
प्रातः
स्मरणीय
पूज्यपाद
संत
श्री
आसारामजी
बापू के
सत्संग-प्रवचन
ऋषि
प्रसाद
पूज्य
बापू के
आशीर्वचन
इस छोटी
सी पुस्तिका
में वे रत्न
भरे हुए हैं जो
जीवन को
चिन्मय बना
दें। हिटलर और
सिकंदर की
उपलब्धियों
और यश उनके
आगे अत्यंत
छोटे दिखने
लगे।
तुम अपने
सारे विश्व
में व्याप्त
अनुभव करो। इन
विचार रत्नों को
बार-बार
विचारो।
एकांत में
शांत वातावरण
में इन वचनों
को दोहराओ।
और....अपना खोया
हुआ खजाना
अवश्य अवश्य
प्राप्त कर
सकोगे इसमें
तनिक भी संदेह
नहीं है।
करो
हिम्मत......! मारो
छलांग.....!
कब तक
गिड़गिड़ाते
रहोगे ? हे भोले
महेश ! तुम
अपनी महिमा
में जागो। कोई
कठिन बात नहीं
है। अपने
साम्राज्य को
संभालो। फिर
तुम्हें संसार
और संसार की
उपलब्धियाँ,
स्वर्ग और स्वर्ग
के सुख
तुम्हारे
कृपाकांक्षी
महसूस होंगे।
तुम इतने महान
हो। तुम्हारा
यश वेद भी नहीं
गा सकते। कब
तक इस देह की
कैद में पड़े
रहोगे ?
ॐ.....! ॐ.....!! ॐ.......!!!
उठो.....
जागो......!
बार-बार इन
वचनों में
अपने चित्त को
सराबोर कर दो।
।। ॐ
शांतिः ।।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
निष्काम
कर्म उपासना-आचारशुद्धि
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
इस संसार
में यदि कुछ
दुर्लभ हो तो
वह है जीव को
मानवदेह की
प्राप्ति
होना।
मानवदेह मिल
जाये तो मोक्ष
की इच्छा होना
दुर्लभ है।
मोक्ष की
इच्छा भी हो
जाय तो
मोक्षमार्ग
को प्रकाशित करने
वाले सदगुरू
की प्राप्ति होना
अत्यंत
दुर्लभ है।
परमात्मा की
कृपा हो तभी
ये तीनों एक
साथ प्राप्त
हो सकते हैं।
जिसको
श्रोत्रिय और
ब्रह्मनिष्ठ
सदगुरू
संप्राप्त हो
गये हैं वह
मानव परम
सदभागी है।
परमात्मा
के
नित्यावतारूप
ज्ञानी
महात्मा के
दर्शन तो कई
लोगों को हो
जाते है लेकिन
उनकी वास्तविक
पहचान सब को
नहीं होती,
इससे वे लाभ
से वंचित रह
जाते हैं।
महात्मा के
साक्षात्कार
के लिए हृदय
में अतुलनीय
श्रद्धा और
प्रेम के पुष्पों
की सुगन्ध
चाहिए।
जिस
मनुष्य ने
जीवन में
सदगुरु की
प्राप्ति नहीं
की वह मनुष्य
अभागा है,
पापी है। ऐसा
मानव या तो
अपने से अधिक
बुद्धिमान
किसी को मानता
नहीं, अभिमानी
है, अथवा उसको
कोई अपना
हितैषी नहीं
दिखता। उसको
किसी में
विश्वास
नहीं। उसके
हृदय में संदेह
का शूल सतत्
पीड़ा देता
रहता है। ऐसा
मानव दुःखी ही
रहता है।
महापुरुष
का आश्रय
प्राप्त करने
वाला मनुष्य
सचमुच परम
सदभागी है। सदगुरु
की गोद में
पूर्ण
श्रद्धा से
अपना अहं रूपी
मस्तक रखकर
निश्चिंत
होकर विश्राम
पाने वाले
सत्शिष्य का
लौकिक एवं
आध्यात्मिक
मार्ग तेजोमय
हो जाता है।
सदगुरु में
परमात्मा का
अनन्त
सामर्थ्य
होता है। उनके
परम पावन देह को
छूकर आने वाली
वायु भी जीव
के अनन्त जन्मों
के पापों का
निवारण करके
क्षण मात्र
में उसको
आह्लादित कर
सकती है तो
उनके श्री
चरणों में
श्रद्धा-भक्ति
से समर्पित
होने वाले
सत्शिष्य के
कल्याण में
क्या कमी
रहेगी ?
गुरुत्व
में विराजमान
ज्ञानी
महापुरुषों की
महिमा गा रहे
हैं शास्त्र,
पुराण, वेद।
उनके सामर्थ्य
की क्या बात
करें ? उपनिषद
तो कहती हैः
तद्
दृष्टिगोचराः
सर्वे
मुच्यन्ते।
उसके
दृष्टिपथ में
जो कोई आ जाता
है उसकी मुक्ति
कालांतर में
भी हो जाती
है। शेर की
दाढ़ में आया
हुआ शिकार
संभव है छटक
जाय लेकिन
फकीर की दाढ़
में आया हुआ
शिकार सदगुरु
के दिल में स्थान
पाया हुआ
सत्शिष्य छटक
नहीं सकता,
श्रेयमार्ग
छोड़कर संसार
में गिर नहीं
सकता, फँस
नहीं सकता।
उसका
पारमार्थिक
कल्याण अवश्य
हो जाता है।
सदगुरु
साक्षात्
परब्रह्म
परमात्मा
हैं। वे निमिच
मात्र में
समग्र सृष्टि
के बन्धन काटकर
मुक्त कर सकते
हं।
यद्
यद्
स्पृश्यति पाणिभ्यां
यद् यद्
पश्यति
चक्षुषा।
स्थावरणापि
मुच्यन्ते
किं पुनः
प्राकृताः जनाः।।
(उपनिषद)
ब्रह्मज्ञानी
महापुरुष
ब्रह्मभाव से
अपने हाथ से
जिसको स्पर्श
करते हैं,
अपने चक्षुओं
से जिसको
देखते हैं वह
जड़ पदार्थ भी
कालांतर में
जीवत्व पाकर
आखिर
ब्रह्मत्व को
उपलब्ध होकर
मुक्ति पाता
है, तो फिर
उनकी दृष्टि
में आये हुए
मानव के मोक्ष
के बारे में
संदेह ही कहाँ
है ?
मोक्षमार्ग
के साधनों में
अनन्य भक्ति
एक उत्तम साधन
है। भक्ति का
अर्थ है
स्वरूप का
अनुसन्धान।
मोक्षकारणसामग्र्यां
भक्तिरेव
गरीयसी।
स्वस्वरूपानुसन्धानं
भक्तिरित्यभिधियते।।
आध्यात्मिक
मार्ग में
गुरुभक्ति की
महिमा अपार
है। शिष्य
स्वयं में
शिवत्व नहीं
देख सकता। अतः
प्रारंभ में
उसे अपने सदगुरु
में शिवत्व
देखना चाहिए,
सदगुरु को परमात्मास्वरूप
से भजना
चाहिए। इससे
गुरु के द्वारा
परमात्मा
शिष्य में
अमृत की वर्षा
कर देते हैं,
उसको
अमृतस्वरूप
बना देते हैं।
गुरुदेव
में मात्र
परमात्मा की
भावना ही नहीं,
गुरुदेव
परमात्म-स्वरूप
हैं ही। यह एक
ठोस सत्य है।
यह
वास्तविकता
अनुभव करने की
है। श्वेतश्वतर
उपनिषद कहती
हैः
यस्य
देवे परा
भक्तिर्यथा
देवे तथा
गुरौ।
सदगुरू
के चित्र,
फोटो या मूर्ति
के समक्ष
उपासना करने
से भी श्रेय
और प्रेय के
मार्ग की
परोक्षता
नष्ट हो जाती
है तो सदगुरु
के साक्षात
श्रीचरणों का
सेवन करने वाला,
अनन्य भक्त,
प्रेमी,
सत्शिष्य का
कल्याण होने
में विलंब
कैसा ?
जिसके
जीवन में
दिव्य विचार
नहीं है,
दिव्य चिन्तन
नहीं है वह चिन्ता
की खाई गिरता
है। चिन्ता से
बुद्धि संकीर्ण
होती है।
चिन्ता से
बुद्धि का
विनाश होता है।
चिन्ता से
बुद्धि
कुण्ठित होती
है। चिन्ता से
विकार पैदा
होते हैं।
विचारवान
पुरुष अपनी
विचारशक्ति
से विवेक वैराग्य
उत्पन्न करके
वास्तव में
जिसकी आवश्यकता
है उसे पा लेगा।
मूर्ख मनुष्य
जिसकी
आवश्यकता है
उसे समझ नहीं
पायेगा और
जिसकी
आवश्यकता
नहीं है उसको
आवश्यकता
मानकर अपना
अमूल्य जीवन
खो देगा।
मैं
दृष्टा हूँ,
यह अनुभूति भी
एक साधक
अवस्था है। एक
ऐसी
सिद्धावस्था
आती है जहाँ
दृष्टा होने
का भी सोचना
नहीं पड़ता। अनुक्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
गुरुभक्ति
और गुरुसेवा
ये साधनारूपी
नौका की पतवार
है जो शिष्य
को संसारसागर
से पार होने
में सहायरूप
हैं।
आज्ञापालन
के गुण के
कारण
आत्म-साक्षात्कार
के मार्ग में
आने वाला सब
से बड़ा शत्रु
अहंभाव धीरे
धीरे निर्मूल
हो जाता है।
पूजा,
पुष्पोहार,
भक्ति तथा
अन्य आँतिरक
भावों की
अभिव्यक्तियों
से
गुरुआज्ञापालन
का भाव ज्यादा
महत्त्वपूर्ण
है।
जो
मनुष्य
गुरुभक्तियोग
के मार्ग से
विमुख है वह
अज्ञान,
अन्धकार और
मृत्यु की
परंपररा को
प्राप्त होता
है।
किसी
आदमी के पास
विश्व की
अत्यन्त
मूल्यवान सारी
वस्तुएँ हों
लेकिन उसका
चित्त यदि
गुरुदेव के
चरणकमलों में
नहीं लगता हो
तो समझो कि उसके
पास कुछ भी
नहीं है।
गुरुदेव
की सेवा दिव्य
प्रकाश, ज्ञान
और कृपा को
ग्रहण करने के
लिए मन को
तैयार करती
है।
गुरुसेवा
हृदय को विशाल
बनाती है, सब
अवरोधों को
हटाती है, मन को
हमेशा
प्रगतिशील और
होशियार रखती
है। गुरुसेवा
हृदयशुद्धि
के लिए एक
प्रभावशाली
साधना है।
गुरुसेवा
से ईर्ष्या,
घृणा और
दूसरों से
उच्चतर होने
का भाव नष्ट
होता है।
जो शिष्य
सदुगुरुदेव
की सेवा करता
है वह वास्तव
में अपनी ही
सेवा करता है।
शिष्य को
चाहिए कि वह
अपने गुरुदेव
के समक्ष धीरे,
मधुर वाणी में
और सत्य बोले
तथा कठोर एव गलीज
शब्दों का
प्रयोग न करे।
जो गुरु
की निंदा करता
है वह रौरव
नर्क में गिरता
है।
शिष्य जब
गुरुदेव के
सान्निध्य
में रहता है तब
उसका मन
इन्द्रिय-विषयक
भोग विलासों
से विमुख हो
जाता है।
राजसी
प्रकृति का
मनुष्य पूरे
दिल से, पूरे
अन्तःकरण से
गुरु की सेवा
नहीं कर सकता।
सदगुरुदेव
के स्वरूप का
ध्यान करते
समय दिव्य
आत्मिक आनन्द,
रोमांच,
शान्ति आदि का
अनुभव होगा।
संसारी
लोगों का संग,
आवश्यकता से
अधिक भोजन, अभिमानी
राजसी
प्रवृत्ति,
निद्रा, काम,
क्रोध, लोभ ये
सब गुरुदेव के
चिन्तन में
अवरोध हैं।
गुरुभक्ति
जन्म, मृत्यु
और जरा को
नष्ट करती है।
शिष्य
लौकिक दृष्टि
से कितना भी
महान हो फिर भी
सदगुरुदेव की
सहायता के
बिना
निर्वाणसुख का
स्वाद नहीं चख
सकता।
गुरुदेव
के चरणकमलों
की रज में
स्नान किये
बिना मात्र
तपश्चर्या
करने से या
वेदों के
अध्ययन से
ज्ञान प्राप्त
नहीं हो सकता।
गुरुदेव
को शिष्य की
सेवा या
सहायता की
तनिक भी
आवश्यकता
नहीं है। फिर
भी सेवा के
द्वारा विकास
करने के लिए
शिष्य को वे
एक मौका देते
हं।
भवसागर
में डूबते हुए
शिष्य के लिए
गुरुदेव जीवन
संरक्षक नौका है।
गुरुदेव
के चिन्तन से
सुख, आन्तरिक
शक्ति, मन की
शांति और
आनन्द
प्राप्त होते
हैं।
मन्त्रचैतन्य
अर्थात्
मन्त्र की
गूढ़ शक्ति
गुरुदेव की
दीक्षा के
द्वारा ही
जागृत होती है।
गुरुदेव
की सेवा किये
बिना किया हुआ
तप, तीर्थाटन
और शास्त्रों
का अध्ययन यह
समय का दुर्व्यय
मात्र है।
गुरुदक्षिणा
दिये बिना
गुरुदेव से
किया हुआ पवित्र
शास्त्रों का
अभ्यास यह समय
का दुर्व्यय
मात्र है।
गुरुदेव
की इच्छाओं को
परिपूर्ण
किये बिना वेदान्त
के ग्रन्थ,
उपनिषद और
ब्रह्मसूत्र
का अभ्यास
करने में
कल्याण नहीं
होता, ज्ञान
नहीं मिलता।
चाहे
जितने
दार्शनिक
ग्रन्थ पढ़
लो, समस्त विश्व
का प्रवास
करके
व्याख्यान दो,
हजारों वर्षों
तक हिमालय की
गुफा में रहो,
वर्षों तक प्राणायाम
करो,
जीवनपर्यन्त
शीर्षासन करो,
फिर भी
गुरुदेव की
कृपा के बिना
मोक्ष नहीं
मिल सकता।
गुरुदेव
के चरणकमलों
का आश्रय लेने
से जो आनन्द
का अनुभव होता
है उसकी तुलना
में त्रिलोकी का
सुख कुछ भी
नहीं है।
गुरुदेव
की आज्ञा का
उल्लंघन करने
वाला सीधे नर्क
में जाता है।
यदि तुम
सच्चे हृदय से
आतुरतापूर्वक
ईश्वर की
प्रार्थना
करोगे तो
ईश्वर गुरु के
स्वरूप में
तुम्हारे पास
आयेंगे।
सच्चे
गुरु से अधिक
प्रेमपूर्ण,
अधिक हितैषी, अधिक
कृपालु और
अधिक प्रिय
व्यक्ति इस
विश्व में कोई
नहीं हो सकता।
सत्संग
का अर्थ है
गुरु का
सहवास। इस
सत्संग के
बिना मन ईश्वर
की ओर नहीं
मुड़ता।
गुरुदेव
के साथ किया
हुआ एक पल का
सत्संग भी
लाखों वर्ष
किये हुए तप
से कई गुना
श्रेष्ठ है।
हे साधक ! मनमुखी
साधना कभी
नहीं करो।
पूर्ण
श्रद्धा एवं
भक्तिभाव से
युक्त
गुरुमुखी
साधना करो।
तुम्हारे
बदले में गुरु
साधना नहीं
करेंगे। साधना
तो तुमको
स्वयं ही करनी
पड़ेगी।
गुरुदेव
तुमको उठाकर
समाधि में रख
देंगे ऐसे
चमत्कार की
अपेक्षा न
करो। तुम खुद
ही कठिन साधना
करो। भूखे
आदमी को स्वयं
ही खाना पड़ता
है।
गुरु-शिष्य
का सम्बन्ध
पवित्र और
जीवनपर्यन्त
का है यह बात
ठीक-ठीक समझ
लो।
अपने
गुरुदेव की
क्षतियाँ न
देखो। अपनी
क्षतियाँ
देखो और
उन्हें दूर
करने के लिए
ईश्वर से प्रार्थना
करो।
गुरुपद
एक भयंकर शाप
है।
सदगुरुदेव
के चरणामृत से
संसारसागर
सूख जाता है
और मनुष्य
आत्म-संपदा को
प्राप्त कर
सकता है।
सुषुप्त
कुण्डलिनी
शक्ति को
जागृत करने के
लिए गुरुदेव
की अपरिहार्य
आवश्यकता है।
सन्त,
महात्मा और
सदगुरुदेव के
सत्संग का एक
अवसर भी मत
चूको।
अहंभाव
का नाश करना
यह शिष्यत्व
का प्रारम्भ है।
शिष्यत्व
की कुंजी है
ब्रह्मचर्य
और गुरुसेवा।
शिष्यत्व
का चोला है
गुरुभक्ति।
सदगुरुदेव
के प्रति
सम्पूर्णतया
आज्ञापालन का
भाव ही
शिष्यत्व की
नींव है।
गुरुदेव
से मिलने की
उत्कट इच्छा
और उनकी सेवा
करने की तीव्र
आकांक्षा यह
मुमुक्षुत्व
की निशानी है।
ब्रह्मज्ञान
अति सूक्ष्म
है। संशय पैदा
होते हैं।
उनकी
निवृत्ति
करने के लिए
और मार्ग दिखाने
के लिए
ब्रह्मज्ञानी
गुरु की
आवश्यकता अनिवार्य
है।
गुरुदेव
के समक्ष हररो
अपने दोष कबूल
करो। तभी तुम
इन दुन्यावी
दुर्बलताओं
से ऊपर उठ
सकोगे।
दृष्टि,
स्पर्श, विचार
या शब्द के
द्वारा गुरु
अपने शिष्य का
परिवर्तन कर
सकते है।
गुरु
तुम्हारे लिए
विद्युत की
डोली हैं। वे
तुम्हें
पूर्णता के
शिखर पर
पहुँचाते
हैं।
जिससे
आत्म-साक्षात्कार
को गति मिले,
जिससे जागृति
प्राप्त हो
उसे गुरुदीक्षा
कहते हैं।
यदि तुम
गुरु में
ईश्वर को नहीं
देख सकते तो और
किसमें देख
सकोगे ?
शिष्य जब
गुरु के
सान्निध्य
में रहते हुए
अपने
गुरुबन्धुओं
के अनुकूल
होना नहीं
जानता है तब
घर्षण होता
है। इससे गुरु
नाराज होते
हैं।
अधिक
निद्रा करने
वाला, जड़,
स्थूल
देहवाला, निष्क्रिय,
आलसी और मूर्ख
मन का शिष्य,
गुरु सन्तुष्ट
हों, इस
प्रकार की
सेवा नहीं कर
सकता।
जिस
शिष्य में
तीव्र लगन का
गुण होता है
वह अपने
गुरुदेव की
सेवा में सफल
होता है। उसे
आबादी और
अमरत्व
प्राप्त होते
हैं।
अपने
पावन गुरुदेव
के प्रति
अच्छा बर्ताव
परम सुख के धाम
का पासपोर्ट
है।
गुरुदक्षिणा
देने से
असंख्य पापों
का नाश होता
है।
अपने
गुरुदेव के
प्रति निभायी
हुई सेवा यह
नैतिक टॉनिक
है। इससे मन और
हृदय दैवी
गुणों से
भरपूर होते
हैं, पुष्ट होते
हैं।
अपने
गुरु की सेवा
करते करते,
गुरुदेव की
आज्ञा का पालन
करते करते जो
सब कठिनाईयों
के सहन करता
है वह अपने
प्राकृत स्वभाव
को जीत लेता
है।
कृतघ्न
शिष्य इस
दुनियाँ में
हतभागी है,
दुःखी है।
उसका भाग्य
दयनीय, शोचनीय
और अफसोसजनक है।
सच्चे
शिष्य को
चाहिए कि वह
अपने पूज्य
गुरुदेव के
चरणकमलों की
प्रतिष्ठा
अपने हृदय के
सिंहासन पर
करे।
गुरुदेव
को मिलते ही
शिष्य का
सर्वप्रथम
पावन कर्तव्य
है कि उनको
खूब नम्र भाव
से प्रणाम करे।
यदि
तुमको नल से
पानी पीना हो
तुम्हें नीचे
झुकना
पड़ेगा। उसी
प्रकार यदि
तुम्हें
गुरुदेव के
पावन
मुखारविन्द
से बहते हुए
अमरत्व के पुण्यअमृत
का पान करना
हो तो तुम्हें
नम्रता का
प्रतीक होना
पड़ेगा।
सदगुरुदेव
के चरणकमलों
की पूजा के
लिए नम्रता के
पुष्प से अधिक
श्रेष्ठ अन्य
कोई पुष्प नहीं
है।
गुरुदेव
के आदेशों में
शंका न करना
और उनके पालन
में
आलस्य न करना
यही गुरुदेव
की आज्ञा का
पालन करने का
दिखावा करता
है। सच्चा शिष्य
भीतर के शुद्ध
प्रेम से गुरु
की आज्ञा का
पालन करता है।
गुरुदेव
के वचनों में
विश्वास रखना
यह अमरत्व के
द्वार खोलने
की गुरुचाबी
है।
जो
मनुष्य
विषयवासना का
दास है वह
गुरु की सेवा
और आत्म
समर्पण नहीं
कर सकता है।
फलतः वह संसार
के कीचड़ से
अपने को नहीं
बचा सकता है।
गुरुदेव
को धोखा देना
मानों अपनी ही
कब्र खोदना।
गुरुकृपा
अणुशक्ति से
भी ज्यादा
शक्तिमान है।
शिष्य के
ऊपर जो
आपत्तियाँ
आती हैं वे
गुप्त वेश में
गुरु के
आशीर्वाद
हैं।
गुरुदेव
के चरणकमलों
में
आत्म-समर्पण
करना यह सच्चे
शिष्य का
जीवनमंत्र
होना चाहिए।
साक्षात्
ईश्वर-स्वरूप
सदगुरुदेव के
चरण-कमलों में
आत्म-समर्पण
करोगे तो वे
तुम्हें
भयस्थानों से
बचायेंगे,
साधना में
तुम्हें
प्रेरणा
देंगे, अन्तिम
लक्ष्य तक
तुम्हारे
पथप्रदर्शक
बने रहेंगे।
सदगुरुदेव
के प्रति
श्रद्धा एक
ऐसी वस्तु है कि
जो प्राप्त
करने के बाद
अन्य किसी चीज
की प्राप्ति
करना शेष नहीं
रहता। इस
श्रद्धा के
द्वारा निमिष
मात्र में तुम
परम पदार्थ को
प्राप्त कर
लोगे।
साधक यदि
श्रद्धा और
भक्तिभाव से
अपने गुरुदेव
की सेवा नहीं
करेगा तो जैसे
कच्चे घड़े
में से पानी
टपक जाता है
वैसे उसके
व्रत-जप-तप
सबके फल टपक
जायेंगे।
शिष्य को
चाहिए कि वह
गुरुदेव को
साक्षात
ईश्वर माने।
उनको मानव कभी
नहीं माने।
जिससे
गुरुचरणों के
प्रति
भक्तिभाव
बड़े वह परम
धर्म है।
नियम का
अर्थ है
गुरुमंत्र का
जप, गुरुसेवा
के दौरान
तपश्चर्या
गुरुवचन में
श्रद्धा, गुरुदेव
की सेवा,
संतोष,
पवित्रता,
शास्त्रों का
अध्ययन,
गुरुभक्ति और
गुरु की
शरणागति।
तितिक्षा
का अर्थ है
गुरुदेव के
आदेशों का पालन
करते दुःख
सहना।
त्याग का
अर्थ है
गुरुदेव के
द्वारा
निषिद्ध कर्मों
का त्याग।
भगवान
श्रीकृष्ण
उद्धव जी से
कहते हैं - 'अति
सौभाग्य से
प्राप्त यह
मानवदेह
मजबूत नौका
जैसा है। गुरु
इस नौका का
सुकान
सँभालते हैं।
इस नौका को
चलानेवाला
मैं (ब्रह्म)
अनुकूल पवन
हूँ। जो मनुष्य
ऐसी नौका, ऐसे
सुकानी और ऐसा
अनुकूल पवन के
होते हुए भी
भवसागर पार
करने का
पुरुषार्थ
नहीं करता वह
सचमुच
आत्मघाती है।'
गुरुदेव
की अंगत सेवा
यह सर्वोत्तम
योग है।
क्रोध,
लोभ, असत्य,
क्रूरता,
याचना, दंभ,
झगड़ा, भ्रम, निराशा,
शोक, दुःख,
निद्रा, भय,
आलस्य ये सब
तमोगुण हैं।
अनेकों जन्म
लेने के
बावजूद भई
इनको जीता
नहीं जाता।
परंतु
श्रद्धा एवं
भक्ति से की
हुई गुरुदेव
की सेवा इन सब
दुर्गुणों को
नष्ट करती है।
साधक को
चाहिए कि वह
स्त्री का
सहवास न करे।
स्त्री सहवास
के जो लालची
हों उनका संभ
भी न करे
क्योंकि उससे
मन क्षुब्ध हो
जाता है। मन
जब क्षुब्ध
होता है तब
शिष्य
भक्तिभाव और
श्रद्धापूर्वक
गुरु की सेवा
नहीं कर सकता
है।
शिष्य
यदि गुरु की
आज्ञा का पालन
नहीं करता तो
उसकी साधना
व्यर्थ है।
जिस
प्रकार अग्नि
के पास बैठने
से ठंड, भय, अंधकार
दूर होते हैं
उसी प्रकार
सदगुरु के
सान्निध्य
में रहने से
अज्ञान,
मृत्यु का भय
और सब अनिष्ट
होते हैं।
गुरुसेवा
रूपी तीक्षण
तलवार और
ध्यान की सहायता
से शिष्य मन,
वचन, प्राण और
देह के अहंकार
को छेद देता है
और सब
रागद्वेष से
मुक्त होकर इस
संसार में स्वेच्छापूर्वक
विहार करता
है।
ज्ञान का
प्रकाश देने
वाली पवित्र
गुरुगीता का
जो अभ्यास
करता है वह
सचमुच
विशुद्ध होता
है और उसको
मोक्ष मिलता
है।
जैसे
सूर्योदय
होने से कुहरा
नष्ट होता है
वैसे ही
परब्रह्म
परमात्मा स्वरूप
सदगुरुदेव के
अज्ञाननाशक
सान्निध्य में
सब संशय
निवृत्त हो
जाते हैं।
साक्षात्
ईश्वर जैसे
सर्वोच्च पद
को प्राप्त
सदगुरु की जय
जयकार हो।
गुरुदेव के यश
को गानेवाले
धर्मशास्त्रों
की जय जयकार
हो। ऐसे सदगुरु
का परम आश्रय
जिसने लिया उस
शिष्य की जय
जयकार हो।
गुरुकृपा
का लघुतम
बिन्दु भी इस
संसार के कष्ट
से मनुष्य को
मुक्त करने के
लिए काफी है।
जो शिष्य
अहंकार से भरा
हुआ है और
गुरु के वचन नहीं
सुनता, आखिर
में उसका नाश
ही होता है।
आत्म-साक्षात्कारी
सदगुरुदेव और
ईश्वर में तनिक
भी भेद नहीं
है। दोनों एक,
अभिन्न और अद्वैत
हैं।
गुरुदेव
का सान्निध्य
साधक के लिए
एक सलामत नौका
है जो अंधकार
के उस पार
निर्भयता के
किनारे
पहुँचाती है।
जो साधक अपने
साधनापथ में
ईमानदारी से
और सच्चे हृदय
से प्रयत्न
करता है और
ईश्वर
साक्षात्कार
के लिए तड़पता
है उस योग्य
शिष्य पर
गुरुदेव की
कृपा उतरती
है।
आजकल
शिष्य ऐश-आराम
का जीवन जीते
हुए और गुरु की
आज्ञा का पालन
किये बिना
उनकी कृपा की
आकांक्षा
रखते हैं।
आत्म-साक्षात्कारी
सदगुरुदेव की
सेवा करने से
तुम्हारे
मोक्ष की
समस्या अवश्य
हल हो जायेगी।
राग
द्वेष से
मुक्त ऐसे
सदगुरु का संग
करने से
मनुष्य
आसक्ति रहित
होता है। उसे
वैराग्य
प्राप्त होता
है।
अपने मन
पर संयम रखकर
जो योगाभ्यास
नहीं कर सकते
हैं उनके लिए
भक्तिपूर्वक
गुरुदेव की
सेवा करना ही
एक मात्र उपाय
है।
गुरुदेव
शिष्य की
कठिनाईयों और
अवरोधों को जानते
हैं। क्योंकि
वे
त्रिकालज्ञानी
हैं। मनोमन
उनकी प्रार्थना
करो। वे
तुम्हारे
अवरोध दूर कर
देंगे।
गुरुदेव
की कृपा तो
हरदम बरसती ही
रहती है। शिष्य
को चाहिए की
वह केवल उनके
वचनों में
श्रद्धा रखे
और उनके
आदेशों का
पालन करे।
सच्चे
शिष्य के लिए
गुरुवचन ही
कायदा है।
गुरु का
दास होना यह
ईश्वर के समीप
होने के बराबर
है।
दंभी
गुरुओं से
सावधान रहना।
ऐसे गुरु
शास्त्रों को
रट लेते हैं
और शिष्यों को
उनमें से दृष्टान्त
भी देते हैं
पर अपने दिये
हुए उपदेशों
का स्वयं आचरण
नहीं कर सकते।
आलसी
शिष्य को
गुरुकृपा
नहीं मिलती।
राजसी स्वभाव
के शिष्य को
लोक कल्याण
करने वाले
गुरुदेव के
कार्य समझ में
नहीं आते।
किसी भी
कार्य को
प्रारंभ करने
से पहले शिष्य
को गुरुदेव की
सलाह और आज्ञा
लेनी चाहिए।
मुक्तात्मा
गुरुदेव की
सेवा, उनके
उपदिष्ट शास्त्रों
का अभ्यास,
उनकी परम पावन
मूर्ति का ध्यान
यह
गुरुभक्तियोग
साधने के
सुवर्णमार्ग
हैं।
जो शिष्य
नाम, कीर्ति,
सत्ता, धन और
विषयवासना के
पीछे दौड़ता
है उसके हृदय
में
सदगुरुदेव के
पावन
चरणकमलों के
प्रति
भक्तिभाव
नहीं जाग
सकता।
ऐसे वैसे
किसी भी
व्यक्ति को
गुरु के रुप
में नहीं
स्वीकारना
चाहिए और
एकबार गुरु के
रूप में
स्वीकार करने
के बाद किसी
भी संयोगवश
उनका त्याग नहीं
करना चाहिए।
जब योग्य
और अधिकारी
साधक
आध्यात्मिक
मार्ग की
दीक्षा लेने
के लिए गुरु
की खोज में
जाता है तब
ईश्वर उसके
समक्ष गुरु के
रूप में स्वयं
प्रगट होते
हैं और दीक्षा
देते हैं।
जो शिष्य
गुरुदेव के
साथ एकता या
तादात्म्य साधना
चाहते हैं
उनको संसार की
क्षणभंगुर
चीजों के
प्रति
संपूर्ण
वैराग्य रखना
चाहिए।
जो
उच्चतर ज्ञान
चित्त में
आविर्भूत
होता है वह
विचारों के
रूप में नहीं
अपितु शक्ति
के रूप में
होता है। ऐसा
ज्ञान देने
वाले गुरु
चित्त के साथ
एक रूप होते
हैं।
शिष्य जब
उच्चतर
दीक्षा के
योग्य बनता है
तब गुरु स्वयं
उसको योग के
रहस्यों की
दीक्षा देते
हैं।
गुरु के
प्रति
श्रद्धा
पर्वतों को
हिला सकती है।
गुरुकृपा
चमत्कार पैदा
कर सकती है।
हे वीर !
निःसंशय होकर
आगे बढ़ो।
परमात्मा
के साथ एकरूप
बने हुए महान
आध्यात्मिक
महापुरुष की
जो सेवा करता
है वह संसार
के कीचड़ को
पार कर सकता
है।
तुम यदि
सांसारिक
मनोवृत्तिवाले
लोगों की सेवा
करोगे तो
तुमको
सांसारिक
लोगों के गुण
मिलेंगे।
परंतु जो
निरन्तर परम
सुख में
निमग्न रहते
हैं, जो
सर्वगुणों के
धाम हैं, जो
साक्षात्
प्रेमस्वरूप
हैं ऐसे
सदगुरुदेव के
चरणकमलों की
सेवा करोगे तो
तुमको उनके
गुण प्राप्त
होंगे। अतः
उन्हीं की
सेवा करो,
सेवा करो, बस
सेवा करो। अनुक्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
(परम
पूज्य संत
श्री आसाराम
जी महाराज की
समृद्ध
सत्संग
वाटिका से
एकत्रित किये
हुए सुविकसित,
सुगंधित
और सुमधुर
पुष्पों का
संकलन)
अपने
आत्मदेव से
अपरिचित होने
के कारण ही
तुम अपने को
दीन हीन और
दुःखी मानते
हो। इसलिए अपनी
आत्म महिमा
में जग जाओ।
यदि अपने आपको
दीन हीन ही
मानते रहे तो
रोते रहोगे।
ऐसा कौन है जो तुम्हें
दुःखी कर सके ? तुम
यदि न चाहो तो
दुःख की क्या
मजाल है कि
तुम्हें
स्पर्श भी कर
सके ?
अनन्त अनन्त
ब्रह्मांडों
को जो चला रहा
है वह चेतना
तुम्हारे
भीतर चमक रही
है। उसकी
अनुभूति कर
लो। वही
तुम्हारा
वास्तविक
स्वरूप है।
जैसे
स्वप्न-जगत
जाग्रत होने
के बाद मिथ्या
लगता है वैसे
ही यह जाग्रत
जगत अपने आत्मदेव
को जानने से
मिथ्या हो
जाता है।
जिसकी सत्ता
लेकर यह जगत्
बना है अथवा
भासमान हो रहा
है उस आत्मा
को जान लेने
से मनुष्य
जीवन्मुक्त हो
जाता है।
गहरी
वास्तविकता
में तुम आत्मा
हो, ईश्वर हो, सर्वशक्तिमान
हो। यह सत्य
तुम्हारे
जीवन में
प्रगट होने की
प्रतीक्षा कर
रहा है।
तुम
अपनी आत्मा पर
सचमुच में
निर्भर होकर
सब कुछ
प्राप्त कर
सकते हो।
तुम्हारे लिए
असम्भव कुछ भी
नहीं है। चाहे
जितनी यौगिक
क्रियाएँ सीख
लो, चाहे
जितने दिन
ध्यान और
समाधि कर लो
लेकिन ध्यान
और समाधि
टूटने पर
राग-द्वेष,
शत्रु-मित्र,
मेरे-तेरे का
भाव आ जाय तो
क्या लाभ ?
आत्म-साक्षात्कार
एक निराली चीज
है।
मनोबल
बढ़ाकर आत्मा
में बैठ जाओ,
आप ही ब्रह्म
बन जाओ।
संकल्प बल की
यह आखिरी
उपलब्धि है।
अपने
को
परिस्थितियं
का गुलाम कभी
न समझो। तुम
स्वयं अपने
भाग्य के
विधाता हो।
यदि
तुम अचल
तत्त्व में
खड़े रहोगे तो
तुम्हारे पैर
अचल रहेंगे।
इस संसार में
आये हो तो ऐसा
कुछ करके जाओ
कि लोग
तुम्हारे
पदचिन्हों को
प्रणाम करें
और उनके सहारे
आगे बढ़ें।
जो
खुद को धोखा
देता है उसको
सारा विश्व
धोखा देता है।
कम से कम अपने
आपसे तो
वफादार रहो। जैसे
भीतर हो वैसे
बाहर हो कर
रहो। जो खुद से
वफादार नहीं
रह सकता वह
गुरु से भी
वफादार नहीं
रह सकता। जो
गुरु से
वफादार नहीं
रह सकता वह
सिद्धि नहीं
पा सकता, अपने
लोक-लोकान्तर
को नहीं सुधार
सकता।
जो
अपने आप से
वफादार है उसे
प्रकृति कुछ
हानि नहीं
पहुँचा सकती।
हरेक
इन्सान
परमात्मा का
स्वरूप है
परन्तु वह खुद
से वफादार
नहीं रहा।
उसने अविद्या
की भाँग पी ली
है और आत्मा
पर आवरण आ गया
है। इसी कारण
वह अपने को
दीन हीन मानने
लगा है।
ईश्वर
के रास्ते
चलने में यदि
गुरु भी रोकते
हों तो गुरु
की बात ठुकरा
देना पर ईश्वर
को न छोड़ना।
हजार
यज्ञ करो, लाख
मंत्र जपो
लेकिन तुमने
जब तक मूर्खता
नहीं छोड़ी तब
तक तुम्हारा
भला न होगा।
मोह
के निवृत्त
होने पर
बुद्धि सिवाय
परमात्मा के
और किसी में
भी नहीं
ठहरेगी।
परमात्मा के
सिवाय कहीं भी
बुद्धि ठहरती
है तो समझ
लेना कि
अज्ञान जारी
है।
तुम
जगत के स्वामी
बनो अन्यथा
जगत तुम्हारा
स्वामी बन
जायेगा।
आत्मा
को जानने वाला
शोक से तर
जाता है। उसे
कोई दुःख
प्रभावित
नहीं कर सकता।
उसके चित्त को
कोई भी दुःख
चलायमान नहीं
कर सकता।
प्रत्येक
परिस्थिति
में
साक्षीभाव....
जगत को स्वप्नतुल्य
समझकर अपने
केन्द्र में
थोड़ा सा
जागकर देखिये ! फिर
मन आपको दगा न
देगा।
विश्व
में आज तक ऐसा
कोई सिद्ध
नहीं हुआ जो
साधनामार्ग
में कभी गिरा
न हो। आज तक
ऐसा कोई मनुष्य
नहीं हुआ जो
बालकपन में
गिरा न हो।
शराबी
को एक बार
शराब की आदत
पड़ गई तो वह
हररोज शराब
पियेगा, घर
बरबाद करके भी
पियेगा, कायदा
तोड़कर भी
पियेगा। इसी
प्रकार जिसको
एकबार
ईश्वरीय
मस्ती का
स्वाद मिल गया
वह ईश्वरीय
मार्ग पर चलते
वक्त कुटुंब
या समाज की परवाह
नहीं करता।
तुम
सदैव से
अकर्त्ता और
अभोक्ता हो।
तुम हो तो यह
सब है। तुमसे
अलग इसकी
सत्ता नहीं
है।
हम
अपने
वास्तविक
स्वरूप, अपनी
असीम महिमा को
नहीं जानते।
नहीं तो मजाल
है कि जगत के
सारे लोग और
तैंतीस करोड़
देवता भी
मिलकर हमें
दुःखी करना
चाहें और हम
दुःखी हो
जायें ! जब
हम ही भीतर से
सुख अथवा दुःख
को स्वीकृति देते
हैं तभी सुख
अथवा दुःख हम
को प्रभावित
करते हैं।
सदैव प्रसन्न
रहना ईश्वर की
सबसे बड़ी भक्ति
है।
जब
तुम्हारा देह,
मन, बुद्धि,
विचार सहित यह
सम्पूर्ण जगत
तुम्हारी
प्रज्ञा में
स्वप्नमय
सिद्ध हो
जायेगा तब
तुम्हारे
तमाम दुःखों
का अन्त हो
जायेगा।
भौतिक
जगत में भाप
की शक्ति,
विद्युत की
शक्ति
गुरुत्वाकर्षण
की शक्ति बड़ी
मानी जाती है
मगर आत्मबल उन
सब शक्तियों
का संचालक बल है।
आत्मबल के
सान्निध्य
में आकर पंगु
प्रारब्ध को
पैर आ जाते
हैं, जीव की
दीनता पलायन
हो जाती है,
प्रतिकूल
परिस्थितियाँ
अनुकूल हो
जाती हैं। आत्मबल
सर्व
ऋद्धि-सिद्धियों
का पिता है।
सर्वत्र
शिव है, अशिव
है ही नहीं।
मन का मान्यता,
अपने को देह
मानने की
परिच्छिन्नता
ही शिवस्वरूप
होते हुए भी
अपने को अशिव
बना रही है।
प्रभु
का दर्शन
माधुर्य देने
वाला है,
आह्लाद देने
वाला है,
पापों का नाशक
है, परन्तु
आत्म-साक्षात्कार
तो आखिरी
मंजिल है,
मनुष्य जीवन का
अन्तिम
प्राप्तव्य
है। जिसे
तत्त्वज्ञान हो
गया उसे कुछ
भी पाना शेष
नहीं रहा।
ब्रह्म
ही सत्य है,
जगत मिथ्या है
और जीव ब्रह्म
ही है यह सब
तुमने पढ़ा है
या विद्वानों
से सुना है।
इसका अनुभव तो
नहीं किया। जब
तुम इस सत्य
का यथार्थ
अनुभव करोगे
तब तुम जो
बोलोगे वह
वेदवाक्य हो
जायगा, जिसको
तुम छुओगे वह
प्रसाद बन
जायेगा, जहाँ
पैर रखोगे वह
तीर्थ हो
जायेगा। तुम
तुम नहीं
रहोगे। तुम्हारे
द्वारा ईश्वर
कार्य करेगा।
प्रकृति
तुम्हारी
सेवा में
हाजिर रहेगी।
उस
निर्विकार
आत्मतत्त्व
को जाने बिना
हम सच्चे सुख
के, सच्चे
आनन्द के भागी
नहीं बन सकते।
एक बार इसको
हम अच्छी
प्रकार समझ
लें, फिर दृढ़ता
से पैर आगे
बढ़ाएँ। फिर
कोई भी विघ्न
आये, उसके सिर
पर पैर रखकर
आगे बढ़ें।
ऐसी दृढ़ता
लायें। शाहों
के शाह होने
का अपने में
अनुभव कर लिया
तो संसार का
कोई भी दुःख
और प्रलोभन
तुम्हें प्रभावित
नहीं कर
सकेगा।
कठिन
से कठिन काम
है
आत्म-साक्षात्कार
करना और सरल
से सरल काम भी
है आत्म
साक्षात्कार
करना। अनुक्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
सत्संग
जीवन का
कल्पवृक्ष
है।
परमात्मा
मिलना उतना
कठिन नहीं है
जितना कि पावन
सत्संग का
मिलना कठिन
है। यदि
सत्संग के द्वारा
परमात्मा की
महिमा का पता
न हो तो सम्भव
है कि
परमात्मा मिल
जाय फिर भी
उनकी पहचान न
हो, उनके
वास्तविक
आनन्द से वंचिर
रह जाओ। सच
पूछो तो
परमात्मा
मिला हुआ ही
है। उससे
बिछुड़ना
असम्भव है।
फिर भी पावन
सत्संग के
अभाव में उस
मिले हुए
मालिक को कहीं
दूर समझ रहे
हो।
पावन
सत्संग के
द्वारा मन से
जगत की सत्यता
हटती है। जब
तक जगत सच्चा
लगता है तब तक
सुख-दुःख होते
हैं। जगत की
सत्यता बाधित
होते ही
अर्थात्
आत्मज्ञान
होते ही
परमात्मा का
सच्चा आनन्द
प्राप्त होता
है। योगी,
महर्षि, सन्त,
महापुरुष,
फकीर लोग इस
परम रस का पान
करते हैं। हम
चाहें तो वे हमको
भी उसका स्वाद
चखा सकते हैं।
परन्तु इसके
लिए सत्संग का
सेवन करना
जरूरी है।
जीवन में एक
बार सत्संग का
प्रवेश हो जाय
तो बाद में और सब
अपने आप मिलता
है और भाग्य
को चमका देता
है।
दुःखपूर्ण
आवागमन के
चक्कर से
छूटने के लिए
ब्रह्मज्ञान
के सत्संग के
अतिरिक्त और
कोई रास्ता
नहीं..... कोई
रास्ता नहीं।
सत्संग
से वंचित रहना
अपने पतन को
आमंत्रण देना
है। इसलिए
अपने नेत्र,
कर्ण, त्वचा
आदि सभी को
सत्संगरूपी
गंगा में
स्नान कराते
रहो जिससे काम
विकार तुम
हावी न हो
सके।
सत्संग
द्वारा
प्राप्त
मार्गदर्शन
के अनुसार
पुरुषार्थ करने
से भक्त पर
भगवान या
भगवान के साथ
तदाकार बने
हुए सदगुरु की
कृपा होती है
और भक्त उस पद को
प्राप्त होता
है जहाँ परम
शांति मिलती
है।
जो
तत्त्ववेत्ताओं
की वाणी से
दूर हैं उन्हें
इस संसार में
भटकना ही
पड़ेगा। चाहे
वह कृष्ण के
साथ हो जाये
या क्राइस्ट
के साथ चाहे
अम्बा जी के
साथ हो जाय,
इससे कोई फर्क
नहीं पड़ता।
भगवान
ने हमें
बुद्धि दी है
तो उसका उपयोग
बन्धन काटने
में करें न कि
बन्धन बढ़ाने
में, हृदय को
शुद्ध करने
में करें न कि
अशुद्ध करने
में। यह तभी
हो सकता है
जबकि हम
सत्संग करें।
सदा
यही प्रयत्न
रखो कि जीवन में
से सत्संग न
छूटे, सदगुरु
का सान्निध्य
न छूटे।
सदगुरु से
बिछुडा हुआ
साधक न जीवन
के योग्य रहता
है न मौत के। अनुक्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
संसार
में
माता-पिता,
भाई-बहन,
पति-पत्नी के
सम्बन्ध की
तरह
गुरु-शिष्य का
सम्बन्ध भी एक
सम्बन्ध ही है
लेकिन अन्य सब
सम्बन्ध
बन्धन बढ़ाने
वाले हैं जबकि
गुरु-शिष्य का
सम्बन्ध सम
बन्धनों से
मुक्ति
दिलाता है। यह
सम्बन्ध एक
ऐसा सम्बन्ध
है जो सब
बन्धनों से
छुड़ाकर अन्त
में आप भी हट
जाता है और
जीव को अपने
शिवस्वरूप का
अनुभव करा
देता है।
सच्चे
गुरु नहीं
मिले हों तो
पुण्य कर्म
करो। जिनके
पुण्यकर्म
में कमी है
उनको गुरु
सामने मिल
जायें फिर भी
वे उन्हें
पहचान नहीं
पाते।
गुरु
को नापने
तोलने का
विचार शिष्य
के दिल में
उठा और गुरु
के बाह्य
आचरण-व्यवहार
को देखकर उनकी
गहराई का
अन्दाज लगाना
शुरु किया तो
समझो शिष्य के
पतन का
प्रारंभ हो
चुका।
गुरु
शिष्य के
कल्याण के लिए
सब कुछ करते
हैं। उनके
अन्दर
निरन्तर
अदम्य स्नेह
की धारा बहती
रहती है। वे
द्वेष के वश
होकर किसी को
थोड़े ही
डाँटते
फटकारते हैं ? उनके
सब राग-द्वेष
व्यतीत हो
चुके हैं। तभी
तो वे गुरु बने
हैं। उनकी हर
चेष्टा सहज और
सब के लिए
हितकर ही होती
है।
गुरुदेव
के पीछे पीछे
जाने की क्या
आवश्यकता है ? उनके
आदेश का
अनुसरण करना
है न कि उनके
पीछे पीछे
भटकना है। देह
के पीछे पीछे
भटकने से क्या
होगा ?
सत्शिष्य वही
है जो गुरु के
आदेश के
मुताबिक चले।
गुरुमुख बनो,
मनमुख नहीं।
गुरुदेव के
वचनों पर चलो।
सब ठीक हो
जायेगा। बड़े
दिखने वाले
आपत्तियों के
घनघोर बादल
गुरुमुख
शिष्य को डरा
नहीं सकते।
उसके देखते
देखते ही वे
बादल
छिन्न-भिन्न हो
जाते हैं।
गुरुमुख
शिष्य कभी
ठोकर नहीं खाता।
जिसको अपने
गुरुदेव की
महिमा पर
पूर्ण भरोसा
होता है ऐसा
शिष्य इस
दुर्गम माया
से अवश्य पार
हो जाता है।
गुरुकृपा से
वह भी एक दिन
अपने अमरत्व
का अनुभव कर
लेता है और
स्वयं गुरुपद
पर आरूढ़ हो
जाता है।
जिस
शिष्य में
गुरु के प्रति
अनन्य भाव
नहीं जगता वह
शिष्य आवारा
पशु के समान
ही रह जाता है।
सब
पुरुषार्थ
गुरुकृपा
प्राप्त करने
के लिए किये
जाते हैं।
गुरुकृपा
प्राप्त हो
जाये तो उसे
हजम करने का
सामर्थ्य आये
इसलिए
पुरुषार्थ
किया जाता है।
दूध की शक्ति
बढ़ाने के लिए
कसरत नहीं की
जाती लेकिन
शक्तिमान दूध
को हजम करने
की योग्यता
आये इसलिए
कसरत की जाती
है। दूध स्वयं
पूर्ण है। उसी
प्रकार
गुरुकृपा
अपने आप में
पूर्ण है,
सामर्थ्यवान
है। भुक्ति और
मुक्ति
दोनों
देने के लिए
वह समर्थ है।
शेरनी के दूध
के समान यह
गुरुकृपा ऐसे
वैसे पात्र को
हजम नहीं
होती। उसे हजम
करने की
योग्यता लाने
के लिए साधक
को सब प्रकार
के साधन-भजन, जप-तप,
अभ्यास-वैराग्य
आदि
पुरुषार्थ
करने पड़ते
हैं।
जो
साधक या शिष्य
गुरुकृपा
प्राप्त होने
के बाद भी
उसका महत्त्व
ठीक से न
समझते हुए
गहरा ध्यान
नहीं करते,
अन्तर्मुख
नहीं होते और
बहिर्मुख
प्रवृत्ति
में लगे रहते
हैं वे मूर्ख
है और भविष्य
में अपने को
अभागा सिद्ध
करते हैं।
संसारियों
की सेवा करना
कठिन है
क्योंकि उनकी
इच्छाओं और
वासनाओं का
कोई पार नहीं,
जबकि सदगुरु
तो अल्प सेवा
से ही तुष्ट
हो जायेंगे क्योंकि
उनकी तो कोई
इच्छा ही नहीं
रहा।
सच
पूछो तो गुरु
आपका कुछ लेना
नहीं चाहते।
वे आपको प्रेम
देकर तो कुछ
देते ही हैं
परन्तु
डाँट-फटकार
देकर भी आपको
कोई उत्तम
खजाना देना
चाहते हैं।
उपदेश
बेचा नहीं जा
सकता। उपदेश
का दान हो सकता
है। इसी कारण
हम सदगुरुओं
के ऋणी रहते
हैं। और....
सदगुरु का
कर्जदार रहना
विश्व का
सर्वाधिक
धनवान बनने से
भी बड़े भाग्य
की बात है।
अपनी
वाणी को पवित्र
करने के लिए,
अपनी बुद्धि
को तेजस्वी बनाने
के लिए, अपने
हृदय को
भावपूर्ण
बनाने के लिए
हम लोग सन्त,
महापुरुष और
सदगुरुओं की
महिमा गा लेते
हैं। यह ठीक
है लेकिन उनकी
असली महिमा के
साथ तो अन्याय
ही होता है।
वेद भी उनकी महिमा
गाते गाते थक
चुके हैं।
गुरुकृपा
या ईशकृपा हजम
हुई कि नहीं,
हम ज्ञान में
जगे कि नहीं
यह जानना हो
तो अपने आपसे
पूछोः "परमात्मा
में रूचि हुई
कि नहीं ?
विलास,
ऐशो-आराम से
वैराग्य हुआ
कि नहीं ?"
गुरुकृपा,
ईश्वरकृपा और
शास्त्रकृपा
तो अमाप है।
किसी के ऊपर
कम ज्यादा
नहीं है। कृपा
हजम करने वाले
की योग्यता कम
ज्यादा है।
योग्यता लाने
का पुरुषार्थ
करना है,
ईश्वर पाने का
नहीं।
गुरु
जिस साधक या
शिष्य की
बेईज्जती
करके जीवन
सुधारते हैं
उनकी इज्जत
आखिर में
बढ़ती है। गुरु
द्वारा की गई
बेइज्जती सहन
नहीं करने से बाद
में शिष्य के
जीवन में जो
बेइज्जती
होती है वह
कितनी भयंकर
होती है !
जो
सदभागी शिष्य
गुरु की
धमकियाँ,
डाँट-फटकार सहकर
आगे बढ़ता है,
खुद यमराज भी
उसकी इज्जत करते
हैं।
गुरु
के कटुवचन जो
हँसते हुए
स्वीकार कर
लेता है उसमें
जगत भर के विष
हजम करने का
सामर्थ्य आ
जाता है।
गुरुकृपा
हुई तो समझना
कि आनन्द के
खजाने खुलने
लगे।
अध्यात्म
मार्ग में
प्रवेश कराने
वाले ज्ञानी
और फकीर लोग
एक
दृष्टिमात्र
से अध्यात्म के
जिज्ञासु को
जान लेते है,
उसकी योग्यता
प्रगट हो जाती
है। इसलिए आज
तक ऐसे
जिज्ञासुओं
को चुनने के
लिये
प्रवेशपत्र
नहीं निकाले
गये।
पति
में परमात्मा
को देखने
लगोगे तो
जल्दी नहीं
दिखेगा
क्योंकि अभी
पति ने भी खुद
में परमात्मा
नहीं देखा है।
पत्नी में
परमात्मा को
देखने लगोगे
तो जल्दी नहीं
दिखेगा
क्योंकि अभी
पत्नी ने भी
खुद में परमात्मा
को नहीं देखा
है। गुरु ने
खुद में
परमात्मा को
देखा है,
पूर्णतया
साक्षात्कार
किया है। वहाँ
पर्दा पूरा हट
चुका है। गुरु
परमात्मा के
ही स्वरूप
हैं। वास्तव
में तो पति भी
परमात्मा का
स्वरूप है,
पत्नी भी
परमात्मा का स्वरूप
है, अरे
कुत्ता भी
परमात्मा का
ही स्वरूप है,
लेकिन वहाँ
अभी पर्दा हटा
नहीं है। गुरु
में वह पर्दा
हट चुका है।
अतः गुरु में
परमात्मा को
निहारो। तुम
जल्दी सफल हो
जाओगे।
फकीर
की अमृतवाणी
सबको ऐसे ही
हजम नहीं
होती। इसीलिए
प्रयोगशील
बनकर फकीर लोग
अहं पर चोट करके
सत्य का द्वार
खोलने का
प्रयास करते
हैं। सदभागी
साधक यह मर्म
समझ लेते हैं
लेकिन व्यवहार
में अपने को
चतुर मानने
वाले लोग इस
दिव्य लाभ से
वंचित रह जाते
हैं। ऐसे लोग
जहाँ अपनी
प्रशंसा होती
है वहीं रुकते
हैं।
गुरुदेव
के चरणों की
पावन रज आदर
से जो अपने सिर
चढ़ाता है
उसकी चरणरज
लेने के लिए
दुनियाँ के
लोग लालायित
रहते हैं।
प्रारंभ
में गुरु का
व्यवहार चाहे
विष जैसा लगता
हो लेकिन परिणाम
में
अमृततुल्य फल
देता है।
गुरु
की बात को
ठुकराने वाले
को जगत और
अन्त में
यमदूत भी ठोकर
मारते हैं।
गुरुदेव
जो देना चाहते
हैं वह कोई
ऐरा-गैरा पदार्थ
टिक नहीं सकता
है। इसलिए
सदगुरु अपने
प्यारे शिष्य
को चोट मार
मारकर मजबूत
बनाते हैं,
कसौटियों में
कसकर योग्य
बनाते हैं।
जब-जब,
जहाँ-जहाँ
आपके भीतर
कर्त्तापन
अंगड़ाइयाँ
लेने लगे
तब-तब,
वहाँ-वहाँ
जैसे
मूर्तिकार
मूर्ति बनाते
वक्त हथौड़ी
और छेनी से
पत्थर को काट
काटकर
अनावश्यक
हिस्से को
हटाता है वैसे
ही, गुरु अपनी
कुशलता से
तुम्हारे
अहंकार को
हटाते रहते
हैं। जीवित
सदगुरु के
सान्निध्य का
लाभ जितना हो
सके अधिकाधिक
लो। वे
तुम्हारे
अहंकार को काट
कूट कर तुम्हारे
शुद्ध स्वरूप
को प्रकट कर
देंगे।
आत्मानन्द
देने वाली
गुरुकृपा
मिलने के बाद भी
विषय सुख के
पीछे भटकना,
लोगों पर
प्रभाव डालने
के लिए टिपटाप
करना तथा शरीर
को सजाने में
जीवन का नूर
खो देना यह तो
मूर्खता की
पराकाष्ठा
है। अनुक्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
ऐ
मनुष्यदेह
में सोये हुए
चैतन्यदेव ! अब जाग
जा। अपने को
जान और
स्वावलम्बी
हो जा। आत्म-निर्भरता
ही सच्चा
पुरुषार्थ
है।
जब तुम
अपनी सहायता
करते हो तो
ईश्वर भी
तुम्हारी
सहायता करता
ही है। फिर
दैव (भाग्य)
तुम्हारी
सेवा करने को
बाध्य हो जाता
है।
विश्व
में यदि कोई
महान् से भी
महान् कार्य
है तो वह है
जीव को जगाकर
उसे उसके
शिवत्व में स्थापित
करना, प्रकृति
की पराधीनता
से छुड़ाकर उसको
मुक्त बनाना।
ब्रह्मनिष्ठ
महापुरुषों
के सान्निध्य
में यह कार्य
स्वाभाविक
रूप से हुआ
करता है।
जैसे
प्रकाश के
बिना पदार्थ
का ज्ञान नहीं
होता, उसी
प्रकार
पुरुषार्थ के
बिना कोई
सिद्धि नहीं
होती। जिस
पुरुष ने अपना
पुरुषार्थ
त्याग दिया है
और दैव के
आश्रय होकर समझता
है कि "दैव
हमारा कल्याण
करेगा" वह कभी
सिद्ध नहीं
होगा।
पुरुषार्थ
यही है कि
संतजनों का
संग करना और बोधरूपी
कलम और
विचाररूपी
स्याही से
सत्शास्त्रों
के अर्थ को
हृदयरूपी
पत्र पर
लिखना।
जैसे कोई
अमृत के निकट
बैठा है तो
पान किये बिना
अमर नहीं होता
वैसे ही अमृत
के भी अमृत
अन्तर्यामी
के पास बैठकर
भी जब तक
विवेक-वैराग्य
जगाकर हम
आत्मरस का पान
नहीं करते तब
तक अमर आनन्द
की प्राप्ति
नहीं होती।
जो 'भाग्य
में होगा वही
मिलेगा' ऐसा जो
कहता है वह
मूर्ख है।
पुरुषार्थ का
नाम ही भाग्य
है। भाग्य
शब्द मूर्खों
का प्रचार किया
हुआ है।
अपने मन
को मजबूत बना
लो तुम
पूर्णरूपेण
मजबूत हो।
हिम्मत, दृढ़
संकल्प और
प्रबल
पुरुषार्थ से
ऐसा कोई ध्येय
नहीं है जो
सिद्ध न हो
सके।
साधक भी
यदि पूर्ण
उत्साह के साथ
अपनी पूरी चेतना
आत्मस्वरूप
के पहचानने
में लगा दे तो
जिसमें
हजारों संत
उत्पन्न होकर विलीन
हो गये उस
परमात्मा का
साक्षात्कार
कर सकता है।
जीवन
गढ़ने के लिए
ही है। उसको
आकार देने
वाला कोई
सदगुरु मिल
जाय ! बस, फिर
तुम्हें
सिर्फ मोम
जैसा नर्म
बनना है।
सदगुरु अपना
कार्य करके ही
रहेंगे। उनकी
कृपा किसी से
बाधित नहीं
होती। उनके
द्वारा अनुशासित
होने का
उत्साह हममें
होना चाहिए। अनुक्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
परमात्मा
हृदय में ही
विराजमान है।
लेकिन अहंकार
बर्फ की सतह
की तरह आवरण
बनकर खड़ा है।
इस आवरण का
भंग होते ही
पता चलता है
कि मैं और परमात्मा
कभी दो न थे, कभी
अलग न थे।
वेदान्त
सुनकर यदि जप,
तप, पाठ, पूजा,
कीर्तन, ध्यान
को व्यर्थ
मानते हो और
लोभ, क्रोध,
राग, द्वेष,
मोहादि
विकारों को
व्यर्थ मानकर
निर्विकार
नहीं बनते हो
तो सावधान हो
जाओ। तुम एक
भयंकर
आत्मवंचना
में फँसे हो।
तुम्हारे उस
तथाकथित
ब्रह्मज्ञान
से तुम्हारा
क्षुद्र अहं
ही पुष्ट होकर
मजबूत बनेगा।
आप
किसी जीवित
आत्मज्ञानी
संत के पास
जायें तो यह
आशा मत रखना
कि वे आपके
अहंकार को
पोषण देंगे।
वे तो आपके
अहंकार पर ही
कुठाराघात
करेंगे।
क्योंकि आपके
और परमात्मा
के बीच यह
अहंकार ही तो
बाधा है।
अपने
सदगुरु की
कृपा से ध्यान
में उतरकर
अपने झूठे
अहंकार को
मिटा दो तो
उसकी जगह पर
ईश्वर आ
बैठेगा। आ
बैठेगा क्या,
वहाँ ईश्वर था
ही। तुम्हारा
अहंकार मिटा तो
वह प्रगट हो
गया। फिर
तुम्हें न
मन्दिर जाने
की आवश्यकता,
न मस्जिद जाने
की, न
गुरुद्वारा
जाने की और न
ही चर्च जाने
की आवश्यकता,
क्योंकि
जिसके लिए तुम
वहाँ जाते थे
वह तुम्हारे
भीतर ही प्रकट
हो गया।
निर्दोष
और सरल
व्यक्ति सत्य
का पैगाम
जल्दी सुन
लेता है लेकिन
अपने को चतुर
मानने वाला व्यक्ति
उस पैगाम को
जल्दी नहीं
सुनता।
मनुष्य
के सब प्रयास
केवल रोटी,
पानी, वस्त्र, निवास
के लिए ही
नहीं होते,
अहं के पोषण
के लिए भी
होते हैं। विश्व
में जो
नरसंहार और
बड़े बड़े
युद्ध हुए हैं
वे दाल-रोटी
के लिए नहीं
हुए, केवल अहं
के रक्षण के
लिए हुए हैं।
जब
तक दुःख होता
है तब तक समझ
लो कि
किसी-न-किसी प्रकार
की अहं की
पकड़ है।
प्रकृति में
घटने वाली
घटनाओं में
यदि तुम्हारी
पूर्ण सम्मति
नहीं होगी तो
वे घटनाएँ
तुम्हें
परेशान कर
देंगी। ईश्वर
की हाँ में
हाँ नहीं
मिलाओ तब तक
अवश्य परेशान
होगे। अहं की
धारणा को चोट
लगेगी। दुःख
और संघर्ष
आयेंगे ही।
अहं
कोई मौलिक चीज
नहीं है।
भ्रान्ति से
अहं खड़ा हो
गया है।
जन्मों और
सदियों का
अभ्यास हो गया
है इसलिए अहं
सच्चा लग रहा
है।
अहं
का पोषण भाता
है। खुशामद
प्यारी लगती
है। जिस
प्रकार ऊँट
कंटीले वृक्ष
के पास पहुँच
जाता है,
शराबी मयखाने
में पहुँच
जाता है, वैसे
ही अहं
वाहवाही के
बाजार में
पहुँच जाता
है।
सत्ताधीश
दुनियाँ को
झुकाने के लिए
जीवन खो देते
हैं फिर भी
दुनियाँ दिल
से नहीं
झुकती। सब से
बड़ा कार्य,
सब से बड़ी साधना
है अपने अहं
का समर्पण,
अपने अहं का
विसर्जन। यह
सब से नहीं हो
सकता। सन्त
अपने सर्वस्व
को लुटा देते
हैं। इसीलिए
दुनियाँ उनके
आगे
हृदयपूर्वक
झुकती है।
नश्वर
का अभिमान
डुबोता है,
शाश्वत का
अभिमान पार
लगाता है। एक
अभिमान
बन्धनों में
जकड़ता है और
दूसरा मुक्ति
के द्वार
खोलता है।
शरीर से लेकर
चिदावली
पर्यंत जो
अहंबुद्धि है
वह हटकर आत्मा
में अहंबुद्धि
हो जाय तो काम
बन गया। 'शिवोऽहम्....
शिवोऽहम्....' की
धुन लग जाय तो
बस.....!
मन-बुद्धि
की अपनी
मान्यताएँ
होती हैं और
अधिक चतुर लोग
ऐसी
मान्यताओं के
अधिक गुलाम
होते हैं वे
कहेंगेः "जो
मेरी समझ में
आयेगा वही
सत्य। मेरी
बुद्धि का
निर्णय ही
मानने योग्य
है और सब झूठ....।"
नाम,
जाति, पद आदि
के अभिमान में
चूर होकर हम
इस शरीर को ही "मैं"
मानकर चलते
हैं और इसीलिए
अपने कल्पित
इस अहं पर चोट
लगती है तो हम
चिल्लाते हैं
और क्रोधाग्नि
में जलते हैं।
नश्वर
शरीर में रहते
हुए अपने
शाश्वत
स्वरूप को जान
लो। इसके लिए
अपने अहं का
त्याग जरूरी है।
यह जिसको आ
गया,
साक्षात्कार
उसके कदमों में
है।
परिच्छिन्न
अहंकार माने
दुःख का
कारखाना।
अहंकार चाहे
शरीर का हो,
मित्र का हो,
नाते-रिश्तेदारों
का हो, धन-वैभव
का हो,
शुभकर्म का
हो, दानवीरता
का हो, सुधारक
का हो या
सज्जनता का
हो, परिच्छिन्न
अहंकार तुमको
संसार की
भट्ठी में ही
ले जायगा। तुम
यदि इस भट्ठी
से ऊबे हो, दिल
की आग बुझाना
चाहते हो तो
इस
परिच्छिन्न
अहंकार को
व्यापक
चैतन्य में
विवेक रूपी आग
से पिघला दो।
उस
परिच्छिन्न
अहंकार के
स्थान पर "मैं
साक्षात्
परमात्मा हूँ", इस
अहंकार को जमा
दो। यह कार्य
एक ही रात्रि
में हो जायेगा
ऐसा नहीं
मानना। इसके
लिए निरन्तर
पुरुषार्थ
करोगे तो जीत
तुम्हारे हाथ
में है। यह
पुरुषार्थ
माने जप, तप,
योग, भक्ति,
सेवा और
आत्म-विचार।
बाहर
की सामग्री
होम देने को
बहुत लोग
तैयार मिल
जायेंगे
लेकिन सत्य के
साक्षात्कार
के लिए अपनी
स्थूल और
सूक्ष्म सब
प्रकार की
मान्यताओं की
होली जलाने
लिए कोई कोई
ही तैयार होता
है।
किसी
भी प्रकार का
दुराग्रह
सत्य को समझने
में बाधा बन
जाता है।
जब
क्षुद्र देह
में अहंता और
देह के
सम्बन्धों
में ममता होती
है तब अशांति
होती है।
जब
तक 'तू' और 'तेरा'
जिन्दे रहेंगे
तब तक
परमात्मा
तेरे लिये मरा
हुआ है। 'तू' और 'तेरा' जब
मरेंगे तब
परमात्मा
तेरे जीवन में
सम्पूर्ण
कलाओं के साथ
जन्म लेंगे।
यही आखिरी
मंजिल है।
विश्व भर में
भटकने के बाद
विश्रांति के
लिए अपने घर ही
लौटना पड़ता
है। उसी
प्रकार जीवन
की सब भटकान
के बाद इसी
सत्य में
जागना पड़ेगा,
तभी निर्मल,
शाश्वत सुख
उपलब्ध होगा।
अपनी
कमाई का खाने
से ही
परमात्मा
नहीं मिलेगा।
अहंकार को
अलविदा देने
से ही
परमात्मा
मिलता है। तुम्हारे
और परमात्मा
के बीच अहंकार
ही तो दीवार के
रूप में खड़ा
है।
जब
कर्म का
भोक्ता
अहंकार नहीं
रहता तब कर्मयोग
सिद्ध होता
है। जब प्रेम
का भोक्ता
अहंकार नहीं
रहता तब भक्तियोग
में अखण्ड
आनन्दानुभूति
होती है। जब
ज्ञान का
भोक्ता
अहंकार नहीं
रहता तब
ज्ञानयोग पूर्ण
होता है।
कुछ
लोग सोचते
हैं-
प्राणायाम-धारणा-ध्यान
से या और किसी
युक्ति से
परमात्मा को
ढूँढ निकालेंगे।
ये सब अहंकार
के खेल हैं,
तुम्हारे मन के
खेल हैं। जब
तक मन से पार
होने की
तैयारी नहीं
होगी, अपनी
कल्पित मान्यताओं
को छोड़ने की
तैयारी नहीं
होगी, अपने
कल्पित पोपले
व्यक्तित्व
को विसर्जित
करने की तैयारी
नहीं होगी तब
तक भटकना चालू
रहेगा। यह कैसी
विडम्बना है
कि परमात्मा
तुमसे दूर
नहीं है,
तुमसे पृथक
नहीं है फिर
भी उससे अनभिज्ञ
हो और संसार
में अपने को
चतुर समझते
हो। अनुक्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
श्रद्धावान
ही शास्त्र और
गुरू की बात
सुनने को
तत्पर होता
है।
श्रद्धावान
ही नेत्र,
कर्ण, वाचा,
रसना आदि
इन्द्रियों
को संयम में
रखता है, वश
में रखता है।
इसलिए
श्रद्धावान
ही ज्ञान को
उपलब्ध होता
है। उस ज्ञान
के द्वारा ही
उसके भय, शोक,
चिन्ता,
अशांति, दुःख
सदा के लिए
नष्ट होते
हैं।
श्रद्धा
ऐसी चीज है
जिससे सब
अवगुण ढक जाते
हैं। कुतर्क
और
वितण्डावाद
ऐसा अवगुण है
कि अन्य सब
योग्यताओं को
ढक देता है।
विनम्र
और
श्रद्धायुक्त
लोगों पर सन्त
की करूणा कुछ
देने को जल्दी
उमड़ पड़ती
है।
भक्ति
करे कोई सूरमा
जाति वरण कुल
खोय..... इसीलिए
भक्तों के
जीवन कष्ट से
भरपूर बन जाते
हैं। एक भक्त
का जीवन ही
स्वयं भक्ति
शास्त्र बन जाता
है। ईश्वर के
प्रादुर्भाव
के लिए भक्त
अपना अहं हटा
लेता है, मान्यताओँ
का डेरा-तम्बू
उठा लेता है।
आज
हम लोग भक्तों
की जय जयकार
करते हैं
लेकिन उनके
जीवन के क्षण
क्षण कैसे बीत
गये यह हम नहीं
जानते, चुभे
हुए कण्टकों
को मधुरता से
कैसे झेले यह
हम नहीं
जानते।
संसार
के भोग वैभव
छोड़कर यदि
प्रभु के
प्रति जाने की
वृत्ति होने
लगे तो समझना
कि वह
तुम्हारे
पूर्वकाल के
शुभ संस्कारों
का फल है।
ईमानदारी
से किया हुआ
व्यवहार
भक्ति बन जाता
है और बेईमानी
से की हुई
भक्ति भी
व्यवहार बन जाती
है।
भगवान
का सच्चा भक्त
मिलना कठिन
है। एक हाथ कान
पर रखकर दूसरा
हाथ लम्बा
करके अपने
साढ़े तीन इंच
का मुँह खोलकर
'आ....आ....'
आलाप करने
वाले तो बहुत
मिल जाते हैं,
लेकिन सच्चे
भक्त नहीं
मिलते।
परमात्मा
से मिलने की
प्रबल हृदय
में होनी चाहिए।
ढोलक
हारमोनियम की
आवाज वहाँ
नहीं पहुँच
सकती है लेकिन
पवित्र हृदय
की प्रबल इच्छा
की आवाज वहाँ
तुरन्त पहुँच
जाती है।
ऐसी
अक्ल किस काम
की जो ईश्वर
से दूर ले
जाये ? ऐसा
धन किस काम का
जो लुटते हुए
आत्मधन को न
बचा सके ? ऐसी
प्रतिष्ठा
किस काम की जो
अपनी ईश्वरीय
महिमा में
प्रतिष्ठित न
होने दे ?
परन्तु
तथाकथित
सयाने लोग उन
नश्वर
खिलौनों को
इकट्ठे करने
में अपनी
चतुराई लगाते
हैं। उनके लिए
ईश्वर का
बलिदान दे
देते हैं पर
भक्त ईश्वर के
लिए नश्वर
खिलौनों का
बलिदान दे
देता है।
आत्मशान्ति
की प्राप्ति
के लिए समय
अल्प है, मार्ग
अटपटा है। खुद
को समझदार
माननेवाले
बड़े बड़े
तीसमारखाँ भी
इस मार्ग की
भूलभूलैया से
बाहर नहीं
निकल पाये। वे
जिज्ञासु धन्य
हैं
जिन्होंने
सच्चे
तत्त्ववेत्ताओं
की छत्रछाया
में पहुँच कर साहसपूर्वक
आत्मशांति को
पाने के लिए
कमर कसी है।
दुःख
से
आत्यान्तिक
मुक्ति पानी
हो तो संत का सान्निध्य
प्राप्त कर
आत्मदेव को
जानो।
महापुरुषों
के चरणों में
निष्काम भाव
से रहकर उनके
द्वारा
निर्दिष्ट
साधना में लग
जाने से
लक्ष्यसिद्धि
दूर नहीं
रहती।
देवी-देवताओं
की पूजा करना,
घण्टे-नगाड़े
बजाना, आरती
करना यह सब
बैलगाड़ी का
मार्ग है। जो अपना
अहं मिटाने के
लिए तैयार हो
गया, जिसको समर्पण
आ गया उसके
लिए हवाई जहाज
का मार्ग है।
ऐसे साधकों को
सदगुरु
ढूँढने नहीं
जाना पड़ता।
सदगुरु ही
ऐसों को ढूँढ
लेते हैं।
साधक
और संत के बीच,
शिष्य और गुरु
के बीच एक निर्दोष
प्रेम जब
छलकता है तब
एक दिल से
प्रेम ढुलता
है और दूसरे
दिल में भर
जाता है। संत
का प्रेम
कितना भी ढुले
लेकिन वह दिल
कभी खाली नहीं
होता है और
हजार हजार दिल
रूपी घड़े भर
जाते हैं।
जब
हमारे अन्दर
कर्त्तृत्व
नहीं होता है
और हम अहोभाव
से भर जाते
हैं उस वक्त
जो घटना घटती है
वह भगवान की
लीला होती है।
अनुक्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
तुम्हारे
भीतर वह
निर्भयस्वरूप
आत्मदेव बैठा
हुआ है, फिर भी
तुम भयभीत
होते हो ? अपने
निर्भय
स्वरूप को
जानो और सब
निर्बलताओं
से मुक्त हो
जाओ। उखाड़
फेंको अपनी सब
गुलामियों को,
कमजोरियों
को।
दीन-हीन-भयभीत
जीवन को
घसीटते हुए
जीना भी कोई
जीवन जीना है ?
यदि तुमको
स्वर्ग का
फरिश्ता
बनाया जाय या
मोतियों का
कोष दिया जाय
और तुम्हारी
प्रसन्नता या निर्भयता
पर रोक लगाई
जाय तो वह पद
या मोतियों का
कोष भी ठुकरा
देना।
जो
भयभीत है उसे
लोग और भयभीत
करते हैं और
जो निर्भय है
उसके आगे
संसार झुकता
है। यदि तुम
निर्भय हो,
प्रसन्न हो तो
दुःखी
व्यक्ति भी
तुम्हारे पास
आकर प्रसन्न
हो उठेगा, वह
अपना दुःख भूल
जायेगा और यदि
तुम भयभीत हो
तो कुत्ते का
पिल्ला
(कुरकुरिया)
भी तुम्हारे
पीछे दौड़कर
तुम्हें
भयभीत करने का
मजा ले लेगा।
राजा
होने से
निर्भयता
नहीं आती,
नेता होने से
निर्भयता
नहीं आती,
पैसा होने से
निर्भयता
नहीं आती,
प्रसिद्धि
होने से
निर्भयता
नहीं आती,
अधिक लोग
मानने लगे
इससे
निर्भयता
नहीं आती,
अस्त्र-शस्त्रों
से सुसज्जित
होने से भी
निर्भयता
नहीं आती। निर्भयता
तो भीतर की
स्थिति है।
निर्भयता तो जो
भीतर से
निर्भय हो
चुके हैं,
उनका संग करने
से आती है।
मानव
जीवन की सबसे
बड़ी उपलब्धि
है परम निर्भयता।
जो परम निर्भय
हो गया अपने
आत्मस्वरूप को
जानकर, उसे
फिर किसी
प्रकार की कोई
उपलब्धि करना
शेष नहीं
रहता।
तलवार
या बन्दूक
रखने वाले तो
निर्भय होते
ही होंगे इस
भ्रांति में
नहीं पड़ना।
निर्भयता भीतर
की चीज है।
बन्दूक
या रायफल जैसे
बाहरों
साधनों के
आधार पर टिकी
निर्भयता
निर्भयता
नहीं है। वह
निर्भयता के
नाम पर धोखा
है।
भय
मनुष्य जीवन
का कलंक है।
तुम
ऐसे निर्भय हो
जाओ कि
तुम्हारी
निर्भयता को
देखकर सामने
से आती हुई
मौत भी भय से
काँप उठे।
जो
भीतर से निर्भय
होता है उसके
सन्मुख रीछ और
सिंह जैसे
खूंखार और
हिंसक पशु भी
अपना हिंसक
स्वभाव भूल
जाते है। परम
निर्भयता तो
ऐसा अमृत है
कि मृत्यु भी
लौट जाती है,
यम का डंडा भी
निस्तेज हो
जाता है,
अस्त्र-शस्त्र
कुण्ठित हो
जाते हैं और
प्रकृति भी
अपने नियम
बदलकर
व्यवहार करती
है।
ऐसा
कोई गुण नहीं
है जो परम
निर्भयता से
पैदा न होता
हो और ऐसा कोई
दुर्गुण नहीं
है जो भय से पैदा
न होता हो।
यह
दृश्य संसार
इन्द्रजाल की
तरह मिथ्या
है। अतः उसमें
आसक्त होना या
उससे भयभीत
होना व्यर्थ
है।
साधना
के राह पर
हजार विघ्न
होंगे,
लाख-लाख काँटे
होंगे। उन सब
पर
निर्भयतापूर्वक
पैर रखोगे तो वे
काँटे फूल बन
जायेंगे।
'हमारा
सुख कहीं छिन
न जाय' ऐसा
भयभीत जीवन भी
कोई जीवन है ? यह तो
मौत से भी
बदतर है।
इसलिए निर्भय
जीवन जीना ही
असली जीवन है।
साधना-मार्ग
में पतन होना
यह पाप नहीं
है लेकिन पतन
होने के बाद
पड़े ही रहना,
उठना नहीं, यह
पाप है। पतन
और असफलता से
डरो नहीं।
साधना के
मार्ग पर हजार
बार निष्फलता
मिले फिर भी
रुको मत। पीछे
न मुड़ो। निर्भयतापूर्वक
साहस जारी
रखो। तुम
अवश्य सफल हो
जाओगे।
निर्भयता
ही जीवन है, भय
ही मृत्यु है।
अनुक्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
मिथ्या
में सत्य को
जान लेना,
नश्वर में
शाश्वत को खोज
लेना, अनात्मा
में आत्मा को
पहचान लेना और
आत्ममय होकर
जीना यह विवेक
है।
सुख
और समृद्धि
में विवेक
सोता है। दुःख
में विवेक
जागता है।
विवेक-वैराग्यसम्पन्न
शिष्य को
समर्थ गुरु
मिल जाय, फिर
क्या बाकी रहेगा
?
थोड़े ही समय
में कार्य हो
जायेगा, परम
तत्त्व ज्ञात
हो जायगा और
साक्षात्कार
हो जायगा।
जहाँ
विवेक का
हथियार चलता
है वहाँ आवेग
का हथियार
शांत हो जाता
है।
जो
समझ सत्य को
जीवन में
उतारे वही समझ
सच्ची समझ है, और
सब नासमझी है।
समय
बहुत कीमती
है। करोड़ों
रूपये खर्च
करोगे फिर भी
एक क्षण भी
नया नहीं बना
सकते। समझ बढ़ा
सकते हो,
ज्ञान बढ़ा
सकते हो लेकिन
आयु नहीं बढ़ा
सकते। अतः
विचारवान
बनो।
आत्मनिष्ठा में
जम जाओ।
अपने
आपका खर्च हो
जाना एक बात
है और अपने
आपकी खबर हो जाना,
आत्मस्वरूप
की पहचान हो
जाना तो बात
ही निराली है।
मात्र
पाठ-पूजा,
देव-दर्शन,
नहाना-धोना,
संध्या करना,
माला घुमाना
इत्यादि से
धर्म की समाप्ति
नहीं होती।
प्रारंभ में
इन सबकी
आवश्यकता है
और जब तक हृदय
में
साक्षात्कार
की परम शांति
का अनुभव न हो
जाय तब तक निरन्तर
साधना में लगे
रहना। मैं कौन
हूँ ?
पूजा पाठ करने
वाला कौन है ?
आत्मा और
परमात्मा के
बीच कितना
अन्तर है ?
ईश्वर और
आत्म-साक्षात्कार
के बीच क्या
फर्क है ?
किताबी ज्ञान,
पंडितों के
ज्ञान और
परमहंसों के
अनुभव में
क्या फर्क है ? ये
सब प्रश्न
एकान्त में बैठकर
गहराई से
सोचने चाहिए।
परमहंसों के
मुखारविन्दों
से इसके बारे
में जो सुना
हो उसका चिन्तन
करना चाहिए।
मन
द्वारा नहीं
बल्कि
प्रज्ञा
द्वारा अनुभव होता
है कि अहंकार
के अन्दर बाहर
सर्वत्र परमात्मा
है। लहर के
अन्दर बाहर
सर्वत्र सागर
है।
आज
तक तुमने मन
की सब बातें
मानी है,
सत्संग
द्वारा
प्राप्त
विवेक की बात
कहाँ मानी है ?
कुटुम्बीजन,
मित्र, साहब,
नेता लोगों की
बातें मानी
हैं। अब कोई
सच्चे
साधु-संत की
बात मानकर
देखो, उनके
ज्ञानोपदेश
का आदर करके
देखो, अमल
करके देखो फिर
अनुभव करो कि
तुम
आनन्दस्वरूप
होकर छलकते हो
कि नहीं। ऐसी
कौन-सी चिन्ता
है कि जिसने
तुम्हें
बाँधा है ? तुम
इसी समय
मुक्ति का
अनुभव करो।
विवेक,
विचार,
वैराग्य और
आत्मचिन्तन
के सिवा और सब
खिलौने हैं।
खिलौनों में
रुक जाओगे तो
जीवन खिलेगा
नहीं।
किसी
भी चीज को
छोड़ना हो तो
छोड़ो लेकिन
दिल में द्वेष
लाकर नहीं।
अलबत्ता,
प्रेम से किसी
भी चीज को
छोड़ना कठिन
है लेकिन
द्वेष से
छोड़ना तो
असंभव है।
निष्काम
भाव से साधन,
भजन, त्याग,
तपस्या, जप, तप, व्रत,
आदि करने से
अन्तःकरण में
ऐसा सात्त्विक
विचार उठता है
कि 'यह
सब व्यवहार
करने से आखिर
क्या ? हम
कौन हैँ और यह
सब क्यों कर
रहे हैं ?'
संसार का
मिथ्यापन समझ
में आ जाने से
शाश्वत सत्य
परमात्मा की
ओर हमारी
वृत्ति जाती
है। प्रकृति
के प्रभाव से
मुक्त होकर
आत्माभिमुख होना
ही सब साधनाओं
का लक्ष्य है।