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प्रातःस्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू के

सत्संग-प्रवचन

निश्चिन्त जीवन

पूज्य बापू का पावन सन्देश

हम धनवान होगे या नहीं, चुनाव जीतेंगे या नहीं इसमें शंका हो सकती है परंतु भैया ! हम मरेंगे या नहीं, इसमें कोई शंका है? विमान उड़ने का समय निश्चित होता है, बस चलने का समय निश्चित होता है, गाड़ी छूटने का समय निश्चित होता है परंतु इस जीवन की गाड़ी छूटने का कोई निश्चित समय है?

आज तक आपने जगत में जो कुछ जाना है, जो कुछ प्राप्त किया है.... आज के बाद जो जानोगे और प्राप्त करोगे, प्यारे भैया ! वह सब मृत्यु के एक ही झटके में छूट जायेगा, जाना अनजाना हो जायेगा, प्राप्ति अप्राप्ति में बदल जायेगी।

अतः सावधान हो जाओ। अन्तर्मुख होकर अपने अविचल आत्मा को, निजस्वरूप के अगाध आनन्द को, शाश्वत शांति को प्राप्त कर लो। फिर तो आप ही अविनाशी आत्मा हो।

जागो.... उठो.... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ। सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा में अथाह सामर्थ्य है। अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके।

सदा स्मरण रहे कि इधर-उधर भटकती वृत्तियों के साथ तुम्हारी शक्ति भी बिखरती रहती है। अतः वृत्तियों को बहकाओ नहीं। तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ और व्यवहार-काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठा में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।

अनुक्रम

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निवेदन

आत्मवेत्ता, जीवन्मुक्त, प्राणीमात्र के परम सुहृद संतों के दिव्य अनुभूतों एवं गीता, रामायण, उपनिषद व पुराणों के पावन प्रसंगों की लेती हुई.... भक्तों-साधकों को अपने प्रसाद में सराबोर करने वाली...... 'मधुर-मधुर नाम हरि ॐ' के संकीर्तन नाद से हर दिल में ईश्वरीय मस्ती जगाने वाली सत्संग-सरिता को लिपिबद्ध करके आपके करकमलों में रखने का सौभाग्य समिति को प्राप्त कर रहा है।

इसमें विवेक-वैराग्य को बढ़ाकर आत्मा परमात्मा के अभिमुख कराने वाले भिन्न-भिन्न प्रवचन और प्रसंग हैं। कहीं कहीं अत्यंत सूक्ष्म तत्त्वज्ञान है तो कहीं कहीं सारगर्भित, सहज समझ में आ जाय ऐसे इशारे हैं।

इस वेदवाणी को, अनुभववाणी को एक बार ही पढ़कर रख नहीं देना है अपितु बार-बार इसका पठन करके नये नये भाव और वेदान्त की सूक्ष्मता समझकर संसार में जीवन्मुक्तावस्था पाने की सामग्री और प्रेरणा लेना है।

कृपया इस पुस्तक का बार-बार पठन-मनन आप भी करें और दूसरों को भी इसमें सहभागी बनाकर पुण्य प्राप्त करें।

अस्तु.....।

विनीत,

श्रीयोग वेदान्त सेवा समिति।

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अनुक्रम

पूज्य बापू का पावन सन्देश.. 2

निवेदन.. 3

चिन्ता से निश्चिन्तता की ओर. 4

जीवन्मुक्तों की महिमा... 12

सर्व बन्धनों से मुक्ति का उपाय.. 24

धर्मानुष्ठान और शरीर-स्वास्थ्य...... 33

कुकर्म के फल से कोई बच नहीं सकता... 48

विवेक की धार तेज बनाओ... 50

गुरू प्रसाद. 58

सत्संग-सरिता... 61

 

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चिन्ता से निश्चिन्तता की ओर

अन्तःकरण की दो धाराएँ होती हैं- एक होती है चिन्ता की धारा और दूसरी होती है चिन्तन की धारा, विचार की धारा।

जिसके जीवन में दिव्य विचार नहीं है, दिव्य चिन्तन नहीं है वह चिन्ता की खाई में गिरता है। चिन्ता से बुद्धि संकीर्ण होती है। चिन्ता से बुद्धि का विनाश होता है। चिन्ता से बुद्धि कुण्ठित होती है। चिन्ता से विकार पैदा होते हैं।

जो निश्चिन्त हैं वे दारू नहीं पीते। जो विचारवान हैं वे फिल्म की पट्टियों में अपना समय बरबाद नहीं करते। सौ वेश्याओं के पास जाना इतना बुरा नहीं जितना फिल्म में जाना बुरा है ऐसा स्वामी माधवतीर्थजी ने लालजी महाराज को कहा। लालजी महाराज पूर्व जीवन में नाटक के रसिया थे। नाटक देखने के लिए दो पाँच दस मील चलना पड़े तो भी चलकर नाटक देख लेते। जब कमाने लगे तब अपने पैसों से दूसरों को भी नाटक दिखाने की वृत्ति बनी रहती। लेकिन संत के दो वचन लग गये, सदविचार उत्पन्न हो गया तो जीवन परिवर्तन हो गया। अभी आपके सामने ऊँचे आसन पर आदर योग्य हो रहे हैं। यह विचार का ही तो प्रभाव है।

स्वामी माधवतीर्थ ने कहा कि सौ वेश्याओं के पास जाना उतना हानिकारक नहीं जितना फिल्म में जाना हानिकारक है। वेश्या दिखेगा कि हानि है लेकिन फिल्म के गहरे संस्कार में पता ही नहीं चलता कि हानि हो रही है। फिल्म में जो दिखता है वह वास्तव में सच्चा नहीं है फिर भी हृदय में जगत की सत्यता और आकर्षण पैदा कर देता है। फिर हृदय में अभाव खटकता रहेगा। अभाव खटकता रहेगा तो चिन्ता के शिकार बन जाएँगे। चलचित्र विचार करने नहीं देंगे, इच्छा बढ़ा देंगे। हल्की सांसारिक इच्छाओं से आदमी का विनाश होता है।

विचारवान पुरूष अपनी विचारशक्ति से विवेक-वैराग्य उत्पन्न करके वास्तव में जिसकी आवश्यकता है उसे पा लेगा। मूर्ख आदमी जिसकी आवश्यकता है उसे समझ नहीं पायेगा और जिसकी आवश्यकता नहीं है उसको आवश्यकता मानकर अपना जीवन खो देगा। उसे चिन्ता होती है कि रूपये नहीं होंगे तो कैसे चलेगा, गाड़ी नहीं होगी तो कैसे चलेगा, अमुक वस्तु नहीं होगी तो कैसे चलेगा। उसे लगता है कि अपने रूपये हैं, अपनी गाड़ी है, अपना साधन है, हम स्वतन्त्र हैं। आपके पास गाड़ी नहीं है तो परतन्त्र हो गये..... रूपये पैसे नहीं हैं तो परतनत्र हो गये।

उन बेचारे मन्द बुद्धिवाले लोगों को पता ही नहीं चलता कि रूपये पैसे से स्वतन्त्रता नहीं आती। रूपये पैसे हैं तो आप स्वतन्त्र हो गये तो क्या रूपये-पैसों की परतंत्रता नहीं हुई ? गाड़ी की, बंगले की, फ्लेट की, सुविधाओं की परतंत्रता हुई। इन चीजों की परतंत्रता पाकर कोई अपने को स्वतंत्र माने तो यह नादानी के सिवाय और क्या है ? वास्तव में रूपये-पैसे, गाड़ी, मकान आदि सब तुम्हारे शरीर रूपी साधन के लिए चाहिए। साधन के लिए साधन चाहिए। तुम्हारे लिये इन चीजों की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम वास्तविक स्वरूप में परम स्वतंत्र हो। तुमको अपने ज्ञान की आवश्यकता है। अपना ज्ञान जब तक नहीं होगा तब तक तुम अपने साधन (शरीर) की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता मान लेते हो। साधन की आवश्यकता भी उतनी नहीं जितनी तुम मानते हो। आवश्यकताएँ मन के नखरे हैं। शरीर साधन है। साधन की जो नितान्त आवश्यकता है वह आसानी से पूरी होती है। जो बहुत जरूरी आवश्यकता है वह बहुत आसानी से पूरी होती है।

जैसे, पेट भरने के लिए रोटी की आवश्यकता है। उसमें ज्यादा परिश्रम नहीं है कमाने में और रोटी बनाने में। विभिन्न प्रकार के व्यंजन बनाने  में और पचाने में परिश्रम है।

अन्न से ज्यादा जरूरत है जल की। जल प्राप्त करने में उतना भी परिश्रम नहीं है जितना अन्न प्राप्त करने में होता है। जल से भी ज्यादा आवश्यकता है हवा की। जीने के लिए हवा के बिना नहीं रह सकते। ऐसी मूल्यवान हवा प्राप्त करने के लिए क्या परिश्रम करते हो ? कुछ नहीं। हवा तो सदा सर्वत्र मुफ्त में उपलब्ध है।

तुम्हारे शरीररूपी साधन को जो आवश्यकता है वह पूरी करने की व्यवस्था शरीर देने वाले दाता, सृष्टिकर्त्ता ईश्वर ने की है।

तुलसीदास जी कहते हैं-

पहले रच्यो प्रारब्ध पीछे दियो शरीर।

तुलसी चिन्ता क्यों करे प्रेम से भजो रघुवीर।।

पहले इस देह का प्रारब्ध बना है, बाद में देह बनी है। तुम्हारे इस साधन की जो आवश्यकता है उसकी पहले व्यवस्था हुई है, बाद में देह बनी है। अगर ऐसा न होता तो जन्मते ही तैयार दूध नहीं मिलता। उस दूध के लिए तुमने-हमने कोई परिश्रम नहीं किया था। माँ के शरीर में तत्काल दूध बन गया और बिल्कुल बच्चे के अनुकूल। ऐसे ही हवाएँ हमने नहीं बनाईं, सूर्य के किरण हमने नहीं बनाये, प्राणवायु हमने नहीं बनाया लेकिन हमारे इस साधन को यह सब चाहिए तो सृष्टिकर्त्ता ने पहले बनाया। अतः इस शरीररूपी साधन की जो नितान्त आवश्यकता है उसके लिए चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। सृष्टिकर्त्ता की सृष्टि में आवश्यकता पूरी करने की व्यवस्था है। अज्ञानजनित इच्छा-वासनाओं का तो कोई अन्त ही नहीं है। वे ही भटकाती हैं सबको।

इच्छाएँ हमारी बेवकूफी से पैदा होती हैं और आवश्यकताँ सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से पैदा होती हैं। शरीर बना कि उसकी आवश्यकताएँ खड़ी हुईं। सृष्टिकर्त्ता का संकल्प है कि तुम मनुष्य जन्म पाकर मुक्त हो जाओ। अगर तुम अपने को सृष्टिकर्त्ता के संकल्प से जोड़ दो तो तुम्हारी मुक्ति आसानी से हो जाएगी। तुम अपनी नई इच्छाएँ बनाकर चिन्ता करके अपने को कोसते हो तो तुम कर्म के भागी बन जाते हो।

जैसे, किसी ने गुनाह किया और जेल में है। चार साल की सजा हुई है। अब जेल का जैसा नियम है ऐसा वह चलता रहे तो चार साल कट जाएँगे, वह मुक्त हो जाएगा। अगर वह जेल में गड़बड़ी करे, तूफान करे, अपराध करे तो और सजा बढ़ जाएगी। ऐसे ही जीव इस संसाररूपी कारावास में आये हैं, कोई मनुष्य होकर आया है कोई पशु होकर आया है कोई पक्षी होकर। जो लोग समझते हैं कि हम संसार में चार दिन सुख भोगने के लिए आये हैं उन हतभागियों को पता ही नहीं कि संसार सुख लेने की जगह नहीं है। सुख लेगा कौन ? यह जरा खोजो। अपने शरीररूपी साधन को तुम सुखी करना चाहते हो ? साधन जड़ है। उसको कुछ ज्ञान नहीं होता। तुम सुखी होना चाहते हो तो तुम्हें अपना पता नहीं। तुम्हारी कल्पना ही है कि हम सुखी हो जाएँ। यही कारण है कि एक वस्तु पर किसी की कल्पना बन जाएः 'यह मिल जाए तो मैं सुखी....' तो उस कल्पनावाले को वह वस्तु सुखद भासती है। वही वस्तु दूसरे को सुखद नहीं भासती। शराबी, कबाबी, मांसाहारी को ये तुच्छ चीजें सुख देती हैं जबकि सदाचारी को ये सुख नहीं देती। तो मानना पड़ेगा कि वस्तुओं में सुख नहीं है, हमने कल्पना का सुख बनाया है।

कल्पना का सुख और कल्पना का दुःख बना बनाकर आदमी चिन्ता के घटीयंत्र में घूमता रहता है। इस प्रकार अपना सारा आयुष्य पूरा कर देता है।

चिन्ता उन्हीं की होती है जिनके पास ठीक चिन्तन नहीं है। शरीर की आवश्यकता पूरी करने के लिए पुरूषार्थ करना हाथ-पैर चलाना, काम करना, इसकी मनाही नहीं है। लेकिन इसके पीछे अन्धी दौड़ लगाकर अपनी चिन्तनशक्ति नष्ट कर देना यह बहुत हानिकारक है।

निश्चिन्त जीवन कैसे हो ?

निश्चिन्त जीवन तब होता है जब तुम ठीक उद्यम करते हो। चिन्तित जीवन तब होता है जब तुम गलत उद्यम करते हो। लोगों के पास है वह तुमको मिले इसमें तुम स्वतन्त्र नहीं हो। तुम्हारा यह शरीर अकेला जी नहीं सकता। वह कइयों पर आधारित रहता है। तुम्हारे पास जो है वह दूसरों तक पहुँचाने में स्वतन्त्र हो। तुम दूसरे का ले लेने में स्वतंत्र नहीं हो लेकिन दूसरों को अपना बाँट देने में स्वतंत्र हो। मजे की बात यह है कि जो अपना बाँटता है वह दूसरों का बहुत सारा ले सकता है। जो अपना नहीं देता और दूसरों का लेना चाहता है उसको ज्यादा चिन्ता रहती है।

लोग शिकायत करते हैं किः 'हमको कोई पूछता ही नहीं... हमको कोई प्रेम नहीं देता..... हमारा कोई मूल्य नहीं है...... हमारे पास कुछ नहीं है.....।'

तुम्हारे पास कुछ नहीं है तो कम से कम शरीर तो है। तुम्हारे पास मन तो है। रूपये-पैसे नहीं हैं चलो, मान लिया। लेकिन तुम्हारे पास शरीर, मन और चिन्तन है। तुम औरों की भलाई का चिन्तन करो तो और लोग तुम्हारी भलाई का चिन्तन किए बिना नहीं रहेंगे। तुम्हारे पास जो तनबल है, मनबल है, बुद्धिबल है उनको परहित में खर्च डालो। औरों का लेने में तुम स्वतन्त्र नहीं हो लेकिन अपना औरों तक पहुँचाने में स्वतन्त्र हो। अपना औरों तक पहुँचाना शुरू किया तो औरों का तुम्हारे तक अपने आप आने लग जाएगा।

होता क्या है ? अपना कुछ देना नहीं, औरों का ले लेना है। काम करना नहीं और वेतन लेना है। मजदूर को काम कम करना है और मजदूरी ज्यादा लेना है। सेठ को माल कम देना है और मुनाफा ज्यादा करना है। नेता को सेवा कम करना है और कुर्सी पर ज्यादा बैठना है। सब भिखमंगे बन गये हैं। देने वाला दाता कोई बनता नहीं, सब भिखारी बन गये। इसलिए झगड़े, कलह, विरोध, अशान्ति बढ़ रही है।

परिवार में भी ऐसा होता है। सब सुख लेने वाले हो जाते हैं। सुख देने वाला कोई होता नहीं। मान लेने वाले हो जाते हैं, मान देने वाला कोई नहीं होता। खुद जो दे सकते हैं वह नहीं देना चाहते हैं और लेने के लालायित रहते हैं। सब भिखमंगों के ठीकरे टकराते हैं।

वास्तव में मान लेने की चीज नहीं, सुख लेने की चीज नहीं, देने की चीज है। जो तुम दे सकते हो वह अगर ईमानदारी से देने लग जाओ तो जो तुम पा सकते हो वह अपने आप आ जाएगा।

तुम प्रेम पा सकते हो, अमरता की अनुभूति पा सकते हो, शाश्वत जीवन पा सकते हो। तुम्हारे पास जो नश्वर है वह तुम दे सकते हो। नश्वर देने की आदत पड़ते ही नश्वर की आसक्ति मिट जाती है। नश्वर की आसक्ति मिटते ही शाश्वत की प्रीति जगती है। शाश्वत कोई पराई चीज नहीं है। तुम सब कुछ दे डालो फिर भी तुम इतने महान् हो कि तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगड़ता। तुम बाहर की दुनियाँ से सब कुछ ले लो लेकिन तुम्हारा शरीर इतना तुच्छ है कि आखिर कुछ उसके पास रह नहीं सकता। यह बिल्कुल सनातन सत्य है।

अगर तुम भक्त हो तो भावना ऐसी करो कि सब भगवान का है। सबसे भगवान के नाते व्यवहार करो। अगर तुम ज्ञानमार्ग में हो तो विचार करो कि सब प्रकृति का है, सब परिवर्तनशील है। संसार और शरीर दोनों एक है। शरीर को संसार की सेवा में लगा दो।

शरीर संसार के लिए है। एकान्त अपने लिए है और प्रेम भगवान के लिए है। यह बात अगर समझ में आ जाय तो प्रेम से दिव्यता पैदा होगी, एकान्त से सामर्थ्य आयेगा और निष्कामता से बाह्य सफलताएँ तुम्हारे चरणों में रहेंगी।

शमा जलती है परवानों को आमंत्रण नहीं देती। परवाने अपने आप आ जाते हैं। ऐसे ही तुम्हारा जीवन अगर परहित के लिए खर्च होता है तो तुम्हारे शरीर रूपी साधन के लिए आवश्यकताएँ, सुविधाएँ अपने आप आ जाती हैं। लोग नहीं देंगे तो लोकेश्वर उनको प्रेरित करके तुम्हारी आवश्यकताएँ हाजिर कर देंगे।

जिसने बाँटा उसने पाया। जिसने सँभाला उसने गँवाया।

तालाब और नदी के बीच बात चली। तालाब कहता हैः

"पगली ! कलकल छलछल करती, गाती गुनगुनाती भागी जा रही है सागर के पास। तुझे वह क्या देगा ? तेरा सारा मीठा जल ले लेगा और खारा बना डालेगा। जरा सोच, समझ। अपना जल अपने पास रख। काम आयगा।"

नदी कहती हैः "मैं कल की चिन्ता नहीं करती। जीवन है बहती धारा। बहती धारा को बहने ही दो।"

तालाब ने खूब समझाया लेकिन सरिता ने माना नहीं। तालाब ने तो अपना पानी संग्रह करके रखा। ऐसे ऐसे मच्छों को, मगरों को रख दिये अपने भीतर कि कोई भीतर आ ही न सके, स्नान भी न कर सके, डर के मारे पानी पीने भी न आ सके।

कुछ समय के बाद तालाब का बँधियार पानी गंदा हुआ, उसमें सेवार हो गई, मच्छर बढ़ गये, गाँव में मलेरिया फैल गया। गाँव के लोगों ने और नगर पंचायत ने मिलकर तालाब को भर दिया।

उधर सरिता तो बहती रही। सागर में अपना नाम-रूप मिटाकर मिल गई। अपने को मैं सागर हूँ ऐसा एहसास करने लगी। उसी सागर से जल उठा, वाष्प बना, वर्षा हुई और नदी ताजी की ताजी बहती रही। 'गंगे हर.... यमुने हर.... नर्मदे हर...' जय घोष होता रहा।

गंगा ने कभी सोचा नहीं किः साधु पुरूष आयें तो उन्हें शीतल जल दूँ और सिंह आये तो उसे जहर डालकर दूँ। वह तो बहती जा रही है। सिंह आये तो भी शीतल जल पी जाए और साधु आये तो भी शीतल जल में नहा ले, जल पी ले।

जीवन भी एक ऐसी अमृतधारा हो कि कोई दुष्ट से दुष्ट हो, चाण्डाल से चाण्डाल हो और सज्जन से सज्जन हो, तुम्हारे द्वारा उन दोनों की कुछ न कुछ सेवा हो जाती है तो तुमने कर्जा चुका दिया। जरूरी नहीं है कि तुम्हारी सेवा का बदला वे लोग ही दें। क्या ईश्वर के हजार-हजार हाथ नहीं हैं देने के लिए ? लाखों-लाखों दिल उस परमात्मा के नहीं हैं क्या ?

त्याग से, प्रसन्नता से एकान्त से अदभुत विकास होता है। साधना काल में एकांतवास अत्यन्त आवश्यक है। भगवान बुद्ध ने छः साल तक उरणावलि अरण्य में एकान्तवास किया था। जिसस भारत में आकर सत्रह साल तक एकान्तवास में रहे थे। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य ने नर्मदा तट पर सदगुरू के सान्निध्य में एकान्तवास में रहकर ध्यानयोग, ज्ञानयोग इत्यादि के उत्तुंग शिखर सर किये थे। उनके दादागुरू एवं सदगुरू गौड़पादाचार्य ने एवं गोविन्दपादाचार्य ने एकान्त-सेवन किया था। अपनी वृत्तियों को इन्द्रियों से हटाकर अन्तर्मुख की थी।

कभी कभी अपने को बन्द कमरे में कुछ दिन तक रखो। प्रारंभ में तुम्हें अकेले रहने में सुविधा न होगी। पहले दो चार घण्टे ही रहो। आत्म-विचार को बढ़ाओ। आत्म-विचार को बढ़ाने वाले पुस्तक पढ़ो। जप करो। प्राणायाम करो। योगासन करो। मौन रखो। मौन से शक्तियों का विकास होता है। साधक ऊपर उठता है। उसकी तपश्चर्या से, मौन से, एकान्त-सेवन से, बन्द कमरे में अज्ञात रहने से सुषुप्त शक्तियाँ विकसित होती हैं। विरोध करने वाले भी उस साधक का आदर करने लग जाते है। अन्न जल, आजीविका की तकलीफ होती थी वह आसानी से दूर हो जाएगी। पुण्य बढ़ेगा।

आध्यात्मिक मार्ग में देखा जाए तो तुम्हारे शत्रु वास्तव में तुम्हारे शत्रु नहीं हैं। बाहर से मित्र दिखते हुए मित्र तुम्हारे गहरे शत्रु हैं। वे तुम्हारा समय खा जाते हैं और तुम्हारी आध्यात्मिक पूँजी चूस लेते हैं, तुमको भी पता नहीं चलता। उनको भी पता नहीं होता कि हम अपने मित्र की आध्यात्मिक पूँजी बरबाद कर रहे है। वे कुछ न कुछ व्यावहारिक काम, सामाजिक काम ले आते हैं, बातें ले आते हैं और तुम्हें बलात् उनके साथ सहमत होना पड़ता है। इन कार्यों में, प्रवृत्ति में तुम्हें संसारी लोगों का संपर्क होता है।

संसारी लोग की और साधक की दिशा बहुत अलग होती है। संसारी के पास जो जो संसार के पद-पदार्थ होते हैं उन्हें बढ़ाने की एवं भविष्य के हवाई किले बाँधने की इच्छा होती है। साधक अपने पास जो है उसको सत्कार्य में लगाने के लिए सोचता है और भविष्य में हरिमय हो जाने की इच्छा करता है।

साधक का लक्ष्य परमात्मा है और संसारी का लक्ष्य तुच्छ भोग है। संसारी की धारा चिन्ता के तरफ जा रही है और साधक की धारा चिन्तन के तरफ जा रही है।

छोटे विचारवाले तुम्हारे मित्र, जिनको संसार प्रिय है, जिनको संसार सच्चा लगता है, जो देह को मैं मान कर देह को सुखी करने में लगे हैं, जो सोचते हैं कि इतना किया है और इतना करके दिखाना है, इतना पाया है और इतना पाकर दिखाना है, इतना देखा है, इतना और देखना है ऐसे संसारी आकर्षणवाले लोगों के संपर्क में जब तुम आ जाओगे तब तुम्हारी एकाग्रता, तुम्हारी विचार-शक्ति, तुम्हारी आध्यात्मिक पूँजी, महीनों की साधना की कमाई अथवा अगले जन्मों की पुण्याई तुम बिखेर डालोगे।

जब आध्यात्मिक पूँजी बिखर जाती है तब साधक बेहाल हो जाता है। जिसस जब भारत के योगियों से योग के रहस्य सीखकर, आध्यात्मिक पूँजी वाले बनकर अपने देश में गये तब लोगों ने उनको माना, पूजा और जब जिसस लोक-सम्पर्क में अधिक आये, आत्म-विचार, एकान्त-सेवन और आत्म-मस्ती छूट गई फिर पूजा करने वाले उन्हीं लोगं ने जिसस को क्रॉस पर चढ़ाया। तब जिसस के उदगार निकलेः

O my God ! I lost my energy. ( हे मेरे प्रभु ! मैंने अपनी शक्ति खो दी।)

कहा जाता है कि जिसस का पुनरूत्थान हुआ। वे एकान्त में चले गये। अंतिम समय में एकान्त अज्ञातवास में रहे इसलिए आज पूजे जा रहे हैं।

वे ही महापुरूष बड़ा काम कर गये हैं, उन्होंने ही जगत का कल्याण किया है जिन्होंने एकान्त-सेवन किया है, जिन्होंने आत्म-विश्लेषण किया है, जिन्होंने तुच्छ वस्तुओं का आकर्षण छोड़कर, तुच्छ वस्तुओं की चिन्ता छोड़कर सत्य वस्तु का अनुसंधान किया है। उन्होंने ही जगत की सच्ची सेवा की है। उन्हीं की सिद्धान्त आज तक हम पर राज्य कर रहे हैं। उन महापुरूषों के संकल्प, उन महापुरुषों के आदर्श, उन महापुरूषों के चित्र हमारे दिल पर आज भी राज्य कर रहे हैं।

जिन्होंने 'तू-तू..... मैं-मैं....' करके डण्डे के बल से अपना अहंकार पोसने के लिए राज्य किया है उनकी सत्ता हमारे दिल पर राज्य नहीं कर सकती। जिन महापुरूषों की मधुर स्मृति हमारे हृदय सिंहासन पर आरूढ़ है वे चाहे वेदव्यास हों चाहे वशिष्ठजी महाराज हों, वल्लभाचार्य हों चाहे रामानुजाचार्य हों, एकनाथ जी हों चाहे नामदेव हों, संत ज्ञानेश्वर हों चाहे तुकारामजी हों, शुकदेवजी हों चाहे अष्टावक्र मुनि हों, उनका चित्र दिखे या कथा-प्रसंग सुनने में आये या सिद्धान्त की बात मिले, हमारे दिल पर अच्छा प्रभाव पड़ता है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन को चिन्तन के द्वारा महान् बनाया था।

विचार अपने विषय में होता है और चिन्ता दूसरे के विषय में होती है। अपने विषय में कभी चिन्ता नहीं होती। यह बिल्कुल नई बात लगेगी। अपने विषय में कभी चिन्ता नहीं होगी, अपने विषय में कभी संदेह नहीं होगा, अपने विषय में कभी भय नहीं होगा, अपने विषय में कभी शोक नहीं होगा। जब भय होता है, शोक होता है, चिन्ता होती है तो पर के विषय में होती है।

तुम अपने आप हो आत्मा, दूसरा है शरीर। स्व है आत्मा और पर है शरीर। शरीर के लिए सन्देह रहेगा कि यह शरीर कैसा रहेगा ? बुढ़ापा अच्छा जाएगा कि नहीं ? मृत्यु कैसी होगी ? लेकिन आत्मा के बारे में ऐसा कोई सन्देह, चिन्ता या भय नहीं होगा। आत्म-स्वरूप से अगर मैं की स्मृति हो जाए तो फिर बुढ़ापा जैसे जाता हो, जाय.... जवानी जैसे जाती हो, जाय.... बचपन जैसे जाता हो, जाय..... मेरा कुछ नहीं बिगड़ता।

दुनियाँ के सब लोग मिलकर तुम्हारे शरीर की सेवा में लग जाएँ फिर भी तुम्हारे स्व में कुछ बढ़ौती नहीं होगी। तुम्हारा विरोध में सारा विश्व उल्टा होकर टँग जाय फिर भी तुम्हारे स्व में कोई कटौती नहीं होगी, कोई घाटा नहीं होगा। ऐसा विलक्ष्ण तुम्हारा स्व है। इतने तुम स्वतन्त्र हो। संसार के सारे देशों के प्रेसिडेन्ट, प्रमुख, राष्ट्रपति, सरमुखत्यार, सुल्तान, प्राईम मिनिस्टर सब मिलकर एक आदमी की सेवा में लग जाएँ उसको सुखी करने में लग जाएँ फिर भी जब तक वह आदमी स्व का चिन्तन नहीं करता, स्व का विचार नहीं करता, आत्म विचार नहीं करता तब उसका दुर्भाग्य चालू रहता है। उपर्युक्त सब लोग मिलकर एक आदमी को सताने लग जाए और वह आदमी अगर आत्म-स्वरूप में सुप्रतिष्ठित है तो उसकी कोई हानि नहीं होती। उसके शरीर को चाहे काट दें या जला दें फिर भी वह आत्मवेत्ता अपने को कटा हुआ या जला हुआ मानकर दुःखी नहीं होगा। वह तो उस अनुभव पर खड़ा है जहाँ.....

नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्याप न शोषयति मारूतः।।

'आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, आग जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।'

(भगवद् गीताः 2.23)

शुकदेवजी और जड़भरत जी जैसे महापुरूषों को कई लोगों ने सताया लेकिन उनका तिनका तक बिगड़ा नहीं क्योंकि वे चिन्तन के बल से स्व में.... आत्मा में प्रतिष्ठित थे।

अभी विनाशकारी अणुबम इतनी मात्रा में बने हैं कि पूरी मानव जात उनसे सात बार मर सकती है। इस पृथ्वी पर मानो साढ़े तीन अरब आदमी हैं तो पच्चीस अरब आदमी मर सकें, उतने अणुबम बनाये गये हैं। आदमियों की शारीरिक आकृतियाँ मरेंगी, मिटेंगी लेकिन आदमियों का चैतन्य जो स्व है, आत्मा है उसको तो ये सब अणुबम मिलकर भी कुछ नहीं कर सकते। सब के सब अणुबम एक आदमी पर खर्च कर दिये जाएँ फिर भी उस आदमी की आत्मा को तनिक भी हानि नहीं हो सकती।

आपका 'स्व' इतना स्वतन्त्र है और शरीर 'पर' है। बेवकूफी से क्या हो गया है कि 'स्व' का पता नहीं और 'पर' को 'स्व' मान लिया..... शरीर को 'मैं' मान लिया।

व्यवहार में कहते हैं, 'मेरा हाथ....' तो तुम हाथ नहीं हो, हाथ से अलग हो। 'मेरा पैर....' तो तुम पैर नहीं हो, पैर से अलग हो। 'मेरा पेट...' तो तुम पेट नहीं हो, पेट से अलग हो। 'मेरा शरीर....' तो तुम शरीर नहीं हो, शरीर से अलग हो। 'मेरा मन.....' तो तुम मन नहीं हो, मन से अलग हो। 'मेरी बुद्धि....' तो तुम बुद्धि नहीं हो, बुद्धि से अलग हो।

तुम्हारे 'स्व' पर, आत्मा पर माया के दो आवरण हैं। माया की यह शक्ति है। जैसे विद्युत के तार में विद्युत दिखती नहीं लेकिन बल्बों के द्वारा, पंखों के द्वारा विद्युत की उपस्थिति का पता चलता है। ऐसे ही माया कोई आकृति धारण करके नहीं बैठी है लेकिन माया का विस्तार यह जगत दिख रहा है उससे माया के अस्तित्व का पता चलता है।

इस माया की दो शक्तियाँ हैः आवरण शक्ति और विक्षेप शक्ति। आवरण बुद्धि पर पड़ता है और विक्षेप मन पर पड़ता है। सत्कार्य करके, जप तप करके, निष्काम कर्म करके विक्षेप हटाया जाता है। विचार करके आवरण हटाया जाता है।

पचास वर्ष तपस्या की, एकान्त का सेवन किया, मौन रहे, समाधि की, बहुत प्रसन्न रहे, सुखी रहे लेकिन भीड़ भड़ाके में आते ही गड़बड़ होगी। भीड़ में वाहवाही होगी तो मजा आयेगा लेकिन लोग तुम्हारे विचार के विरोधी होंगे तो तुम्हारा विक्षेप बढ़ जाएगा। क्योंकि अभी बुद्धि पर से आवरण गया नहीं। अगर आवरण चला गया तो तुम्हें शूली पर भी चढ़ा दिया जाय, कंकड़-पत्थर मारे जाएँ, अपमान किया जाय फिर भी आत्मनिष्ठ के कारण तुम दुःखी जैसे दिखोगे लेकिन तुम पर दुःख का प्रभाव नहीं पड़ेगा, अपमान में तुम अपमानित जैसे दिखोगे लेकिन तुम पर अपमान का प्रभाव नहीं पड़ेगा। मृत्यु के समय लोगों को तुम्हारी मृत्यु होती हुई दिखेगी परन्तु तुम पर मृत्यु का प्रभाव नहीं पड़ेगा। तुम खाते-पीते, आते-जाते, लेते-देते हुए दिखोगे फिर भी तुम इन सबसे परे होगे। तुम आत्म-स्वरूप से कितने स्वतंन्त्र हो !

वासना से परतन्त्रता का जन्म होता है और आत्म विचार से स्वतन्त्रता का।

अनुक्रम

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जीवन्मुक्तों की महिमा

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।

छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः।।

'जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा नियुक्त हो गये हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित हैं, वे ब्रह्मवेत्ता पुरूष शान्त ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।'

(गीताः 5.25)

सब पाप नष्ट हुए बिना ब्रह्मनिष्ठा होती नहीं। जिनके सब पाप नष्ट हुए हैं उनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो जाते हैं। वे सम्पूर्ण प्राणियों के अर्थात् देव, गंधर्व, यक्ष, किन्नर, मनुष्य पशु पक्षी जो भी उनके संपर्क में आते हैं उनके हित में रत होते हैं। जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है वे ब्रह्मवेत्ता पुरूष शान्त ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

सब पाप मिट जाने का सौभाग्य जिनका होता है उनके सब संशय मिट जाते हैं।

माण्डूक्य उपनिषद के वैतथ्य प्रकरण में आता है कि ज्ञानी ब्रह्मसाक्षात्कार करके कैसा रहता है।

जड़वत् लोकमाचरेत्।

वह ज्ञानी लोगों में जड़ जैसा होकर रहता है, अज्ञानियों की तरह रहता है।

चार आदमियों ने भाँग पी ली। चारों भाँग के नशे में चूर हो गये। एक आदमी नशे में ऊटपटांग बोलने लगा। दूसरा गाना गाने लगा। तीसरा नाचने लगा। चौथा आदमी प्रगाढ़ नींद सो गया। सब नशा तो एक जैसा था लेकिन अपने अपने चित्त के संस्कार के मुताबिक चेष्टा करने लगे। ऐसे ही ब्रह्मसाक्षात्कार करने वाले ज्ञानियों का ज्ञान तो एक समान होता है पर लौकिक जीवन उनका अपना निराला ही होता है।

जिनके सब पाप अलविदा हो गये हैं वे अपने आत्म-परमात्म-स्वभाव में निसंशय हो जाते हैं।

लौकिक व्यवहार, खान-पान, रहन सहन से ज्ञानी को नापा नहीं जाता। वेश-भूषा से ज्ञान का पता नहीं चलता। आप अपने आपको नाप सकते हैं अपनी मति के अनुसार परन्तु जिनकी मति मतिदाता से अभिन्न हुई है, मति-गति से पार परमात्म-स्वरूप में जो स्थित हैं ऐसे ज्ञानियों को नापना असम्भव है। आपकी मति जितनी ऊँची होगी उतना आपका उनके बारे में ऊँचा अनुमान और आदर होगा। मति जब नीची होगी तब उनके बारे में नीचा अनुमान और नीचा निर्णय होगा। जब तक मनुष्य को पूर्ण आत्म-साक्षात्कार नहीं होता तब तक पूर्ण पुरूषों के प्रति श्रद्धा, भक्ति, मति, गति में चढ़ाव-उतार होता ही रहता है। अतः जल्दी पूर्णता को पाओ.... पूर्ण पुरूष को पहचानो और पूर्ण हो जाओ।

जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिनके सब संशय ज्ञान के द्वारा निवृत्त हो गये हैं, जो सम्पूर्ण प्राणियों के हित में रत हैं और जिनका जीता हुआ मन निश्चल भाव से परमात्मा में स्थित है, वे ब्रह्मवेत्ता पुरूष शान्त ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।

स्कंद पुराण में एक कथा आती हैः

एक जीवन्मुक्त महात्मा भिक्षा हेतु बस्ती में गये। एक कुम्हारिन रो रही थी। महात्मा ने पूछाः

"क्यों रोती हो बहन ?"

"महाराज ! मेरे पति देव हो गये।"

"न कोई मरता है न जीता है। जीना-मरना सब भ्रांति मात्र है। 'यह मेरा पति' ऐसा तूने सुन-सुनकर मान लिया था। सब पाँच भूत हैं और पाँच भूत माया मात्र हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश सब भ्रांति ही भ्रांति हैं। उनसे बने हुए पुतले भी भ्रांति मात्र हैं। कौन किसका पति... कौन किसकी पत्नी ? फिर क्यों रोती है ?"

जीवन्मुक्त महात्मा का तो अनुभव अपने ढंग का था लेकिन कुम्हारिन तो बेचारी अपनी दृष्टि से जी रही थी। वह बोलीः

"महाराज ! यह ज्ञान तो आप ही जानो। मैं तो इसीलिए रोती हूँ कि अब मिट्टी कौन लाएगा ? रौंदेगा कौन ? घड़े कौन बनाएगा ?

न कोई पति के लिए रोता है न पत्नी के लिए रोता है। सब रोते हैं अपनी सुविधा के लिए, अपने मतलब के लिए।

कुम्हारिन बोलती हैः "महाराज ! ये सब काम अब कौन करेगा ? मैं इसलिए रोती हूँ।"

महात्मा बोलेः "इतना काम तो हम ही कर देंगे बेटी, तू चिन्ता मत कर।"

वे महात्मा वहाँ कुम्हार का काम करने लग गये। हैं तो महात्मा ज्ञानी लेकिन जड़वत् लोकमाचरेत्। अज्ञानी जैसा आचरण भी कर लेते हैं। उनको ऐसा नहीं होता कि 'मैं ब्रह्मवेत्ता हूँ। मुझसे यह काम कैसे होगा !" उनको कोई पकड़ नहीं होती। ज्ञानी तो अपने सहित सारे विश्व को अपना आत्मा मानते हैं। ज्ञानी के भीतर भेद नहीं होता इसलिए उन्हें भीतर शांति होती है। हम लोगों के भीतर भेद होता है इसलिए हमारे मन-इन्द्रियों से अच्छा व्यवहार होता है तो हमें हर्ष होता है और मन-इन्द्रियों से कुछ ऐसा वैसा व्यवहार हो जाता है तो हमें शोक होता है। हमारे तन-मन का कोई आदर करता है तो हम खुश होते हैं, कोई उंगली उठाता है, अनादर करता है तो हम नाराज हो जाते हैं।

हम अपने को देह मानते हैं और दूसरों से अपेक्षा करते हैं कि वे हमारे साथ अच्छा व्यवहार करें। मेरे साथ पत्नी इस प्रकार चले, पुत्र इस प्रकार चले, परिवार इस प्रकार चले। हम अपनी मान्यताओं की गठरी सिर पर लेकर घूमते हैं। हमारी मान्यताओं के अनुकूल जो व्यवहार करता है उसके साथ राग होता है। जो प्रतिकूल चलता है उसके साथ द्वेष हो जाता है, भय हो जाता है, क्रोध हो जाता है।

ये राग और द्वेष, भय और क्रोध हमारे चित्त को मलिन करते हैं। अनुकूलता आती है तो चित्त में राग की रेखा गहरी होती है, प्रतिकूलता आती है तो द्वेष या भय की रेखा गहरी होती है। चित्त में रेखाएँ पड़ जाती हैं तो चित्त क्षत-विक्षत हो जाता है। फिर वह शांत, स्वस्थ नहीं रहता। ....और

अशान्तस्य कुतः सुखम्।

अशान्त चित्त को सुख कहाँ ? संशयवाले को सुख कहाँ ? उद्विग्न को सुख कहाँ ?

किसी जीवन्मुक्त महात्मा के चरणों में एक अदभुत स्वभाव वाला आदमी पहुँचा। बोलाः

"महाराज ! मैं चंबल की घाटी का हूँ। डाकू हूँ। अपनी शरण में रखोगे ?"

"हाँ, ठीक है।" महात्मा ने स्वीकृति दी।

"महाराज ! मैं दारू पीता हूँ।"

"कोई बात नहीं।"

"महाराज ! मैं जुआ खेलता हूँ।"

"कोई बात नहीं।"

"महाराज ! मैं दुराचार भी करता हूँ।"

"कोई बात नहीं।"

"महाराज ! मुझमें दुनियाँभर के दोष हैं।"

"कोई बात नहीं।"

"महाराज ! आप यह सब स्वीकार कर रहे हैं ?"

"भैया ! जब सृष्टिकर्त्ता तुझे अपनी सृष्टि से नहीं निकालता तो मैं तुझे अपनी दृष्टि से क्यों निकालूँ ?"

जो जीवन्मुक्त महापुरूष हैं वे ऐसा नहीं समझते कि मेरा आचरण सही है और दूसरे का आचरण गलत है। मेरा शरीर-तंत्र ठीक है, शुद्ध है, दूसरे का अशुद्ध है। ''मैं ठीक और दूसरा गलत..." ऐसा नहीं। दूसरों को भी मेरा अनुभव समझ में आ जाय, दुःखों और क्लेशों से छूट जाएँ ऐसी उन सर्वभूतहितेरताः महापुरूषों की चेष्टा होती है।

हम लोगों का हित इसी में है कि हम अपने आपको समझें। हम अपने आपको नहीं समझेंगे तो कैसी भी परिस्थिति होगी, चित्त का राग और द्वेष जाएगा नहीं।

वस्तुओं से प्राप्त जो सुख है अथवा हमारी मान्यताओं के अनुसार जो सुख है वह वास्तविक में राग का सुख है, आत्मा का सुख नहीं है। हमारी इच्छा के खिलाफ जो हो रहा है उससे जो दुःख होता है वह वास्तविक में बाहर दुःख नहीं है। हमारी मान्यताएँ हमको दुःख देती हैं।

को काहू को नहीं सुख दुःख करी दाता।

निज कृत कर्म हि भोगत भ्राता।।

हम लोग अपने ही विचार, अपनी ही मान्यताओं की गठरियाँ, अपने ही संस्कार पैदा करके दुःख की रेखाएँ खींचकर अपने को जंजीर में बाँधते हैं और सुख की रेखाएँ खींचकर अपने आप आसक्त होकर बँध मरते हैं।

गोस्वामी तुलसीदासजी महाराज ने संकल्प किया कि प्रभुजी युगल सरकार जिस रास्ते से यात्रा को गये उसी रास्ते में मैं यात्रा को जाऊँ। यात्रा करते-करते दण्डकारण्य आया। रास्ता सँकरा था। सँकरी पगदण्डी के किनारे झाड़ी में कोई भोगी आदमी वेश्या के साथ विलास कर रहा था। तुलसीदासजी रास्ते में आधे तक आ चुके थे। उन्होंने सोचा कि अगर वापस लौटूँगा तो भी उन लोगों को सन्देह होगा कि बाबाजी ने देख लिया। आगे जाऊँगा तो भी शरमिन्दे होंगे।

उन संत-प्रवर ने अन्धा होने का अभिनय किया। हाथ में लाठी थी। आँखें बन्द कर लीं। लाठी आगे ठोकते-ठोकते चलते हुए पुकारने लगेः

"ऐ भाई ! भगवान के नाम पर कोई रास्ता दिखा दो....।"

भोगी आदमी ने सोचा कि चलो, अच्छा हुआ। यह बाबा आ तो रहा था लेकिन अन्धा है। वह बोलाः

"महाराज ! सीधे सीधे चले जाओ चुपचाप.... जल्दी से। यही रास्ता है। निकल जाओ जल्दी।"

महाराज लकड़ी टेकते-टेकते घाटी की झाड़ी से बाहर निकले। आँखें खोली तो सामने सियाराम मुस्कुराते हुए मिले।

"प्रभु ! आप यहाँ कैसे ?"

"तुलसीदास ! सज्जन में भगवान देखना आसान है लेकिन सबमें भगवान देखने वाले, दुर्जन में भी भगवान देखने वाले तुम्हारे जैसे संत-प्रवर दुर्लभ हैं। ऐसे संतों को देखने के लिए मैं आ जाता हूँ।

यह जरूरी नहीं कि हम जैसा चाहते हैं ऐसा जगत बन जाएगा। यह सम्भव नहीं है। हम चाहेंगे ऐसी पत्नी होगी यह सम्भव नहीं है। पति ऐसा ही होगा यह सम्भव नहीं है। शिष्य ऐसा ही होगा यह सम्भव नहीं है। हम जैसा चाहें ऐसे गुरू बनें यह सम्भव नहीं है। यह सम्भव नहीं है ऐसा समझते हुए भी जितना भी उनका कल्याण हो सके ऐसी उनको यात्रा कराना यह अपने हृदय को भी खुश रखना है और उनका भी कल्याण करना है। हृदय को भी खुश रखना है और उनका भी कल्याण करना है।

अगर हम किसी प्रकार की पकड़ बाँध रखें तो हमें दुःख होगा। यदुवंशी लोग भगवान श्रीकृष्ण के कुल में पैदा हुए हैं। श्रीकृष्ण के होते हुए वे लोग बोतल पीकर एक दूसरे से युद्ध करके खत्म हो गये। सबके अपने-अपने संस्कार होते हैं। जी अपने संस्कार, मान्यताओं के पाश में बँधा है। यह पाश तब खत्म होता है जब हमारे पुण्य और आत्मविचार बलवान होते हैं। हमारे पुण्य जोर नहीं करेंगे तो हम निःसंशय नहीं हो सकेंगे। जितने अंश में हमारे पुण्य और आत्मविचार की कमजोरी है। हमारी मान्यताओं का जोर ज्यादा है, पुण्यों का जोर कम है। पुण्य तो हैं लेकिन मान्यताओं का इतना जोर है कि पुण्य कमजोर हो रहे हैं।

बुद्धेः फलं अनाग्रहः।

बुद्धि का फर क्या है ? अनाग्रह। हम जगत को ठीक कर सकें यह हमारे हाथ की बात नहीं है। हम सबको अन्न-वस्त्र दे दें यह हमारे हाथ की बात नहीं है। सबको मकान दे दें यह हमारे हाथ की बात नहीं है। सबको हमारी शुभ इच्छा के अनुसार चलायें यह हमारे हाथ की बात नहीं है लेकिन सबमें बैठा हुआ परमात्मा निर्लेप नारायण है, असंग है, बाकी सब प्रकृति की लीला है ऐसा समझकर यथाशक्ति सबका हित करना और सुखद विचारों से सुखी रहना हमार हाथ की बात है।

इसका मतलब यह नहीं कि हम आलसी हो जाएँ, प्रमादी हो जाएँ, कोई भूखा है तो भले भूखा मरे, कोई नंगा है तो भले नंगा रहे, हमारे पास ज्यादा वस्त्र हों तो छुपाकर रखें..... नहीं। उनमें अपना आत्मा देखकर उनके हित के लिए यथायोग्य करें लेकिन ऐसा नहीं सोचें कि मैं उनका हित नहीं करता तो इनका क्या होता.... मैं इनके बच्चों को अन्न वस्त्र नहीं देता, उनको नहीं पढ़ाता तो इनका क्या होता। नहीं....

आप और वे पृथक नहीं हैं। जैसे आप अपने शरीर के अंगों को पोसते हैं तो आपको ऐसा नहीं लगता कि आज मैंने अपने पैरों को मजबूत करने के लिए भोजन किया, पैरों के ऊपर उपकार किया। अपने अंगों की पुष्टि आप सहज भाव से करते हैं। आप भोजन करते हैं तो आँखों का हित हो जाता है, कानों का हित हो जाता है, हाथ पैर का हित हो जाता है, पेट और पीठ का हित हो जाता है। सारे शरीररूपी नगर का हित हो जाता है। आपको ऐसा अहंकार नहीं आता कि मैं भोजन करके सारे अंगों को पुष्ट करता हूँ। आप सहज स्वाभाविक शरीर के तमाम अंगों को पुष्ट करते हैं। आप अपने शरीर के हित में रत हैं। फिर भी शरीर के लिए आप जो कुछ सुविधाएँ चाहते हो वे सब सदैव सर्वत्र प्राप्त नहीं कर सकते। जितना हित कर सकते हैं उतना करते हैं।

जैसे आप अपने एक शरीर के साथ हित का व्यवहार करते हैं और जितना हित कर सकते हैं उतना करते हैं। उसका आपको अहंकार नहीं होता। ऐसे ही ज्ञानवान सर्व भूतों का उनके अधिकार के अनुसार जितना हित होता है उतना कर देते हैं और हित करने का अहंकार उनमें नहीं होता। वे जानते हैं कि एक ही अन्तःकरण या शरीर मेरा नहीं अपितु सब अन्तःकरण और शरीर मेरे हैं। मैं अन्तःकरण या शरीर नहीं अपितु अनन्त अनन्त अन्तःकरण जिसमें कल्पित हैं वह चिदाकाश मैं हूँ। ऐसा उनका अनुभव होता है इसलिए उनको गहराई में हर्ष, शोक, राग, द्वेष, भय या अभिनिवेश नहीं होता। यह बहुत ऊँची स्थिति है। यह बिना स्मृति के आयेगी नहीं। स्मृति का अर्थ यह नहीं कि ब्रह्म को याद किया करो। विजातीय चिन्तन और व्यवहार से आदमी बहिर्मुख हो जाता है। वृत्ति स्थूल हो जाती है, मोटी हो जाती है। आदमी तुच्छ हो जाता है। ब्रह्म का चिन्तन करने से विजातीय चिन्तन छूट जाता है। ब्रह्म का स्मरण हकीकत में होता नहीं, दूसरे का स्मरण छोड़ने के लिए ब्रह्म के स्मरण का एक अवलम्बन मात्र लेना पड़ता है। ब्रह्म तो अपना स्वभाव है। अपने इस ब्रह्म-स्वभाव को जान लेने वाला आदमी निःसंशय हो जाता है।

अगर आप अपने शरीर को 'मैं' मानेंगे और संसार को सच्चा मानेंगे तो आपके पास कुछ भी हो उससे आप सुखी नहीं रहेंगे। शरीर को 'मैं' माना और संसार को सच्चा माना तो मुसीबतें आयी ही समझो। दुःख, भय, शोक, चिन्ता आदि आयेंगे ही। सब तो आपके चित्त के अनुसार होगा नहीं और सब सदा के लिए एक जैसा रहेगा नहीं।

हम जो चाहते हैं वह सब अपना होता नहीं। जो अपना होता है वह सब भाता नहीं। जो भाता है वह सदा के लिए टिकता नहीं। हमारा अन्तःकरण है ऐसे ही दूसरों के भी अपने-अपने अन्तःकरण हैं। हम दुःखी क्यों होते हैं ? क्योंकि हमारा आग्रह होता है कि दूसरों को ऐसा-ऐसा करना चाहिए।

हम अज्ञानवश परचिन्तन में चले जाते हैं। परचिन्तन होते ही 'स्व' की शक्ति क्षीण होने लगती है। परचिन्तन छोड़ते ही स्व की शक्ति जागृत होती है, आकर्षण होता है और प्रीति प्रकट होती है। स्व की प्रीति प्रकट हो गई, अपने आप में तृप्ति मिल गई फिर बाहर कुछ भी हो, कोई परवाह नहीं। अगर आप अपने आप में तृप्त हो तो बाहर आपकी बात किसी ने मानी तो क्या और नहीं मानी तो क्या ? आपको कोई दुःख नहीं होगा। इसीलिए श्रीकृष्ण कहते हैं-

सन्तुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्योमद्भक्तः स मे प्रियः।।

'जो योगी निरन्तर सन्तुष्ट है, मन इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किये हुए हैं और मुझमें दृढ़ निश्चयवाला है, वह मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है।'

(भगवद् गीताः 12.14)

बाहर की परिस्थितियों से जो सन्तुष्ट होना चाहते हैं वे भोगी हैं। अपनी समझ या स्मृति का सदुपयोग करके जो सन्तुष्ट रहते हैं वे योगी हैं। वे अपने मन और बुद्धि को परमात्मा में अर्पित कर देते हैं।

हम लोग क्या करते हैं ? हम अपने मन और बुद्धि को हमारी मान्यताओं में अर्पित कर देते हैं, दूसरों की मान्यताओं में अर्पित कर देते हैं। लोगों की नजरों में हम भले दिखें ऐसी चेष्टाएँ करते कर देते हैं। लोगों की नजरों में हम भले दिखें ऐसी चेष्टाएँ करते हैं। हजार-हजार प्रकार की बुद्धि वाले, हजार-हजार विचारवाले हजारमुखी संसार में आप सबको सन्तुष्ट नहीं कर सकते।

आप कैसा भी शरीर बनायें, कैसा भी आचरण करें, कैसा भी व्यवहार चलायें लेकिन सब आपसे सन्तुष्ट नहीं हो सकते। क्योंकि सब अपने-अपने ढंग की मान्यताओं से जीते हैं। उनकी जिस समय जैसी मान्यताएँ होती हैं ऐसा आपके प्रति भाव, अभाव, श्रद्धा-अश्रद्धा, अपना परायापन आदि का भाव आ जाता है।

कोई आदमी आप पर श्रद्धा करता है इसलिए आप बड़े हो जाते हैं तो आप गलती करते हैं। कोई आपसे नफरत करता है और आप छोटे हो जाते हैं तो आप गलती करते हैं। पाँच पच्चीस, सौ-दो सौ आदमी वाहवाही करें तो आप बड़े हो जाएँ या पच्चीस-पचास आदमी आपकी निन्दा करें तो आप छोटे हो जायें तो आप अपने आपमें नहीं आये। आप निःसंशय नहीं हुए। आप जितात्मा नहीं हुए। आप प्रशान्तात्मा नहीं हुए। आप ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित नहीं हुए।

ब्रह्मचारी एकाकी रहता है, अकेले में रहता है। एकाकी और अकेले में रहने से ब्रह्मचर्य व्रत की रक्षा होती है। अधिक संपर्क में ब्रह्मचर्य का नाश होता है। ब्रह्मचर्य माने सब इन्द्रियों का संयम और मन का ब्रह्म में विचरण।

ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित रहने वाला योगी संतुष्ट होता है। वह निष्पाप हो जाता है। एक बार परमात्मा को जान लिया और निःसंशय हो गया तो वह सिद्ध बना हुआ योगी व्यवहार में आने पर भी विचलित नहीं होता। व्यवहार में तो विक्षिप्त कर दें ऐसे प्रसंग तो आते ही हैं फिर भी ज्ञानी को अपने ब्रह्म-स्वभाव की स्मृति यथावत् बनी रहती है। व्यवहार में ज्ञानी भीतर से अपने को कुछ विशेष मानकर नहीं रहता। ज्ञानी का और अज्ञानी का खान-पान, रहन-सहन, उठ-बैठ, बोल-चाल आदि सब लोकव्यवहार एक समान दिखेगा लेकिन दोनों की भीतरी समझ में बहुत बड़ा फासला होता है। अज्ञानी ज्ञानी को मानेगा कि ये ज्ञानी हैं, महान् हैं..... लेकिन ज्ञानी अपने को यह नहीं मानेगा कि मैं इतना महान् हूँ या तुच्छ हूँ।

हम लोगों में परचर्चा करने की आदत होती है। पर की चर्चा में स्व की प्रीति खत्म हो जाती है। जब परचर्चा में प्रवृत्त होने लगो तब सजग होकर अपने आपको पूछो कि हमारा जन्म दूसरों के दोष देखने के लिए हुआ है कि अपने को प्रभु में मिलाने के लिए हुआ है ? दूसरों के दोष देखने की अपेक्षा गुण देखने चाहिए। गुण देखने की अपेक्षा उनमें परमात्मा देखना चाहिए।

सांख्य के द्वारा तत्त्वज्ञान होने में अड़चन यह आती है कि हमारी देह में प्रीति होती है। प्राणीमात्र को अपने देह में प्रीति होती है। इसीलिए तत्त्वज्ञान जल्दी से नहीं होता। तत्त्वज्ञान हुए बिना सब संशय दूर नहीं होते। दृष्टा-दृश्य का विवेक, साक्षित्व का विवेक तो बिना वेदान्त के भी आदमी कर सकता है। तत्त्वज्ञान पाने के लिए दृश्य-दृष्टा के विवेके से भी आगे जाना पड़ेगा। इसके लिए वेदान्त चाहिए। वेदान्त-सिद्धान्त का ज्ञान चाहिए। वेदान्तनिष्ठ महापुरूष का कृपा-प्रसाद चाहिए।

अकेले रहकर कितनी भी समाधि करो, जितेन्द्रिय हो जाओ, ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित हो जाओ फिर भी एक अन्तःकरण में अहंप्रत्यय रहेगा। 'मैं इसको छोड़ूँ.... उसको छोड़ूँ...... एकान्त में जाऊँ.... तपस्या करूँ... ध्यान करूँ.... आनन्द में रहूँ.....' ये संकल्प बने रहेंगे। साधक नर्मदा किनारे एकान्त में जाएगा, ध्यान-साधना करेगा, आनन्द में रहेगा लेकिन वहाँ भी मछुआ आ जाएगा तो उसे देखकर खिन्न होगा कि इस बला का कहाँ दर्शन हो गया ! ऐसे-वैसे किसी भी प्रसंग से दुःख हो सकता है, क्योंकि अभी पूरी समझ नहीं है न ! जब तक तत्त्वज्ञान नहीं हुआ तब तक दुनियाँ के किसी भी कोने में चले जाओ, अपने को कैसी भी अवस्था में ढाल दो लेकिन देह की परिच्छिन्नता तो बनी ही रहेगी। चाहे कितना भी धन रख लो, कितनी भी सत्ता हस्तगत कर लो, कितना भी परिचय बढ़ा लो, कितने भी पदार्थ पा लो, कितनी भी एकाग्रता कर लो, तपस्या कर लो लेकिन जब तक एक देह में 'मैं' पना है तब तक द्वैत बना रहेगा। जब तक द्वैत रहेगा तब तक मुसीबतों का अन्त नहीं आयेगा।

द्वितीयाद् वै भयं भवति।

दूसरे से भय बना रहता है।

जब तक दूसरा दिखता रहेगा तब तक भय बना रहेगा। एकाग्र होने वाले को विक्षेप का भय, सदाचारी को दुराचारी का भय, सत्ताधीश को सत्ताभ्रष्ट हो जाने का भय, धनवान को धन चला जाने का भय। इन सब भयों से बचने के लिए, भय को दबाने के लिए लोग फिर उसी प्रकार का सामान इकट्ठा करते हैं जो भय को और बढ़ाते हैं। अपने साथियों का झुण्ड बनने से आदमी निर्भय नहीं होता अपितु और खोखला हो जाता है।

आप जितना ज्ञान की शरण जाते हैं, आत्मविश्वास की शरण जाते हैं, अद्वैतभाव की शरण जाते हैं उतना आप निर्भय बनते हैं। आप जितना अद्वैतनिष्ठा में स्थित होते हैं उतना आप सर्वभूतहिते रताः बनते हैं।

हम लोगों की आदत है शरीर से सुख लेने की। कई जन्मों के संस्कार पड़ गये हैं, कई युगों का ऐसा अभ्यास हो गया है। जिस शरीर में आते हैं उसको 'मैं' मान लेते हैं। उसी को खिलाने-पिलाने में, उसकी लालन-पालन में, उसी की वाहवाही में, उसी के यश में उसी को अमर करने में हमारी रूचि होती है। यह पुराना रोग है।

..........तो अब क्या करें ? देह की आसक्ति कैसे मिटायें ?

दूसरों के सुख का चिन्तन करने से अपने देह को सुखी करने का चिन्तन छूट जाएगा। अपने देह को सुखी रखने का चिन्तन छूटते ही आत्मा में प्रीति होने लगेगी।

देह को सुखी रखने का चिन्तन न करें तो ? देह दुःखी होगा ?

ना.... ना.... फिर देह से जो होगा वह औषध की तरह आचरण हो जाएगा। अपने आपको देह से पृथक जान लिया तो आपके देह के द्वारा जो कुछ भी होगा वह दूसरों के हित के लिए होगा। देह के द्वारा अगर सुख लेने की वासना है तो, सुख भोगने की वासना है तो देह में आसक्ति हो जाएगी। देहाध्यास मजबूत हो जाएगा। राग मजबूत हो जाएगा। राग मजबूत होते ही चित्त मलिन हो जाएगी।

एक राजा था। रनवास में बहुत सुविधाएँ रखी थीं। ऐसी ऐसी रानियाँ थीं कि राजा को रनवास से बाहर ही न आने देतीं थीं। इत्र आदि चीजें ऐसी होती हैं कि आदमी को रजस् और तमस् में बाँधे रखती हैं, नीचे के केन्द्रों में ही ले जाती हैं।

राजा महल में ही रहने लगा।

राजा का वजीर विश्वासपात्र था। वह सब राजकाज सँभाल लेता था। प्रजा को तथा अमलदार वर्ग को पता चला कि राजा साहब आजकल सप्ताह-सप्ताह तक, पन्द्रह-पन्द्रह दिन तक, महीने-महीने तक रनवास में ही रहते हैं। सब अमलदार मनमाना करने लगे।

दीवान ने देखा कि राजा साहब आते नहीं और मेरे नियंत्रण में अमलदार रहते नहीं। राज्य में अन्धाधुन्धी हो रही है। प्रजा का बुरी तरह शोषण हो रहा है। बदमाश लोग प्रजा का खून चूस रहे हैं।

वजीर ने जाकर महल का दरवाजा खटखटाया। रानियों ने सोचा कि मूँआ दीवान आया है, राजा साहब को कोई सूचना देगा, राजा साहब हमको छोड़कर दरबार में चले जाएँगे। रानियों ने दीवान को आँखें दिखायी।

दीवान बोलाः "अच्छा ! राजा साहब से मिलने नहीं देती तो कोई बात नहीं लेकिन यह चिट्ठी तो उन्हें पहुँचा देना।"

रानियों ने कहाः "तू चला जा। अगर दुबारा आया तो दासियों से पिटाई करवा देंगे।"

आठ-दस, बारह-पन्द्रह दिन हो गये लेकिन राजा बाहर नहीं आया। वजीर ने सोचा की अभी राजा साहब को चिट्ठी मिली नहीं। अरे राम ! राज्य लुटा जा रहा है। गुन्डों ने प्रजा को घेर लिया है। महीनों भर अपने महल से राजा साहब बाहर ही नहीं आते। दीवान को मुलाकात ही नहीं देते !

वजीर को वैराग्य हो आया। 'मेरे होते होते राज्य जल रहा है.... मुझसे देखा नहीं जाता। क्या करूँ ?' वजीर चुपचाप बैठ गया...... शान्त.....। भीतर से आवाज आयी किः 'एक दिन जलना है। उसको देखकर क्या जलता है ? जो बुझाना है उसको बुझा। अपनी पकड़ और आग्रह है उसको बुझा।'

वजीर चला गया जंगल में। महल के पीछे के इलाके में जाकर बैठ गया। प्रजा में हाहाकार मच गया। सूबेदारों ने राजा के महल के द्वार खटखटाये। राजा ने द्वार खोला तो सूबेदारों ने कहाः

"महाराज ! दीवान चले गये, कई दिन हो गये। अब तो बिल्कुल अन्धाधुधी हो गई है।"

"दीवान चला गया ? वह तो मेरा विश्वासपात्र था ! उसके भरोसे तो मैं निश्चिन्त था। वह चला गया ?"

"हाँ महाराज ! वे चिट्ठी लेकर महल में आये थे। दो-दो दिन, पाँच-पाँच दिन खड़े रहे लेकिन उनको आपकी मुलाकात नहीं हुई। आखिर थककर वे चले गये।"

"कहाँ गया ?"

"जंगल में। झोंपड़ी बाँधकर बैठ गये हैं ध्यानस्थ।"

राजा पहुँचा वजीर के पास और बोलाः

राजा पहुँचा वजीर के पास और बोलाः

"तू मेरा विश्वासपात्र दीवान है। सब छोड़कर जंगल में बैठा है। क्या फायदा हुआ ?"

"महाराज ! फायदा यह हुआ कि मैं कई दिनों तक कई बार आपके महल के द्वार पर खड़ा रहा। रानी साहेबाओं ने बुरी तरह डाँटा। आपकी मुलाकात नहीं हुई। अब सब कुछ छोड़कर झोंपड़े में परमात्मा-चिन्तन में रह रहा हूँ तो आप खुद चल कर मेरे पास आये। मुझे लाभ हुआ कि नहीं हुआ ?"

पर के चिन्तन से हमारी शक्ति क्षीण होती है। स्व (आत्म-परमात्मा) के चिन्तन से शक्ति जागृत होती है, बढ़ती है।

स्व क्य है ? पर क्या है ? हम निष्पाप कैसे हों ? हमारे कल्मष दूर कैसे हों ? जब तक कल्मष हैं तब तक ज्ञान नहीं होता। जब तक ज्ञान नहीं होता तब तक सब कल्मष नहीं जाते। जैसे नाविक नाव को ले जाता है, नाव नाविक को ले भागती है ऐसे ही ये भी एक दूसरे के पोषक हैं। कल्मष जाएँगे तो ज्ञान बढ़ेगा। ज्ञान बढ़ेगा तो कल्मष जाएँगे।

कल्मष होते क्या हैं ? कल्मष होते हैं पर का चिन्तन अधिक बढ़ जाने से। स्व का अज्ञान.... स्व की विस्मृति हो जाती है। चित्त मलिन होता है।

चित्त को शुद्ध करने का उत्तम से उत्तम एक तरीका है। वह आसान भी है। सब अवस्थाओं में कर सकते है। सब जगह समाधि नही कर सकते। सब जगह कीर्तन नहीं कर सकते। बस में बैठे कीर्तन करेंगे तो लोग भगतड़ा कहकर उपहास करेंगे। आप पर का चिन्तन छोड़कर स्व की स्मृति कहीं भी कर सकते हैं। बस में भी कर सकते हैं और बाजार में भी।

स्व की स्मृति करने के लिए प्रारंभ में थोड़ा एकान्त चाहिए लेकिन अभ्यास हो जाने पर वह कहीं भी कर सकते हैं।

स्व क्या है, पर क्या है यह समझ लें।

जिसको रखने से न रहे उसको बोलते हैं पर। जिसको छोड़ने से भी न छूटे उसको बोलते हैं स्व। जिसको आप कभी छोड़ नहीं सकते वह है स्व। जिसको आप सदा रख नहीं सकते वह है पर। मकान, दुकान, घर, गाड़ी यह जो कुछ भी है वह पर है। अपना शरीर भी पर है, स्व नही है। अगर शरीर स्व होता तो वह कहने में चलता। तुम नहीं चाहते कि बाल सफेद हों, तुम नहीं चाहते हो कि चेहरे पर झुर्रियाँ पड़े, तुम नहीं चाहते कि शरीर में कोई भी रोग हो। शरीर पर है।

उपनिषद में आता है कि जो स्वाभाविक होता है वह मिटता नहीं। जो आस्वाभाविक होता है उसको रखने की इच्छा नहीं होती। बर्फ की ठण्डक मिटाने के लिए आपकी इच्छा नहीं होगी। अग्नि की गर्मी मिटाने के लिए आपकी इच्छा नहीं होगी। ठण्डा होना बर्फ का स्वभाव है। गर्म होना अग्नि का स्वभाव है। मुँह में दाँत होना स्वाभाविक है लेकिन दाँत में तिनका होना अस्वाभाविक है इसलिए तिनका निकालकर ही चैन लेते हैं। आँखों के पोपचों में बाल स्वाभाविक हैं लेकिन बाल आँख में घुस जाता है तो वह खटकता है। उसे निकालना पड़ता है। खटकता वह है जो अस्वाभाविक है। जो स्वाभाविक होता है वह सुख देता है।

शान्ति पाना स्वाभाविक है। आपकी वह माँग है। घर-बार, पुत्र-परिवार छोड़कर शहर से बाहर आश्रम में सत्संग सुनने आ जाते है तो शान्ति पाना स्वाभाविक है। सत्संग के वातावरण में आकर कोई लफंगा फिल्मी गीत गाने लग जाए तो यह आपको अस्वाभाविक लगेगा। उसे आप तुरन्त चुप कर देंगे।

सदा रहना आपका स्वभाव है। आप नहीं चाहते कि मैं मर जाऊँ। जानना आपका स्वभाव है। आप अज्ञानी, मूर्ख नहीं रहना चाहते है। कोई आपको अज्ञानी कहकर पुकारे तो आपको खटकेगा। आप अज्ञान नहीं चाहते। आप मौत नहीं चाहते। आप दुःख नहीं चाहते। आप सदा रहना चाहते हैं, ज्ञान चाहते हैं और आनन्द चाहते हैं।

आप सत् हैं इसलिए सदा रहना चाहते हैं। आप चित् हैं इसलिए ज्ञान चाहते हैं। आप आनन्द स्वरूप हैं इसलिए आनन्द चाहते है। असत्, जड़ और दुःखरूप हो जाना यह अस्वाभाविकता है। आप यह अस्वाभाविकता त्यागकर अपनी असली स्वाभाविकता पाना चाहते हैं। सच्चिदानन्द आपका स्वभाव है। आप मृत्यु से बचना चाहते हैं, अज्ञान और दुःख मिटाना चाहते हैं। अज्ञान आपको अखरता है क्योंकि आप ज्ञानस्वरूप हैं, दुःख आपको अखरता है क्योंकि आप आनन्दस्वरूप हैं, दुःख आता है तो आप बेचैन होते हैं। सुख में वर्ष के वर्ष बीत जाते हैं तो कोई पता नहीं चलता लेकिन आपकी किसी मान्यता को ठेस पहुँची तो आप दुःखी हो गये। दुःख आता है तो आप दुःख मिटाने की कोशिश करते हैं। सुख आता है तो सुख मिटाने की कभी कोशिश की ? ऐसा कोई माई का लाल देखा जिसको आनन्द ही आनन्द मिला और उसे मिटाने की कोशिश की हो ? सुख और आनन्द मिटाने की कोशिश कोई नहीं करता फिर भी वह मिट तो जाता ही है। दुःख वापस आ ही जाता है। क्यों ? क्या कारण है ? सुख और आता रहे... आनन्द और आता रहे.... आता रहे... ऐसी चाह करते-करते पर का चिन्तन हुआ और आनन्द भाग गया।

स्व का माने हमारा स्वभाव है सत्, चित् और आनन्द। पर का स्वभाव है असत्, जड़ और दुःख।

असत् पहले था नहीं, बाद में रहेगा नहीं। जड़ को तो पता ही नहीं कि मैं हूँ। देह जड़ है, पाँच भूतों का पुतला है। सुबह से रात तक, जीवन से मौत तक इसको खिलाओ-पिलाओ, नहलाओ, घुमाओ लेकिन देखो तो कभी न कभी कोई न कोई शिकायत जरूर होगी।

तन धरिया कोई न सुखिया देखा।

जो देखा सो दुखिया रे।।

'डॉक्टर साब ! दवा कर दो, बहुत पीड़ा हो रही है....' लेकिन डाक्टर सा'ब को पूछो कि अपना क्या हाल है ? अपनी पत्नी का क्या हाल है ? सुबह इन्जेक्शन लेकर अस्पताल में जाता हूँ बाबाजी !'

मैं ऐसे डाक्टरों को जानता हूँ जिन्होंने अपने इलाके में नाम कमाया है। उनके बाप उनको मेरे पास ले आये और प्रार्थना करने लगे किः

"स्वामी जी ! आप इसको समझाइये। इसने नाम कमाया है, मरीजों को तो ठीक करता है लेकिन खुद इतना बेठीक है कि रोज नशे के इन्जेक्शन लेता है। M.B.B.S. की डिग्री भी है, कमाता भी है, प्रैक्टीस भी अच्छी चलती है लेकिन कभी नशे-नशे में किसी मरीज का बेड़ा गर्क कर देता है। यह हिन्दुस्तान है बाबा जी ! सब चल रहा है। परदेश में प्रैक्टीस करता तो वहाँ के लोग और सरकार इसको दिन के तारे दिखा देती। आप आशीर्वाद करो।"

स्थूल, सूक्ष्म या कारण शरीर में, किसी में भी, 'मैं' पना है तो अभी ज्ञान नहीं हुआ। ज्ञान हुआ नहीं तो असत्, जड़ और दुःख का सम्बन्ध छूटा नहीं। जब तक असत्, जड़ और दुःख का सम्बन्ध नहीं छूटा तब तक सत्, चित्, और आनन्द स्वरूप में प्रीति नहीं होती। ऐसा नहीं है कि सत्-चित्-आनन्द-स्वरूप आयेगा, मिलेगा, हम वहाँ पहुँचेंगे। सत्-चित्-आनन्द यह आत्मा का स्वभाव है। आत्मा आपका स्व है। देह पर है। पर का स्वभाव है असत्-जड़-दुःख।

आत्मा और देह का परस्पर अध्यास हो गया। एक का स्वभाव दूसरे में दिखने लगा। आत्मा का अध्यास देह में होने लगा इसलिए आप देह से सदा रहना चाहते हैं। देह से सब जानना चाहते हैं। देह से सदा सुखी रहना चाहते हैं। ऐसे पर के चिन्तन की आदत पड़ गई। यह आदत पुरानी है इसीलिए अभ्यास की जरूरत पड़ती है।

तत्त्वज्ञान समझने में जो असमर्थ हैं उनके लिए योग सुगम उपाय है। प्राण-अपान की गति को सम करके भ्रूमध्य में प्रणव की धारणा करें। इससे पर का स्वभाव छूटेगा। स्व का आनन्द प्रकट होगा। सत् चित् आनन्द स्वभाव बढ़ेगा।

एकान्त में जाकर बैठो। चाँद सितारों को निहारो। निहारते निहारते सोचो कि वे दूर दिख रहे हैं, बाहर से दूर दिख रहे हैं। भीतर से देखा जाए कि मैं वहाँ तक व्यापक न होता तो वे मुझे नहीं दिखते। मेरी ही टिमटिमाहट उनमें चमक रही है। मैं ही चाँद में चमक रहा हूँ... सितारों में टिमटिमा रहा हूँ।

कीड़ी में तू नानो लागे हाथी में तूँ मोटो क्यूँ।

बन महावत ने माथे बेठो होंकणवाळो तूँ को तूँ।

ऐसो खेल रच्यो मेरे दाता जहाँ देखूँ वहाँ तूँ को तूँ।।

इस प्रकार स्व का चिनत्न करने से सामने दिखेगा पर लेकिन पर में छुपे हुए स्व की स्मृति आ जाए तो आपको खुली आँख समाधि लग सकती है और योग की कला आ जाए तो बन्द आँख भी समाधि लग सकती है।

सतत खुली आँख रखना भी संभव नहीं और सतत आँख बन्द करना भी संभव नही। जब आँख बन्द करने का मौका हो तब बन्द आँख के द्वारा यात्रा कर लें और आँख खोलने का मौका हो तो खुली आँख से यात्रा कर लें। यात्रा करने का मतलब ऐसा नहीं है कि कहीं जाना है। पर के चिन्तन से बचना है, बस। यह प्रयोग लगता तो इतना सा है लेकिन इससे बहुत लाभ होता है।

अनुक्रम

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सर्व बन्धनों से मुक्ति का उपाय

ये हि वृत्तिं विजानन्ति ज्ञात्वापि वर्धयन्ति ये।

ते वै सत्पुरूषाः धन्याः वन्द्यास्ते भुवनत्रये।।

'जो इस ब्रह्माकार वृत्ति को जानते हैं और जानकर इसे बढ़ाते हैं वे सत्पुरूष धन्य हैं। वे ही तीनों लोकों में वन्दनीय हैं।'

(अपरोक्षानुभूतिः 131)

जो ब्रह्माकार वृत्ति को नहीं जानते हैं वे घटाकार वृत्ति से, मठाकार वृत्ति से, पटाकार वृत्ति से, सुखाकार वृत्ति से, दुःखाकार वृत्ति से चिपक चिपककर अपने को सताते रहते हैं।

वृत्ति उत्पन्न होती है। घड़ा देखा घटाकारवृत्ति, मठ देखा तो मठाकार वृत्ति, मित्र देखा तो मित्राकार वृत्ति, शत्रु देखा तो शत्रुआकार वृत्ति, पुस्तक देखी तो पुस्तकाकार वृत्ति.... ये वृत्तियाँ तो उठती रहती हैं। जिसने सत्संग सुनकर ब्रह्माकार वृत्ति को जान लिया वह पुरूष धन्य है।

जीव के सारे दुःखों का मूल कारण है अपने उदगम स्थान ब्रह्म-परमात्मा को नहीं जानना। उस अपने मूल स्रोत ब्रह्म-परमात्मा को जान लेने मात्र से जीव के सारे दुःख दूर हो जाते हैं।

ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्व  पाशेभ्यः।

उस देव को जानकर आदमी सारे बन्धनों से मुक्त हो जाता है।

अपने में से दोष निकालना अच्छा है। दोष निकालने के लिए गुण भरना अच्छा है। गुण प्रकृति में होते हैं। दोषी होने की अपेक्षा गुणवान होना ठीक है। सिर में केरोसीन लगाने की अपेक्षा सुगंधित तेल लगाना ठीक है लेकिन उसे भी साबुन लगाकर आखिर उतारना ही पड़ता है अन्यथा वह सिर में मैल जमाकर देता है। यज्ञ करते समय भी हाथ जलते हैं। एक आदमी दुष्कृत्य करता है और लोहे की जंजीर से बंधता है। दूसरा आदमी सुकृत करता है तो सोने की जंजीर से बंधता है। बन्धन तो दोनों को है।

ब्रह्माकार वृत्ति सुकृत दुष्कृत दोनों से पार कराके जीव को कृत अकृत से पार अपने स्वरूप में जगाती है। सुकृत दुष्कृत की अपेक्षा अच्छा है। लेकिन जीव सुकृत दुष्कृत दोनों से परे नहीं पहुँचा, सुकृत-दुष्कृत से आच्छादित होता रहा तो पूर्ण नहीं हो पाता। पाप बुरा फल देकर खत्म हो जाता है। पुण्य अच्छा फल देकर खत्म हो जाता है। पाप न करें, पुण्य करें। लेकिन इससे भी आगे जाकर विचार करें कि पुण्य का कर्त्ता कौन है ?

हमारे देश के तत्त्ववेत्ता मनीषियों की यह प्रसिद्ध विलक्षणता है कि कोई भी विषय का विचार करेंगे तो उसके परिणाम पर नजर दौड़ायेंगे। 'इसका आखिरी परिणाम क्या होगा, अंतिम निष्कर्ष क्या निकलेगा ?' यह सोच विचार करके ही कोई भी कर्माकर्म का निर्णय करेंगे। यह उनकी विलक्षण योग्यता है और उनकी यह विलक्ष्णता सारे विश्व में प्रसिद्ध है।

जिसका आखिरी परिणाम मोक्ष नहीं है, जिसका आखिरी परिणाम जीवन्मुक्ति नहीं है, जिसका आखिरी परिणाम ब्रह्माकार वृत्ति नहीं है वे सारे के सारे कृत्य बालकों की चेष्टा के समान हैं। सारी उपासनाएँ, सारे दर्शनशास्त्र, सारा योग, सारा ध्यान, ज्ञान, भक्ति, भजन, भाव का आखिरी प्रयोजन है कि जीव बन्धन से मुक्त हो जाये।

ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपाशेभ्यः।

जिसको जानने से सर्व पाशों से मुक्त हो जाए उस देव को जानने का अगर हेतु है तुम्हारे क्रिया-कलाप का तो वह सार्थक है। उस देव को कब जाना जाता है ? जब ब्रह्माकार वृत्ति बनती है तब। घटाकार वृत्ति पैदा हो रही है, मठाकार वृत्ति पैदा हो रही है, सुखाकार वृत्ति पैदा हो रही है लेकिन सुखाकार वृत्ति जितनी देर टिकी उतनी देर सुख, फिर वृत्ति बदली तो सुख गायब हो गया। ब्रह्माकार वृत्ति एक बार अगर उत्पन्न हो जाय, केवल तीन क्षण के लिए ही सही, तो जीव का आवरण भंग हो जाता है। फिर सुख-दुःख में सत्य-बुद्धि नहीं रहती, मान-अपमान में सत्य-बुद्धि नहीं रहती, पुण्य-पाप में सत्य-बुद्धि नहीं रहती, विक्षेप और समाधि में सत्य-बुद्धि नहीं रहती। बहुत ऊँची बात है। यह ज्ञान पाने के लिए बड़े बड़े राजा, महाराजा, सम्राट हाथ में काँसा लिए, सिर में खाक डालकर संतों के शरण में जाते थे।

उस ब्रह्माकार वृत्ति को जानो। ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न करने की कला को जानो। जानकर उसे बढ़ाओ।

अब ऐहिक विज्ञान ने भी प्राचीन ऋषियों के सत्य की ओर कुछ यात्रा की है। वे भी पदार्थ का विश्लेषण करते-करते वहाँ पहुँचते हैं जहाँ सबका जोड़ एक ही में आता है। वैज्ञानिक खोज जहाँ से शुरू करते हैं, वापस वहीं आखिर में आ जाते हैं। सब एक ही तत्त्व से जुड़े हैं। तिनका हो चाहे वटवृक्ष हो, दोनों सूर्य से जुड़े हैं। आदमी बड़ा हो चाहे छोटा हो, अच्छा हो चाहे बुरा हो, गोरा हो चाहे काला हो, लाभकर्त्ता हो चाहे हानिकर्त्ता हो, लेकिन उसका शरीर सूर्य से जुड़ा है।

सूर्य जिससे जुड़ा है, चंद्र जिससे जुड़ा है, आकाश जिससे जुड़ा है उस चैतन्य से तुम जुड़े हो। राजा के महल में जलने वाला बल्ब और गरीब के झोंपड़े में जलने वाला बल्ब दोनों पावर हाउस के वायर से जुड़े हैं अतः पावर हाउस से ही जुड़े हैं।

ऐसे ही प्राणीमात्र ब्रह्म-परमात्मा से जुड़ा है।

सागर का हर बिन्दु सागर से जुड़ा है। कोई छोटी तरंग होती है कोई बड़ी होती है। नदी में कहीं-कहीं भँवर बनता है। लगता है कि भँवर में पानी वही का वही है लेकिन नहीं। वह पानी चला जाता है और दूसरा आता है, भँवर के आकार में घूमता है और चला जाता है।

ऐसे ही लगता है कि यह शरीररूपी भँवर वही का वही है लेकिन उसमें सूक्ष्म सत्ताएँ सूर्य की, जल की, वायु की, पृथ्वी की, आकाश की हैं। वे सत्ताएँ निरन्तर बदलती ही जाती है। हम हर श्वास में बदल रहे हैं. यह बदलाहट जिसकी सत्ता से मिलती है उस चैतन्य को, अबदल आत्मा को पहचान लो। ब्रह्मज्ञान का श्रवण-मनन करके आनन्द-स्वरूप ब्रह्म-परमात्मामय वृत्ति बनाना ही ब्रह्माकार वृत्ति है।

भगवदाकार वृत्ति बनती है, इष्टाकार वृत्ति बनती है, स्मरणाकार वृत्ति बनती है। स्मरण होता है तब लगता है कि हमारा स्मरण चालू है। स्मरण चालू नहीं था तब, स्मरण चालू है तब, स्मरण छूट जाएगा तब....तीनों को जो जानता है वह कौन है ?

खोजनहार नू खोज ले।

ढूँढनहार नू ढूँढ ले।।

आहा.... ! बेड़ा पार.......। वे लोग धन्य हैं जो ब्रह्माकार वृत्ति को जानते हैं, जानकर जो बढ़ाते हैं।

मारवाह में कोई सज्जन रहते थे। वे कमाने के लिए कलकत्ता गये। घर से जब निकले उन दिनों में उनकी पत्नी गर्भवती थी। वे सज्जन पंद्रह-सत्रह साल कलकत्ते में ही रह गये। पुराना जमाना था। संदेश व्यवहार एवं यातायात की सुविधाएँ नहींवत् थीं। डाक-तार एवं रेलगाड़ियाँ नहीं थीं।

इधर पत्नी को लड़का हुआ। समय पाकर बड़ा होते-होते वह पंद्रह-सत्रह साल का हो गया। बेटे ने बाप को नहीं देखा था और बाप ने बेटे को नहीं देखा था। माँ ने बेटे से कहा कि तलाश करो, तुम्हारे पिता कलकत्ते कमाने गये हुए हैं। हम इधर दुःख में दिन गुजार रहे हैं। उनके कोई समाचार नहीं मिल रहे हैं। जरा जाँच करो।

बेटा तो गरीबी में दिन काट रहा था। जो कुछ फटा-टूटा पहना था, मैली फटी चदरिया थी वह लेकर निकल पड़ा कलकत्ता जाने के लिए। उधर कलकत्ता में पिता को भी हुआ कि बहुत साल हो गये हैं, अब अपने घर जाऊँ। काम-धन्धा ठीक हो गया है, कमाई भी अच्छी हुई है। अब अपने देश में जाऊँ। ऐसा सोचकर वह कलकत्ता से मारवाड़ आने के लिए चला।

बच्चा घूमता-घामता, थका माँदा यात्रा करते-करते एक रात्रि को किसी धर्मशाला में जा ठहरा। उसी धर्मशाला में कलकत्ता से चला हुआ पिता भी ठहरा था। लड़के की हालत देखकर उसे छोटी सी खोली दे दी गई। लड़का मारे ठण्ड के ठिठुर रहा था, सर्दी जुकाम के कारण खाँस भी रहा था। पास में ही उस कलकत्ता वाले सेठ को दिया हुआ बढिया कमरा था। सेठ ने धर्मशाला के व्यवस्थापक से शिकायत कीः

"ऐसी सुन्दर धर्मशाला में कैसे अवारा छोरों को ठहरने देते हो ? वह छोरा खाँस रहा है, मेरी नींद खराब हो रही है। हटाओ इसको। निकालो यहाँ से। चाहिए तो हमसे दो रूपये चार्ज ज्यादा ले लो। मेरी नींद खराब हो रही है। कल मुझे और आगे यात्रा करनी है।"

लड़के को खोली से बाहर निकाल दिया गया। फुटपाथ पर ठण्ड में ठिठुरते हुए सारी रात बितायी। सुबह में सेठ अपने कमरे से बाहर निकले। धर्मशाला से बाहर आये। फुटपाथ पर देखा तो वही रातवाला लड़का।

"अरे ! कैसे बदतमीज नालायक लोग हैं ! इस धर्मशाला में ठहरने की औकात ! कहाँ से आया है रे छोरा ?"

"सेठ जी ! राजस्थान से आ रहा हूँ।"

"राजस्थान से ? कौन से इलाके से ?"

"सिरोही जिले में फलानी.... जगह से।"

"वहाँ तो मेरा भी गाँव है। किस जाति का है।"

"मारवाड़ी हूँ।"

"कौन-सा कुल ?"

"फलाना.....।"

"तेरे पिता का नाम क्या है ?"

लड़के की आँखों से आँसू बहने लगेः

"मेरे पिता का नाम अमुक है। मैं माँ के पेट में था तब मेरे पिता कलकत्ता गये हैं। आज पन्द्रह-सत्रह साल हो गये....।"

अब तो महाराज ! लड़के की खाँसी चली गई, जुकाम भाग गया। पिता ने पुत्र को गले लगा लिया... मधुर लग गया अपना लाडला।

क्यों ?

उस बच्चे में 'मेरापन' आ गया। जान लिया कि यह 'मेरा' है। 'मेरा' है तो उसके सारे दोष गायब।

लड़का भी अब फरियाद नहीं करेगा कि 'सेठ का सत्यानाश हो..... मुझे बाहर निकलवा दिया.... आधी रात को ठण्ड में धकेल दिया।' ना.... ना......। अब यह रोष नहीं रहेगा। अब तो मेरे पिता....!'

अज्ञान दशा में दोनों एक दूसरे को दुत्कार रहे थे, बेटा मन ही मन दुत्कार रहा था, बाप वाणी से भी दुत्कार रहा था। लेकिन जब दोनों ने जान लिया कि हम दोनों में एक ही रक्त है तो गले लग गया।

क्रोध कब होता है ? जब सामने दूसरा होता है। भय कब होता है ? जब दूसरा होता है। काम कब होता है ? जब दूसरा दिखता है। तुम कितने भी सुन्दर हो लेकिन तुमको अपने आप पर काम-विकार नहीं होगा। स्त्री हो चाहे पुरूष हो, काम हमेशा दूसरे पर ही होता है। यह कामाकार वृत्ति है। जिस पर काम होता है उसमें भी अपने चैतन्य को देख लो तो काम राम में बदल जाएगा, ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न हो जाएगी। अद्वैत में निष्ठा होते ही भय प्रेम में बदल जाएगा, घृणा स्नेह में बदल जाएगी। बाहर से आप यथोचित लेना देना, हँसना-रोना करेंगे लेकिन भीतर से आपको लगेगा कि सब मुझमें है और मैं सबमें हूँ। जैसे शरीर को देखो तो हाथ अलग हैं, मूछ के बाल अलग हैं लेकिन ये सब मिलाकर एक आप ही हैं न ! इस देह के पुर्जे भिन्न होते हुए भी सब एक अभिन्न सत्ता से संचालित होते हैं, अभिन्न सत्ता के लिए ही सब काम कर रहे हैं। ऐसे ही पूरे ब्रह्माण्ड में जो भिन्न भिन्न क्रिया-कलाप हैं वे अभिन्न चैतन्य से संचालित हैं और उसी से मिलने के लिए ही सब यात्रा कर रहे है। देर सबेर सब वही जाएंगे। पापी हो चाहे पुण्यात्मा हो, हजारों जन्मों के बाद पहुँचे या आज ही पहुँच जाय लेकिन जायगा वहीं।

हमें देर सबेर उसी चैतन्य परमात्मा में अभिन्न रूप से पहुँचना पड़ेगा तो क्यों न आज ही उसके साथ के शाश्वत सम्बन्ध की स्वीकृति देकर अभिन्नता महसूस करें ? वह महा यात्रा आज ही क्यों न कर लें ?

इस जीव को देर सबेर ब्रह्माकार वृत्ति के जगत में पहुँचना ही पड़ेगा।

बैलगाड़ी में यात्रा करते-करते तुम अमेरिका जाने की चेष्टा करो तो पहुँचने की संभावना नहीं। पहिये घुमाते-घुमाते, बैल बदलते-बदलते, दिन रात, मास और वर्ष बिताते-बिताते, एक दो, दस जन्म बदलते-बदलते फिर पता चले कि हवाई जहाज के सिवाय अमेरिका नहीं पहुँच सकते..... फिर हवाई जहाज में बैठो। इसके बदले अभी समझ लो कि बैलगाड़ी में अमेरिका नहीं पहुँच सकते अतः अभी से हवाई जहाज में बैठ जाओ.... मर्जी तुम्हारी है।

ऐसे ही जगदाकार वृत्तियों से तुम जगदीश्वर के पास नहीं जा सकते हो। ब्रह्माकार वृत्तिरूपी हवाई जहाज में बैठो तो तुम जगदीश्वर से भिन्न नहीं हो।

वृत्तियाँ तो आप बनाते ही हैं। बम्बई आकार वृत्ति, मद्रासाकार वृत्ति, अहमदाबादाकार वृत्ति, जगदाकार वृत्ति। ऐसी वृत्तियाँ तो आप बहुत बनाते हैं। ये वृत्तियाँ तो सब बैलगाड़ी के चाक घुमाने जैसी हैं। इन वृत्तियों से तो आप देह में ही रहते हैं। देह से पार अपने आप में नहीं आते।

सत्त्वगुण से दयालु वृत्ति बनती है, रजोगुण से अहंकारी वृत्ति बनती है और तमोगुण से द्वेषाकार वृत्ति बनती है। मन में द्वेष आया तो समझो तमोगुण और रजोगुण का मिश्रण हो गया। वृत्ति में दया आयी, प्रेम आया, शान्ति आयी, आनन्द आया तो समझो सत्त्वगुण है। सत्त्वगुण की वृत्ति भी टिकती नहीं, रजोगुण की वृत्ति भी टिकती नहीं और तमोगुण की वृत्ति भी टिकती नहीं। वृत्तियाँ सदैव बदलती रहती हैं। बदलने वाले को बदलनेवाला समझकर अबदल का साक्षात्कार कर ले उसका नाम है ब्रह्माकार वृत्ति।

न चलति भगवतपदारविन्दात् लव निमिषार्धमपि।

ब्रह्माकार वृत्तिवाला भगवद्  पद से, भगवत् तत्त्व से एक क्षण भी वह चलित नहीं होता। सत्त्वगुण, रजोगुण, तमोगुण की वृत्तियों से काम लेता होगा लेकिन अपनी ऊँचाई पर टिका रहता है। सनकादिक ऋषि पाँच वर्ष के बालक.... क्रीड़ा करते हैं, यात्रा करते हैं लेकिन एक क्षण भी ब्रह्माकार वृत्ति से, भगवदानुभव से दूर नहीं जाते। वशिष्ठजी महाराज उपदेश करते हैं, आश्रम चलाते हैं लेकिन एक क्षण भी ब्रह्माकार वृत्ति से दूर नहीं होते। शुकदेवजी महाराज जंगल छोड़कर बस्ती में आते हैं, रास्ते से गुजरते हैं, लोग कंकड़-पत्थर मारते हैं, अपमान करते हैं लेकिन शुकदेव जी महाराज के लिए सब ब्रह्म है। उन्हें कोई क्षोभ नहीं होता। राजा परीक्षित के दरबार में सोने के सिंहासन पर बैठते हैं तो कोई हर्ष नहीं होता। हर्षाकार, शोकाकार, दुःखाकार वृत्ति का कोई महत्त्व ही नहीं है उनके लिए। ये सारी वृत्तियाँ बाधित हो जाती हैं। ऐसा नहीं कि ज्ञानी को ठण्ड नहीं लगती, ज्ञानी को सज्जन सज्जन नहीं दिखेगा, दुर्जन दुर्जन नहीं दिखेगा। दिखेगा तो सही लेकिन उसमें सत्य बुद्धि नहीं होगी। उसकी शाश्वतता नहीं दिखेगी।

रस्सी में साँप दिखा। टॉर्च जलाकर देख लिया कि साँप नहीं है, रस्सी है। फिर टॉर्च बंद करके दूर जाकर बैठे तो वहाँ से दिखेगा कि साँप जैसा ही लेकिन साँप की सत्यता गायब हो गई।

ठूँठे में चोर दिखा। टॉर्च जलाकर देख लिया कि चोर नहीं है, ठूँठा है ! फिर दूर से चोर जैसा ही दिखेगा लेकिन वास्तविकता जान ली है।

मरूभूमि में पानी दिखा। वहाँ गये। मरूभूमि को मरूभूमि जान लिया। वापस आ गये। तुम्हारे दोस्त आकर बोलते हैं- 'चलो, उस पानी में नहाकर आयें।' तुम समझाते हो कि वहाँ पानी नहीं है, मैं देखकर आया हूँ। मित्र आग्रह करते हैं तो तुम भी चल पड़ते हो। दस आदमी वे हैं, ग्यारहवें तुम भी तौलिया लेकर साथ में हो लिये। वे लोग जा रहे हैं सत्य बुद्धि से, तुम जा रहे हो, विनोद-बुद्धि से। वे सब जानते हैं कि पानी नहीं है, मरूभूमि है तब वे दुःखी होते हैं जबकि तुम्हें तो विनोद होगा और कहोगे किः मैं तो पहले से ही जानता था।

ऐसे ही ब्रह्माकार वृत्ति बनने के बाद तुम जगत के साथ यथायोग्य व्यवहार करोगे लेकिन जगत के लोग जगत से सुख पाने की कोशिश करते हैं जबकि तुम्हें पता है कि जगत से सुख नहीं मिल सकता। जैसे मरूभूमि से पानी नहीं मिल सकता ऐसे ही संसार से कोई वास्तविक शाश्वत सुख नहीं मिल सकता। यह तुम्हें पता है इसलिए संसार का कोई आकर्षण नहीं होगा।

तुम वही होते हो जैसी तुम्हारी वृत्ति होती है। दुकान की वृत्ति करते हो तो तुम दुकान पर हो, घर की वृत्ति करते हो तो तुम घर पर हो, बाजार की वृत्ति करते हो तो बाजार में हो, देह की वृत्ति करते हो तो तुम देह में हो, जाति की वृत्ति की गाँठ बाँधते हो तो जाति वाले हो, सम्प्रदाय की वृत्ति की गाँठ बाँधते हो तो सम्प्रदाय वाले बन जाते हो, भगवदाकार वृत्ति बनाते हो तो भगवान में आ जाते हो, दुःखाकार वृत्ति करते हो तो दुःखी होते हो, सुखाकार वृत्ति बनाते हो तो सुखी होते हो।

ऐसे ही तुम ब्रह्माकार वृत्ति बनाओगे तो ब्रह्म हो जाओगे, बेड़ा पार हो जाएगा।

जो इस ब्रह्माकार वृत्ति को जानते हैं, जानकर उसे बढ़ाते हैं वे सत्पुरूष धन्य हैं। वे तीनों लोकों में वन्दनीय हैं।

वे सत्पुरूष क्यों हैं ? कुदरत जिसकी सत्ता से चलती है उस सत्य में वे टिके हैं इसलिए सत्पुरूष हैं। हम लोग साधारण क्यों हैं ? हम लोग परिवर्तनशील, नश्वर, साधारण चीजों में उलझे हुए हैं इसलिए साधारण हैं।

मूलस्वरूप में तुम शान्त ब्रह्म हो। अज्ञानवश देह में आ गये और अनुकूलता मिली तो वृत्ति एक प्रकार की होगी, प्रतिकूलता मिली तो वृत्ति दूसरे प्रकार की होगी, साधन-भजन मिला, सेवा मिली तो वृत्ति थोड़ी सूक्ष्म बन जाएगी। जब अपने को ब्रह्मस्वरूप में जान लिया तो बेड़ा पार हो जाएगा। फिर हाँ हाँ सबकी करेंगे लेकिन गली अपनी नहीं भूलेंगे।

तुम जब अपने-अपने घर जाओगे, अपने-अपने व्यवहार में जाओगे तब अपनी गली याद रखना कि यह तुम्हारा घर नहीं है शरीर का घर है... तुम्हारा व्यवहार नहीं है, शरीर का व्यवहार है।

तुम्हारा घर तो... जो प्रभु का घर है वही तुम्हारा घर है।

वास्तव में तो जिस ईंट, चूने, लोहे, लक्कड़ के घर को तुम 'मेरा' घर मान रहे हो वह घर भी प्रभु का है। जिन चीजों से घर बना है वे चीजें प्रकृति की हैं। प्रकृति परमात्मा की है। कुम्हार ने ईंटें बनाईं मिट्टी, अग्नि, पानी से। मिट्टी, अग्नि, पानी किसी व्यक्ति के नहीं हैं, ये ईश्वर की चीजें हैं। ईश्वर की चीजों से चूना बना, ईश्वर की चीजों से लक्कड़ बना। ईश्वर की ईंट, चूना, लोहा, लक्कड़ के मिश्रण से घर बना तो यह घर किसका हुआ ? ईश्वर का हुआ।

"बरसात तुम बनाते हो ?"

"नहीं, ईश्वर बनाता है।"

"जमीन तुमने बनाई ?"

"नहीं, ईश्वर ने बनाई।"

"अन्न किसका हुआ ?"

"ईश्वर का हुआ।"

ईश्वर का अन्न खाकर बच्चे पैदा किये। इस बच्चों में ममता हो गई कि ये मेरे बच्चे हैं। अपने बच्चों में से ममता हटाकर उन्हें ईश्वर के बच्चे समझकर उनका लालन-पालन करो तो अन्तःकरण शुद्ध हो जाएगा। लेकिन होता क्या है ? ये मेरे बच्चे हैं... उन्हें अच्छा बनाऊँ... उन्हें अच्छा पढ़ाऊँ... दूसरे किसी के बेटे अनपढ़ रह जाएँ तो कोई हर्ज नहीं लेकिन मेरे बेटे बढ़िया हों...... यह ममता है। यह देहाकार वृत्ति का परिणाम है। 'दूसरों के बेटे जिस तत्त्व के हैं उसी तत्त्व के ये मेरे बेटे हैं।' इस प्रकार की वृत्ति बनाओगे तो ब्रह्माकार वृत्ति उत्पन्न होने में सहाय मिलेगी।

जो पराये हैं उन्हें अपना मानो और जो अपने हैं उन्हें ठाकुर जी के मानो, तुम्हारा व्यवहार, धन्धा, घर-गृहस्थी सब बन्दगी हो जाएगी।

उधार लेकर, करप्शन करके, झूठ बोलकर, काला बाजार करके लोग अपने बच्चों को खिलाते हैं, पिलाते हैं, पढ़ाते हैं, परिवार को सुखी करने का प्रयास करते हैं लेकिन उनको कभी ऐसा नहीं लगता कि मैं अपने घर में, अपने परिवार में हर महीने दो हजार, पाँच हजार आदि का दान करता हूँ। क्योंकि वे यह खर्च ममतावश होकर कर रहे हैं इसलिए दान का फल नहीं मिलता। पाँच रूपये भी अगर किसी अजनबी की सेवा में लगा देते हैं तो अन्तःकरण प्रसन्न हो जाता है कि आज अच्छा काम किया। क्योंकि वहाँ ममता नहीं है।

एक पौराणिक कथा हैः

एक आदमी का जीवन दुर्व्यसन एवं दुश्चरित्र में अस्तव्यस्त हो गया था। वह शराबी भी था, जुआरी भी था और वेश्यागामी भी था। एक बार अपने जन्मदिन पर वह शराबी चाँदी की थाली में स्वस्तिकाकार में मेवा-मिठाई, पान-बीड़ा आदि सजाकर अपनी प्रेयसी गणिका के पास जा रहा था। शराब की प्याली व्याली लगा ली थी। नशे में झूमता जा रहा था। रास्ते में ठोकर लगी और वह गिर पड़ा। चोट लगी तो कुछ देर पड़ा रहा। नशे में तो था ही।

वह ऐसी जगह थी कि जहाँ पुराने शिवालय के अवशेष नजर आ रहे थे। पूर्वकाल में कोई संत पुरूष वहाँ शिवलिंग की स्थापना करके ध्यानस्थ हुआ करते थे। जैसे शिवलिंग में शिव हैं वैसे ही सचराचर सृष्टि में भी शिव ही ओतप्रोत हैं.... ऐसा करके उस ब्रह्मवेत्ता संत पुरूष ने अपनी वृत्ति ब्रह्माकार बनाई थी। समय पाकर वे संत ब्रह्मलीन हो गये। शिवालय भी जीर्ण-शीर्ण हो गया। कालांतर में अवशेष मात्र रह गया।

उसी जगह पर वह शराबी गिर पड़ा। उस भूमि में मिट्टी के कणों का प्रभाव कहो चाहे वहाँ के वायब्रेशनों का प्रभाव कहो, उस शराबी के पूर्व संचित पुण्यों का उदय हुआ।

जो आदमी जहाँ बैठता है और जो विचार करता है, उस आदमी के चले जाने के बाद भी वहाँ उसके विचारों का, वायब्रेशनों का प्रभाव रहता है। कोई आदमी अच्छे विचार करके गया और दूसरा आदमी वहाँ आयेगा तो उसको अच्छे विचार आने लगेंगे। इसी कारण से तीर्थों का महत्त्व है। ध्यान, भजन, साधना, तपस्या करने वाले साधकों का एवं भगवन्नमय रहने वाले संतों का प्रभाव नये आने वाले श्रद्धावान यात्री लोगों को भी लाभान्वित करता है। तीर्थ में जाने से लोगों के विचार पवित्र होने लगते हैं। सिनेमा के थीएटर में जाने से उसी प्रकार के विचार मस्तिष्क में पनपेंगे। सिनेमा के रसियों को आश्रम में ले आओगे तो वे भी 'हरि ॐ' बोलने लग जाएँगे। स्थान का भी प्रभाव होता है।

गाँधी जी किसी गुफा में गये थे। शान्ति से बैठे तो प्रणव की ध्वनि सुनाई पड़ी। गुफा में साधना करने वाले तो चल बसे थे लेकिन प्रणव के जाप का प्रभाव मौजूद था। गाँधी जी लिखते हैं-

"सात्त्विक वृत्ति वाले व्यक्तियों का प्रभाव लम्बे समय तक रहता है यह मेरा अनुभव है।"

वह शराबी गिर पड़ा तो पड़ा रहा सुन्न होकर। अनजाने में वह अहंशून्य हो गया थोड़ी देर के लिए। उसके श्वास में वहाँ का प्राणवायु गया जहाँ के वातावरण में ब्रह्माकार वृत्तिवाले संत पुरूष के वायब्रेशनों का प्रभाव था। शराबी का अन्तःकरण अनजाने में ही थोड़ा निर्मल हो गया। उसको जब होश आया और उठा तो सोचने लगाः

"धिक्कार है मुझे ! एक तो धन कमाने में पाप, फिर शराब पीने का पाप..... और वह भी अपने जन्मदिन पर ! इतना ही नही, मैं उस गणिका के पास जा रहा हूँ जिसने मेरा जीवन और यौवन नोच डाला है ! ऐसी डाइन को पान-बीड़ा देने जा रहा हूँ। धिक्कार है मेरे जीवन को ! इन पापों का फल मैं कहाँ भोगूँगा ? हाय...."

पश्चाताप से उसके पाप धुलने लगे। चाँदी की थाली में सजाये हुए मेवा-मिठाई, पान-बीड़े आदि सब पदार्थ निर्दोष बच्चों को बाँट दिये।

कथा कहती है कि समय पाकर उसकी मृत्यु हुई और यमराज के पास ले जाया गया। यमराज ने कहाः

"तुम्हारे खाते में पुण्य की दो घड़ियाँ हैं। ब्रह्माकार वृत्तिवाले संत जहाँ रहते थे वहाँ तुमने दो घड़ियाँ बिताई हैं और जिस चीज में ममत्व था उस चीज पर से ममत्व हटाकर अन्य लोगों को बाँटा था। अतः इन दो घड़ी के पुण्य के बदले तुम्हें दो घड़ी स्वर्ग का राज्य दिया जायेगा। तुम्हारे अन्य तमाम पापों के लिए तुम्हें दीर्घ काल तक नर्क की यातनाएँ भुगतनी पड़ेंगी। नर्क की यातनाएँ पहले भोगो या बाद में भोगो, मर्जी तुम्हारी।"

शराबी ने सोचाः नर्क की यातनाएँ तो भोगनी ही पड़ेंगी परन्तु पहले देख लूँ, स्वर्ग का राज्य कैसा है।

उसे स्वर्ग ले जाया गया, सुवर्ण के सिंहासन पर बिठाया गया। उसको विचार आयाः मैं दो घड़ी अच्छी जगह में रहा और थोड़ा सा दान किया तो दो घड़ी तक राज्य मिल रहा है ! अब दो घड़ी में तो स्वर्ग छोड़ना है। जितना हो सके सत्कर्म कर लूँ !

उसने वशिष्ठजी महाराज का आवाहन किया और स्वर्ग की कामधेनु गाय दान में दे दी। विश्वामित्र का आवाहन किया और उच्चैश्रवा घोड़ा उनको दे दिया। कौण्डिन्य ऋषि का आवाहन करके ऐरावत हाथी दे दिया। स्वर्ग की जो-जो मूल्यवान विभूतियाँ थीं वे सब फटाफट ब्रह्मवेत्ता महापुरूषों को दे डाली।

दो घड़ी पूरी हुई। चित्रगुप्त भागता भागता आया और कहाः

"अब आपको यातना भोगने लायक शरीरों में नहीं जाना पड़ेगा। आपके पुण्य बहुत बढ़ गये हैं