
प्रातः
स्मरणीय
पूज्यपाद संत
श्री आसाराम जी
बापू के पावन
सत्संग-प्रवचन
मुक्ति का
सहज मार्ग
हम धनवान होंगे या नहीं, यशस्वी होंगे या नहीं, चुनाव जीते या इसमें शंका हो सकती है परन्तु भैया ! हम मरेंगे या नहीं इसमें कोई शंका है ? विमान उड़ने का समय निश्चित होता है, बस चलने का समय निश्चित होता है, गाड़ी छूटने का समय निश्चित होता है परन्तु इस जीवन की गाड़ी के छूटने का कोई निश्चित समय है ?
आज तक आपने जगत का जो कुछ जाना है, जो कुछ प्राप्त किया है.... आज के बाद जो जानोगे और प्राप्त करोगे, प्यारे भैया ! वह सब मृत्यु के एक ही झटके में छूट जाएगा, जाना अनजाना हो जायेगा, प्राप्ति अप्राप्ति में बदल जायेगी।
अतः सावधान हो जाओ। अन्तर्मुख होकर अपने अविचल आत्मा को, निजस्वरूप के अगाध आनन्द को, शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लो। फिर तो आप ही अविनाशी आत्मा हो।
जागो.... उठो.... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा मे अथाह सामर्थ्य है। अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके।
सदा स्मरण रहे कि इधर-उधर भटकती वृत्तियों को बहकाओ नहीं। तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन मे लगाओ और व्यवहार –काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठा में जगे हुए महापुरूषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।
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तत्त्वज्ञान को लोकभोग्य बनाकर रखना हो तो स्वाभाविक है कई बार आये, कई ढंग से आये और श्रवण के साथ आम जनता का मनन भी होने लगे।
इस पुस्तक में पूज्यपाद संत श्री आसारामजी महाराज के सत्संग प्रवचन ज्यों के त्यों दिये गये हैं। इसमें पुनरावृत्ति स्वाभाविक है। अतः साधक गुणग्राही दृष्टि से लाभ उठाने की कृपा करेंगे।
श्री
योग वेदान्त
सेवा समिति
अमदावाद
आश्रम
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यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र
लोकोऽयं
कर्मबन्धनः।
तदर्थ
कर्म कौन्तेय
मुक्तसंगः
समाचर।।
'यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य-समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन ! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भली भाँति कर्त्तव्य कर्म कर।'
(भगवद्
गीताः 3.9)
सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माजी ने जीवों के दुःख की निवृत्ति का उपाय खोजा। जीव कर्म तो करते हैं लेकिन कर्म यज्ञ के निमित्त नहीं हैं तो जीव दुःख को पाते हैं, जन्म-जन्मांतर को पाते हैं, अशांति को पाते हैं। अतः ब्रह्माजी ने यज्ञ करने की सलाह भी दी और यज्ञ करने की सामग्री भी दी।
यज्ञ वह है जो सृष्टिकर्त्ता के स्वरूप में विश्रान्ति दिला दे। जो कोई कर्म है उसमें यज्ञबुद्धि कर दे तो वह कर्म कर्त्ता को बन्धनों से छुड़ाता है। कर्म में भोगबुद्धि कर दी तो वह कर्म कर्त्ता को बाँधता है। कर्म में फलासक्ति, कर्म में संग-आसक्ति, कर्म में अहंपुष्टि अगर मिलती है तो वह कर्म कर्त्ता को बाँधता है।
कर्म में अगर यज्ञबुद्धि आ जाय, कर्म में अगर उदारता आ जाय, स्नेह आ जाय तो वह कर्म कर्त्ता को अपने स्वरूप का मान करा देता है।
कुछ लोग आलस्य, निद्रा के वश होकर कर्म का त्याग करते हैं वह तामसी त्याग है। तामस त्यागवाला मूढ़ योनि को प्राप्त होता है। वृक्ष, पाषाण आदि मूढ़ योनियाँ हैं। कुछ लोग कर्म को दुःखरूप समझकर कर्म का त्याग करते हैं। यह राजस त्याग कहा जाता है। ये लोग दुःखयोनि को प्राप्त होते हैं।
कुछ लोग ऐसे हैं जो कर्म के रहस्यों को समझकर सात्त्विक त्याग करते हैं। अर्जुन युद्ध के मैदान से रवाना हो जाना चाहता है तो भगवान श्रीकृष्ण ने राजसी त्याग की अपेक्षा सात्त्विक त्याग का महत्त्व बताया है।
यज्ञार्थात् कर्म यानी यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्म। ऐसे कर्म सात्त्विक कर्म हैं। प्रकृति के मूल में देखा जाय, सृष्टि के मूल में देखा जाये तो यज्ञ हो रहा है। भगवान भास्कर प्रकट होते हैं, अनन्त-अनन्त जीवों को प्राणशक्ति देते हैं। पक्षी किल्लोल करते हैं, पेड़ पौधे लहलहाते हैं। यहाँ तक कि रोगी मनुष्य भी प्रभात काल में कुछ आश्वासन पा लेते हैं। सूर्यनारायण सतत यज्ञकर्म कर रहे हैं। चन्द्रमा यज्ञ कर्म कर रहे हैं। दरिया उछल कूद करके भी यज्ञ ही कर रहा है। पृथ्वी माता भी यज्ञ कर रही है प्रकृति के साथ तादात्म्य करें तो प्रकृति की गहराई में स्नेह है, उदारता है। प्रकृति का स्नेह और उदारता अपने परमात्म-स्वभाव से आया है। जीव का भी पारमार्थिक स्वभाव स्नेह और उदारता है लेकिन स्वार्थपूर्ण कर्म करता है तो स्नेह और उदारता संकीर्णता और शुष्कता में बदल जाती है। आदमी जब भीतर से संकीर्ण और शुष्क होता है तो उसके कर्म बाँधने वाले होते हैं। भीतर से जब स्नेह और उदारता से भर जाता है तो उसके कर्म परमात्मा से मिलाने वाले होते हैं। स्नेह और उदारता से किये जाने वाले यज्ञ-कर्म हैं। संकीर्णता से किये जाने वाले कर्म बन्धनकारक कर्म हैं।
व्यक्तित्व की संकीर्णता कुटुम्ब से अन्याय करवा देगी। कौटुम्बिक संकीर्णता पड़ोस से अन्याय करवा देगी। पड़ोस की संकीर्णता गाँव से अन्याय करवा देगी। गाँव की संकीर्णता प्रान्त से अन्याय करवा देगी। प्रान्त की संकीर्णता राज्य से अन्याय करवा देगी। राज्य की संकीर्णता राष्ट्र से अन्याय करवा देगी। राष्ट्र की संकीर्णता विश्व से अन्याय करवा देगी। यह नाम-रूप की आसक्ति और संकीर्णता ही नाम-रूप के आधार स्वरूप सच्चिदानन्द परमात्मा से मिलने में बाधा बन जाती है।
यज्ञ कर्म ये हैं जो तुम्हारी संकीर्णता छुड़ा दे और उदारता भर दे। ....तो जो कोई कर्म किये जायें वे यज्ञार्थ किये जायें, सेवा निमित्त किये जायें। आँखों को बुरी जगह जाने नहीं देना यह आँखों की सेवा है। वाणी को व्यर्थ नहीं खर्चना यह वाणी की सेवा है। मन को व्यर्थ चिन्तन से बचाना यह मन की सेवा है। बुद्धि को राग-द्वेष से बचाना यह बुद्धि की सेवा है। अपने को स्वार्थ से बचाना यह अपनी सेवा है और दूसरों की ईर्ष्या या वासना का शिकार न बनाना यह दूसरों की सेवा है। इस प्रकार का यज्ञार्थ कर्म कर्त्ता को परमात्मा से मिला देता है।
वास्तव में कर्त्ता का स्वभाव परमात्मा से मिलता-जुलता स्वभाव है। कर्त्ता ने बचपन देखा, कर्त्ता ने विफलता देखी। देखने वाला कर्त्ता तो वही का वही रहा... साक्षी। ऐसे ही सृष्टि की उत्पत्ति हुई, स्थिति हुई, रूपान्तर हुआ फिर भी सृष्टिकर्त्ता वही का वही। तो जीव-कर्त्ता और सृष्टिसर्जन-कर्त्ता दोनों का स्वभाव एक है। ईश्वर की आत्मा और अपनी आत्मा वास्तव में एक है। लेकिन अभागी वासनाओं ने, अभागे स्वार्थ ने हमको उस परम औदार्य स्वरूप और स्नेह की मधुरता से वंचित कर दिया।
जीवन में ऐसे कर्म किये जायें कि एक यज्ञ बन जाय। दिन में ऐसे कर्म करो कि रात को आराम से नींद आये। आठ मास में ऐसे कर्म करो कि वर्षा के चार मास निश्चिन्तता से जी सकें। जीवन में ऐसे कर्म करो कि जीवन की शाम होने से पहले जीवनदाता से मुलाकात हो जाय। ये सब कर्म यज्ञार्थ कर्म कहे जाते हैं।
तामस त्याग अधम योनि में ले जाता है। राजस त्याग दुःख देता है। सात्विक त्याग कर्त्ता को यज्ञार्थ कर्म कराता है। संयमी जीवन जीते हुए बच्चे को पेट में रखती है, सँभालती है यह भी यज्ञ है। अपनी सुख-सुविधा छोड़कर बच्चे को पालती-पोसती है यह भी यज्ञ है। संकीर्णता छोड़ते हुए, व्यक्तिगत विषय-वासना की लालच छोड़ते हुए जो कर्त्तव्य कर्म किये जाते हैं वह यज्ञ है।
यज्ञ केवल वेदी में ही, केवल यज्ञकुण्ड में ही नहीं होता, यज्ञ बाजार में भी हो सकता है, मंदिर में भी हो सकता है, कोर्ट में भी हो सकता है, स्मशान में भी हो सकता है। यज्ञ एकान्त में भी हो सकता है, भीड़ में भी हो सकता है। यज्ञार्थ कर्म कर्त्ता को अपने प्रियतम स्वभाव से मिला देता है।
क्रिया में बन्धन नहीं होता, क्रिया के भाव में बन्धन और मुक्ति निर्भर है। कर्म में बन्धन और मुक्ति नहीं, कर्त्ता के भाव में बन्धन और मुक्ति है। कर्त्ता किस भाव से कर्म कर रहा है ? राग से प्रेरित होकर कर रहा है ? द्वेष से प्रेरित होकर कर रहा है ? वासना से प्रेरित होकर कर रहा है ? .....कि परमात्मा-स्नेह से कर रहा है ?
वासना-तृप्ति के लिए जो कर्म किया जाता है वह कर्त्ता को बाँधता है। वासना-निवृत्ति के लिए जो यज्ञार्थ कर्म किये जाते हैं वे कर्त्ता को मुक्त स्वभाव में जगा देते हैं। कर्म किये बिना कोई रह नहीं सकता। अत्यंत आलस्य और प्रमाद में पड़े रहने से तो सकाम कर्म करना भी अच्छा है। आज का मनुष्य जहाँ स्वार्थ दिखता है वहाँ तो बड़ी छटपटाहट के साथ कार्य करता है। जहाँ देखता है कि अपना कोई बाह्य स्वार्थ सिद्ध नहीं हो रहा है तो वहाँ कर्म में प्रवृत्त नहीं होता। आज के कर्त्ता को पता नहीं कि स्वार्थ से प्रेरित होकर जो कर्म करता है वही कर्म उस बेचारे को बाँध देता है, अशान्त कर देता है, परमात्म-प्राप्ति की योग्यताएँ क्षीण कर देता है।
'स्वामी जी ! हम यज्ञार्थ कर्म करें, निष्काम भाव से कर्म करें, सेवाभाव से कर्म करें तो फिर हमारा गुजारा कैसे होगा ? सब लोग सेवा भाव से कर्म करने लग जायें तो गुजारा कैसे होगा ?' प्रश्न हो सकता है।
प्रकृति की गहराई में सब कार्य सेवाभाव से ही हो रहे हैं। सूर्यनारायण सेवाभाव से प्रकाश दे रहे हैं, चन्द्रमा सेवाभाव से शीतलता बरसा रहे हैं, वनस्पति को, औषधियों को पुष्ट कर रहे हैं, हवाएँ सेवाभाव से बह रही हैं, सागर सेवाभाव से लहरा रहा है। तुम्हारी इन्द्रियाँ भी तो सेवाभाव से तुम्हारे लिए कार्य कर रही है, तभी तो शरीर टिका है। आँख पदार्थ को देखती है लेकिन जिद्द नहीं करती कि पदार्थ मैंने देखा इसलिए मेरा हो गया, वह मुझमें भर दो। अगर पदार्थ को आँख में भर दिया तो आँख की सलामती नहीं रहेगी।
आँख पदार्थ को देखती है, हाथ उसे उठाता है। अब हाथ अगर आग्रह करे कि मैंने उठाया, मेरा हो गया, वह मुझमें भर दो तो यह सम्भव नहीं। अगर सम्भव भी कर दो तो हाथ निकम्मे हो जायेंगे। आँख ने देखा, यज्ञ कर। हाथ ने उठाया, मुँह को दे दिया, यज्ञ हो गया। मुँह चबाता है और गले को दे देता है। गला वह पदार्थ पेट को पहुँचा देता है। पेट उसमें से रस बनाकर शरीर में सब जगह भेज देता है। बाकी बचा हुआ त्याज्य कचरा अंतड़ियों से गुजरकर बाहर निकाल दिया जाता है। पेट अगर त्यागने योग्य चीज को पकड़ रखे तो बीमार हो जाय। शरीर के तमाम अंगों को देने योग्य रस का संग्रह कर बैठे तो अजीर्ण हो जायेगा, बीमारी से पीड़ित हो जायेगा। शरीर का पूरा तंत्र यज्ञस्वरूप चल रहा है।
प्रकृति की गहराई में यज्ञ हो रहा है। इसके साथ तादात्म्य कर दो तो प्रकृति के मूल स्वरूप परमात्मा को पा लोगे। जो भी मनुष्य यज्ञार्थ कर्म करते हैं वे मुक्ति को पाते हैं और यज्ञ से विरूद्ध कर्म करते हैं वे कर्म में बँध जाते हैं, दुःखों में घसीटे जाते हैं।
सुनी है कहानी। नगर के राजमार्ग से राजा की सवारी जा रही थी। एक बुढ़िया का लड़का कहने लगाः "माँ ! मुझे राजा से मिलना है।"
माँ बोलीः "बेटे ! हम गरीब लोग.... तेरे पिता कई वर्ष पूर्व चल बसे..... अपनी कोई पहुँच नहीं है। राजा से मिलना कोई साधारण बात नहीं है।"
"कुछ भी हो, माँ ! मुझे राजा से मिलना ही है।" बेटे ने हठ कर ली। माँ ने युक्ति बताते हुए कहाः
"बेटा ! एक उपाय है। राजा का महल बन रहा है वहाँ जाकर काम में लग जा। सप्ताह के बाद तनख्वाह मिलेगी तो लेना मत। बस उत्साह से काम में लगे रहना।"
लड़का काम में लग गया। बड़ी तत्परता और चाव से लगा रहा। एक हफ्ता बीता, दूसरी बीता, तीसरा भी गुजर गया। लड़का तनख्वाह लेने का इन्कार करता और काम बड़े उत्साह के साथ करता। वजीर ने देखाः अजीब लड़का है ! बढ़िया काम करता है और अपनी मजदूरी के पैसे नहीं लेता ! वजीर के दिल पर लड़के के लिए अच्छा प्रभाव पड़ा। उसने जाकर राजा को बताया तो राजा ने उस बच्चे को बुलाया। उत्साह और तत्परता एवं अहोभाव से काम करने वाले बच्चे की वाणी में माधुर्य था, दिल में उदारता थी। राजा को मिलने में जो स्नेह था वह उमड़ आया। राजा के दिल पर बच्चे का जादू-सा प्रभाव पड़ा। राजा बोलाः
"आज से यह लड़का महल बनाने के काम में नहीं अपितु मेरी अंगत सेवा के कार्य में लगा दिया जाय।"
वजीर बोलाः "जो आज्ञा राजन् !"
बच्चा राजा के महल में सेवा कार्य करने लगा। महल का खान-पान और निवास तो मिलना ही था। राजमहल के भोजन और निवास की इच्छा रखकर कोई कार्य करे तो उसको ऐसा भोजन और निवास मुश्किल से मिलता है। सेवा के लिए सेवा करने वाले बच्चे को भी भोजन और निवास मिल ही गये। मानो बच्चे का काम करना काम न रहा, यज्ञ हो गया।
'सेवा के लिए शरीर को टिकाना है' यह भाव आ जाय तो जीवन यज्ञ बन जाय। भोग के लिए शरीर को टिकाया तो बन्धन हो गया। परहित के कार्य करने के लिए शरीर को तन्दुरूस्त रखना यह यज्ञ हो गया। अपने को कुछ विशेष बनाने के लिए शरीर का लालन-पालन किया तो बन्धन हो गया।
जो यज्ञार्थ कर्म करते हैं वे बड़े आनन्द से जीते हैं, बड़ी मौज से जीते हैं। जितना-जितना निःस्वार्थ भाव होता है उतना-उतना भीतर का रस छलकता है। मन बुद्धि विलक्षण शक्ति से सम्पन्न हो जाते हैं।
विधवा माई के बच्चे को राजा की सेवा मिल गई, राजा का संग मिल गया उसकी बुद्धि ने कुछ विशेष योग्यता प्राप्त कर ली। रानी का हृदय भी उसने जीत लिया।
व्यक्ति जितना निःस्वार्थ होता है उतनी उसकी सुषुप्त जीवनशक्ति विकसित होती है। आदमी जितना स्वार्थी होता है उतनी उसकी योग्यताएँ कुण्ठित हो जाती हैं। अपने अहं को पोसने के लिए आदमी जितना काम करता है उतना ही वह अपनी क्षमताएँ क्षीण करता है। श्रीहरि को प्रसन्न करने हेतु जितना कार्य करता है उतनी उसकी क्षमताएँ विकसित होती हैं।
उस बच्चे की क्षमताएँ विकसित हो गईं। उसने अपने सुन्दर कार्यों से राजा-रानी का हृदय जीत लिया। दोनों के दिल-दिमाग में बच्चे की निर्दोषता एवं कार्य की तत्परता का प्रभाव छा गया। एक दिन राजा ने रानी से कहाः
"हमें कोई सन्तान नहीं है। इस बालक को गोद ले लें और अपना राजकुमार घोषित कर दें तो ?"
रानी हर्ष से बोल उठीः "हाँ हाँ..... मैं भी तो यही चाहती थी लेकिन आपसे बात करने में जरा संकोच होता था। आज आपने मेरे दिल की ही बात कह दी अब विलम्ब क्यों ? शुभस्य शीघ्रम्। राजपुरोहित को बुलाइये और....।"
दोनों ने निर्णय ले लिया और बच्चे को अपना पुत्र घोषित करके राजतिलक कर दिया। महल में और सारे नगर में आनन्दोत्सव मनाया गया। राजमार्ग पर दोनों की शोभायात्रा निकली। राजा और राजकुमार का अभिवादन करने के लिए सड़कों पर प्रजा की भीड़ हो गई। कुमार ने अपनी बुढ़िया माँ को देखा। उसके नेत्र प्रफुल्लित हो उठे। अपनी वात्सल्यमयी माँ से मिलने के लिए वह लालायति हो उठा। वह राजा से बोलाः
"महाराज श्री ! वहाँ देखो, मेरी माँ खड़ी है जिसने मुझे आपसे मिलने का रास्ता दिखाया था। मैं उसके चरण-स्पर्श करने को जाऊँ ?"
"तू अकेला ही नहीं, मैं भी तेरे साथ चलता हूँ।"
दोनों रथ से नीचे उतरे और जाकर बुढ़िया को प्रणाम किया। बुढ़िया के पास कैसी अदभुत कुंजी थी सत्संग की ! उसने बेटे को सिखाया था कि तू निष्काम भाव से कर्म कर। अन्यथा, लड़के के पास कोई हथियार नहीं था कि राजा को वश कर ले। उस बुढ़िया के पास भी कोई हथियार नहीं था कि राजा आकर उसके पैर छुए।
निष्कामता एक ऐसा अनुपम हथियार है कि जीव को ईश्वर के पास नहीं जाना पड़ता है, ईश्वर ही जीव के पास आ जाता है। बुढ़िया को राजमहल के द्वार नहीं खटखटाने पड़े, राजा स्वयं उसके घर आ गया। निष्कामता से उस बच्चे का चित्त इतना विकसित हुआ, इतना उन्नत हुआ कि वह स्वयं राजा बन गया। राजाओं का भी जो राजा है परमात्मा, उसको भी प्रसन्न करना चाहें तो यज्ञार्थ कर्म किये जायें। यज्ञार्थ कर्म करने से हृदय में तृप्ति होती है और परमात्मा प्रसन्न होते हैं। मनु महाराज कहते हैं-
"जो कार्य करने से तुम्हारा हृदय प्रसन्न होता है, जो महापुरूषों के द्वारा अनुमोदित है और शास्त्र-सम्मत है वह कार्य सत्कार्य है !"
यहाँ कोई आपत्ति उठा सकता है कि शराबी का हृदय तो शराब पीने से प्रसन्न होता है, जुआरी का हृदय जुआ खेलने से खुश होता है, भोगी का हृदय भोग भोगने से खुश होता है तो ये पुण्यकार्य हैं ? सत्कार्य हैं ?
नहीं। ये कार्य सत्कार्य नहीं। सत्कार्य की व्याख्या में हृदय की प्रसन्नता के अलावा दो शर्तें और भी हैं- कार्य महापुरूषों के द्वारा अनुमोदित हो और शास्त्र-सम्मत हो।
महापुरूषों के द्वारा वही बात अनुमोदित होगी जो शास्त्र-सम्मत हो, सदाचारयुक्त हो, कल्याणकारी हो।
जाति सम्प्रदाय, समाज, वर्ण आदि कुछ हद तक तो उचित हैं, अच्छे हैं। ये सब आदमी के कुलधर्म आदमी की वासनाओं को नियन्त्रित करने में उपयोगी है। जातीयता और सामाजिकता व्यक्ति के कार्यों को व्यक्तिगत न रखकर समाज तक पहुँचाने में सहायभूत होते हैं। लेकिन जातीयता का भेदभाव करके मनुष्य मनुष्य से जब नफरत करने लगता है तो वही जातीयता खतरा पैदा करती है। ऐसे ही सम्प्रदाय कुछ नीति-नियम बनाकर हमारी वासनाओं को नियन्त्रण करके हमें ऊपर उठाता है तब तक तो ठीक है लेकिन एक सम्प्रदाय दूसरे सम्प्रदाय से, एक पार्टी दूसरी पार्टी से दलबन्दी करके हमारे चित्त में संकीर्णता के संस्कार आबद्ध करते हैं तो गड़बड़ है। सम्प्रदाय या पार्टीबाजी हमें अपने ही चक्र में बाँधकर रखना चाहते हैं तो वे हानिकारक हो जाते हैं।
सब चीजें आदमी की योग्यता पर निर्भर करती हैं। कोई चीज एक आदमी के लिए हितकर है और दूसरे के लिए अहितकर भी हो जाती हैं। जैसे, "नारायण हरि" करके भिक्षा माँगकर खाना संन्यासी के लिए हितकर है लेकिन गृहस्थी आदमी अगर भिक्षा का अन्न खाय तो उसके लिए हितकर नहीं है। विरक्त महापुरूष शिखा-सूत्र-यज्ञोपवित का त्याग कर के संन्यास ले लें तो उनके लिए हितकर है लेकिन भोगी आदमी शिखा-सूत्र-यज्ञोपवित का त्याग कर दे, नीति नियम छोड़कर संन्यासी का वेश धारण कर ले तो यह अहितकर है।
कुछ नीति-नियम, रीत-रिवाज समाज को ऊपर उठाने के लिए हैं लेकिन उन्हीं रीति-रिवाजों को पकड़े रखकर ऊपर उठने के बजाय आदमी जब संकीर्ण दायरा बना लेता है, जटिल हो जाता है तो वे बन्धन कारक हो जाते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- "जो कर्म करते हो, यज्ञार्थ कर्म करो।"
लोग फल तो खाना चाहते हैं लेकिन फलदायी वृक्ष को काट देते हैं। उन्नत होने चाहते हैं, यश-सुख-आनन्द चाहते हैं लेकिन यशस्वी होने के, आनन्दित होने के, सुखी होने के निष्काम कार्य में सकामता का कुल्हाड़ा मार देते हैं।
जितना-जितना यज्ञबुद्धि से कर्म होता है उतना-उतना कर्त्ता अपने आत्म-स्वभाव में जगता जाता है। जितना स्वार्थबुद्धि से कर्म करता है उतना-उतना कर्त्ता पर स्वभाव में प्रविष्ट होता जाता है।
स्वधर्मे
निधनं श्रेयः परधर्मो
भयावहः।
स्वधर्म, स्वकर्म, अपने हिस्से आये हुए सत्कृत्य, अपनी जवाबदारी के कर्त्तव्यकर्म करते-करते मर जाना अच्छा है लेकिन परधर्म भयावह है। माता-पिता का स्वधर्म है बच्चों का पालन-पोषण करना। माँ बच्चे का लालन-पालन करती है, यह यज्ञकर्म है। लेकिन माँ अगर बाद में सोचने लगे कि बच्चा अब बड़ा हो गया, जवान हो गया, कमाने लगा, अब मुझे सुख दे, तो यह गड़बड़ हो गई। अब माँ को सुख देना बच्चे का कर्त्तव्यकर्म है लेकिन माँ की अपेक्षा बनी रही उससे सुख पानी की तो, यह यज्ञकर्म में विघ्नरूप बन जाएगा। अपने हिस्से का कर्त्तव्यकर्म करते जाओ। दूसरा इसका बदला क्या देगा उधर ध्यान दिया तो यज्ञार्थ कर्म नहीं रहा।
सेवा करने वाला सामने वाले के गुणदोष देखेगा तो सेवा नहीं कर पायेगा। यज्ञार्थ कर्म करते जाओ। अपना कर्त्तव्य निभाते जाओ।
कोई सुखी आदमी बाजार से गुजर रहा था। रास्ते में एक बीमार आदमी अकेला पड़ा था, खाँस रहा था, निःसहाय होकर रोग से पीड़ित हो रहा था। बड़ा लाचार दिखता था। सुखी आदमी ने पूछाः
"सेवा करने वाला, दवाई इलाज करने वाला कोई नहीं है ?"
"बाबू जी ! मैं अकेला हूँ। दुनियाँ में मेरा कोई नहीं है.....!"
उस आदमी को दया आ गई। उठवाकर रोगी को अपने घर ले आया। डॉक्टर को बुलवाकर इलाज करवाया। बिस्तर पर सुलाया। यह है यज्ञार्थ कर्म। अभी तक कर्त्ता का सात्त्विक भाव है।
रोगी का इलाज होता रहा। वह खाँसता रहा। कुछ आराम भी महसूस करता रहा। कर्त्ता के मन में उसे देखकर विचार आयाः "यह पड़ा था फुटपाथ पर। मैं दया कर के इसे यहाँ ले आया हूँ। ऐसा काम और कोई नहीं कर सकता।"
वह आदमी अब सात्त्विकता में से राजस में आ गया। अपने आपको बड़ा सेवाभावी समझने लगा।
कुछ समय और बीता। खाँसने वाले रोगी ने खाँसते-खाँसते दीवार पर थूक दिया, गन्दगी कर दी। अब कर्त्ता को आ गया गुस्सा। वह बोल उठाः "तुम लोग तो फुटपाथ के ही अधिकारी हो। चल, निकल जा बाहर'। निःसहाय रोगी को घर से बाहर निकाल दिया। कर्त्ता तमस् से आक्रान्त हो गया।
प्रारम्भ में यज्ञार्थ कर्म तो हुआ। कर्त्ता सावधान नहीं रहा तो रजस् आ गया। रजस् के पीछे तमस् भी आ गया।
रजस् तमस् जब आने लगे तब कर्त्ता को सावधान होकर समझना चाहिए, सोचना चाहिये किः 'मैं लाया क्या था ? ले क्या जाना है ? जगन्नियन्ता ने जो कुछ दिया है वह उसी की सेवा में लग जाये, यही जीवन की कृतत्यता है।' ऐसा समझकर कर्त्ता अगर यथायोग्य कार्य करता है तो वह कार्य यज्ञरूप बन जायेगा, अपने आनन्द-स्वरूप, सुख-स्वरूप, मुक्त-स्वरूप आत्मदेव में जगने के लिए काबिल होता जायेगा। सब कर्म यज्ञार्थ करे और यथायोग्य करे। ऐसा नहीं कि यज्ञार्थ कर्म में कुत्ते को खाने के लिए घास डाल दे और गाय को रोटी खिला दे। यह कोई यथायोग्य कार्य नहीं है।
कर्त्ता यथायोग्य कर्म तो करे लेकिन अपने पुण्य कार्य का, यज्ञार्थ कार्य का, सत्कर्म का अहंकार न करे। पानी का ग्लास कह दे कि मैं लोगों की प्यास बुझाता हूँ तो वह पागल है। बल्ब कह दे कि मैं अन्धकार मिटाता हूँ तो वह पागल है। बल्ब को जहाँ से अन्धकार मिटाने की शक्ति मिलती है उसको भूलकर वह स्वतन्त्र रीति से अन्धकार नहीं मिटा सकता। प्यास बुझाने का अहंकार करने वाला ग्लास अपने मूल स्रोत पानी के बिना कैसे मिटा सकता है ?
ऐसे ही यह कर्त्ता अनन्त चैतन्य सत्ता से जुड़ा है, विश्वेश्वर से जुड़ा है, परमात्मा से जुड़ा है। उस परमात्मा से अपने को अलग करके अगर कोई सत्कर्म करने का अहंकार करता है तो कर्त्ता बँध जाता है।
आपके पास जो कुछ है वह यज्ञार्थ कर्म में लगा दो तो आपको और ज्यादा मिलता जायेगा। आपके पास जो कुछ है उसको स्वार्थ में संकीर्ण कर दो तो मिलना कम हो जायेगा और जो है वह परेशानी पैदा कर देगा।
एक छोटी-सी कहानी है। एक बार नदी और तालाब के बीच 'तू-तू.... मैं-मैं' हो गई। तालाब ने नदी से कहाः "पगली ! रूक जा। भागी जा रही है नादान ! कल-कल.... छल-छल गुनगुनाती, भागती, कितनी टक्करें सहती हुई दौड़ी जा रही हैं ! वहाँ खारा समुद्र है। अपना बिलौरी काँच जैसा निर्मल जल बहाती वहाँ जायेगी तो मिट जायेगी, नष्ट हो जायेगी। जरा रूक जा, थाम ले अपने आपको। वह खारा दरिया तुझे देगा क्या ? वह तो कृतघ्न है। कई नदियाँ उसमें समा गई। तेरा अस्तित्व भी नष्ट भ्रष्ट हो जाएगा।"
नदी ने कहाः "भैया ! रूकना, थमना मेरा स्वभाव नहीं है। मैं आलसी नहीं हूँ, प्रमादी नहीं हूँ। मुझे तो बहने दें.. चलने दें। मेरा जीवन तो पक्षपात रहित परोपकार के लिए ही है 'सर्वजनसुखाय..... सर्वजनहिताय' मेरा जीवन है। ऐसा नहीं कि गाय आयी तो मीठा जल दूँ और शेर आये तो जहर डाल दूँ, सज्जन नहाये तो शीतलता दूँ और दुर्जन नहाये तो पानी गर्म कर दूँ। ना.... ना..... । मेरा तो स्वभाव है सबके लिए निरन्तर बहते रहना। लोग 'गंगे हर... यमुने हर.... नर्मदे हर...' करें चाहे न करें लेकिन यज्ञार्थ जीवन जीना हमारा स्वभाव है।"
तालाब ने किसी को देना सीखा नहीं। संग्रह करना उसका स्वभाव है। समय पाकर उसका पानी गन्दा हो गया, बदबू आने लगी, मच्छर हो गये इर्दगिर्द। वहाँ से रोग के कीटाणु फैलने लगे। लोगों ने देखा कि तालाब गन्दगी फैलाता है, रोग फैलाता है तो नगरपालिका ने उसमें नगर का सारा कूड़ा-कचरा डालकर तालाब को भर दिया। जो संग्रह करना चाहता था वह गंदगी से भर गया। उसका अस्तित्व मिट गया। बहने वाली सरिता सदा बहती रही। बादलों ने उसको समृद्ध बनाया। पहाड़ों पर जमे हुए बर्फ ने गर्मी के मौसम में पिघलकर उसे वैभववान बनाया। सरिता सदा गुनगुनाती रही और तालाब का अस्तित्व मिट गया।
जिसके जीवन में यज्ञार्थ कर्म होते हैं उसकी योग्यताएँ निखरती रहती हैं। नया-नया परमात्मा-रस उसके द्वारा फैलता रहता है। जो लोग अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर बाहर का सुख पाने के लिए, बाहर की वाहवाही और यश पाने के लिए, धन के लिए, मान के लिए, अहं पोसने के लिए, राग-द्वेष और मोह-मदिरा से उन्मत्त होकर कर्म करते हैं वे अपने को बाँध देते हैं। जो यज्ञार्थ कर्म करते हैं वे परमात्मा को पा लेते हैं।
प्रकृति के मूल में देखा जाए तो उदारता और स्नेह भरा है। ऐसा कौन-सा हमारा पुरूषार्थ है कि हम परमात्म-साक्षात्कार कर सकें ? यह परमात्मा की उदारता है हमें मनुष्य जन्म मिला है। यह परमात्मा की उदारता है ऐसी बढ़िया बुद्धि मिली है। .....और यह भी उदारता है परमात्मा की कि श्रद्धा के साथ विवेक है। यह भी उसी की उदारता है कि हम सत्संग में जा सकते हैं। यह भी उदारता है कि सत्संग सुनकर हम मनन कर सकते हैं, मनन करते-करते यज्ञार्थ कर्म में आगे बढ़ सकते हैं। .....और यह भी उसी की उदारता है कि एक दिन वह वह नहीं रहेगा... हम हम नहीं रहेंगे... सब एकाकार.... हम न तुम... दफ्तर गुम।
ऐसी महान् पदवी पर पहुँच सकने वाला जीव अगर स्वार्थप्रेरित, हल्के, निकम्मे कृत्य करता है, वासनाएँ पूरी करने के लिए कर्म करता है तो जन्मान्तर में निम्न योनियों में चला जाता है, वृक्ष बन जाता है, पशृ-पक्षी कीट पतंग बन जाता है। आलसी, प्रमादी जीवन जीने वाला जीव मूढ़ योनियों को पाता है, कँटीला पेड़ बन जाता है, पौधा बन जाता है। कभी पानी मिला न मिला। ऐसे ही दुःख भोगता है और समय पाकर पानी के बिना सूख जाता है। जब वह मनुष्य था तब किसी को कुछ दिया नहीं, किसी की सेवा की नहीं। ऐसे जीव बारिश के समय पैदा तो हो जाते हैं लेकिन बाद में बारिश के बिना तड़प-तड़प कर मर जाते हैं, सूख जाते हैं। दूसरों के काम आने वाले पेड़-पौधे भी अच्छी तरह जीते हैं। गाय-भैंस भी अच्छी होती है, उपयोगी होती है तो चारा मिलता है। उपयोगिता कम होते ही चारा पानी का हिसाब बदल जाता है।
ऐसे ही तुम्हारा तन, तुम्हारा मन, तुम्हारा धन, तुम्हारी बुद्धि आदि ' बहुजनसुखाय ...... बहुजनहिताय ' प्रवृत्ति करके अगर सर्वेश्वर के कार्य में काम आते हैं तो सर्वेश्वर की सत्ता-स्फूर्ति-बल-बुद्धि-ओज-तन्दुरूस्ती आदि सब मिलता रहता है, समझ बढ़ती रहती है। अगर स्वार्थ में आ गये तो बुद्धि संकीर्ण बन जाती है।
यज्ञार्थ कर्म का अर्थ हैः कर्त्ता को पहले भीतर से उत्साह होना चाहिए कि यह सेवाकार्य मुझे करना चाहिए। जबरन सेवाकार्य नहीं होता। ऐसा भी नहीं कि 'मैं सेवा कर रहा हूँ.... तुम सहयोग दो..... सहयोग दो.....।' सेवा के नाम से पैसे इकट्ठे करके महल बाँधकर रहने लगे यह यज्ञार्थ कर्म नहीं है। यज्ञार्थ कर्म अपने से शुरू होता है। दान का प्रारम्भ अपने घर से, सेवा का प्रारम्भ अपने शरीर से। जो लोग अपने आलीशान बंगले बना लेते हैं, महल खड़े कर देते हैं, विदेशी बैंकों में धन राशि जमा कर लेते हैं और चिल्लाते हैं कि हम राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं तो यह धोखा है।
सचमुच में अगर सेवा है तो आत्म-साक्षात्कार हो जाय। सचमुच में अगर सेवा है तो रात्रि को बढ़िया नींद आयेगी। सचमुच में अगर सेवा है तो चित्त में परमात्मा का ध्यान करने की रूचि जग जाएगी।
कर्त्ता को कर्म ऐसा करना चाहिए कि कर्म करते-करते वासना निवृत्त हो जाय। कर्त्ता को जीवन ऐसा बना लेना चाहिए कि वह जन्म-मरण से पार हो जाय।
जो लोग बच्चे पैदा करते रहते हैं, प्रजा पर कर (टेक्स) बढ़ाते रहते हैं, अपने महल बनाते रहते हैं और झंडा उठाये देश की सेवा का, राष्ट्र की सेवा का तो यह उनका यज्ञकर्म नहीं है, अहंकर्म है। अहंकर्म आदमी को बेचैन कर देता है और यज्ञकर्म आदमी को यज्ञपुरूष के साथ, परमात्मा के साथ मिला देता है।
यज्ञार्थत्कर्मणोऽन्यत्र
लोकोऽयं
कर्मबन्धनः।
तदर्थं
कर्म कौन्तेय
मुक्तसंगः
समाचर।।
''यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य-समुदाय कर्मों से बँधता है। इसलिए हे अर्जुन ! तू आसक्ति से रहित होकर यज्ञ के निमित्त ही भलीभाँति कर्त्तव्य कर।"
स्वार्थपूर्वक कर्म करने से तो अल्प चीज मिलती है जबकि निःस्वार्थ होकर कर्म करने से अनन्त परमात्मा मिलता है।
यज्ञो
दानं तपश्चैव
पावनानि
मनीषिणाम्।
'यज्ञ, दान और तप-ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरूषों को पवित्र करने वाले हैं।'
(भगवद् गीताः 18.5)
वह मनुष्य बुद्धिमान है जो फल और आसक्ति को त्यागकर केवल प्रभु-प्रीत्यर्थ कर्म करता है। यज्ञ, दान और तप से बुद्धि पावन होती है। संसार के जो भी दुःख हैं वे सब प्रज्ञा के दोष से हैं, बुद्धि की मन्दता से हैं। स्वार्थ से कर्म करने से बुद्धि मन्द हो जाती है और निःस्वार्थ कर्म करने से बुद्धि खिल उठती है।
लोग भगवान की आराधना-उपासना करते हैं, अर्चना-सेवा-पूजा करते हैं उसमें भी फलस्वरूप कुछ मिल जाये, अपना ऐहिक कार्य सिद्ध हो जाय ऐसी आकांक्षा रखते हैं। ऐसी सेवा-पूजा में भीतर का रस नहीं खुलता। सहज भाव से सेवा-पूजा होती है, हम भगवान के हैं.... भगवान हमारे हैं, ऐसे आत्मिक भाव से स्नेहपूर्वक सेवा पूजा होती है तो वह जल्दी फल जाती है, भीतर आनन्द का स्रोत खोल देती है। इससे प्रज्ञा पावन होने लगती है।
मंदिर में कुछ स्वार्थ-भाव का संकल्प लेकर दर्शन करने जाते हैं तो यह कहने भर का दर्शन है और निःस्वार्थ भाव से जाते हैं तो दर्शन का मजा कुछ निराला ही है। जितना-जितना हृदय में निःस्वार्थता भरते जायेंगे उतना-उतना हृदय आन्तरिक सुख से छलकता जायेगा, अन्तर ज्योत से अलोकित होता जायेगा। हृदय जितना स्वार्थ से भरा होगा उतना आदमी पराधीन होता जाएगा। यह काम करूँ तो मुझे यह फायदा हो जायेगा...... वह काम करूँ तो मुझे वह फायदा हो जाएगा..... ऐसा सोचविचार करके स्वार्थपूर्ण कर्मों में उलझे रहने वाले लोगों का दिल-दिमाग संकीर्ण रह जाता है।
उड़ियाबाबा, हरिबाबा, आनन्दमयी माँ और हाथीबाबा ये आपस में मित्र संत थे। एक बार उनके पास कोई आदमी आये और पूछाः
"बाबाजी ! भगवान का नाम लेने से क्या फायदा ?" हाथीबाबा ने उड़ियाबाबा से कहाः "यह कोई बनिया है, वैश्य है। बड़ा स्वार्थी आदमी। भगवान का नाम लेने में भी फायदा ही फायदा ढूँढता है।" फिर उस आदमी से बोलेः
"अरे भाई ! भगवान का नाम स्नेह से लिया जाता है। उसमें क्या फायदा, कितना फायदा, इसका बयान करने वाला कोई वक्ता ही पैदा नहीं हुआ। भगवन्नाम-स्मरण से क्या लाभ होता है इसका बयान कोई नहीं कर सकता। नाम का बयान करते-करते सब नाममय हो गये लेकिन नाम का बयान पूरा नहीं हुआ। भगवान के नाम की महिमा का संपूर्ण बयान हो ही नहीं सकता।"
राम
न सकहिं नाम
गुण गाई।
भगवान खुद ही नाम की महिमा गा नहीं सकते तो दूसरों की क्या बात ?
मंत्रजाप
मम दृढ़
विश्वासा।
पंचम
भक्ति यह वेद
प्रकाशा।।
"मंत्रजाप और दृढ़ विश्वास यह भक्ति का पाँचवा सोपान है।" ऐसा तो कह दिया लेकिन नाम की महिमा का पूरा बयान नहीं हो सका।
कबीर और कमाल की कथा है। रामनाम से एक कोढ़ी का कोढ़ दूर हो गया तो कमाल समझता है कि मैं रामनाम की महिमा जानता हूँ। कबीर जी ने कमाल को तुलसीदास जी के पास भेजा। तुलसीदास जी ने एक तुलसीपत्र पर राम शब्द लिखकर वह तुलसीपत्र पानी के घड़े में घोंट दिया। फिर उस पानी से पाँचसौ कोढ़ियों को ठीक कर दिया। कमाल ने माना कि रामनाम से एक ही कोढ़ी नहीं बल्कि पाँच सौ कोढ़ी एक साथ ठीक हो सकते हैं। ऐसी राम नाम की महिमा है। इससे भी कबीर जी सन्तुष्ट नहीं हुए। उन्होंने कमाल को भेजा सूरदास के पास। सूरदासजी ने गंगा में बहते मुर्दे को निकलवाया। उसके कान में राम शब्द का केवल र बोलने मात्र से मुर्दा जिन्दा हो गया। कमाल समझा कि रामनाम के 'र' कार मात्र से मुर्दा जिन्दा हो सकता है इतनी भारी महिमा है रामनाम की। कबीर जी ने कहाः "नहीं नहीं..... इतनी सी नहीं है मेरे राम जी की महिमा। रामनाम की महिमा का बयान करना हमारे बस की बात नहीं है।"
भृकुटी
विलास सृष्टि
लय होवहिं।
जिसने भृकुटी विलास मात्र से सृष्टि का लय हो सकता है, प्रलय हो सकता है, उनके नाम की महिमा का वर्णन तुम क्या कर सकोगे ?
अजब
राज है इस
मुहब्बत के
फसाने का।
जिसको
जितना आता है
उतना ही गाये
चला जाता है।।
भगवन्नाम की महिमा का पूरा बयान कोई नहीं कर सकता। बयान जितना करते हैं थोड़ा ही पड़ता है। सत्संग से कितना लाभ हो सकता है उसका बयान आज तक कोई नहीं कर सका। भील वालिया लुटेरा वाल्मीकि ऋषि बन गया नारदजी के सत्संग से। नारद जी स्वयं एक साधारण दासीपुत्र थे, विद्याहीन, जातिहीन, बलहीन। उनकी माँ किसी के वहाँ चाकरी करती थी। वहाँ संत-महात्मा पधारते। दासी अपने पुत्र को भी साथ ले जाती और उन संतों के सत्संग से पुत्र आगे चलकर देवर्षि नारद बन गया। मैत्रेय ऋषि पूर्व जन्मों में कीड़ा थे। वेदव्यास जी के संग से जन्मों जन्म उन्नति करके आखिर में ऋषि बन गये। सत्संग की महिमा लाबयान है।
सनकादि ऋषि ईश्वर कोटि के थे फिर भी सत्संग करते। चार में से एक वक्ता बन जाते, तीन श्रोता। शिवजी भी सत्संग करते और पार्वती जी सुनती। वे अगस्त्य ऋषि के आश्रम में जावे सत्संग सुनने के लिए।
सत्संग पापी को पुण्यात्मा बना देता है, पुण्यात्मा को धर्मात्मा बना देता है, धर्मात्मा को महात्मा बना देता है, महात्मा को परमात्मा बना देता है और परमात्मा को....? अब आगे वाणी नहीं जा सकती।
मैं
संतन के पीछे
जाऊँ जहाँ
जहाँ संत
सिधारे......
क्या कंस को मारने के लिए भगवान को अवतार लेना पड़ता है ? वह तो "हार्ट अटैक" से भी मर सकता था। रावण को मारने के लिए अवतार लिया होगा रामचन्द्रजी ने ? राक्षस तो अन्दर अन्दर ही लड़कर मर सकते थे, अवतार लेने की आवश्यकता नहीं पड़ती। लेकिन उस बहाने सत्संग का प्रचार प्रसार होगा, ऋषियों का सान्निध्य मिलेगा, सत्संग बँटेगा, सत्संग का प्रसाद भक्त समाज तक पहुँचेगा इस हेतु से रामजी आये।
परब्रह्म परमात्मा का बयान पूरा कोई नहीं कर सकता, क्योंकि बयान किया जाता है बुद्धि से और बुद्धि है प्रकृति में। परमात्मा है प्रकृति से परे। ब्रह्म-परमात्मा के एक अंश में प्रकृति है और प्रकृति में ये तमाम तमाम जीव हैं और जीवों में जरा सी बुद्धि। वह छोटी-सी बुद्धि परमात्मा का क्या बयान करेगी ? बुद्धि से सच्चिदानंदघन परमात्मा का पूरा बयान नहीं किया जा सकता।
वेद कहते हैं- "नेति.... नेति....नेति....।" यानि, न इति... न इति.... न इति....। पृथ्वी नहीं, जल नहीं, तेज नहीं, वायु नहीं, आकाश नहीं। इससे भी परे, जो है वह है परमात्मा।
जो कुछ हम बने हैं शरीर रूप में, वह पंचभूतों को ही समूह है। पंचभूतों के ही हम फूल हैं, और क्या हैं ? मनुष्य, प्राणी, वनस्पति आदि सब कुछ इन पंच तत्त्वों से ही आता है। परमात्मा इन सबसे परे है, उसका बयान कैसे होगा ? बुद्धि जब उसका बयान सचमुच करने लगती है तो जितना-जितना बयान होता है उतनी-उतनी वह परमात्मामय होती जाती है। परमात्मा का बयान अगर पूरा किया तो फिर वह बुद्धि प्रकृति की बुद्धि नहीं बचती, वह परमात्म-स्वरूप हो जाती है। जैसे लोहा अग्नि में प्रविष्ट हो जाय तो गर्म होकर अग्निमय बन जाता है।
परमात्मा का बयान भी भोगबुद्धि से नहीं, यज्ञार्थबुद्धि से होगा तभी बुद्धि परमात्ममय बनने लगेगी। बयान करने वाला यज्ञार्थ कर्म करे तभी यह सम्भव हो सकेगा। 'चलो, परमात्मा की चर्चा कर ली, कथा कर ली, दक्षिणा मिल गयी, रूपये-पैसे, फल-फूल, भेंट-सौगात मिल गई, अपना काम बन गया...' यह यज्ञार्थ कर्म नहीं हुआ। सत्संग करें यज्ञार्थ, जप करें यज्ञार्थ, सेवा करें यज्ञार्थ।
किसी को पानी पिलाना भी यज्ञ है, भोजन कराना भी यज्ञ है, दुःखी को आश्वासन देना भी यज्ञ है, बहिर्मुख को अन्तर्मुख करना भी यज्ञ है, दुश्चरित्रवाले को सच्चरित्र में लगाना भी यज्ञ है, निगुरे को सगुरा बनाना भी यज्ञ है, नास्तिक को आस्तिकता की ओर मोड़ना भी यज्ञ है।
ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं किः "मैं साधक बनकर सुखी हुआ हूँ तो और दस लोगों को साधक बनाना मेरा कर्त्तव्य है।'' ऐसे लोग भी हो गये जिन्होंने प्रतिज्ञा ली थी कि प्रतिदिन पाँच साधक बनाऊँगा, बाद में भोजन लूँगा। प्रतिदिन पाँच साधक नहीं बना पायें तो एक ही बनायें। प्रतिदिन एक नहीं तो सप्ताह में एक, महीने में एक साधक बनायें। यह भी यज्ञार्थ कर्म है।
भगवन्नाम का निःस्वार्थ भाव से स्नेहपूर्वक जप करना भी यज्ञ है। श्री कृष्ण कहते हैं-
यज्ञानां
जपयज्ञोऽस्मि।
यज्ञों में जप यज्ञ मैं हूँ।
जप करके अपना शारीरिक, ऐहिक सुख सुविधा बढ़ाने की आकांक्षा है, अहं सजाने-बढ़ाने की इच्छा है तो यह यज्ञकर्म नहीं रहा, गड़बड़ी हो गयी। स्नेहपूर्वक जप, नाम-स्मरण करना अपना स्वभाव बन जाय, दान करना हमारा स्वभाव बन जाय, परहित करना हमारा स्वभाव बन जाय, यह हो गया यज्ञार्थ कर्म।
जो दूसरों को सुख देता है वह स्वयं दुःखी कैसे रह सकता है ? जो दूसरों को मान देता है उसको मान की क्या परवाह रहेगी ?
आजकल घर घर में, कुटुम्ब में, समाज में, देश में, राष्ट्र में, विश्व में इतना कलह क्यों ? क्योंकि यज्ञार्थ कर्म को भूल रहे हैं, अहंकारार्थ कर्म हो रहे हैं। राग और द्वेष से प्रेरित होकर, अहंकारपूर्वक जो कर्म होते हैं वे मनुष्य जाति को खतरे में डालते हैं। ये जो मानव-संहार के लिए बम बनाये जाते हैं वह क्या यज्ञार्थ कर्म हैं ? मनुष्य जाति का ही शोषण करके करोड़ों अरबों रूपये एकत्रित किये जाते हैं और वे ही रूपये मानव-संहार के लिए लगाये जाते हैं।
ब्रह्माजी ने कहा थाः "हे अमृतपुत्रों ! तुम्हें अगर सुखी जीवन जीना है तो यज्ञार्थ जीवन जियो।" इस प्रकार ब्रह्माजी ने यज्ञ करने के लिए उपदेश एवं सामग्री दी।
संसार में जो कुछ सामग्रियाँ हैं उसका उपयोग यज्ञबुद्धि से करो। वातावरण में प्रदूषण कम हो इस विषय में विचारना और कुछ न कुछ सहयोग देना यह भी यज्ञ है। हमारे इर्दगिर्द कम से कम गन्दगी हो, हमारी ओर से पड़ोसी को कोई तकलीफ न हो इसका ख्याल रखना भी यज्ञ है।
ऐसा नहीं कि किसी का दिल न दुःखे इसके लिए धर्म विरूद्ध कर्म भी करने लग जाना। नहीं। कोई धर्म विरूद्ध बात कहे तो युक्ति से उसे सन्मार्ग पर लाना चाहिए, उसके साथ हाँ में हाँ नहीं मिलाना चाहिए।
रामजी बड़ी कुशलता से व्यवहार करते थे। कोई उनके समक्ष किसी विषय में बात करे तो वे तब क सुनते जब तक वह धर्म विरूद्ध नहीं होती, किसी की हानि विषयक नहीं होती। अगर उसकी बात अयोग्य होती, अनिष्टकारक होती, धर्म से विरूद्ध होती तो रामजी उसको आधे में टोककर, अपमानित करके नहीं रोकते थे वरन् कुछ नया विषय छेड़कर, इतिहास या धर्म की बात बताकर उसकी वृत्ति को मोड़ देते थे। उसे अच्छी बात, सही बात, नीति और धर्मयुक्त बात बताते ताकि वह अपनी गलती अपने आप समझ लेता और सुधार लेता।
आँख को बुरी जगह न देना यह भी यज्ञ है। ईश्वर-कार्य करने के लिए अपने शरीर को तन्दुरूस्त रखना यह भी यज्ञ है। तन, मन, बुद्धि को निर्विकारी जीवन के मार्ग में लगाना यह भी यज्ञ है। जैसे अपने शरीर की रक्षा करते हैं वैसे यज्ञबुद्धि से अपने बाल-बच्चों की, कुटुम्बियों की, सम्बन्धियों की, पड़ोसियों की रक्षा करना भी यज्ञ है।
हम जो भी करते हैं, अच्छा या बुरा, उसका प्रभाव वातावरण पर पड़ता ही है, हमारे सम्पर्क में आने वाले लोगों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष परिणाम आता ही है। गन्दगी करता है, बुरे विचार करते हैं तो वातावरण कलुषित होता है, गन्दे परमाणु फैलते हैं। अगर धूप करते हैं, प्राणायाम करते और ध्यान करते हैं तो वातावरण में शुद्धि और पवित्रता फैलती है।
आचार्य विनोबा के पास एक आदमी आया और बोलाः "बाबाजी ! मैंने शौक से घोड़ा लिया, बड़ा महँगा है। लेकिन मैं उसके करीब जाता हूँ तो वह उछल कूद करता है। मुझे अपनी पीठ पर सवार नहीं होने देता। मेरा नौकर उस पर सवार होकर मजे से घूमता है, घोड़ा कोई हरकत नहीं करता। मैं उसके पास जाता हूँ तो भड़कता है। ऐसा क्यों ?"
विनोबाजी बोलेः "तुमने घोड़े को कभी खिलाया पिलाया ?"
"नहीं। वह तो मेरा नौकर ही करता है।"
"नौकर खिलाता-पिलाता है तो नौकर को बैठने देगा। तुम खिलाओ-पिलाओ तो तुमको बैठने देगा। अब आठ दिन तक तुम उसे दाना-पानी दो, प्यार करो, उसकी पीठ सहलाओ। फिर देखो, क्या होता है।"
आठ दिन तो क्या, चार ही दिन में वह अपने घोड़े पर बैठकर बाबाजी के दर्शन करने पहुँच गया।
प्रकृति की गहराई में स्नेह और उदारता है। तुम अगर संकीर्णता और अहंकार रखते हो तो घोड़ा भी पास नहीं आने देगा। स्नेह और उदारता से उसकी सेवा करो तो वह भी स्नेह से अपनी पीठ पर बैठाकर तुम्हारी सेवा करता है। गाय-भैंस को डण्डे के बल से दुहते हैं और अच्छी तरह चारा पानी खिला-पिला कर स्नेह से सहलाते हुए दुहते हैं तो दूध की गुणवत्ता और प्रमाण में फर्क पड़ेगा।
सहज
मिले सो दूध
बराबर माँग
लिया सो पानी।
नोंच
लिया सो रक्त
बराबर बोले
कबीरा बानी।।
जो आदमी यज्ञार्थ कर्म नहीं करता वह जन्मान्तर में वृक्ष आदि बन जाता है। उससे प्रकृति जबरन यज्ञकर्म करवाती है। वृक्ष के फल, फूल पत्ते, टहनियाँ, जड़-मूल सब कुछ दूसरों के लिए काम में आता है। वृक्ष स्वयं धूप सहता है, बारिश आँधी तूफान सहता है और आखिर में ठनठनपाल रह जाता है। उसे जब मनुष्य जन्म मिला था तब स्वार्थ से जिया था। अब प्रकृति जबरन उससे सेवा करवाती है, कठोरता से काम लेती है।
मनुष्य योनि में प्रकृति अपना कठोरतापन हटा लेती है, मनुष्य को संकल्प-स्वातन्त्र्य प्रदान करती है। तीन से पाँच वर्ष की उम्र तक बालक होता है तब तक उस पर प्रकृति का पूरा प्रभाव होता है। बालक ज्यों-ज्यों बड़ा होता है त्यों-त्यों प्रकृति अपना प्रभाव हटाती जाती है, कर्त्ता को संकल्प-स्वातन्त्र्य मिलता जाता है। इसीलिए कर्त्ता पर कर्म का फल लागू हो जाता है।
सिंह अगर गाय को मार देता है, खा जाता है तो उसको पाप नहीं लगता। बिल्ली चूहे को पकड़कर नोच डालती है तो उसे पाप नहीं लगता। लेकिन मनुष्य अगर अण्डा खाता है, बकरी काटकर खाता है तो पाप लगता है। पशु-पक्षी तो प्रकृति से प्रेरित होकर पुराने कर्म करते हैं। मनुष्य संकल्प स्वातन्त्र्य का उपयोग करके नये कर्म बनाता है। संकल्प करने में वह स्वतन्त्र है लेकिन इस स्वातन्त्र्य का उपयोग करके कर्म करता है फिर उस कर्म का फल भोगने में वह स्वतंत्र नहीं है, उसे अपना कर्मफल मजबूर होकर भोगना ही पड़ता है।
मनुष्य जो कर्म करता है उसके प्रेरक-बल के रूप में उसकी इच्छाएँ, वासनाएँ होती हैं। उसके रक्त में माता-पिता के, दादा-दादी के, नाना-नानी के संस्कारों का प्रभाव होता है। मनुष्य जन्म में उसे अगर सीख मिल जाय, कर्म-बन्धन काटने का मार्ग मिल जाय, अपने पुराने संस्कार हटाता जाय, हल्के स्वभाव को छोड़ता जाय, उचित स्वभाव बनाता जाय, यज्ञार्थ कर्म करता जाये, सेवा से अन्तःकरण पावन बनाता जाय तो उसके कर्म निष्कर्म-सिद्धि में पहुँच जायेंगे। निष्कर्म सिद्धि होते ही वह अपने शुद्ध स्वरूप में, आत्म-स्वरूप में टिकने लग जाएगा। अपने शुद्ध आत्म-स्वरूप में टिक जाना ही जीवन का आखिरी लक्ष्य है।
व्यापारी दुकान पर जाता है। सुबह दुकान का दरवाजा खोलने से लेकर रात को बन्द करने तक वह कभी हँसता है, कभी नौकर को डाँटता है, कभी ग्राहकों की खुशामद करता है, कभी बाजार के चढ़ाव-उतार का सावधानी से चिन्तन करता है। ये सारी चेष्टाएँ उसकी पैसा कमाने की हैं। रात होते ही उसकी नज़र गल्ले पर जाती है कि कितना धन्धा हुआ, कितना पैसा आया। बिक्री का हिसाब लगाता है।
जैसे लोभी का मन काम करने के बाद अपने मुनाफे पर जाता है ऐसे ही सच्चे साधक का मन यज्ञार्थ कर्म करने के बाद भीतर गोता मारता है, जाँच करता है कि भीतर निर्मलता बढ़ी कि नहीं, आनन्द या कि नहीं, शांति मिली कि नहीं, अन्तर्यामी सन्तुष्ट हुए कि नहीं। जो भी यज्ञार्थ कर्म होंगे वे आन्तरिक सुख, आन्तरिक शांति, आन्तरिक ओज और विश्रान्ति प्रदान करेंगे।
लोग ध्यान करना चाहते हैं लेकिन ध्यान लगता नहीं क्योंकि जीवन में यज्ञार्थ कर्म नहीं है। ध्यान करने बैठते हैं तो एक वासना इधर खींचती है, दूसरी वासना उधर खींचती है अथवा मनोराज चलता है, क्योंकि कर्त्ता ने जगत में सत्यबुद्धि कर दी है और परमसत्यस्वरूप परमात्मा से दूर हो गया है। स्वार्थ ने कर्त्ता की परिच्छिन्नता को इतना मजबूत कर दिया कि अपने असीम स्वभाव का पता नहीं चलता। कर्त्ता स्वार्थ बुद्धि से अन्तःकरण में, इन्द्रियों में, कर्म में उतरता है तो परिच्छिन्न हो जाता है। निःस्वार्थ भावना से आता है तो अपने मूल शुद्ध स्वरूप में प्रतिष्ठित होने लगता है।
यज्ञार्थ कर्म करने से कर्त्ता के चित्त में शांति आती है, कर्त्ता के चित्त में योग्यताएँ पनप उठती हैं, कर्त्ता के चित्त में अपने मूल स्वभाव को जानने की क्षमता आती है। इस लाभ के आगे ऐहिक लाभ कुछ नहीं है।
लोग बोलते हैं- "बाबाजी ! निःस्वार्थ भावना से कर्म करेंगे तो ये वस्तुएँ, ये पदार्थ, ये व्यक्ति मिलेंगे नहीं। वस्तु-पदार्थ-व्यक्तियों के बिना जियेंगे कैसे ? मर जायेंगे...."
....तो क्या इन सबके होने से आप सदा के लिए जीते रहेंगे ? इनके होते हुए भी आप मर जाएंगे। वास्तव में देखा जाये तो वस्तुओं के बिना आप जी नहीं सकते ऐसा नहीं है अपितु अपने मूल स्वभाव में, आत्म-स्वरूप में गये बिना जी नहीं सकते। लोग समझते हैं कि संसार को रखे बिना हम जी नहीं सकते। वास्तव में संसार को भूले बिना संसार की चीजों को त्यागे बिना हम जी नहीं सकते।
'हे रूपया ! तेरे बिना नहीं चलेगा।'
अरे भाई ! रात को तिजोरी छोड़े बिना नींद नहीं आयेगी। नींद में सब पदार्थों से मुख मोड़कर अपने मूल शान्त स्वरूप में, आत्म-स्वरूप में जाने या अनजाने आना ही पड़ता है। अगर नहीं आ सकते तो जीना दुष्कर हो जाता है। आने के लिए नींद की गोलियाँ लेनी पड़ती हैं, कई प्रकार के इलाज करवाने पड़ते हैं।
शरीर थककर बिस्तर पर लेटा है। आप बाहर के सब स्वार्थों से, आकर्षणों से मुक्त होकर नींद में चले जाते हो तो आपके तन की थकान दूर जो जाती है। स्वार्थ छोड़कर अगर यज्ञार्थ कर्म किया तो आप परमात्मा में चले जाओगे, आपका जन्म-मरण का दारूण चक्र मिट जायेगा। बाह्य आकर्षण छोड़कर शान्त स्वरूप में जग जाएँगे।
हमारे तीन शरीर होते हैं- पहला स्थूल शरीर, दूसरा सूक्ष्म शरीर और तीसरा कारण शरीर। ये शरीर हम नहीं हैं। शरीर हमारे साधन हैं। वस्तुओं में और साधनों में जितना अहं और मम होता है उतना ही कर्त्ता बेचारा डरता रहता है और जन्म मरण का भागी होता है।
कर्त्ता तीन चीजों से बँधता हैः वस्तु, व्यक्ति और साधन। 'मेरा मकान..... मेरी गाड़ी.....' यह वस्तु है। मेरी पत्नी.... मेरा पति.... मेरा बेटा..... यह व्यक्ति है। स्थूल-सूक्ष्म कारण शरीर- ये साधन हैं। यज्ञार्थ कर्म करने से साधनों का सदुपयोग होगा और साध्य में पहुँचायेगा। यज्ञार्थ कर्म न करने से, साधनों को मैं मानने से आपत्ति बढ़ती रहेगी।
परमात्मा के स्वभाव में स्नेह और उदारता है। अपना स्वभाव भी वैसा बनाते जाएँगे तो परमात्मा में मिलते जाएँगे। यही जीवन की इतिकर्त्तव्यता है। मनुष्य जन्म मिला है और वह भी भारत में ! देवता लोग भी भारत में जन्म लेने को तरसते हैं, भारत-भूमि की प्रशंसा करते हैं। देवता लोग अपने संकल्प के मुताबिक गमनागमन कर सकते हैं क्योंकि वे पुण्य योनि में हैं। स्वर्ग में प्रचुर मात्रा के भोग हैं। वहाँ भोग में कोई विघ्न नहीं आता और फलतः भोगों में उपरामता भी नहीं आती जल्दी से। भोग का आकर्षण नहीं मिटने के कारण समय उनका खराब हो जाता है।
मनुष्य जन्म में भोग इतने मिलते नहीं, कुछ कुछ मिलते हैं तो उसमें विघ्न भी आते हैं। भोगों से उपरामता और वैराग्य आने का मौका है। यज्ञार्थ कर्म करने की यहाँ सुविधा है। इसलिए मनुष्य अगर चाहे तो वह परमात्म-प्राप्ति का अधिकारी हो सकता है। चाहे वह पापी में पापी हो, दुराचारी में दुराचारी हो वह भी अपना कल्याण कर सकता है।
अपि
चेदसि पापेभ्यः
सर्वेभ्यः
पापकृत्तमः।
सर्व
ज्ञानप्लवेनैव
वृजिनं
संतरिष्यसि।।
'यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है तो भी तू ज्ञान रूप नौका द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भली भाँति तर जायेगा।'
(भगवद् गीताः 4.36)
जीव ज्ञान की नाव में बैठ जाये तो आसानी से वह पार हो सकता है। हाँ तत्परता अपनी हो। जो भी कर्म करे उसके मूल में देखे, निगरानी रखे सूक्ष्मता से।
ज्ञानेश्वर महाराज कहते हैं- "जो यज्ञार्थ कर्म करता है वह इधर-उधर भटकना पसन्द नहीं करता । वह बाहर के तीर्थों में दूर-दूर जाकर, श्रम उठाकर अपने को त्रस्त नहीं करता। कठिन तप करके अपने शरीर को तपाता नहीं, सुखाता नहीं। शरीर को भी यज्ञार्थ संभालता है। नंगे पैर यात्रा नहीं करता और प्रमादी होकर विलास भी नहीं करता। अति आहार और अति भूखापन से बचता है। अति भोग और अति त्याग से बचकर मध्यम मार्ग से चलकर यज्ञार्थ कर्म में प्रवृत्त रहता है।
अत्यंत बहिर्मुख व्यक्तियों के लिए जो विधान है वह साधक के लिए नहीं है। जो साधक के लिए विधान है वह सिद्ध के लिए नहीं है। जो कर्म इस समय उचित है वह आगे चलकर दसरे संदर्भ में अनुचित भी बन सकता है। 10वीं कक्षा वाला विद्यार्थी चौथी कक्षा की किताब का अभ्यास करे तो यह उसके लिए अनुचित है।
ऐसे ही मनुष्य जन्म पाकर विषयों में ही उलझे रहना अनुचित है। मनुष्य जन्म मिला है मुक्ति पाने के लिए। तुलसीदास जी महाराज कहते हैं-
यह
तन कर फल विषय
न भाई।
मानव तन पाकर विषय भोगना उचित नहीं है। विषय भोग भोगना है तो पशुयोनि में खूब मजे से भोगा जा सकता है। पशुओं को कोई बाधा नहीं। हम असंयमी बनकर अपना जीवन व्यतीत कर दें तो हम पशुता की ओर गये। अतः जीवन-सरिता को संयम के दो किनारों के बीच में बहाते हुए यज्ञार्थ कर्म करने चाहिए। भोजन करें तो भी यज्ञार्थ, पानी पियें तो भी यज्ञार्थ। हमारे पेट में जठराग्नि यानि भगवान अग्निदेव विराजमान हैं उनको आहुति देना है।
'मैं खा रहा हूँ... मजा ले रहा हूँ...'
नहीं....। मैं वैश्वानर को भोजन करा रहा हूँ। अपने बच्चे को भोजन कराते समय बच्चे में स्थित आदि नारायण को भोजन कराने की भावना करो। इससे भोजन कराना भी यज्ञ हो जाएगा।
बंगाल में एक स्त्री की शादी होते ही उसी वर्ष में उसका पति मर गया। एकाएक पति की मृत्यु होने से वह विधवा महिला विह्वल हो गई, बावरी सी बन गई। किसी सज्जन व्यक्ति ने सोचा कि पति की याद में कहीं पागल न हो जाय यह लड़की ! उसके घरवालों को समझाया कि, 'फलानी जगह पर संत-महात्मा रहते हैं उनके पास ले जाओ इस बच्ची को। उनके दर्शन कराओ, सत्संग में बैठाओ, सब कुछ ठीक हो जाएगा।'
वह विधवा युवती, सोलह वर्ष की बच्ची संत-दर्शन को गई। पति के वियोग में विह्वल। सौभाग्य-चिह्न बिन्दी विहीन ललाट, चूड़ियाँ विहीन हाथ, तन पर विधवा के धवल वस्त्र। आँखों में आँसू बहाती संत श्री के चरणों में पहुँची। बाबाजी ने आत्मिक प्यार भरे स्वर में पूछाः
"बेटा ! कैसे आयी ?"
वह रो पड़ी। सिसकते हुए बोलीः "दुनिया में मेरा कोई नहीं..... मैं क्या करूँ ?"
बाबाजी ने कहाः "अरे बेटी ! तू आज जितना झूठ बोल रही है उतना कभी नहीं बोली। तुझे इतना पता नहीं कि संत महात्मा के आगे कभी झूठ नहीं बोलना चाहिए ?"
वह युवती चौंक उठी एकदम। बाबाजी को यकीन दिलाते हुए कहने लगीः "बाबाजी ! मैं सच बोलती हूँ। इस दुनिया में मेरा कोई नहीं। मेरी बुढ़िया माँ थी उसने कन्यादान कर दिया और कुछ महीनों में वह प्रभु धाम में चली गई। फिर उसका जमाई भी चल बसा। मैं अकेली रह गई। मेरा कोई न रहा।"
"तू झूठ बोल रही है। तेरा कोई नहीं ? अरे ! तेरे हृदय में परमात्मा बैठा है वह तेरा है। हृदय की धड़कनें चला रहा है, तेरे तन में रक्त बहा रहा है, श्वास चला रहा है, आँखों को देखने की शक्ति दे रहा है, कानों को सुनने की शक्ति दे रहा है वह सर्वान्तर्यामी परमात्मा तेरा है, तेरे साथ है, तेरे भीतर है और तू बोलती है मेरा कोई नहीं ? पगली ! वह तेरे और सबके हृदय में बैठा हुआ सृष्टिकर्त्ता कभी मरता नहीं। शरीर मरता है तब भी सूक्ष्म शरीर में अन्तर्यामी रहता है, प्रेरणा देता है, आगे की यात्रा करवाता है। सूक्ष्म शरीर भी विलीन हो जाता है तब वह सर्वव्यापक ब्रह्म हो जाता है, विश्व चैतन्य हो जाता है।
ऐसे परब्रह्म परमात्मा जैसे सबके हैं वैसे तेरे भी हैं। जिसका कोई नहीं होता उसके तो वे पूरे के पूरे हैं। ....और तू रोती है। धैर्य रख बेटी ! करूणामूर्ति महात्मा ने बच्ची को आश्वासन दिया।
लौकिक दृष्टि से कोई अनाथ सोचे कि दुनियाँ में मेरा कोई नहीं है, केवल परमात्मा ही मेरा है, तो उसकी सारी की सारी वृत्तियाँ एक ही जगह पर लग जाती हैं, केन्द्रित हो जाती हैं। उसका मन परमात्मा में लगने लगता है।
कोई मशीन चलानी हो तो उसके छोटे-मोटे सब पुर्जे एकत्रित होने चाहिए, मशीन से संलग्न होने चाहिए। तभी मशीन चल सकती है।
अपनी जीवनरूपी मशीन तो ऐसी है कि उसकी वृत्तियाँरूपी पुर्जे जगह-जगह पर बिखरे पड़े हैं। ऐसी दशा में ईश्वर के मार्ग पर अपनी जीवन-गाड़ी दौड़ेगी कैसे ? अपना एक पुर्जा ऑफिस में पड़ा है, एक पुर्जा बाजार में भटक रहा है, एक पुर्जा परिवार की ममता में उलझा है, एक पुर्जा किसी ने अपमान कर दिया उसके पीछे लगा है, एक पुर्जा किसी ने मान दिया उसको भोगने में लगा है, एक पुर्जा मतमतांतर में गोते खा रहा है, एक पुर्जा भविष्य के सुख की तलाश में गया है। अपनी हृदयरूपी मशीन ऐसी बिखरी हुई पड़ी है। जो महसूस करता है कि, 'मेरा कोई नहीं है' –तो उसका बिखराव हट गया। अब वह लगेगा तो पूरा लगेगा। पूरा लगेगा तो परमात्मा भी पूरे के पूरे उसी के ही हैं।
बाबाजी ने उस बच्ची से कहाः "जिसका कोई नहीं उसका तो भगवान होता है। और तेरा तो वह पूरे का पूरा है। उस भगवान को तू पिता मान, पति मान, पुत्र मान, भाई मान, जो तेरी भावना हो, मान। वह सब कुछ होने को तैयार है।"
बाबाजी ने युवती को लाला कन्हैया का विग्रह स्वरूप दे दिया, एक प्यारी मूर्ति दे दी। लड़की खुश हो गयी। "मैं कन्हैया को पुत्र मानकर उसकी सेवा करूँगी। वह कन्हैया को ले गयी अपने घर। रोज सुबह जल्दी उठे, कन्हैया को स्नेह से उठाये। स्वयं स्नान करके अपने लाला को नहलाये। फिर भोजन की थाली परोसकर उसके सामने रख दे। आँख बन्द करके भावना करे कि मेरा लाला खा रहा है, भोजन कर रहा है। फिर उसके हाथ-मुँह धुलाये। इस प्रकार मानसपूजा से समन्वित वह युवती अपने लाला का लालन पालन करने लगी।
ऐसा करते करते तीस साल बीत गये। सत्रह साल की बच्ची अब सैंतालीस की प्रौढ़ा हो गयी। उस समय रामकृष्ण परमहंस की ख्याती लोगों तक पहुँचने लगी थी। इस महिला के मन में हुआ कि, चलो, बाबाजी के दर्शन करने जाऊँ।......लेकिन मेरे लाला का क्या होगा ? उसको भूख लगेगी तो ? मेरे लाला के लिये क्या करूँ ?
उसने दाल-चावल की पोटली बाँधकर साथ में ले ली और लाला के साथ चल पड़ी रामकृष्णदेव के दर्शन करने। दक्षिणेश्वर में तो कई लोग बाबाजी के दर्शनार्थ आते थे, बैठते थे। बड़े-बड़े लोगों के बीच बाबाजी की बातचीत होती थी। वह बेचारी अनपढ़ माई बैठी थी एक कोने में।
आखिर दोपहर हुई। वह थकी। सोचने लगीः
"मेरे लाला को भूख लगी होगी। यहाँ तो खिचड़ी पकाने की सुविधा नजर नहीं आती है। मेरा लाला कैसे खायेगा ? घर जाऊँ और वहीं लाला को भोग लगाऊँ।"
वह उठकर चुपके से जाने लगी तो रामकृष्ण भी अचानक उठे और उसके पीछे भागे। बोलेः "माँ....माँ.... मुझे भूख लगी है। खाना खिलाओ।" महिला को समझाकर वापस बुला लाये। अपने चौके में रसोई पकाने की सुविधा कर दी। बुढिया ने खिचड़ी बनाई, पत्तल में परोसी। उसे संकोच हो रहा था कि बाबाजी को खिचड़ी कैसे खिलाऊँ ! इतने बड़े महात्मा पुरूष ! मेरी खिचड़ी खाएँगे !
इतने में ही रामकृष्ण स्वयं आये और खाने बैठ गये। माई का हृदय भाव से भर आया। स्नेहपूर्ण दिल से पत्तल परोस दी। रामकृष्ण मजे से खा रहे हैं। वह बुढ़िया समझ रही है कि मेरे लाला को भूख लगी है और वह नटखट नागर अठखेलियाँ करता हुआ खिचड़ी खा रहा है। ऐसी भावना करके वह रामकृष्णदेव को निहारती तो उसमें उसको लाला के दर्शन होने लगे। साक्षात श्री कृष्ण का बाल स्वरूप देखने लगी। भाव विभोर होकर अपने प्यारे लाला को छूने लगी तो लाला गायब ! सामने रामकृष्ण भोजन कर रहे हैं।
उस दिन से वह बुढ़िया कुछ अलौकिक भाव में ही रहने लगी। आनन्द से गुनगुनाती रहती, लाला से बात किया करती। कभी लाला को डाँटतीः "नटखट ! किसी का मक्खन चुरा के लाया है..... इत्र की बोतल उठा लाया है....
लोग उसे पागल समझते। कुछ भाग्यशाली लोग समझते कि इसको भगवान के दर्शन हो रहे हैं। वह जब लाला से बात करती तो लोग पूछतेः "कहाँ है लाला ?"
"यहीं तो खड़ा है, देखते नहीं ?"
"नहीं माता जी ! लाला सिर्फ तुम्हें ही दर्शन दे रहे हैं। उनसे प्रार्थना करो न कि हमको भी दर्शन देवे।"
माई ने लाला को कहा तो लाला ने मना कर दिया। लोगों ने अनुनय विनय किया तो बुढ़िया लाला से आग्रह करने लगी। लाला ने दर्शन तो न दिये लेकिन इत्र की एक बोतल दी। बुढ़िया ने अपने प्यारे लाला को डाँटाः
"तू कहाँ से रोज-रोज इत्र चुरा लाता है ? कौन देता है तेरे को ?"
लाला ने अन्य लोगों को दर्शन देने से तो इन्कार कर दिया लेकिन बुढ़िया कोई निराली दुनियाँ में पहुँच चुकी है इस समाचार से उन्हें वाकिफ करने के लिए इत्र की शीशी फोड़ दी। फर्श पर आवाज आयी। काँच के टुकड़े भी लोगों ने देखे। इत्र की सुगन्ध सर्वत्र फैल गयी। तबसे लोग जानने लगे कि यह पागल-सी दिखती महिला वास्तव में पागल नहीं है। इसने तो गल को पा लिया है। अपनी वृत्तियाँ प्रभु में एकाकार कर ली हैं।
मनुष्य के मन में अदभुत शक्ति है। आपका मन चाहे लाला में लगा दो चाहे योगाभ्यास में लगा दो चाहे यज्ञार्थ कर्म में लगा दो चाहे निज आत्मस्वरूप के अनुसन्धान में लगा दो। मन एकाग्र होते ही शुद्ध होने लगेगा, दिव्य होने लगेगा, शान्त होने लगेगा, आत्मविश्रान्ति पाने लगेगा।
आप जो भी कार्य करो यज्ञार्थ भावना से करो, ईश्वर से नाता जोड़ने के लिए करो, दूसरों का कल्याण करने की भावना से करो, अपनी वासनाएँ निवृत्त करके जीवन को निर्मल बनाने के हेतु से करो। जो कर्म भोगबुद्धि से, स्वार्थबुद्धि से, राग-द्वेष से प्रेरित होकर, ईर्ष्या के कारण से, दूसरों को नीचा दिखाने के उद्देश्य से किये जाते हैं वे कर्म कर्त्ता को बाँधने वाले हैं। दूसरों को सताकर ऐश-आराम पाने के लिए जो कर्म किये जाते हैं वे जीव को निम्न गति में ले जाते हैं। 'सबमें मेरा ही नारायण स्वरूप विलास कर रहा है'- ऐसी मंगल भावना से व्यवहार होता है वह परम मांगल्य के द्वार खोल देता है।
परमात्मा और परमात्मा के ज्ञान की महिमा का कोई पार नहीं।
भगवन्नाम स्मरण करें, जप करें, तो भगवान को प्यार करने के लिए करें, भक्ति का दिखावा करने के लिए नहीं। जीव का अहंकार मिटाने के लिए जपयज्ञ करना है, व्यक्तित्व का सर्जन करने के लिये नहीं।
भक्त समझता है कि अपने जीवन में जो सत्कर्म है वह भगवान का कृपा-प्रसाद है और जो दोष हैं वे अपने हैं। जिनका योग में प्रेम होता है उसका अहंकार परमात्मा में विलय होता है। जिसका योग में प्रेम में नहीं होता उसका संस्कारों में प्रेम होता है। जो संस्कारों के अनुरूप कर्म करता है वह कर्मों में बँध जाता है। यज्ञ के अनुरूप जो कर्म करता है वह मुक्ततता का अनुभव करता है। कुछ माँ-बाप के संस्कार, कुछ दादा-दादी के संस्कार, कुछ नाना-नानी के संस्कार और कुछ अपने पूर्व जन्म के संस्कार के मुताबिक जीव अपनी वासनापूर्ति के लिए कर्म करता रहता है तो अपना कर्म-बन्धन बढ़ाता रहता है। यदि वह सजग होकर यज्ञार्थ कर्म करता जाय, अपने तन-मन बुद्धि पर लदी हुई संस्कारों की जाल को काटता जाय तो फिर वे घड़ियाँ दूर नहीं कि वह दिल में आराम पाकर दिलबर का साक्षात्कार कर ले।
यज्ञार्थ कर्म करने वाला महा धनवान होता है, अलौकिक आध्यात्मिक धन से वह धनी होता। उसके चित्त की धारा अवर्णनीय शान्ति को, निर्विषय निर्मल आनन्द को पाती है। यज्ञार्थ जीवन जीने वाला जीवनदाता को पा लेता है।
साधक वही है जो निरन्तर सावधान रहे। वह अपने जीवन पर निगरानी रखता है कि, 'मेरा कर्म कामार्थ तो नहीं हो रहा है ? अहंकारार्थ तो नहीं हो रहा है ?' ऐसी सावधानी रखनेवाला व्यक्ति ही साधक कहा जाता है। ऐसा साधक अपने साध्य को पा लेता है।
जो कर्म का कर्त्ता है वही कर्मफल को भोक्ता है। जो यज्ञार्थ कर्म करता है वह धीरे-धीरे कर्त्ताभाव से पार हो जाता है। कर्त्तापन-भोक्तापन से पार होने वाला परमात्म-पद में स्थित होने लगता है। पाप-पुण्य कर्त्ता को लगते हैं। सुख-दुःख भोक्ता को लगते हैं। कर्त्ता अपने को व्यक्ति मानता है तो पाप-पुण्य लगता है। कर्त्ता अपने को व्यक्ति माने, जहाँ से कर्त्ता को सत्ता मिल रही है उस अपने मूल स्रोत का ख्याल रखे, अपने आत्म-स्वरूप में गोता लगाता रहे तो पाप-पुण्य से रहित हो जाता है। जो पाप, पुण्य से रहित है वह सुख-दुःख के भोग से भी रहित हो जाता है। वह परम पद में स्थित हो जाता है।
निकम्मा आदमी तो मुर्दा है। अशुद्ध कर्म करने वाला आदमी पापी है। वासना-पूर्ति के लिए कर्म करने वाला भोगी है। परमात्मा को स्नेह करते हुए, उनकी प्रसन्नता के लिए कर्म करने वाले योगी है।
कर्त्ता में अगर ज्ञान के संस्कार हैं तो उसे आत्मबोध होगा। कर्त्ता में अगर भक्ति के संस्कार है भगवदभाव, भगवत्प्रेम प्रकट होगा। वह भगवान के संतोष के लिए, भगवान की प्रसन्नता के लिए कर्म करेगा और भगवान की कृपा-प्रसाद पा लेगा। कर्त्ता में वेदान्त के संस्कार होंगे तो कर्मबन्धन काटकर अपने निज स्वरूप में जग जाता है।
पाप कर्म छुपकर करें तो भी वह फल देता ही है तो प्रभु-प्रीत्यर्थ निष्काम कर्म करें तो वह क्यों फल नहीं देगा ? वह कर्म ऐसा फल देगा कि वह फल की गिनती में नहीं आता। ऐसा परम फल देगा वह कर्म।
जितना-जितना निष्काम कर्म होता है उतना परमात्म-आनन्द प्रकट होता है, स्नेह का स्वभाव छलकता है। परमात्मा का स्वभाव है स्नेह और उदारता। जो यज्ञार्थ कर्म करता है वह अपने इस परमात्म-स्वभाव को जगा लेता है।
ध्यान करने बैठो तो प्रारम्भ में थोड़े प्राणायाम कर लो। श्वास छोड़ते समय भावना करो कि, "मैं श्वास के साथ काम-क्रोध और राग-द्वेष को अलविदा दे रहा हूँ।" श्वास भीतर भरते समय भावना करो कि "अब मैं यज्ञार्थ कर्मों से जीवन को निर्मल बना रहा हूँ।"
प्रकृति में जो कार्य हो रहा है, यज्ञार्थ हो रहा है। ज्ञानवालों के जीवन में जो कार्य हो रहा है वह यज्ञार्थ हो रहा है। अपने में भी यज्ञार्थ जीवन जीने की क्षमताएँ बढ़ाते जाओ।
जो कर्म महान् दृष्टि से अनुशासित होते हैं वे कर्त्ता को बन्धन-मुक्त करते हैं। यह अनुशासन सदगुरू का हो सकता है, आत्मवेत्ता संतों का होता है या पवित्र शास्त्रों का होता है। साधक को अपने कर्मों पर निगरानी रखनी चाहिए कि वे गुरू या शास्त्रों को अनुशासन में हो रहे हैं कि अपनी वासना से प्रेरित होकर ही रहे हैं। क्षुद्र दृष्टि से किये जाने वाले कर्म कर्त्ता को बाँधते हैं। कर्म में जितनी उदार दृष्टि होती है उतना ही वे कर्म कर्त्ता को कृर्त्तृत्व अभिमान से हटाकर परब्रह्म परमात्मा में टिकने का अधिकारी बनाते हैं।
जाँच करोः आपके कर्मों में सच्चे अनुशासक की दृष्टि है ? .....कि कच्चे मन की मान्यताएँ हैं ? अगर कच्चे मन की मान्यताओं के मुताबिक कर्म हो रहे हैं तो वे कर्म आगे चलकर बन्धन रूप बनेंगे और अशान्ति पैदा करेंगे। अगर उदार शास्त्रदृष्टि के अनुसार कर्म हो रहे हैं तो वे कर्म बन्धन की बेड़ियाँ काटकर तुम्हें निर्दोष नारायण के स्वरूप में प्रतिष्ठित कर देंगे।
एक होती है शाश्वत दृष्टि और दूसरी होती है क्षुद्र दृष्टि यानी संकीर्ण दृष्टि, तुच्छ भोग की दृष्टि। शाश्वत दृष्टि यानी शाश्वत परमात्मा में टिकने वाली दृष्टि। असीम श्रीहरि को साक्षी रखकर जो कर्म होते हैं वे महान दृष्टि के अनुशासन में कर्म होते हैं। वे कर्म हमारे जीवन को पूर्णता की ओर ले जाते हैं।
आपका श्वासोच्छ्वास उस पूर्ण परमात्मा के साथ जुड़ा है। आप जिस धरती पर खड़े हैं उस व्यापक धरती से जुड़े हैं, व्यापक आकाश से जुड़े हैं। ऐसे ही आप जो कर्म करें वह व्यापक विश्वात्मा के अनुशासन के मुताबिक यज्ञार्थ करें तो आप कर्त्तापन और भोक्तापन के भाव से पार होकर निर्दोष नारायण स्वभाव में जुड़ जायेंगे, ब्रह्म स्वभाव में जग जायेंगे।
अपने नारायण स्वभाव को प्यार करते जाओ... उसे प्रार्थना करते जाओ, रिझाते जाओः "हे देव ! अब हमारा देखना यज्ञार्थ हो जाये, हमारा भोजन करना, सोना यज्ञार्थ हो जाये। हे प्रभु हम तेरी विरह में रोयें.... तेरे प्यार में हँसें। तुझे पाने के लिए अपने तन को तन्दुरूस्त रखें। भोग भोगने के लिए नहीं, बड़ा कहलाने के लिए नहीं लेकिन बड़पप्न मिटाकर वास्तव में जो बड़ा है उस उदार स्वभाव को जगाने के लिए जियें। हे विश्वेश्वर ! हे देवेश्वर ! हे सर्वेश्वर ! हम जो भी करें, तुझे रिझाने के लिए करें।
जब-जब कार्य करो, उत्साह से करो, यज्ञार्थ करो। उन कार्यों से बहुजन हिताय.... बहुजन सुखाय भावना की सुगन्ध आये। बहुजनों में बैठा हुआ वह एक, बहुरूपों में बैठा हुआ वह अरूपी सन्तुष्ट हो और तुम्हारे दिल में प्रकट हो जाय, बस इसीलिए कर्म करो।
तुम इसे प्यार करो जो सचमुच प्यारा है। वह प्यारा तुम्हारे हृदय में प्रकट होने का इन्तजार कर रहा है। अगर वह इन्तजार न करता तो तुम्हें सत्संग में जाने के लिए प्रेरित भी नहीं करता... सत्साहित्य पढ़ने के लिए उत्सुक भी नहीं करता।
अभागा आदमी सत्संग में नहीं जा सकता।
आपका अन्तःकरण जिस देव के आधार पर है वह देव ब्राह्माण्डों में व्याप्त है। उस देवेश्वर को पाने के लिए, उस सर्वेश्वर को रिझाने के लिए, अपनी अखण्डता और व्यापकता जगाने के लिए, परिच्छिन्न आत्मदेव को रिझाने के लिए ही जीवन के सब क्रिया कलाप हों।
भगवान में जिसकी प्रीति है वह अहंकार को नहीं पोसता। ज्ञान में जिसकी प्रीति है वह प्रकृति के आकर्षणों से प्रभावित नहीं होता।
हम उसे ही प्यार करेंगे जो सचमुच में प्यारा है। हम उसी में शान्ति पायेंगे जिससे योगेश्वरों को सत्ता मिलती है। उस सर्व सत्ताधीश को हम स्नेह करेंगे।
क्षुद्र दृष्टि को छोड़कर हम उदारत्मा गुरुदेव की अनुशासित दृष्टि से कर्म करेंगे। आलस्य और प्रमाद छोड़कर उत्साह से कार्य करेंगे।
जप करते समय, कीर्तन करते समय, ध्यान करते समय अपने दिल और दिमाग को दिव्य भावना से भर दो.... हृदय-मंदिर को इस आलोक से आलोकित कर दो कि हम अपने प्रियतम परमात्मा में पहुंच रहे हैं। .....हम अपने परिच्छिन्न अहंकार को मिटाये जा रहे हैं। हम जो भी कर रहे हैं यज्ञार्थ ही कर रहे हैं....। हमारा रोम-रोम..... हमारी रग-रग पावन हो रही है परमात्म प्रेम से।
सत्संग की महिमा लाबयान है.... परमात्मा की महिमा लाबयान है। ऐसी लाबयान चीजों की सहज में प्राप्ति हो रही है। सत्संग में भगवन्नाम का स्मरण हो रहा है, जप हो रहा है, कीर्तन और ध्यान हो रहा है, हरिचर्चा हो रही है, आत्म-परमात्मदेव का अनुसन्धान हो रहा है, जन्म जन्मान्तर की थकान मिट रही है।
यज्ञार्थ कर्म कर्त्ता को परमात्मा की प्राप्ति करा देता है। सत्संग में जिसकी प्रीति है, योग में जिसकी प्रीति है, ध्यान में जिसकी प्रीति है वह भोग के खड्डों से बच जाता है। जिसकी सत्संग में प्रीति नहीं, योग में प्रीति नहीं, ध्यान में प्रीति नहीं वह कुसंस्कारों का शिकार हो जाता है।
जीव का स्वभाव है नित्य, मुक्त, शुद्ध, बुद्ध, आनन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन। वह दिव्य स्वभाव अपना भूल गया है.... क्यों ? क्या विघ्न बीच में आ गया है ?
चाह
चमारी चूहड़ी
अति नीचन की
नीच।
तू
तो पूरन
ब्रह्म था जो
चाह न होती
बीच।।
सुख की चाह करके जीव क्षुद्र वस्तुओं के लिए, क्षुद्र भोगों के लिए प्रवृत्ति करता है। वह क्षुद्र अनुशासन के प्रेरित होकर कर्म करता है। विराट के अनुशासन में अपना जीवन ढाले तो विराट अनुशासन उसको अपने स्वभाव में जगाकर मुक्त कर देता है। अतः अपने जीवन को विराट परमात्मा से एक हो जाने की भावना से तरबतर बनाकर यज्ञार्थ कर्मों में बिताना चाहिए।
प्रवृत्ति तो करनी ही चाहिए। प्रवृत्ति के बिना कोई जीव रह ही नहीं सकता।
न हि
कश्चित्
क्षणमपि जातु
तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते
ह्यवशः कर्म
सर्वः
प्रकृतिजैर्गुणैः।।
'निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षण मात्र भी बिना कर्म किये नहीं रहता, क्योंकि सारा मनुष्य-समुदाय प्रकृतिजनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है।'
(भगवद गीताः 3.5)
शरीर से प्रवृत्ति कोई रोक दे तो भीतर ही भीतर मन मनोराज खड़ा कर देगा, विचारों की जंजीरें बनाना शुरू कर देगा। आलसी-प्रमादी होकर पड़ा रहना कोई निवृत्ति नहीं है। ऐसा मुर्दा जीवन भी कोई जीवन है ?
आलसी, प्रमादी, मुर्दा जीवन जीने से तो सकाम कर्म करना ठीक है। सकाम कर्म से निष्काम कर्म उत्तम है। निष्काम कर्म करते-करते नैष्कर्म्यसिद्धि हो जाती है, कर्मों कि पूर्णाहुति हो जाती है, कर्त्ता अपने आत्म-स्वभाव में जग जाता है।
कोई चीज मिल जाना बड़े भाग्य की बात नहीं है। कोई चीज खो जाना दुर्भाग्य की बात नहीं है। चीज को खो जाने के कारण दुःखी हो जाना दुर्भाग्य की बात है। चीज मिल जाये उसमें आसक्त हो जाना दुर्भाग्य की बात है। चीज मिल जाय तब और खो जाय तब सम रहना यह बड़े भाग्य की बात है।
चीज मिल जाय उसका ठीक उपयोग करना, चीज खो जाय उसको खोजना लेकिन समता नहीं खोना। समता के सिंहासन पर डटे रहना यह परम सौभाग्य है।
समता उतनी मजबूत होती जाएगी जितना यज्ञार्थ कर्म में कर्त्ता आगे बढ़ता जायेगा। स्वार्थ-त्याग से जीवन जियेगा उतना ही जीवन उन्नत होता जायेगा। स्वार्थी आदमी भी खाता-पीता है चिन्ता के साथ। निःस्वार्थी अपने शरीर के सुख-चैन की परवाह नहीं करता। उसके लिए प्रकृति के विराट आयोजन में यथायोग्य व्यवस्था होती रहती है।
अपने देह की ममता छोड़ने के बराबर और कोई ऊँची अवस्था नहीं। देह में से 'अहं' और 'मम' उठ गया तो फिर तुम्हारा शरीर, तुम्हारा मन, तुम्हारी बुद्धि, स्थूल-सूक्ष्म-कारण ये तीनों शरीर विराट के साधन बन जायेंगे। तुम्हारे द्वारा विश्वनियन्ता काम करने लगेगा।
जैसे लावारिस माल सरकार का होता है। तुम्हारा स्वार्थ चला गया, देह में से अहंता-ममता चली गई तो अन्तःकरण हो गया परमात्मा का।
निःस्वार्थ कर्म करने से स्वार्थ विलीन हो जाता है। अन्तःकरण स्वच्छ हो जाता है, फिर परमात्मा उसके द्वारा काम करता है। परमात्मा की निगाह मात्र से हजारों आदमी आनन्दित होते हैं।
भूत और भविष्य की चिन्ता मत करो। बीत गया उसका शोक न करो। 'है' उसको हँसकर बिताओ। आयेगा उससे विमोहित मत हो।
माया में अदभुत शक्ति है। स्वार्थ ने तुमको संकीर्ण कर दिया। कामनाओं ने तुम्हें लूट लिया। चिंतित हो रहे हो कि मेरा क्या होगा ? अरे, माता के गर्भ में थे तब अपने रक्षण और पोषण की चिन्ता की थी ? उस विराट परमात्मा ने कितनी बढ़िया व्यवस्था की थी। बाहर आकर उस निर्दोष अवस्था में रहे नहीं स्वार्थ से प्रेरित होकर संकीर्ण हो गये। अब तुम फिर से यज्ञार्थ कर्म करते जाओ, निर्दोष निर्मल आत्म-स्वभाव में जगते जाओ। विराट अनुशासन तुम्हारे शरीर की सँभाल लेने के लिए प्रकृति को प्रेरित करता जायेगा।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
रामायणकार कहते हैं-
नाम
अखिल अघ पुंज
नसावन.....।
भगवन्नाम का बड़ा भारी प्रभाव है। सारे पापों के समूह को नाश करने वाला है भगवान का नाम। भगवान का वाचिक नाम लेते-लेते मानसिक नाम में डूबते जायें तो सौ गुना अधिक लाभ करता है। नाम-जप के समय शरीर की रग-रग भगवान के प्यार में तल्लीन होती जाये, रोम-रोम में स्नेह से पुलकित होता जाय।
कहाँ
लगी कहुँ नाम
बड़ाई राम न
सके नाम गुण
गाई।
भगवान स्वयं भी नाम का पूरा बयान नहीं कर सकते। सत्संग की महिमा का वर्णन, संत समागम का वर्णन और नाम-महिमा का वर्णन लाबयान है। जितना जिनको लाभ हुआ है उतना गाया है। पूरा बयान तो कोई नहीं कर पाये।
यह
राज समझ में
तो आता है
लेकिन समझाया
नहीं जाता।
वेदान्त श्रवण के लिए एकाग्रता करनी चाहिए। ध्यान से एकाग्रता आती है। नाम-जप से हृदय में निर्मलता आती है। मन की एकाग्रता, हृदय की निर्मलता और बुद्धि की मोक्षदायी तीव्र जिज्ञासा, आकांक्षा और ज्ञान के अनुकूल मनन को ही अभीष्ट माना गया है आध्यात्मिक साधना में।
आत्मज्ञान का श्रवण महापुण्यदायी है। आत्मज्ञान का श्रवण सब साधनों से उत्तम माना गया है। उस श्रवण के लिए मन की एकाग्रता, हृदय की पवित्रता और बुद्धि की जिज्ञासा, ये तीन साधन जब जुड़ते हैं तब थोड़े ही समय में साधक का परम कल्याण हो जाता है।
लेबोरेटरी में पदार्थों का विश्लेषण करना एक बात है, दुनियादारी का व्यवहार करना यह दूसरी बात है, रीत-रिवाज के मुताबिक धार्मिक क्रियाएँ करना यह तीसरी बात है और अपने दिल में ही दिलबर को निहार कर मोक्ष पा लेना, मुक्ति पा लेना सबसे अदभुत बात है।
देश की सेवा अच्छी है, समाज की सेवा अच्छी है लेकिन भगवद् –भक्ति तो कुछ निराली ही चीज है। जो भगवद्-भक्ति करता है उसके द्वारा वातावरण इतना मधुर और पवित्र हो जाता है कि लोगों की शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक उन्नति होने लगती है। ऐसे पुरूष का नाम सुनकर भी लोगों के हृदय में सत्प्रेरणा और सदभाव पैदा हो लगता है। उनके सान्निध्य, दर्शन वाणी से तो प्रेरणा और सेवा होती ही रहती है। चाहे स्थूल दृष्टि से ऐसे महापुरूष कुछ भी करते हुए न दिखें फिर भी उनका अस्तित्व देश के लिए बड़ा हितावह होता है, मानव जात के लिए बड़ा कल्याणकारी होता है।
रामानंद स्वामी हरिनाम-स्मरण में तल्लीन रहते थे, रामरस में मस्त रहते थे। एकबार कोई सज्जन अपने बेटे को लेकर उनके दर्शनार्थ गये। देखा तो बाबाजी नहीं थे। जानकर बड़ा उदास हो गया। उसका लड़का बहुत बीमार था। काफी इलाज किये, लाभ नहीं हो रहा था। अब गुरू महाराज का ही सहारा था। शिष्य से पूछाः
"गुरू महाराज कहाँ पधारे हैं ?"
"महाराज किसी महापुरूष से मिलने गये हैं।"
"मेरे बच्चे की स्थिति बड़ी गम्भीर है। गुरू महाराज के आशीर्वाद लेने आया था। उनके सिवा मेरा और कोई नहीं। अब क्या किया जाय ?" वह गृहस्थ उदास हो गया। फिर शिष्य से विनती कीः
"अब आप ही कोई उपाय बताइये। आप गुरू महाराज की सेवा कर रहे हैं, सदा उनके पावन सान्निध्य का सेवन कर रहे हैं, निरन्तर दर्शन कर रहे हैं, ध्यान-भजन कर रहे हैं। ब्रह्मवेत्ता सदगुरू की सेवा करने वाला भी पुण्यात्मा होता है। जो रामजी के परम भक्त हैं, परमात्मा के भक्त हैं, उन भक्त के भी जो भक्त हैं, दासों के भी जो दास हैं वे भी हमारे लिये वन्दनीय हैं, पूजनीय हैं। आप गुरू महाराज के नित्य चरणसेवी हैं। अब आप ही कोई उपाय बता दीजिये इस बच्चे के लिए। आप जो बोलेंगे वह आशीर्वाद हो जायेगा।"
शिष्य ने गुरू महाराज का स्मरण करके जो मन में आया वह बता दियाः "