प्रातः स्मरणीय परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन

जीते जी मुक्ति

 

ब्रह्मचर्य-रक्षा का मंत्र

ॐ नमो भगवते महाबले पराक्रमाय

मनोभिलाषतं मनः स्तंभ कुरु कुरु स्वाहा।

रोज दूध में निहारकर 21 बार इस मंत्र का जप करें और दूध पी लें। इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा होती है। स्वभाव में आत्मसात् कर लेने जैसा यह नियम है।

अनुक्रम

ब्रह्मचर्य-रक्षा का मंत्र. 2

निवेदन.. 3

जीते जी मुक्ति... 3

तो माया तरना सुगम है. 22

वेदान्त में ईश्वर की विभावना... 33

सर्वरोगों का मूलः प्रज्ञापराध.. 42

विश्वास करोगे तो जागोगे..... 49

प्रसंगचतुष्ट्य.... 55

ऋण चुकाना ही पड़ता है..... 55

अकिंचन सम्राट. 57

नाम-जप में मन नहीं लगता तो...... 60

जीवन का अनुभव. 61

दिव्य विचार से पुष्ट बनो... 62

 

 

निवेदन

पूज्यपाद स्वामी जी की सहज बोलचाल की भाषा में ज्ञान, भक्ति और योग की अनुभव-सम्पन्न वाणी का लाभ श्रोताओं को तो प्रत्यक्ष मिलता ही है, घर बैठे अन्य भी भाग्यवान आत्माओं तक यह दिव्य प्रसाद पहुँचे इसलिए पू. स्वामी जी के सत्संग-प्रवचनों में से कुछ अंश संकलित करके यहाँ लिपिबद्ध किया गया है।

इस अनूठी वाग्धारा में पूज्यश्री कहते हैं-

"..... प्रतीति संसार की होती है, प्राप्ति परमात्मा की होती है।"

".....माया दुस्तर है लेकिन मायापति की शरण जाने से माया तरना सुगम हो जाता है।"

"..... ईश्वर किसी मत, पंथ, मजहब की दीवारों में सीमित नहीं है। वेदान्त की दृष्टि से वह प्राणिमात्र के हृदय में और अनन्त ब्रह्माण्डों में व्याप रहा है। केवल प्रतीति होने वाली मिथ्या वस्तुओं का आकर्षण कम होते ही साधक उस सदा प्राप्त ईश्वर को पा लेता है।"

".... जितने जन्म-मरण हो रहे हैं वे प्रज्ञा के अपराध से हो रहे हैं। अतः प्रज्ञा को दैवी सम्पदा करके यहीं मुक्ति का अनुभव करो।"

"...... कर्म का बदला जन्म-जन्मान्तर लेकर भी चुकाना पड़ता है। अतः कर्म करने में सावधान.... और कर्म का फल भोगने में प्रसन्न....।"

"......रामनाथ तर्करत्न और धर्मपत्नी बाहर से अकिंचन फिर भी पूर्ण स्वतन्त्र। बिना सुविधाओं के भी निर्भीक और सुखी रहना मनुष्य के हाथ की बात है। वस्तुएँ और सुविधा होते हुए भी भयभीत और दुःखी रहना यह मनुष्य की नासमझी है।"

".....मनुष्य जैसा सोचता है वैसा हो जाता है। मन कल्पतरू है। अतः सुषुप्त दिव्यता को, दिव्य साधना से जगाओ। अपने में दिव्य विचार भरो।"

इस प्रकार की सहज बोलचाल के रूप में प्रकट होने वाली, गहन योगानुभूतियों से सम्पन्न अमृतवाणी का संकलन आपके करकमलों तक पहुँचाने का हमें सौभाग्य मिल रहा है। स्वयं इससे लाभान्वित होकर अन्य सज्जनों तक पहुँचायें और आप भी सौभाग्यशाली बनें इसी अभ्यर्थना के साथ....

श्री योग वेदान्त सेवा समिति

अमदावाद आश्रम

अनुक्रम

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जीते जी मुक्ति

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।

प्रसन्न चेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।

"अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्तवाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भली भाँति स्थिर हो जाती है।"

(भगवदगीताः 2.65)

चित्त की मधुरता से, बुद्धि की स्थिरता से सारे दुःख दूर हो जाते हैं। चित्त की प्रसन्नता से दुःख तो दूर होते ही हैं लेकिन भगवद-भक्ति और भगवान में भी मन लगता है। इसीलिए कपड़ा बिगड़ जाये तो ज्यादा चिन्ता नहीं, दाल बिगड़ जाये तो बहुत फिकर नहीं, रूपया बिगड़ जाये तो ज्यादा फिकर नहीं लेकिन अपना दिल मत बिगड़ने देना। क्योंकि इस दिल में दिलबर परमात्मा स्वयं विराजते हैं। चाहे फिर तुम अपने आपको महावीर के भक्त मानो चाहे श्रीकृष्ण के भक्त मानो चाहे मोहम्मद के मानो चाहे किसी के भी मानो, लेकिन जो मान्यता उठेगी वह मन से उठेगी और मन को सत्ता देने वाली जो चेतना है वह सबके अन्दर एक जैसी है।

ईश्वर को पाने के लिए, तत्त्वज्ञान पाने के लिए हमें प्रतीति से प्राप्ति में जाना पड़ेगा।

एक होती है प्रतीति और दूसरी होती है प्राप्ति। प्रतीति माने : देखने भर को जो प्राप्त हो वह है प्रतीति। जैसे गुलाब जामुन खाया। जिह्वा को स्वाद अच्छा लगा लेकिन कब तक ? जब तक गुलाब जामुन जीभ पर रहा तब तक गले से नीचे उतरने पर वह पेट में खिचड़ी बन गया। सिनेमा में कोई दृश्य बड़ा अच्छा लगा आँखों को। ट्रेन या बस में बैठे पहाड़ियों के बीच से गुजर रहे हैं। संध्या का समय है। घना जंगल है। सूर्यास्त के इस मनोरम दृश्य को बादलों की घटा और अधिक मनोरम बना रही है। लेकिन कब तक ? जब तक आपको वह दृश्य दिखता रहा तब तक। आँखों से ओझल होने पर कुछ भी नहीं। सब प्रतीति मात्र था।

डिग्रियां मिल गई यह प्रतीति है। धन मिल गया, पद मिल गया, वैभव मिल गया यह भी प्रतीत है। मृत्यु का झटका आया कि सब मिला अमिला हो गया। रोज रात को नींद में सब मिला अमिला हो जाता है। तो यह सब मिला कुछ नहीं, मात्र धोखा है, धोखा। मुझे यह मिला.... मुझे वह मिला..... इस प्रकार सारी जिन्दगी जम्पींग करते-करते अंत में देखो तो कुछ नहीं मिला। जिसको मिला कहा वह शरीर भी जलाने को ले गये।

यह सब प्रतीति मात्र है, धोखा है। वास्तव में मिला कुछ नहीं।

दूसरी होती है प्राप्ति। प्राप्ति होती है परमात्मा की। वास्तव में मिलता तो है परमात्मा, बाकी जो कुछ भी मिलता है वह धोखा है।

परमात्मा तब मिलता है जब परमात्मा की प्रीति और परमात्म-प्राप्त, भगवत्प्राप्त महापुरुषों का सत्संग, सान्निध्य मिलता है। उससे शाश्वत परमात्मा की प्राप्ति होती है और बाकी सब प्रतीति है। चाहे कितनी भी प्रतीति हो जाये आखिर कुछ नहीं। ऊँचे ऊँचे पदों पर पहुँच गये, विश्व का राज्य मिल गया लेकिन आँख बन्द हुई तो सब समाप्त।

प्रतीति में आसक्त न हो और प्राप्ति में टिक जाओ तो जीते जी मुक्त हो।

प्रतीति मात्र में लोग उलझ जाते हैं परमात्मा के सिवाय जो कुछ भी मिलता है वह धोखा है। वास्तविक प्राप्ति होती है सत्संग से, भगवत्प्राप्त महापुरुषों के संग से।

महावीर के जीवन में भी जो प्रतीति का प्रकाश हुआ वह तो कुछ धोखा था। वे इस हकीकत को जान गये। घरवालों के आग्रह से घर में रह रहे थे लेकिन घर में होते हुए भी वे अपनी आत्मा में चले जाते थे। आखिर घरवालों ने कहा कि तुम घर में रहो या बाहर, कोई फर्क नहीं पड़ता। महावीर एकान्त में चले गये। प्रतीति से मुख मोड़कर प्राप्ति में चले गये।

जब रामजी का राज्याभिषेक हुआ तो कुछ ही दिनों के बाद कौशल्याजी रामजी से कहती हैं-

"हे राम ! हमारे वनवास जाने की व्यवस्था करो।" तब राम जी कहते हैं-

"माँ ! इतने दिन तो आपका सान्निध्य न पाया। चौदह वर्ष का वनवास काटा। अभी तो जब राजकाज से थकूँगा तब तुम्हारी गोद में सिर रखूँगा। माँ, अगर कोई मार्गदर्शन चाहिएगा तो तुम्हारे पास आऊँगा। मुझे साँत्वना मिलेगी, विश्रान्ति मिलेगी तुम्हारी गोद में। अभी तो तुम्हारी बहुत आवश्यकता है।"

कौशल्याजी सहज भाव से कहती हैं-

"हे राम ! इस जीव को मोह है। वह जब बालक होता है तो समझता है माँ-बाप को मेरी आवश्यकता है। बड़ा होता है तो समझता है कुटुम्बियों को मेरी आवश्यकता है और मुझे कुटुम्बियों की आवश्यकता है। जब बूढ़ा होता है तो बाल-बच्चे, पोते-पोती, नाते-रिश्तों को अभी मेरी आवश्यकता है। लेकिन हे राम ! जीव की अपनी यह आवश्यकता  कि वह अपना उद्धार करे। तुम मेरे पुत्र राम भी हो, राजा राम भी हो और भगवान राम भी हो। तुम तो स्वयं त्रिकालदर्शी हो। तुम तो मोह हटाने की बात करो। तुम स्वयं मोह की बात कर रहे हो ?"

रामजी मुस्कराते हैं किः माँ ! तुम धन्य हो। पिता जी कहते थे कि भक्ति में, धर्म में तो तुम अग्रणी हो लेकिन आज देख रहा हूँ कि आत्मा-अनात्मा विवेक में और वैराग्य में भी तुम्हारी गति बहुत उन्नत है।"

श्रीरामचन्द्रजी ने कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी को एकान्तवास में भेजने की व्यवस्था की। श्रृंगी-आश्रम में कौशल्या माता ने साधना की। प्राप्ति में टिकी।

राम तो बेटा है जिनका, अयोध्या का राज्य, राजमाता का ऊँचा पद और साधन-भजन के लिए जितने चाहिए उतने स्वतंत्र कमरे। फिर भी कौशल्याजी प्रतीति में उलझी नहीं। प्राप्ति में ठहरने के लिए एकान्त में गई। एक में ही सब वृत्तियों का अंत हो जाय उस चैतन्य राम में विश्रान्ति पाने को गई।

तुलसीदास जी कहते हैं-

राम ब्रह्म परमारथ रूपा।

अर्थात् ब्रह्म ने ही परमार्थ के लिए राम रूप धारण किया था। अवधपति राम प्रकट हुए और हमें आचरण करके सिखाया कि उन्नत जीवन कैसे जीया जा सकता है। हर परिस्थिति में रामजी का ज्ञान तो ज्यों का त्यों है। कभी दुःख आता है कभी सुख आता है, कभी यश आता है कभी अपयश आता है, फिर भी रामजी ज्यों के त्यों हैं। कभी साधु-संतो से रामजी का सम्मान होता है तो कभी दुर्जनों से अपमान होता है। कभी कंदमूल खाते हैं तो कभी मोहनभोग पाते हैं। कभी महल में शयन करते हैं तो कभी झोंपड़ी में। कभी वस्त्र-अलंकार, मुकुट-आभूषण धारण करते हैं तो कभी वल्कल पहनते हैं लेकिन रामजी का ज्ञान ज्यों का त्यों है। प्राप्ति में जो ठहरे हैं!

रामचन्द्रजी प्रतीति में बहे नहीं। श्रीकृष्ण प्रतीति में बहे नहीं। राजा जनक प्रतीति में बहे नहीं। हम लोग प्रतीति में बह जाते हैं। प्रतीति माने दिखने वाली चीजों में सत्यबुद्धि करके बह जाना। प्रतीति बहने वाली चीज है। बहने वाली चीज के बहाव का सदुपयोग करके बहने का मजा लो और सदा रहने वाले जो आत्मदेव हैं उनसे मुलाकात करके परमात्म-साक्षात्कार कर लो, बेड़ा पार हो जायेगा। दोनों हाथों में लड्डू हैं। प्रतीति में प्रतीति का उपयोग करो और प्राप्ति में स्थिति करके जीते जी मुक्ति का अनुभव करो।

हम लोग क्या करते हैं कि प्राप्ति के लक्ष्य की ओर नहीं जाते और प्रतीति को प्राप्ति समझ लेते हैं। यह मूल गलती कर बैठते हैं। दो ही बाते हैं, बस। फिर भी हम गलती से बचते नहीं।

अपने बचपन की एक बेवकूफी हम बताते हैं। एक बार हमने भी गुड्डा-गुडिया का खेल खेला था। उस समय होंगे करीब नौ दस साल के। हमारे पक्ष में गुड्डा था और हम बारात लेकर गये। गुड़ियावालों के यहाँ से उसकी शादी कराके लाये। पार्टीवार्टी का रिवाज था तो थोड़ा हलवा बनाया था, चने बनाये थे। छोटी छोटी कटोरियों में सबको खिलाया था। फंक्शन भी किया गुड्डे-गुड़िया की शादी में। बच्चों का खेल था सब।

फिर हमने कौतूहलवश उन गुड्डे-गुड़िया को खोला। ऊपर से तो रेशम की चुन्दड़ी थी, रेशम का जामा था और अन्दर देखो तो कपड़े के सड़े-गले गन्दे-गन्दे चिथड़े थे। और कुछ नहीं था। गुड़िया को भी देख लिया, गुड़्डे को भी देख लिया। ये दुल्हा और दुल्हन ! है तो कुछ नहीं। भीतर चिथड़े भरे हैं।

ऐसे ही संसार में भी वही है। लड़का शादी करके सोचता है। मुझे गुड़िया मिल गई... लड़की शादी करके सोचती है मुझे गुड्डा मिल गया। मुझे राजा मिल गया... मुझे पटरानी मिल गई।

जरा ऊपर की चमड़ी का कवर खोलकर देखो तो राम.... राम ! भीतर क्या मसाला भरा है....! लेकिन राजी होते हैं कि मैंने शादी की। दुल्हा सोचता है मैं दुल्हा हूँ। दुल्हन सोचती है कि मैं दुल्हन हूँ। अरे भाई ! तू दुल्हा भी नहीं, तू दुल्हन भी नहीं। तू तो है आत्मा। वह है प्राप्ति। तूने प्रतीति की कि मैं दुल्हा हूँ।

जीव वास्तव में है तो आत्मा लेकिन प्रतीति करता है कि मैं जैन हूँ.... मैं अग्रवाल हूँ.... मैं हिन्दू हूँ..... मैं मुसलमान हूँ..... मैं सेठ हूँ... मैं साहब हूँ... मैं जवान हूँ... मैं बूढ़ा हूँ।

है तो आत्मा और मान बैठा है कि मैं विद्यार्थी हूँ। यह प्रतीति है। प्रतीति का उपयोग करो लेकिन प्रतीति को प्राप्ति मत समझो। वास्तविक प्राप्ति की ओर लापरवाही मत करो।

आज विश्व में जो अशांति और झगड़े हुए हैं वे केवल इसलिए कि हम प्रतीति में आसक्त हुए और प्राप्ति से विमुख रहे। कौमी झगड़े.... मजहबी झगड़े..... मेरे-तेरे के झगड़े। ऐसा नहीं कि हिन्दू और मुसलमान ही लड़ते हैं। मुसलमानों में शिया और सुन्नी भी लड़ते हैं। जैन-जैन भी लड़ते हैं। एक माँ-बाप के बेटे-बेटियाँ भी लड़ते हैं। आदमी नीचे के केन्द्रों में जी रहा है, प्रतीति की वस्तुओं में आसक्त हुआ है। सास और बहू लड़ती है। एक ही माँ-बाप के बेटे, दो भाई भी लड़ते हैं। हम लोग प्रतीति में उलझ गये हैं इसलिए लड़-लड़कर मर रहे हैं। हम लोग अगर प्राप्ति की ओर लग जायँ तो पृथ्वी स्वर्ग बन जाय।

विवेकानन्द बोलते थेः

"लाख आदमी में अगर एक आदमी आत्मारामी हो जाय, लाख आदमी में अगर एक आदमी प्राप्ति में टिक जाय तो पृथ्वी चन्द दिनों में स्वर्ग बन जाय।"

भगवान ऋषभदेव ने प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्ग दोनों का आचरण करके दिखाया और बाद में साबित कर दिखाया कि दोनों प्रतीति मात्र हैं। प्रवृत्ति भी प्रतीति है और निवृत्ति भी प्रतीति है। प्रकृति और निवृत्ति इन दोनों की सिद्धि जिससे होती है वह आत्मा ही सार है। उस आत्मा की ओर जितनी जितनी हमारी नजर जाती है उतना उतना समय सार्थक होता है। उतना उतना जीवन उदार होता है, व्यापक होता है, निर्भीक होता है, निर्द्वन्द्व होता है और निजानन्द के रस से परिपूर्ण होता है।

युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण बंसी रहे हैं, क्योंकि वे प्राप्ति में ठहरे हैं। रामचन्द्रजी कभी मोहनभोग पाते हैं कभी कन्दमूल खाते हैं फिर भी उद्विग्न नहीं होते, क्योंकि प्राप्ति में ठहरे हैं। विषम परिस्थितियों में भी रामचन्द्रजी मधुर भाषण तो करते ही थे, सारगर्भित भी बोलते थे। रामचन्द्रजी के आगे कभी कोई आकर बात करता था तो वे बड़े ध्यान से सुनते और तब तक सुनते थे जब तक कि सामने वाले का अहित न होता हो, चित्त कलुषित न होता हो, कान अपवित्र न होते हों। अगर वह किसी की निन्दा या अहित की बात बोलता तो रामजी युक्ति से उसकी बात को मोड़ देते थे। अतः यह गुण आप सबको अपनाना चाहिए।

रामचन्द्रजी की सभा में कभी-कभी दो पक्ष हो जाते किसी निर्णय देने में। रामचन्द्रजी इतिहास के, शास्त्रों के तथा पूर्वकाल में जिये हुए उदार पुरुषों के निर्णय का उद्धरण देकर सत्य के पक्ष को पुष्ट कर देते थे और जिस पक्ष मे दुराग्रह होता था उस पक्ष को रामचन्द्रजी नीचा भी नहीं दिखाते थे लेकिन सत्य के पक्ष को एक लकीर ऊँचा कर देते तो उसको पता चल जाता कि हमारी बात सही नहीं है।

हम घर में, कुटुम्ब में क्या करते हैं ? बहू चाहती है घर में मेरा कहना चले, बेटी चाहती है मेरा कहना चले, भाभी चाहती है मेरा कहना चले, ननद चाहती है मेरा कहना चले। सुबह उठकर कुटुम्बी लोग सब एक दूसरे से सुख चाहते हैं और सब एक दूसरे से अपना कहना मनवाना चाहते हैं। घर में सब लोग भिखारी हैं। सब चाहते हैं कि दूसरा मुझे सुख दे।

सुख लेने की चीज नहीं है, देने की चीज है। मान लेने की चीज नहीं है, मान देने की चीज है। हम लोग मान लेना चाहते हैं, मान देना नहीं चाहते। इसलिए झंझट पैदा होती है, झगड़े पैदा होते हैं।

मैं भी रानी तू भी रानी।

कौन भरेगा घर का पानी ?

सिन्धु घाटी के किनारे अनंत काल पूर्व, जिसका कोई सन् या संवत सिद्ध नहीं किया जा सकता, सृष्टि के साथ ही साथ वेद का ज्ञान प्रकट हुआ है। भगवान ऋषभदेव ने वैदिक ज्ञान का अमृतपान किया था। प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों से छलांग मारकर आत्मा में आये थे। कोई बोलता हैः 'हम जैनी हैं, हम हिन्दू नहीं है।' जैनी अगर हिन्दू नहीं है तो जैनी जैनी भी नहीं हो सकता। कोई बोलता हैः 'हम भील है, हम हिन्दू नहीं हैं।' अरे भील अगर हिन्दू नहीं तो वह भील भी नहीं।

सिन्धु घाटी में सिन्धु नदी के किनारे भगवान वेदव्यास ने शास्त्रों का अनुवाद किया था।

आपके जब 432000 वर्ष पूरे होते हैं तब कलियुग पूरा होता है। 864000 वर्ष बीतते हैं तो त्रेतायुग पूरा होता है। द्वापर की अवधि 1296000 वर्ष की है। सतयुग 1728000 वर्ष का है। कुल मिलाकर 4320000 वर्ष बीतते हैं तब एक चतुर्युगी होती है।

खूब ध्यान देना इस बात पर।

ऐसी इकहत्तर चतुर्युगी बीतती है तब एक मन्वन्तर होता है। ऐसे चौदह मन्वन्तर बीतते हैं तब ब्रह्माजी का एक दिन होता है। तुम्हारे साठ साल बीतते हैं तो देवताओं के दो महीने बीतते हैं तुम्हारा एक साल बीतता है तो देवताओं का एक दिन व्यतीत होता है। जैसे तुम्हारा एक दिन बीतता है तो मच्छर और मक्खियों की तीन चौथाई जिन्दगी पूरी हो जाती है। तुम्हारा एक दिन बीतता है तो तुम्हारे रक्त के अन्दर जो कीटाणु है उनकी दसों पीढ़ियाँ बीत जाती हैं।

कीटाणुओं के आगे तुम ब्रह्माजी हो, मक्खियों के आगे तुम देवता हो और देवताओं के आगे तुम्हारी आयु ठीक ऐसी है जैसे तुम्हारे आगे मच्छर और मक्खियों की।

ब्रह्माजी के केवल एक दिन में ऐसे चौदह इन्द्र बदल जाते हैं। इस समय ब्रह्माजी की उम्र 50 वर्ष हो गई है। 51वें वर्ष का प्रथम दिन चल रहा है। प्रथम दिन का भी आधा हिस्सा समाप्त हुआ है। अभी यह सातवाँ मन्वन्तर चल रहा है।

जो लोग कर्मकाण्ड करते हैं वे संकल्प करते समय बोलते हैं- 'सप्तम मन्वन्तरे जम्बू द्वीपे उत्तराखण्डे भारत देशे कलियुगे प्रथम चरणे....' आदि आदि...।

श्रीरामचन्द्रजी ने प्राप्ति में टिककर हमें ऐसा मार्ग बताया कि अभी भी उनके गुणों का गान करें तो हमारा जीवन-व्यवहार मधुर हो जाता है। सब मुसीबतें विदा होने लगती हैं।

कोई सौ-सौ बार रामचन्द्रजी का अपमान करे, बिगाड़े तो रामचन्द्रजी अपने चित्त में उद्विग्न नहीं होते थे। कोई सदगुणी सेवा करता था तो रामचन्द्रजी उसकी सेवा भूलते नहीं थे।

आपको अगर सुखी होना हो तो आपने जो भलाई की उसे भूल जाओ और दूसरे ने थोड़ी बुराई की उसे बिसार दो तो कुटुम्ब में आनन्द और शान्ति आ जायेगी। घर-घर में रामराज्य होने लगेगा।

हमारे घरों में क्या होता है ? सास ने कभी कुछ कह दिया, कुछ थोड़ी गड़बड़ कर दी तो बहू मौका ढूँढती रहती है और बहू ने कुछ कर दिया तो सास ऐसे मौके की तलाश में रहती है कि कभी न कभी इस चुड़ैल को सुना दूँगी। सास बहू को सुनाना चाहती है और बहू सास को सुनाना चाहती है। लेकिन सास और बहू दोनों अगर अपने अन्तरात्मा की आवाज एक दूसरे को सुना दे किः

तुझमें राम मुझमें राम सबमें राम समाया है।

कर लो सभी से प्यार जगत में कोई नहीं पराया है।।

....तो महाराज ! घर में रामराज्य हो जायगा। परिवार में रामराज्य हो जायगा।

एक बोलता है मैं अग्रवाल हूँ, दूसरा बोलता है मैं जैनी हूँ, तीसरा बोलता है मैं हिन्दू हूँ, चौथा बोलता है मैं मुसलमान हूँ, पाँचवाँ बोलता है मैं भील हूँ, छठा बोलता है मैं आर्य समाजी हूँ, सातवाँ बोलता है मैं फलाना हूँ।

अरे भाई ! 'मैं.... मैं.... मैं..'. ऐसा जो भीतर से हो रहा है उसमें सबमें एक-का-एक राम रम रहा है। तुमने तो सुन-सुनकर मान्यता बना ली है कि मैं फलाना भाई हूँ....।

'मैं फलानी माई हूँ.... मेरा नाम कांता... शांता.... ऊर्मिला... है' यह भी प्रतीति है और 'मेरा नाम छगन..... मगन.... मोहन है... मैं अग्रवाल हूँ...' यह भी प्रतीति है। प्राप्ति तुम्हारी आत्मा है। आत्मा सो परमात्मा।

मिलता तो परमात्मा है। बाकी जो मिलता है, सब धोखा मिलता है। 'मैं भील हूँ... मैं हिन्दू हूँ..... मैं गुजराती हूँ... मैं सिन्धी हूँ....' ये सब प्रतीति मात्र हैं, धोखा है। यह स्मृति जिसकी सत्ता से जागती है वह सर्वसत्ताधीश परमात्मा ही सार है, और सब खिलवाड़ है। इस खिलवाड़ को खिलवाड़ समझकर खेलो लेकिन इसको सच्चा समझकर उलझो मत।

समय की धार में सब 'मेरा-तेरा.... हैसो हैसो...' करते प्रवाहित हो जाता है। 'यह मकान मेरा है.... यह घर मेरा है.... यह मठ मेरा है... यह मंदिर मेरा है... रूपये मेरे हैं... गहने मेरे हैं... गाड़ी मेरी है....।' जिसका सब कुछ है वह परमात्मा तेरा है, बाकी सब धोखा है। यह बात समझ लेनी चाहिए, जीवन में उतारनी चाहिए।

आदमी जब आखिरी यात्रा करता है, रवाना होता है तब सब लोग क्या बोलते हैं पता है ? 'राम बोलो भाई राम।.... रामनाम संग है, संतनाम संग है।.... राम नाम सत्य है आखिर यही गत है।.....'

राम में ही तेरी गति है प्यारे ! बाकी और कहीं तेरी गति नहीं है। बाकी सब तो प्रतीति मात्र है, धोखा है।

रात को नींद में तुम स्वप्न देखते हो। बड़े साहब बन गये हो। कुर्सी पर बैठे हो। मूँछे ऐंठ रहे हो। ऑर्डर चला रहे हो। बड़ा ठाठ है लेकिन आँख खुली तो अपने आपको पलंग के कोने में पड़े हुए पाते हो। उस समय तो बड़ी प्राप्ति थी लेकिन आँख खुलने पर कुछ भी नहीं।

रात को स्वप्न में किसी से 'तू-तू मैं-मैं' हो गई, मुक्केबाजी हो गई, मुठभेड़ हो गई। पकड़े गये और चार-छः महीने की सजा हो गई। चार महीने सजा भोग ली, बाकी के दो महीने बड़ी मुसीबत में जा रहे हैं। अरे भगवान ! यह क्या हो गया ? ऐसा करके थोड़ा चिल्लाये तो आँख खुल गई। मम्मी ने पूछाः "क्यों चिल्ला रहा है बेटा !"

"अरे माँ ! मैं तो समझ रहा था कि मैं जेल में हूँ लेकिन मैं पलंग पर हूँ।"

...तो रात को स्वप्न में साहब होने की या कैदी होने की जो प्रतीति हो रही थी उस समय वह सच्ची लग रही थी। उस समय अगर आपसे कोई कहता कि यह तो सब प्रतीति है मात्र है तो उस समय आप उसकी बात नहीं मानते। आँख खुलने पर पता चलता है कि सब प्रतीति मात्र था। जागे तो प्राप्ति रही और प्रतीति खो गई। जिसकी सत्ता से हम स्वप्न देख रहे थे वह आत्मा तो रहा। जिस समय स्वप्न देख रहे थे उस समय भी वह था। स्वप्न बदल गया तब भी वह है। नया स्वप्न आयेगा तब भी होगा और कोई स्वप्न नहीं होगा तब भी यह आत्मदेव रहेगा ही।

....तो जो आया और गया वह सब प्रतीति मात्र था। सब प्रतीतियों के बीच जो सदा रहा वह प्राप्ति है। इस प्राप्ति में जग गये तो बेड़ा पार।

बचपन से लेकर अब तक कितने ही सुख आये दुःख आये, मित्र आये शत्रु आये लेकिन सब प्रतीति मात्र था।

अपने बचपन को याद करो। एक चवन्नी के लिए या चॉकलेट के लिए कितने कूदाकूद करते थे... रोते थे.... चिल्लाते थे ! चॉक्लेट मिल गई तो खुश। छोटा बच्चा काम करती हुई माँ का पल्लू पकड़कर पीछे पीछे घूमता है। माँ को हजार काम छुड़ाकर भी दिखाता हैः देख देख ! मैं क्या खा रहा हूँ ? चाकलेट खाकर दिखाता है, लोलीपॉप चाटकर दिखाता है। उस समय अपनी अल्प बुद्धि के कारण सोचता है कि मैं बहुत बड़ा साइन्टीस्ट हो गया हूँ। लोलीपॉप चाटने की तकनीक मुझमें आ गई है। बच्चा मम्मी को, पापा को कूदकर दिखाता है, दस बीस कदम दौड़कर दिखाता है। उस समय लगता है कि वाह ! बड़ी उपलब्धि कर ली। बड़ा होने पर कुछ नहीं। वह सब प्रतीति मात्र था।

जैसे बचपन में ये लोलीपॉप चाटने की या चाकलेट खाने की कला तुम बड़ी कला समझते थे ऐसे ही दुनिया भर की सारी कलाएँ चाकलेट खाने जैसी ही कलाएँ हैं, कोई बड़ी कला नहीं है। सब प्रतीति मात्र है, पेट भरने की कलाएँ हैं। धोखा है धोखा। कितना भी कमा लिया, कितना भी खा लिया, पी लिया, सुन लिया, देख लिया लेकिन जिस शरीर को खिलाया-पिलाया, सुनाया-दिखाया उस शरीर को तो जला देना है।

कर सत्संग अभी से प्यारे

नहीं तो फिर पछताना है।

खिला-पिलाकर देह बढ़ाई

वह भी अग्नि में जलाना है।।

सत्संग की बड़ी महिमा है कि वह प्रतीति के संस्कारों की पोल खोल देता है और प्राप्ति के संस्कारों को जगा देता है। सत्संग तो भगवान शिव भी करते थे। श्री रामचन्द्रजी अगस्त्य ऋषि के आश्रम में सत्संग हेतु जाते थे। बाल्य काल में जब गुरु-आश्रम में रहते थे तब विद्याध्ययन के साथ-साथ सत्संग भी करते थे। धनुर्विद्या सीखते थे तब उससे भी समय बचाकर रामजी प्राप्ति में ठहरने वाले सत्संग की बातें सुनते थे। चौदह साल के वनवास के दौरान भी वे ऋषि-मुनियों के आश्रम में सत्संग हेतु जाया करते थे। वनवास से लौटते समय पुष्पक विमान से उतर कर भरद्वाज ऋषि के आश्रम में गये। अयोध्या में राजगद्दी सँभालने के बाद भी सत्संग बराबर जारी रहा। प्राप्ति तो आत्मज्ञान है, आत्मा-परमात्मा है यह प्रजा को समझाने के लिए। उनके दरबार में सत्संग हुआ करता था। राजा जनक के दरबार में सत्संग हुआ करता था। राजा अरबपति, राजा सव्यकृत के दरबार में भी सत्संग हुआ करता था। हम तो चाहते हैं कि आपके दिल में व्यवहार काल में भी सत्संग हुआ करे।

एक घण्टा काम किया। फिर एक दो मिनट के लिए आ जाओ इन विचारों में किः 'अब तक जो कुछ किया, जो कुछ लिया, दिया, खाया, पिया, हँसे, रोये,  जो कुछ हुआ सब सपना है.... केवल अन्तर्यामी राम अपना है। हरि ॐ तत्सत्.... और सब गपशप।' तुम्हारा बेड़ा पार हो जायेगा। तुम्हारी मीठी निगाहें जिन पर पड़ेंगी वे खुशहाल होने लगेंगे।

ऐसे आत्मदेव को पा लो। कब तक इस संसार की भट्ठी में अपने आपको जलाते रहोगे, तपाते रहोगे ? कब तक चिन्ता के दौरे में घूमते रहोगे ? अब बहुत हो गया।

व्यवहार करते-करते आधा घण्टा बीते, एक घण्टा बीते तो आ जाओ अपने आत्मदेव में। ज्यों-ज्यों मोह कम होगा त्यों-त्यों प्रतीति का सदुपयोग ठीक होगा।

प्राप्ति और प्रतीति कह दो, राम और माया कह दो, आत्मा और आत्मा की आह्लादिनी शक्ति कह दो तो भी ठीक है। शब्दों के चक्कर में मत पड़ना। असलियत जानने की कोशिश करना। जब असलियत समझ में आ जाती है तो कोई दुराग्रह नहीं रहता। 'मैं जैन हूँ.... मैं मुसलमान हूँ....' ऐसी पकड़ नहीं रहती। मुसलमान के कुल में पैदा हुआ तुम्हारा शरीर है, हिन्दू के कुल में पैदा हुआ तुम्हारा शरीर है, जैन के कुल में पैदा हुआ तुम्हारा शरीर है। इस शरीर के कुल के अनुसार सब प्रतीतियाँ होती हैं। तुम तो परमात्मा के कुल के हो। तुम्हारी जात खुदा की जात है। तुम्हारी जात परमात्मा की जात है। शरीर की जात कुल की जात है।

बचपन के शरीर के कण-कण बदल गये, बचपन की बुद्धि बदल गई, बचपन का मन बदल गया, बचपन के दोस्त बदल गये लेकिन बचपन में मन ऐसा था, बचपन में बुद्धि ऐसी थी यह जाननेवाला आत्मा नहीं बदला। 'बचपन में मेरी बुद्धि ऐसी थी...' ऐसा कहने वाला नहीं बदला। अगर वह बदल जाता तो बदलने का पता किसको चलता ?

आसुमल नगरसेठ का बेटा था। जब वह नन्हा मुन्ना था तब पिता जी ने उसके लिए हीरे जड़ित कमीज बनवायी थी। वह कमीज पहनकर आसुमल वट मारता था कि देखो, मेरी कमीज कितनी चमाचम चमक रही है ! रात को आकाश में देखा तो तारे टिमटिमाते थे। आसुमल ने सोचा कि वहाँ भी किसी नगरसेठ के बेटे ने हीरे जड़ित कमीन पहन रखी होगी। उसके भी हीरे टिमटिमा रहे हैं। वह उसको बोलता कि तेरे पास ऐसी कमीज है तो देख, मेरे पास भी है।

अब वह कमीज मैं खोजूँगा तो भी नहीं मिलेगी, न जाने कहाँ गई और बचपन भी बीत गया। बचपन के शरीर का कण-कण बदल गया। सात साल में पूरा शरीर बदल जाता है। तुम रोज नया खाते हो और पुराना निकालते हो। ऐसा करते-करते शरीर के सब कोष बदल जाते हैं।

शरीर के कण बदल गये, मन का चिन्तन बदल गया, बुद्धि की बेवकूफी बदल गई, शरीर का छोटापन बदल गया। फिर भी कोई एक है जो नहीं बदला। जो नहीं बदला वही तो जानता है सारी बदलाहट को। 'बचपन में ऐसी कमीज थी.....' ऐसा जो जानता है वही है आत्मा। जो बदल गया वह है माया। जो नहीं बदला वह है राम।

राम, लक्ष्मण और सीता जी वनगमन कर रहे हैं। उनका वर्णन करते हुए तुलसीदास जी कहते हैं-

आगें रामु लखनु बने पाछें।

तापस बेष बिराजत काछें।।

उभय बीच सिय सोहति कैसें।

ब्रह्म जीव बिच माया जैसें।।

आगे राम और पीछे लक्ष्मण। दोनों के बीच सीता जी हैं। ऐसे ही आगे ब्रह्म है, पीछे जीव है। बीच में प्रतीति रूपी सीता है। इन दोनों के बीच जो प्रतीति है उसको प्रतीति समझकर उसका सदुपयोग कर लो और प्राप्ति में टिक जाओ। प्राप्ति ही सत्य है, प्रतीति केवल सपना है। तुलसीदास जी रामायण में शिवजी के द्वारा कहलवाते हैं-

उमा कहूँ मैं अनुभव अपना।

सत्य हरिभजन जगत सब सपना।।

प्रतीतिवश तुम अपने को भिन्न-भिन्न सम्प्रदाय के मानते हो। यह तुम्हारे मन की मान्यता है। असलियत में तुम आत्मा हो.... रोम-रोम में रमने वाले राम हो... तुम चैतन्य हो।

"मैं ब्राह्मण हूँ...।'

अरे काहे के ब्राह्मण ? ब्राह्मण तुम्हारा शरीर है। तुम्हारे दिल में तो राम रम रहा है। दिल में अगर राम नहीं है तो तुम ब्राह्मण भी नहीं हो। तुम्हारा राम के साथ सम्बन्ध टूट जाये तो तुम ब्राह्मण भी नहीं। फिर तो जला देंगे मुरदा समझकर। राम बोलो भाई राम।

जिसकी चेतना से तुम्हारा हृदय स्पन्दन करता है वह राम पहले तुम्हारे हृदय में है तब तुम ब्राह्मण। तुम्हारे हृदय में राम है तब तुम जैन। तुम्हारे हृदय में राम है तब तुम हिन्दू। तुम्हारे हृदय में राम है तब तुम मुसलमान।

तुमने सुन-सुनकर मान रखा है कि मैं जैन हूँ....मैं बनिया हूँ.... मैं हिन्दू हूँ... मैं मुसलमान हूँ.... मैं भाई हूँ.... मैं माई हूँ....। यह सब प्रतीति है। इसका व्यवहार में उपयोग करो। हमारा कोई विरोध नहीं है। हम तो सबको अपनी आत्मा मानते हैं। हम सबको प्रणाम करते हैं। हम शरीर का अनादर नहीं करते लेकिन तुम शरीर नहीं हो यह समझने का मेरा प्रयास है। शरीर तुम्हारा साधन है। इस साधन को कैसे ठीक रखना यह भी हम बताते हैं।

तुम्हारा शरीर तन्दुरुस्त कैसे रहे ? इसके लिए कब खाना, क्या खाना, कैसे खाना यह जान लोगे तो शरीर भी तन्दुरुस्त रहेगा और व्यवहार में आनन्द आयेगा। हररोज सूर्योदय से पहले शरीर को मर्दन करके स्नान कर लो। प्राणायाम करो, योगासन करो। सत्त्वगुण बढ़ेगा। शरीर मजबूत बनेगा।

भोजन करते समय पैर गीले करके भोजन करो लेकिन सोते समय पैर गीले नहीं होने चाहिए।

रात्रि में सोते समय पूर्व अथवा दक्षिण की तरफ सिर करके सोओगे तो तुम्हारी उमरिया लम्बी होगी। शरीर तन्दुरुस्त रहेगा। अगर तुम पश्चिम या उत्तर दिशा की तरफ सिर करके सोते हो तो तुम्हारे मस्तिष्क में शिकायत रहेगी, शरीर में बीमारी रहेगी। अपमृत्यु का भय रहेगा।

तुम अपने को कुछ भी मानो भैया ! लेकिन कम-से-कम अपना शरीर तो तन्दुरुस्त रखो।

अपने को तुम जैन मानते हो... हमें आनंद है। अपने को तुम कुछ भी मानते हो, हमें कोई आपत्ति नहीं लेकिन कम-से-कम इतना तो समझ लो कि ये सब तुम्हारी मान्यताएँ है। अपने वास्तविक स्वरूप को भी जान लेने की हिम्मत जुटाओ न भाई !

तुम्हारा शरीर तन्दुरुस्त रहे, मन प्रसन्न रहे ऐसी कुछ बातें जान लो। मन को प्रसन्न बनाने के लिए उदार जीवन जियो। संकीर्णता को छोड़ो। हृदय को विशाल बनाओ। मन को खुश रखने का प्रयास करो।

तुम्हारी बुद्धि में अन्दर का प्रकाश आना चाहिए। जिसकी सत्ता से आँखे देखती हैं, जिसकी शक्ति से कान सुनते हैं, जिसकी शक्ति से दिल धड़कता है उस शक्तिदाता में अपनी बुद्धि को कभी-कभी विश्रान्ति देने का प्रयोग करो। तुम्हारा तन तन्दुरुस्त रहे, मन प्रसन्न रहे और बुद्धि में आत्म-प्रकाश हो जाय.... फिर तुम अपने को कुछ भी मानते रहो, हमें आनन्द है। हमें कोई आपत्ति नहीं है भैया ! संत तो सबके होते हैं। जैसे, सूरज का प्रकाश सबके लिये होता है, चाँद की चाँदनी सबके लिए होती है, ईश्वर की हवाएँ सबके लिए होती हैं। ऐसे ही संत की वाणी संत का अनुभव सबके लिए होता है। संत सबके होते हैं।

जाति न पूछिये संत की पूछ लीजिए ज्ञान।

मोल करो तलवार का, पड़ी रहने दो म्यान।।

मीराबाई के गुरु कौन थे ? संत रैदास। रैदासजी का धन्धा चमार का था लेकिन दिल ? दिल तो राम में रंगा हुआ था।

राम के रंग के बिना और सब किया तो क्या किया ? आदमी हाड़-मांस के, चमड़े के शरीर को पालते-पोसते, खिलाते-पिलाते अक्ल-होशियारी लगाते लगाते कितना भी संसार रूपी दुकानदारी चलाता है। आखिर तो पैसा कमाकर इस हाड़-मांस के शरीर को ही पोसता है, और क्या करता है ? लोगों के सामने तो बड़ा साहब बनता है, रोब दिखाता है लेकिन घर जाकर तो मेम साहब के आगे गिड़गिड़ाता है, विषय-सुख में लट्टू होता है।

जिस तरह की लगन स्त्री-सुख में होती है, जिस तरह की लगन प्रेमी अपनी प्रेमिका में रखता है ठीक ऐसी ही लगन, ऐसी ही प्रीति अगर प्रभु चरणों में हो जाये तो आदमी प्रतीति से निकलकर प्राप्ति रूप परमात्मा में स्थिर हो सकता है। इसमें लेश मात्र संदेह नहीं है। एक बार आजमाकर तो देखो कि पीर-पैगम्बर, संत-महात्मा यूँ ही चिल्लाते रहते हैं या वाकई कोई दम भी है उनकी हिदायतों में... उनके वचनों में ?

एक बार की सच्ची घटित घटना आँखों देखी सुनाता हूँ। घटना है तो बड़ी घटिया और आप लोग भी सिनेमा इत्यादि में आये दिन देखते ही होंगे। शायद यहाँ सुनकर आपको इससे कुछ लाभ मिले।

हम अमेरिका गये हुए थे। वहाँ एक ही दिन में तीन-तीन चार-चार अलग-अलग प्रांतों में सत्संग-प्रवचन होते थे। प्रायः चार्टर्ड प्लेन में यानि स्पेशल हवाई जहाज में यात्रा करने की होती थी। कभी-कभी साधारण हवाई जहाज में भी यात्रा करने का मौका आया। पाँच सौ या हजार कि.मी. पर हवाई जहाज रुकता था। डेढ़ सौ दौ सौ लोग और भी होते थे। कुछ स्त्री-पुरुष, कुछ अकेले पुरुष, कुछ अकेली स्त्रियाँ।

स्त्रियाँ अपने साथ एक पर्स हमेशा रखती थीं। उसमें कुछ श्रृंगार का सामान जैसे पावडर, आईना, तेल, आँखों की भौहों पर लगाने का सामान, गाल-ओठों पर लगाने की लाली-लिपस्टिक आदि सब होता था। जब उन स्त्रियों का गन्तव्य स्थान आने लगता था तो वे अपने पर्स से आईना निकाल कर मुँह देखती, आँखों की भौहों पर कुछ लगाती, चेहरे पर पावडर लगाती। यहाँ तक तो ठीक है। फिर गोल-गोल लम्बा-लम्बा लाल केमिकल जिसको लाली बोलते हैं वह निकालती और मुँह से थूक और लार का मिश्रण करके वह लाली गाल पर रगड़ती। लाली में एक तो होता है केमिकल, और दूसरा होता है पशुओं का खून। तीसरा, उसकी लार में मरे हुए बेक्टेरिया (कीटाणु)।

हवाई जहाज के उतरने पर जब उसका पति या प्रेमी उसको लेने आता था तो उसको चुम्बन लेने लग जाता था। उस समय मुझे दिल में लगता था किः अरे रे रे...! इतना बड़ा साहब कितना बेवकूफ गधा ! थूक, लार, केमिकल और पशुओं के खूनवाला चमड़ा चाट रहा है सुख के लिए ! इससे तो आत्मरस ले ले, ध्यान रस ले ले। समता का रस पी ले। तू यह क्या करता है ? इतना पढ़ा-लिखा होकर बेवकूफी में थूक चाट रहा है ? टाई वाई पहना हुआ है.... अच्छा, गोरा, चिट्टा छः फुट का लम्बा... इतनी अक्ल नहीं कि क्या चाट रहा है !

      आदमी अपने आपको पढ़ा लिखा, अक्लवाला, बुद्धिमान मानता है फिर भी ओंठ और गाल पर केमिकल और थूक है इतना तो वह भी जानता है लेकिन क्षणिक सुख के लिए वह कैसा अनर्थ कर बैठता है। प्रतीति में उलझ जाता है। चमड़े थूक और  केमिकल में मजा लेता है। अगर थूक में मजा होता तो वह स्त्री पहले से ही मजे मे आ जाती, थूक तो उसके मुँह में पहले से ही पड़ी थी।

जैसे कुत्ता हड्डी चबाता है और उसके दाँतों से, मसूड़ों से खून निकलता है। अज्ञानवश वह समझता है कि हड्डी में से वह मिल रहा है, रस आ रहा है। अज्ञानवश वह समझता है कि हड्डी में से वह मिल रहा है, रस आ रहा है। ऐसे ही आदमी के अन्दर रस तो राम का है लेकिन हाड़-मांस चाटकर समझता है कि वहाँ से मजा आ रहा है।

जो स्त्री-पुरुष एक दूसरे से ज्यादा कामुकता से मिलते हैं वे शत्रु हैं। बल, बुद्धि, तेज, तन्दुरुस्ती और आयुष्य क्षीण करने में लगे हैं।

सुकरात के पास एक नवविवाहित दुल्हा गया और प्रार्थना की किः "गुरु महाराज ! आप आज्ञा करें की हम संसार में कैसे जियें ?"

सुकरात बोलेः "जीवन भर से एकबार संसार व्यवहार कर। जीवन में एकबार नहीं तो साल में एकबार।"

"उससे भी संतोष नहीं मिले तो ?" युवक ने पूछा।

"छः महीने में एक बार।"

"उससे भी थोड़ा जल्दी चाहिए तो ?"

"तो तीन महीने में एकबार।"

"तीन महीने भी नहीं रह सके तो ?"

"महीने में पाँच दिन बीत जाय फिर अमावस्या, एकादशी, श्राद्धपक्ष और पूनम छोड़कर सातवें दिन, नौवें दिन, ग्यारहवें दिन, मासिक धर्म के छः दिन छोड़कर महीने में एकबार।"

"महाराज ! महीने में एक दिन से संतोष न हो तो ?"

सुकरात ने कहाः "फिर ऐसा करो, बाँस की वह सीढ़ी (ननामी) बनाकर तैयार रख लो, फिर चाहे प्रतिदिन करो। आँखों की रोशनी कमजोर हो जायेगी और बेटों को भी चश्मा जल्दी आ जाएँगे। तुम अगर बचपना करोगे काम-विकार में तो तुम्हारे बच्चों की भी कमर झुक जायेगी, कमजोर हो जायेगी। सबका सत्यानाश करोगे और तुम्हें अर्थी की जल्दी आवश्यकता पड़ेगी।"

आदमी में चतुराई तो है लेकिन वह चतुराई से ठगी करके ऐश-आराम पाना चाहता है, सुखी होना चाहता है और सुख के बदले में दुःख-दर्द पैदा कर लेता है। सच्ची चतुराई तो यह है कि वह प्राप्ति में टिक जाय, अन्दर के आत्मरस में टिक जाय।

बाप बेटे से बोलता हैः तू जरा ग्राहक को निपट ले। सच्चा बाप तो वह होता है जो मौत से निपटने की कला बता दे। इसलिए तो कहते हैं कि जीव का सच्चा बाप तो सदगुरु होते हैं। शरीर के माँ-बाप तो बाहर के होते हैं लेकिन आत्मा-परमात्मा की जागृति के माई-बाप तो भगवान और भगवान के प्यारे संत होते हैं जो मनुष्य को प्रतीति से ऊपर उठाकर प्राप्ति में डालते हैं।

दीक्षा तीन प्रकार की होती है। एक होती है मांत्रिक दीक्षा, दूसरी होती है शांभवी दीक्षा और तीसरी होती है स्पर्श दीक्षा। ब्रह्मवेत्ता गुरुदेव अपने परमात्म-भाव में बैठकर शिष्य को वैदिक मंत्र देते हैं। शिष्य जिसे केन्द्र में रहता है उस केन्द्र में जाने की कला जानने वाले गुरुदेव वहाँ बैठकर जब गुरुमंत्र देते हैं तो शिष्य के स्वभाव में रूपान्तर होता है। दीक्षा से शिष्य को कुछ न कुछ अनुभव हो जाना चाहिए। उसी समय नहीं तो दो चार दिन के बाद कुछ न कुछ तो होना ही चाहिए। पानी पिया तो प्यास बुझेगी ही, भोजन खाया जो भूख मिटेगी ही सूरज निकला तो अन्धकार मिटेगा ही। ऐसे ही मंत्र मिला तो पाप मिटने का अनुभव होगा। हृदय में रस का अनुभव होगा।

गुरु लोभी शिष्य लालची दोनों खेले दाव।

दोनों डूबे बावरे चड़े पत्थर की नाव।।

आगे गुरु पीछे चेला दे नरक में ठेलम ठेला।।

ऐसे गुरु तो दुनियाँ में कई मिल जाते हैं लेकिन रामानन्दजी जैसे सदगुरु और कबीर जी जैसे सत् शिष्य, अष्टावक्रजी जैसे सदगुरु और जनक जैसे सत् शिष्य, शुकदेवजी जैसे सदगुरु और परीक्षित जैसे सत् शिष्य जब मिलते हैं तब काम बन जाता है। रामकृष्णजी जैसे सत् शिष्य और तोतापुरी जैसे सदगुरु, विवेकानन्द जैसे सत् शिष्य और रामकृष्ण जैसे सदगुरु हों तब काम बन जाता है।

रामकृष्ण परमहंस को तो कई शिष्य मानते थे लेकिन शिष्यों की जितनी योग्यता थी उसके अनुसार उनको लाभ मिला। लाभ तो सबको अवश्य मिलता है। बरसात कैसे होती है हम सब जानते हैं। सूरज की तपन से सागर का पानी वाष्पीभूत होता है। पानी वाष्प बनकर ऊपर जाता है, बादल बनते हैं, ठण्डे होकर बरसात के रूप में बरसते हैं।

सागर का पानी अगर स्वाति नक्षत्र में बरसात बनकर गिरता है और इसकी एक बूँद सीप के मुँह में पड़ जाती है तो सागर के गर्भ में जाकर समय पाकर वह बूँद मोती बन जाती है। है तो सागर का पानी। लेकिन बादल के जरिये जब बरसता है तो मोती में परिवर्तित हो जाता है, क्योंकि पात्र सीप मिल गई और स्वाति नक्षत्र का संयोग मिल गया।

ऐसे ही अमर स्वाति नक्षत्र रूपी सदगुरु हों और सीप रूपी सत् शिष्य हो तो यहीं संसार रूपी सागर की बातें लेकर संसार के गर्भ में ही शिष्य के हृदय में परमात्मा रूपी मोती पका सकते हैं वे महापुरुष।

है तो सागर का पानी। बादल बनकर बरसता है तो कहीं गंगा बनता है कहीं यमुना, कहीं नर्मदा बनता है कहीं गोदावरी, कहीं और कोई नदी कहीं नाला, कहीं सरोवर कहीं बाँध। वही पानी सागर में बरसता है तो खारा बन जाता है और स्वाति नक्षत्र में सीप के मुँह में पड़ता है तो मोती बन जाता है।

किसी सत्संग समारोह की पूर्णाहुति करते समय एक राजनेता ने घोषणा कीः "सब धर्मों का ज्ञान देनेवाले, दिव्य भक्ति, योग, ज्ञान से परिपूर्ण गुरु महाराज पूज्यपाद संत श्री आसारामजी महाराज का प्रवचन सुनकर हम लोग पवित्र हुए। लेकिन इस आयोजन को तो मैं सफल तब मानूँगा कि जब सब लोग पू. बापू की बातों पर अमल करें.......।"

मैंने देखा कि यह गड़बड़ कर दी। सब लोग अमल नहीं करेंगे तो क्या आयोजन व्यर्थ हो गया ? मैंने उनको रोककर कहाः

"सत्संग तो बरसात है। बरसात का जल सीप के मुँह में गिरे तब भी सफल है और किसी पहाड़ी पर गिरे तब भी सफल है। बरसात कभी व्यर्थ नहीं जाती। और जगह तो ठीक लेकिन डामर की सड़क पर जहाँ कोई खेती वेती नहीं होती वहाँ बरसात पड़ती है तो गोबर और डीजल के दाग तो धुलते ही हैं। ऐसे ही कठोर हृदय पर भी सत्संग की बरसात पड़े तो पाप के दाग धुलते हैं।"

सत्संग का आयोजन तो सफल होगा। लोग अमल करें तो मोती पकायें। अमल नहीं भी करें तो दिल रूपी सड़क तो साफ हो ही गई भैया ! आयोजन सफल ही है।

जरूरी नहीं कि सब के सब लोग अमल करके भगवान का साक्षात्कार कर लें। भगवान का साक्षात्कार कर लें तो बेड़ा पार है और नहीं भी करें, केवल सुनते हैं तो भी हृदय कोमल बनता है। अहंकार रूपी डीजल के दाग धुलते हैं, मोह रूपी गोबर धुलता है। दिल अगर कठोर भी होता है तो उसमें कुछ न कुछ तो फर्क पड़ जाता है। कुछ न कुछ तो स्वच्छ हो ही जाता है।

सत्संग रूपी अमृत कठोर दिल रूपी सड़क पर गिरता है तो भी काम करता है और खेड़ी हुई ऊर्वरा भूमि की तरह भक्ति भाव के संस्कारों से युक्त हृदय पर सत्संग-अमृत की वृष्टि होती है तो भगवद भक्ति के फल उगते हैं। अगर ज्ञान के संस्कारवाले दिल पर सत्संग की बरसात होती है तो वहाँ ज्ञान रूपी फल लगते हैं। योगाभ्यासी के हृदय में योगसिद्धि रूप फल लगते हैं। सत्संग कभी व्यर्थ नहीं जाता। इसीलिए तुलसीदासजी कहते हैं-

एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध।

तुलसी संगत साध की हरे कोटि अपराध।।

एक आदिवासी लड़का था। उसको सत्संग का रंग लग गया। वह था तो गरीब लेकिन भगवान गरीबी अमीरी थोड़े ही देखते हैं ! वे तो दिल देखते हैं दिल !

बीस-पच्चीस साल का वह लड़का सिर पर माल ढोने की मजदूरी करता था। उसने ऐसा नियम ले रखा था कि जो मेरी बात सुनेगा, जन्म-जन्म की मजदूरी उतारनेवाला सत्संग सुनेगा अथवा मुझे सुनायेगा उसी का बोझ मैं उठाऊँगा।

जो प्रतीति से थोड़ा ऊपर उठ चुका हो और प्राप्ति के मार्ग की ओर अग्रसर हो उसका नियम बड़ी मुश्किल से टूटता है।

लोग बाजार में घरेलू सामान खरीदने आते थे। उस समय यांत्रिक वाहन आदि का जमाना नहीं था। मजदूर लोग सिर से सामान ढोते थे। वह लड़का ऐसा ही सामान ढोने का काम किया करता था। वह बेचारा मजदूरी तो करता था लेकिन हर समय उसके दिल में 'राम राम राम' का अजपाजाप चला करता था, क्योंकि वह तो प्रतीति से प्राप्ति की ओर अग्रसर था। प्रतिदिन सुबह शाम भगवान का स्मरण करके उसका हृदय पवित्र हो गया था। दिखने में तो बाहर से वह गरीब दिखता था लेकिन भीतर में उसे रामनाम का खजाना प्राप्त था।

एक सेठ को सामान लेकर घर जाने की जल्दी थी। लड़के को देखकर सेठ ने बुलाया और जल्दी-जल्दी सामान ले चलने को कहा। लड़के ने सामान उठाया और सेठ के साथ चल पड़ा। रास्ते में चलते-चलते उसे याद आया कि अरे ! शर्त रखना तो भूल ही गया ! सेठ जी को रोकाः

"सेठ जी ! आपसे एक शर्त रखना भूल गया। मैं उसी का सामान उठाता हूँ जो मुझसे भगवद कथा सुने या सुनाये।"

सेठ जी को जल्दी थी। सोचाः लड़का नादान है। बोलेः "भाई ! मुझे तो कथा वथा आती नहीं। तू ही सुनाता चल।"

रास्ते में लड़का कथा सुनाता रहा। घर पहुँचे। लड़के ने सामान रखा और पूछाः

"सेठ जी ! कथा कैसी लगी ?"

"अरे ! तू तो बड़ा भोलाभाला है। मुझे तो अपना काम करवाना था. मैंने तो तेरी कोई कथा वथा नहीं सुनी। सिर्फ 'हाँ... हूँ...' करता आया।"

लड़के ने सोचाः अरे भगवान ! सेठ के पास पैसा तो है लेकिन भक्ति नहीं है। यह तो कोई अभागा है। पापी लगता है। जिसको सत्संग नहीं भावे, भगवान की कथा नहीं भावे उसे तो पापी ही कहूँगा।

लड़के ने थोड़ा अपने भीतर गोता लगाया। प्रतीति से थोड़ा प्राप्ति में पहुँचा। एक मिनट का ध्यान करके पता लगा लिया कि सेठ का कब क्या होने वाला है। वह सेठ से बोलाः

"सेठ ! कल का तुम्हारा आखिरी दिन है। कल शाम को तुम्हारे हृदय में थोड़ा दुःखेगा और तुम इस  दुनिया से सदा के लिए विदा होगे।"

"अरे क्या बोलता है छोकरे !" सेठ को उसकी बात में कुछ दम लगा क्योंकि उसकी यह बात उसके अन्तरात्मा से निकली थी। सेठ ने कहाः

"बैठ बेटा ! बैठ। चाय वाय पी। बिस्कुट खा। अपनी थकान उतार।"

लड़का बोलाः "सेठजी ! ऐसा नहीं है कि आप मुझे चाय वाय पिलाएँ, बिस्कुट आदि खिलाएँ और मौत टल जाये। वहाँ कोई रिश्वत आदि नहीं चलती।"

"बेटे ! कोई उपाय बताओ।"

"उपाय तो मैं बता सकता हूँ फिर भी आपको मरना तो पड़ेगा। मरने के बाद आप सुखी रह सको ऐसा कुछ उपाय मैं आपको बता सकता हूँ।"

उस भक्त लड़के ने सेठ को कुछ रहस्य समझा दिया। दूसरे दिन शाम को सेठ के हृदय में थोड़ा दर्द उठा और सेठ जी चल बसे।

किसी न किसी निमित्त से हर किसी को एक न एक दिन जाना ही पड़ेगा। है कोई ऐसा जो दावे के साथ कह दे कि मैं नहीं मरूँगा ? शादी नहीं करूँगा ऐसा कह सकते हो, परदेश नहीं जाऊँगा ऐसा कह सकते हो, नौकरी करूँगा या नहीं करूँगा ऐसा कह सकते हो लेकिन मरूँगा नहीं ऐसा कोई नहीं कह सकता। है कोई ऐसा कहने वाला ? सबकी मृत्यु पक्की है, बाकी सब कच्चा है।

मरो मरो सब कोई कहे मरना न जाने कोई।

एक बार ऐसा मरो कि फिर मरना न होई।।

वह लड़का कुछ सीखा हुआ था अपने गुरु से। प्राप्ति के अर्थात् अन्तर्यामी परमात्मा की प्राप्ति के करीब था। बैखरी वाणी से मध्यमा, पश्यन्ति और परा के नजदीक पहुँचा हुआ था। बाहर से तो गरीब था लेकिन भीतर से वह कुछ और था। भक्ति-प्रभुध्यान का धन था उसके पास।

लड़के ने जैसा बताया था ऐसा ही सेठ ने यमपुरी में जाकर किया। यमराज के पास पहुँचने पर चित्रगुप्त ने कहाः "इसने जन्म भर पाप किये हैं। पुण्य मात्र इतना ही है इसने एक घंटे का सत्संग किया है, भगवद कथा का श्रवण किया है।"

यमराज सेठ से बोलेः "तुम्हें पहले अपने पुण्य का फल भुगतना है या पहले पाप का फल भुगतना है ? तूने बीड़ी-सिगरेट पिया, दारू पिया, मांस खाया, दूसरों का दिल दुःखाया, और भी न जाने क्या क्या पाप किये हैं। इसके लिए तुम्हें नरक में जाना पड़ेगा। फिर बैल होना पड़ेगा, कुत्ता, गधा, बिल्ला, आदि होना पड़ेगा। तो पहले पुण्य का फल दें कि पाप का ?

सेठ को उस लड़के ने बताई हुई बात याद थी। वह बोलाः "मैं पाप का फल तो भोग लूँगा लेकिन मुझे पुण्य का फल नहीं भोगना है।"

यमराज ने सोचा कि ऐसा केस तो यहाँ पहला ही है। यह पहला आदमी है जो अपने पुण्य का फल भोगना नहीं चाहता। वे बोलेः

"तू पुण्य का फल भोगना नहीं चाहता तो क्या चाहता है ?"

"मैं पुण्य का फल भोगना नहीं देखना चाहता हूँ।"

यमराज सोच में पड़ गये। सत्संग से जो पुण्य अर्जित होता है उसे भोगा जाता है। यह जीव फल देखना चाहता है। अब क्या किया जाय ? यहाँ का ऐसा कोई कायदा नहीं है। समस्या खड़ी हो गई। चलो, इन्द्रदेव के पास जायें। वहाँ कुछ हल मिल जाये। उधर कोई कायदा बना हो तो देखें।

यमराज सेठ को लेकर पहुँचे इन्द्रदेव के पास और बोलेः "यह प्राणी सत्संग का फल भोगना नहीं देखना चाहता है।"

इन्द्र ने भी देखा कि हमारे पास ऐसा कोई सर्कुलर या नियम नहीं आया है कि सत्संग का फल इसे दिखाया जा सके। इन्द्र ने कहा कि चलो इसे आदिनारायण भगवान विष्णु के पास, मूल पुरुष के पास ले चलें।

चित्रगुप्त, यमराज और इन्द्रदेव उस सेठ को बड़े आदर के साथ ले गये और विनम्र हाथ जोड़कर बोलेः

"महाराज ! इस व्यक्ति ने हमें बड़े धर्मसंकट में डाल दिया है। यह सत्संग द्वारा अर्जित पुण्य का फल भुगतना नहीं देखना चाहता है।"

भगवान आदिनारायण ने उस पर दृष्टि डाली और अपने प्राप्ति स्वभाव में पहुँचकर देखा कि मेरे उस गरीब भक्त लड़के ने इसको कान में फूँक मार दी है, युक्ति बतायी है। इसी से दो घड़ी के पुण्य फल की वजह से मुझे प्रत्यक्ष देख रहा है। प्रभु ने चित्रगुप्त, यमराज और इन्द्रदेव को विदा कर दिया। सेठ भगवान से हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगा।

"प्रभो ! मुझे सत्संग के पुण्य का फल देखना है।"

भगवान मन्द-मन्द मुस्कराने लगे। बोलेः

"उस भक्त बालक के साथ तूने दो घड़ी सत्संग किया और वह भी आधा सुना आधा नहीं सुना। फिर भी चित्रगुप्त, यमराज और इन्द्र तुझे आदर के साथ मेरे पास ले आये और तू साक्षात् मेरे दर्शन कर रहा है, मुझसे बात करने का अधिकारी बन गया है। इससे बढ़कर और क्या फल हो सकता है।

उस बालक के साथ तेरे दो घड़ी के सत्संग मात्र से ही तू मुझे देख रहा है। सत्संग से ही मैं दिख रहा हूँ। मैं कण कण में, सर्व हृदयों में वास करने वाला वासुदेव बिना सत्संग के नहीं दिखता। सत्संग का फल तू देख ही रहा है।"

मजदूर बालक के साथ दो घड़ी सत्संग करने मात्र से जब श्रीहरि के दर्शन हो सकते हैं तो संत के दरबार में आकर सत्संग सुनते हो तो दिल में दिलबर रस स्वरूप से प्रकट हो जाय इसमें क्या आश्चर्य है।

भगवान कहते हैं-

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।

प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते।।

"अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्न चित्तवाले योगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भली भाँति स्थिर हो जाती है।"

वह आत्मज्ञान का प्रसाद, दिल का प्रसाद जब मिलता है तब सारे दुःख दूर हो जाते हैं। बुद्धि प्रतीति से ऊपर उठकर प्राप्ति में पहुँच जाती है, परब्रह्म परमात्मा में ठहरने लगती है।

जिसको सत्संग में रूचि नहीं है उसको कुसंग में रूचि है। जो सत्संग नहीं करेगा वह कुकर्म जरूर करेगा। जो सदविचार नहीं करेगा वह कुविचार जरूर करेगा। जो राम को प्यार नहीं करेगा वह काम का जरूर गुलाम होगा।

इसलिए अपने हृदय में बैठे हुए आत्मा को प्यार करो, राम को प्यार करो।

प्यार तो अपने दिलवाले से करो और व्यवहार बाहर करो। प्यार दिलवाले से करोगे तो तुम्हारा दिल पवित्र हो जायेगा। पवित्र दिल से सदभावना से ओतप्रोत होकर तुम व्यवहार करोगे तो तुम्हारा व्यवहार भी साधना हो जायेगा, दिल में दिलबर का प्यार भरके तुम व्यवहार करोगे, व्यवहार में प्रेम रखोगे, सदभावना रखोगे तो व्यवहार भक्ति बन जायेगा। अगर भक्ति में प्रेम नहीं है, सदभावना नहीं है तो भक्ति भी झगड़ाबाजी हो जायेगी।

वास्तव में सच्चे सत्संग में, सच्चे ज्ञान में, सच्चा जीवन जीने के मार्ग में रूचि नहीं है इसलिए सांसारिक जीव दुःखी है। जब सच्चा सत्संग, सच्चा ज्ञान, सच्चा परमात्मा-प्रेम हृदय में प्रकट होने लगता है तो समाज में सुख शान्ति, आनन्द, उदारता आदि सदगुण खिलते हैं।

मैं कहता हूँ- एक चक्रवर्ती सम्राट होना उतना अच्छा नहीं जितना भगवान का प्यारा सत्संगी होना अच्छा है।

सम्राट के साथ राज्य करना भी बुरा है न जाने कब रुला दे।

संत के साथ भीख माँगकर रहना भी अच्छा है न जाने कब मिला दे।।

इसलिए.....

कर सत्संग अभी से प्यारे नहीं तो फिर पछताना है.....।

सत्य स्वरूप ईश्वर में रहने का अभ्यास आज से ही चालू कर दो। यह जगत प्रतीति मात्र है। प्रतीति को जिसकी सत्ता से देखा जाता है उस परमात्मा को, तुम्हारे अन्तरात्मा को, उस सर्वेश्वर  को, उस परमेश्वर को स्नेह करो। जो सदा प्राप्त है उसमें गोता मारो, उसी प्राप्तिरूप परमेश्वर में स्थिर होते जाओ।

हरिः ॐ.... ॐ..... ॐ...।

हिम्मत करो। कार्य कठिन नहीं है। तुच्छ आकर्षण छोड़कर शाश्वत की ओर चलने का दृढ़ संकल्प तुम्हें तो निहाल करेगा, तुम्हारे संग में आनेवालों का भी बेड़ा पार करेगा।

प्रतीति में आसक्त न हो और प्राप्ति में टिक जाओ तो जीते जी मुक्त हो।

अनुक्रम

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तो माया तरना सुगम है

परमात्मा की माया बड़ी दुस्तर है। जीव को जल्दी से पता चलने नहीं देती कि वह क्या चाहता है। हम जिन चीजों की इच्छा कर रहे हैं वे चीजें जिनके पास हैं वे क्या तृप्त हो गये हैं ? हम जो कुछ चाहते हैं वह जीवन का सही लक्ष्य है क्या ? हम जो कुछ बनाये जा रहे हैं, सजाये जा रहे वह साथ चलेगा क्या ?.... माया में हमारी बुद्धि उलझी हुई रह जाती है।

न मां दुष्कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः

माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमिश्रिताः।।

'माया के द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है ऐसे असुर स्वभाव को धारण किये हुए मनुष्यों में नीच दूषित कर्म करने वाले मूढ लोग मुझको नहीं भजते।'

(भगवदगीताः 7.15)

अज्ञान से हमारा ज्ञान आवृत्त हो गया है। हम मोहित हो जाते हैं, ब्रह्म में से जन्तु की श्रेणी में आ जाते हैं।

जीव माया के तीन गुणों से बचने की युक्ति जान ले, परमात्मा की शरण ले ले, समझ पा ले तो पता चले कि इतने जन्मों से हमने अपने साथ धोखा किया, अपने साथ गद्दारी की। कम से कम अपने साथ तो बुरा मत करो।

हम अपने साथ बुरा करना नहीं चाहते लेकिन हम वही प्रवृत्ति करते रहते हैं जिससे हमारा अहित होता है। हम वे ही पदार्थ चाहते हैं जिससे हमारा ज्ञान दबा रहता है। हम वे ही सुविधाएँ चाहते हैं जिससे हमारा मन दुर्बल हो जाता है, मनोबल क्षीण हो जाता है। हम वे ही पद चाहते हैं जिससे हमारा अहंकार बढ़ता है, अहंकार विसर्जित नहीं होता। हम वे ही सुख चाहते हैं जिससे हमारी वासनाएँ बढ़ती हैं, वासनाएँ निवृत्त नहीं होतीं। अगर वासना निवृत्त करने वाले सुख में गोता मारें तो बेड़ा पार हो जाय।

वासना निवृत्त करने वाला सुख तो केवल आत्मसुख है, आत्म-ध्यान है। वासनाओं को निवृत्त करने वाला सुख तो एक राम का सुख है। वासनाओं को भड़काने वाला सुख काम का सुख है, विषयों का सुख है। कामना का सुख लेते लेते हम कई जन्मों से भटकते आये हैं, कई जन्मों से जीते आये हैं, मरते आये हैं। हमारा यह मनुष्य जन्म है, शायद इस बात को समझ जाएँ, इस वचन को हम समझ जाएँ कि यह माया है।

माया का अर्थ है धोखा। माया = या मा सा माया। जो नहीं है फिर भी प्रतीत होती है वह माया। माया का वास्तविक अस्तित्व नहीं है, वास्तविक सार नहीं है, माया की वास्तविक स्थिति नहीं है, माया की वास्तविक सत्ता नहीं है फिर भी प्रतीत होती है। माया से हम लड़ना चाहें तो क्या खाक लड़ेगी ? मिट्टी का पुतला जमीन से लड़ने जाय, घड़ा चट्टान से लड़ने जाय ते क्या होगा ? फूट ही जाएगा। ऐसे ही हमारा यह स्थूल शरीर, हमारा मन, हमारी बुद्धि, हमारा कारण शरीर, ये सब माया के बने हुए हैं। विशाल ब्रह्माण्डों में फैली हुई इसी माया की सत्ता से ही बने हुए इन साधनों से ही माया को जीतने की चेष्टा करें तो जीतना मुश्किल है। जैसे बुदबुदा सागर को वश करना चाहे तो सागर का वश होना असंभव है।

बुदुबदा सागर को वश न करे लेकिन बुदबुदा अपनी वजूदी जाना ले तो पता चले कि मैं पानी हूँ। सागर भी तो पानी ही पानी है। जैसे बुदबुदा पानी के शरण चला आया ऐसे ही जीव परमात्मा के शरण चला जाय तो उसके लिए माया तरना आसान हो जाता है। नहीं तो, माया में रहकर, मन में रहकर, बुद्धि में रहकर, शरीर में रहकर, अहंकार में रहकर, कोई अपनी अक्ल से, अपने बाहुबल से, अपने धन से, अपने वैभव से, अपने मित्रों के सहारे से, अपने सत्ता की कुर्सी से अगर माया को पार करना चाहता है तो वह नादान है। मानो वह सागर में गद्दियाँ बिछाकर सागर को पार करना चाहता है।

माया त्रिगुणात्मक है। उसके किसी न किसी गुण में हम अपना अहंकार जोड़ देते हैं। आती है नींद शरीर को थकान के कारण, तमस् के कारण और हम कहते हैं कि मुझे नींद आ गई। लगती है भूख प्राणों को लेकिन हमारा अहंकार कहता है कि मुझे भूख लगी। होता है हर्ष मन को लेकिन हम सोचते हैं मुझे हर्ष हुआ। होता है शोक मन को और हम कहते हैं कि मैं दुःखी हूँ।

माया के गुणों के साथ हम मिल जाते हैं क्योंकि हम परमात्मा की शरण में नहीं हैं। हम गुणों के शरण हो जाते हैं। हम परमात्मा के शरण नहीं हैं इसलिए मान-अपमान के शरण हो जाते हैं। हम परमात्मा के शरण नहीं हैं इसलिए कल्पना के शरण हो जाते हैं और खो जाते हैं गुणों के अधीन। इसी का नाम माया है।

अपनी अक्ल है नहीं और दूसरों का मानना नहीं। यही माया है।

बड़े-बड़े तीसमारखाँ जो संसार को नचाने की सत्ता रखते थे वे भी माया के आगे नाचकर गये। जो स्वर्ग की सीढ़ियाँ बनाने की योग्यता रखते थे, जिनके पास ऐसे नौकर थे जो सोने का मृग बन जाय और सीता को धोखा दे दे ऐसे रावण जैसे लोग भी माया के आगे हार गये। माया गुणमयी है। माया धन का, सत्ता का, धर्मात्मा होने का, पुण्यवाला होने का, सेवक होने का, साधक होने का, भक्त होने का, कुछ न कुछ होने का अहंकार हमारे चित्त में पैदा कर देती है।

माया तब तक हमें अपनी झपेट में लेती रहती है, तब तक हमें गिराती रहती है, तब तक हमें बाँधती रहती है जब तक हम परमात्मा के शरण नहीं गये। जब तक हमने उस परमात्मा के लिए हमारी भूख नहीं जगी तब तक माया हमें मजदूरी कराती रहती है।

'धन कमाएँगे तो सुखी होंगे, सत्ता मिलेगी तो सुखी होंगे, राज्य मिलेगा तो सुखी होंगे, शत्रु मरेगा तो सुखी होंगे, मित्र आयेगा तो सुखी होंगे....., ये सब मन की कल्पनाएँ हैं और मन माया से बना है।

रामायण में आता हैः

संसृत मूल शब्द प्रद नाना।

सकल शोक दायक अभिमाना।।

'संसृत' माने जो सरकने वाला है, नाश के तरफ जाने वाला है। उस नाशवान पदार्थों में, नाशवान अवस्थाओं में, जिसकी रूचि हो गई, जिसका मोह हो गया उसको सब शोक आकर मिलते हैं। बदलने वाले अहंकार को, बदलनेवाले प्रकृति के पदार्थों को, बदलने वाले गुणों को जिसने 'मैं' मान लिया, बदलने वाली अवस्थाओं को जिसने अपनी अवस्थाएँ मान ली, बदलने वाले शरीर को जिसने 'मैं' मान लिया, बदलने वाले घर को जिसने 'मेरा' मान लिया, बदलने वाले पत्नी के देह को जिसने अपनी पत्नी मान लिया, बदलने वाले पुरुष के देह को जिसने अपना पति मान लिया, बदलने वाले कुटुम्बियों को जिसने अपना मान लिया उसके लिए तुलसीदासजी कहते हैं-

संसृत मूल शब्द प्रद नाना।

सकल शोक दायक अभिमाना।।

सब लोकों को देने वाला अभिमान है। अभिमान होता है माया का कोई कार्य। माया का कोई गुण लेकर, माया का कोई रंग लेकर अपने में इस प्रकार का अभिमान होता है।

देह तो बनी है माया की मिट्टी से, अभिमान होता है कि 'मैं फलाना हूँ।' मन बना है माया के सूक्ष्म तत्त्वों से, हमें अभिमान होता है कि 'मैंने अच्छा काम किया.... मैंने बुरा काम किया.... मैंने पाप किया... मैंने पुण्य किया...' अरे भैया ! तू करने वाला कौन है ? उस अनन्त की हवाएँ लेकर तू अपने फेफड़े चला रहा है। उस परमात्मा की सत्ता से सूर्य की किरणें तुझे  जिला रही हैं। तेरा अपना क्या है ?

'मैंने यह किया... अब मैं यह करूँगा..... मैंने यह पाया.... अब मैं यह पाऊँगा...'

सच पूछो तो देने वाले परमात्मा की ऐसी अदभुत करुणा है, कृपा है कि देने वाला हम लोगों को दिखता नहीं और जो कुछ मिलता है उसे हम अपना मान लेते हैं। शरीर उसने दिया है। सब वैज्ञानिक मिलकर राई का एक दाना बना नहीं सकते। मिट्टी का एक नया कण बना नहीं सकते। जो कुछ बनाएँगे वह अनन्त परमात्मा की बनायी हुई चीजों का ही जोड़-मेल बिठाकर बनाएँगे और फिर उसमें 'मैं-मेरा' करके मालिक बन जाएँगे। फिर कहेंगे 'यह मेरा घर है।'

घर तेरा है तो क्या घर की ईंटें तूने बनायी ?

नहीं, कुम्हार ने बनायी।

कुम्हार ने कैसे बनायी ?

मिट्टी में से।

मिट्टी कुम्हार ने बनायी ? आग कुम्हार ने बनायी ? पानी कुम्हार ने बनाया ?

नहीं।

पानी कुम्हार का नहीं, आग कुम्हार का नहीं, मिट्टी कुम्हार की नहीं तो ईंटें कुम्हार की कैसे हो गई ? ईंटें कुम्हार की नहीं हैं तो वे ईंटें तुम्हारी नहीं हैं। जब ईंटें तुम्हारी नहीं हैं तो घर तुम्हारा कैसे होगा।.....लेकिन माया में उलझकर बोलते हैं कि मेरा घर....। व्यवहार के लिए मान लो, कह लोः मेरा घर.... तेरा घर....' भीतर सोचोः किसका घर ? क्या मेरा और क्या तेरा ?

'यह बेटा मेरा है क्योंकि मैंने उसको जन्म दिया।'

तूने उसे जन्म कैसे दिया ? तूने रोटी खायी, जल पिया... यह जल तूने बनाया है ? नहीं। अन्न तूने बनाया है ? नहीं। अन्न बनने में तो सूर्य का संयोग था, पाँच भूतों का संयोग था। पंचभूतों से अन्न बना, फल बने। शरीर ने अन्न-फल-जल ग्रहण किये। उन्हीं माता-पिता के शरीरों के रज-वीर्य से तेरा शरीर बना। तेरा शरीर भी तूने नहीं बनाया तो बेटे का शरीर तूने कैसे बनाया ?

माता-पिता के रज-वीर्य से तेरा शरीर बना। प्रकृति की चीजें खाकर तेरा शरीर बड़ा हुआ। इस शरीर से कोई जीव रज वीर्य के रूप में पसार हुआ और तू बोलता है 'यह मेरा बेटा है..... उसके लिए मैं कुछ कर जाऊँ। मेरी पत्नी है ..... मेरा पति है....।'

तुझे यह माया भ्रमित कर रही है। उनके लिए तू क्या कर सकेगा ? कम-से-कम तू अपने कल्याण के लिए तो कर ! मकान तेरा नहीं.... बेटा तेरा नहीं.... पत्नी तेरी नहीं.... मन तेरी नहीं... बुद्धि तेरी नहीं.... चित्त तेरा नहीं.... अहंकार तेरा नहीं... जिसकी सत्ता से यह सब लीला हो रही है वह परमात्मा तेरा है। तू उसकी ठीक से स्मृति बना ले तो तेरी ज्ञानमयी दृष्टि जिन पर पड़ जाएगी उनका भी कल्याण होने लगेगा। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं किः

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।

'जो पुरुष केवल मुझको ही निरन्तर भजते हैं वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं, संसार से पार हो जाते हैं।'

भगवान को कहते हैं-

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।।

'यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधु ही मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निश्चयवाला है। अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है।'

(भगवदगीताः 9.30)

सच पूछो ते सज्जनों से, धर्मात्माओं से दुराचारी आदमी भगवान को जल्दी पा सकता है, अगर वह सचमुच भगवान के शरण हो जाय तो। सज्जन के मन में, धर्मात्मा के मन में तो भ्राँति होती है कि मैं सज्जन हूँ, मैं धर्मात्मा हूँ। उसकी ऐसी धारणा बनी रहती है, मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार आदि प्रकृति या माया की चीजों का अभिमान बना रहता हैः 'हम तो धार्मिक हैं... हम तो सत्संगी हैं।' जो दुराचारी है, पापी है, पापकृत्तम है उसको तो 'मैं सज्जन हूँ... मैं पुण्यात्मा हूँ....' ऐसा अभिमान तो होता नहीं। मैं पापी हूँ...... मैं अधम हूँ....' ऐसा समझकर वह परमात्मा के शरण आता है तो वह पूरे का पूरा शरण आता है धर्मात्मा तो थोड़ा धर्म में रहता है, थोड़ा कर्म में रहता है, थोड़ा व्यवहार में रहता है इसलिए धर्मात्मा का कल्याण थोड़ा देरी से होता है। अधूरी शरण आये हुए धर्मात्मा की अपेक्षा पूरी शरण आया हुआ दुरात्मा जल्दी पार हो जाएगा।

इसका मतलब यह भी नहीं कि धर्मात्मा लोग अपना धर्मात्मापना छोड़कर दुरात्मा बन जाय। नहीं...। धर्मात्मा अपने धर्मात्मापना छोड़कर दुरात्मा बन जाय। नहीं....। धर्मात्मा अपने धर्मात्मापने का अभिमान छोड़ दे और भगवान के पूरे शरण आ जायें। दुरात्मा अपना दुरात्मापने का अभिमान छोड़कर भगवान के पूरे शरण आ जाय।

दुरात्मा व्यक्ति दुरात्मा है इसलिए वह हार जाता है और पूरा भगवान के शरण आ जाता है। धर्मात्मा व्यक्ति मानता है कि 'मैं धर्मात्मा हूँ.... भगवान का भक्त हूँ....।' वह भगवान का भक्त कहलाने के लिए आता है तो उसका कुछ न कुछ अपना अस्तित्व रखकर आता है इसलिए वह पूरा शरण नहीं हो पाता। वालिया लुटेरा पूरा प्रपन्न हो गया तो जल्दी से उसका कल्याण हो गया।

हम जितने पूरी ईमानदारी से भगवान के शरण जाते हैं उतना उतना कल्याण होता है।

उस भगवान ने गर्भ में भी तुम्हारी रक्षा की, तुम माता के उदर में थे तब रक्षा की। जब जन्म लिया तब माता की छाती में दूध भर दिया। माता वही रोटी, वही सब्जी, वही दाल खाती है तो बच्चे के जन्म के साथ उसी सामग्री से दूध बनने लगा। बच्चा बड़ा हुआ, अन्न खाने योग्य हुआ तो दूध बनना बन्द हो गया। परमात्मा की कैसी दिव्य व्यवस्था है ! फिर भी आदमी चिन्ता की गठरी लेकर घूमता है। 'मैंने यह किया... वह किया....।' भाई ! कार्य प्रकृति में होते हैं करने की सत्ता जहाँ से आती है उसे फलार्पण करते हुए निष्काम भाव से, निरहंकारी होकर, तत्परता से कार्य किये तो नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त कर लेगा।

हम जब भगवान के शरण नहीं होते तब हजार-हजार मुसीबतें उठानी पड़ती हैं। ईश्वर की शरण चुके कि दुःख, बोझा, कर्म, काम, क्रोध, लोभ, मोह, घृणा, चिन्ता, ग्लानि, राग-द्वेष.... आदि के नर्कों में पड़े। ईश्वर की स्मृति छूटी, ईश्वर का सहारा छूटा, उस अनन्त का सहारा छूटा तो बस झपटे गये दुःखों में। जैसे बिल्ली के हाथ चूहा आया ऐसे ही हम माया के हाथ आ जाते हैं, कल्पना के जाल में फँस जाते हैं। सुख के लिए सदियों से और जन्मों से मजदूरी आज तक करते आये लेकिन सुखी हुए नहीं। सुख की कहीं परछाई दिखती है तो भागते हैं लेने के लिए। जहाँ-जहाँ गये, सुख की परछाइयाँ दिखी, सुख न मिला।

अमृत का मतलब यह है कि उसमें विष पड़े तो विष भी अमृत हो जाय। सुख का मतलब यह है कि उसमें दुःख पड़े तो दुःख भी सुख हो गया। शीतलता की पहचान क्या ? उसमें अंगारा पड़े तो अंगारा भी शीतल हो जाय।

हमको आज तक सुख मिला ही नहीं। हमको सुख की परछाइयाँ मिली हैं। क्योंकि तीन गुणवाली माया में हम जीते हैं। त्रिगुणमयी माया से विमोहित हो गया है हमारा ज्ञान। श्रीकृष्ण कहते हैं-

न मां दुष्कृतिनो मूढ़ाः प्रपद्यन्ते नराधमाः

जो नरों में अधम है, जो दुष्कृत्य करते हैं, जिनकी बुद्धि मलिन है, जो विकारी हैं, विलासी हैं, जिनको अपने मनुष्य जन्म की कीमत नहीं है वे मेरी शरण नहीं आते।

तुम किसकी शरण जाते हो ? सुख की शरण जाते हो.... वाहवाही की शरण जाते हो कि परमात्मा की शरण जाते हो ? सच्चे परमात्मा की शरण जाते हो तो तुम्हें बाह्य सहारों की आवश्यकता नहीं है। बाह्य सहारे तो तुम्हारे चरणों में आ जायेंगे। अगर तुम्हारी प्रीति परमात्मा में नहीं है तो तुम न जाने किस किस को क्या-क्या मस्का लगाओगे ! किस किस के आगे कितने कितने दाँत निकालोगे !

जो भगवान के शरण जाते हैं, भगवान उनके हो जाते हैं। जो ईश्वर के हो जाते हैं, ईश्वर उनका हो जाता है। फिर उनके द्वारा भगवान जो भी संकल्प कर दे, कहला दे वह घटना तुरन्त ही प्रकृति में घटने लगती है। द्रौपदी के वस्त्राहरण का प्रसंग आपने कथा में सुना होगा। दुःशासन वस्त्र खींच रहा है तब द्रौपदी युधिष्ठिर की ओर निहार रही है, दूसरे पाण्डवों की ओर निहार रही है, बुजुर्गों की ओर निहार रही है। तब तक उसे दुःशासन का भय है। जब वह भगवान की शरण आ गई तो वह पूर्णतया सुरक्षित हो गई। भगवान का वहाँ वस्त्रावतार हो गया। दुःशासन साड़ियाँ खींचते थक गया। लेकिन द्रौपदी को निर्वस्त्र नहीं कर पाया। वे साड़ियाँ कौन-सी मील से आयी होंगी ?

जो परमात्मा के शरण हो जाता है परमात्मा उसके अंतिम समय में तथा भारी विपत्तियों के समय में उसकी रक्षा करता है। अगर हम ईमानदारी से परमात्मा के शरण हैं तो जितने सुनिश्चिन्त होते हैं, सुखी होते हैं, सुरक्षित होते हैं उतने कुटुम्बी, सगे-सम्बन्धी, मित्र, राजा, महाराजा, सम्राट आदि सब मिलकर भी हमें सुखी, सुनिश्चिन्त और सुरक्षित नहीं कर सकते... जितने परमात्मा की शरण से सुनिश्चिन्त और सुरक्षित होते हैं।

नेता, राजा-महाराजाओं को सहारा कई लोगों ने लिया लेकिन कुछ कल्याण नहीं हुआ। भगवान की शरण लेने पर शायद प्रारब्ध वेग से कोई कष्ट आ भी जाय तो भी भक्त समझता है कि, 'कष्ट देह को हो रहा है। तेरी मरजी पूरण हो....।'

जब चित्त में 'तेरी मरजी पूरण हो....' का भाव आ जाता है तो परमात्मा तुरन्त हमें अपना बना लेता है। वास्तव में तो हम है ही परमात्मा के और परमात्मा हमारा है लेकिन हम चित्त में रहकर ममता में, वासना में रहकर, इच्छाओं में रहकर जीना चाहते हैं। माया के गुणों में रहकर वासनाओं के अनुसार अपना जीवन गँवाते हैं। इसी से हम दीन-हीन हो गये हैं, वरना परमात्मा हमसे दूर नहीं। दुःखी होने का तो कोई कारण ही नहीं है।

परमात्मा जिसके साथ है, परमात्मा की सत्ता से दिल की धड़कने चल रही हैं, परमात्मा की सत्ता से हमारी आँखें देख रही हैं, परमात्मा की सत्ता से हमारे कान सुन रहे हैं इतने हम परमात्मा के निकट हैं फिर दुःखी क्यों हैं ?

तुम मानो चाहे न मानो लेकिन जिस सत्ता से श्रोता के कान सुन रहे हैं उसी सत्ता से वक्ता की जिह्वा चल रही है। जिस सत्ता से श्रोता की आँखें वक्ता को निहार रही हैं उसी सत्ता से वक्ता की आँखें श्रोताओं की ओर निहार रही हैं। दोनों तरफ की आँखों में सत्ता एक ही परमात्मा की है। इस प्रकार की स्मृति अगर बनी रहे तो आहा... ! उसके लिए माया तरना कोई कठिन काम नहीं है। उसके लिए माया है ही नहीं। है तो अति छोटी है, अति तुच्छ है।

जो लोग माया की चीजों को, माया के शरीरों को, माया के सम्बन्धों को सच्चा मानकर सुखी होना चाहते हैं और माया से तरना चाहते हैं उनके लिए तो माया बड़ी दुस्तर है।

जन्म जन्म मुनि जतन कराहीं।

अंतराम कछु आवत नाहीं।।

जिसके हृदय में परमात्मा के लिए प्रीति है उसको अगर संसार का सुख दिया भी जाय, उसकी वाहवाही की जाय, उसको यश दिया जाय, उसको सुख-सुविधाएँ मिल जाय फिर भी वह इन चीजों में फँसता नहीं और इन चीजों को पाकर अपने को भाग्यवान नहीं मानता। इस तुच्छ यश, मान, भोग, विलास का कोई महत्त्व ही नहीं होता उसके चित्त में।

हम लोग तो परिश्रम करके संसार का सुख, ऐशो-आराम, वाहवाही, शरीर की सुविधाएँ पाकर अपने को भाग्यवान मानते हैं। जिनको परमात्मा की स्मृति मिल गई है, जिनको परमात्मा घर-गृहस्थी में दिखते हो, उनको संसार की सब सुविधाएँ मिलती हों, यश होता हो तभी भी वे चित्त से उपराम रहते हैं। वे समझते हैं, और भगवान से कहते हैं किः 'हे प्रभु ! हमने क्या पाप किया है कि तेरी स्मृति हटाने वाले पदार्थ हमें दे रहा है हम पर क्यों नाराज है ?'

शंकराचार्य ने ठीक ही कहा हैः

सो संगति जल जाय जिसमें कथा नहीं राम की।

बिन खेती की बाड़ किस काम की ?

वे नूर बेनूर भले जिसमें पिया की प्यास नहीं।।

''वे आँखें हमारी फूट जाएँ जिन आँखों में ईश्वर के लिए आँसू न बहें। वह दिल हमारा धड़कने से रुक जाय जिस दिल में दिलबर को याद न हो। हमारे उस व्यवहार आग लगे जो तेरे आनन्द से हमको दूर कर दे।'

उनके उपराम चित्त में ऐसा हुआ करता है। 'हमारी सुविधाओं और वाहवाही को हे भगवान ! तू अभी-अभी छीन ले लेकिन तू अपनी प्रीति हमसे मत छीन। दुनिया की चीज तू छीन ले, तेरी बड़ी कृपा होगी लेकिन तू अपनी रहेमत मत छीनना, अपना करुणा मत छीनना, अपना अलौकिक स्वभाव हमसे मत छीनना।'

तकदीर न कैसां डोह करे।

शल केर प्रभुखां थे न परे।।

हे मुकद्दर ! तू किसी से धोखा मत करना। तू छीनना चाहता है तो हमसे रूपये छीन लेना, क्योंकि आखिर मौत छीन ही लेगी। मौत मारकर छीन लेती है, तू जीते जी छीन ले, क्या फर्क पड़ता है। तू जीते जी हम से रूपये छीन लेगा तो हमें वैराग्य आ जायगा। तू कपड़े छीन लेना चाहता है तो छीन लेना हमसे भगवान की भक्ति मत छीनना, प्रभु का प्यार मत छीनना।

हे तकदीर ! तू हमसे धोखा करना चाहती है तो कोई संसार की चीज छीनकर धोखा कर लेकिन भगवान की भक्ति मत छीनना।

जिसके पास भगवान की भक्ति रहती है उसके पास तो संसार की चीजें दासानुदास बनकर रहती हैं।

जिसको परमात्मा के स्मरण का मूल्य पता है, जिसने परमात्मा के मार्ग में कदम रखा है उनके लिए संसार की सुविधाएँ, संसार का सुख त्यागना कोई बड़ी बात नहीं है। जो अभागे परमात्मा को त्यागकर बैठे हैं उनको तो संसार का सुख भी नहीं मिलता, थप्पड़ें ही मिलती हैं।

सौ सौ जूते खाएंगे।

तमाशा घूसे के देखेंगे।।

सौ-सौ अपमान होंगे, सौ-सौ ताने सुनने पड़ेंगे, सौ-सौ फटकार बरसेंगे लेकिन काम वही करेंगे जो काम हमें जन्म-मरण के चक्कर में घसीटता रहे। इच्छाएँ वही करेंगे, संकल्प वही करेंगे जिसके कारण हम नराधम हो जायँ।

जो दुष्कृत करने वाले हैं वे नरों में अधम हैं। पशु लोग तो अपने कर्मों का फल भोग कर ऊँची गति को पाते हैं, फिर मनुष्य बनते हैं और ये मनुष्य अभागे, विकारी जीवन जीकर, पापकर्म करके, भगवान से विमुख होकर, मायाजाल में पड़कर पशु योनि में जाने की तैयारी करते हैं। वे तो पशुओं से भी बदतर हैं। पशु तो दुःख भोगकर, कर्म भोगकर अपने पाप काटते हैं और मनुष्य योनि में आने की यात्रा कर रहे हैं। जबकि मनुष्य भगवान को भूलकर संसार के सुख लेने के पीछे, विकार तृप्त करने के लिए, देह का अहं पुष्ट करने के लिए प्रयत्न करते हैं। वे पापाचारी नराधम कहे जाते हैं।

जो 'दुष्कृतिनः' हैं उनको भगवान मे रूचि नहीं होती। जो पापी हैं उनको भगवान में प्रीति नहीं होती। अगर उनको भगवान में प्रीति हो जाए तो पापी पापी नहीं रहता। भगवान की शरण आ जाय तो अभागा अभागा नहीं रहता।

सिनेमाघर में जाने के लिए टिकट चाहिए, पैसे चाहिए। परदेश जाने के लिए पासपोर्ट चाहिए, विद्या चाहिए, पैसे चाहिए। स्वर्ग में जाने के लिए पुण्य चाहिए। शादी करने के लिए भी दुल्हन चाहिए। नौकरी के लिए भी प्रमाणपत्र चाहिए। नौकरी में बढ़ती के लिए भी योग्यता चाहिए, जान-पहचान चाहिए। ये सब होने पर भी इनसे जो चीजें मिलती हैं उनसे व्यक्ति को शाश्वत सुख, शाश्वत शांति नहीं मिलती। परमात्मा के पास जाने के लिए तुम्हारे पास चाहे कुछ भी न हो, केवल परमात्मा के लिए भाव हो जाय तो परमात्मा तुम्हें सत्संग में पहुँचा ही देता है। वह यों नहीं पूछता कि तुम पुण्य मापने का पासपोर्ट लेकर आये हो कि नहीं..... तुम चपरासी हो या अलमदार हो..... धनवान हो कि गरीब हो... तुम अनपढ़ हो कि विद्वान हो... तुम बड़े घर के हो कि छोटे घर के हो....?

सत्संग में यह कुछ नहीं देखा जाता। सत्संग परमात्म-प्राप्ति सुलभ करा देता है।

ॐ....ॐ....ॐ.....ॐ......ॐ.....ॐ.......ॐ.....।

साधक को सार असार का, सत्य असत्य का, शाश्वत नश्वर का विवेक होना चाहिए। शाश्वत क्या है नश्वर क्या है ? सार क्या है असार क्या है ? सदा क्या रहेगा और छूट क्या जाएगा ? इस प्रकार का जब तक विवेक नहीं होगा तब तक श्रीकृष्ण जैसे, ब्रह्माजी जैसे गुरु भी मिल जाएँ, ज्ञानेश्वर जैसे, तुकारामजी जैसे संत भी मिल जाएँ तब भी लोग जीवन को धन्य नहीं कर पाते। क्योंकि वे अपना विवेक नहीं जगाते।

प्रथम भगति संतन कर संगा।

दूसर रति मम कथा प्रसंगा।।

संतों का संग करे और भगवान की कथा सुने, आत्मज्ञान का सत्संग सुने। सत्संग से विवेक जगता है।

बिनु सत्संग विवेक न होई।

रामकृपा बिनु सुलभ न सोई।।

भगवान की कृपा होती है तब सत्संग मिलता है।

दो प्रकार के लोग होते हैं- एक होते हैं क्रिया प्रधान और दूसरे होते हैं भाव प्रधान लोग। क्रिया प्रधान लोगों के लिए तो बाह्य क्रियायुक्त सेवा, पूजा, आराधना है। भावनावालों के पास बाहर की सामग्री न होते हुए भी वे भावना मात्र से बहुत ऊँचाई तक पहुँच जाते हैं। भावना से प्रीति बढ़ती है और प्रीति से अनन्यता आती है। अनन्यता से आदमी अनन्य तत्त्व में स्थिर हो जाता है।

भगवान के लिए अगर भाव नहीं है तो संसार के लिए भाव बहेगा। प्रभु के लिए प्रीति नहीं है तो संसार के साधनों के लिए प्रीति होगी। प्रीति तो तुम्हारी परमात्मा के लिए हो और उपयोग संसार का हो।

संसार के पदार्थों का केवल उपयोग किया जाय। उनमें प्रेम करने जैसी कोई चीज नहीं है। शरीर का भी उपयोग न करो, मन का भी उपयोग करो, परिस्थितियों का भी उपयोग करो।

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