प्रातः स्मरणीय परम पूज्य

संत श्री आसारामजी बापू

के सत्संग प्रवचनों में से नवनीत

 

ईश्वर की ओर

 

 

 

 


 

ईश्वर की ओर. 3

मोहनिशा से जागो... 31

केवल निधि... 46

ज्ञानयोग.. 50

ज्ञानगोष्ठी... 56

दत्त और सिद्ध का संवाद. 60

चिन्तन कणिका... 63

प्रार्थना... 65


ईश्वर की ओर

 

(मार्च 1982, में आश्रम में चेटिचंड, चैत शुक्ल दूज का ध्यान योग शिविर चल रहा है । प्रात: काल में साधक भाई बहन पूज्य श्री के मधुर और पावन सान्निध्य में ध्यान कर रहे हैं । पूज्य श्री उन्हें ध्यान द्वारा जीवन और मृत्यु की गहरी सतहों में उतार रहें हैं | जीवन के गुप्त रहस्यों का अनुभव करा रहे हैं । साधक लोग ध्यान में पूज्यश्री की धीर, गम्भीर, मधुर वाणी के तंतु के सहारे अपने अन्तर में उतरते जा रहे हैं । पूज्य श्री कह रहे हैं:)

 

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यं अनहंकार एव च ।

जन्ममृत्युजराव्याधिदु:खदोषानुदर्शन्म्॥

 

इन्द्रिय विषयों में विरक्त, अहंकार का अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दु:ख और दोषों को देखना (यह ज्ञान है) ।

 

आज तक कई जन्मों के कुटुम्ब और परिवार तुमने सजाये धजाये । मृत्यु के एक झटके से वे सब छुट गये । अत: अभी से कुटुम्ब का मोह मन ही मन हटा दो ।

यदि शरीर की इज्ज्त आबरु की इच्छा है, शरीर के मान मरतबे की इच्छा है तो वह आध्यात्मिक राह में बड़ी रुकावट हो जायेगी । फेंक दो शरीर की ममता को । निर्दोष बालक जैसे हो जाओ ।

 

इस शरीर को बहुत सँभाला । कई बार इसको नहलाया, कई बार खिलाया पिलाया, कई बार घुमाया, लेकिनलेकिन यह शरीर सदा फरियाद करता ही रहा । कभी बीमारी कभी अनिद्रा कभी जोड़ों में दर्द कभी सिर में दर्द, कभी पचना कभी न पचना । शरीर की गुलामी बहुत कर ली । मन ही मन अब शरीर की यात्रा कर लो पूरी । शरीर को कब तक मैं मानते रहोगे बाबा…!

 

अब दृढ़तापूर्वक मन से ही अनुभव करते चलो कि तुम्हारा शरीर दरिया के किनारे घूमने गया । बेंच पर बैठा । सागर के सौन्दर्य को निहार रहा है । आ गया कोई आखिरी झटका । तुम्हारी गरदन झुक गयी । तुम मर गये

 

घर पर ही सिरदर्द हुआ या पेट में कुछ गड़बड़ हुई, बुखार आया और तुम मर गये

 

तुम लिखते-लिखते अचानक हक्के बक्के हो गये । हो गया हार्टफेल । तुम मर गये

 

तुम पूजा करते करते, अगरबत्ती करते करते एकदम सो गये । आवाज लगायी मित्रों को , कुटुम्बियों को, पत्नी को । वे लोग आये । पूछा: क्या हुआक्या हुआ? कुछ ही मिन्टों में तुम चल बसे

 

तुम रास्ते पर चल रहे थे । अचानक कोई घटना घटी, दुर्घटना हुई और तुम मर गये

 

निश्चित ही कुछ न कुछ निमित्त बन जायेगा तुम्हारी मौत का । तुमको पता भी न चलेगा । अत: चलने से पहले एक बार चलकर देखो । मरने से पहले एक बार मरकर देखो । बिखरने से पहले एक बार बिखरकर देखो ।

 

दृढ़तापूर्वक निश्चय करो कि तुम्हारी जो विशाल काया है, जिसे तुम नाम और रुप से मैंकरके सँभाल रहे हो उस काया का, अपने देह का अध्यास आज तोड़ना है । साधना के आखिरी शिखर पर पँहुचने के लिए यह आखिरी अड़चन है । इस देह की ममता से पार होना पड़ेगा । जब तक यह देह की ममता रहेगी तब तक किये हुए कर्म तुम्हारे लिए बंधन बने रहेंगे । जब तक देह में आसक्ति बनी रहेगी तब तक विकार तुम्हारा पीछा न छोड़ेगा । चाहे तुम लाख उपाय कर लो लेकिन जब तक देहाध्यास बना रहेगा तब तक प्रभु के गीत नहीं गूँज पायेंगे । जब तक तुम अपने को देह मानते रहोगे तब तक ब्रह्म-साक्षात्कार न हो पायेगा । तुम अपने को हड्डी, मांस, त्वचा, रक्त, मलमूत्र, विष्टा का थैला मानते रहोगे तब तक दुर्भाग्य से पिण्ड न छूटेगा । बड़े से बड़ा दुर्भाग्य है जन्म लेना और मरना । हजार हजार सुविधाओं के बीच कोई जन्म ले, फर्क क्या पड़ता है? दु:ख झेलने ही पड़ते हैं उस बेचारे को ।

 

हृदयपूर्वक ईमानदारी से प्रभु को प्रार्थना करो कि:

 

हे प्रभु ! हे दया के सागर ! तेरे द्वार पर आये हैं । तेरे पास कोई कमी नहीं । तू हमें बल दे, तू हमें हिम्मत दे कि तेरे मार्ग पर कदम रखे हैं तो पँहुचकर ही रहें । हे मेरे प्रभु ! देह की ममता को तोड़कर तेरे साथ अपने दिल को जोड़ लें |’

 

आज तक अगले कई जन्मों में तुम्हारे कई पिता रहे होंगे, माताएँ रही होंगी, कई नाते रिश्तेवाले रहे होंगे । उसके पहले भी कोई रहे होंगे । तुम्हारा लगाव देह के साथ जितना प्रगाढ़ होगा उतना ये नाते रिश्तों का बोझ तुम्हारे पर बना रहेगा । देह का लगाव जितना कम होगा उतना बोझ हल्का होगा । भीतर से देह की अहंता टूटी तो बाहर की ममता तुम्हें फँसाने में समर्थ नहीं हो सकती ।

 

भीतर से देह की आसाक्ति टूट गयी तो बाहर की ममता तुम्हारे लिए खेल बन जायेगी । तुम्हारे जीवन से फिर जीवनमुक्ति के गीत निकलेंगे ।

 

जीवन्मुक्त पुरुष सबमें होते हुए, सब करते हुए भी सुखपूर्वक जीते हैं, सुखपूर्वक खाते पीते हैं, सुखपूर्वक आते जाते हैं, सुखपूर्वक स्वस्वरुप में समाते हैं ।

 

केवल ममता हटाना है । देहाध्यास हट गया तो ममता भी हट गई । देह की अहंता को हटाने के लिए आज स्मशानयात्रा कर लो । जीते जी मर लो जरा सा । डरना मत । आज मौत को बुलाओ: हे मौत ! तू इस शरीर पर आज उतर ।

 

कल्पना करो कि तुम्हारे शरीर पर आज मौत उतर रही है । तुम्हारा शरीर ढीला हो गया । किसी निमित्त से तुम्हारे प्राण निकल गये । तुम्हारा शव पड़ा है । लोग जिसको आज तक फलाना भाईफलाना सेठफलाना साहब …’ कहते थे, उसके प्राण पखेरु आज उड़ गये । अब वह लोगों की नजरों में मुर्दा होकर पड़ा है । हकीम डॉक्टरों ने हाथ धो लिये हैं । जिसको तुम इतना पालते पोसते थे, जिसकी इज्जत आबरु को सँबालने में व्यस्त थे, वह शरीर आज मरा पड़ा है सामने । तुम उसे देख रहे हो । भीड़ इकठ्ठी हो गयी । कोई सचमुच में आँसू बहा रहा है, कोई झूठमूठ का रो रहा है ।

 

तुम चल बसे । शव पड़ा है । लोग आये, मित्र आये, पड़ोसी आये, साथी आये, स्नेही आये, टेलिफोन की घण्टियाँ खटख़टायी जा रही हैं, टेलिग्राम दिये जा रहे हैं । मृत्यु होने पर जो होना चाहिए वह सब किया जा रहा है ।

 

यह आखिरी ममता है देह की, जिसको पार किए बिना कोई योगी सिद्ध नहीं बन सकता, कोई साधक ठीक से साधना नहीं कर सकता, ठीक से सौभाग्य को उपलब्ध नहीं हो सकता । यह अंतिम अड़चन है । उसे हटाओ ।

 

मैं अरु मोर तोर की माया ।

बश कर दीन्हीं जीवन काया॥

 

तुम्हारा शरीर गिर गया, ढह गया । हो गया रामनाम सत है। तुम मर गये । लोग इकट्ठे हो गये । अर्थी के लिए बाँस मँगवाये जा रहे हैं । तुम्हें नहलाने के लिए घर के अंदर ले जा रहे हैं । लोगो ने उठाया । तुम्हारी गरदन झुक गयी । हाथ पैर लथड़ रहे हैं । लोग तुम्हें सँभालकर ले जा रहे हैं । एक बड़े थाल में शव को नहलाते हैं । लेकिन

 

लेकिन वह चमत्कार कहाँ… ? वह प्रकाश कहाँ  ? वह चेतना कहाँ… ?

जिस शरीर ने कितना कितना कमाया, कितना कितना खाया, जिसको कितना कितना सजाया, कितना कितना दिखाया, वह शरीर आज शव हो गया । एक श्वास लेना आज उसके बस की बात नहीं । मित्र को धन्यवाद देना उसके हाथ की बात नहीं । एक संत फकीर को हाथ जोड़ना उसके बस की बात नहीं ।

 

आज वह पराश्रित शरीर बेचारा, शव बेचारा चला कूच करके इस जँहा से । जिस पर इतने टेन्शन (तनाव) थे, जिस जीवन के लिए इतना खिंचाव तनाव था उस जीवन की यह हालत ? जिस शरीर के लिए इतने पाप और सन्ताप सहे वह शरीर आज इस परिस्थिति में पड़ा है ! देख लो जरा मन की आँख से अपने शरीर की हालत । लाचार पड़ा है । आज तक जो मैं मैं …’ कर रहा था, अपने को उचित समझ रहा था, सयाना समझ रहा था, चतुर समझ रहा था, देख लो उस चतुर की हालत । पूरी चतुराई खाक में मिल गई । पूरा known unknown( ज्ञात अज्ञात ) हो गया । पूरा ज्ञान एक झटके में समाप्त हो गया। सब नाते और रिश्ते टूट गये । धन और परिवार पराया हो गया ।

 

जिनके लिए तुम रात्रियाँ जगे थे, जिनके लिए तुमने मस्तक पर बोझ उठाया था वे सब अब पराये हो गये बाबा… ! जिनके लिए तुमने पीड़ाएँ सहीं , वे सब तुम्हारे कुछ नहीं रहे । तुम्हारे इस प्यारे शरीर की यह हालत …!!

 

मित्रों के हाथ से तुम नहलाये जा रहे हो । शरीर पोंछा न पोंछा , तौलिया घुमाया न घुमाया और तुम्हें वस्त्र पहना दिये । फिर उसे उठाकर बाँसों पर सुलाते हैं । अब तुम्हारे शरीर की यह हालत ! जिसके लिए तुमने बड़ी बड़ी कमाइयाँ कीं, बड़ी बड़ी विधाएँ पढ़ीं, कई जगह लाचारियाँ कीं, तुच्छ जीवन के लिए गुलामी की, कईयों को समझाया, सँभाला, वह लाचार शरीर, प्राण पखेरु के निकल जाने से पड़ा है अर्थी पर ।

 

जीते जी मरने का अनुभव कर लो । तुम्हारा शरीर वैसे भी तो मरा हुआ है । इसमें रखा भी क्या है ?

 

अर्थी पर पड़े हुए शव पर लाल कपड़ा बाँधा जा रहा है । गिरती हुई गरदन को सँभाला जा रहा है । पैरों को अच्छी तरह रस्सी बाँधी जा रही है, कहीं रास्ते में मुर्दा गिर न जाए । गरदन के इर्दगिर्द भी रस्सी के चक्कर लगाये जा रहे हैं । पूरा शरीर लपेटा जा रहा है । अर्थी बनानेवाला बोल रहा है: तू उधर से खींचदूसरा बोलता है : मैने खींचा है, तू गाँठ मार ।

 

लेकिन यह गाँठ भी कब तक रहेगी ? रस्सियाँ भी कब तक रहेंगी ? अभी जल जाएँगीऔर रस्सियों से बाँधा हुआ शव भी जलने को ही जा रहा है बाबा !

धिक्कार है इस नश्वर जीवन को … ! धिक्कार है इस नश्वर देह की ममता को… ! धिक्कार है इस शरीर के अध्यास और अभिमान को…!

 

अर्थी को कसकर बाँधा जा रहा है । आज तक तुम्हारा नाम सेठ, साहब की लिस्ट (सूची) में था । अब वह मुर्दे की लिस्ट में आ गया । लोग कहते हैं : मुर्दे को बाँधो जल्दी से ।अब ऐसा नहीं कहेंगे कि सेठ को, साहब को, मुनीम को, नौकर को, संत को, असंत को बाँधो…’ पर कहेंगे, मुर्दे को बाँधो ।

 

हो गया तुम्हारे पूरे जीवन की उपलब्धियों का अंत । आज तक तुमने जो कमाया था वह तुम्हारा न रहा । आज तक तुमने जो जाना था वह मृत्यु के एक झटके में छूट गया । तुम्हारे इन्कमटेक्स’ (आयकर) के कागजातों को, तुम्हारे प्रमोशन और रिटायरमेन्ट की बातों को, तुम्हारी उपलब्धि और अनुपलब्धियों को सदा के लिए अलविदा होना पड़ा ।

 

हाय रे हाय मनुष्य तेरा श्वास ! हाय रे हाय तेरी कल्पनाएँ ! हाय रे हाय तेरी नश्वरता ! हाय रे हाय मनुष्य तेरी वासनाएँ ! आज तक इच्छाएँ कर रहा था कि इतना पाया है और इतना पाँऊगा, इतना जाना है और इतना जानूँगा, इतना को अपना बनाया है और इतनों को अपना बनाँऊगा, इतनों को सुधारा है, औरों को सुधारुँगा ।

 

अरे! तू अपने को मौत से तो बचा ! अपने को जन्म मरण से तो बचा ! देखें तेरी ताकत । देखें तेरी कारीगरी बाबा !

 

तुम्हारा शव बाँधा जा रहा है । तुम अर्थी के साथ एक हो गये हो । स्मशानयात्रा की तैयारी हो रही है । लोग रो रहे हैं । चार लोगों ने तुम्हें उठाया और घर के बाहर तुम्हें ले जा रहे हैं । पीछे-पीछे अन्य सब लोग चल रहे हैं ।

 

कोई स्नेहपूर्वक आया है, कोई मात्र दिखावा करने आये है । कोई निभाने आये हैं कि समाज में बैठे हैं तो

 

दस पाँच आदमी सेवा के हेतु आये हैं । उन लोगों को पता नहीं के बेटे ! तुम्हारी भी यही हालत होगी । अपने को कब तक अच्छा दिखाओगे ? अपने को समाज में कब तक सेटकरते रहोगे ? सेट करना ही है तो अपने को परमात्मा में सेटक्यों नहीं करते भैया ?

 

दूसरों की शवयात्राओं में जाने का नाटक करते हो ? ईमानदारी से शवयात्राओं में जाया करो । अपने मन को समझाया करो कि तेरी भी यही हालत होनेवाली है । तू भी इसी प्रकार उठनेवाला है, इसीप्रकार जलनेवाला है । बेईमान मन ! तू अर्थी में भी ईमानदारी नहीं रखता ? जल्दी करवा रहा है ? घड़ी देख रहा है ? आफिस जाना हैदुकान पर जाना है…’ अरे ! आखिर में तो स्मशान में जाना है ऐसा भी तू समझ ले । आफिस जा, दुकान पर जा, सिनेमा में जा, कहीं भी जा लेकिन आखिर तो स्मशान मेँ ही जाना है । तू बाहर कितना जाएगा ?

 

ऐ पागल इन्सान ! ऐ माया के खिलौने ! सदियों से माया तुझे नचाती आयी है । अगर तू ईश्वर के लिए न नाचा, परमात्मा के लिए न नाचा तो माया तेरे को नचाती रहेगी । तू प्रभुप्राप्ति के लिए न नाचा तो माया तुझे न जाने कैसी कैसी योनियों में नचायेगी ! कहीं बन्दर का शरीर मिल जायगा तो कहीं रीछ का, कहीं गंधर्व का शरीर मिल जाएगा तो कहीं किन्नर का । फिर उन शरीरों को तू अपना मानेगा । किसी को अपनी माँ मानेगा तो किसी को बाप, किसी को बेटा मानेगा तो किसी को बेटी, किसी को चाचा मानेगा तो किसी को चाची, उन सबको अपना बनायेगा । फिर वहाँ भी एक झटका आयेगा मौत काऔर उन सबको भी छोड़ना पड़ेगा, पराया बनना पड़ेगा । तू ऐसी यात्राएँ कितने युगों से करता आया है रे ? ऐसे नाते रिश्ते तू कितने समय से बनाता आया है ?

 

मेरे पुत्र की शादी हो जायबहू मेरे कहने में चलेमेरा नौकर वफादार रहेदोस्तों का प्यार बना रहे…’ यह सब ऐसा हो भी गया तो आखिर कब तक ? प्रमोशन हो जाएहो गया । फिर क्या ? शादी हो जाए  हो गई शादी । फिर क्या ? बच्चे हो जायें हो गये बच्चे भी । फिर क्या करोगे ? आखिर में तुम भी इसी प्रकार अर्थी में बाँधे जाओगे । इसी प्रकार कन्धों पर उठाये जाओगे । तुम्हारे देह की हालत जो सचमुच होनेवाली है उसे देख लो । इस सनातन सत्य से कोई बच नहीं सकता । तुम्हारे लाखों रुपये तुम्हारी सहायता नहीं कर सकते । तुम्हारे लाखों परिचय तुम्हें बचा नहीं सकते । इस घटना से तुम्हें गुजरना ही होगा । अन्य सब घटनाओं से तुम बच सकते हो लेकिन इस घटना से बचानेवाला आज तक पृथ्वी पर न कोई है, न हो पाएगा । अत: इस अनिवार्य मौत को तुम अभी से ज्ञान की आँख द्वारा जरा निहार लो ।

 

तुम्हारी प्राणहीन देह को अर्थी में बाँधकर लोग ले जा रहे हैं स्मशान की ओर । लोगों की आँखो में आँसू हैं । लेकिन आँसू बहानेवाले भी सब इसी प्रकार जानेवाले हैं । आँसू बहाने से जान न छूटेगी । आँसू रोकने से भी जान न छूटेगी । शव को देखकर भाग जाने से भी जान न छूटेगी । शव को लिपट जाने से भी जान न छूटेगी । जान तो तुम्हारी तब छूटेगी जब तुम्हें आत्म साक्षात्कार होगा । जान तो तुम्हारी तब छूटेगी जब संत का कृपा प्रसाद तुम्हें पच जाएगा । जान तुम्हारी तब छूटेगी जब ईश्वर के साथ तुम्हारी एकता हो जाएगी ।

 

भैया ! तुम इस मौत की दुर्घटना से कभी नहीं बच सकते । इस कमनसीबी से आज तक कोई नहीं बच सका ।

 

आया है सो जाएगा राजा रंक फकीर ।

 

किसीकी अर्थी के साथ 50 आदमी हों या 500 आदमी हों, किसीकी अर्थी के साथ 5000 आदमी हो या मात्र मात्रात्मक आदमी हों, इससे फर्क क्या पड़ता है ? आखिर तो वह अर्थी अर्थी है, शव शव ही हैं ।

 

तुम्हारा शव उठाया जा रहा है । किसीने उस पर गुलाल छिड़का है, किसीने गेंदे के फूल रख दिये हैं । किसीने उसे मालाँए पहना दी हैं । कोई तुमसे बहुत निभा रहा है तो तुम पर इत्र छिड़क रहा है, स्प्रे कर रहा है । परन्तु अब क्या फर्क पड़ता है इत्र से ? स्प्रे तुम्हें क्या काम देगी बाबा… ?

 

शव पर चाहे ईंट पत्थर डाल दो चाहे सुवर्ण की इमारत खड़ी कर दो, चाहे फूल चढ़ा दो, चाहे हीरे जवाहरात न्योछावर कर दो, फर्क क्या पड़ता है ?

 

घर से बाहर अर्थी जा रही है । लोगों ने अर्थी को घेरा है । चार लोगों ने उठाया है, चार लोग साथ में है । रामबोलो भाई राम । तुम्हारी यात्रा हो रही है । उस घर से तुम विदा हो रहे हो जिसके लिए तुमने कितने कितने प्लान बनाये थे । उस द्वार से तुम सदा के लिए जा रहे हो बाबा … ! जिस घर को बनाने के लिए तुमने ईश्वरीय घर का त्याग कर रखा था, जिस घर को निभाने के लिए तुमने अपने प्यारे के घर का तिरस्कार कर रखा था उस घर से तुम मुर्दे के रुप में सदा के लिए विदा हो रहे हो । घर की दीवारें चाहे रो रही हों चाहे हँस रही हों, लेकिन तुमको तो जाना ही पड़ता है ।

 

समझदार लोग कह रहे हैं कि शव को जल्दी ले जाओ । रात का मरा हुआ है इसे जल्दी ले जाओ, नहीं तो इसके वायब्रेशन’ … इसके बैक्टीरियाफैल जायेंगे, दूसरों को बीमारी हो जायेगी । अब तुम्हें घड़ीभर रखने की किसीमें हिम्मत नहीं । चार दिन सँभालने का किसीमें साहस नहीं । सब अपना अपना जीवन जीना चाहते हैं । तुम्हे निकालने के लिए उत्सुक हैं समझदार लोग । जल्दी करो । समय हो गया । कब पँहुचोगे ? जल्दी करो, जल्दी करो भाई… !

 

तुम घर से कब तक चिपके रहोगे ? आखिर तो लोग तुम्हें बाँध बूँधकर जल्दी से स्मशान ले जायेंगे ।

 

देह की ममता तोड़नी पड़ेगी । इस ममता के कारण तुम जकड़े गये हो पाश में । इस ममता के कारण तुम जन्म मरण के चक्कर में फँसे हो । यह ममता तुम्हें तोड़नी पड़ेगी । चाहे आज तोड़ो चाहे एक जन्म के बाद तोड़ो, चाहे एक हजार जन्मो के बाद तोड़ो ।

 

लोग तुम्हें कन्धे पर उठाये ले जा रहे हैं । तुमने खूब मक्खन घी खाया है, चरबी ज्यादा है तो लोगों को परिश्रम ज्यादा है । चरबी कम है तो लोगों को परिश्रम कम है । कुछ भी हो, तुम अब अर्थी पर आरुढ़ हो गये हो ।

 

यारों ! हम बेवफाई करेंगे।

तुम पैदल होगे हम कंधे चलेंगे ॥

हम पड़े रहेंगे तुम धकेलते चलोगे ।

यारों ! हम बेवफाई करेंगे ॥

 

तुम कन्धों पर चढ़कर जा रहे हो जँहा सभी को अवश्य जाना है । राम बोलो भाई राम । राम बोलो भाई राम । राम बोलो भाई राम

अर्थीवाले तेजी से भागे जा रहे हैं । पीछे 50-100 आदमी जा रहे हैं । वे आपस में बातचीत कर रहे हैं कि: भाई अच्छे थे, मालदार थे, सुखी थे ।’ (अथवा) गरीब थे, दु:खी थेबेचारे चल बसे

 

उन मूर्खों को पता नहीं कि वे भी ऐसे ही जायेंगे । वे तुम पर दया कर रहे हैं और अपने को शाश्वत् समझ रहे हैं नादान !

 

अर्थी सड़क पर आगे बढ़ रही है । बाजार के लोग बाजार की तरफ भागे जा रहे हैं । नौकरीवाले नौकरी की तरफ भागे जा रहे हैं । तुम्हारे शव पर किसीकी नजर पड़ती है वह हो …’ करके फिर अपने काम की तरफ , अपने व्यवहार की तरफ भागा जा रहा है । उसको याद भी नहीं आती कि मैं भी इसी प्रकार जानेवाला हूँ, मैं भी मौत को उपलब्ध होनेवाला हूँ । साइकिल, स्कूटर, मोटर पर सवार लोग शवयात्रा को देखकर आहाउहू…’ करते आगे भागे जा रहे हैं, उस व्यवहार को सँभालने के लिए जिसे छोड़कर मरना है उन मूर्खो को । फिर भी सब उधर ही जा रहे हैं ।

 

अब तुम घर और स्मशान के बीच के रास्ते में हो । घर दूर सरकता जा रहा हैस्मशान पास आ रहा है । अर्थी स्मशान के नजदीक पहुँची । एक आदमी स्कूटर पर भागा और स्मशान में लकड़ियों के इन्तजाम में लगा । स्मशानवाले से कह रहा है: लकड़ी 8 मन तौलो, 10 मन तौलो, 16 मन तौलो । आदमी अच्छे थे इसलिए लकड़ी ज्यादा खर्च हो जाए तो कोई बात नहीं ।

 

जैसी जिनकी हैसियत होती है वैसी लकड़ियाँ खरीदी जाती हैं, लेकिन अब शव 8 मन में जले या 16 मन में , इससे क्या फर्क पड़ता है ? धन ज्यादा है तो 10 मन लकड़ी ज्यादा आ जाएगी, धन कम है तो दो-पाँच मन लकड़ी कम आ जाएगी, क्या फर्क पड़ता है इससे ? तुम तो बाबा हो गये पराये ।

 

अब स्मशान बिल्कुल नजदीक आ गया है । शकुन करने के लिए वहाँ बच्चों के बाल बिखेरे जा रहे हैं । लड्डू लाये थे साथ में, वे कुत्तों को खिलाये जा रहे हैं ।

जिसको बहुत जल्दी है वे लोग वहीं से खिसक रहे हैं । बाकी के लोग तुम्हें वहाँ ले जाते हैं जहाँ सभी को जाना होता है ।

 

लकड़ियाँ जमानेवाले लकड़ियाँ जमा रहे हैं । दो-पाँच मन लकड़ियाँ बिछा दी गयीं । अब तुम्हारी अर्थी को वे उन लकड़ियों पर उतार रहे हैं । बोझा कंधों से उतरकर अब लकड़ियों  पर पड़ रहा है । लेकिन वह बोझा भी कितनी देर वहाँ रहेगा ?

घास की गड्डियाँ, नारियल की जटायें, माचिस, घी और बत्ती सँभाली जा रही है । तुम्हारा अंतिम स्वागत करने के लिए ये चीजें यहाँ लायी गयी हैं । अंतिम अलविदा

अपने शरीर को तुमने हलवा-पूरी खिलाकर पाला या रुखी सूखी रोटी खिलाकर टिकाया इससे अब क्या फर्क पड़ता है ? गहने पहनकर जिये या बिना गहनों के जिये, इससे क्या फर्क पड़ता है ? आखिर तो वह अग्नि के द्वारा ही सँभाला जायेगा । माचिस से तुम्हारा स्वागत होगा ।

 

इसी शरीर के लिए तुमने ताप संताप सहे । इसी शरीर के लिए तुमने लोगों के दिल दु:खाये । इसी शरीर के लिए तुमने लोकेश्वर से सम्बन्ध तोड़ा । लो, देखो, अब क्या हो रहा है ? चिता पर पड़ा है वह शरीर । उसके ऊपर बड़े बड़े लक्कड़ जमाये जा रहे हैं । जल्दी जल जाय इसलिए छोटी लकड़ियाँ साथ में रखी जा रहीं हैं ।

 

सब लकड़ियाँ रख दी गयीं । बीच में घास भी मिलाया गया है, ताकि कोई हिस्सा कच्चा न रह जाय । एक भी मांस की लोथ बच न जाय । एक आदमी देख रेख करता है, मैनेजमेन्टकर रहा है । वहाँ भी नेतागिरी नहीं छूटती । नेतागिरी की खोपड़ी उसकी चालू है । ऐसा करो वैसा करो … ‘ वह सूचनायें दिये जा रहा है ।

 

ऐ चतुराई दिखानेवाले ! तुमको भी यही होनेवाला है । समझ लो भैया मेरे ! शव को जलाने में भी अगवानी चाहिए ? कुछ मुख्य विशेषताँए चाहिए वहाँ भी ? वाह वाह … !

 

हे अज्ञानी मनुष्य ! तू क्या क्या चाहता है ? हे नादान मनुष्य ! तूने क्या क्या किया है ? ईश्वर के सिवाय तूने कितने नाटक किये ? ईश्वर को छोड़कर तूने बहुत कुछ पकड़ा, मगर आज तक मृत्यु के एक झटके से सब कुछ हर बार छूटता आया है । हजारों बार तुझसे छुड़वाया गया है और इस जन्म में भी छुड़वाया जायेगा । तू जरा सावधान हो जा मेरे भैया !

 

अर्थी के ऊपर लकड़े  फिटहो गये हैं । तुम्हारे पुत्र, तुम्हारे स्नेही मन में कुछ भाव लाकर आँसू बहा रहे हैं । कुछ स्नेहियों के आँसू नहीं आते हैं इसलिए वे शरमिंदा हो रहे हैं । बाकी के लोग गपशप लगाने बैठ गये हैं । कोई बीड़ी पीने लगा है कोई स्नान करने बैठ गया है, कोई स्कूटर की सफाई कर रहा है । कोई अपने कपड़े बदलने में व्यस्त है । कोई दुकान जाने की चिन्ता में है, कोई बाहरगाँव जाने की चिन्ता में है । तुम्हारी चिन्ता कौन करता है ? कब तक करेंगे लोग तुम्हारी चिन्ता ? तुम्हें स्मशान तक पँहुचा दिया, चित्ता पर सुला दिया, दीया-सलाई दान में दी, बात पूरी हो गयी ।

 

लोग अब जाने को आतुर हैं । अब चिता को आग लगाओ । बहुत देर हो गई । जल्दी करोजल्दी करो…’ इशारे हो रहे हैं । वे ही तो मित्र थे जो तुमसे कह रहे थे : बैठे रहो, तुम मेरे साथ रहो, तुम्हारे बिना चैन नहीं पड़ता ।अब वे ही कह रहे हैं : जल्दी करोआग लगाओहम जायेंजान छोड़ो हमारी…’

 

वाह रे वाह संसार के मित्रों ! वाह रे वाह संसार के रिश्ते नाते । धन्यवादधन्यवादतुम्हारा पोल देख लिया ।

 

प्रभु को मित्र न बनाया तो यही हाल होनेवाला है ।  आज तक जो लोग तुम्हें सेठ, साहब कहते थे, जो तुम्हारे लंगोटिया यार थे वे ही जल्दी कर रहे हैं । उन लोगों को भूख लगी है । खुलकर तो नहीं बोलते लेकिन भीतर ही भीतर कह रहे हैं कि अब देर नहीं करो । जल्दी स्वर्ग पँहुचाओ । सिर की ओर से आग लगाओ ताकि जल्दी स्वर्ग में जाय ।

 

वह तो क्या स्वर्ग में जाएगा ! उसके कर्म और मान्यताँए जैसी होंगी ऐसे स्वर्ग में वह जायेगा लेकिन तुम रोटी रुप स्वर्ग में जाओगे । तुमको यहाँ से छुट्टी मिल जायेगी ।

 

नारियल की जटाओं में घी डालते हैं । ज्योति जलाते हैं, तुम्हारे बुझे हुए जीवन को सदा के लिए नष्ट करने के हेतु ज्योति जलायी जा रही है । यह ब्रह्मज्ञानी गुरु की ज्योति नहीं है, यह सदगुरु की ज्योति नहीं है । यह तुम्हारे मित्रों की ज्योति है ।

 

जिनके लिए पूरा जीवन तुम खो रहे थे वे लोग तुम्हें यह ज्योति देंगे । जिनके पास जाने के लिए तुम्हारे पास समय न था उन सदगुरु की ज्योति तुमने देखी भी नहीं हैं बाबा !

 

लोग ज्योति जलाते हैं । सिर की तरफ लकड़ियों के बीच जो घास है उसे ज्योति का स्पर्श कराते हैं । घास की गड्डी को आग ने घेर लिया है । पैरों की तरफ भी एक आदमी आग लगा रहा है । भुभुक भुभुक अग्नि शुरु हो गयी । तुम्हारे ऊपर ढँके हुए कपड़े तक आग पँहुच गयी है । लकड़े धीरे धीरे आग पकड़ रहे हैं । अब तुम्हारे बस की बात नहीं कि आग बुझा लो । तुम्हारे मित्रों को जरुरत नहीं कि फायर ब्रिगेड बुला लें । अब डॉक्टर हकीमों को बुलाने का मौका नहीं है । जरुरत भी नहीं है । अब सबको घर जाना है, तुमको छोड़कर विदा होना है ।

 

धुआँ निकल रहा है । आग की ज्वालाएँ निकल रही हैं । जो ज्यादा स्नेही और साथी थे, वे भी आग की तपन से दूर भाग रहे हैं । चारों और अग्नि के बीच तुम्हें अकेला जलना पड़ रहा है । मित्र , स्नेही , सम्बन्धी बचपन के दोस्त सब दूर खिसक रहे हैं ।

 

अब कोई किसीकानहीं । सारे सम्बन्ध ममता के सम्बन्ध । ममता में जरा सी आँच सहने की ताकत कहाँ है ? तुम्हारे नाते रिश्तों में मौत की एक चिनगारी सहने की ताकत कहाँ है ? फिर भी तुम संबंध को पक्के किये जा रहे हो । तुम कितने भोले महेश्वर हो ! तुम कितने नादान हो ! अब देख लो जरा सा !

अर्थी को आग ने घेरा है । लोगों को भूख ने घेरा है । कुछ लोग वहाँ से खिसक गये । कुछ लोग बचे हैं । चिमटा लिए हुए स्मशान का एक नौकर भी है । वह सँभाल करता है कि लक्कड़ इधर उधर न चला जाए । लक्कड़ गिरता है तो फिर चढ़ाता है तुम्हारे सिर पर । अब आग ने ठीक से घेर लिया है । चारों तरफ भुभुक भुभुक आग जल रही है । सिर की तरफ आग पैरों की तरफ आग बाल तो ऐसे जले मानो घास जला । मुंडी को भी आग ने घेर लिया है । मुँह में घी डाला हुआ था, बत्ती डाली हुई थी, आँखों पर घी लगाया हुआ था ।

 

मत कर रे भाया गरव गुमान गुलाबी रंग उड़ी जावेलो ।

मत कर रे भाया गरव गुमान जवानीरो रंग उड़ी जावेलो ।

उड़ी जावेलो रे फीको पड़ी जावेलो रे काले मर जावेलो,

पाछो नहीं आवेलोमत कर रे गरव

जोर रे जवानी थारी फिर को नी रे वेला

इणने जातां नहीं लागे वार गुलाबी रंग उड़ी जावेलो॥

पतंगी रंग उड़ी जावेलोमत कर रे गरव ॥

धन रे दौलत थारा माल खजाना रे

छोड़ी जावेलो रे पलमां उड़ी जावेलो॥

पाछो नहीं आवेलोमत कर रे गरव ।

कंई रे लायो ने कंई ले जावेलो भाया

कंई कोनी हाले थारे साथ गुलाबी रंग उड़ी जावेलो॥

पतंगी रंग उड़ी जावेलोमत कर रे गरव ॥

 

तुम्हारे सारे शरीर को स्मशान की आग ने घेर लिया है । एक ही क्षण में उसने अपने भोग का स्वीकार कर लिया है । सारा शरीर काला पड़ गया । कपड़े जल गये, कफन जल गया, चमड़ी जल गई । पैरों का हिस्सा नीचे लथड़ रहा है, गिर रहा है । चरबी को आग स्वाहा कर रही है । मांस के टुकड़े जलकर नीचे गिर रहे हैं । हाथ के पंजे और हड्डियाँ गिर रही हैं । खोपड़ी तड़ाका देने को उत्सुक हो रही हैं । उसको भी आग ने तपाया है । शव में फैले हुए बैक्टीरियातथा बचा हुआ गैस था वह सब जल गया ।

 

ऐ गाफिल ! न समझा था , मिला था तन रतन तुझको ।

मिलाया खाक में तुने, ऐ सजन ! क्या कहूँ तुझको ?

अपनी वजूदी हस्ती में तू इतना भूल मस्ताना

अपनी अहंता की मस्ती में तू इतना भूल मस्ताना

करना था किया वो न, लगी उल्टी लगन तुझको ॥

ऐ गाफिल ……

जिन्होंके प्यार में हरदम मुस्तके दीवाना था

जिन्होंके संग और साथ में भैया ! तू सदा विमोहित था

आखिर वे ही जलाते हैं करेंगे या दफन तुझको ॥

ऐ गाफिल

शाही और गदाही क्या ? कफन किस्मत में आखिर ।

मिले या ना खबर पुख्ता ऐ कफन और वतन तुझको ॥

ऐ गाफिल ……

 

पहनी हुई टेरीकोटन, पहने हुए गहने तेरे काम न आए । तेरे वे हाथ, तेरे वे पैर सदा के लिए अग्नि के ग्रास हो रहे हैं । लक्कड़ों के बीच से चरबी गिर रही है । वहाँ भी आग की लपटें उसे भस्म कर रही हैं । तुम्हारे पेट की चरबी सब जल गई । अब हड्डियाँ पसलियाँ एक एक होकर जुदा हो रही हैं ।

 

होकितना सँभाला था इस शरीर को ! कितना प्यारा था वह ! जरा सी किडनी बिगड़ गई तो अमेरिका तक की दौड़ थी । अब तो पूरी देह बिगड़ी जा रही है। कहाँ तक दौड़ोगे ? कब तक दौड़ोगे ? जरा सा पैर दुखता था, हाथ में चोट लगती थी तो स्पेश्यलिस्टों से घेरे जाते थे । अब कौन सा स्पेश्यलिस्ट यहाँ काम देगा ? ईश्वर के सिवाय कोई यहाँ सहाय न कर सकेगा । आत्मज्ञान के सिवाय इस मौत की आग से तुम्हें सदा के लिए बचाने का सामर्थ्य डॉक्टरों स्पेश्यलिस्टों के पास कहाँ है ? वे लोग खुद भी इस अवस्था में आनेवाले हैं । भले थोकबन्ध फीस ले लें, पर कब तक रखेंगे ? भले जाँच पड़ताल मात्र के लिये थप्पीबंद नोटों के बंडल ले लें, पर लेकर जायेंगे कहाँ ? उन्हें भी इसी अवस्था से गुजरना होगा ।

 

शाही और गदाही क्या? कफन किस्मत में आखिर

 

कर लो इकट्ठा । ले लो लम्बी चौड़ी फीस । लेकिन याद रखो : यह क्रूर मौत तुम्हें साम्यवादी बनाकर छोड़ देगी । सबको एक ही तरह से गुजारने का सामर्थ्य यदि किसीमें है तो मौत में है । मौत सबसे बड़ी साम्यवादी है । प्रकृति सच्ची साम्यवादी है ।

 

तुम्हारे शरीर का हाड़पिंजर भी अब बिखर रहा है । खोपड़ी टूटी । उसके पाँच सात टुकड़े हो गये । गिर रहे हैं इधर उधर । आहाहाहड्डी के टुकड़े किसके थे ? कोई साहब के थे या चपरासी के थे ? सेठ के थे या नौकर के थे ? सुखी आदमी के थे या दु:खी आदमी के थे ? भाई के थे या माई के थे ? कुछ पता नहीं चलता ।

 

अब आग धीरे-धीरे शमन को जा रही है । अधिकांश मित्र स्नान में लगे हैं । तैयारियाँ कर रहे हैं जाने की । कितने ही लोग बिखर गये । बाकी के लोग अब तुम्हारी आखिरी इजाजत ले रहे हैं । आग को जल की अंजलि देकर, आँखों में आँसू लेकर विदा हो रहे हैं ।

 

कह रहा है आसमाँ यह समाँ कुछ भी नहीं ।

रोती है शबनम कि नैरंगे जहाँ कुछ भी नहीं ॥

जिनके महलों में हजारों रंग के जलते थे फानूस ।

झाड़ उनकी कब्र पर है और निशाँ कुछ भी नहीं ॥

जिनकी नौबत से सदा गूँजते थे आसमाँ ।

दम बखुद है कब्र में अब हूँ न हाँ कुछ भी नहीं ॥

तख्तवालों का पता देते हैं तख्ते गौर के ।

खोज मिलता तक नहीं वादे अजां कुछ भी नहीं ॥

 

स्मशान में अब केवल अंगारों का ढेर बचा । तुम आज तक जो थे वह समाप्त हो गये । अब हड्डियों से मालूम करना असंभव है कि वे किसकी हैं । केवल अंगारे रह गये हैं । तुम्हारी मौत हो गई । हड्डियाँ और खोपड़ी बिखर गयी । तुम्हारे नाते और रिश्ते टूट गये । अपने और पराये के सम्बन्ध कट गये । तुम्हारे शरीर की जाति और सांप्रदायिक सम्बन्ध टूट गये । शरीर का कालापन और गोरापन समाप्त हो गया । तुम्हारी तन्दुरुस्ती और बीमारी अग्नि ने एक कर दी ।

 

ऐ गाफिल ! न समझा था

 

आग अब धीरे धीरे शांत हो रही है क्योंकि जलने की कोई चीज बची नहीं । कुटुम्बी, स्नेही, मित्र, पड़ोसी सब जा रहे हैं । स्मशान के नौकर से कह रहे हैं : हम परसों आयेंगे फूल चुनने के लिए । देखना, किसी दूसरे के फूल मिश्रित न हो जाए ।कइयों के फूल वहाँ पड़े भी रह जाते हैं । मित्र अपनेवालों के फूल समझकर उठा लेते हैं ।

 

कौन अपना कौन पराया ? क्या फूल और क्या बेफूल ? फूलजो था वह तो अलविदा हो गया । अब हड्डियों को फूल कहकर भी क्या खुशी मनाओगे? फूलों का फूल तो तुम्हारा चैतन्य था । उस चैतन्य से सम्बन्ध कर लेते तो तुम फूल ही फूल थे ।

 

सब लोग घर गये । एक दिन बीता । दूसरा दिन बीता । तीसरे दिन वे लोग पहुँचे स्मशान में । चिमटे से इधर उधर ढूँढ़कर अस्थियाँ इकट्ठी कर लीं । डाल रहे हैं तुम्हें एक डिब्बे में बाबा ! खोपड़ी के कुछ टुकड़े, जोड़ों की कुछ हड्डियाँ मिल गईं । जो पक्की पक्की थीं वे मिलीं, बाकी सब भस्म हो गईं ।

 

करीब एकाध किलो फूल मिल गये । उन्हें डिब्बे में डालकर मित्र घर ले आए हैं । समझानेवालों  ने कहा : हड्डियाँ घर में न लाओ । बाहर रखो, दूर कहीं । किसी पेड़ की डाली पर बाँध दो । जब हरिद्वार जायेंगे तब वहाँ से लेकर जायेंगे। उसे घर में न लाओ, अपशकुन है ।

 

अब तुम्हारी हड्डियाँ अपशकुन हैं । घर में आना अमंगल है। वाह रे वाह संसार ! तेरे लिए पूरा जीवन खर्च किया था । इन हड्डियों को कई वर्ष बनाने में और सँभालने में लगे । अब अपशकुन हो रहा है ? बोलते हैं : इस डिब्बे को बाहर रखो । पड़ोसी के घर ले जाते हैं तो पड़ोसी नाराज होता है कि यह क्या कर रहे हो ? तुम्हारे जिगरी दोस्त के घर ले जाते हैं तो वह इन्कार कर देता है कि इधर नहीं दूर दूर दूर

 

तुम्हारी हड्डियाँ किसीके घर में रहने लायक नहीं हैं, किसीके मंदिर में रहने लायक नहीं हैं । लोग बड़े चतुर हैं । सोचते हैं : अब इससे क्या मतलब है ? दुनियाँ के लोग तुम्हारे साथ नाता और रिश्ता तब तक सँभालेंगे जब तक तुमसे उनको कुछ मिलेगा । हड्डियों से मिलना क्या है?

 

दुनियाँ के लोग तुम्हें बुलायेंगे कुछ लेने के लिए । तुम्हारे पास अब देने के लिए बचा भी क्या है ? वे लोग दोस्ती करेंगे कुछ लेने के लिए । सदगुरु तुम्हें प्यार करेंगे प्रभु देने के लिए । दुनियाँ के लोग तुम्हें नश्वर देकर अपनी सुविधा खड़ी करेंगे, लेकिन सदगुरू तुम्हें शाश्वत् देकर अपनी सुविधा की परवाह नहीं करेंगे । ॐ

 

जिसमें चॉकलेट पड़ी थी, बिस्किट पड़े थे उस छोटे से डिब्बे में तुम्हारी अस्थियाँ पड़ी हैं । तुम्हारे सब पद और प्रतिष्ठा इस छोटे से डिब्बे में पराश्रित होकर, अति तुच्छ होकर पेड़ पर लटकाये जा रहे हैं । जब कुटुम्बियों को मौका मिलेगा तब जाकर गंगा में प्रवाहित कर देंगे ।

 

देख लो अपने कीमती जीवन की हालत !

 

जब बिल्ली दिखती है तब कबूतर आँखे बंद करके मौत से बचना चाहता है लेकिन बिल्ली उसे चट कर देती है । इसी प्रकार तुम यदि इस ठोस सत्य से बचना चाहोगे, मेरी मौत न होगीऐसा विचार करोगे अथवा इस सत्संग को भूल जाओगे फिर भी मौत छोड़ेगी नहीं ।

 

इस सत्संग को याद रखना बाबा ! मौत से पार कराने की कुंजी वह देता है तुम्हें । तुम्हारी अहंता और ममता तोड़ने के लिये युक्ति दिखाता है , ताकि तुम साधना में लग जाओ । इस राह पर कदम रख ही दिये हैं तो मंजिल तक पँहुच जाओ । कब तक रुके रहोगे ? हजार-हजार रिश्ते और नाते तुम जोड़ते आये हो । हजार हजार संबंधियों को तुम रिझाते आये हो । अब तुम्हारी अस्थियाँ गंगा में पड़े उससे पहले अपना जीवन ज्ञान की गंगा में बहा देना । तुम्हारी अस्थियाँ पेड़ पर टँगें उससे पहले तुम अपने अहंकार को टाँग देना परमात्मा की अनुकंपा में । परमात्मारुपी पेड़ पर अपना अहंकार लटका देना । फिर जैसी उस प्यारे की मर्जी होनचा ले, जैसी उसकी मर्जी होदौड़ा ले ।

 

तेरी मर्जी पूरन हो

 

ऐसा करके अपने अहंकार को परमात्मारुपी पेड़ तक पँहुचा दो ।

 

तीसरा दिन मनाने के लिए लोग इकट्ठे हुए हैं । हँसनेवाले शत्रुओं ने घर बैठे थोड़ा हँस लिया । रोनेवाले स्नेहियों ने थोड़ा रो लिया । दिखावा करनेवालों ने औपचारिकताएँ पूरी कर लीं ।

 

सभा में आए हुए लोग तुम्हारी मौत के बारे में कानाफूसी कर रहे हैं:

 

मौत कैसे हुई? सिर दुखता था । पानी माँगा । पानी दिया और पीते पीते चल बसे ।

चक्कर आये और गिर पड़े । वापस नहीं उठे ।

 

पेट दुखने लगा और वे मर गये ।

 

सुबह तो घूमकर आये । खूब खुश थे । फिर जरा सा कुछ हुआ । बोले : मुझे कुछ हो रहा है, डॉक्टर को बुलाओ ।हम बुलाने गये और पीछे यह हो गया।

 

हॉस्पिटल में खुब उपचार किये, बचाने के लिए डॉक्टरों ने खूब प्रयत्न किये लेकिन मर गये । रास्ते पर चलते चलते सिधार गये। कुछ न कुछ निमित्त बन ही गया।

 

तीसरा दिन मनाते वक्त तुम्हारी मौत के बारे में बातें हो गई थोड़ी देर । फिर समय हो गया : पाँच से छ: । उठकर सब चल दिये । कब तक याद करते रहेंगे ? लोग लग गये अपने-अपने काम धन्धे में ।

 

अस्थियों का डिब्बा पेड़ पर लटक रहा है । दिन बीत रहे हैं । मौका आया । वह डिब्बा अब हरिद्वार ले जाया जा रहा है । एक थैली में डिब्बा डालकर ट्रेन की सीट के नीचे रखते हैं । लोग पूछ्ते हैं: इसमें क्या है?तुम्हारे मित्र बताते हैं : नहीं नहीं, कुछ नहीं । सब ऐसे ही है । अस्थियाँ हैं इसमें…’ ऐसा कहकर वे पैर से डिब्बे को धक्का लगाते हैं । लोग चिल्लाते हैं:

यहाँ नहीं   यहाँ नहीं उधर रखो ।

 

वाह रे वाह संसार ! तुम्हारी अस्थियाँ जिस डिब्बे में हैं वह डिब्बा ट्रेन में सीट के नीचे रखने के लायक नहीं रहा । वाह रे प्यारा शरीर ! तेरे लिए हमने क्या क्या किया था ? तुझे सँभालने के लिए हमने क्या क्या नहीं किया ? … !!

 

मित्र हरिद्वार पहुँचे हैं । पण्डे लोगों ने उन्हें घेर लिया । मित्र आखिरी विधि करवा रहे हैं । अस्थियाँ डाल दीं गंगा में, प्रवाहित हो गयीं । पण्डे को दक्षिणा मिल गई । मित्रों को आँसू बहाने थे, दो चार बहा लिये । अब उन्हें भी भूख लगी है । अब वे भी अपनी हड्डियाँ सँभालेंगे, क्योंकि उन्हें तो सदा रखनी हैं। वे खाते हैं, पीते हैं, गाड़ी का समय पूछते हैं ।

 

जल्दी वापस लौटना है क्योंकि आफिस में हाजिर होना है, दुकान सँभालनी है। वे सोचते हैं: वह तो मर गया । उसे विदा दे दी । मैं मरनेवाला थोड़े हूँ ।

 

मित्र भोजन में जुट गये हैं।

 

आज तुमने अपनी मौत की यात्रा देखी । अपने शव की, अपनी हड्डियों की स्थिति देख ली । तुम एक ऐसी चेतना हो कि तुम्हारी मौत होने पर भी तुम उस मौत के साक्षी हो । तुम्हारी हड्डियाँ जलने पर भी तुम उससे पृथक् रहनेवाली ज्योति हो ।

 

तुम्हारी अर्थी जलने के बाद भी तुम अर्थी से पृथक् चेतना हो । तुम साक्षी हो, आत्मा हो । तुमने आज अपनी मौत को भी साक्षी होकर देख लिया । आज तक तुम हजारों-हजारों मौत की यात्राओं को देखते आये हो ।

 

जो मौत की यात्रा के साक्षी बन जाते हैं उनके लिये यात्रा यात्रा रह जाती है, साक्षी उससे परे हो जाता है ।

 

मौत के बाद अपने सब पराये हो गये । तुम्हारा शरीर भी पराया हो गया । लेकिन तुम्हारी आत्मा आज तक परायी नहीं हुई ।

 

हजारों मित्रों ने तुमको छोड़ दिया, लाखों कुटुम्बियों ने तुमको छोड़ दिया, करोड़ों-करोड़ों शरीरों ने तुमको छोड़ दिया, अरबों-अरबों कर्मों ने तुमको छोड़ दिया लेकिन तुम्हारा आत्मदेव तुमको कभी नहीं छोड़ता ।

 

शरीर की स्मशानयात्रा हो गयी लेकिन तुम उससे अलग साक्षी चैतन्य हो । तुमने अब जान लिया कि:

 

मैं इस शरीर की अंतिम यात्रा के बाद भी बचता हूँ, अर्थी के बाद भी बचता हूँ, जन्म से पहले भी बचता हूँ और मौत के बाद भी बचता हूँ । मैं चिदाकाश ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ । मैंने छोड़ दिया मोह ममता को । तोड़ दिया सब प्रपंच ।

 

इस अभ्यास को बढ़ाते रहना । शरीर की अहंता और ममता, जो आखिरी विघ्न है, उसे इस प्रकार तोड़ते रहना । मौका मिले तो स्मशान में जाना । दिखाना अपनेको वह दृश्य ।

 

मैं भी जब घर में था, तब स्मशान में जाया करता था । कभी-कभी दिखाता था अपने मन को कि, देख ! तेरी हालत भी ऐसी होगी ।

 

स्मशान में विवेक और वैराग्य होता है । बिना विवेक और वैराग्य के तुम्हें ब्रह्माजी का उपदेश भी काम न आयेगा । बिना विवेक और वैराग्य के तुम्हें साक्षात्कारी पूर्ण सदगुरु मिल जायँ फिर भी तुम्हें इतनी गति न करवा पायेंगे । तुम्हारा विवेक और वैराग्य न जगा हो तो गुरु भी क्या करें ?

 

विवेक और वैराग्य जगाने के लिए कभी कभी स्मशान में जाते रहना । कभी घर में बैठे ही मन को स्मशान की यात्रा करवा लेना ।

 

मरो मरो सब कोई कहे मरना न जाने कोय ।

एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होय ॥

 

ज्ञान की ज्योति जगने दो । इस शरीर की ममता को टूटने दो । शरीर की ममता टूटेगी तो अन्य नाते रिश्ते सब भीतर से ढीले हो जायेंगे । अहंता ममता टूटने पर तुम्हारा व्यवहार प्रभु का व्यवहार हो जाएगा । तुम्हारा बोलना प्रभु का बोलना हो जाएगा । तुम्हारा देखना प्रभु का देखना हो जाएगा । तुम्हारा जीना प्रभु का जीना हो जाएगा ।

 

केवल भीतर की अहंता तोड़ देना । बाहर की ममता में तो रखा भी क्या है ?

     

देहाभिमाने गलिते विज्ञाते परमात्मनि।

यत्र यत्र मनो याति तत्र तत्र समाधय: ॥

देह छ्तां जेनी दशा वर्ते देहातीत ।

ते ज्ञानीना चरणमां हो वन्दन अगणित ॥

 

भीतर ही भीतर अपने आपसे पूछो कि:

 

मेरे ऐसे दिन कब आयेंगे कि देह होते हुए भी मैं अपने को देह से पृथक् अनुभव करुँग? मेरे ऐसे दिन कब आयेंगे कि एकांत में बैठा बैठा मैं अपने मन बुद्धि को पृथक् देखते-देखते अपनी आत्मा में तृप्त होऊँगा ? मेरे ऐसे दिन कब आयेंगे कि मैं आत्मानन्द में मस्त रहकर संसार के व्यवहार में निश्चिन्त रहूँगा ? मेरे ऐसे दिन कब आयेंगे कि शत्रु और मित्र के व्यवहार को मैं खेल समझूँगा ?

 

ऐसा न सोचो कि वे दिन कब आयेंगे कि मेरा प्रमोशन हो जाएगामैं प्रेसिडेन्ट हो जाऊँगा मैं प्राइम मिनिस्टर हो जाऊँगा ?

 

आग लगे ऐसे पदों की वासना को ! ऐसा सोचो कि मैं कब आत्मपद पाऊँगा ? कब प्रभु के साथ एक होऊँगा ?

 

अमेरिका के प्रेसिडेन्ट मि कूलिज व्हाइट हाउस में रहते थे । एक बार वे बगीचे में घूम रहे थे । किसी आगन्तुक ने पूछा : यहाँ कौन रहता है ?

 

कूलिज ने कहा : यहाँ कोई रहता नहीं है। यह सराय है, धर्मशाला है। यहाँ कई आ आकर चले गये, कोई रहता नहीं ।

 

रहने को तुम थोड़े ही आये हो ! तुम यहाँ से गुजरने को आये हो, पसार होने को आये हो । यह जगत तुम्हारा घर नहीं है । घर तो तुम्हारा आत्मदेव है । फकीरों का जो घर है वही तुम्हारा घर है। जहाँ फकीरों ने डेरा डाला है वहीं तुम्हारा डेरा सदा के लिए टिक सकता है, अन्यत्र नहीं । अन्य कोई भी महल, चाहे कैसा भी मजबूत हो, तुम्हें सदा के लिए रख नहीं सकता ।

 

संसार तेरा घर नहीं, दो चार दिन रहना यहाँ ।

कर याद अपने राज्य की, स्वराज्य निष्कंटक जहाँ ॥

 

कूलिज से पूछा गया : I have come to know that Mr. Coolidge, President of America lives here. ’

( ‘ुझे पता चला है कि अमेरिका के राष्ट्रपति श्री कूलिज यहाँ रहते हैं ।’)

कूलिज ने कहा : ‘No, Coolidge doesnot live here. Nobody lives here. Everybody is passing through.’ (‘नहीं, कूलिज यहाँ नहीं रहता । कोई भी नहीं रहता । सब यहाँ से गुजर रहे हैं। ’)

 

चार साल पूरे हुए । मित्रों ने कहा : फिर से चुनाव लड़ो । समाज में बड़ा प्रभाव है अपका । फिर से चुने जाओगे ।

 

कूलिज बोला : चार साल मैंने व्हाइट हाउस में रहकर देख लिया । प्रेसिडेन्ट का पद सँभालकर देख लिया । कोई सार नहीं । अपने आपसे धोखा करना है, समय बरबाद करना है। I have no time to waste. अब मेरे पास बरबाद करने के लिए समय नहीं है ।

 

ये सारे पद और प्रतिष्ठा समय बरबाद कर रहे हैं तुम्हारा । बड़े बड़े नाते रिश्ते तुम्हारा समय बरबाद कर रहे हैं । स्वामी रामतीर्थ प्रार्थना किया करते थे :

 

हे प्रभु ! मुझे मित्रों से बचाओ, मुझे सुखों से बचाओ

 

सरदार पूरनसिंह ने पूछा : क्या कह रहे हैं स्वामीजी ? शत्रुओं से बचना होगा, मित्रों से क्या बचना है ?

 

रामतीर्थ : नहीं, शत्रुओं से मैं निपट लूँगा, दु:खों से मैं निपट लूँगा । दु:ख में कभी आसक्ति नहीं होती, ममता नहीं होती । ममता, आसक्ति जब हुई है तब सुख में हुई है, मित्रों में हुई है, स्नेहियों में हुई है ।

 

मित्र हमारा समय खा जाते हैं, सुख हमारा समय खा जाता है । वे हमें बेहोशी में रखते हैं । जो करना है वह रह जाता है । जो नहीं करना है उसे सँभालने में ही जीवन खप जाता है ।

 

तथाकथित मित्रों से हमारा समय बच जाए, तथाकथित सुखों से हमारी आसक्ति हट जाए । सुख में होते हुए भी परमात्मा में रह सको, मित्रों के बीच रहते हुए भी ईश्वर में रह सको - ऐसी समझ की एक आँख रखना अपने पास ।

 

ॐ शांति : शांति : शांति : ! ॐ … !!

 

तुम्हारे शरीर की यात्रा हो गई पूरी । मौत को भी तुमने देखा । मौत को देखनेवाले तुम दृष्टा कैसे मर सकते हो ? तुम साक्षात् चैतन्य हो । तुम आत्मा हो । तुम निर्भय हो । तुम नि:शंक हो । मौत कई बार आकर शरीर को झपट गई । तुम्हारी कभी मृत्यु नहीं हुई । केवल शरीर बदलते आये, एक योनि से दूसरी योनि में यात्रा करते आये ।

 

तुम निर्भयतापूर्वक अनुभव करो कि मैं आत्मा हूँ । मैं अपनेको ममता से बचाऊँगा । बेकार के नाते और रिश्तों में बहते हुए अपने जीवन को बचाऊँगा । पराई आशा से अपने चित्त को बचाऊँगा । आशाओं का दास नहीं लेकिन आशाओं का राम होकर रहूँगा ।

 

मैं निर्भय रहूँगा । मैं बेपरवाह रहूँगा जगत के सुख दु:ख में । मैं संसार की हर परिस्थिति में निश्चिन्त रहूँगा, क्योंकि मैं आत्मा हूँ । ऐ मौत ! तू शरीरों को बिगाड़ सकती है, मेरा कुछ नहीं कर सकती । तू क्या डराती है मुझे ?

 

ऐ दुनियाँ की रंगीनियाँ ! ऐ संसार के प्रलोभन ! तुम मुझे अब क्या फँसाओगे ! तुम्हारी पोल मैंने जान ली है । हे समाज के रीति रिवाज ! तुम कब तक बाँधोगे मुझे ? हे सुख और दु:ख ! तुम कब तक नचाओगे मुझे ? अब मैं मोहनिशा से जाग गया हूँ ।

 

निर्भयतापूर्वक, दृढ़तापूर्वक, ईमानदारी और नि:शंकता से अपनी असली चेतना को जगाओ । कब तक तुम शरीर में सोते रहोगे ?

 

साधना के रास्ते पर हजार हजार विघ्न होंगे, लाख लाख काँटे होंगे । उन सबके ऊपर निर्भयतापूर्वक पैर रखेंगे ।

 

वे काँटे फूल न बन जाँए तो हमारा नाम साधककैसे ?

 

हजारों हजारों उत्थान और पतन के प्रसंगो में हम अपनी ज्ञान की आँख खोले रहेंगे । हो होकर क्या होगा ? इस मुर्दे शरीर का ही तो उत्थान और पतन गिना जाता है । हम तो अपनी आत्मा मस्ती में मस्त है।

 

बिगड़े तब जब हो कोई बिगड़नेवाली शय ।

अकाल अछेघ अभेघ को कौन वस्तु का भय ॥

 

मुझ चैतन्य को, मुझ आत्मा को क्या बिगड़ना है और क्या मिलना है ? बिगड़ बिगड़कर किसका बिगड़ेगा ? इस मुर्दे शरीर का ही न ? मिल मिलकर भी क्या मिलेगा ? इस मुर्दे शरीर को ही मिलेगा न ? इसको तो मैं जलाकर आया हूँ ज्ञान की आग में । अब सिकुड़ने की क्या जरुरत है ? बाहर के दु:खों के सामने, प्रलोभनों के सामने झुकने की क्या जरुरत है ?

 

अब मैं सम्राट की नाईं जिऊँगा बेपरवाह होकर जिऊँगा । साधना के मार्ग पर कदम रखा है तो अब चलकर ही रहूँगा । ॐ ऐसे व्यक्ति के लिए सब संभव है ।

 

एक मरणियो सोने भारे ।

 

आखिर तो मरना ही है, तो अभी से मौत को निमंत्रण दे दो । साधक वह है कि जो हजार विघ्न आयें तो भी न रुके , लाख प्रलोभन आएँ तो भी न फँसे । हजार भय के प्रसंग आएँ तो भी भयभीत न हो और लाख धन्यवाद मिले तो भी अहंकारी न हो । उसका नाम साधक है । साधक का अनुभव होना चाहिए कि:

 

हमें रोक सके ये जमाने में दम नहीं ।

हम से जमाना है जमाने से हम नहीं ॥

 

प्रहलाद के पिता ने रोका तो प्रहलाद ने पिता की बात को ठुकरा दी । वह भगवान के रास्ते चल पड़ा । मीरा को पति और परिवार ने रोका तो मीरा ने उनकी बात को ठुकरा दिया । राजा बलि को तथाकथित गुरु ने रोका तो राजा बलि ने उनकी बात को सुनी अनसुनी कर दी ।

 

ईश्वर के रास्ते पर चलने में यदि गुरु भी रोकता है तो गुरु की बात को भी ठुकरा देना, पर ईश्वर को नहीं छोड़ना ।

 

ऐसा कौन गुरु है जो भगवान के रास्ते चलने से रोकेगा ? वह निगुरा गुरु है । ईश्वर के रास्ते चलने में यदि कोई गुरु रोके तो तुम बलि राजा को याद करके कदम आगे रखना । यदि पत्नी रोके तो राजा भरतृहरी को याद करके पत्नी की ममता को ढकेल देना । यदि पुत्र और परिवार रोकता है तो उन्हें ममता की जाल समझकर काट देना ज्ञान की कैंची से । ईश्वर के रास्ते, आत्म-साक्षात्कार के रास्ते चलने में दुनियाँ का अच्छे से अच्छा व्यक्ति भी आड़े आता हो तो आहा ! तुलसीदासजी ने कितना सुन्दर कहा है !

जाके प्रिय न राम वैदेही,

तजिए ताहि कोटि वैरी सम , यद्यपि परम सनेही ।

 

ऐसे प्रसंग में परम स्नेही को भी वैरी की तरह त्याग दो । अन्दर की चेतना का सहारा लो और ॐ की गर्जना करो ।

 

दु:ख और चिन्ता, हताशा और परेशानी, असफलता और दरिद्रता भीतर की चीजें होती हैं, बाहर की नहीं । जब भीतर तुम अपने को असफल मानते हो तब बाहर तुम्हें असफलता दिखती है ।

 

भीतर से तुम दीन हीन मत होना । घबराहट पैदा करनेवाली परिस्थितियों के आगे भीतर से झुकना मत । ॐकार का सहारा लेना । मौत भी आ जाए तो एक बार मौत के सिर पर भी पैर रखने की ताकत पैदा करना । कब तक डरते रहोगे ? कब तक मनौतियाँ मनाते रहोगे ? कब तक नेताओं को, साहबों को, सेठों को, नौकरों को रिझाते रहोगे ? तुम अपने आपको रिझा लो एक बार । अपने आपसे दोस्ती कर लो एक बार । बाहर के दोस्त कब तक बनाओगे ?

 

कबीरा इह जग आय के, बहुत से कीने मीत ।

जिन दिल बाँधा एक से, वे सोये निश्चिंत ॥

 

बहुत सारे मित्र किये लेकिन जिसने एक से दिल बाँधा वह धन्य हो गया । अपने आपसे दिल बाँधना है । यह एककोई आकाश पाताल में नहीं बैठा है । कहीं टेलिफोन के खम्भे नहीं डालने हैं, वायरिंग नहीं जोड़नी है । वह एकतो तुम्हारा अपना आपा है । वह एकतुम्हीं हो । नाहक सिकुड़ रहे हो । यह मिलेगा तो सुखी होऊँगा, वह मिलेगा तो सुखी होऊँगा …’

 

अरे ! सब चला जाए तो भी ठीक है, सब आ जाए तो भी ठीक है । आखिर यह संसार सपना है । गुजरने दो सपने को । हो होकर क्या होगा ? क्या नौकरी नहीं मिलेगी ? खाना नहीं मिलेगा ? कोई बात नहीं । आखिर तो मरना है इस शरीर को । ईश्वर के मार्ग पर चलते हुए बहुत बहुत तो भूख प्यास से पीड़ित हो मर जायेंगे । वैसे भी खा खाकर लोग मरते ही हैं न ! वास्तव में होता तो यह है कि प्रभु प्राप्ति के मार्ग पर चलनेवाले भक्त की रक्षा ईश्वर स्वयं करते हैं । तुम जब निश्चिंत हो जाओगे तो तुम्हारे लिए ईश्वर चिन्तित होगा कि कहीं भूखा न रह जाए ब्रह्मवेत्ता ।

 

सोचा मैं न कहीं जाऊँगा यहीं बैठकर अब खाऊँगा ।

जिसको गरज होगी आयेगा सृष्टिकर्त्ता खुद लायेगा ॥

 

सृष्टिकर्त्ता खुद भी आ सकता है। सृष्टि चलाने की और सँभालने की उसकी जिम्मेदारी है । तुम यदि सत्य में जुट जाते हो तो धिक्कार है उन देवी देवताओं को जो तुम्हारी सेवा के लिए लोगों को प्रेरणा न दें । तुम यदि अपने आपमें आत्मारामी हो तो धिक्कार है उन किन्नरों और गंधर्वों को जो तुम्हारा यशोगान न करें !

 

नाहक तुम देवी देवताओं के आगे सिकुड़ते रहते हो कि आशीर्वाद दोकृपा करो …’ तुम अपनी आत्मा का घात करके, अपनी शक्तियों का अनादर करके कब तक भीख माँगते रहोगे ? अब तुम्हें जागना होगा । इस द्वार पर आये हो तो सोये सोये काम न चलेगा ।

 

हजार तुम यज्ञ करो, लाख तुम मंत्र करो लेकिन तुमने मूर्खता नहीं छोड़ी तब तक तुम्हारा भला न होगा । 33 करोड़ देवता तो क्या, 33 करोड़ कृष्ण आ जायें, लेकिन जब तक तत्त्वज्ञान को व्यवहार में उतारा नहीं तब तक अर्जुन की तरह तुम्हें रोना पड़ेगा । Let the lion of vedant roar in your life. वेदान्तरुपी सिंह को अपने जीवन में गर्जने दो । टँकार कर दो ॐ कार का । फिर देखो, दु:ख चिन्ताएँ कहाँ रहते हैं ।

 

चाचा मिटकर भतीजे क्यों होते हो ? आत्मा होकर शरीर क्यों बन जाते हो ? कब तक इस जलनेवाले को मैंमानते रहोगे ? कब तक इसकी अनुकूलता में सुख, प्रतिकूलता में दु:ख महसूस करते रहोगे ? अरे सुविधा के साधन तुम्हें पाकर धनभागी हो जायें, तुम्हारे कदम पड़ते ही असुविधा सुविधा में बदल जाए -ऐसा तुम्हारा जीवन हो ।

 

घने जंगल में चले जाओ । वहाँ भी सुविधा उपलब्ध हो जाए । न भी हो तो अपनी मौज, अपना आत्मानंद भंग न हो । भिक्षा मिले तो खा लो । न भी मिले तो वाह वाह ! आज उपवास हो गया ।

 

राजी हैं उसमें जिसमें तेरी रजा है ।

हमारी न आरजू है न जूस्तजू है ॥

 

खाना या नहीं खाना यह मुर्दे के लिए है । जिसकी अस्थियाँ भी ठुकराई जाती हैं उसकी चिन्ता ? भगवान का प्यारा होकर टुकड़ों की चिन्ता ? संतो का प्यारा होकर कपड़ों की चिन्ता ? फकीरों का प्यारा होकर रुपयों की चिन्ता ? सिद्धों का प्यारा होकर नाते रिश्तों की चिन्ता ?

 

चिन्ता के बहुत बोझे उठाये । अब निश्चिन्त हो जाओ । फकीरों के संग आये हो तो अब फक्कड़ हो जाओ । साधना में जुट जाओ ।

 

फकीर का मतलब भिखारी नहीं । फकीर का मतलब लाचार नहीं । फकीर वह है जो भगवान  की छाती पर खेलने का सामर्थ्य रखता हो । ईश्वर की छाती पर लात मारने की शक्ति जिसमें है वह फकीर । भृगु ने भगवान की छाती पर लात मार दी और भगवान पैरचंपी कर रहे हैं । भृगु फकीर थे । भिखमंगो को थोड़े ही फकीर कहते हैं ? तृष्णावान् को थोड़े ही फकीर कहते हैं ?

 

भृगु को भगवान के प्रति द्वेष न था । उनकी समता निहारने के लिए लगा दी लात । भगवान विष्णु ने क्या किया ? कोप किया ? नहीं । भृगु के पैर पकड़कर चंपी की कि हे मु्नि ! तुम्हें चोट तो नहीं लगी ?

 

फकीर ऐसे होते हैं । उनके संग में आकर भी लोग रोते हैं : कंकड़ दोपत्थर दोमेरा क्या होगा … ? बच्चो का क्या होगा ? कुटुम्ब का क्या होगा ?

 

सब ठीक हो जायेगा । पहले तुम अपनी महिमा में आ जाओ । अपने आपमें आ जाओ ।

 

न्यायाधीश कोर्ट में झाडू लगाने थोड़े ही जाता है ? वादी प्रतिवादी को, असील वकील को बुलाने थोड़ी ही जाता है ? वह तो कोर्ट में आकर विराजमान होता है अपनी कुर्सी पर । बाकी के सब काम अपने आप होने लगते हैं । न्यायाधीश अपनी कुर्सी छोड़कर पानी भरने लग जाए, झाडू लगाने लग जाए, वादी प्रतिवादी को पुकारने लग जाए तो वह क्या न्याय करेगा ?

 

तुम न्यायाधीशों के भी न्यायाधीश हो । अपनी कुर्सी पर बैठ जाओ । अपनी आत्मचेतना में जग जाओ ।

 

छोटी बड़ी पूजाएँ बहुत की । अब आत्मपूजा में आ जाओ ।

 

देखा अपने आपको, मेरा दिल दीवाना हो गया ।

ना छेड़ो मुझे यारों ! मैं खुद पे मस्ताना हो गया ॥

 

ऐसे गीत निकलेंगे तुम्हारे भीतर से । तुम अपनी महिमा में आओ । तुम कितने बड़े हो ! इन्द्रपद तुम्हारे आगे तुच्छ है, अति तुच्छ है । इतने तुम बड़े हो, फिर सिकुड़ रहे हो ! धक्का मुक्का कर रहे हो । दया कर दो जरा सा प्रमोशन दे दोअवल कारकुन में से तहसीलदार बना दो तहसीलदार में से कलेक्टर बना दो कलेक्टर में से सचिव बना दो …’

 

लेकिन जो तुमको यह सब बनायेंगे वे तुमसे बड़े बन जायेंगे । तुम छोटे ही रह जाओगे । बनती हुई चीज से बनानेवाला बड़ा होता है । अपने से किसको बड़ा रखोगे ? मुर्दों को क्या बड़ा रखना ? अपनी आत्मा को ही सबसे बड़ी जान लो, भैया ! यहाँ तक कि तुम अपने से इन्द्र को भी बड़ा न मानो।

 

फकीर तो और आगे की बात कहेंगे । वे कहते हैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी अपने से बढ़कर नहीं होते, एक ऐसी अवस्था आती है । यह है आत्म साक्षात्कार ।

 

ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तत्त्ववेत्ता से आलिंगन करके मिलते हैं कि यह जीव अब शिवस्वरुप हुआ । ऐसे ज्ञान में जगने के लिए तुम्हारा मनुष्य जन्म हुआ है । और तुम सिकुड़ते रहते हो ? मुझे नौकर बनाओ, चाकर रखो ।अरे, तुम्हारी यदि तैयारी है तो अपनी महिमा में जगना कोई कठिन बात नहीं है ।

 

यह कौन सा उकदा है जो हो नहीं सकता ।

तेरा जी न चाहे तो हो नहीं सकता ॥

छोटा सा कीड़ा पत्थर में घर करे ।

और इन्सान क्या दिले दिलबर में घर न करे ॥

 

तुम्हारे सब पुण्य, कर्म, धर्माचरण और देव दर्शन का यह फल है कि तुम्हें आत्मज्ञान में रुचि हुई । ब्रह्मवेत्ताओं के शरीर की मुलाकात तो कई नास्तिकों को भी हो जाती है, अभागों को भी हो जाती है । श्रद्धा जब होती है तब शरीर के पार जो बैठा है उसे पहचानने के काबिल तुम बन जाओगे । ॐ

 

जो तत्त्ववेत्ताओं की वाणी से दूर है उसे इस संसार में भटकना ही पड़ेगा । जन्म मरण लेना ही पड़ेगा । चाहे वह कृष्ण के साथ हो जाए चाहे अम्बाजी के साथ हो जाए लेकिन जब तक तत्त्वज्ञान नहीं हुआ तब तक तो बाबा

गुजराती भक्त कवि नरसिंह मेहता कहते हैं :

 

आत्मतत्त्व चीन्या विना सर्व साधना झूठी ।

 

सर्व साधनाओं के बाद नरसिंह मेहता यह कहते हैं ।

तुम कितनी साधना करोगे ?

 

पहले मैंने भी खूब पूजा उपासना की थी । भगवान शिव की पूजा के बिना कुछ खाता पीता नहीं था । प. पू. सदगुरुदेव श्री लीलाशाहजी बापू के पास गया तब भी भगवान शंकर का बाण और पूजा की सामग्री साथ में लेकर गया था । मैं लकड़ियाँ भी धोकर जलाऊँ, ऐसी पवित्रता को माननेवाला था । फिर भी जब तक परम पवित्र आत्मज्ञान नहीं हुआ तब तक यह सब पवित्रता बस उपाधि थी । अब तो अब क्या कहूँ ?

नैनीताल में 15 डोटियाल (कुली) रहने के लिए एक मकान किराये पर ले रहे थे । किराया 32 रुपये था और वे लोग 15 थे । लीलाशाहजी बापू ने दो रुपये देते हुए कहा:

मुझे भी एक मेम्बरबना लो । 32 रुपये किराया है, हम 16 किरायेदार हो जायेंगे ।’’

 

ये अनन्त ब्रह्माण्डों के शहेनशाह उन डोटियालों के साथ वर्षों तक रहे । वे तो महा पवित्र हो गये थे । उन्हें कोई अपवित्रता छू नहीं सकती थी ।

 

एक बार जो परम पवित्रता को उपलब्ध हो गया उसे क्या होगा ? लोहे का टुकड़ा मिट्टी में पड़ा है तो उसे जंग लगेगा । उसे सँभालकर आलमारी में रखोगे तो भी हवाँए वहाँ जंग चढ़ा देंगी । उसी लोहे के टुकड़े को पारस का स्पर्श करा दो, एक बार सोना बना दो, फिर चाहे आलमारी में रखो चाहे कीचड़ में डाल दो, उसे जंग नहीं लगेगा ।

 

ऐसे ही हमारे मन को एक बार आत्मस्वरुप का साक्षात्कार हो जाय । फिर उसे चाहे समाधि में बिठाओ, पवित्रता में बिठाओ चाहे नरक में ले जाओ । वह जहाँ होगा, अपने आपमें पूर्ण होगा । उसीको ज्ञानी कहते हैं । ऐसा ज्ञान जब तक नहीं मिलेगा तब तक रिद्धि सिद्धि आ जाए, मुर्दे को फूँक मारकर उठाने की शक्ति आ जाए फिर भी उस आत्मज्ञान के बिना सब व्यर्थ है । वाक् सिद्धि या संकल्पसिद्धि ये कोई मंजिल नहीं है । साधनामार्ग में ये बीच के पड़ाव हो सकते हैं । यह ज्ञान का फल नहीं है । ज्ञान का फल तो यह है कि ब्रह्मा और महेश का ऐश्वर्य भी तुम्हें अपने निजस्वरुप में भासित हो, छोटा सा लगे । ऐसा तुम्हारा आत्म परमात्मस्वरुप है। उसमें तुम जागो । ॐ

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


मोहनिशा से जागो

 

आँखों के द्वारा, कानों के द्वारा दुनियाँ भीतर घुसती है और चित्त को चंचल करती है । जप, ध्यान, स्मरण, शुभ कर्म करने से बुद्धि स्वच्छ होती है । स्वच्छ बुद्धि परमात्मा में शांत होती है और मलिन बुद्धि जगत में उलझती है । बुद्धि जितनी जितनी पवित्र होती है उतनी उतनी परम शांति से भर जाती है । बुद्धि जितनी जितनी मलिन होती है, उतनी संसार की वासनाओं में, विचारों में भटकती है ।

 

आज तक जो भी सुना है, देखा है, उसमें बुद्धि गई लेकिन मिला क्या? आज के बाद जो देखेंगे, सुनेंगे उसमें बुद्धि को दौड़ायेंगे लेकिन अन्त में मिलेगा क्या? श्रीकृष्ण कहते हैं :

 

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति ।

तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥

 

जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरुप दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उस समय तू सुने हुए और सुनने में आनेवाले इस लोक और परलोक सम्बन्धी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जायेगा ।                                        (भगवदगीता:2.52)

 

दलदल में पहले आदमी का पैर धँस जाता है । फिर घुटने, फिर जाँघें, फिर नाभि, फिर छाती, फिर पूरा शरीर धँस जाता है । ऐसे ही संसार के दलदल में आदमी धँसता है । थोड़ा सा यह कर लूँ, थोड़ा सा यह देख लूँ, थोड़ा सा यह खा लूँ, थोड़ा सा यह सुन लूँ ।प्रारम्भ में बीड़ी पीनेवाला जरा सी फूँक मारता है, फिर व्यसन में पूरा बँधता है । शराब पीनेवाला पहले जरा सा घूँट पीता है, फिर पूरा शराबी हो जाता है ।

 

ऐसे ही ममता के बन्धनवाले ममता में फँस जाते हैं । जरा शरीर का ख्याल करें, जरा कुटुम्बियों का ख्याल करें ’ ‘जरा जरा …’ करते करते बुद्धि संसार के ख्यालों से भर जाती है । जिस बुद्धि में परमात्मा का ज्ञान होना चाहिए, जिस बुद्धि में परमात्मशांति भरनी चाहिए उस बुद्धि में संसार का कचरा भरा हुआ है । सोते हैं तो भी संसार याद आता है, चलते हैं तो भी संसार याद आता है, जीते हैं तो संसार याद आता है और मरतेहैं तो भी संसारही  यादआता  है ।

 

सुना हुआ है स्वर्ग के बारे में, सुना हुआ है नरक के बारे में, सुना हुआ है भगवान के बारे में । यदि बुद्धि में से मोह हट जाए तो स्वर्ग नरक का मोह नहीं होगा, सुने हुए भोग्य पदार्थों का मोह नहीं होगा । मोह की निवृत्ति होने पर बुद्धि परमात्मा के सिवाय किसी में भी नहीं ठहरेगी । परमात्मा के सिवाय कहीं भी बुद्धि ठहरती है तो समझ लेना कि अभी अज्ञान जारी है । अमदावादवाला कहता है कि मुंबई में सुख है । मुंबईवाला कहता है कि कलकत्ते में सुख है । कलकत्तेवाला कहता है कि कश्मीर में सुख है । कश्मीरवाला कहता है कि मंगणी में सुख है । मंगणीवाला कहता हैं कि शादी में सुख है । शादीवाला कहता है कि बाल बच्चों में सुख है । बाल बच्चोंवाला कहता है कि निवृत्ति में सुख है । निवृत्तिवाला कहता है कि प्रवृत्ति में सुख है । मोह से भरी हुई बुद्धि अनेक रंग बदलती है । अनेक रंग बदलने के साथ अनेक अनेक जन्मों में भी ले जाती है ।

 

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यति

 

   जिस काल में तेरी बुद्धि मोहरुपी दलदल को भलीभाँति पार कर जाएगी, उसी समय तू सुने हुए और सुनने में आनेवाले इस लोक और परलोक संबंधी सभी भोगों से वैराग्य को प्राप्त हो जायेगा ।

 

इस लोक और परलोक

सात लोक ऊपर हैं : भू:, भुव:, स्व:, जन:, तप:, मह: और सत्य ।