
योग
सिद्ध
ब्रह्मलीन
ब्रह्मनिष्ठ
प्रातः
स्मरणीय
पूज्यपाद
स्वामी
श्री
लीलाशाहजी
महाराज का
जीवन
सौरभ
योगसिद्ध ब्रह्मलीन ब्रह्मनिष्ठ
प्रातः
स्मरणीय
पूज्यपाद
स्वामी श्री
लीलाशाहजी
महाराज
संन्यास
एवं गुरुदेव
के सान्निध्य
में
संत श्री
लीलारामजी
में से
पूज्यपाद
स्वामी श्री
लीलाशाह जी
महाराज
तुम से
भिन्न दूसरी
कोई वस्तु ही
नहीं है
अभ्यास
में रूचि
क्यों नहीं
होती?
भगवान किस
पर ज्यादा
प्रसन्न रहते
हैं ?
आध्यात्मिक
मार्ग पर कैसे
चलूँ ?
दृष्टि
मात्र से
निहाल कर दिया
!
गुरुदेव
की डाँट भी
कितनी
कल्याणकारी !
जहाँ भी
रहे.... अपनी
महिमा में
मस्त !
तुम स्वयं
अपने भाग्य के
आप विधाता हो
नम्रता और
महानता का
अदभुत समन्वय
लौकिकता
में थी अलौकिक
की खबरें
भगवान की
चोरी या भगवान
की प्राप्ति?
संत-फकीर
बेपरवाह
बादशाह होते
हैं
संसार ताप से तप्त जीवों में शांति का संचार करने वाले, अनादिकाल से अज्ञान के गहन अन्धकार में भटकते हुए जीवों को ज्ञान का प्रकाश देकर सही दिशा बताने वाले, परमात्म-प्राप्तिरूपी मंजिल को तय करने के लिए समय-समय पर योग्य मार्गदर्शन देते हुए परम लक्ष्य तक ले जाने वाले सर्वहितचिंतक, ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों की महिमा अवर्णनीय है।
वे महापुरुष केवल दिशा ही नहीं बताते वरन् चलने के लिए पगडंडी भी बना देते हैं, चलना भी सिखाते हैं, उंगली भी पकड़ाते हैं और हम उनकी उंगली अगर छोड़ भी दें तो करुणा-कृपा की वृष्टि करते हुए वे हमें ऊपर भी उठा लेते हैं। जैसे माता-पिता अपने बालक को कन्धे पर उठाकर यात्रा पूरी करवाते हैं वैसे ही वे कृपालु महापुरुष हमारी आध्यात्मिक यात्रा को पूर्ण कर देते हैं। माता-पिता की तरह कदम-कदम पर हमारी संभाल रखने वाले, सर्वहितचिंतक, समता के सिंहासन पर बैठाने वाले ऐसे विरल संतों को लाख-लाख वंदन....
ऐसे महापुरुषों की कृपा से जीव रजो-तमोगुण के प्रभाव से छूटकर ऊर्ध्वगामी होता है, जिज्ञासुओं की ज्ञान-पिपासा तृप्त होने लगती है, जपियों का जप सिद्ध होने लगता है, तपियों का तप फलने लगता है, योगियों का योग सफल होने लगता है। ऐसे महापुरुषों के प्रभाव से समग्र वातावरण में पवित्रता, उत्साह, सात्त्विकता एवं आनंद की लहर छा जाती है। इतना ही नहीं, वरन् उनकी संतरूपी शीतल गंगा में अवगाहन करके जीव के त्रितापों का शमन हो जाता है एवं वह जन्म-मरण की शृंखला से छूट जाता है।
अपने स्वरूप में जगे हुए ऐसे महापुरुषों की करुणामयी शीतल छाया में संसार के दुःखों से ग्रस्त जीवों को परम शांति मिलती है। उनके प्रेम से परिपूर्ण नेत्रों से अविरत अमीमय वृष्टि होती रहती है। उनकी अमृतमयी वाणी जीवों के हृदय में आनंद एवं माधुर्य का संचार करती है। उनके पावन करकमल सदैव शुभ संकल्पों के आशीर्वाद देते हुए अनेकों पतितों को पावन कर देते हैं। उनकी चरणरज से भूमि तीर्थत्व को प्राप्त कर लेती है। उनकी कृपादृष्टि में आने वाले जड़ पदार्थ भी जब कालांतर में जीवत्व को मिटाकर ब्रह्मत्व को प्राप्त कर लेते हैं तो मनुष्य की तो बात ही क्या? किंतु ऐसे महापुरुष हजारों में तो कहाँ, लाखों-करोड़ों में भी विरले ही होते हैं।
भगवान श्री कृष्ण ने भगवदगीता में कहा भी हैः
बहूनां
जन्मनामन्ते
ज्ञानवान्मां
प्रपद्यते।
वासुदेवः
सर्वमिति स
महात्मा
सुदुर्लभः।।
'बहुत जन्मों के बाद तत्त्वज्ञान को प्राप्त हुआ ज्ञानी पुरुष 'सब कुछ वासुदेव ही है' – इस प्रकार मुझको भजता है। वह महात्मा अति दुर्लभ है।'
(गीताः
7.19)
ऐसे ब्रह्माकार वृत्ति में स्थित हुए महात्माओं के दर्शन की महिमा का वर्णन करते हुए संत कबीर ने कहा हैः
अलख
पुरुष की आरसी
साधु का ही
देह।
लखा
जो चाहे अलख
को इन्हीं में
तू लख ले।।
'परमात्मा के साथ एकरूप हो गये ब्रह्म-साक्षात्कारी महापुरुष की देह एक दर्पण के समान है, जिसमें आप अलख पुरुष (परमात्मा) के दर्शन कर सकते हो।'
गुरु नानक जी ने भी संतो की महिमा का वर्णन करते हुए कहा हैः
संत
की महिमा वेद
न जाने।
जेता
जाने तेता
बखाने।।
संसार का सच्चा कल्याण संतों के द्वारा ही हो सकता है। ऐसे महापुरुषों का पूरा जीवन ही 'बहुजनहिता बहुजनसुखाय' होता है। संसार के जीवों को पाप में से पुण्य की तरफ, असत् में से सत् की तरफ, अन्धकार में से प्रकाश की तरफ एवं नश्वर में से शाश्वत की तरफ ले जाने वाले संतों के दिव्य कार्य एवं उपदेशों का अनुसरण करने से साधक के जीवन में संयम, सदाचार, साहस, शक्ति, उत्साह, प्रसन्नता जैसे अनेक दैवी गुणों का विकास होता है।
जब-जब समाज में से संयम, सदाचार, सत्य, नीति आदि लुप्त होने लगते हैं एवं मनुष्य अपने अमूल्य जीवन को विषय-विकारों में ही गँवाने लगता है तब-तब इस धरा पर संतों का अवतरण होता है। वैसे तो अलग-अलग समय में अन्य देशों में भी सूफी फकीरों, पैगंबरों या प्रभु के प्यारे भक्तों ने अपनी करुणा कृपा से मानवकल्याण के लिए निःस्वार्थ कर्म किये हैं, फिर भी यह भारत भूमि इस विषय में विषय भाग्यशाली रही है। जब स्वामी विवेकानन्द ने अपनी पहली अमेरिका की यात्रा के बाद सन् 1896 में स्वदेशगमन किया तब एक पत्रकार ने उन्हें एक खूब ही सीधा एवं सरल प्रश्न पूछाः
"स्वामी जी ! आप पाश्चात्य जगत की प्रगति, विकास एवं विज्ञान सभी देखकर आये हैं तो अब भारत के लिए आपकी धारणा कैसी बनी है?"
पत्रकार को ऐसा ख्याल था कि स्वामी जी भारत के विषय में कुछ घटिया बोलेंगे। किन्तु स्वामी विवेकानंद ने खूब दृढ़तापूर्वक जवाब दियाः
"साढ़े तीन वर्ष पूर्व जब मैंने विदेश प्रस्थान किया था तब मैं भारत को मात्र अपना देश, अपनी मातृभूमि समझता था और अब, जब मैं अमेरिका जाकर वहाँ के समाज एवं जीवन-पद्धति को देखकर आया हूँ तो अब भारत मेरे लिए केवल मेरा देश या मेरी मातृभूमि ही नहीं बल्कि एक दिव्य भूमि, देवभूमि, पवित्र भूमि, पूजनीय भूमि बन गयी है। यह धरा प्राचीन युग से ही संत-परंपरा से सुशोभित है।"
ऐसी ही पावन भूमि एवं ज्ञानी महापुरुषों की महिमा का वर्णन करते हुए 'नारदभक्तिसूत्र' में लिखा हैः
तीर्थीकुर्वन्ति
तीर्थानि, सुकर्मीकुर्वन्ति
कर्माणि
सच्छास्त्रीकुर्वन्ति
शास्त्राणि।।69।।
'(ज्ञानी) तीर्थों को तीर्थत्व प्रदान करते हैं, कर्मों को पावित्र्य प्रदान करते हैं, शास्त्रों को शास्त्रत्व प्रदान करते हैं।' ज्ञानी जहाँ रहते हैं वह देश भी पुण्यतीर्थ बन जाता है। उनका उपदेश शास्त्र बन जाता है एवं उनके कर्म सत्कर्म बन जाते हैं।
ऐसे ही महापुरुषों के प्रेरणात्मक जीवनचरित्र की महिमा का बयान करते हुए महात्मा दादू के शिष्य संत सुंदरदास ने कहा हैः
"भगवान
के दर्शन करने
पर भी संदेह
पूर्ण रूप से
नष्ट नहीं
होता, किन्तु
भगवान की कथा
सुनने से
भगवान में
श्रद्धा
बढ़ती है और
उसकी अपेक्षा
भी भगवद्
प्राप्त
महात्माओं का
जीवनचरित्र
एवं सत्संग
पढ़ने तथा
सुनने से
भक्ति का
प्रागट्य
शीघ्र हो जाता
है।"
नारेश्वरवाले श्री रंगअवधूतजी महाराज ने भी अपने जीवन पर पड़े हुए, संतों के जीवनचरित्र के प्रभाव का वर्णन करते हुए कहा हैः
"मुझे
संतों का
जीवनचरित्र
पढ़ना अभी भी
बहुत अच्छा
लगता है। संत
अर्थात्
जिनके
जन्म-मरण के
चक्र का अंत
हो गया हो, जिनके
सत्संग के
ज्ञान से
हमारे
जन्म-मरण का अंत
हो जाता है...
कर्त्तापने
के भाव का अंत
आ जाता हो- ऐसा
ज्ञान
देनेवाले को
संत कहते हैं।
संतों के
जीवनचरित्रों
ने ही मुझे
भगवद्
प्राप्ति की
प्रेरणा दी
थी।"
ऐसी जीवन्मुक्त महाविभूतियों के लिए श्री अर्जुनदेव ने गाया हैः
आपि
मुकतु मुकतु
करै संसारु।
नानक
तिसु जन कउ
सदा
नमसकारू।।
केवल प्राचीन समय में ही संत-महापुरुषों का अवतरण हुआ हो ऐसी बात नहीं है। अर्वाचीन समय में भी आध्यात्मिक ऊँचाईवाले अनेक संत, ऋषि, महर्षि हो गये हैं। उन्हीं में से एक थे विश्ववंदनीय प्रातः स्मरणीय श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज। उन्होंने सत्-चित्-आनंद की पराकाष्ठास्वरूप परमानंद को पाया था एवं अनेक साधकों को इसी दिशा की ओर मोड़ा था। उनका जीवन पृथ्वी के समस्त जीवों के लिए दिव्य प्रेरणास्रोत था। उनकी प्रत्येक चेष्टा समष्टि के हित के लिए ही थी। उनके दर्शनमात्र से प्रसन्नता उत्पन्न हो जाती थी, निराशा के बादल छँट जाते थे, हताश हुए लोगों में उत्साह का संचार हो जाता था एवं उलझे हुओं की उलझनें दूर होकर उनमें नयी चेतना छा जाती थी। उनका सम्पूर्ण जीवन ही मानो निष्काम कर्मयोग का मूर्तिमंत स्वरूप था।
लोगों के जीवन में से लुप्त होते धार्मिक संस्कारों को पुनः जगाने के लिए, संस्कृति के पुनरुत्थान के लिए एवं सोयी हुई आध्यात्मिकता में पुनः प्राण फूँकने के लिए वे आजीवन कार्यरत रहे। उनकी प्रार्थना ही विश्वकल्याण की भावना की द्योतक हैः
'हे भगवान ! सबको सदबुद्धि दो.... शक्ति दो.... आरोग्यता दो... हम सब अपना-अपना कर्त्तव्य पालें एवं सुखी रहें....'
लाखों-लाखों माँ सरस्वती जी भी एकत्रित होकर जिनकी महिमा का वर्णन नहीं कर सकतीं ऐसे ब्रह्मनिष्ठ, आत्म-साक्षात्कारी महापुरुष, वेदान्त के मूर्तिरूप श्री लीलाशाहजी महाराज के संदर्भ में कुछ भी लिखना मात्र बालचेष्टा ही है। उनकी दिव्य लीला वर्णनातीत है, शब्दातीत है। उनके अलौकिक व्यक्तित्व को शब्दसीमा में बाँधना असंभव है। वामन भला विराट को कैसे नाप सकता है? गागर में पूरा सागर कैसे समा सकता है?
विशाल महासागर में से मात्र एक बूँद की झलक दिखाने के सिवा और क्या हो सकता है? उनका चरित्र इतना विशाल, गहन एवं उदार है कि उनके विषय में कुछ भी कहना या लिखना उनकी विशालता को मर्यादित कर देने जैसा लगता है।
फिर भी.... अंतर में केवल श्रद्धा रखकर ही गुह्य ब्रह्मविद्या के मूर्तिमंत स्वरूप पूज्य श्री लीलाशाहजी महाराज के जीवन के प्रेरक प्रसंगों एवं जिज्ञासुओं के जीवन में ज्ञान का प्रकाश फैलाने वाली सत्संग-कणिकाओं को यहाँ यथाशक्ति प्रस्तुत करने का एक विनम्र प्रयास किया जा रहा है।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
योगसिद्ध
ब्रह्मलीन
ब्रह्मनिष्ठ
प्रातः स्मरणीय
पूज्यपाद
एक
दिव्य विभूति
हमारी वैदिक हिन्दू संस्कृति का विकास सिंधु नदी के तट से ही प्रारंभ हुआ है। अनेकों ऋषि-मुनियों ने उसके तट पर तपस्यारत होकर आध्यात्मिकता के शिखरों को सर किया है एवं पूरे विश्व क अपने ज्ञान-प्रकाश से प्रकाशित किया है।
उसी पुण्यसलिला सिंधु नदी के तट पर स्थित सिंध प्रदेश के हैदराबाद जिले के महराब चांडाई नामक गाँव में ब्रह्मक्षत्रिय कुल में परहित चिंतक, धर्मप्रिय एवं पुण्यात्मा टोपणदास गंगाराम का जन्म हुआ था। वे गाँव के सरपंच थे। सरपंच होने के बावजूद उनमें जरा-सा भी अभिमान नहीं था। वे स्वभाव से खूब सरल एवं धार्मिक थे। गाँव के सरपंच होने के नाते वे गाँव के लोगों के हित का हमेशा ध्यान रखते थे। भूल से भी लाँच-रिश्वत का एवं हराम का पैसा गर में न आ जाये इस बात का वे खूब ख्याल रखते थे एवं भूल से भी अपने सरपंच पद का दुरुपयोग नहीं करते थे। गाँव के लोगों के कल्याण के लिए ही वे अपनी समय-शक्ति का उपयोग करते थे। अपनी सत्यनिष्ठा एवं दयालुता तथा प्रेमपूर्ण स्वभाव से उन्होंने लोगों के दिल जीत लिए थे। साधु-संतों के लिए तो पहले से ही उनके हृदय में सम्मान था। इन्हीं सब बातों के >फलस्वरूप आगे चलकर उनके घर में दिव्यात्मा का अवतरण हुआ।
वैसे तो उनका कुटुंब सभी प्रकार से सुखी था, दो पुत्रियाँ भी थीं, किन्तु एक पुत्र की कमी उन्हें सदैव खटकती रहती थी। उनके भाई के यहाँ भी एक भी पुत्र-समान नहीं थी।
एक बार पुत्रेच्छा से प्रेरित होकर टोपणदास अपने कुलगुरु श्री रतन भगत के दर्शन के लिए पास के गाँव तलहार में गये। उन्होंने खूब विनम्रतापूर्वक हाथ जोड़कर एवं मस्तक नवाकर कुलगुरु को अपनी पुत्रेच्छा बतायी। साधु-संतों के पास सच्चे दिल से प्रार्थना करने वाले को उनके अंतर के आशीर्वाद मिल ही जाते हैं। कुलगुरु ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हुए कहाः
"तुम्हें 12 महीने के भीतर पुत्र होगा जो केवल तुम्हारे कुल का ही नहीं परंतु पूरे ब्रह्मक्षत्रिय समाज का नाम रोशन करेगा। जब बालक समझने योग्य हो जाये तब मुझे सौंप देना।"
संत के आशीरवाद फले। रंग-बिरंगे फूलों का सौरभ बिखेरती हुई वसंत ऋतु का आगमन हुआ। सिंधी पंचाग के अनुसार संवत् 1937 के 23 फाल्गुन के शुभ दिवस पर टोपणदास के घर उनकी धर्मपत्नी हेमीबाई के कोख से एक सुपुत्र का जन्म हुआ।
कुल
पवित्रं जननी
कृतार्था
वसुन्धरा
पुण्यवती च
येन।
'जिस कुल में महापुरुष अवतरित होते हैं वह कुल पवित्र हो जाता है। जिस माता के गर्भ से उनका जन्म होता है वह माता कृतार्थ हो जाती है एवं जिस जगह पर वे जन्म लेते हैं वह वसुन्धरा भी पुण्यशालिनी हो जाती है।'
पूरेकुटुंब एवं गाँव में आनन्द की लहर छा गयी। जन्मकुंडली के अनुसार बालक का नाम लीलाराम रखा गया। आगे जाकर यही बालक लीलाराम प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज के नाम से सुप्रसिद्ध हुए। स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज ने केवल सिंध देश के ही गाँवों में ज्ञान की ज्योति जगाई हो – ऐसी बात नहीं थी, वरन् पूरे भारत में एवं विदेशों में भी सत्शास्त्रों एवं ऋषि-मुनियों द्वारा दिये गये आत्मा की अमरता के दिव्य संदेश को पहुँचाया था। उन्होंने पूरे विश्व को अपना मानकर उसकी सेवा में ही अपना पूरा जीवन लगा दिया था। वे सच्चे देशभक्त एवं सच्चे कर्मयोगी तो थे ही, महान् ज्ञानी भी थे। भगवान सदैव अपने प्यारे भक्तों को अपनी ओर भोजन के लिए विघ्न-बाधाएँ देकर संसार की असारता का भान करवा देते हैं। यही बात श्री लीलारामजी के साथ भी हुई। पाँच वर्ष की अबोध अवस्था में ही सिर पर से माता का साया चला गया तब चाचा एवं चाची समझबाई ने प्रेमपूर्वक उनके लालन-पालन की सारी जवाबदारी अपने ऊपर ले ली। पाँच वर्ष की उम्र में ही उनके पिता टोपणदास कुलगुरु को दिये गये वचन को पूर्ण करने के लिए उन्हें तलहार में कुलगुरु श्री रतन भगत के पास ले गये एवं प्रार्थना की।
"आपके आशीर्वाद से मिले हुए पुत्र को, आपके दिये गये वचन के अनुसार आपके पास लाया हूँ। अब कृपा करके दक्षिणा लेकर बालक मुझे लौटा दें।"
संत का स्वभाव तो दयालु ही होता है। संत रतन भगत भी टोपणदास का दिल नहीं दुखाना चाहते थे। उन्होंने कहाः
"बालक को आज खुशी से भले ही ले जाओ लेकिन वह तुम्हारे घर में हमेशा नहीं रहेगा। योग्य समय आने पर हमारे पास वापस आ ही जायेगा।"
इस प्रकार आशीर्वाद देकर संत ने बालक को पुनः उसके पिता को सौंप दिया। श्री टोपणदास कुलगुरु को प्रणाम करके खुश होते हुए बालक के साथ घर लौटे।
श्री लीलारामजी का बाल्यकाल सिंधु नदी के तट पर ही खिला था। वे मित्रों के साथ कई बार सिंधु नदी में नहाने जाते। नन्हीं उम्र से ही उन्होंने अपनी निडरता एवं दृढ़ मनोबल का परिचय देना शुरु कर दिया था. जब वे नदी में नहाने जाते तब अपने साथ पके हुए आम ले जाते एवं स्नान के बाद सभी मिलकर आम खाने के लिए बैठ जाते।
उस समय श्री लीलारामजी की अदभुत प्रतिभा के दर्शन होते थे। बच्चे एक-दूसरे के साथ शर्त लगाते कि 'पानी में लंबे समय तक डुबकी कौन मार सकता है?' साथ में आये हुए सभी बच्चे हारकर पानी से बाहर निकल आते किन्तु श्री लीलारामजी पानी में ही रहकर अपने मजबूत फेफड़ों एवं हिम्मत का प्रमाण देते।
श्री
लीलारामजी जब
काफी देर तक
पानी से बाहर
न आते तब उनके
साथी घबरा
जाते लेकिन
श्री लीलारामजी
तो एकाग्रता
एवं मस्ती के
साथ पानी में
डुबकी लगाये
हुए बैठे रहते।
श्री लीलारामजी जब पानी से बाहर आते तब उनके साथी पूछतेः "लीलाराम ! तुम्हें क्या हुआ?"
श्री लीलारामजी सहजता से उत्तर देते हुए कहतेः
"मुझे कुछ भी नहीं हुआ। तुम लोगों को घर जाना हो तो जाओ। मैं तो यही बैठता हूँ।"
श्री लीलारामजी पद्मासन लगाकर स्थिर हो जाते। बाल्यकाल से श्री लीलारामजी ने चंचल मन को वश में रखने की कला को हस्तगत कर लिया था। उनके लिए एकाग्रता का अभ्यास सरल था एवं इन्द्रिय-संयम स्वाभाविक। निर्भयता एवं अंतर्मुखता के दैवी गुण उनमें बचपन से ही दृष्टिगोचर होते थे।
जब श्री लीलारामजी दस वर्ष के हुए तब उनके पिता का देहावसान हो गया। अब तो चाचा-चाची ही माता-पिता की तरह उनका ख्याल रखने लगे। टोपणदास के देहत्याग के बाद गाँव के पंचों ने इस नन्हीं सी उम्र में ही श्री लीलारामजी को सरपंच की पदवी देनी चाही किंतु श्री लीलारामजी को भला इन नश्वर पदों का आकर्षण कहाँ से होता? उन्हें तो पूर्वजन्म के संस्कारों के कारण संतसमागम एवं प्रभुनाम-स्मरण में ही ज्यादा रूचि थी।
उस समय सिंध के सब गाँवों में पढ़ने के लिए पाठशालाओं की व्यवस्था न थी एवं लोगों में भी पढ़ने-बढ़ने की जिज्ञासा नहीं थी। अतः श्री लीलारामजी भी पाठशाला की शिक्षा के लाभ से वंचित रह गये।
जब वे 12 वर्ष के हुए तब उन्हें उनकी बुआ के पुत्र लखुमल की दुकान पर काम करने के लिए जाना पड़ा ताकि वे जगत के व्यवहार एवं दुनियादारी को समझ सकें। किन्तु इस नश्वर जगत के व्यवहार में श्री लीलारामजी का मन जरा भी नहीं लगता था। उन्हें तो संतसेवा एवं गरीबों की मदद में ही मजा आता था। बहुजनहिताय..... की कुछ घटनाओं के चमत्कार ने नानकजी की तरह श्री लीलारामजी के जीवन में भी एक क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया।
सिक्ख धर्म के आदि गुरु नानकदेव के जीवन में भी एक बार ऐसी ही चमत्कारिक घटना घटी थी।
नानकजी जब छोटे थे तब उनके पिता ने उन्हें सुलतानपुर के नवाब दौलतखान की अनाज की दुकान पर अपने बहनोई के साथ काम करने के लिए कहा।
संसारी लोग तो भजन के समय भी भजन नहीं कर पाते। भजन के समय भी उनका मन संसार में ही भटकता है। किन्तु नानकजी जैसे भगवान के प्यारे तो व्यवहार को भी भक्ति बना देते हैं।
नानक जी दुकान में काम करते वक्त कई बार गरीब ग्राहकों को मुफ्त में वस्तुएँ दे देते। यह बात नवाब के कानों तक जाने लगी। गाँव के लोग जाकर नवाब के कान भरतेः "इस प्रकार दुकान कब तक चलेगी? यह लड़का तो आपकी दुकान बरबाद कर देगा।"
एक बार एक ऐसी घटना भी घटी जिससे नवाब को लोगों की बात की सच्चाई को जानना आवश्यक लगने लगा।
उस दिन नानकजी दुकान पर अनाज तौल-तौलकर एक ग्राहक के थैले में डाल रहे थे। '1... 2....3....4....' इस प्रकार संख्या की गिनती करते जब संख्या 13 पर पहुँची तो फिर आगे 14 तक न बढ़ सकी क्योंकि नानकजी के मुख से 'तेरा' (तेरह) शब्द निकलते ही वे सब भूल गये कि 'मैं किसी दुकान पर अनाज तौलने का काम कर रहा हूँ।' 'तेरा... तेरा....' करते-करते वे तो परमात्मा की ही याद में तल्लीन हो गये कि 'हे प्रभु ! मैं तेरा हूँ और यह सब भी तेरा ही है।'
फिर तो 'तेरा-तेरा...' की धुन में नानकजी ने कई बार अनाज तौलकर ग्राहक को दे दिया।
लोगों की नज़र में तो नानकजी यंत्रवत् अनाज तौल रहे थे, किन्तु नानकजी उस समय अपने प्रभु की याद में खो गये थे। इस बात की शिकायत भी नवाब तक पहुँची। फिर नवाब ने दुकान पर सामान एवं पैसों की जाँच करवायी तो घाटे की जगह पर कुछ पैसे ज्यादा ही मिले ! यह चमत्कार देखकर नवाब ने भी नानकजी से माफी माँगी।
जो भक्त अपनी चिंता को भूलकर भगवान के ध्यान में लग जाता है उसकी चिंता परमात्मा स्वयं करते हैं। श्रीमद भगवद् गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने भी कहा हैः
अनन्याश्चिन्तयन्तो
मां ये जनाः
पर्युपासते।
तेषां
नित्याभियुक्तानां
योगक्षेमं
वहाम्यहम्।।
'जो अनन्य भाव से मेरे में स्थित हुए भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य एकीभाव से मेरे में स्थितिवाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं वहन करता हूँ।'
(गीताः
9.22)
ऐसी ही चमत्कारिक घटना श्री लीलारामजी के जीवन में भी घटी। श्री लीलारामजी का जन्म जिस गाँव में हुआ था, वह महराब चांडाई नामक गाँव बहुत छोटा था। उस जमाने में दुकान में बेचने के लिए सामान टंगेबाग से लाना पड़ता था। भाई लखुमल वस्तुओं की सूची एवं पैसे देकर श्री लीलारामजी को खरीदी करने के लिए भेजते थे।
एक समय की बात हैः उस वर्ष मारवाड़ एवं थर में बड़ा अकाल पड़ा था। लखुमल ने पैसे देकर श्री लीलारामजी को दुकान के लिए खरीदी करने को भेजा। श्री लीलारामजी खरीदी करके, माल-सामान की दो बैलगाड़ियाँ भरकर अपने गाँव लौट रहे थे। गाड़ियों में आटा, दाल, चावल, गुड़, घी आदि था। रास्ते में एक जगह पर गरीब, पीड़ित, अनाथ एवं भूखे लोगों ने श्री लीलाराम जी को घेर लिया। दुर्बल एवं भूख से व्याकुल लोग जब अनाज के लिए गिड़गिड़ाने लगे तब श्री लीलारामजी का हृदय पिघल उठा। वे सोचने लगे। 'इस माल को मैं भाई की दुकान पर ले जाऊँगा। वहाँ से खरीदकर भी मनुष्य ही खायेंगे न....! ये सब भी तो मनुष्य ही हैं। बाकी बची पैसे के लेन-देन की बात... तो प्रभु के नाम पर भले ये लोग ही खा लें।'
श्री लीलारामजी ने बैलगाड़ियाँ खड़ी करवायीं और उन क्षुधापीड़ित लोगों से कहाः
"यह रहा सब सामान। तुम लोग इसमें से भोजन बना कर खा लो।"
भूख से कुलबुलाते लोगों ने तो दोनों बैलगाड़ियों को तुरंत ही खाली कर दिया। श्री लीलारामजी भय से काँपते, थरथराते गाँव में पहुँचे। खाली बोरों को गोदाम में रख दिया। कुँजियाँ लखुमल को दे दीं। लखुमल ने पूछाः
"माल लाया?"
"हाँ।"
"कहाँ है?"
"गोदाम में।"
"अच्छा बेटा ! जा, तू थक गया होगा। सामान का हिसाब कल देख लेंगे।"
दूसरे दिन श्री लीलारामजी दुकान पर गये ही नहीं। उन्हें तो पता था कि गोदाम में क्या माल रखा है। वे घबराये, काँपने लगे। उनको काँपते हुए देखकर लखुमल ने कहाः "अरे ! तुझे बुखार आ गया? आज घर पर आराम ही कर।"
एक दिन.... दो दिन.... तीन दिन..... श्री लीलारामजी बुखार के बहाने दिन बिता रहे हैं और भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं-
"हे भगवान ! अब तो तू ही जान। मैं कुछ नहीं जानता। हे करन-करावनहार स्वामी ! तू ही सब कराता है। तूने ही भूखे लोगों को खिलाने की प्रेरणा दी। अब सब तेरे ही हाथ में है, प्रभु ! तू मेरी लाज रखना। मैं कुछ नहीं, तू ही सब कुछ है...."
एक दिन शाम को लखुमल अचानक श्री लीलारामजी के पास आये और बोलेः
''लीला.... लीला ! तू कितना अच्छा माल लेकर आया है !"
श्री लीलारामजी घबराये। काँप उठे कि 'अच्छा माल.... अच्छा माल कहकर अभी लखुमल मेरे कान पकड़कर मारेंगे। वे हाथ जोड़कर बोलेः
"मेरे से गल्ती हो गयी।"
"नहीं बेटा ! गलती नहीं हुई। मुझे लगता था कि व्यापारी तुझे कहीं ठग न लें। ज्यादा कीमत पर घटिया माल न पकड़ा दें। किन्तु सभी चीजें बढ़िया हैं। पैसे तो नहीं खूटे न?"
"नहीं, पैसे तो पूरे हो गये और माल भी पूरा हो गया।"
"माल किस तरह पूरा हो गया?"
श्री लीलाराम जी जवाब देने में घबराने लगे तो लखुमल ने कहाः "नहीं बेटा ! सब ठीक है। चल, तुझे बताऊँ।"
ऐसा कहकर लखुमल श्री लीलारामजी का हाथ पकड़कर गोदाम में ले गये। श्री लीलारामजी ने वहाँ जाकर देखा तो सभी खाली बोरे माल-सामान से भरे हुए मिले ! उनका हृदय भावविभोर हो उठा और गदगद होते हुए उन्होंने परमात्मा को धन्यवाद दियाः
'प्रभु ! तू कितना दयालु है.... कितना कृपालु है !'
श्रीलीलाराम जी ने तुरंत ही निश्चय कियाः 'जिस परमात्मा ने मेरी लाज रखी है.... गोदाम में बाहर से ताला होने पर भी भीतर के खाली बोरों को भर देने की जिसमें शक्ति है, अब मैं उसी परमात्मा को खोजूँगा..... उसके अस्तित्व को जानूँगा.... उसी प्यारे को अब अपने हृदय में प्रगट करूँगा।'
अब श्री लीलारामजी का मन धीरे-धीरे ईश्वराभिमुख होने लगा। हर पल उनका बढ़ता जाता ईश्वरीय अनुराग, उन्हें आध्यात्मिक पथ पर अग्रसर करने लगा। तन से तो वे दुकान सँभालते किंतु मन सदैव परमात्म-प्राप्ति के लिए व्याकुल रहते।
एक बार श्री लीलारामजी बैलगाड़ी के ऊपर सामान लादकर जंगी नामक गाँव में बेचने जा रहे थे तब जीवाई नामक एक महिला ने श्री लीलाराम जी के पास से थोड़ा सामान खरीदा। उसमें से तौलते वक्त एक चीज का वजन उस महिला को कम लगा। उसने तुरंत ही बालक श्री लीलारामजी को एक थप्पड़ मारते हुए कहाः
"तू सामान कम देकर हमें लूटता है? यह तुझे आधा सेर लगता है?"
तब श्री लीलारामजी ने शांतिपूर्वक कहाः
"माँ ! सामान तो बराबर तौलकर दिया है फिर भी तुम्हें शंका हो तो फिर से तौल दूँ?"
श्रीलीलारामजी ने सामान तौला तो उसका वजन आधे सेर की जगह पौना सेर निकला। जीवाई शरमा गयी एवं श्री लीलारामजी के पैरों पड़ी। सरल हृदय के श्री लीलारामजी को जरा भी क्रोध न आया। उलटे वे ही उस महिला से माफी माँगने लगे।
उसी दौरान् एक ऐसी ही दूसरी घटना घटी जिसे लेकर श्री लीलारामजी की जिज्ञासा ज्यादा तीव्र हो गयी।
उस गाँव में जीवा नामक एक शिकारी रहता था। अकाल का समय था। बाल-बच्चों वाला जीवा अपने बच्चों की भूख को न मिटा सका। अनाज की गाड़ी लेकर जब श्री लीलारामजी जा रहे थे तब रास्ते में थका हारा जीवा श्री लीलारामजी के पास आया और याचना करने लगाः "मेरे बच्चे भूख से कुलबुला रहे हैं। थोड़ा सा अनाज दे दें तो बच्चों को जीवनदान मिल सके।"
श्री लीलारामजी ने जीवा की लाचारी को समझा। भूख से अंदर धँसी हुई आँखें उसकी दयाजनक स्थिति का संकेत दे रही थीं। श्री लीलारामजी परिस्थिति पा गये।
वैष्णवजन
तो तेने रे
कहिए, जे
पीड़ पराई
जाणे रे.....
जीवा के परिवार की ऐसी करूण स्थिति ने उन्हें हिलाकर रख दिया। क्षण का भी विचार किये बिना आधे मन अनाज से उसका थैला भर दिया।
उस जमाने में पैसे का लेन-देन बहुत कम था। छोटे-छोटे गाँवों में सामान की अदला-बदली ही ज्यादा होती थी। जीवा शिकारी चल पड़ा लखुमल की दुकान की ओर। वहाँ थोड़ा-सा अनाज देकर मिर्च-मसाले ले लिये। जब लखुमल ने जीवा से पूछाः "तुझे अनाज कहाँ से मिला?"
तब जीवा ने बतायाः "यह अनाज लीलाराम के पास से दान में मिला है।"
ऐसा कहकर लखुमल के आगे श्री लीलारामजी की खूब प्रशंसा करते हुए आशीर्वाद बरसाने लगा।
लखुमल विचार में पड़ गये। उन्हें हुआ कि इस बार लीलाराम का हिसाब ठीक से जाँच लेना पड़ेगा। जब श्री लीलारामजी ने हिसाब दिया तो पैसे ज्यादा आये ! लखुमल ज्यादा उलझ गये। उन्होंने श्री लीलारामजी से पूछाः "पहले के किसी के पैसे लेने-देने के तो इस हिसाब में नहीं हैं न?"
जब श्री लीलारामजी ने खूब सरलता से बताया कि 'किसी का भी आगे पीछे का कोई भी हिसाब बाकी नहीं है।' तब लखुमल की उलझन और बढ़ गयी।
अब तो उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने निश्चय किया कि जैसे भी हो खुद जाँच किये बिना इस उलझन को नहीं सुलझाया जा सकता। दूसरी बार जब उन्होंने श्री लीलारामजी को सामान खरीदने के लिए भेजा तब वह स्वयं भी छिपकर श्री लीलारामजी की लीला को देखने लगे।
जब श्री लीलारामजी अच्छी तरह खरीदी करके वापस लौटने लगे तब रास्ते में गरीब-गुरबों, भूखे-प्यासों को अनाज बाँटने लगे। लखुमल ने श्री लीलारामजी की इस दयालुता एवं दानवृत्ति को देखा, गरीबों की तरफ उनका निष्काम भाव देखा। वह सब लखुमल छिपकर ही देखते रहे। जब श्री लीलारामजी घर पहुँचे तब लखुमल ने मानो, कुछ न हुआ हो इस प्रकार सारा हिसाब लिया तो आश्चर्य ! हिसाब बराबर ! सामान भी बराबर !! कहीं कोई घाटा नहीं !!!
श्री लीलारामजी अपनी उदारता एवं सरलता से खूब लोकप्रिय हो गये इसलिए दूसरे दुकानदारों को श्री लीलारामजी से ईर्ष्या होने लगी। मौका मिलते ही वे लखुमल के कान भरतेः "तुम्हारे मामा का लड़का अपनी दानवृत्ति से तुम्हें पूरा दिवालिया बना देगा। उससे सँभलना।"
तब लखुमल ने स्पष्ट करते हुए कहाः "मैं रोज सूची के अनुसार सामान एवं पैसों की जाँच कर लेता हूँ। मुझे तो कभी भी, कहीं भी गड़बड़ नहीं दिखी। उलटे मेरा व्यापार एवं नफा दोनों बढ़ने लगा है। मैं किस प्रकार उस पर शंका कर सकता हूँ?"
श्री लीलारामजी की सहृदयता एवं परोपकार की वृत्ति को देखकर लखुमल के हृदय में श्री लीलारामजी के लिए आदर एवं भक्तिभाव उदित होने लगा। खुद के द्वारा की गयी जाँच से भी लखुमल का यह विश्वास दृढ़ ह गया कि लीलाराम कोई साधारण बालक नहीं है। उसमें कई दिव्य शक्तियों का भण्डार है, बालक अलौकिक है।
श्री लीलारामजी को भी गाँव के व्यापारियों द्वारा की जाने वाली शिकायतों का अंदाज लग गया था। लखुमल कुछ न कहते और श्री लीलारामजी भी विरक्तभाव से सब घटनाओं को देखते रहते। फिर भी गहराई में एक ही चिंतन चलता रहता कि 'इस दान की कमी को पूरा करने वाला कौन?'
इस कमी को पूरा करने वाले के प्रति उनका आकर्षण बढ़ता गया। जिज्ञासा की तीव्रता बढ़ने लगी। श्री लीलारामजी को दृढ़ विश्वास हो गया कि 'इस ब्रह्माण्ड में कोई सबसे बड़ा दानी है जिसकी दानवृत्ति स ही सारे ब्रह्माण्ड का व्यवहार चलता है। मुझे उसी दाता प्रभु को जानना है।' मैंनें कुछ दान किया है या अच्छा काम किया है – इस बात का उन्हें जरा भी अहं न था। दूसरों के हित को ध्यान में रखकर, निष्काम भाव से कर्म करने वाले की सेवा में तो प्रकृति भी दासी बनकर हाजिर रहती है।
मेरा
मुझ में कुछ
नहीं, जो
कुछ है सो
तोर।
तेरा
तुझको देत है, क्या लागत
है मोर।।
उपरोक्त चमत्कारिक घटनाओं ने श्री लीलारामजी को अधिक सजग कर दिया। उनके अंतरतम में वैराग्य की अग्नि अधिकाधिक प्रज्वलित होने लगी। अब वे अपना अधिकाधिक समय ईश्वर की आराधना में बिताने लगे।
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जब कुलगुरु श्री रतन भगत ने नश्वर देह का त्याग कर दिया तब उनकी गद्दी पर उनके शिष्य टौंरमल को बैठाया गया। थोड़े समय के पश्चात् वे भी संसार से अलविदा हो गये तब शिष्यों ने लीलारामजी को गद्दी पर बिठाया।
नन्हें-से लीलारामजी गद्दी पर तो बैठे किन्तु उनका मन वहाँ नहीं लगता था। उनके भीतर तो निरंतर यही विचारधारा चलती थी कि 'दान देने के कारण कम हुई वस्तुओं की भरपाई करने वाला वह कौन है, जो मेरी लाज रखता था?' उन्होंने निर्णय किया कि 'जिसने मेरी लाज रखी, जिसने खाली गोदाम को भरा, मैं उस परमात्मा का साक्षात्कार करके ही रहूँगा। नहीं तो मेरा जीवन व्यर्थ है।' उनकी अन्तरात्मा जागृत हो उठी। संसार के नश्वर पद एवं संबंधों को त्यागने का दृढ़ निश्चय करके वे अपनी चाची के पास आकर कहने लगेः
"माँ मैं परमात्मा की खोज करके उन्हें पाना चाहता हूँ। मुझे आज्ञा दीजिए।"
चाची को यह बात सुनकर बड़ा आघात लगा। घर में एक ही कुलदीपक है और वह भी साधु बनना चाहता है ! उन्होंने बात टालने का काफी प्रयास किया किंतु श्री लीलारामजी तो दृढ़निश्चयी थे। उनके मन पर चाची के रोने-गिड़गिड़ाने का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। आखिरकार चाची ने एक वचन लिया कि 'अंत समय में मेरी अर्थी को कंधा जरूर देना।' कंधा देने का वचन देकर श्री लीलारामजी तो अपना परम लक्ष्य पाने के लिए घर छोड़कर निकल पड़े। जिसके हृदय में तीव्र वैराग्य हिलोरें मारता हो उसे जगत में कौन सकता है?
विवेकवान् पुरुष नश्वर उपलब्धियों से मुँह मोड़कर अपना समय परमार्थ सिद्ध करने में ही लगाते हैं। कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ के पास पूरा राजपाट, युवान सुंदर पत्नी, सुंदर बालक एवं भोग-विलास के सभी साधन थे। वे जब छोटे थे तब ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी कि 'यह बालक संसार का त्याग करके, संन्यासी बनकर, जगत का उद्धार करेगा।'
राजा ने अपना इकलौता लाडला पुत्र साधु न बने इसका पहले से ही खूब ख्याल रखा था। परंतु एक दिन सिद्धार्थ को बाहर की दुनिया देखने की इच्छा हुई। वे सारथि द्वारा रथ तैयार करवाकर बाहर की दुनिया का अवलोकन करने निकले।
मार्ग में उन्होंने कमर से झुका हुआ एक वृद्ध, एक रोगी, एक अर्थी एवं एक संन्यासी को देखा। वृद्धावस्था, रोग एवं मृत्यु को देखकर उन युवान सिद्धार्थ के मन में प्रश्न उत्पन्न हुआ कि इन दुःखों से छूटने का कोई उपाय है क्या? तब प्रभुप्राप्ति के सिवाय उन्हें दूसरा कोई उत्तर नहीं मिला। उनका विवेक जगा कि मिले हुए शरीर के साथ का सुख-वैभव तो मृत्यु के झटके में ही चला जायेगा।
पड़ा
रहेगा माल
खजाना छोड़
त्रिया सुत
जाना है।
कर
सत्संग अभी से
प्यारे नहीं
तो फिर पछताना
है।।
उन्होंने शरीर एवं संसार के दुःखों को देखा जिनमें से किसी प्रकार छूटना संभव नहीं है। सभी जीवों को उनसे गुजरना पड़ता है। यह सोचकर उनका वैराग्य जाग उठा एवं मध्यरात्रि में ही युवान पत्नी यशोधरा एवं पुत्र राहुल को सोते हुए छोड़कर, राजपाट वगैरह का त्याग करके वे परमात्म प्राप्ति के मार्ग पर निकल पड़े। जंगलों में जाकर घोर तपस्या करके परमात्म-शांति को पाकर महान् बन गये। आज लाखों लोग उन बुद्ध की बंदना करते हैं।
संसार के दुःखों को देखकर सिद्धार्थ का वैराग्य का जाग उठा। अपनी पत्नी के विश्वासघात ने राजा भर्तृहरि के जगा दिया।
राजा भर्तृहरि के पास विशाल साम्राज्य था। उनकी पिंगला नाम की अत्यंत रूपवती रानी थी। राजा को रानी के ऊपर अटूट विश्वास एवं प्रेम था परंतु वह रानी राजा के बदले एक अश्वपाल से प्रेम करती थी और वह अश्वपाल भी रानी के बदले राजनर्तकी को चाहता था। वह राजनर्तकी अश्वपाल की जगह राजा भर्तृहरि को स्नेह करती थी।
एक दिन एक योगी ने राजा को अमरफल दिया। राजा ने रानी के मृत्यु के वियोग के भय से उसे अमर बनाने के लिए वह फल खाने के लिए रानी को दिया। परंतु मोहवश रानी ने वह फल अश्वपाल को दे दिया। अश्वपाल ने वह राजनर्तकी को दे दिया। किन्तु राजनर्तकी ने जब वह फल राजा को दिया, तभी यह सारा सत्य बाहर आया। रानी की बेवफाई को देखकर राजा के पैरों तले की जमीन खिसक गयी।
राजा भर्तृहरि ने बाद में अपने नीतिशतक में इस घटना के बारे में लिखा हैः
यां
चिन्तयामि
सततं मयि सा
विरक्ता।
साप्यन्यमिच्छति
जनं स
जनोऽन्यसक्तः।
अस्मत्कृते
च परितुष्यति
काचिदन्या।
धिक्
तां च तं च
मदनं च इमां च
मां च।।
'मैं जिसका सतत चिंतन करता हूँ वह (पिंगला) मेरे प्रति उदासीन है। वह (पिंगला) भी जिसको चाहती है वह (अश्वपाल) तो कोई दूसरी ही स्त्री (राजनर्तकी) में आसक्त है। वह (राजनर्तकी) मेरे प्रति स्नेहभाव रखती है। उस (पिंगला) को धिक्कार है ! उस अश्वपाल को धिक्कार है ! उस (राजनर्तकी) को धिक्कार है ! उस कामदेव को धिक्कार है और मुझे भी धिक्कार है !'
उनके अंतरचक्षु खुल गये। उन्होंने रनिवास, सिंहासन और राजपाट सब छोड़कर विवेकरूपी कटार से तृष्णा एवं राग की बेल को एक ही झटके में काट दिया।
फिर जंगलों में भटकते-भटकते भर्तृहरि ने गुरु गोरखनाथ के चरणों में निवेदन कियाः
"हे नाथ ! मैंने सोने की थाली में भोजन करके देख लिया और चाँदी के रथ में घूमकर भी देख लिया। यह सब करने में मैंने अपनी आयुष्य को बरबाद कर दिया। अब मैं यह अच्छी तरह जान चुका हूँ कि ये भोग तो बल, तेज, तंदरुस्ती और आयुष्य का नाश कर डालते हैं। मनुष्य की वास्तविक उन्नति भोग-पूर्ति में नहीं वरन् योग में है। इसलिए आप मुझ पर प्रसन्न होकर योगदीक्षा देने की कृपा करिये।"
राजा भर्तृहरि की उत्कट इच्छा एवं वैराग्य को देखकर गोरखनाथ ने उन्हें दीक्षा दी एवं तीर्थाटन की आज्ञा दी।
तीर्थाटन करते-करते, साधना करते-करते भर्तृहरि ने आत्मानुभव पा लिया। उसके बाद कलम उठाकर उन्होंने सौ-सौ श्लोक की तीन छोटी-छोटी पुस्तकें लिखीं- वैराग्यशतक, नीतिशतक एवं शृंगारशतक। ये आज विश्व-साहित्य के अनमोल रत्न हैं।
इस प्रकार जिसके पूर्वजन्मों के संस्कार अथवा पुण्य जगे हों तब कोई वचन, कथा अथवा घटना उसके हृदय को छू जाती है और उसके जीवन में विवेक-वैराग्य जाग उठता है, उसके जीवन में महान् परिवर्तन आ जाता है।
रोगी, वृद्ध एवं मृत व्यक्ति को देखकर सिद्धार्थ का वैराग्य जाग उठा, पिंगला के विश्वासघात को देखकर भर्तृहरि का विवेक जाग उठा और उन लोगों ने अपने विशाल साम्राज्य को ठोकर मार दी। इसी प्रकार खाली गोदाम को भरने वाले परम पिता परमात्मा की करूणा-कृपा को देखकर श्री लीलारामजी ने स्नेहमयी चाची के प्रेम एवं गुरुगद्दी का भी त्याग कर दिया एवं परमात्मतत्व की खोज में निकल पड़े।
वे टंडोमुहम्मदखान में आकर अपने बहनोई के भाई आसनदास के साथ रहने लगे। वहाँ उन्होंने नारायणदास के मंदिर में हिंदी सीखना शुरु किया। हिंदी का ज्ञान प्राप्त करने के बाद श्री लीलारामजी ने वेदान्त-ग्रंथों का अभ्यास शुरु किया।
गाँव के छोर पर संत हंस निर्वाण का आश्रम था। जोधपुर के एक बड़े विद्वान और ज्ञानी महापुरुष स्वामी परमानंदजी उसमें रहते थे। श्री लीलारामजी के ऊपर उनकी मीठी कृपादृष्टि पड़ी। श्री लीलारामजी के उत्साह एवं तत्परता को देखकर वे उन्हें वेदान्त पढ़ाने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे। इस प्रकार श्री लीलारामजी एक ओर सांसारिक एवं आध्यात्मिक विद्या में तीव्र प्रगति कर रहे थे तो दूसरी ओर उनकी त्याग एवं वैराग्यवृत्ति भी खूब प्रबल होती जा रही थी।
यह देखकर उनके बहनोई एवं सगे-संबंधियों को चिंता होने लगी। इधर उनकी चाची बी इन लोगों को संदेश भेजतीं कि लीलाराम की शादी करवा देना। वह साधु न बन जाये – इसका विशेष ध्यान रखना। इस कारण बहनोई एवं सगे-संबंधी उन्हें बार-बार संसार की तरफ खींचने का प्रयत्न करने लगे। एक सुंदर लड़की भी बतायी गयी परंतु जिसे ईश्वर से मिलने की लगन लगी हो वह भला, किस प्रकार संसार-बंधन में फँस सकता है?
चातक
मीन पतंग जब
पिया बिन नहीं
रह पाये।
साध्य
को पाये बिना
साधक क्यों रह
जाये?
छत्रपति शिवाजी के गुरु समर्थ रामदास के विवाह के समय की बात है। उनके सगे-संबंधियों ने जबरदस्ती उन्हें विवाह-मंडप में बैठा दिया और सभी ब्राह्मणों ने मंगलाष्टक बोलना प्रारंभ किया। सभी ब्राह्मणों ने जब एक साथ 'सावधान' शब्द का उच्चारण किया तब समर्थ ने मन में कहाः
"मैं सदा सावधान रहता हूँ। फिर भी ये लोग मुझे सावधान रहने को कह रहे हैं इसलिए इसमें अवश्य कोई भेद होना चाहिए। मातुश्री की आज्ञा अंतरपट पकड़ने तक की ही थी, वह भी पूरी हो गयी है और मैं अपना वचन पाल चुका हूँ तो फिर अब मैं यहाँ क्यों बैठा हूँ? अब तो मुझे सचमुच सावधान हो जाना चाहिए।"
मन में ऐसा विचारकर समर्थ विवाह मंडप में से एकदम उठकर भाग गये।
इसी प्रकार श्री लीलारामजी ने जब देखा कि उनके संबंधी उन्हें दुनिया के नश्वर बंधन में बाँधना चाहते हैं तब उन्होंने अपने बहनोई के आगे स्पष्ट शब्दों में कह दियाः
"मैं पूरी जिंदगी ब्रह्मचर्यव्रत का पालन करूँगा एवं संन्यासी बन कर ही रहूँगा।"
बाद में जब ये ही लीलारामजी पूज्य संत श्री लीलाशाहजी महाराज के रूप में विख्यात हुए तब वे ही सगे-संबंधी, मित्र वगैरह पगड़ी उतारकर, पैर पड़कर उनसे माफी माँगने लगे किः
"हमने तुम्हारा खूब अपमान किया था। हम तुम्हें गलत रास्ते पर ले जाने के लिए परेशान करते थे, हमें माफ करो। हमने बूढ़े होकर भी पूरा जीवन बरबाद कर डाला किंतु कुछ भी हाथ न लगा। हमने अपनी जिंदगी भी संसार में व्यर्थ बिता डाली। तुम्हारा मार्ग ही सच्चा था।"
अंत में श्री लीलारामजी का वैराग्य सीमा लाँघ गया। उन्होंने लोकलाज छोड़कर संसारियों का साधारण वेश उतार दिया एवं पाँच-छः आने वाला खादी का कपड़ा लेकर, उसमें से चोगा बनवाकर, उसे पहनकर संन्यास ग्रहण कर लिया। उस समय श्री लीलारामजी की उम्र मात्र 12 वर्ष की थी।
फिर श्री लीलारामजी टंडोमुहमदखान छोड़कर टंडोजानमुहमदखान में आ गये। यहीं वेदान्ती, ब्रह्मनिष्ठ, ब्रह्मश्रोत्रिय संत श्री केशवानंद जी रहते थे। सिंध के कई जिज्ञासु ज्ञान पाने के लिए उनके पास आते थे।
श्री लीलारामजी जब छोटे थे तब टंडेबाग में स्वामी श्री केशवानंद जी के दर्शन करके खूब प्रभावित हुए थे। अतः अपनी आध्यात्मिक भूख मिटाने के लिए सदगुरुदेव स्वामी श्री केशवानंद जी के श्री चरणों में श्री लीलारामजी खूब श्रद्धापूर्वक समर्पित हो गये। श्री लीलारामजी की श्रद्धा एवं प्रेम को देखकर स्वामी श्री केशवानंद जी उनके मस्तक पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते हुए पूछाः
"यह चोगा तुझे किसने पहनाया है? संत का वेश पहनने मात्र से कोई संत नहीं बन जाता वरन् जिसके जन्म-मरण का अंत हो जाता है उन्हें ही संत कहा जाता है।"
श्री लीलारामजी ने तुरंत नम्रतापूर्वक जवाब दियाः
"साँई ! किसी ने यह चोगा (अंगरखा) पहनाया नहीं है। मेरा दिल संसार से विरक्त हो गया है। दिल दातार को बेच दिया है। मैं ब्रह्मचर्यव्रत को धारण करके स्वयं ही यह चोगा बनाकर, पहनकर आपकी शरण में आया हूँ। मैं आपका बालक हूँ। आपकी दया कृपा से मुझे ईश्वरप्राप्ति करनी है।"
तब स्वामी केशवानंद जी ने कहाः
"बेटा ! चोगा पहनने अथवा भगवा कपड़ा रंगने से कोई संत या संन्यासी नहीं बन जाता है। सत्य को, ईश्वर को प्राप्त करने के लिए तो तपस्या की जरूरत है, सेवा करने की जरूरत है। यहाँ तो अपने को, अपने अहं को मिटाने की जरूरत हैं। अपने अंतर में से विषय-वासनाओं को निकालने की जरूरत है।"
श्री
लीलारामजी ने
हाथ जोड़कर
नम्रतापूर्वक
कहाः "यह
सेवक आपकी
प्रत्येक
आज्ञा का पालन
करने के लिए
तैयार है।
मुझे संसार के
किसी भी सुख
को भोगने की
इच्छा नहीं
है। मैं समस्त
संबंधों का त्याग
करके आपकी शरण
में आया हूँ।"
ऐसे जवाब से संतुष्ट होकर संत श्री केशवानंदजी ने खुशी से श्री लीलारामजी को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया।
सदगुरु की महिमा अवर्णनीय है। सदगुरु-महिमा का वर्णन करते हुए कबीरजी ने कहा हैः
सात
समंदर की मसि
करौं, लेखनी
सब वनराई।
धरती
सब कागद करौं, गुरु गुन
लिखा न जाई।।
"सातों महासागरों की स्याही बना दी जाय, पृथ्वी के सभी वनों की लेखनी (कलम) बना दी जाये और संपूर्ण पृथ्वी को कागज बना दिया जाय फिर भी गुरु के गुणगान नहीं लिखे जा सकते।"
गुरु महिमा को अनेक ऋषि-मुनियों ने गाया है, गा रहे हैं और गाते ही रहेंगे, फिर भी उनकी महिमा का कोई अंत नहीं है, कोई पार नहीं है। स्वयं भगवान ने भी गुरुओं की महिमा का गान किया है। भगवान श्रीराम एवं श्रीकृष्ण भी जब मनुष्य रूप धारण करके पृथ्वी पर अवतरित हुए तब वे भी आत्मतत्त्व का ज्ञान पाने के लिये वशिष्ठ मुनि एवं सांदीपनि मुनि जैसे आत्मानुभव से तृप्त गुरुओं के द्वार पर गये थे। अष्टावक्र मुनि की सहज अवस्था के स्फुरित जीवन्मुक्ति देने वाले अमृतोपदेश से राजा जनक को घोड़े के रकाब में पैर डालते-डालते ज्ञान हो गया। अष्टावक्र मुनि पूर्णता को प्राप्त ब्रह्मवेत्ता महापुरुष थे और जनक पूर्ण तैयार पात्र।
ऐसे जीवन्मुक्त, ब्रह्मज्ञानी सदगुरुओं की महिमा जितनी गायें उतनी कम है। ऐसे पवित्र महापुरुषों की अनुकंपा एवं उनके पुण्य-प्रताप से यह धरा सदैव पावन होती रही है। श्री गुरुगीता में भगवान शिव ने सदगुरु की महिमा का वर्णन करते हुए माता पार्वती से कहा हैः
बहुजन्मकृतात्
पुण्याल्लभ्यतेऽसौ
महागुरूः।
लब्ध्वाऽमुं
न पुनर्याति
शिष्यः
संसारबन्धनम्।।
'अनेक जन्मों में किये हुए पुण्यों से ऐसे महागुरु प्राप्त होते हैं। उनको प्राप्त करके शिष्य पुनः संसारबंधन में नहीं बँधता अर्थात् मुक्त हो जाता है।'
ऐसे आत्मानुभव से तृप्त महापुरुषों की गाथा दिव्य है। ऐसे महापुरुष अगर किसी सत्पात्र शिष्य को मिल जायें तो....
श्री लीलारामजी भी दृढ़ता एवं तत्परता से गुरुद्वार पर रहकर तन-मन से गुरुसेवा में संलग्न हो गये।
उपनिषदों में भी आया है कि आत्मज्ञान के मुमुक्षु संसार को छोड़कर, गुरु के चरणों का सेवन करते हुए वर्षों तक सेवा एवं साधनारूपी कठिन तपस्या करके सत्य का अनुभव प्राप्त करते हैं। श्री लीलारामजी भी निष्ठापूर्वक रात-दिन गुरुसेवा एवं साधना में अपने को रत रखने लगे। वे सुबह जल्दी उठकर आश्रम की सफाई करते, पानी भरते, भोजन बनाकर गुरुदेव को खिलाते, गायों के लिए घास काटते, गायों की सब सेवा करते, आश्रम में जो अतिथि आते उन्हें भोजन बनाकर खिलाते, साधु-संतों की देखभाल करते, आधी रात तक गुरुदेव की चरणचंपी करते।
श्री लीलारामजी की दृढ़ता एवं तत्परता देखकर गुरु उन्हें सच्चे रंग में रंगने लगे। श्री लीलारामजी भी गुरु के साथ खूब मर्यादा रखते। खूब कम एवं मर्यादित बोलते थे। वे अपना समय सदैव जप, ध्यान, सत्संग, सत्शास्त्रों के अध्ययन, ईश्वर-चिंतन एवं आश्रम की विविध प्रकार की सेवा में गुजारते थे।
खाली
दिमाग शैतान
का घर होता
है। खाली मन
गपशप में लगता
है अथवा आवारा
मन इधर-उधर की
बातें करता
है। श्री
लीलारामजी
कभी ऐसा नहीं
करते थे। केवल
दिखाने के लिए
ही उनका साधक
या शिष्य जैसा
व्यवहार नहीं
था वरन् वे तो
सच्चे
सतशिष्य थे।
उनका कद छोटा एवं देह का रंग श्याम था। दिखने में भोले-भाले लगते किन्तु व्यक्तित्व आकर्षक था। वाणी पर उनका बड़ा संयम था। वे आश्रम में सभी गुरुभाइयों के साथ विनम्र एवं प्रेमपूर्ण व्यवहार रखते थे।
जिस प्रकार कुम्हार घड़ा बनाते वक्त बाहर से कठोर व्यवहार करता दिखता है किन्तु अंदर से अपने कोमल हाथ का आधार देता है वैसे ही सदगुरु बाहर से शिष्य के साथ कठोर व्यवहार करते, कठोर कसौटी करते दिखते हैं परंतु अंदर से उनका हृदय करुणा-कृपा से परिपूर्ण होत है। नरसिंह मेहता ने गुजराती में ठीक ही गाया हैः
भोंय
सुवाडुं भूखे
मारुं, उपरथी
मारुं मार।
एटलुं
करतां जो हरि
भजे तो करी
नाखुं
निहाल।।
अर्थात्
धरा
सुलाऊँ भूखा
मारूँ, ऊपर
से लगाऊँ मार।
इतना
करते हरि भजे, तो कर
डालूँ
निहाल।।
इस प्रकार निहाल कर देने वाले सदगुरु की फटकार, कड़वे शब्द जिन जिज्ञासु साधकों-शिष्यों को मिल जाते हैं वे सचमुच धन्य हैं।
स्वामी श्री केशवानंद जी महाराज लीलारामजी की सेवा और भक्ति से खूब प्रसन्न रहते थे। वे श्री लीलारामजी को 'विचारसागर', 'पंचीकरण', भर्तृहरि का 'वैराग्यशतक', श्रीमदभगवदगीता, सारसूक्तावली एवं उपनिषद पढ़ाते। ऐसे उच्च कोटि के वेदान्त के ग्रंथों को कंठस्थ करके दूसरे दिन सुनाने के लिए कहते। कभी-कभी अत्यधिक सेवा के कारण श्री लीलारामजी को शास्त्र कंठस्थ करने का समय न मिलता तो गुरुदेव कान पकड़कर इतने जोर से गाल पर थप्पड़ मारते कि गाल पर दो-तीन घण्टे तक उँगलियों का निशान मौजूद रहता था।
शास्त्रों में आता है कि शास्त्रों की कितनी ही गूढ़ रहस्यभरी बातें, जिन्हें समझना मुश्किल है, जिनके अर्थ का अनर्थ होना संभव है उन्हें केवल सदगुरु ही सतशिष्यों को समझा सकते हैं और शिष्यों की शंकाओं का समाधान कर सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा हैः
तद्विद्ध
प्रणिपातेन
परिप्रश्नेन
सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति
ते ज्ञानं
ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः।।
'तत्त्व को जानने वाले ज्ञानी पुरुषों के पास जाकर उन्हें भली प्रकार दण्डवत प्रणाम करके तथा सेवा और निष्कपट भाव से किये हुए प्रश्न द्वारा तू उस ज्ञान को जान। वे मर्म को जाननेवाले ज्ञान तुझे उस ज्ञान का उपदेश करेंगे।'
(गीताः
4.34)
'यह संसार किस तरह प्रगट हुआ? जीव को बंधन किस तरह हुआ? मुक्ति कैसे पायी जाये? ईश्वर का वास्तविक स्वरूप क्या है? ईश्वर एवं जीव में क्या भेद है? ब्रह्म क्या है? माया क्या है?' वगैरह गूढ़ रहस्यों का ज्ञान सदगुरु द्वारा ही प्राप्त होता है। जैसे, निद्रा से जागते ही स्वप्न निवृत्त हो जाता है उसी प्रकार तत्त्वरूप का ज्ञान होते ही अज्ञानरूपी अंधकार में सदियों से भटकता हुआ जीव क्षणभर में शिव हो जाता है। सदगुरु के दर्शन, स्पर्श एवं उपदेश से शिष्य का कल्याण हो जाता है।
श्रीलीलारामजी भी स्वयं पुरुषार्थ करके तत्परता से साधना में तल्लीन हो जाते। दिनों दिन उनकी वृत्ति ब्रह्माकार होने लगी। द्वैतभाव धीरे-धीरे छूटने लगा। कभी-कभी उनका मन बेकाबू हो जाता तो वे उसे संयम में लाने के लिए अपना कान पकड़कर गाल के ऊपर तमाचा मार देते अथवा कभी छाती कूटते अथवा कभी अपने मन को प्रेम से समझाते। इतनी छोटी उम्र में कभी कुछ खाने की इच्छा होती तो उस वस्तु को आगे रखकर पलथी मार कर बैठ जाते और मन से कहतेः
"खा, लीला ! खा।" परन्तु उस वस्तु को उठाकर मुँह में नहीं रखते थे।
वे एकांत में बैठकर ध्यान करते। ध्यान करते-करते अगर कभी मन में बुरे विचार आते तो अपने को ही दंड देते थे। इस प्रकार किशोरावस्था से ही उन्होंने अपनी सभी इच्छा-वासनाओं एवं चंचल मन पर नियंत्रण पा लिया था।
कभी-कभी फकीरी भाव में आ जाते तो आश्रम से गुम हो जाते। दूर जंगल में एकांत जगह पर ध्यान भजन में लीन हो जाते। कभी-कभी ईश्वर के प्रेम का आस्वादन करते-करते मधुर गीत-गाते रो पड़ते थेः
मस्ती
हस्ती है
यारों ! और कुछ
हस्ती नहीं।
बेखुदी
हस्ती है
यारों ! और कुछ
मस्ती नहीं।।
यह हस्ती तो ऐसी है कि जिसमें खुद ही न रहे। यह मस्ती तो ऐसी है जिसमें खुद की मस्ती में ही मस्त हुआ जाता है। श्री लीलारामजी भी अपने मन की मस्ती को मारकर खुद खुदा की, रब की मस्ती में मस्त रहते थे। थोड़े दिनों के बाद जब आश्रम में वापस आते तब स्वामी श्री केशवानंद जी पूछते थेः
"कहाँ था?"
तब वे सिर नीचे करके चुपचाप गुरुचरणों में बैठ जाते थे। कुछ भी न बोलते थे। उन्हें एकान्तवास अत्यंत प्रिय था।
तुलसीदास नामक एक मंदिरवाले गृहस्थ स्वामी श्री केशवानंदजी महाराज के शिष्य थे एवं संबंधी भी थे। गृहस्थाश्रम में रहकर भी गुरुकृपा से उन्होंने अच्छी आध्यात्मिक अवस्था प्राप्त की थी। उन्होंने धार्मिक, व्यवहारिक एवं देशसेवा के कार्यों में अच्छा भाग लिया था। सन् 1930 में संत श्री केशवानंद जी एवं तुलसीदास दोनों सत्याग्रह आंदोलन के कारण जेल में भी गये थे। संत श्री केशवानंद जी उनके साथ ही रहते थे। श्री लीलारामजी भी इन लोगों के साथ कुटुम्बी की तरह ही रहते थे। तुलसीदास की माता श्री लीलारामजी को अपने पुत्र के समान ही मानती थी। घर के बालक भी गले में दुपट्टा डालकर श्री लीलाराम जी से कहते थेः
"नाचो लीला ! नाचो.... कुछ गाओ।"
तब श्री लीलारामजी भी मस्ती में आ जाते एवं 'अहं ब्रह्मास्मि' जैसे महावाक्य उनके श्रीमुख से स्फुरित होने लगते।
'मैं शाहों का शाह हूँ... मैं खुद खुदा हूँ....' कहते हुए आत्मा की मस्ती में वे स्थूल शरीर की हस्ती को भूल जाते।
जैसे-जैसे समय गुजरता गया वैसे-वैसे श्री लीलारामजी की आत्मानुभव की उत्कण्ठा तीव्र-तीव्रतर होने लगी। यह अवस्था देखकर गुरुदेव ने कहाः "लीलाराम ! संत रतन भगत के आश्रम में एकांत में रहकर साधना करो।"
गुरु-आज्ञानुसार श्री लीलारामजी संत रतन भगत के आश्रम में जाकर गहन साधना में तल्लीन हो गये। कभी चने तो कभी सींग खाकर अपनी भूख मिटा लेते कभी-कभी कितने ही दिनों तक उपवास भी कर लेते थे। इस प्रकार कठोर तितिक्षाएँ सहन करते-करते श्री लीलारामजी आत्म-साक्षात्कार के पथ पर अग्रसर होने लगे।
जब तक जीव को अपने वास्तविक स्वरूप का भान नहीं होता तब तक चाहे जैसी अवस्था आ जाये परंतु मानव पूर्ण निश्चिन्त नहीं होता। अपने 'स्व' का ज्ञान हो जाये, अपने 'स्व' की पहचान हो जाये इसे आत्म-साक्षात्कार कहते हैं। यह साक्षात्कार किसी दूसरे का नहीं वरन् अपना साक्षात्कार है। इसीलिए इसे आत्म-साक्षात्कार कहते हैं। जब तक आत्म-साक्षात्कार नहीं होता तब तक व्यक्ति भले 33 करोड़ श्री कृष्ण या क्राईस्ट के बीच रहे फिर भी उसे पूर्ण विश्रांति नहीं मिलेगी। आत्मवेत्ता महापुरुष की आज्ञा में अपने मन की वासनाओं एवं मन की चंचलताओं को पूर्ण समर्पित कर दें तभी पूर्ण गुरुकृपा मिल सकती है।
पूर्ण
गुरु किरपा
मिली पूर्ण
गुरु का
ज्ञान....
आत्म-साक्षात्कार का तात्पर्य क्या है? भगवान दत्तात्रेय कहते हैं- "नाम, रूप और रंग जहाँ नहीं पहुँचते ऐसे परब्रह्म में जिसने विश्रांति पायी है वह जीते जी ही मुक्त है।" नानकजी कहते हैं-
रूप
न रेख न रंगु
किछु त्रिहु
गुण ते प्रभ
भिंन।
तिसहि
बुझाए नानका
जिसु होवै
सुप्रसंन।।
रूप, रंग, आकार जो कुछ भी है वह स्थूल शरीर में है, मन में है, बुद्धि में है, संस्कार में है। देवी-देवता के दर्शन भी यदि हो जायें तो वे भी मायाविशिष्ट चैतन्य में ही होंगे। उनके दर्शन से भी पूर्ण विश्रान्ति नहीं मिलेगी। यह स्थूल जगत, सूक्ष्म जगत एवं जीव-जगत तथा ईश्वर ये सब माया के ही अन्तर्गत हैं। जबकि आत्म-साक्षात्कार है माया से पार। जिसकी सत्ता से यह जीव, जगत और ईश्वर दिखता है उस सत्ता का 'मैं' रूप से अनुभव करना इसी का नाम है आत्म-साक्षात्कार। जीव, जगत एवं ईश्वर का अस्तित्व जिसके आधार से दिखता है, परिवर्तनशील अस्तित्व का आधार जो अबदल आत्मा है, उसे ज्यों का त्यों जानना इसी को कहते हैं आत्म-साक्षात्कार।
आत्म-साक्षात्कार के इन पथिक की यात्रा का अंत हुआ। श्री लीलारामजी का तप और वैराग्य परिपक्व हुआ। उनकी गुरुभक्ति फली और उसके परिपाकस्वरूप बीस वर्ष की उम्र में ही उन्होंने अपने आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर लिया। जिसके लिए घर-बार छोड़ा था, सगे-संबंधी छोड़े थे, धन-ऐश्वर्य छोड़ा था, फकीरी अपनायी थी, जप-तप आसन-प्राणायाम, ध्यान-समाधि का अभ्यास किया था उस लक्ष्य को गुरुकृपा से हासिल कर लिया। सदगुरुदेव ने घर में ही घर बता दिया..... साधक में से सिद्ध अवस्था को पा लिया.... अपने अंदर ही परमानंद स्वरूप परमात्मा का अनुभव हो गया। स्वामी रामतीर्थ ने ऐसी उन्मत अवस्था का वर्णन करते हुए कहा हैः
लख
चौरासी के
चक्कर से थका, खोली कमर।
अब रहा
आराम पाना, काम क्या
बाकी रहा?
जानना
था वो ही जाना, काम क्या
बाकी रहा?
लग गया
पूरा निशाना, काम क्या
बाकी रहा?
देह के
प्रारब्ध से
मिलता है सबको
सब कुछ।
नाहक जग
को रिझाना, काम क्या
बाकी रहा?
समय बीतने पर साधक श्रीलीलारामजी अब संत श्री लीलारामजी के नाम से प्रसिद्ध होने लगे। संत श्रीलीलारामजी थोड़े वर्षों तक नैनिताल के जंगलों में, एकांत में अपनी ब्रह्मनिष्ठा में ही लीन रहे। साथ ही साथ सत्संग, सेवा और साधना में भी नित्य लगे रहते। सत्संग किये बिना दिवस या रात्रि में वे कभी भी भोजन नहीं करते थे।
थोड़े समय के बाद उनके पूज्यपाद गुरुदेव ने नश्वर देह को छोड़ा। उनकी समाधी टंडोजानमुहमद के आश्रम में ही बनायी गयी। वहाँ हर वर्ष उनकी जयंती मनाने के लिए दूर-दूर से शिष्य, भक्त एवं संत कैंवरराम जैसे महापुरुष भी आते थे। इस उत्सव की पूरी व्यवस्था करने के लिए संत श्री लीलारामजी स्वयं आते और हर प्रकार की सेवा करते। किन्तु किसी भी दिन आश्रम में नहीं रहते थे। उत्सव पूरा होते ही तलहार चले जाते थे।
एक बार संत श्री लीलारामजी जब गुरुदेव के आश्रम में आये तब उन्होंने देखा कि आश्रम में साधकों की साधना करने के लिए जो कमरे बनवाये गये हैं, उन्हें गृहस्थी लोगों को रहने के लिए किराये पर दे दिया गया है। यह देखकर संत श्री लीलारामजी अत्यंत दुःखी हुए। गृहस्थ साधक तुलसीदास ने पैसे के लोभ में यह कार्य किया था। उन्होंने तुलसीदास को फटकारते हुए कहाः
"मोह-माया के आवरण में आकर तुमने गुरुदेव के पवित्र आश्रम को गृहस्थियों के रहने की जगह बना दिया है। यह जरा भी योग्य नहीं है। शिष्य के रूप में तुमने यह अच्छा काम नहीं किया है।"
आश्रम के दूसरे गुरुभाई संत श्री लीलारामजी से खूब डरते थे क्योंकि अपनी वाक्सिद्धी के कारण श्री लीलारामजी जो कुछ भी बोलते थे वह होकर ही रहता था। इसलिए तुलसीदास तो घबराकर कुछ न बोले परंतु जब उनकी धर्मपत्नी को इस बात का पता चला तब वह बहुत क्रोधित हो गयी। हमेशा क तरह जब संत श्री लीलारामजी उन लोगों के घर भोजन करने गये तो उसने गुस्से से भरकर कहाः
"चूल्हे में से खा।"
सामान्य रूप से ऐसा कहा जाता है कि जब कोई संत, महात्मा किसी गृहस्थी के घर जाते हैं उस वक्त यदि वे किसी भी प्रकार का प्रसाद लिए बिना ही, खाली हाथ लौट जाते हैं तो उस गृहस्थ के घर पर संकट आने का भय रहता है। सरव एवं करूणामय हृदय के संत श्री लीलारामजी ने भी तुलसीदास की धर्मपत्नी के कटुवचनों की तरफ ध्यान नहीं दिया और उन्हें गृहस्थ धर्म के ऋण से मुक्त किया। संत श्री लीलारामजी ने एक शब्द बोले बिना, क्रोध किये बिना, सीधे चूल्हे के पास जाकर, राख लेकर थोड़ी जीभ पर रखी, थोड़ी मस्तक पर रखी एवं सबको प्रणाम करके तुरंत ही वहाँ से निकल पड़े। किसी को पता तक न चला कि वे कहाँ गये।
एक बार संत श्री लीलारामजी किसी गाँव में जा रहे थे तब एक गरीब स्त्री अपने मृतक पुत्र को रास्ते में रखकर दूर बैठकर रो रही थी। इस बालक को अचानक रास्ते में सोया हुआ देखकर संत श्री लीलारामजी के श्रीमुख से एकाएक निकल पड़ाः
"बेटा ! बेटा ! उठ.... उठ"
संत श्री
लीलारामजी के
वचन सुनकर वह
मृतक बालक
तुरंत उठ खड़ा
हुआ और जाकर
संत श्री
लीलारामजी के
चरणों में जा
गिरा। वह
स्त्री तो यह
दैवी चमत्कार
देखकर
दौड़ती-दौड़ती
आयी और संत श्री
लीलारामजी के
पैरों पड़कर
खूब-खूब आभार
मानने लगी। यह
देखकर संत
श्री
लीलारामजी उस
स्त्री से
प्रार्थना
करने लगेः "माँ ! मैं
तुझसे
प्रार्थना
करता हूँ कि
यह बात तू किसी
से न कहना।"
परन्तु सत्य कहाँ तक छुप सकता है?
तप
करे पाताल में, प्रगट होये
आकाश।
रज्जब
तीनों लोक में, छिपे न हरि
का दास।।
थोड़े ही समय में गाँव के लोगों को इस चमत्कार का पता चल गया। 'लोगों को इस बात का पता चल गया है' – यह जानते ही संत श्री लीलारामजी तुरंत उस गाँव को छोड़कर चल पड़े।
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आत्म-साक्षात्कार के बाद पूज्य लीलारामजी महाराज केवल एक ही स्थान पर न रहे, वरन् जंगलों, पर्वतों एवं तीर्थस्थानों में भ्रमण करते रहे। उत्तर भारत के पहाड़ों पर उन्होंने अनेकों उच्च कोटि के संतों, महात्माओं, सिद्ध पुरुषों एवं तपस्वियों का संग किया। पाँचवे सिक्ख गुरु अर्जुनदेव ने संत-महात्माओं के संग एवं महिमा का सुंदर वर्णन करते हुए कहा हैः
साध
कै संगि मुख
ऊजल होत।
साध
संगि मलु सगली
खोत।।
साध
के संगि मिटै
अभिमानु।
साध
कै संगि
प्रगटै
सुगिआनु।।
साध
की महिमा बरनै
कउनु प्रानी।
नानक
! साध की सोभा
प्रभ माहि
समानि।।
'सत्पुरुषों के संग से मुख तेजस्वी होता है, सब (दुर्गुणरूपी) मल धुल जाते हैं। सत्पुरुष के संग से अभिमान दूर हो जाता है एवं सच्चा ज्ञान प्रगट होता है। सत्पुरुषों की महिमा को कौन बखान सकता है? नानकजी कहते हैं कि सत्पुरुषों की स्तुति प्रभु की स्तुति के समान है।'
पूज्य श्री लीलारामजी बापू के जीवन में संत-समागम की महत्ता का बड़ा ऊँचा स्थान है। जहाँ कोई संत, महात्मा दिखे कि वे उनका संग अवश्य करते। उन्होंने बाल्यकाल से किसी लौकिक विद्या का अध्ययन नहीं किया था, किन्तु साधु-संतों के संग से अपने जीवन में ज्ञान की ऐसी ज्योति जगाई थी जिससे वे जगत के उद्धारक पूजनीय महापुरुष बन गये। वे स्वयं कहते थेः
"साधु का संग मनुष्य को जस्ते में से सोना बनाता है। साधु कोई आकाश में से नहीं उतरते परंतु संतों के संग एवं उनके द्वारा लिखे गये सत्शास्त्रों के अभ्यास से मनुष्य साधु बनता है।"
वे स्वयं भी संतों के संग में रंगकर लाल (रत्न) बन गये थे। कितने ही वर्षों तक उन्होंने हरिद्वार, हृषिकेश, उत्तरकाशी, हिमालय की गुफाओं, कश्मीर, तिब्बत वगैरह स्थलों पर भ्रमण करके संत-समागम से वेदान्त एवं यौगिक क्रियाओं का खूब गहराई से अभ्यास किया था। वे संपूर्ण सिद्धियों को प्राप्त करके योगीराज बने। योगदर्शन में जिन आठ सिद्धियों का वर्णन आता है उनमें से एक भी सिद्धि ऐसी न थी, जो उन्होंने सिद्ध न की हो। इसलिए उनके भक्त उन्हें "कामिल गुरू" अथवा 'चमत्कारों के मालिक' कहा करते थे। गुरु नानक, संत ज्ञानेश्वर, कबीरजी, तुकारामजी, एकनाथजी महाराज जैसे असंख्य महान् संतों के जीवन भी ऐसे चमत्कारों से पूर्ण थे।
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