवन के
ऊँचे-में-ऊँचे
ध्येय
परमात्म-प्राप्ति
के लिए आदर्श
चरित्रों का
पठन बड़ा
लाभदायक है होता
है।
पूज्य
बापू जी के
सत्संग
प्रवचनों में
से संकलित
महापुरुषों,
देशभक्ति व
साहसी वीर
बालकों के
प्रेरणादायक
जीवन
प्रसंगों का
यह संग्रह
पुस्तक के रूप
में आपके
करकमलों तक पहुँचाने
का बालयत्न
समिति ने किया
है। आप इसका लाभ
लें और इसे
दूसरों तक
पहुँचा कर
पुण्यभागी
बनें।
श्री योग
वेदान्त सेवा
समिति
अमदावाद
आश्रम।
सात
बातें बड़ी
हानिकारक हैं-
अधिक
बोलना, व्यर्थ
का भटकना,
अधिक शयन,
अधिक भोजन,
श्रृंगार, हीन
भावना और
अहंकार।
जीवन
में
निम्नलिखित
आठ गुण हों तो
वह बड़ा यशस्वी
हो जाता हैः
शांत
स्वभाव,
उत्साह,
सत्यनिष्ठा,
धैर्य, सहनशक्ति,
नम्रता, समता,
साहस।
अपनी संस्कृति का आदर करें.....
धर्मनिष्ठ देशभक्त केशवराव हेडगेवार
धर्म के लिए बलिदान देने वाले चार अमर शहीद
जिसके चरणों के रावण भी न हिला सका....
चरित्र
मानव की
श्रेष्ठ
संपत्ति है,
दुनिया की
समस्त
संपदाओं में
महान संपदा
है। पंचभूतों
से निर्मित
मानव-शरीर की
मृत्यु के
बाद, पंचमहाभूतों
में विलीन
होने के बाद
भी जिसका अस्तित्व
बना रहता है,
वह है उसका
चरित्र।
चरित्रवान
व्यक्ति ही
समाज, राष्ट्र
व विश्वसमुदाय
का सही
नेतृत्व और
मार्गदर्शन
कर सकता है।
आज जनता को
दुनियावी
सुख-भोग व
सुविधाओं की
उतनी
आवश्यकता
नहीं है,
जितनी चरित्र
की। अपने
सुविधाओं की
उतनी
आवश्यकता
नहीं है,
जितनी की
चरित्र की।
अपने चरित्र व
सत्कर्मों से
ही मानव चिर
आदरणीय और
पूजनीय हो
जाता है।
स्वामी
शिवानंद कहा
करते थेः
"मनुष्य
जीवन का
सारांश है
चरित्र।
मनुष्य का चरित्रमात्र
ही सदा जीवित
रहता है।
चरित्र का
अर्जन नहीं
किया गया तो
ज्ञान का
अर्जन भी किया
जा सकता। अतः
निष्कलंक
चरित्र का
निर्माण
करें।"
अपने
अलौकिक
चरित्र के
कारण ही आद्य
शंकराचार्य, महात्मा
बुद्ध, स्वामी
विवेकानंद,
पूज्य लीलाशाह
जी बापू जैसे
महापुरुष आज
भी याद किये
जाते हैं।
व्यक्तित्व
का निर्माण
चरित्र से ही
होता है।
बाह्य रूप से
व्यक्ति
कितना ही
सुन्दर क्यों
न हो, कितना ही
निपुण गायक
क्यों न हो,
बड़े-से-बड़ा
कवि या
वैज्ञानिक
क्यों न हो, पर
यदि वह
चरित्रवान न
हुआ तो समाज
में उसके लिए
सम्मानित
स्थान का सदा
अभाव ही
रहेगा। चरित्रहीन
व्यक्ति
आत्मसंतोष और
आत्मसुख से वंचित
रहता है।
आत्मग्लानि व
अशांति
देर-सवेर
चरित्रहीन
व्यक्ति का
पीछा करती ही
है। चरित्रवान
व्यक्ति के
आस-पास
आत्मसंतोष,
आत्मशांति और
सम्मान वैसे
ही मंडराते
हैं. जैसे कमल
के इर्द-गिर्द
भौंरे, मधु के
इर्द-गिर्द
मधुमक्खी व
सरोवर के
इर्द-गिर्द
पानी के
प्यासे।
चरित्र
एक शक्तिशाली
उपकरण है जो
शांति, धैर्य,
स्नेह, प्रेम,
सरलता, नम्रता
आदि दैवी
गुणों को
निखारता है।
यह उस पुष्प
की भाँति है
जो अपना सौरभ
सुदूर देशों
तक फैलाता है।
महान विचार
तथा उज्जवल
चरित्र वाले
व्यक्ति का ओज
चुंबक की
भाँति
प्रभावशाली
होता है।
भगवान
श्रीकृष्ण ने
अर्जुन को
निमित्त बनाकर
सम्पूर्ण
मानव-समुदाय
को उत्तम
चरित्र-निर्माण
के लिए
श्रीमद्
भगवद् गीता के
सोलहवें अध्याय
में दैवी
गुणों का
उपदेश किया
है, जो मानवमात्र
के लिए
प्रेरणास्रोत
हैं, चाहे वह
किसी भी जाति,
धर्म अथवा
संप्रदाय का
हो। उन दैवी
गुणों को
प्रयत्नपूर्वक
अपने आचरण में
लाकर कोई भी
व्यक्ति महान
बन सकता है।
निष्कलंक
चरित्र
निर्माण के
लिए नम्रता,
अहिंसा,
क्षमाशीलता,
गुरुसेवा,
शुचिता,
आत्मसंयम,
विषयों के प्रति
अनासक्ति,
निरहंकारिता,
जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि
तथा दुःखों के
प्रति
अंतर्दृष्टि, निर्भयता,
स्वच्छता,
दानशीलता,
स्वाध्याय, तपस्या,
त्याग-परायणता,
अलोलुपता,
ईर्ष्या, अभिमान,
कुटिलता व
क्रोध का अभाव
तथा शाँति और
शौर्य जैसे
गुण विकसित
करने चाहिए।
कार्य
करने पर एक
प्रकार की आदत
का भाव उदय होता
है। आदत का
बीज बोने से
चरित्र का उदय
और चरित्र का
बीज बोने से
भाग्य का उदय
होता है। वर्तमान
कर्मों से ही
भाग्य बनता
है, इसलिए
सत्कर्म करने
की आदत बना
लें।
चित्त
में विचार, अनुभव
और कर्म से
संस्कार
मुद्रित होते
हैं। व्यक्ति
जो भी सोचता
तथा कर्म करता
है, वह सब यहाँ
अमिट रूप से
मुद्रित हो
जाता है।
व्यक्ति के
मरणोपरांत भी
ये संस्कार
जीवित रहते
हैं। इनके
कारण ही
मनुष्य संसार
में बार-बार
जन्मता-मरता
रहता है।
दुश्चरित्र
व्यक्ति सदा के
लिए
दुश्चरित्र
हो गया – यह
तर्क उचित
नहीं है। अपने
बुरे चरित्र व
विचारों को
बदलने की
शक्ति
प्रत्येक
व्यक्ति में
विद्यमान है।
आम्रपाली
वेश्या, मुगला
डाकू,
बिल्वमंगल,
वेमना योगी,
और भी कई नाम
लिये जा सकते
हैं। एक
वेश्या के
चँगुल में
फँसे व्यक्ति
बिल्वमंगल से
संत सूरदास हो
गये। पत्नी के
प्रेम में दीवाने
थे लेकिन
पत्नी ने
विवेक के दो
शब्द सुनाये
तो वे ही संत
तुलसीदास हो
गये।
आम्रपाली वेश्या
भगवान बुद्ध
की परम भक्तिन
बन कर सन्मार्ग
पर चल पड़ी।
बिगड़ी
जनम अनेक की
सुधरे अब और
आज।
यदि बुरे
विचारों और
बुरी भावनाओं
का स्थान
अच्छे
विचारों और
आदर्शों को
दिया जाए तो
मनुष्य
सदगुणों के
मार्ग में
प्रगति कर सकता
है।
असत्यभाषी
सत्यभाषी बन
सकता है, दुष्चरित्र
सच्चरित्र
में
परिवर्तित हो
सकता है, डाकू
एक नेक इन्सान
ही नहीं ऋषि
भी बन सकता है।
व्यक्ति की
आदतों, गुणों
और आचारों की
प्रतिपक्षी
भावना (विरोधी
गुणों की
भावना) से
बदला जा सकता
है। सतत
अभ्यास से
अवश्य ही सफलता
प्राप्त होती
है। दृढ़
संकल्प और
अदम्य साहस से
जो व्यक्ति
उन्नति के
मार्ग पर आगे
बढ़ता है,
सफलता तो उसके
चरण चूमती है।
चरित्र-निर्माण
का अर्थ होता
है आदतों का
निर्माण। आदत
को बदलने से
चरित्र भी बदल
जाता है। संकल्प,
रूचि, ध्यान
तथा श्रद्धा
से स्वभाव में
किसी भी क्षण
परिवर्तन
किया जा सकता
है। योगाभ्यास
द्वारा भी
मनुष्य अपनी
पुरानी
क्षुद्र
आदतों को
त्याग कर नवीन
कल्याणकारी
आदतों को
ग्रहण कर सकता
है।
आज का
भारतवासी
अपनी बुरी
आदतें बदलकर
अच्छा इन्सान
बनना तो दूर रहा,
प्रत्युत
पाश्चात्य
संस्कृति का
अंधानुकरण
करते हुए और
ज्यादा बुरी
आदतों का
शिकार बनता जा
रहा है, जो
राष्ट्र के
सामाजिक व
नैतिक पतन का
हेतु है।
जिस
राष्ट्र में
पहले
राजा-महाराजा
भी जीवन का
वास्तविक
रहस्य जानने
के लिए,
ईश्वरीय सुख
प्राप्त करने
के लिए
राज-पाट,
भौतिक सुख-सुविधाओं
को त्यागकर
ब्रह्मज्ञानी
संतों की खोज
करते थे, वहीं
विषय-वासना व
पाश्चात्य
चकाचौंध पर
लट्टू होकर कई
भारतवासी
अपना पतन आप
आमंत्रित कर रहे
हैं।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
साधक के
जीवन में,
मनुष्य मात्र
के जीवन में अपने
लक्ष्य की
स्मृति और
तत्परता होनी
ही चाहिए। जो
काम जिस समय
करना चाहिए कर
ही लेना चाहिए।
संयम और
तत्परता
सफलता की
कुंजी है।
लापरवाही और
संयम का अनादर
विनाश का कारण
है। जिस काम
को करें, उसे
ईश्वर का कार्य
मान कर साधना
का अंग बना
लें। उस काम
में से ही
ईश्वर की
मस्ती का आनंद
आने लग
जायेगा।
दो
किसान थे।
दोनों ने
अपने-अपने
बगीचे में पौधे
लगाये। एक
किसान ने बड़ी
तत्परता से और
ख्याल रखकर
सिंचाई की,
खाद पानी
इत्यादि
दिया। कुछ ही
समय में उसका
बगीचा सुंदर
नंदनवन बन
गया। दूर-दूर
से लोग उसके
बगीचे में आने
लगे और खूब
कमाई होने
लगी।
दूसरे
किसान ने भी
पौधे तो लगाये
थे लेकिन उसने
ध्यान नहीं
दिया,
लापरवाही की,
अनियमित खाद-पानी
दिये।
लापरवाही की
तो उसको
परिणाम वह नहीं
मिला। उसका
बगीचा उजाड़
सा दिखता था।
अब पहले
किसान को तो
खूब यश मिलने
लगा, लोग उसको
सराहने लगे।
दूसरा किसान
अपने भाग्य को
कोसने लगा,
भगवान को दोषी
ठहराने लगा।
अरे भाई ! भगवान
ने सूर्य कि
किरणें और
वृष्टि तो
दोनों के लिए
बराबर दी थी,
दोनों के पास
साधन थे, लेकिन
दूसरे किसान
में कमी थी
तत्परता व
सजगता की, अतः
उसे वह परिणाम
नहीं मिल
पाया।
पहले
किसान का
तत्पर व सजग
होना ही उसकी
सफलता का कारण
था और दूसरे
किसान की
लापरवाही ही
उसकी विफलता
का कारण थी।
अब जिसको यश
मिल रहा है वह
बुद्धिमान
किसान कहता है
कि 'यह सब भगवान
की लीला है' और
दूसरा भगवान
को दोषी
ठहराता है।
पहला किसान
तत्परता व
सजगता से काम
करता है और
भगवान की
स्मृति रखता
है। तत्परता व
सजगता से काम
करने वाला
व्यक्ति कभी
विफल नहीं
होता और कभी विफल
हो भी जाता है
तो विफलता का
कारण खोजता है।
विफलता का
कारण ईश्वर और
प्रकृति नहीं
है। बुद्धिमान
व्यक्ति अपनी
बेवकूफी
निकालते हैं
और तत्परता
तथा सजगता से
कार्य करते
हैं।
एक होता
है आलस्य और
दूसरा होता है
प्रमाद। पति
जाते-जाते
पत्नी को कह
गयाः "मैं जा
रहा हूँ।
फैक्टरी में
ये-ये काम
हैं। मैनेजर
को बता देना।" दो
दिन बाद पति
आया और पत्नी
से पूछाः "फैक्टरी
का काम कहाँ
तक पहुँचा?"
पत्नी
बोलीः "मेरे तो
ध्यान में ही
नहीं रहा।"
यह आलस्य
नहीं है,
प्रमाद है।
किसी ने कुछ
कार्य कहा कि
इतना कार्य कर
देना। बोलेः "अच्छा,
होगा तो देखते
हैं।" ऐसा
कहते हुए काम
भटक गया। यह
है आलस्य।
आलस
कबहुँ न कीजिए, आलस
अरि सम जानि।
आलस
से विद्या घटे, सुख-सम्पत्ति
की हानि।।
आलस्य और
प्रमाद
मनुष्य की
योग्याताओं
के शत्रु हैं।
अपनी योग्यता
विकसित करने
के लिए भी तत्परता
से कार्य करना
चाहिए। जिसकी
कम समय में
सुन्दर,
सुचारू व
अधिक-से-अधिक
कार्य करने की
कला विकसित
है, वह
आध्यात्मिक
जगत में जाता
है तो वहाँ भी
सफल हो जायगा
और लौकिक जगत
में भी। लेकिन
समय बरबाद
करने वाला,
टालमटोल करने
वाला तो
व्यवहार में
भी विफल रहता
है और परमार्थ
में तो सफल हो
ही नहीं सकता।
लापरवाह,
पलायनवादी
लोगों को सुख
सुविधा और भजन
का स्थान भी
मिल जाय लेकिन
यदि कार्य
करने में
तत्परता नहीं
है, ईश्वर में
प्रीति नहीं
है, जप में
प्रीति नहीं
है तो ऐसे
व्यक्ति को
ब्रह्माजी भी
आकर सुखी करना
चाहें तो सुखी
नहीं कर सकते।
ऐसा व्यक्ति
दुःखी ही
रहेगा।
कभी-कभी
दैवयोग से उसे
सुख मिलेगा तो
आसक्त हो
जायेगा और
दुःख मिलेगा
तो बोलेगाः "क्या
करें? जमाना
ऐसा है।" ऐसा
करकर वह
फरियाद ही
करेगा।
काम-क्रोध
तो मनुष्य के
वैरी हैं ही,
परंतु लापरवाही,
आलस्य, प्रमाद
– ये मनुष्य की
योग्याओं के
वैरी हैं।
अदृढ़ं
हतं ज्ञानम्।
'भागवत' में
आता है कि
आत्मज्ञान
अगर अदृढ़ है
तो मरते समय
रक्षा नहीं
करता।
प्रमादे
हतं श्रुतम्।
प्रमाद
से जो सुना है
उसका फल और
सुनने का लाभ बिखर
जाता है। जब
सुनते हैं तब
तत्परता से
सुनें। कोई
वाक्य या शब्द
छूट न जाय।
संदिग्धो
हतो मंत्रः
व्यग्रचित्तो
हतो जपः।
मंत्र
में संदेह हो
कि 'मेरा यह
मंत्र सही है
कि नहीं? बढ़िया
है कि नहीं?' तुमने
जप किया और
फिर संदेह
किया तो केवल
जप के प्रभाव
से थोड़ा बहुत
लाभ तो होगा
लेकिन पूर्ण
लाभ तो निःसंदेह
होकर जप करने
वाले को हो ही
होगा। जप तो
किया लेकिन
व्यग्रचित्त
होकर बंदर-छाप
जप किया तो
उसका फल क्षीण
हो जाता है।
अन्यथा एकाग्रता
और
तत्परतापूर्वक
जप से बहुत
लाभ होता है।
समर्थ रामदास
ने तत्परता से
जप कर साकार
भगवान को
प्रकट कर दिया
था। मीरा ने
जप से बहुत
ऊँचाई पायी
थी। तुलसीदास
जी ने जप से ही
कवित्व शक्ति
विकसित की थी।
जपात्
सिद्धिः
जपात्
सिद्धिः
जपात् सिद्धिर्न
संशयः।
जब तक
लापरवाही है,
तत्परता नहीं
है तो लाख
मंत्र जपो,
क्या हो जायेगा?
संयम और
तत्परता से
छोटे-से-छोटे
व्यक्ति को महान
बना देती है
और संयम का
त्याग करके
विलासिता और
लापरवाही पतन
करा देती है।
जहाँ विलास
होगा, वहाँ
लापरवाही आ
जायेगी।
पापकर्म, बुरी
आदतें
लापरवाही ले
आते हैं, आपकी
योग्यताओं को
नष्ट कर देते
है और तत्परता
को हड़प लेते
हैं।
किसी देश
पर शत्रुओं ने
आक्रमण की
तैयारी की। गुप्तचरों
द्वारा राजा
को समाचार
पहुँचाया गया
कि शत्रुदेश
द्वारा सीमा
पर ऐसी-ऐसी
तैयारियाँ हो
रही हैं। राजा
ने मुख्य
सेनापति के
लिए संदेशवाहक
द्वारा पत्र
भेजा।
संदेशवाहक की
घोड़ी के पैर
की नाल में से
एक कील निकल
गयी थी। उसने
सोचाः 'एक कील ही
तो निकल गयी
है, कभी ठुकवा
लेंगे।' उसने
थोड़ी
लापरवाही की।
जब संदेशा
लेकर जा रहा
था तो उस
घोड़ी के पैर
की नाल निकल
पड़ी। घोड़ी
गिर गयी।
सैनिक मर गया।
संदेश न पहुँच
पाने के कारण
दुश्मनों ने
आक्रमण कर
दिया और देश
हार गया।
कील न
ठुकवायी....
घोड़ी गिरी....
सैनिक मरा....
देश हारा।
एक छोटी
सी कील न
लगवाने की
लापरवाही के
कारण पूरा देश
हार गया। अगर
उसने उसी समय
तत्पर होकर
कील लगवायी
होती तो ऐसा न
होता। अतः जो
काम जब करना
चाहिए, कर ही
लेना चाहिए।
समय बरबाद
नहीं करना चाहिए।
आजकल
ऑफिसों में
क्या हो रहा
है? काम में
टालमटोल।
इंतजार
करवाते हैं।
वेतन पूरा
चाहिए लेकिन
काम बिगड़ता
है। देश की व
मानव-जाति की
हानि हो रही
है। सब
एक-दूसरे के
जिम्मे
छोड़ते हैं।
बड़ी बुरी
हालत हो रही
है हमारे देश
की जबकि जापान
आगे आ रहा है,
क्योंकि वहाँ तत्परता
है। इसीलिए
इतनी तेजी से
विकसित हो गया।
महाराज ! जो
व्यवहार में
तत्पर नहीं है
और अपना
कर्तव्य नहीं
पालता, वह अगर
साधु भी बन
जायेगा तो क्या
करेगा?
पलायनवादी
आदमी जहाँ भी
जायेगा, देश
और समाज के
लिए बोझा ही
है। जहाँ भी
जायेगा, सिर
खपायेगा।
भगवान
श्रीकृष्ण ने
उद्धव,
सात्यकि,
कृतवर्मा से
चर्चा
करते-करते
पूछाः "मैं
तुम्हें पाँच
मूर्खों,
पलायनवादियों
के साथ स्वर्ग
में भेजूँ यह
पसंद करोगे कि
पाँच बुद्धिमानों
के साथ नरक
में भेजूँ यह
पसंद करोगे?"
उन्होंने कहाः "प्रभु
!
आप कैसा
प्रश्न पूछते
हैं? पाँच
पलायनवादी-लापरवाही
अगर स्वर्ग
में भी जायेंगे
तो स्वर्ग की
व्यवस्था ही
बिगड़ जायेगी
और अगर पाँच
बुद्धिमान व
तत्पर
व्यक्ति नरक
में जायेंगे
तो
कार्यकुशलता
और योग्यता से
नरक का नक्शा
ही बदल
जायेगा, उसको
स्वर्ग बना
देंगे।"
पलायनवादी,
लापरवाही
व्यक्ति
घर-दुकान,
दफ्तर और
आश्रम, जहाँ
भी जायेगा
देर-सवेर असफल
हो जायेगा।
कर्म के पीछे
भाग्य बनता
है, हाथ की रेखाएँ
बदल जाती हैं,
प्रारब्ध बदल
जाता है। सुविधा
पूरी चाहिए
लेकिन
जिम्मेदारी
नहीं, इससे लापरवाह
व्यक्ति
खोखला हो जाता
है। जो
तत्परता से
काम नहीं
करता, उसे
कुदरत दुबारा
मनुष्य-शरीर
नहीं देती। कई
लोग अपने-आप
काम करते हैं,
कुछ लोग ऐसे होते
हैं, जिनसे
काम लिया जाता
है लेकिन
तत्पर
व्यक्ति को
कहना नहीं
पड़ता। वह
स्वयं कार्य करता
है। समझ
बदलेगी तब
व्यक्ति बदलेगा
और व्यक्ति
बदलेगा तब
समाज और देश
बदलेगा।
जो
मनुष्य-जन्म
में काम
कतराता है, वह
पेड़ पौधा पशु
बन जाता। फिर
उससे डंडे
मार-मार कर,
कुल्हाड़े
मारकर काम
लिया जाता है।
प्रकृति दिन रात
कार्य कर रही
है, सूर्य दिन
रात कार्य कर
रहा है, हवाएँ
दिन रात कार्य
कर रही हैं,
परमात्मा दिन
रात चेतना दे
रहा है। हम अगर
कार्य से
भागते फिरते
हैं तो स्वयं
ही अपने पैर
पर कुल्हाड़ा
मारते हैं।
जो काम, जो
बात अपने बस
की है, उसे
तत्परता से करो।
अपने कार्य को
ईश्वर की पूजा
समझो। राजव्यवस्था
में भी अगर
तत्परता नहीं
है तो तत्परता
बिगड़ जायेगी।
तत्परता से जो
काम
अधिकारियों
से लेना है, वह
नहीं लेते
क्योंकि
रिश्वत मिल
जाती है और वे
लापरवाह हो
जाते हैं। इस
देश में 'ऑपरेशन' की
जरूरत है। जो
काम नहीं करता
उसको तुरंत सजा
मिले, तभी देश
सुधरेगा।
शत्रु या
विरोधी पक्ष
की बात भी यदि
देश व मानवता
के हित की हो
तो उसे आदर से
स्वीकार करना
चाहिए और अपने
वाले की बात
भी यदि देश के,
धर्म के अनुकूल
नहीं हो तो
उसे नहीं
मानना चाहिए।
आप लोग
जहाँ भी हो,
अपने जीवन को
संयम और तत्परता
से ऊपर उठाओ।
परमात्मा
हमेशा उन्नति
में साथ देता
है। पतन में
परमात्मा साथ
नहीं देता।
पतन मे हमारी
वासनाएँ,
लापरवाही काम
करती है।
मुक्ति के
रास्ते भगवान
साथ देता है,
प्रकृति साथ
देती है। बंधन
के लिए तो
हमारी
बेवकूफी, इन्द्रियों
की गुलामी,
लालच र हलका
संग ही कारणरूप
होता है। ऊँचा
संग हो तो
ईश्वर भी
उत्थान में
साथ देता है।
यदि हम ईश्वर
का स्मरण करें
तो चाहे हमें
हजार फटकार
मिलें, हजारों
तकलीफें आयें
तो भी क्या? हम तो
ईश्वर का संग
करेंगे,
संतों-शास्त्रों
की शरण
जायेंगे,
श्रेष्ठ संग
करेंगे और
संयमी व तत्पर
होकर अपना
कार्य
करेंगे-यही
भाव रखना चाहिए।
हम सब
मिलकर संकल्प
करें कि
लापरवाही,
पलायनवाद को
निकालकर,
संयमी और
तत्पर होकर
अपने को बदलेंगे,
समाज को
बदलेंगे और
लोक कल्याण
हेतु तत्पर
होकर देश को
उन्नत
करेंगे।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
जीवन में
सर्वांगीण
उन्नति के लिए
चार प्रकार के
बल जरूरी हैं-
शारीरिक बल,
मानसिक बल,
बौद्धिक बल,
संगठन बल।
पहला बल
है शारीरिक
बल। शरीर
तन्दरुस्त
होना चाहिए।
मोटा होना
शारीरिक बल
नहीं है वरन्
शरीर का
स्वस्थ होना
शारीरिक बल
है।
दूसरा बल
है मानसिक बल।
जरा-जरा बात
में क्रोधित
हो जाना,
जरा-जरा बात में
डर जाना, चिढ़
जाना – यह
कमजोर मन की
निशानी है।
जरा-जरा बात
में घबराना
नहीं चाहिए,
चिन्तित-परेशान
नहीं होना चाहिए
वरन् अपने मन
को मजबूत
बनाना चाहिए।
तीसरा बल
है बुद्धिबल।
शास्त्र का
ज्ञान पाकर
अपना, कुल का,
समाज का, अपने
राष्ट्र का
तथा पूरी
मानव-जाति का
कल्याण करने
की जो बुद्धि
है, वही
बुद्धिबल है।
शारीरिक,
मानसिक और
बौद्धिक बल तो
हो, किन्तु संगठन-बल
न हो तो
व्यक्ति
व्यापक कार्य
नहीं कर सकता।
अतः जीवन में
संगठन बल का
होना भी आवश्यक
है।
ये चारों
प्रकार के बल
कहाँ से आते
हैं? इन सब
बलों का मूल
केन्द्र है आत्मा।
अपना
आत्मा-परमात्मा
विश्व के सारे
बलों का महा
खजाना है।
बलवानों का
बल, बुद्धिमानों
की बुद्धि,
तेजस्वियों
का तेज,
योगियों का योग-सामर्थ्य
सब वहीं से
आते हैं।
ये चारों
बल जिस
परमात्मा से
प्राप्त होते
हैं, उस
परमात्मा से
प्रतिदिन
प्रार्थना
करनी चाहिएः
'हे
भगवान ! तुझमें
सब शक्तियाँ
हैं। हम तेरे
हैं, तू हमारा
है। तू पाँच
साल के ध्रुव
के दिल में
प्रकट हो सकता
है, तू
प्रह्लाद के
आगे प्रकट हो
सकता है.... हे
परमेश्वर ! हे
पांडुरंग ! तू
हमारे दिल में
भी प्रकट
होना....'
इस
प्रकार
हृदयपूर्वक,
प्रीतिपूर्वक
व शांतभाव से
प्रार्थना
करते-करते
प्रेम और
शांति में
सराबोर होते
जाओ।
प्रभुप्रीति
और प्रभुशांति
सामर्थ्य की
जननी है। संयम
और धैर्यपूर्वक
इन्द्रियों
को नियंत्रित
रखकर परमात्म-शांति
में अपनी
स्थिति
बढ़ाने वाले
को इस आत्म-ईश्वर
की संपदा
मिलती जाती
है। इस प्रकार
प्रार्थना
करने से
तुम्हारे
भीतर
परमात्म-शांति
प्रकट होती
जायेगी और
परमात्म-शांति
से आत्मिक
शक्तियाँ
प्रकट होती
हैं, जो
शारीरिक, मानसिक,
बौद्धिक और
संगठन बल को
बड़ी आसानी से
विकसित कर
सकती है।
हे
विद्यार्थियो
!
तुम भी
आसन-प्राणायाम
आदि के द्वारा
अपने तन को
तन्दरुस्त
रखने की कला
सीख लो।
जप-ध्यान आदि
के द्वारा मन
को मजबूत
बनाने की
युक्ति जान
लो। संत-महापुरुषों
के श्रीचरणों
में आदरसहित
बैठकर उनकी
अमृतवाणी का
पान करके तथा
शास्त्रों का
अध्ययन कर
अपने बौद्धिक
बल को बढ़ाने
की कुंजी जान
लो और आपस में
संगठित होकर
रहो। यदि
तुम्हारे
जीवन में ये
चारों बल आ
जायें तो फिर
तुम्हारे लिए
कुछ भी असंभव
न होगा।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
किसी
गाँव का एक
लड़का
पढ़-लिखकर
पैसे कमाने के
लिए विदेश
गया। शुरु में
तो उसे कहीं
ठिकाना न
मिला, परंतु
धीरे-धीरे
पेट्रोल पंप
आदि जगहों पर
काम करके कुछ
धन कमाया और
भारत आया। अब
उसके लिए अपना
देश भारत 'भारत'
नहीं रहा, 'इंडिया' हो
गया।
परदेश के
वातावरण,
बाह्य
चकाचौंध तथा
इन्द्रियगत
ज्ञान से उसकी
बुद्धि इतनी
प्रभावित हो गयी
थी की वह
सामान्य
विवेक तक भूल
गया था। पहले
तो वह रोज
माता-पिता को
प्रणाम करता
था, किंतु आज
दो वर्ष के
बाद इतनी दूर
से आने पर भी
उसने पिता को
प्रणाम न किया
बल्कि बोलाः
"ओह, पापा
!
कैसे हो?"
पिता की
तीक्ष्ण
नजरों ने परख
लिया कि पुत्र
का व्यवहार
बदल गया है।
दूसरे दिन
पिता ने पुत्र
से कहाः
"चलो,
बेटा ! गाँव में
जरा चक्कर
लगाकर आयें और
सब्जी भी ले
आयें।"
पिता
पुत्र दोनों
गये। पिता ने
सब्जीवाले से
250 ग्राम
गिल्की तौलने
के लिए कहा।
पुत्रः "पापा
!
आपके इंडिया
में इतनी
छोटी-छोटी
गिल्की? हमारे
अमेरिका में
तो इससे दुगनी
बड़ी गिल्की
होती है।"
अब
इंडिया उसका
अपना न रहा,
पिता का हो
गया। कैसी समझ
!
अपने देश से
कोई पढ़ने या
पैसा कमाने के
लिए परदेश जाय
तो ठीक है,
किंतु कुछ समय
तक वहाँ रहने
के बाद वहाँ
की बाह्य
चकाचौंध से
आकर्षित होकर
अपने देश का
गौरव तथा अपनी
संस्कृति भूल
जाय, वहाँ की
फालतू बातें
अपने दिमाग
में भल ले और
यहाँ आने पर
अपने
बुद्धिमान
बड़े-बुजुर्गों
के साथ ऐसा
व्यवहार करें,
इससे अधिक
दूसरी क्या
मूर्खता होगी?
पिता कुछ
न बोले। थोड़ा
आगे गये। पिता
ने 250 ग्राम
भिंडी
तुलवायी। तब
पुत्र बोलाः
"ह्वाट
इज़ दिस, पापा? इतनी
छोटी भिंडी !
हमारे
अमेरिका में
तो बहुत
बड़ी-बड़ी
भिंडी होती
है।"
पिता को
गुस्सा आया
किंतु वे
सत्संगी थे,
अतः अपने मन
को समझाया कि
कबसे डींग
हाँक रहा है... मौका
देखकर समझाना
पड़ेगा।
प्रकट में
बोलेः
"पुत्र !
वहाँ सब ऐसा
खाते होंगे तो
उनका शरीर भी
ऐसा ही भारी-भरकम
होगा और उनकी
बुद्धि भी
मोटी होगी। भारत
में तो हम
सात्त्विक
आहार लेना
पसन्द करते
हैं, अतः
हमारे
मन-बुद्धि भी
सात्त्विक
होते हैं।"
चलते-चलते
उनकी तरबूज के
ढेर पर गयी।
पुत्र ने कहाः
"पापा
!
हम वॉटरमेलन
(तरबूज) लेंगे?"
पिता ने
कहाः "बेटा ! ये
नींबू हैं।
अभी कच्चे
हैं, पकेंगे
तब लेंगे।"
पुत्र
पिता की बात
का अर्थ समझ
गया और चुप हो
गया।
परदेश का
वातावरण ठंडा
और वहाँ के
लोगों का आहार
चर्बीयुक्त
होने से उनकी
त्वचा गोरी
तथा शरीर का
कद अधिक होता
है। भौतिक
सुख-सुविधाएँ
कितनी भी हों,
शरीर चाहे
कितना भी
हृष्ट-पुष्ट
और गोरा हो लेकिन
उससे आकर्षित
नहीं होना
चाहिए।
वहाँ की
जो अच्छी बाते
हैं उनको तो
हम लेते नहीं,
किंतु वहाँ के
हलके
संस्कारों के
हमारे युवान
तुरंत ग्रहण
कर लेते हैं।
क्यों? क्योंकि
अपनी
संस्कृति के
गौरव से वे
अपरिचित हैं।
हमारे
ऋषि-मुनियों
द्वारा
प्रदत्त
ज्ञान की महिमा
को उन्होंने
अब तक जाना
नहीं है। राम
तत्त्व के,
कृष्ण तत्त्व
के,
चैतन्य-तत्त्व
के ज्ञान से
वे अनभिज्ञ
हैं।
वाईन
पीने वाले,
अण्डे-मांस-मछली
खाने वाले परदेश
के लेखकों की
पुस्तकें खूब
रुपये खर्च करके
भारत के युवान
पढ़ते हैं,
किंतु अपने
ऋषि मुनियों
ने वल्कल पहनकर,
कंदमूल, फल और
पत्ते खाकर,
पानी और हवा
पर रहकर
तपस्या-साधना
की, योग की
सिद्धियाँ
पायीं,
आत्मा-परमात्मा
का ज्ञान पाया
और इसी जीवन में
जीवनदाता से
मुलाकात हो
सके ऐसी
युक्तियाँ
बताने वाले
शास्त्र रचे।
उन शास्त्रों
को पढ़ने का
समय ही आज के
युवानों के
पास नहीं है।
उपन्यास,
अखबार और अन्य
पत्र-पत्रिकाएँ
पढ़ने को समय
मिलता है, मन
मस्तिष्क को
विकृत करने
वाले तथा
व्यसन, फैशन
और विकार
उभारने वाले
चलचित्र व
चैनल देखने को
समय मिलता है,
फालतू गपशप
लगाने को समय
मिलता है, शरीर
को बीमार करने
वाले अशुद्ध
खान-पान के
लिए समय मिलता
है, व्यसनों
के मोह में
पड़कर मृत्यु
के कगार पर
खड़े होने के
लिए समय मिलता
है
लेकिन
सत्शास्त्र
पढ़ने के लिए,
ध्यान-साधना
करके तन को
तन्दुरुस्त,
मन को प्रसन्न
और बुद्धि को
बुद्धिदाता
में लगाने के
लिए उनके पास
समय ही नहीं
है। खुद की,
समाज की,
राष्ट्र की
उन्नति में
सहभागी होने
की उनमें रुचि
ही नहीं है।
हे भारत
के युवानो ! इस विषय
में गंभीरता
से सोचने का
समय आ गया है।
तुम इस देश के
कर्णधार हो।
तुम्हारे
संयम, त्याग,
सच्चरित्रता,
समझ और
सहिष्णुता पर
ही भारत की
उन्नति
निर्भर है।
वृक्ष,
कीट, पशु,
पक्षी आदि
योनियों में
जीवन प्रकृति
के
नियमानुसार
चलता है। उन्हें
अपने विकास की
स्वतंत्रता
नहीं होती है
लेकिन तुम
मनुष्य हो।
मनुष्य जन्म
में कर्म करने
की
स्वतन्त्रता
होती है।
मनुष्य अपनी
उन्नति के लिए
पुरुषार्थ कर
सकता है,
क्योंकि
परमात्मा ने
उसे समझ दी है,
विवेक दिया
है।
अगर तुम
चाहते हो सफल
उद्योगपति,
सफल अभियंता,
सफल चिकित्सक,
सफल नेता आदि
बनकर राष्ट्र
के विकास में
सहयोगी हो
सकते हो, साथ
ही किसी ब्रह्मवेत्ता
महापुरुष का
सत्संग-सान्निध्य
तथा
मार्गदर्शन
पाकर अपने
शिवत्व में भी
जाग सकते हो।
इसीलिए
तुम्हें यह
मानव तन मिला
है।
भर्तृहरि
ने भी कहा हैः
यावत्स्वस्थमिदं
कलेवरगृहं
यावच्च दूरे जरा
यावच्चेन्द्रियशक्तिरप्रतिहता
यावत्क्षयो
नायुषः।
आत्मश्रेयसि
तावदेव
विदुषा
कार्यः
प्रयत्नो
महान्
प्रोद्दीप्ते
भवने च
कूपखननं
प्रत्युद्यमः
कीदृशः।।
"जब तक
काया स्वस्थ
है और
वृद्धावस्था
दूर है, इन्द्रियाँ
अपने-अपने
कार्यों को
करने में अशक्त
नहीं हुई हैं
तथा जब तक आयु
नष्ट नहीं हुई
है, तब तक
विद्वान
पुरुष को अपने
श्रेय के लिए
प्रयत्नशील
रहना चाहिए।
घर में आग लग
जाने पर कुआँ
खोदने से क्या
लाभ?"
(वैराग्यशतकः
75)
अतः हे
महान देश के
वासी ! बुढ़ापा,
कमजोरी व
लाचारी आ
घेरे, उसके
पहले अपनी
दिव्यता को,
अपनी महानता
को, महान पद को
पा लो, प्रिय !
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
अपने ढाई
वर्ष के
अमरीकी
प्रवास में
स्वामी रामतीर्थ
को
भेंटस्वरूप
जो प्रचुर
धनराशि मिली
थी, वह सब
उन्होंने
अन्य देशों के
बुभुक्षितों
के लिए
समर्पित कर
दी। उनके पास
रह गयी केवल
एक अमरीकी
पोशाक।
स्वामी राम ने
अमरीका से
वापस लौट आने
के बाद एक वह
पोशाक पहनी।
कोट पैंट तो
पहनने के बजाय
उन्होंने
कंधों से लटका
लिये और
अमरीकी जूते
पाँव में
डालकर खड़े हो
गये, किंतु
कीमती टोपी की
जगह उन्होंने
अपना सादा
साफा ही सिर
पर बाँधा।
जब उनसे
पूछा गया कि 'इतना
सुंदर हैट तो
आपने पहना ही
नहीं?' तो बड़ी
मस्ती से
उन्होंने
जवाब दियाः 'राम
के सिर माथे
पर तो हमेशा
महान भारत ही
रहेगा, अलबत्ता
अमरीका
पाँवों में
पड़ा रह सकता
है....' इतना कह
उन्होंने
नीचे झुककर
मातृभूमि की
मिट्टी उठायी
और उसे माथे
पर लगा लिया।
ॐॐॐॐ
विद्यालय
में बच्चों को
मिठाई बाँटी
जा रही थी। जब
एक 11 वर्ष के
बालक केशव को
मिठाई का
टुकड़ा दिया
गया तो उसने
पूछाः "यह
मिठाई किस बात
की है?"
कैसा
बुद्धिमान
रहा होगा वह
बालक ! जीभ का
लंपट नहीं
वरन् विवेक
विचार का धनी
होगा।
बालक को
बताया गयाः "आज
महारानी
विक्टोरिया
का बर्थ डे
(जन्मदिन) है
इसलिए खुशी
मनायी जा रही
है।"
बालक ने
तुरंत मिठाई
के टुकड़े को
नाली में फेक
दिया और कहाः "रानी
विक्टोरिया
अंग्रेजों की
रानी है और उन अंग्रजों
ने हमको गुलाम
बनाया है।
गुलाम बनाने
वालों के
जन्मदिन की
खुशियाँ हम
क्यों मनायें? हम
तो खुशियाँ तब
मनायेंगे जब
हम अपने देश
भारत को आजाद
करा लेंगे।"
वह
बुद्धिमान
बालक केशव जब
नागपुर के 'नीलसिटी
हाई स्कूल' में
पढ़ता था, तब
उसने देखा कि
अंग्रेज जोर
जुल्म करके
हमें हमारी
संस्कृति से,
हमारे धर्म से,
हमारी
मातृभक्ति से
दूर कर रहे
हैं। यहाँ तक
कि वन्दे
मातरम्
कहने पर भी
प्रतिबन्ध
लगा दिया है !
वह
धैर्यवान और
बुद्धिमान
लड़का हर
कक्षा के
प्रमुख से मिला
और उनके साथ
गुप्त बैठक
की। उसने कहाः
"हम
अपनी
मातृभूमि में
रहते हैं और
अंग्रेज सरकार
द्वारा हमें
ही वन्दे
मातरम् कहने
से रोका जाता
है। अंग्रेज
सरकार की
ऐसी-तैसी...."
जो
हिम्मतवान और
बुद्धिमान
लड़के थे
उन्होंने
केशव का साथ
दिया और सभी
ने मिलकर तय
किया कि क्या
करना है।
लेकिन 'यह बात
गुप्त रखनी है
और नेता का
नाम नहीं लेना
है।' यह बात
प्रत्येक
कक्षा-प्रमुख
ने तय कर ली।
ज्यों ही
स्कूल का
निरीक्षण
बड़ा अधिकारी
और कुछ लोग
केशव की कक्षा
में आये,
त्यों ही उसके
साथ कक्षा के
सभी बच्चे
खड़े हो गये
और बोल पड़ेः वन्दे
मातरम् ! शिक्षक
भारतीय तो थे
लेकिन
अंग्रेजों की
गुलामी से
जकड़े हुए,
अतः चौंके।
निरीक्षक
हड़बड़ाकर
बोलेः यह क्या
बदतमीजी है? यह वन्दे
मातरम् किसने
सिखाया? उसको
खोजो पकड़ो।
दूसरी
कक्षा में
गये। वहाँ भी
बच्चों ने
खड़े होकर
कहाः वन्दे
मातरम् !
अधिकारीः
ये भी बिगड़
गये?
स्कूल की
हर एक कक्षा
के
विद्यार्थियों
ने ऐसा ही
किया।
अंग्रेज
अधिकारी
बौखला गया और
चिल्लायाः 'किसने
दी यह सीख?'
सब बच्चों
से कहा गया
परंतु किसी ने
नाम नहीं
बताया।
अधिकारी
ने कहाः "तुम
सबको स्कूल से
निकाल देंगे।"
बच्चे
बोलेः "तुम
क्या
निकालोगे? हम ही
चले। जिस
स्कूल में हम
अपनी
मातृभूमि की
वंदना न कर
सकें, वन्दे
मातरम् न कह
सकें – ऐसे
स्कूल में
हमें नहीं
पढ़ना।
उन दुष्ट
अधिकारियों
ने सोचा कि अब
क्या करें? फिर
उन्होंने
बच्चों के माँ
बाप पर दबाव
डाला कि
बच्चों को
समझाओ, सिखाओ
ताकि वे माफी
माँग लें।
केशव के
माता पिता ने
कहाः "बेटा ! माफी
माँग लो।"
केशवः "हमने
कोई गुनाह
नहीं किया तो
माफी क्यों
माँगे?"
किसी ने
केशव से कहाः "देशसेवा
और लोगों को
जगाने की बात
इस उम्र में
मत करो, अभी तो
पढ़ाई करो।"
केशवः "बूढ़े-बुजुर्ग
और अधिकारी
लोग मुझे
सिखाते हैं कि
देशसेवा बाद
में करना। जो
काम आपको करना
चाहिए वह आप
नहीं कर रहे
हैं, इसलिए हम
बच्चों को
करना पड़ेगा।
आप मुझे अक्ल
देते हैं?
अंग्रेज हमें
दबोच रहे हैं,
हमें गुलाम
बनाये जा रहे
हैं तथा
हिन्दुओं का
धर्मांतरण
कराये जा रहे
हैं और आप
चुप्पी साधे
जुल्म सह रहे
हैं? आप जुल्म
के सामने लोहा
लेने का
संकल्प करें तो
पढ़ाई में लग
जाऊँगा, नहीं
तो पढ़ाई के
साथ देश की
आजादी की पढ़ाई
भी मैं
पढ़ूँगा और
दूसरे
विद्यार्थियों
को भी मजबूत
बनाऊँगा।"
आखिर
बडे-बूढ़े-बुजुर्गों
को कहना पड़ाः
"यह
भले 14 वर्ष का
बालक लगता है
लेकिन है कोई
होनहार।"
उन्होंने
केशव की पीठ
थपथपाते हुए
कहाः "शाबाश है,
शाबाश!"
"आप मुझे
शाबाशी तो
देते हैं
लेकिन आप भी जरा
हिम्मत से काम
लें। जुल्म
करना तो पाप
है लेकिन
जुल्म सहना
दुगना पाप है।"
केशव ने
बूढ़े-बुजुर्गों
को सरलता से,
नम्रता से,
धीरज से
समझाया।
डेढ़
महीने बाद वह
स्कूल चालू
हुई। अंग्रेज
शासक 14 वर्षीय
बालक का लोहा
मान गये कि
उसके आगे हमारे
सारे षडयंत्र
विफल हो गये।
उस लड़के के
पाँच मित्र
थे। वैसे ये
पाँच मित्र
रहते तो सभी
विद्यार्थियों
के साथ हैं,
लेकिन
अक्लवाले
विद्यार्थी
ही उनसे मित्रता
करते हैं। वे
पाँच मित्र
कौन से हैं?
विद्या
शौर्य च
दाक्ष्यं च
बलं धैर्यं च
पंचकम्।
मित्राणि
सहजन्याहुः
वर्तन्ति एव
त्रिर्बुधाः।।
विद्या,
शूरता,
दक्षता, बल और
धैर्य – ये
पाँच मित्र
सबके पास हैं।
अक्लवाले
विद्यार्थी
इनका फायदा
उठाते हैं,
लल्लू-पंजू
विद्यार्थी
इनसे लाभ नहीं
उठा पाते।
केशव के
पास ये पाँचों
मित्र थे। वह
शत्रु और विरोधियों
को भी नम्रता
और दक्षता से
समझा-बुझाकर
अपने पक्ष में
कर लेता था।
एक बार
नागपुर के पास
यवतमाल
(महाराष्ट्र)
में केशव अपने
साथियों के
साथ कहीं
टहलने जा रहा था।
उस जमाने में
अंग्रेजों का
बड़ा दबदबा था।
वहाँ का
अंग्रेज
कलेक्टर तो
इतना सिर चढ़
गया था कि कोई
भी उसको सलाम
मारे बिना
गुजरता तो उसे
दंडित किया जाता
था।
सैर करने
जा रहे केशव
और उसके
साथियों को
वही अंग्रेज
कलेक्टर
सामने मिला।
बड़ी-बड़ी उम्र
के लोग उसे
प्रणाम कर रहे
थे। सबने केशव
से कहाः "अंग्रेज
कलेक्टर साहब
आ रहे हैं।
इनको सलाम करो।"
उस 15-16
वर्षीय केशव
ने प्रणाम
नहीं किया।
कलेक्टर के
सिपाहियों ने
उसे पकड़ लिया
और कहाः "तू
प्रणाम क्यों
नहीं करता? साहब
तेरे से बड़े
हैं।"
केशवः "मैं
इनको प्रणाम
क्यों करूँ? ये
कोई महात्मा
नहीं हैं,
वरन् सरकारी
नौकर हैं। अगर
अच्छा काम
करते तो आदर
से सलाम किया
जाता, जोर
जुल्म से
प्रणाम करने
की कोई जरूरत
नहीं है।"
सिपाहीः "अरे
बालक ! तुझे पता
नहीं, सभी लोग
प्रणाम करते
हैं और तू ऐसी
बाते बोलता है?"
कलेक्टर
गुर्राकर
देखने लगा।
अंग्रेज कलेक्टर
की तरफ प्रेम
की निगाह
डालते हुए
केशव ने कहाः "प्रणाम
भीतर के आदर
की चीज होती
है। जोर जुल्म
से प्रणाम करना
पाप माना जाता
है, फिर आप
मुझे क्यों
जोर-जबरदस्ती
करके पाप में
डालते हो?
दिखावटी
प्रणाम से
आपको क्या
फायदा होगा?"
अंग्रेज
कलेक्टर का
सिर नीचा हो
गया, बोलाः "इसको
जाने दो, यह
साधारण बालक
नहीं है।"
15-16 वर्षीय
बालक की कैसी
दक्षता है कि
दुश्मनी के
भाव से भरे
कलेक्टर को भी
सिर नीचे करके
कहना पड़ाः 'इसको
जाने दो।'
यवतमाल
में यह बात
बड़ी तीव्र
गति से फैल
गयी और लोग
वाहवाही करने
लगेः 'केशव ने
कमाल कर दिया ! आज
तक जो सबको
प्रणाम
करवाता था,
सबका सिर झुकवाता
था, केशव ने
उसी का सिर
झुकवा दिया !'
पढ़ते-पढ़ते
आगे चलकर केशव
मेडिकल कॉलेज
में भर्ती
हुआ। मेडिकल कॉलेज
में सुरेंद्र
घोष नामक एक
बड़ा लंबा तगड़ा
विद्यार्थी
था। वह रोज 'पुल
अप्स' करता था
और दंड-बैठक
भी लगाता था।
अपनी भुजाओं
पर उसे बड़ा
गर्व था कि 'अगर
एक घूँसा किसी
को लगा दूँ तो
दूसरा न मांगे।'
एक दिन
कॉलेज में जब
उसने केशव की
प्रशंसा सुनी
तब वह केशव के
सामने गया और
बोलाः
"क्यों
रे ! तू बड़ा
बुद्धिमान,
शौर्यवान और
धैर्यवान होकर
उभर रहा है।
है शूरता तो
मुझे मुक्के
मार, मैं भी
तेरी ताकत
देखूँ।"
केशवः "नहीं-नहीं,
भैया ! मैं आपकी
नहीं
मारुँगा। आप
ही मुझे
मुक्के मारिये।"
ऐसा कहकर केशव
ने अपनी भुजा
आगे कर दी।
वह जो पुल
अप्स करके,
कसरत करके
अपने शरीर को
मजबूत बनाता
था, उसने
मुक्के मारे –
एक, दो, तीन....
पाँच...
पन्द्रह..
पच्चीस... तीस....
चालीस....
मुक्के
मारते-मारते
आखिर
सुरेन्द्र
घोष थक गया,
पसीने से
तर-बतर हो
गया। देखने
वाले लोग चकित
हो गये। आखिर
सुरेन्द्र ने
कहाः
"तेरा
शरीर
हाड़-मांस का
है कि लोहे का? सच
बता, तू कौन है?
मुक्के
मारते-मारते
मैं थक गया पर
तू उफ तक नहीं
करता?
प्राणायाम
का रहस्य जाना
होगा केशवराव
ने ! आत्मबल
बचपन से ही
विकसित था।
दुश्मनी के
भाव से भरा
सुरेंद्र घोष
केशव का मित्र
बन गया और गले
लग गया।
कलकत्ता
के प्रसिद्ध
मौलवी लियाकत
हुसैन 60 साल के
थे और
नेतागिरी में
उनका बड़ा नाम
था। नेतागिरी
से उनको जो
खुशियाँ
मिलती थी,
उनसे वे 60 साल
के होते हुए
भी चलने,
बोलने और काम
करने में
जवानों को भी
पीछे कर देते
थे।
मौलवी
लियाकत हुसैन
ने केशवराव को
एक सभा में देखा।
उस सभा में
किसी ने भाषण
में लोकमान्य
तिलक के लिए
कुछ हलके
शब्दों का
उपयोग किया।
देशभक्ति से
भरे हुए
लोकमान्य
तिलक के लिए
हलके शब्द
बोलने और
भारतीय
संस्कृति को वन्दे
मातरम् कर के
निहारनेवालो
लोगों को
खरी-खोटी
सुनाने की जब
उसने बदतमीजी
की तो युवक
केशव उठा, मंच
पर पहुँचा और
उस वक्ता का
कान पकड़ कर
उसके गाल पर
तीन तमाचे जड़
दिय।
आयोजक
तथा उनके आदमी
आये और केशव
का हाथ पकड़ने
लगे। केशव ने
हाथ पकड़ने
वाले को भी
तमाचे जड़
दिये। केशव का
यह शौर्य,
देशभक्ति और
आत्मनिर्भरता
देखकर मौलवी
लियाकत हुसैन
बोल उठेः
"आफरीन
है, आफरीन है !
भारत के लाल !
आफरीन है।"
लियाकत
हुसैन दौड़
पड़े और केशव
को गले लगा लिया,
फिर बोलेः "आज से आप
और हम जिगरी
दोस्त ! मेरा कोई
भी कार्यक्रम
होगा, उसमें
मैं आपको बुलाऊँ
तो क्या आप
आयेंगे?"
केशवः "क्यों
नहीं भैया ! हम सब
भारतवासी
हैं।"
जब भी
लियाकत हुसैन
कार्यक्रम
करते, तब केशव
को अवश्य
बुलाते और
केशव अपने
साथियों सहित
भगवा ध्वज
लेकर उनके
कार्यक्रम
में जाते।
वहाँ वन्दे
मातरम् की
ध्वनि से आकाश
गूँज उठता था।
यह साहसी,
वीर, निडर,
धैर्यवान और
बुद्धिमान
बालक केशव और
कोई नहीं,
केशवराव
बलिराम
हेडगेवार ही
थे, जिन्होंने
आगे चलकर
राष्ट्रीय
स्वयंसेवक
संघ (आर.एस.एस.)
की स्थापना
की, जिनके
संस्कार आज
दुनियाभर के
बच्चों और
जवानों के दिल
तक पहुँच रहे
हैं।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
औरंगजेब
ने पूछाः "मतिदास
कौन है?"....तो भाई
मतिदास ने आगे
बढ़कर कहाः "मैं
हूँ मतिदास।
यदि गुरुजी
आज्ञा दें तो
मैं यहाँ
बैठे-बैठे
दिल्ली और
लाहौर का सभी
हाल बता सकता
हूँ। तेरे
किले की ईंट-से-ईंट
बजा सकता हूँ।"
औरंगजेब
गुर्राया और
उसने भाई
मतिदास को धर्म-परिवर्तन
करने के लिए
विवश करने के
उद्देश्य से
अनेक प्रकार
की यातनाएँ
देने की धमकी
दी। खौलते हुए
गरम तेल के
कड़ाहे
दिखाकर उनके
मन में भय
उत्पन्न करने
का प्रयत्न
किया, परंतु धर्मवीर
पुरुष अपने
प्राणों की
चिन्ता नहीं
किया करते।
धर्म के लिए
वे अपना जीवन
उत्सर्ग कर
देना श्रेष्ठ
समझते हैं।
जब
औरंगजेब की
सभी धमकियाँ
बेकार गयीं,
सभी प्रयत्न
असफल रहे, तो
वह चिढ़ गया।
उसने काजी को
बुलाकर पूछाः
"बताओ
इसे क्या सजा
दी जाये?"
काजी ने
कुरान की
आयतों का हवाला
देकर हुक्म
सुनाया कि 'इस
काफिर को
इस्लाम ग्रहण
न करने के
आरोप में आरे
से लकड़ी की
तरह चीर दिया
जाये।'
औरंगजेब
ने सिपाहियों
को काजी के
आदेश का पालन
करने का हुक्म
जारी कर दिया।
दिल्ली
के चाँदनी चौक
में भाई
मतिदास को दो
खंभों के बीच
रस्सों से
कसकर बाँध
दिया गया और
सिपाहियों ने
ऊपर से आरे के
द्वारा उन्हें
चीरना
प्रारंभ
किया। किंतु
उन्होंने 'सी' तक नहीं
की। औरंगजेब
ने पाँच मिनट
बाद फिर कहाः "अभी
भी समय है।
यदि तुम
इस्लाम कबूल
कर लो, तो तुम्हें
छोड़ दिया
जायेगा और
धन-दौलत से
मालामाल कर
दिया जायेगा।"
वीर मतिदास ने
निर्भय होकर
कहाः
"मैं
जीते जी अपना
धर्म नहीं
छोड़ूँगा।"
ऐसे थे
धर्मवीर
मतिदास ! जहाँ
आरे से
चिरवाया गया,
आज वह चौक 'भाई
मतिदास चौक' के
नाम से
प्रसिद्ध है।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
प्रत्येक
मनुष्य को
अपने धर्म के
प्रति श्रद्धा
और आदर होना
चाहिए। भगवान
श्रीकृष्ण ने
भी कहा हैः
श्रेयान्स्वधर्मो
विगुणः
परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे
निधनं श्रेयः
परधर्मो
भयावहः।।
'अच्छी
प्रकार आचरण
में लाये हुए
दूसरे के धर्म
से गुणरहित भी
अपना धर्म अति
उत्तम है।
अपने धर्म में
तो मरना भी कल्याणकारक
है और दूसरे
का धर्म भय को
देने वाला है।'
(गीताः
3.35)
जब भारत
पर मुगलों का
शासन था, तब की
यह घटित घटना
हैः ने मिलकर
उसे गालियाँ
दीं। पहले तो
वह चुप रहा।
वैसे भी
सहनशीलता तो
हिन्दुओं का
गुण है ही...
किंतु जब उन
उदंड बच्चों
ने गुरुओं के
नाम की और झूलेलाल
व गुरुनानक के
नाम की
गालियाँ देनी
शुरु कीं, तब
उस वीर बालक
से अपने गुरु
और धर्म का अपमान
से सहा नहीं
गया।
हकीकत
राय ने कहाः "अब
हद हो गयी ! अपने
लिए तो मैंने
सहनशक्ति को
उपयोग किया लेकिन
मेरे धर्म,
गुरु और भगवान
के लिए एक भी
शब्द बोलोगे
तो यह मेरी सहनशक्ति
से बाहर की
बात है। मेरे
पास भी जुबान
है। मैं भी
तुम्हें बोल
सकता हूँ।"
उद्दंड
बच्चों ने
कहाः "बोलकर तो
दिखा ! हम तेरी
खबर ले लेंगे।"
हकीकत
राय ने भी
उनको दो-चार
कटु शब्द सुना
दिये। बस,
उन्हीं दो-चार
शब्दों को
सुनकर
मुल्ला-मौलवियों
को खून उबल
पड़ा। वे
हकीकत राय को
ठीक करने का
मौका ढूँढने
लगे। सब लोग
एक तरफ और
हकीकत राय
अकेला दूसरा
तरफ।
उस समय
मुगलों का ही
शासन था,
इसलिए
एकत्रित राय
को जेल में
कैद कर दिया
गया।
मुगल
शासकों की ओर
हकीकत राय को
यह फरमान भेजा
गया कि 'अगर तुम
कलमा पढ़ लो
और मुसलमान बन
जाओ तो तुम्हें
अभी माफ कर
दिया जायेगा
और यदि तुम
मुसलमान नहीं
बनोगे तो
तुम्हारा सिर
धड़ से अलग कर दिया
जायेगा।'
हकीकत
राय के
माता-पिता जेल
के बाहर आँसू
बहा रहे थेः "बेटा
!
तू मुसलमान बन
जा। कम से कम
हम तुम्हें
जीवित तो देख
सकेंगे !" .....लेकिन
उस बुद्धिमान
सिंधी बालक ने
कहाः
"क्या
मुसलमान बन
जाने के बाद
मेरी मृत्यु
नहीं होगी?"
माता-पिताः
"मृत्यु
तो होगी ही।"
हकीकत
रायः ".... तो फिर
मैं अपने धर्म
में ही मरना
पसंद करुँगा।
मैं जीते जी
दूसरों का
धर्म स्वीकार
नहीं करूँगा।"
क्रूर
शासकों ने
हकीकत राय की
दृढ़ता देखकर
अनेकों
धमकियाँ दीं
लेकिन उस
बहादुर किशोर
पर उनकी
धमकियों का
जोर न चल सका।
उसके दृढ़
निश्चय को
पूरा
राज्य-शासन भी
न डिगा सका।
अंत में
मुगल शासक ने
उसे प्रलोभन
देकर अपनी ओर
खींचना चाहा
लेकिन वह
बुद्धिमान व
वीर किशोर
प्रलोभनों
में भी नहीं
फँसा।
आखिर
क्रूर
मुसलमान
शासकों ने
आदेश दिया कि 'अमुक
दिन बीच मैदान
में हकीकत राय
का शिरोच्छेद
किया जायेगा।'
उस वीर
हकीकत राय ने
गुरु का मंत्र
ले रखा था। गुरुमंत्र
जपते-जपते
उसकी बुद्धि
सूक्ष्म हो
गयी थी वह 14
वर्षीय किशोर
जल्लाद के हाथ
में चमचमाती
हुई तलवार
देखकर जरा भी
भयभीत न हुआ
वरन् अपने
गुरु के दिये
हुए ज्ञान को
याद करने लगे
कि 'यह तलवार
किसको मारेगी?
मार-मारकर इस
पाँचभौतिक
शरीर को ही तो
मारेंगी और
ऐसे पंचभौतिक
शरीर तो कई
बार मिले और
कई बार मर
गये। ....तो क्या
यह तलवार मुझे
मारेगी? नहीं
मैं तो अमर
आत्मा हूँ...
परमात्मा का
सनातन अंश
हूँ। मुझे यह
कैसे मार सकती
है? ॐ....ॐ....ॐ...
हकीकत
राय गुरु के
इस ज्ञान का
चिन्तन कर रहा
था, तभी क्रूर
काजियों ने
जल्लाद को
तलवार चलाने
का आदेश दिया।
जल्लाद ने
तलवार उठायी
लेकिन उस
निर्दोष बालक
को देखकर उसकी
अंतरात्मा
थरथरा उठी।
उसके हाथों से
तलवार गिर
पड़ी और हाथ
काँपने लगे।
काजी
बोलेः "तुझे
नौकरी करनी है
कि नहीं? यह तू
क्या कर रहा
है?"
तब हकीकत
राय ने अपने
हाथों से
तलवार उठायी
और जल्लाद के
हाथ में थमा
दी। फिर वह
किशोर आँखें
बंद करके
परमात्मा का
चिन्तन करने
लगाः 'हे अकाल
पुरुष ! जैसे
साँप केंचुली
का त्याग करता
है, वैसे ही मैं
यह नश्वर देह
छोड़ रहा हूँ।
मुझे तेरे चरणों
की प्रीति
देना ताकि मैं
तेरे चरणों
में पहुँच
जाऊँ.... फिर से
मुझे वासना का
पुतला बनकर
इधर-उधर न
भटकना पड़े....
अब तू मुझे
अपनी ही शरण
में रखना.... मैं
तेरा हूँ... तू
मेरा है.... हे
मेरे अकाल
पुरुष !'
इतने में
जल्लाद ने
तलवार चलायी
और हकीकत राय का
सिर धड़ से
अलग हो गया।
हकीकत
राय ने 14 वर्ष
की छोटी सी
उम्र में धर्म
के लिए अपनी
कुर्बानी दे
दी। उसने शरीर
छोड़ दिया
लेकिन धर्म न
छोड़ा।
गुरु
तेगबहादुर
बोलिया,
सुनो
सिखो !
बड़भागिया, धड़
दीजे धरम न
छोड़िये....
हकीकत
राय ने अपने
जीवन में यह
वचन चरितार्थ
करके दिखा
दिया।
हकीकत
राय तो धर्म
के लिए
बलिवेदी पर
चढ़ गया लेकिन
उसकी
कुर्बानी ने
समाज क
हजारों-लाखों जवानों
में एक जोश भर
दिया कि 'धर्म की
खातिर प्राण
देने पड़े तो
देंगे लेकिन
विधर्मियों
के आगे कभी
नहीं
झुकेंगे।
अपने धर्म में
भले भूखे
मारना पड़े तो
भी स्वीकार है
लेकिन परधर्म
की सभी
स्वीकार नहीं
करेंगे।'
ऐसे
वीरों के
बलिदान के
फलस्वरूप ही
हमें आजादी
प्राप्त हुई
है और ऐसे
लाखों-लाखों
प्राणों की
आहुति द्वारा
प्राप्त की
गयी इस आजादी
को हम कहाँ
व्यसन, फैशन
और चलचित्रों
से प्रभावित
होकर गँवा न
दें ! अब
देशवासियों
को सावधान
रहना होगा।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
धन्य है
पंजाब की माटी
जहाँ समय-समय
पर अनेक महापुरुषों
का
प्रादुर्भाव
हुआ ! धर्म की
पवित्र
यज्ञवेदी में
बलिदान देने
वालों की
परंपरा में
गुरु
गोविंदसिंह
के चार लाडलों
को, अमर
शहीदों को
भारत भूल सकता
है? नहीं, कदापि
नहीं। अपने
पितामह गुरु
तेगबहादुर की
कुर्बानी और
भारत की स्वतंत्रता
के लिए
संघर्षरत
पिता गुरु
गोविन्दसिंह
ही उनके आदर्श
थे। तभी तो 8-10
वर्ष की छोटी
सी अवस्था में
उनकी वीरता र
धर्मपरायणता
को देखकर
भारतवासी
उनके लिए
श्रद्धा से
नतमस्तक हो
उठते हैं।
गुरुगोविंदसिंह
की बढ़ती हुई
शक्ति और
शूरता को
देखकर
औरंगजेब
झुँझलाया हुआ
था। उसने शाही
फरमान निकाला
कि 'पंजाब के
सभी सूबों के
हाकिम और
सरदार तथा पहाड़ी
राजा मिलकर
आनंदपुर को
बरबाद कर डालो
और गुरु
गोविंदसिंह
को जिंदा
गिरफ्तार करो
या उनका सिर
काटकर शाही
दरबार में
हाजिर करो।'
बस फिर क्या
था? मुगल सेना
द्वारा
आनंदपुर पर
आक्रमण कर
दिया गया।
आनंदपुर के
किले में रहते
हुए मुट्ठीभर सिक्ख
सरदारों की
सेना ने विशाल
मुगल सेना को भी
त्रस्त कर
दिया। किंतु
धीरे-धीरे
रसद-सामान
घटने लगा और
सिक्ख सेना
भूख से
व्याकुल हो उठी।
आखिरकार अपने
साथियों के विचार
से बाध्य होकर
अनुकूल अवसर
पाकर गुरुगोविंदसिंह
ने आधी रात
में सपरिवार
किला छोड़ दिया।
.....किंतु न
जाने कहाँ से
यवनों को इसकी
भनक मिल गयी
और दोनों
सेनाओं में
हलचल मच गयी।
इसी भागदौड़
में गुरु
गोविन्दसिंह
के परिवार
वाले अलग होकर
भटक गये। गुरु
गोविंदसिंह की
माता अपने दो
छोटे-छोटे
पौत्रों,
जोरावरसिंह
और फतेहसिंह
के साथ दूसरी
ओर निकल पड़ी।
उनके साथ रहने
वाले रसोइये
के
विश्वासघात
के कारण ये
लोग
विपक्षियों
द्वारा
गिरफ्तार
किये गये और
सूबा सरहिंद
के पास भेज
दिये गये।
सूबेदार ने
गुरु
गोविन्दसिंह
के हृदय पर
आघात पहुँचाने
के ख्याल से
उनके दोनों
छोटे बच्चों
को मुसलमान
बनाने का
निश्चय किया।
भरे
दरबार में
गुरु
गोविन्दसिंह
के इन दोनों पुत्रों
से सूबेदार ने
पूछाः "ऐ बच्चो ! तुम
लोगों को
दीन(मजहब)
इस्लाम की गोद
में आना मंजूर
है या कत्ल
होना?"
दो-तीन
बार पूछने पर
जोरावरसिंह
ने जवाब दियाः
"हमें
कत्ल होना
मंजूर है।"
कैसी
दिलेरी है ! कितनी
निर्भीकता ! जिस
उम्र में
बच्चे
खिलौनों से
खेलते रहते हैं,
उस नन्हीं सी
सुकुमार
अवस्था में भी
धर्म के प्रति
इन बालकों की
कितनी निष्ठा
है !
वजीद खाँ
बोलाः "बच्चो ! दीन
इस्लाम में
आकर सुख से जीवन
व्यतीत करो।
अभी तो
तुम्हारा
फलने-फूलने का
समय है।
मृत्यु से भी
इस्लाम धर्म
को बुरा समझते
हो? जरा सोचो !
अपनी जिंदगी
व्यर्थ क्यों
गँवा रहे हो?"
गुरु
गोविंदसिंह
के लाडले वे
वीर पुत्र...
मानो गीता के
इस ज्ञान को
उन्होंने
पूरी तरह आत्मसात्
कर लिया थाः स्वधर्मे
निधनं श्रेयः
परधर्मो
भयावहः। जोरावरसिंह
ने कहाः "हिन्दू
धर्म से बढ़कर
संसार में कोई
धर्म नहीं।
अपने धर्म पर
अडिग रहकर
मरने से बढ़कर
सुख देने वाला
दुनिया में
कोई काम नहीं।
अपने धर्म की
मर्यादा पर
मिटना तो
हमारे कुल की
रीति है। हम
लोग स
क्षणभंगुर
जीवन की परवाह
नहीं करते।
मर-मिटकर भी
धर्म की रक्षा
करना ही हमारा
अंतिम ध्येय
है। चाहे तुम
कत्ल करो या
तुम्हारी जो
इच्छा हो,
करो।"
गुरु
गोविन्दसिंह
के पुत्र महान,
न
छोड़ा धर्म
हुए
कुर्बान.........
इसी
प्रकार
फतेहसिंह ने
भी धर्म को न
त्यागकर बड़ी
निर्भीकतापूर्वक
मृत्यु का वरण
श्रेयस्कर
समझा। शाही
सल्तनत आश्चर्यचकित
हो उठी कि 'इस
नन्हीं-सी आयु
में भी अपने
धर्म के प्रति
कितनी अडिगता
है ! इन
नन्हें-नन्हें
सुकुमार
बालकों में
कितनी निर्भीकता
है !' किंतु
अन्यायी शासक
को भला यह
कैसे सहन होता?
काजियों और
मुल्लाओं की
राय से इन्हें
जीते-जी दीवार
में चिनवाने
का फरमान जारी
कर दिया गया।
कुछ ही
दूरी पर दोनों
भाई दीवार में
चिने जाने लगे
तब धर्मांध
सूबेदार ने
कहाः "ऐ बालको ! अभी
भी चाहो तो
तुम्हारे
प्राण बच सकते
हैं। तुम लोग
कलमा पढ़कर
मुसलमान धर्म
स्वीकार कर
लो। मैं
तुम्हें नेक
सलाह देता
हूँ।"
यह सुनकर
वीर
जोरावरसिंह
गरज उठाः "अरे
अत्याचारी
नराधम ! तू क्या
बकता है? मुझे तो
खुशी है कि
पंचम गुरु
अर्जुन देव और
दादागुरु
तेगबहादुर के
आदर्शों को
कायम करने के
लिए मैं अपनी
कुर्बानी दे
रहा हूँ तेरे
जैसे
अत्याचारियों
से यह धर्म
मिटनेवाला
नहीं, बल्कि
हमारे खून से
वह सींचा जा
रहा है और
आत्मा तो अगर
है, इसे कौन
मार सकता है?"
दीवार
शरीर को ढकती
हुई ऊपर बढ़ती
जा रही थी। छोटे
भाई फतेहसिंह
की गर्दन तक
दीवार आ गयी
थी। वह पहले
ही आँखों से
ओझल हो जाने
वाला था। यह देखकर
जोरावरसिंह
की आँखों में
आँसू आ गये।
सूबेदार को लगा
कि अब मुलजिम
मृत्यु से
भयभीत हो रहा
है। अतः मन ही
मन प्रसन्न
होकर बोलाः "जोरावर
!
अब भी बता दो
तुम्हारी
क्या इच्छा है?
रोने से क्या
लाभ होगा?"
जोरावर
सिंहः "मैं
बड़ा अभागा
हूँ कि अपने
छोटे भाई से
पहले मैंने जन्म
धारण किया,
माता का दूध
और जन्मभूमि
का अन्न जल
ग्रहण किया,
धर्म की
शिक्षा पायी
किंतु धर्म के
निमित्त
जीवन-दान देने
का सौभाग्य
मुझसे पहले
मेरे छोटे भाई
फतेह को
प्राप्त हो
रहा है। मुझसे
पहले मेरा
छोटा भाई
कुर्बानी दे
रहा है,
इसीलिए मुझ आज
खेद हो रहा
है।"
लोग दंग
रह गये कि
कितने साहसी
हैं ये बालक ! जो
प्रलोभन दिये
जाने और
जुल्मियों
द्वारा अत्याचार
किये जाने पर
भी
वीरतापूर्वक
स्वधर्म में
डटे रहे।
उधर गुरु
गोविंदसिंह
की पूरी सेना
युद्ध में काम
आ गयी। यह
देखकर उनके
बड़े पुत्र
अजीतसिंह से
नहीं रहा गया
और वे पिता के
पास आकर बोल
उठेः
"पिताजी !
जीते जी बंदी
होना कायरता
है और भागना
बुजदिली है।
इनसे अच्छा है
लड़कर मरना।
आप आज्ञा करें,
मैं इन यवनों
के छक्के
छुड़ा दूँगा
या मृत्यु का
आलिंगन
करूँगा।"
वीर
पुत्र
अजीतसिंह की
बात सुनकर
गोविंदसिंह
का हृदय
प्रसन्न हो
उठा और वे बोलेः
"शाबाश !
धन्य हो पुत्र
!
जाओ, स्वदेश
और स्वधर्म के
निमित्त अपना
कर्तव्यपालन
करो। हिन्दू
धर्म को
तुम्हारे
जैसे वीर
बालकों की
कुर्बानी की
आवश्यकता है।"
पिता से
आज्ञा पाकर
अत्यंत
प्रसन्नता
तथा जोश के
साथ अजीतसिंह
आठ-दस सिक्खों
के साथ युद्ध
स्थल में जा धमका
और देखते ही
देखते यवन
सेना के
बड़े-बड़े सरदारों
को मौत के घाट
उतारते हुए
खुद भी शहीद
हो गया।
ऐसे वीर
बालकों की
गाथा से ही
भारतीय
इतिहास अमर हो
रहा है। अपने
बड़े भाइयों
को वीरगति प्राप्त
करते देखकर
उनसे छोटा भाई
जुझारसिंह भला
कैसे चुप
बैठता? वह भी
अपने पिता
गुरु
गोविंदसिंह
के पास जा पहुँचा
और बोलाः
"पिताजी !
बड़े भैया तो
वीरगति को
प्राप्त हो
गये, इसलिए
मुझे भी भैया
का अनुगामी
बनने की आज्ञा
दीजिए।"
गुरु
गोविन्दसिंह
का हृदय भर
आया और
उन्होंने
उठकर जुझार को
गले लगा लिया।
वे बोलेः "जाओ,
बेटा ! तुम भी
अमरपद
प्राप्त करो,
देवता
तुम्हारा इंतजार
कर रहे हैं।"
धन्य है
पुत्र की
वीरता और धन्य
है पिता की कुर्बानी
!
अपने तीन
पुत्रों की
मृत्यु के
पश्चात् स्वदेश
तथा स्वधर्म
पालन के
निमित्त अपने
चौथे और अंतिम
पुत्र को भी
प्रसन्नता से
धर्म और स्वतन्त्रता
की बलिवेदी पर
चढ़ने के
निमित्त स्वीकृति
प्रदान कर दी !
वीर
जुझारसिंह 'सत्
श्री अकाल' कहकर
उछल पड़ा।
उसका रोम-रोम
शत्रु को
परास्त करने
के लिए फड़कने
लगा। स्वयं
पिता ने उसे वीरों
के देश से
सुसज्जित
करके
आशीर्वाद
दिया और वीर
जुझार पिता को
प्रणाम करके
अपने कुछ
सरदार
साथियों के
साथ निकल पड़ा
युद्धभूमि की
ओर। जिस ओर
जुझार गया उस
ओर दुश्मनों
का तीव्रता से
सफाया होने
लगा और ऐसा
लगता मानो
महाकाल की
लपलपाती
जिह्वा
सेनाओं को चाट
रही है।
देखते-देखते
मैदान साफ हो
गया। अंत में
शत्रुओं से
जूझते-जूझते
वह वीर बालक
भी मृत्यु की
भेंट चढ़ गया।
देखनेवाले
दुश्मन भी
उसकी प्रशंसा
किये बिना न
रह सके।
धन्य है
यह देश ! धन्य
हैं वे
माता-पिता
जिन्होंने इन
चार पुत्ररत्नों
को जन्म दिया
और धन्य हैं
वे चारों वीर
पुत्र
जिन्होंने
देश, धर्म और
संस्कृति के रक्षणार्थ
अपने प्राणों
तक का उत्सर्ग
कर दिया।
चाहे
कितनी भी विकट
परिस्थिति हो
अथवा चाहे कितनी
भी बड़े-बड़े
प्रलोभन आयें,
किंतु वीर वही
है जो अपने धर्म
तथा देश की
रक्षा के लिए
उनकी परवाह न
करते हुए अपने
प्राणों की भी
बाजी लगा दें।
वही वास्तव
में मनुष्य
कहलाने योग्य
है। किसी ने
सच कहा हैः
जिसको
नहीं निज देश
पर निज जाति
पर अभिमान है।
वह नर
नहीं पर पशु
निरा और मृतक
समान है।।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
धर्म, देश के
हित में जिसने
पूरा जीवन लगा
दिया।
इस
दुनिया में
उसी मनुज ने
नर तन को
सार्थक
किया।।
हिन्दस्तान
में औरंगजेब
का शासनकाल
था। किसी
इतिहासकार ने
लिखा हैः
'औरंगजेब
ने यह हुक्म
दिया कि किसी
हिन्दू को राज्य
के कार्य में
किसी उच्च
स्थान पर नियत
न किया जाये
तथा
हिन्दुओं पर
जजिया (कर) लगा
दिया जाय। उस
समय अनेकों
नये कर केवल
हिन्दुओं पर
लगाये गये। इस
भय से अनेकों
हिन्दू
मुसलमान हो
गये।
हिन्दुओं के पूजा-आरती
आदि सभी
धार्मिक
कार्य बंद
होने लगे।
मंदिर गिराये
गये, मसजिदें
बनवायी गयीं
और अनेकों
धर्मात्मा
मरवा दिये
गये। उसी समय
की उक्ति है
कि 'सवा मन
यज्ञोपवीत
रोजाना उतरवा
कर औरंगजेब
रोटी खाता था....'
उसी समय
कश्मीर के कुछ
पंडितों ने
आकर गुरु तेगबहादुरजी
से हिन्दुओं
पर हो रहे
अत्याचार का
वर्णन किया।
तब गुरु
तेगबहादुरजी
का हृदय द्रवीभूत
हो उठा और वे
बोलेः
"जाओ, तुम
लोग बादशाह से
कहो कि हमारा
पीर तेगबहादुर
है। यदि वह
मुसलमान हो
जाये तो हम
सभी इस्लाम
स्वीकार कर
लेंगे।"
पंडितों
ने वैसा की
किया जैसा कि
श्री तेगबहादुरजी
ने कहा था। तब
बादशाह
औरंगजेब ने
तेगबहादुरजी
को दिल्ली आने
का बुलावा
भेजा। जब उनके
शिष्य मतिदास
और दयाला
औरंगजेब के
पास पहुँचे तब
औरंगजेब ने
कहाः
"यदि तुम
लोग इस्लाम
धर्म कबूल
नहीं करोगे तो
कत्ल कर दिये
जाओगे।"
मतिदासः "शरीर
तो नश्वर है
और आत्मा का
कभी कत्ल नहीं
हो सकता।"
तब
औरंगजेब ने
क्रोधित होकर
मतिदास को आरे
से चिरवा
दिया। यह
देखकर दयाला
बोलाः
"औरंगजेब
!
तूने बाबर वंश
को और अपनी
बादशाहियत को
चिरवाया है।"
यह सुनकर
औरंगजेब ने
दयाला को
जिंदा ही जला
दिया।
औरंगजेब
के अत्याचार
का अंत नहीं आ
रहा था। फिर
गुरुतेगबहादुरजी
स्वयं गये।
उनसे भी औरंगजेब
ने कहाः
"यदि तुम
मुसलमान होना
स्वीकार नहीं
करोगे तो कल
तुम्हारी भी
यही दशा होगी।"
दूसरे
दिन
(मार्गशीर्ष
शुक्ल पंचमी
को) बीच
चौराहे पर
तेगबहादुरजी
का सिर धड़ से
अलग कर दिया
गया। धर्म के
लिए एक संत
कुर्बान हो
गये।
तेगबहादुरजी
के बलिदान ने
जनता में रोष
पैदा कर दिया।
अतः लोगों में
बदला लेने की
धुन सवार हो
गयी। अनेकों
शूरवीर धर्म
के ऊपर
न्योछावर होने
को तैयार होने
लगे। तेग
बहादुरजी के
बलिदान ने समय
को ही बदल
दिया। ऐसे
शूरवीरों का,
धर्मप्रेमियों
का बलिदान ही
भारत को दासता
की जंजीरी से
मुक्त करा सका
है।
देश तो
मुक्त हुआ
किंतु क्या
मानव की
वास्तविक
मुक्ति हुई?
नहीं।
विषय-विकार,
ऐश-आराम और
भोग-विलासरूपी
दासता से अभी
भी वह आबद्ध
ही है और इस
दासता से
मुक्ति तभी
मिल सकती है
जब संत महापुरुषों
की शरण में
जाकर उनके
बताये मार्ग पर
चलकर मुक्ति
पथ का पथिक
बना जाय। तभी
मानव-जीवन
सार्थक हो
सकेगा।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
बंगाल के
माल्दा जिले
के
केन्दूरपुर
नामक गाँव में
एक नुमाई नाम
का बालक था जो
बाद में एक अच्छे
स्वयंसेवक के
रूप में
प्रसिद्ध
हुआ। उसे बचपन
में एक बार
जोरदार बुखार
आ गया और पैर में
चोट लग गयी।
अनेकों
छोटे-मोटे
इलाज करने पर
बुखार तो मिट
गया, किंतु
घाव मिटने का
नाम नहीं ले
रहा था।
आखिरकार
थककर किसी की
सलाह से उसे
बड़े अस्पताल
में भर्ती कर
दिया गया। वह
अस्पताल ईसाई
मिशनरी का था,
अतः वहाँ उसके
घाव को भरने
के साथ-साथ
नुमाई में
ईसाइयत के
संस्कार भरने
का भी प्रयास
किया जाने
लगा। छोटे-से
घाव को भरने
के लिए उसे 5-6
महीने तक
अस्पताल में
रखा ताकि
धीरे-धीरे उसका
हृदय ईसाइयत
के संस्कारों
से भर जाये।
लेकिन वह
बालक नुमाई
अपने धर्म पर
अडिग रहा और
बोलाः "मैं
हिन्दू हँ और
हिन्दू ही
रहूँगा।
तुम्हारे
चक्कर में आकर
मैं ईसाई बनने
वाला नहीं
हूँ।"
अंतिम
प्रयास करते
हुए ईसाई
मिशनरीवालों
ने उसके गरीब
पिता से कहाः "इसके
घाव भरने में 6
हजार रूपये
खर्च हो गये
हैं। तुम अपने
लड़के से कह
दो कि वह
ईसाइयत स्वीकार
कर ले। अगर वह
ईसाइयत
स्वीकार कर
लेगा तो 6 हजार
रुपये माफ हो
जायेंगे, नहीं
तो तुम्हें वे
रुपये भरने
पड़ेंगे जबकि
तुम तो गरीब
हो। तुम्हारे
पास केवल 12
बीघा जमीन है।
(उस समय एक बीघा
जमीन की कीमत
एक हजार रुपये
थी।) या तो तुम 6
बीघा जमीन दे
दो जो कि
तुम्हारा
भरण-पोषण का
एक मात्र आधार
है या नुमाई
को ईसाइयत
स्वीकार करने
के लिए राजी
कर लो।"
तब पिता
बोलाः "मैं धन
का गरीब हूँ
लेकिन धर्म का
नहीं। धर्म
बेचने के लिए
नहीं होता।
मैं 6 बीघा जमीन
बेचकर भी 6
हजार रुपये
तुम्हें दे
दूँगा।"
उस गरीब
पिता ने 6 बीघा
जमीन बेचकर
रुपये दे दिये,
किंतु धर्म
नहीं बेचा। उस
बालक ने
हिन्दू रहकर
ही अपना पूरा
जीवन ईश्वर के
रास्ते लगा दिया।
कितनी निष्ठा
है स्वधर्म
में !
कभी भी
अपने धर्म का
त्याग नहीं
करना चाहिए वरन्
अपने ही धर्म
में अडिग
रहकर, अपने
धर्म का पालन
करते हुए अपने
धर्म और अपनी
संस्कृति के गौरव
की रक्षा करनी
चाहिए। इसी
में हमारा
कल्याण है।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
गीता में
कहा गया हैः
स्वधर्मे
निधनं श्रेयः
परधर्मो
भयावहः।
'अपने
धर्म में मर
जाना भी
श्रेयस्कर है
किंतु दूसरे
का धर्म भयावह
है।' (गीताः
3.35)
किसी को
धर्मच्युत
करने की चाहे
कोई लाख कोशिश
क्यों न करें,
यदि वह
बुद्धिमान
होगा तो न तो किसी
के प्रलोभन
में आयेगा न
ही भय में, वह
तो हर कीमत पर
अपने ही धर्म
में अडिग
रहेगा।
ईसाइयत
वाले
गाँव-गाँव
जाकर प्रचार
करते हैं कि 'हमारे
धर्म में आ
जाओ। हम तुमको
मुक्ति दिलायेंगे।'
एक
समझदार वृद्ध
सज्जन ने
उन्हें पूछाः
"मुक्ति
कौन देगा?"
"यीशु
भगवान देंगे।"
"यीशु
भगवान कौन हैं?"
"वे
भगवान के बेटे
हैं।"
तब उस
वृद्ध सज्जन
ने कहाः "हम तो
सीधे भगवान का
ज्ञान पा रहे
हैं, फिर भगवान
के बेटे के
पास क्यों
जायें? भगवान के
बेटे मुक्ति
क्यों माँगे?"
इतना
ज्ञान तो भारत
का एक ग्रामीण
किसान भी रखता
है कि भगवान
के बेटे से
क्या मुक्ति
माँगनी? जिस
बेटे को खीलें
लगीं और जो
खून
बहाते-बहाते
चला गया, उससे
हम मुक्ति
माँगे? इससे तो
जो
मुक्तात्मा-परमात्मा
श्रीकृष्ण विघ्न-बाधाओं
के बीच भी चैन
की बंसी बजा
रहे हैं,
जिनको देखते ह
चिन्ता गायब
हो जाती है और
प्रेम प्रकट
होने लगता है,
सीधा उन्हीं
से मुक्ति
क्यों न ले
लें? भगवान के
बेटे से हमको
मुक्ति नहीं
चाहिए। हम तो
भगवान से ही
मुक्ति
लेंगे। कैसी
उत्तम समझ है !
ॐ
भारत का
एक बालक
कान्वेंट
स्कूल में
अपना नाम खारिज
करवाकर
भारतीय
पद्धति से
पढ़ानेवाली शाला
में भर्ती हो
गया। उस लड़के
की दृष्टि
बड़ी पैनी थी।
उसने देखा कि
शाला के
प्रधानाचार्य
कुर्ता और
धोती पहन कर
पाठशाला में
आते हैं। अतः
वह भी अपनी
पाठशाला की
पोशाक उतारकर
धोती-कुर्ते
में पाठशाला
जाने लगा। उसे
इस प्रकार जाते
देखकर पिता ने
पूछाः "बेटा !
तूने यह क्या
किया?"
बालकः "पिताजी
!
यह हमारी
भारतीय
वेशभूषा है।
देश तब तक
शाद-आबाद नहीं
रह सकता जब तक
हम अपनी
संस्कृति का
और अपनी
वेशभूषा का
आदर नहीं
करते। पिता जी
!
मैंने कोई
गलती तो नहीं
की?"
पिताजीः "बेटा
!
गलती तो नहीं
की लेकिन ऐसा
पहन कैसे लिया?"
बालकः "पिताजी
!
हमारे
प्रधानाचार्य
यही पोशाक
पहनते हैं।
टाई, शर्ट, कोट,
पैन्ट आदि तो
ठण्डे
प्रदेशों की
आवश्यकता है।
हमारा प्रदेश
तो गरम है।
हमारी
वेशभूषा तो
ढीली-ढाली ही
होनी चाहिए।
यह वेशभूषा
स्वास्थ्यप्रद
भी है और
हमारी
संस्कृति की
पहचान भी।"
पिता ने
बालक को गले
लगाया और कहाः
"बेटा ! तू
बड़ा होन हार
है। किसी के
विचारों से तू
दबना नहीं।
अपने विचारों
को बुलंद
रखना। बेटा !
तेरी जय-जयकार
होगी।"
पाठशाला
में पहुँचने
पर अन्य
विद्यार्थी
उसे देखकर दंग
रह गये कि यह
क्या ! जब उस
बालक से पूछा
गया कि 'तू
पाठशाला की
पोशाक पहनकर
क्यों नहीं
आया?' तब उसने
कहाः
"पाश्चात्य
देशों में
ठण्डी रहती
है, अतः वहाँ शर्ट-पैन्ट
आदि की जरूरत
पड़ती है।
ठण्डी हवा शरीर
में घुसकर
सर्दी न कर दे,
इसलिए वहाँ के
लोग टाई
बाँधते हैं।
हमारे देश में
तो गर्मी है।
फिर हम उनके
पोशाक की नकल
क्यों करें? जब
हमारी
पाठशाला के
प्रधानाचार्य
भारतीय पोशाक
पहन सकते हैं
तो भारतीय
विद्यार्थी
क्यों नहीं
पहन सकते?"
उस बालक
ने अन्य
विद्यार्थियों
को भी अपनी संस्कृति
के प्रति
प्रोत्साहित
किया। उसने देखा
कि कान्वेंट
स्कूल में
पादरी लोग
हिन्दू धर्म
की निन्दा
करते हैं और
माता-पिता की
अवहेलना करना सिखाते
हैं। हमारे
शास्त्र कहते
हैं- 'मातृदेवो
भव। पितृदेवो
भव।
आचार्यदेवो
भव।' ....और
अमेरिका में
कहते हैं कि 'माँ
या बाप डाँट
दे तो पुलिस
को खबर कर दो।' जो
शिक्षा
माता-पिता को
भी दंडित करने
की सीख दे, ऐसी
शिक्षा हम
क्यों पायें? हम
तो भारतीय
पद्धति से
शिक्षा
देनेवाली
पाठशाला में
ही पढ़ेंगे।' ऐसा
सोचकर उस बालक
ने कान्वेंट
स्कूल से अपना
नाम कटवाकर
भारतीय
शिक्षा
पद्धतिवाली
पाठशाला में
दर्ज करवाया
था।
इतनी
छोटी सी उम्र
में भी अपने
राष्ट्र का,
अपने धर्म का
तथा अपनी
संस्कृति का
आदर करने वाले
वे बालक थे
सुभाषचंद्र
बोस।
ॐ
एक पादरी
किसी
कान्वेंट
स्कूल में
विद्यार्थियों
के आगे हिन्दू
धर्म की
निन्दा कर रहा
था और अपनी
ईसाइयत की
डींग हाँक रहा
था। इतने में
एक हिम्मतवान
लड़का उठ खड़ा
हुआ और पादरी
को भी तौबा
पुकारनी पड़े,
ऐसा सवाल
किया। लड़के ने
कहाः "पादरी
महोदय ! क्या आपका
ईसाई धर्म
हिन्दू धर्म
की निन्दा
करना सिखाता
है?"
पादरी
निरुत्तर हो
गया, फिर
थोड़ी देर बाद
कूटनीति से
बोलाः
"तुम्हारा
धर्म भी तो
निन्दा करता
है।"
उस लड़के
ने कहाः "हमारे
धर्मग्रन्थ
में कहाँ किसी
धर्म की निंदा
की गयी है? गीता में
तो आता हैः न हि
ज्ञानेन
सदृशं
पवित्रमिह
विद्यते। 'इस
संसार में
ज्ञान के समान
पवित्र करने
वाला निःसंदेह
कुछ भी नहीं
है।'
(गीताः4.38)
गीता के
एक-एक शब्द
में
मानवमात्र का
उत्थान करने
का सामर्थ्य
छुपा हुआ है।
ऐसा ज्ञान
देनेवाली
गीता में कहाँ
किसी के धर्म
की निन्दा की
गयी है? हमारे एक
अन्य धर्म
ग्रंथ –
रचयिता भगवान
वेदव्यासजी
का श्लोक भी
सुन लोः
धर्म
यो बाधते न स
धर्मः
कुवर्त्म
तत्।
अविरोधाद्
यो धर्मः स
धर्मः सत्य
विक्रम।।
हे
विक्रम ! जो धर्म
किसी दूसरे
धर्म का विरोध
करता है, वह धर्म
नहीं कुमार्ग
है। धर्म वही
है जिसका किसी
धर्म से विरोध
नहीं है।
पादरी
निरुत्तर हो
गया।
वही 10-11 साल
का लड़का आगे
चलकर गीता,
रामायण, उपनिषद्
आदि ग्रंथों
का अध्ययन
करके एक
प्रसिद्ध धुरंधर
दार्शनिक बना
और भारत के
राष्ट्रपति पद
पर शोभायमान
हुआ। उसका नाम
था डॉ.
सर्वपल्ली
राधाकृष्णन्।
कैसी
हिम्मत और
कैसा साहस था
भारत के उन
नन्हें-नन्हें
बच्चों में !
उनके साहस,
स्वाभिमान और
स्वधर्म-प्रीति
ने ही आगे
चलकर उन्हें
भारत का
प्रसिद्ध
नेता व दार्शनिक
बना दिया।
जो धर्म
की रक्षा करते
हैं, धर्म
उनकी रक्षा अवश्य
करता है। उठो,
जागो,
भारतवासियो !
विधर्मियों
की कुचालों और
षडयंत्रों के
कारण फिर से
पराधीन होना
पड़े इससे
पहले ही अपनी
संस्कृति के
गौरव को
पहचानो। अपने
राष्ट्र की
अस्मिता की
रक्षा के लिए
कमर कसकर
तैयार हो जाओ।
अब भी वक्त है.....
फिर कहीं
पछताना न
पड़े। भगवान
और भगवत्प्राप्त
संतों की कृपा
तुम्हारे साथ
है फिर भय किस
बात का? देर किस
बात की? शाबाश,
वीर ! शाबाश...!!
ॐॐॐॐॐॐॐ
बात उस
समय की है, जब
दिल्ली के
सिंहासन पर
औरंगजेब बैठ
चुका था।
विंध्यवासिनी
देवी के मंदिर
में मेला लगा
हुआ था, जहाँ
उनके दर्शन
हेतु लोगों की
खूब भीड़ जमी
थी।
पन्नानरेश
छत्रसाल उस
वक्त 13-14 साल के
किशोर थे।
छत्रसाल ने
सोचा कि 'जंगल से
फूल तोड़कर
फिर माता के
दर्शन के लिए जाऊँ।'
उनके साथ हम
उम्र के दूसरे
राजपूत बालक
भी थे। जब वे
जंगल में फूल
तोड़ रहे थे,
उसी समय छः
मुसलमान
सैनिक घोड़े
पर सवार होकर
वहाँ आये और
उन्होंने
पूछाः "ऐ लड़के !
विंध्यवासिनी
का मंदिर कहाँ
है?"
छत्रसालः
"भाग्यशाली
हो, माता का
दर्शन करने के
लिए जा रहे
हो। सीधे...
सामने जो टीला
दिख रहा है,
वहीं मंदिर
है।"
सैनिकः "हम
माता के दर्शन
करने नहीं जा
रहे, हम तो
मंदिर को
तोड़ने के लिए
जा रहे हैं।"
छत्रसाल
ने फूलों की
डलिया एक
दूसरे बालक को
पकड़ायी और
गरज उठाः "मेरे
जीवित रहते
हुए तुम लोग
मेरी माता का
मंदिर
तोड़ोगे?"
सैनिकः "लड़के
तू क्या कर
लेगा? तेरी
छोटी सी उम्र,
छोटी-सी-तलवार....
तू क्या कर
सकता है?"
छत्रसाल
ने एक गहरा
श्वास लिया और
जैसे हाथियों
के झुंड पर
सिंह टूट
पड़ता है,
वैसे ही उन घुड़सवारों
पर वह टूट
पड़ा।
छत्रसाल ने
ऐसी वीरता
दिखाई कि एक
को मार गिराया,
दूसरा बेहोश
हो गया.... लोगों
को पता चले
उसके पहले ही
आधा दर्जन
सैनिकों को
मार भगाया।
धर्म की रक्षा
के लिए अपनी
जान तक की
परवाह नहीं की
वीर छत्रसाल
ने।
भारत के
ऐसे ही वीर
सपूतों के लिए
किसी ने कहा हैः
तुम
अग्नि की भीषण
लपट, जलते
हुए अंगार हो।
तुम
चंचला की
द्युति चपल, तीखी
प्रखर असिधार
हो।
तुम
खौलती
जलनिधि-लहर, गतिमय
पवन उनचास हो।
तुम
राष्ट्र के
इतिहास हो, तुम
क्रांति की
आख्यायिका।
भैरव
प्रलय के गान
हो, तुम
इन्द्र के
दुर्दम्य
पवि।
तुम
चिर अमर
बलिदान हो, तुम
कालिका के कोप
हो।
पशुपति
रूद्र के
भ्रूलास हो, तुम
राष्ट्र के
इतिहास हो।
ऐसे वीर
धर्मरक्षकों
की दिव्य गाथा
यही याद दिलाती
है कि दुष्ट बनो
नहीं और
दुष्टों से
डरो भी नहीं।
जो आततायी
व्यक्ति
बहू-बेटियों
की इज्जत से
खेलता है या
देश के लिए
खतरा पैदा
करता है, ऐसे
बदमाशों का सामना
साहस के साथ
करना चाहिए।
अपनी शक्ति जगानी
चाहिए। यदि
तुम धर्म और
देश की रक्षा
के लिए कार्य
करते हो तो
ईश्वर भी
तुम्हारी
सहायता करता
है।
'हरि ॐ..
हरि ॐ... हिम्मत...
साहस... ॐ...ॐ...बल...
शक्ति... हरि ॐ... ॐ...
ॐ...'
ऐसा उच्चारण
करके भी तुम
अपनी सोयी हुई
शक्ति को जगा
सकते हो। अभी
से लग जाओ
अपनी सुषुप्त
शक्ति को
जगाने के
कार्य में और
प्रभु को पाने
में।
ॐ
बात उन
दिनों की है
जब भामाशाह की
सहायता से राणा
प्रताप पुनः
सेना एकत्र
करके मुगलों
के छक्के
छुड़ाते हुए
डूंगरपुर,
बाँसवाड़ा
आदि स्थानों
पर अपना
अधिकार जमाते
जा रहे थे।
एक दिन
राणा प्रताप
अस्वस्थ थे,
उन्हें तेज
ज्वर था और
युद्ध का
नेतृत्व उनके
सुपुत्र
कुँवर अमर
सिंह कर रहे
थे। उनकी
मुठभेड़
अब्दुर्रहीम
खानखाना की
सेना से हुई।
खानखाना और
उनकी सेना जान
बचाकर भाग
खड़ी हुई। अमर
सिंह ने बचे
हुए सैनिकों तथा
खानखाना
परिवार की
महिलाओं को
वहीं कैद कर
लिया। जब यह
समाचार
महाराणा को
मिला तो वे
बहुत क्रुद्ध
हुए और बोलेः
"किसी
स्त्री पर
राजपूत हाथ
उठाये, यह मैं सहन
नहीं कर सकता।
यह हमारे लिए
डूब मरने की
बात है।"
वे तेज
ज्वर में ही
युद्ध-भूमि के
उस स्थान पर पहुँच
गये जहाँ
खानखाना
परिवार की
महिलाएँ कैद थीं।
राणा
प्रताप
खानखाना के
बेगम से विनीत
स्वर में
बोलेः
"खानखाना
मेरे बड़े भाई
हैं। उनके
रिश्ते से आप
मेरी भाभी
हैं। यद्यपि
यह मस्तक आज
तक किसी व्यक्ति
के सामने नहीं
झुका, परंतु
मेरे पुत्र
अमर सिंह ने
आप लोगों को
जो कैद कर
लिया और उसके
इस व्यवहार से
आपको जो कष्ट
हुआ उसके लिए
मैं माफी
चाहता हूँ और
आप लोगों को
ससम्मान मुगल
छावनी में
पहुँचाने का
वचन देता हूँ।"
उधर
हताश-निराश
खानखाना जब
अकबर के पास
पहुँचा तो
अकबर ने व्यंग्यभरी
वाणी से उसका
स्वागत कियाः
"जनानखाने
की युद्ध-भूमि
में छोड़कर
तुम लोग जान
बचाकर यहाँ तक
कुशलता से
पहुँच गये?"
खानखाना
मस्तक नीचा
करके बोलेः "जहाँपनाह
!
आप चाहे जितना
शर्मिन्दा कर
लें, परंतु
राणा प्रताप
के रहते वहाँ
महिलाओं को
कोई खतरा नहीं
है।" तब तक
खानखाना
परिवार की
महिलाएँ
कुशलतापूर्वक
वहाँ पहुँच
गयीं।
यह दृश्य
देख अकबर
गंभीर स्वर
में खानखाना
से कहने लगाः
"राणा
प्रताप ने
तुम्हारे
परिवार की
बेगमों को यों
ससम्मान
पहुँचाकर
तुम्हारी ही
नहीं, पूरे मुगल
खानदान की
इज्जत को
सम्मान दिया
है। राणा
प्रताप की
महानता के आगे
मेरा मस्तक झुका
जा रहा है।
राणा प्रताप
जैसे उदार
योद्धा को कोई
गुलाम नहीं
बना सकता।"
ॐ
एक लड़का
काशी में
हरिश्चन्द्र
हाई स्कूल में
पढ़ता था।
उसका गाँव
काशी से 8 मील
दूर था। वह रोजाना
वहाँ से पैदल
चलकर आता, बीच
में जो गंगा
नदी बहती है
उसे पार करता
और फिर विद्यालय
पहुँचता।
उस जमाने
में गंगा पार
करने के लिए
नाववाले को दो
पैसे देने
पड़ते थे। दो
पैसे आने के
और दो पैसे
जाने के, कुल
चार पैसे यानी
पुराना एक आना।
महीने में
करीब दो रुपये
हुए। जब सोने
के एक तोले का
भाव सौ रुपयों
से भी कम था तब
के दो रुपये।
आज के तो पाँच-पच्चीस
रुपये हो
जायें।
उस लड़के ने अपने माँ-बाप प