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अनुक्रम


प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद

संत श्री आसारामजी बापू के

सत्संग-प्रवचन

सामर्थ्य स्रोत

निवेदन

पूज्य बापू की सहज बोलचाल में अनुभवसंपन्न गीताज्ञान की माधुर्यता इस प्रकार निखर आती है कि विद्वान इसमें तत्त्व-अमृत निहार सकते हैं, साधक काम-संकल्प के काँटों को चुनकर फेंक सकते हैं। संसारी जीवन जीने वाले सत्य की साधना पर अग्रसर होने को उत्सुक हो सकते हैं।

समिति ने पूज्य बापू की सहज बोलचाल की धारा को संग्रहीत करके पुस्तक के रूप में आपके करकमलों तक पहुँचाने का बालयत्न किया है। गुणग्राही दृष्टि से इसका लाभ उठाने की कृपा करें। सनातन धर्म के उच्च शिखरों के अनुभव संपन्न इन संत की अमृतवाणी औरों तक पहुँचाकर पुण्य के भागी बनें।

विनीत,

श्री योग वेदान्त सेवा समिति

अमदावाद आश्रम

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अनुक्रम

निवेदन

सामर्थ्य स्रोत                                 2          पाँच रूपये और गधा                         53

भूषणों का भूषणः शील            8     चूहे का पुरुषार्थ                                    55

सत्संग-सुधा                           23    कच की सेवा-भावना              55

      शील का दान             23    निष्काम गुरुसेवा                                 57

      'चतुराई चूल्हे पड़ी....       27    ओखा की शादी                  60

      गीता से आत्मज्ञान पाया    31    घोड़ी गई..... हुक्का रह गया                         60

      पाँच आश्चर्य               34    मथुरा के भंगेड़ी                                   69

      आठ पापों का घड़ा         36    युक्ति से कामनाओ को मोड़ो             71       

      सत्संग महिमा             37    स्वामी विवेकानन्द और नर्तकी          72

      विधेयात्मक जीवनदृष्टि            40    गांधारी और श्रीकृष्ण                          75

तीन दुर्लभ चीजें                 41    मेधावी बालक : शंकराचार्य         76

गीता में मधुर जीवन का मार्ग      49

सुख का स्रोत अपने आप में       81

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सामर्थ्य स्रोत

रावण के जमाने में एक बड़े सदाचारी, शील को धारण करने वाले राजा चक्ववेण हुए। बड़ा सादा जीवन था उनका। राजपाट होते हुए भी योगी का जीवन जीते थे। प्रजा से जो कर आता था, उसको प्रजा का खून-सा समझते थे। उसका उपयोग व्यक्तिगत सुख, ऐश्वर्य, स्वार्थ या विलास में बिल्कुल नहीं होने देते थे। राजमहल के पीछे खुली जमीन थी, उसमें खेती करके अपना गुजारा कर लेते थे। हल जोतने के लिए बैल कहाँ से लायें ? खजाना तो राज्य का था, अपना नहीं था। उसमें से   खर्च नहीं करना चाहिए। .....तो राजा स्वयं बैल की जगह जुत जाते थे और उनकी पत्नी किसान की जगह। इस प्रकार पति पत्नी खेती करते और जो फसल होती उससे गुजारा करते। कपास बो देते। फिर घर में ताना-बुनी करके कपड़े बना लेते, खद्दर से भी मोटे।

चक्ववेण राजा के राज्य में किसी की अकाल मृत्यु नहीं होती थी, अकाल नहीं पड़ता था, प्रजा में ईमानदारी थी, सुख-शान्ति थी। प्रजा अपने राजा-रानी को साक्षात् शिव-पार्वती का अवतार मानती थी। पर्व त्यौहार के दिनों में नगर के लोग इनके दर्शन करने आते थे।

पर्व के दिन थे। कुछ धनाढ्य महिलायें सज धजकर राजमहल में गईं। रानी से मिलीं। रानी के वस्त्र तो सादे, घर की ताना-बुनी करके बनाये हुए मोटे-मोटे। अंग पर कोई हीरे-जवाहरात, सुवर्ण-अलंकार आदि कुछ नहीं। कीमती वस्त्र-आभूषणों से, सुवर्ण-अलंकारों से सजीधजी बड़े घराने की महिलाएँ कहने लगीं- "अरे रानी साहिबा ! आप तो हमारी लक्ष्मी जी हैं। हमारे राज्य की महारानी पर्व के दिनों में ऐसे कपड़े पहनें ? हमें बड़ा दुःख होता है। आप इतनी महान विभूति की धर्मपत्नी ! .....और इतने सादे, चिथड़े जैसे कपड़े ! ऐसे कपड़े तो हम नौकरानी को भी पहनने   नहीं देते। आप ऐसा  जीवन बिताती हो ? हमें तो आपकी जिन्दगी पर बहुत दुःख होता है।"

आदमी जैसा सुनता है, देर-सबेर उसका प्रभाव चित्त पर पड़ता ही है। अगर सावधान न रहे तो कुसंग का रंग लग ही जाता है। हल्के संग का रंग जल्दी लगता है। अतः सावधान रहें। कुसंग सत्पथ से विचलित कर देता है।

दूसरी महिला ने कहाः "देखो जी ! हमारे ये हीरे कैसे चमक रहे हैं ! .... और हम तो आपकी प्रजा हैं। आप हमारी रानी साहिबा हैं। आपके पास तो हमसे भी ज्यादा कीमती वस्त्रालंकार होने चाहिए ?"

तीसरी ने अपनी अंगूठी दिखायी। चौथी ने अपने जेवर दिखाये। चक्ववेण की पत्नी तो एक  और उसको बहकाने वाली अनेक। उनके श्वासोच्छवास, उनके विलासी वायब्रेशन से रानी हिल गई। वे स्त्रियाँ तो चली गईं लेकिन चक्ववेण के घर में आग लगा गई।

रानी ने बाल खोल दिये और स्त्रीचरित्र में उतर आई। राजा राज-दरबार से लौटे। देखा तो देवीजी का रूद्र स्वरूप ! पूछाः

"क्या बात है देवी ?"

"आप मुझे मूर्ख बना रहे हैं। मैं आपकी रानी कैसी ? आप ऐसे महान् सम्राट और मैं आप जैसे सम्राट की पत्नी ऐसी दरिद्र ? मेरे ये हाल ?"

"तुझे क्या चाहिए ?"

"पहले वचन दो।"

"हाँ, वचन देता हूँ। माँग।"

"सुवर्ण-अलंकार, हीरे जवाहरात, कीमती वस्त्र-आभूषण..... जैसे महारानियों के पास होते हैं, वैसी ही मेरी व्यवस्था होनी चाहिए।"

राजा वस्तुस्थिति से ज्ञात हुए। वे समझ गये किः "वस्त्रालंकार और फैशन की गुलाम महिलाओं ने इसमें अपनी विलासिता का कचरा भर दिया है। अपना अन्तःकरण सजाने के बजाय हाड़-मांस को सजानेवाली अल्पमति माइयों ने इसे प्रभावित कर दिया है। मेरा उपदेश मानेगी नहीं।

इसके लिये हीरे-जवाहरात, गहने-कपड़े कहाँ से लाऊँ ? राज्य का खजाना तो प्रजा का खून है। प्रजा के खून का शोषण करके, स्त्री का गुलाम होकर, उससे उसको गहने पहनाऊँ ? इतना नालायक मुझे होना नहीं है। प्रजा का शोषण करके औरत को आभूषण दूँ ? क्या करूँ ? धन कहाँ से लाऊँ ? नीति क्या कहती है ?

नीति कहती है कि अपने से जो बलवान् हो, धनवान हो और दुष्ट हो तो उसका धन ले लेने में कोई पाप नहीं लगता। धन तो मुझे चाहिए। नीतियुक्त धन होना चाहिए।'

राजा सोचने लगेः ‘धनवान और दुष्ट लोग तो मेरे राज्य में भी होंगे लेकिन वे मुझसे बलवान नहीं हैं। वे मेरे राज्य के आश्रित हैं। दुर्बल का धन छीनना ठीक नहीं।"

विचार करते-करते अड़ोस-पड़ोस के राजाओं पर नजर गई। वे धनवान तो होंगे, बेईमान भी होंगे लेकिन बलवान भी नहीं थे। आखिर याद आया कि रावण ऐसा है। धनवान भी है, बलवान भी है और दुष्ट भी हो गया है। उसका धन लेना नीतियुक्त है।

अपने से बलवान् और उसका धन ? याचना करके नहीं, माँगकर नहीं, उधार नहीं, दान नहीं, चोरी करके नहीं, युक्ति से और हुक्म से लेना है।

राजा ने एक चतुर वजीर को बुलाया और कहाः "जाकर राजा रावण को कह दो कि दो मन सोना दे दे। दान-धर्म के रूप में नहीं, ऋण के रूप में नहीं। राजा चक्ववेण का हुक्म है कि 'कर' के रूप में दो मन सोना दे दे।"

वजीर गया रावण की सभा में और बोलाः "लंकेश ! राजा चक्ववेण का आदेश है, ध्यान से सुनो।"

रावणः "देव, दानव, मानव, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व आदि सब पर लंकापति रावण का आदेश चलता है और उस रावण पर राजा चक्ववेण का आदेश ! हूँऽऽऽ...." रावण गरज उठा।

विभीषण आदि ने कहाः "राजन ! कुछ भी हो, वह सन्देशवाहक है, दूत है। उसकी बात सुननी चाहिए।"

रावणः "हाँ, क्या बोलते हो ?" रावण ने स्वीकृति दी।

वजीरः "दान के रूप में नहीं, ऋण के रूप में नहीं, लेकिन राजा चक्ववेण का आदेश है कि 'कर' के रूप में दो मन सोना दे दो, नहीं तो ठीक नहीं रहेगा। लंका का राज्य खतरे में पड़ जायेगा।" चक्ववेण के वजीर ने अपने स्वामी का आदेश सुना दिया।

रावणः "अरे मच्छर ! इस रावण से बड़े-बड़े चक्रवर्ती डरते हैं और वह जरा सा-चक्ववेण राजा ! मुझ पर 'कर' ? हूँऽऽऽ..... अरे ! इसको बाँध दो, कैद में डाल दो।" रावण आगबबूला हो गया।

सबने सलाह दीः "महाराज ! यह तो बेचारा अनुचर है, चिट्ठी का चाकर। इसको कैद करना नीति के विरूद्ध है। आप सोना न दें, कोई हर्ज नहीं किन्तु इसको छोड़ ही दें। हमने राजा चक्ववेण का नाम सुना है। वह बड़ा शीलसम्पन्न राजा है। बड़ा सज्जन, सदाचारी है। उसके पास योग-सामर्थ्य, सूक्ष्म जगत का सामर्थ्य बहुत है।"

"तो रावण क्या कम है ?"

"लंकेश ! आप भी कम नही है। लेकिन वह राजा शील का पालन करता है।"

"सबकी क्या राय है ?" पूरे मंत्रीमण्डल पर रावण ने नजर डालते हुए पूछा।

"या तो दो मन सोना दे दें......"

"मैं सोना दे दूँ ?" सलाहकारों की बात बीच से ही काटते हुए रावण गरज उठा। "याचक भीख माँगने आये तो दे दूँ लेकिन मेरे ऊपर 'कर' ? मेरे ऊपर आदेश ? यह नहीं होगा।" सिर धुनकर रावण बोला।

"अच्छा, तो दूत को बाहर निकाल दो।"

चक्ववेण के वजीर को बाहर निकाल दिया गया। रावण महल में गया तो वार्त्तालाप करता हुआ वह मन्दोदरी से बोलाः

"प्रिये ! दुनियाँ में ऐसे मूर्ख भी राज्य करते हैं। देव, दानव, मानव, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व आदि सबके सब जिससे भय खाते हैं, उस लंकापति रावण को किसी मूर्ख चक्ववेण ने आदेश भेज दिया कि 'कर' के रूप में दो मन सोना दे दो। 'अरे मन्दोदरी ! कैसे कैसे पागल राजा हैं दुनियाँ में !"

"नाथ ! चक्ववेण राजा बड़े सदाचारी आदमी हैं। शीलवान् नरेश हैं। आपने क्या किया ? दो मन सोना नहीं भेजा उनको ?" मन्दोदरी विनीत भाव से बोली।

"क्या 'कर' के रूप में सोना दे दूँ ? लंकेश से ऊँचा वह होगा ?" रावण का क्रोध भभक उठा।

"स्वामी ! दे देते तो अच्छा होता। उनका राज्य भले छोटा है, आपके पास विशाल साम्राज्य है, बाह्य शक्तियाँ हैं, लेकिन उनके पास ईश्वरीय शक्तियाँ हैं, आत्म-विश्रान्ति से प्राप्त अदभुत सामर्थ्य है।"

"अरे मूर्ख स्त्री ! रावण के साथ रहकर भी रावण का सामर्थ्य समझने की अक्ल नहीं आई? पागल कहीं की !" रावण ने मन्दोदरी की बात उड़ा दी।

कहानी कहती है कि दूसरे दिन सुबह मन्दोदरी ने रावण को छोटा-सा चमत्कार दिखाया। रोज सुबह कबूतरों को ज्वार के दाने डालने के लिए राजमहल की छत पर जाती थी। उस दिन रावण को भी साथ ले गई और बोलीः

"महाराज ! देव, दानव, मानव, यक्ष, गंधर्व, किन्नर आदि सब आपकी आज्ञा मानते हैं तो अपने प्रभाव का आज जरा अनुभव कर लो। देखो, इन पक्षियों पर आपका कितना प्रभाव है ?"

पक्षियों को दाने डालकर मन्दोदरी उन्हें कहने लगीः

"हे विहंग ! राजा लंकेश की दुहाई है कि जो दाने खायेगा, उसकी गरदन झुक जायेगी और वह मर जायेगा।" सब पक्षी दाने खाते रहे। उन्हें कुछ नहीं हुआ। मन्दोदरी बोलीः

"प्राणेश ! आपकी दुहाई का प्रभाव पक्षियों पर कुछ नहीं पड़ा।"

"मूर्ख औरत ! पक्षियों को क्या पता कि मैं लंकेश हूँ ?"

"स्वामी ! ऐसा नहीं है। अब देखिए।" फिर से दाने डालकर रानी पक्षियों से बोलीः "राजा चक्ववेण की दुहाई है। दाने चुगने बन्द कर दो। जो दाने चुगेगा, राजा चक्ववेण की दुहाई से उसकी गरदन टेढ़ी हो जाएगी और वह मर जाएगा।"

पक्षियों ने दाना चुगना बन्द कर दिया। पाषाण की मूर्तिवत् वे स्थिर हो गये। एक बहरे कबूतर ने सुना नहीं था। वह दाने चुगता रहा तो उसकी गरदन टेढ़ी हो गई, वह मर गया। रावण देखता ही रह गया ! अपनी स्त्री के द्वारा अपने ही सामर्थ्य की अवहेलना सह न सका। उसको डाँटते हुए वह कहने लगा:

"इसमें तेरा कोई स्त्रीचरित्र होगा। हम ऐसे अन्धविश्वास को नहीं मानते। जिसके घर में स्वयं वरूणदेव पानी भर रहे हैं, पवनदेव पंखा झल रहे हैं, अग्निदेव रसोई पका रहे हैं, ग्रह-नक्षत्र चौकी कर रहे हैं उस महाबली त्रिभुवन के विजेता रावण को तू क्या सिखा रही है ?" क्रुद्ध होकर रावण वहाँ से चल दिया।

इधर, राजा चक्ववेण के मंत्री ने समुद्र के किनारे एक नकली लंका की रचना की। काजल के समान अत्यन्त महीन मिट्टी को समुद्र के जल में घोलकर रबड़ी की तरह बना लिया तथा तट की जगह को चौरस बनाकर उस पर उस मिट्टी से एक छोटे आकार में लंका नगरी की रचना की। घुली हुई मिट्टी की बूँदों को टपका-टपकाकर उसी से लंका के परकोटे, बुर्ज और दरवाजों आदि की रचना की। परकोटों के चारों ओर कंगूरे भी काटे एवं उस परकोटे के भीतर लंका की राजधानी और नगर के प्रसिद्ध बड़े-बड़े मकानों को भी छोटे आकार में रचना करके दिखाया। यह सब करने के बाद वह पुनः रावण की सभा में गया। उसे देखकर रावण चौंक उठा और बोलाः

"क्यों जी ! तुम फिर यहाँ किसलिये आये हो ?"

"मैं आपको एक कौतूहल दिखलाना चाहता हूँ।"

"क्या कौतूहल दिखायेगा रे ? अभी-अभी एक कौतूहल मन्दोदरी ने मुझे दिखाया है। सब मूर्खों की कहानियाँ हैं। उपहास करते हुए रावण बोला।

"मैंने समुद्रतट पर आपकी पूरी लंका नगरी सजायी है। आप चलकर तो देखिये !"

रावण उसके साथ समुद्रतट पर गया। वजीर ने अपनी कारीगरी दिखायीः

"देखिये, यह ठीक-ठीक आपकी लंका की नकल है न ?"

रावण ने उसकी अदभुत कारीगरी देखी और कहाः "हाँ ठीक है। यही दिखाने के लिए मुझे यहाँ लाया है क्या ?"

"राजन ! धैर्य रखो। इस छोटी-सी लंका से मैं आपको एक कौतूहल दिखाता हूँ। देखिये, लंका के पूर्व का परकोटा, दरवाजा, बुर्ज और कंगूरे साफ-साफ ज्यों-के-त्यों दिख रहे हैं न ?"

"हाँ दिख रहे हैं।"

"मेरी रची हुई लंका के पूर्व द्वार के कंगूरों को मैं राजा चक्ववेण की दुहाई देकर जरा-सा हिलाता हूँ, इसके साथ ही आप अपनी लंका के पूर्व द्वार के कंगूरे हिलते हुए पायेंगे।"

इतना कहकर मंत्री ने राजा चक्ववेण की दुहाई देकर अपनी रची हुई लंका के पूर्व द्वार के कंगूरे हिलाये तो उसके साथ-ही-साथ असली लंका के कंगूरे भी डोलायमान होते दिखाई दिये। यह देखकर रावण को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसे मन्दोदरी की बात याद आ गई। चक्ववेण के वजीर ने बारी-बारी से और भी कंगूरे, परकोटे के द्वार, बुर्ज आदि हिलाकर दिखाया। इसे देखकर रावण दंग रह गया। आखिर वजीर ने कहाः

"राजन ! अभी दो मन सोना देकर जान छुड़ा लो तो ठीक है। मैं तो अपने स्वामी राजा चक्ववेण का छोटा सा वजीर हूँ। उनकी दुहाई से इन छोटे रूप में बनी हुई लंका को उजाडूँगा तो तुम्हारी लंका में भी उजाड़ होने लगेगा। विश्वास न आता हो तो अभी दिखा दूँ।"

आखिर रावण भी बड़ा विद्वान था। अगम अगोचर जगत विषयक शास्त्रों से परिचित था। समझ गया बात। वजीर से बोलाः "चल, दो मन सोना ले जा। किसी से कहना मत।"

दो मन सोना लेकर वजीर राजा के पास पहुँचा। चक्ववेण ने कहाः "लंकेश जैसे हठी और महा अहंकारी ने 'कर' के रूप में दो मन सोना दे दिया ? तूने याचना तो नहीं की ?"

"नहीं, नहीं प्रभु ! मेरे सम्राट की ओर से याचना ? कदापि नहीं हो सकती।" वजीर गौरव से मस्तक ऊँचा करके बोला।

"फिर कैसे सोना लाया ?" राजा ने पूछा। रानी भी ध्यानपूर्वक सुन रही थी।

"महाराज ! आपकी दुहाई का प्रभाव दिखाया। पहले तो मुझे कैद में भेज रहा था, फिर मंत्रियों ने समझाया तो मुझे दूत समझकर छोड़ दिया। मैंने रातभर में छोटे-छोटे घरौंदे सागर के तट पर बनाये.... किला, झरोखे, प्रवेशद्वार आदि सब। उसकी लंका की प्रतिमूर्ति खड़ी कर दी। फिर उसको ले जाकर सब दिखाया। आपकी दुहाई देकर खिलौने की लंका का मुख्य प्रवेशद्वार जरा-सा हिलाया तो उसकी असली लंका का द्वार डोलायमान हो गया। थोड़े में ही रावण आपकी दुहाई का और आपके सामर्थ्य का प्रभाव समझ गया एवं चुपचाप दो मन सोना दे दिया। दया-धर्म करके नहीं दिया वरन् जब देखा कि यहाँ का डण्डा मजबूत है, तभी दिया।"

रानी सब बात एकाग्र होकर सुन रही थी। उसको आश्चर्य हुआ किः "लंकेश जैसा महाबली ! महा उद्दण्ड ! देवराज इन्द्र सहित सब देवता, यम, कुबेर, वरूण, अग्नि, वायु, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, दानव, मानव, नाग आदि सब जिससे काँपते हैं, ऐसे रावण पर भी मेरे पतिदेव के शील-सदाचार का इतना प्रभाव और मैं ऐसे पति की बात न मानकर विलासी स्त्रियों की बातों में आ गई ? फैशनेबल बनने के चक्कर में पड़ गई ? धिक्कार है मुझे और मेरी क्षुद्र याचना को ! ऐसे दिव्य पति को मैंने तंग किया !"

रानी का हृदय पश्चाताप से भर गया। स्वामी के चरणों में गिर पड़ीः "प्राणनाथ ! मुझे क्षमा कीजिए। मैं राह चूक गई थी। आपके शील-सदाचार के मार्ग की महिमा भूल गई थी इसीलिए नादानी कर बैठी। मुझे माफ कर दीजिए। अपना योग मुझे सिखाइये, अपना ध्यान मुझे सिखाइये, अपना आत्महीरा मुझे भी प्राप्त कराइये। मुझे बाहर के हीरे-जवाहरात कुछ नहीं चाहिए। जल जाने वाले इस शरीर को सजाने का मेरा मोह दूर हो गया।"

"तो इतनी सारी खटपट करवायी ?"

"नहीं.... नहीं... मुझे रावण के सोने का गहना पहनकर सुखी नहीं होना है। आपने जो शील का गहना पहना है, आत्म-शांति का, योग की विश्रांति का जो गहना पहना है, वही मुझे दीजिए।"

"अच्छा..... तो वजीर ! जाओ। यह सोना रावण को वापस दे आओ। उसको बता देना कि रानी को गहना पहनने की वासना हो आई थी, इसलिए आदमी भेजा था। अब वासना निवृत्त हो गई है। अतः सोना वापस ले लो।"

वासनावाले को ही परेशानी होती है। जो शील का पालन करता है, उसकी वासनाएँ नियंत्रित होकर निवृत्त होती हैं। जिसकी वासनाएँ निवृत्त हो जाती हैं वह साक्षात् नारायण का अंग हो जाता है। शील का पालन करते हुए राजा चक्ववेण नारायणस्वरूप में स्थिर हुए। उनकी अर्धांगिनी भी उनके पवित्र पदचिह्नों पर चलकर सदगति को प्राप्त हुई।

शीलवान् भोग में भी योग बना लेता है। यही नहीं, नश्वर संसार में शाश्वत् स्वरूप का साक्षात्कार भी कर सकता है।

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भूषणों का भूषणः शील

किं भूषणाद् भूषणमस्ति शीलम्

तीर्थं परं किं स्वमनो विशुद्धम्।

किमत्र हेयं कनकं च कान्ता

श्राव्यं सदा किं गुरूवेदवाक्यम्।।

'उत्तम-से-उत्तम भूषण क्या है ? शील। उत्तम तीर्थ क्या है ? अपना निर्मल मन ही परम तीर्थ है। इस जगत में त्यागने योग्य क्या है ? कनक और कान्ता (सुवर्ण और स्त्री)। हमेशा सुनने योग्य क्या है ? सदगुरू और वेद के वचन।'

श्री शंकराचार्यविरचित 'मणिरत्नमाला' का यह आठवाँ श्लोक है।

बाहर की सब संपत्ति पाकर भी आदमी वह सुख, वह चैन, वह शांति, वह कल्याण नहीं पा सकता, जो शील से पा सकता है। इन्द्र को स्वर्ग के राज-वैभव, नन्दनवन आदि होते हुए भी वह आनन्द, वह प्रसन्नता न थी, जो प्रहलाद के पास थी। इन्द्र ने अपने गुरू बृहस्पति से यह बात पूछी थी।

प्रह्लाद के जीवन में शील था इसलिए वह साधनों के नहीं होने के बावजूद भी सुखी रह सका। जिसके पास शील है उसके पास साधन न हों तो भी वह सुखी रह सकता है। जिसके जीवन में शील नहीं है वह साधन होते हुए भी परेशान है।

....तो भूषणों का भूषण क्या है ? शील। कई लोग सोने-चाँदी के गहने पहनते हैं, गले में सुवर्ण की जंजीर, पग में झाँझन, कण्ठ में चन्दनहार, हाथ-पैरों में कड़े, कानों में कर्णफूल, उँगली में अँगूठी, नाक में नथ इत्यादि पहनते हैं और समझते हैं कि गहने-आभूषण पहनने से हम सुशोभित होते हैं। लेकिन शास्त्रकारों का कहना है, बुद्धिमानों का अनुभव है कि गहने पहनने से हम सुशोभित नहीं होते। गहने आभूषण से हमारा हाड़-मांस-चामवाला देह थोड़ा सा सुशोभित हो सकता है, लेकिन हमारी शोभा इनमें नहीं है। इन अलंकारों से तो हमारी शोभा दब जाती है। हमारी असली शोभा जो निखरनी चाहिए, वह देह का लालन-पालन और बाहरी टिप-टॉप करने की वृत्ति से दब जाती है। बाहरी भूषणों से हाड़-चामवाले देह की कृत्रिम चमक-दमक दिखती है। हमारी शोभा भूषणों से नहीं है, हमारी शोभा है शील से। शीलवान् पुरूष हो या स्त्री, उसका प्रकाश कुटुम्ब, मोहल्ले, जाति आदि में जैसा पड़ता है, वैसा प्रकाश सोने-चाँदी के आभूषणों का नहीं पड़ता। किसी ने चाहे उपरोक्त सब आभूषणों को धारण किया हो, यदि शील न हो तो वे सब व्यर्थ हैं।

मन, वचन और कर्म से अयोग्य क्रिया न करना, देश-काल के अनुसार योग्यता से, सरलता से विचारपूर्वक बर्तना-इस आचरण को शास्त्र में 'शीलव्रत' कहा गया है। उन्नति का मार्ग शील ही है। गीता में बताये हुए दैवी संपत्ति के लक्षण शीलवाले व्यक्ति में होते हैं। यदि आत्मज्ञान न भी हो और शील हो तो मनुष्य नीच गति को प्राप्त नहीं होता। शीलवान ही आत्मबोध प्राप्त करके मुक्त हो सकता है। शीलरहित पुरूष को कड़ा, कुण्डल आदि गहने ऊपर की शोभा भले ही देते हों, परन्तु सज्जन पुरूषों का तो शील ही भूषण है।

शीलरहित मूर्ख को कड़ा, कुण्डल आदि बोझरूप हैं। ये भूषण जीव को जोखिम में डालने वाले और भय के कारण है, जबकि शीलरूपी भूषण लोक और परलोक में उत्तम प्रकार का सुख देने वाला है, इस लोक में शोभा और कीर्ति बढ़ानेवाला है, परलोक में अक्षय सुख को प्राप्त कराता है। मूर्ख पहने हुए गहनों को भी लजा देता है जबकि शीलवान् पहने हुए भूषणों को शोभा देता है।

एक राजपुत्र ने अपने पिता की इच्छा के विरूद्ध एक स्त्री के साथ विवाह कर लिया था और गुप्त स्थान में उसके साथ रहा करता था। राजा को जब यह समाचार मिला कि मेरा पुत्र मेरे शत्रु की पुत्री के साथ विवाह करके गुम हो गया है तो वह बहुत दुःखी हुआ। पुत्र की यह कार्यवाही उसे योग्य न लगी इसलिए दुःखी होते हुए मरण के समीप आ गया। उसको एक ही पुत्र था। मरने के समय उसने कुँवर को बुलाने के लिए आदमी भेजे और अपनी परिस्थिति के समाचार कहलवाये।

कुँवर ने अपनी पत्नी से कहाः "पिता जी मरने की तैयारी में हैं। मुझे उन्होंने अपने पास बुलाया है। इस समय मुझे जाना ही चाहिए। मेरे जाने से वे स्वस्थ हो जायेंगे तो मुझ पर प्रसन्न होंगे। अगर वे चल बसेंगे तो मैं राजा बन जाऊँगा।"

पत्नी बोलीः "तुम राजा बन जाओगे तो मेरा क्या होगा ?"

"मैं तुझे वहाँ बुला लूँगा और पटरानी बनाऊँगा।" यह कहकर राजकुमार ने अपनी नामवाली अँगूठी अपनी उँगली से उतारक पत्नी को पहनाई और स्वयं राजधानी को चल दिया।

वहाँ आकर देखा तो राजा मृत्युशैय्या पर पड़ा था। कुँवर को देखकर राजा प्रसन्न हुआ और बोलाः "मैं तुझसे एक बात कहना चाहता हूँ। यदि तू मेरी बात मान लेगा तो मेरे प्राण सुख से निकलेंगे। पिता के वचन पुत्र को मानने चाहिए। श्रीराम, देवव्रत भीष्म आदि पुत्रों ने माने हैं। यदि तू मानना स्वीकार करे तो कहूँ।"

"पिताजी ! मैं आपकी अन्त समय की आज्ञा का पालन करूँगा।" कुँवर ने स्वीकृति दी।

राजा ने कहाः "हे सुपुत्र ! तू मेरे मित्र गंधर्वराज की कन्या से विवाह करना स्वीकार कर।"

कुँवर ने बात मान ली। राजा का प्राणांत हो गया। कुँवर ने गंधर्वराज की कन्या से विवाह कर लिया। वह राजा होकर राज्य करने लगा और अपनी पूर्व पत्नी से जो बात कहकर आया था, उसको अत्यन्त सुख में भूल गया।

प्रथमवाली राजकन्या ने सुना कि मेरे श्वसुर का देहान्त हो गया है, मेरा पति राजा हो गया है और उसने एक दूसरी राजकन्या से विवाह कर लिया है। इस राजकन्या के पास एक बहुत चतुर दासी थी। राजकुँवर की मुलाकात के लिए वह तीन और कन्याओं को ले आई और उसने राजकन्या सहित चारों को पुरूष की पोशाक पहनाकर राजकुँवर के पास नौकरी करने को भेजा। कुँवर चारों युवान पुरूषों को देखकर प्रसन्न हुआ और चारों को अपने रक्षकों की नौकरी पर रख लिया।

कुँवर को देखकर राजकन्या के बार-बार आँसू गिरा करते थे। कुँवर ने कई बार पूछा, परन्तु उसने कुछ उत्तर न दिया।

एक दिन कुँवर अकेला उद्यान में बैठा था तो वह अंगरक्षक उदासी से हाथ जोड़कर उसके सामने जा बैठा। कुमार ने उसकी उँगली पर अपने नामवाली अँगूठी देखी तो विस्मय से पूछाः

"हे मित्र ! यह अँगूठी तुझे कहाँ से प्राप्त हुई ?"

"आपके पास से।"

"मैंने यह अँगूठी तुझे कब दी थी ?" राजकुमार का आश्चर्य बढ़ गया।

"जब तुम मुझे छोड़कर आये और राजा बने तब।"

रहस्य खुल गया। वह समझ गया कि यह मेरी प्राणेश्वरी राजकन्या है। प्रिया से क्षमा माँगते हुए उसने अपने पिता की अन्तिम समय की आज्ञा की सारी बात कही। तब राजकन्या बोलीः

"आपने पिता की आज्ञानुसार जो विवाह किया है, उससे मैं प्रसन्न हूँ। परन्तु आप मेरा त्याग न कीजिए। अपने निवास में दासी के समान रहने दीजिए जिससे मैं नित्य आपके दर्शन कर सकूँ।" कुँवर ने स्वीकार कर लिया और अन्य तीनों को पुरस्कार देकर विदा किया।

गंधर्वराज की कन्या यह विवाह विषयक बात सुनकर कुँवर से बोलीः "आपने जिसके साथ पूर्व में विवाह किया है, उसका हक मारा जाये यह मैं नहीं चाहती। वही आपकी पटरानी होने की अधिकारिणी है। मैं उसकी छोटी बहन के समान रहूँगी।"

इस प्रकार दोनों पत्नियाँ प्रेमपूर्वक बहनों के समान रहने लगीं। इन दोनों ने ही शील का अनुसरण किया इसलिए दोनों ही सुखी हुईं। एक दूसरे का आदर करके सामने वाले के अधिकार की रक्षा करने लगीं।

जैसे भरतजी कहते थे कि राज्य बड़े भाई श्रीराम का है और रामजी कहते थे कि पिता की आज्ञानुसार राज्य का अधिकार भरत का है। यह है शील।

सास सोचे की बहू को सुख कैसे मिले, उसका कल्याण कैसे हो और बहू चाहे कि माता जी का हृदय प्रसन्न रहे.... तो यह शील है।

अगर सास चाहे कि घर में मेरा कहना ही हो और बहू चाहे कि मेरा कहना ही हो, देवरानी चाहे मेरा कहना ही हो और जेठानी चाहे मेरा कहना ही हो – ऐसा वातावरण होगा तो देह पर चाहे कितने ही गहने लदे हों, फिर भी जीवन में सच्चा रस नहीं मिलेगा। सच्चा गहना तो शील है।

सत्य बोलना, प्रिय बोलना, मधुर बोलना, हितावह बोलना और कम बोलना, जीवन में व्रत रखना, परहित के कार्य करना - इससे शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण होता है। जिसके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण नहीं हुआ वह चाहे अपनी स्थूल काया को कितने ही पफ-पाऊडर-लाली और वस्त्रालंकारों से सुसज्जित कर दे, लेकिन भीतर की तृप्ति नहीं मिलेगी, हृदय का आनन्द नहीं मिलेगा।

स्वामी रामतीर्थ अमेरिका गये थे। उनके प्रवचन सुनने के लिए लोग इकट्ठे हो जाते। एक बार एक महिला आई। उसके अंग पर लाखों रूपये के हीरेजड़ित अलंकार लदे थे। फिर भी वह महिला बड़ी दुःखी थी। प्रवचन पूरा होते ही वह स्वामी रामतीर्थ के पास पहुँची और चरणों में गिर पड़ी। बोलीः

"मुझे शान्ति दो..... मैं बहुत दुःखी हूँ। कृपा करो।"

स्वामी रामतीर्थ ने पूछाः "इतने मूल्यवान, सुन्दर तेरे गहने, वस्त्र-आभूषण ! तू इतनी धनवान ! फिर तू दुःखी कैसे ?"

"स्वामी जी ! ये गहने तो जैसे गधी पर बोझ लदा हो ऐसे मुझ पर लदे हैं। मुझे भीतर से शांति नहीं है।"

अगर शीलरूपी भूषण हमारे पास नहीं है तो बाहर के वस्त्रालंकार, कोट-पैन्ट-टाई आदि सब फाँसी जैसे काम करते हैं। चित्त में आत्म-प्रसाद है, भीतर प्रसन्नता है तो वह शील से, सदगुणों से। परहित के लिए किया हुआ थोड़ा-सा संकल्प, परोपकारार्थ किया हुआ थोड़ा-सा काम हृदय में शान्ति, आनन्द और साहस ले आता है।

अगर अति उत्तम साधक है तो उसे तीन दिन में आत्म-साक्षात्कार हो सकता है। तीन दिन के भीतर ही परमात्म तत्त्व की अनुभूति हो सकती है। जन्म-मृत्यु के चक्कर को तोड़कर फेंक सकता है। पृथ्वी जैसी सहनशीलता उसमें होनी चाहिए। ऐसा नहीं कि इधर-उधर की थोड़ी- सी बात सुनकर भागता फिरे।

पृथ्वी जैसी सहनशक्ति और सुमन जैसा सौरभ, सूर्य जैसा प्रकाश और सिंह जैसी निर्भीकता, गुरूओं जैसी उदारता और आकाश जैसी व्यापकता। पानी में किसी का गला घोंटकर दबाये रखे और उसे बाहर आने की जैसी तड़प होती है ऐसी जिसकी संसार से बाहर निकलने की तीव्र तड़प हो, उसको जब सदगुरू मिल जाय तो तीन दिन में काम बन जाय। ऐसी तैयारी न हो तो फिर उपासना, साधना करते-करते शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करना होगा।

वेद के दो विभाग है- प्रमाण विभाग और निर्माण विभाग। जीवात्मा का वास्तविक स्वरूप क्या है ? इसका जो ज्ञान है उसे 'वेदान्त' कहते हैं। यह है प्रमाण विभाग। दया, मैत्री, करूणा, मुदिता, दान, यज्ञ, तप, स्मरण, परहित, स्वाध्याय, आचार्य-उपासना, इष्ट-उपासना आदि जो कर्म हैं ये शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करते हैं। जिसके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण नहीं हुआ वह प्रमाण विभाग को ठीक से समझ नहीं पाता, प्रमाण विभाग का आनन्द नहीं ले पाता। सत्कर्म, साधन, आचार्योपासना आदि करते-करते साधक प्रमाण विभाग का अधिकारी बन जाता है।

आज कल हम लोग प्रायः निर्माण विभाग के अधिकारी हैं। कीर्तनादि से शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण होता है, सदभाव भाव का निर्माण होता है। सदभाव कहाँ से होता है ? शुद्ध अन्तःकरण से। सोने-चाँदी के गहनों से देह की सजावट होती है और कीर्तन आदि से शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण होता है। देह की अपेक्षा अन्तःकरण हमारे ज्यादा नजदीक है। बाहर के गहने खतरा पैदा कर देते हैं जबकि कीर्तन, ध्यानरूपी गहने खतरों को भी खतरा पहुँचा देते हैं। अतः शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करने वाला शील ही सच्चा आभूषण है।

शील में क्या आता है ? सत्य, तप, व्रत, सहिष्णुता, उदारता आदि सदगुण।

आप जैसा अपने लिए चाहते हैं, वैसा दूसरों के साथ व्यवहार करें। अपना अपमान नहीं चाहते तो दूसरों का अपमान करने का सोचें तक नहीं। आपको कोई ठग ले, ऐसा नहीं चाहते तो दूसरों को ठगने का विचार नहीं करें। आप किसी से दुःखी होना नहीं चाहते तो अपने मन, वचन, कर्म से दूसरा दुःखी न हो इसका ख्याल रखें।

प्राणिमात्र में परमात्मा को निहारने का अभ्यास करके शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करना यह शील है। यह महा धन है। स्वर्ग की संपत्ति मिल जाय, स्वर्ग में रहने को मिल जाय लेकिन वहाँ ईर्ष्या है, पुण्यक्षीणता है, भय है। जिसके जीवन में शील होता है उसको ईर्ष्या, पुण्यक्षीणता या भय नहीं होता। शील आभूषणों का भी आभूषण है।

मीरा के पास कौन-से बाह्य आभूषण थे ? शबरी ने कितने गहने पहने होंगे ? वनवास के समय द्रौपदी ने कौन-से गहने सजाये होंगे ? शील के कारण ही आज वे इतिहास को जगमगा रही हैं।

उदारता देखनी हो तो रंतिदेव की देखो। दान करते-करते अकिंचन हो गये। जंगल में पड़े हैं भूखे-प्यासे। काफी समय के बाद कुछ भोजन मिला और ज्यों ही ग्रास मुख तक पहुँचा कि भूखा अतिथि आ गया। स्वयं भूखे रहकर उसे तृप्त किया। दूसरों की क्षुधानिवृत्ति के लिए अपने शरीर का मांस भी काट-काटकर देने लगे। कैसी अदभुत दानवीरता और उदारता !

साधक में रंतिदेव जैसी दानवीरता और उदारता होनी चाहिए।

उदारता पदार्थों की भी होती है और विचारों की भी होती है। किसी ने कुछ कह दिया, अपमान कर दिया तो बात को पकड़ मत रखिये। जो बीत गई सो बीत गई। उससे छुटकारा नहीं पाएँगे तो अपने को ही दुःखी होना पड़ेगा। जगत को सुधारने का ठेका हमने-आपने नहीं लिया है। अपने को ही सुधारने के लिए हमारा आपका जन्म हुआ है। माँ के पेट से जन्म लिया, गुरू के चरणों में गया और पूरा सुधर गया ऐसा नहीं होता। जीवन के अनुभवों से गुजरते-गुजरते आदमी सुधरता है, पारंगत होता है और संसार-सागर से पार हो जाता है। व्यक्ति में अगर कोई दोष न रहे तो उसे अभी निर्विकल्प समाधि लग जाय और वह ब्रह्मलीन हो जाय।

रामकृष्ण परमहंस बार-बार सत्संग से उठकर रसोईघर में चले जाते और बने हुए व्यंजन- पकवानों के बारे में पूछताछ करते। शारदा माँ कहतीं:

"आप तत्त्वचिन्तन की ऊँची बात करते हैं और फिर तुरन्त दाल, सब्जी, चटनी की खबर लेने आ जाते हैं ! लोग क्या कहेंगे ?"

रामकृष्ण बोलेः "यह माँ की कोई लीला है। मेरी जीवन-नाव तो ब्रह्मानंद-सागर की ऐसी मझधार में है कि कोई उसमें बैठ न सके। इसीलिए माँ ने मेरे चित्त को जिह्वा के रस में शायद लगा दिया है। जिह्वारस के जरिये मैं बाहर के जगत में आ जाता हूँ। जिस दिन यह जिह्वारस छूटा तो समझ लेना... उसी दिन हमारी जीवन-नाव किनारा छोड़कर सागर की मझधार में पहुँच जाएगी। फिर यह देह टिकेगी नहीं।"

....और हुआ भी ऐसा ही। एक दिन शारदामणि देवी भोजन की थाली सजाकर रामकृष्ण देव के समक्ष लायी। थाली को देखकर परमहंसजी ने मुँह फेर लिया। शारदा माँ को उनकी बात याद आ गयी.... हाथ से थाली गिर पड़ी। ढाई-तीन दिन में ही उस महान् विभूति ने अपनी जीवनलीला समेट ली।

हम लोगों में कोई-न-कोई दोष रहता है, आसक्ति रहती है। दोषों से देह जकड़ा रहता है। अगर दोष अनेक होंगे तो अनेक जन्मों की यात्रा करवायेंगे। दोषों के साथ जितना तादात्म्य होगा, उतने हम दोषों से प्रभावित होंगे। ईश्वर के साथ हमारा जितना तादात्म्य होगा, आत्मदेव के साथ जितना तादात्म्य होगा, शील के स्वभाव से जितना तादात्म्य होगा, इतने ये दोष निर्दोषिता में बदलते जाएँगे।

धन का लोभ, सत्ता का लोभ, यश का लोभ, काम का विकार ये सब हैं तो केवल वृत्ति.... केवल संवित्। धन के प्रति कामना जगती है तो वह लोभ बनती है, व्यक्ति के प्रति कामना जगती है तो वह काम बनती है। है वह एक ही संवित्। वह संवित् अगर चैतन्यघन परमात्मा के चिन्तन में लग जाय तो बेड़ा पार कर दे। फिर काम, क्रोध, लोभ का प्रभाव तुम्हें प्रभावित नहीं कर सकेगा। फिर खाते हुए भी भोजन के स्वाद में बँधोगे नहीं। लेते-देते हुए भी लेन-देन के कर्त्तृत्व अभिमान में बँधोगे नहीं। तुम्हारे शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण होता जाएगा। ऐसा करते-करते आत्मस्वरूप का बोध हो गया तो अन्तःकरण बाधित हो जायेगा। खा रहे हैं फिर भी नहीं खाते, लेन-देन कर रहे हैं फिर भी कुछ नहीं करते।

शील आदि सदगुणों द्वारा शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण किया जाता है। कल्याण का दूसरा उपाय है अन्तःकरण से सम्बन्ध-विच्छेद करने का। अन्तःकरण से सम्बन्ध-विच्छेद करने में सफल हो गये तो वेदान्त दर्शन के सर्वोच्च आदर्शों का साक्षात्कार हो सकता है। शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण करने में सफल हो गये तो भक्ति-दर्शन के मधुर अमृत का आस्वाद प्राप्त हो जाता है। शुद्ध अन्तःकरण का निर्माण ईश्वर-भक्ति में बड़ी सहाय करता है और ईश्वर-तत्त्व के साक्षात्कार में सहायक होता है।

व्यक्ति अगर धार्मिक हो तो अपने लिए ही नहीं, परिवार और समाज के लिए भी उपयोगी होता है। जिसके जीवन में धर्म नहीं है, उस पर अशांति के बादल घिरे रहते हैं। जिसके जीवन में धर्म है, उसके जीवन में साधना, सहनशक्ति, साहस के गुण निखरते रहते हैं। लड़की धार्मिक है तो माँ-बाप को तसल्ली रहती है। ससुरालवाले उस पर विश्वास करते हैं। व्यक्ति धार्मिक है तो सब लोग उस पर विश्वास करते हैं। इस प्रकार धार्मिकता, सच्चाई, शील आदि परमार्थ में तो सहायक हैं ही, हमारे व्यवहार-जगत में भी उपयोगी है। किसी व्यक्ति के पास धन हो, वैभव हो, लेकिन शील और सन्तोष न हो तो कितना भी बड़ा व्यक्ति शराब-कबाब आदि में फँस जाता है।

......तो उत्तम से उत्तम भूषण है शील।

फिर शंकराचार्य जी आगे कहते हैं कि उत्तम-से-उत्तम तीर्थ क्या है ? अपना विशुद्ध मन ही उत्तम तीर्थ है। गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, काशी, मथुरा, पुष्कर आदि सब तीर्थ तो हैं लेकिन वे बाहर के तीर्थ हैं। विशुद्ध हुआ मन जब परमात्मदेव में डूबता है तब वह उत्तम-से- उत्तम तीर्थ में स्नान करता है। यह तीर्थ भी उसे उत्तम तीर्थ में अर्थात् परमात्मदेव में डूबे हुए संत महापुरूषों के द्वारा मिलता है। तात्पर्य यह है कि उत्तम-से-उत्तम तीर्थ अपना विशुद्ध मन है।

सुनी है एक कहानीः

एक पिता के दो बेटे थे। पिता का स्वर्गवास हुआ। छोटे बेटे ने अपने भाई से कहाः "मैं तीर्थाटन करने जा रहा हूँ। पिताजी की संपत्ति हम आधी-आधी बाँट लेवें।"

बड़ा भाई सहमत होते हुए बोलाः "अच्छा भैया ! तीर्थयात्रा करने जाता है तो भले जा। मेरा यह तुम्बा भी साथ में लेते जा। उसे सब तीर्थों में घुमाना, सब जगह स्नान कराना, देव-दर्शन कराना। मेरे बदले मेरा यह तुम्बा ही तीर्थाटन कर आएगा। तीर्थयात्रा में जो खर्च होगा, आधा मैं दूँगा।"

छोटा भाई बड़े भाई का तुम्बा ले गया। तीर्थों में घुमाते, पवित्र स्थानों में नहलाते, देवदर्शन कराते हुए घर वापस लौटा तो बड़े भाई ने अपना तुम्बा वापस लिया और खर्च का आधा हिस्सा चुका दिया। फिर तुम्बे को छीला और भीतर से थोड़ा चखा तो कडुआ-कडुआ । वह छोटे भाई से बोलाः

"यह तुम्बा इतने तीर्थों में घूमा, सरिताओं में नहाया, देवदर्शन किये, फिर भी कडुआ ही रहा। अभी मधुरता नहीं आई। यह तो बाहर से ही नहाया। भीतर इसका स्नान नहीं हुआ। इसके भीतर जो चीज रखेंगे वह भी कडुवी हो जायेगी।"

बड़ा भाई चतुर था। तुम्बे को कंकड़-मिट्टी-राख आदि डालकर खूब रगड़ा। फिर पानी से अच्छी तरह धोया तो उसकी कडुवाहट दूर हो गयी। अब तुम्बे में जो कुछ रखे वह चीज वैसी ही शुद्ध बनी रहे। छोटा भाई समझ गया कि देह को बाहर के तीर्थों में स्नान कराना ठीक है, अच्छा है लेकिन अपने भीतर शुद्धीकरण करने से ही सच्चा तीर्थत्व महसूस होता है।

मन एक तुम्बा है। शील, हरिनामरूपी पाऊडर, कायिक-वाचिक-मानसिक सत्कर्मरूपी कंकड़ और प्रभु-प्रेमरूपी पानी उसमें डालकर उसे अच्छी तरह धो डालो। फिर साक्षीभाव की निगाह से उसे सुखाओ। यह मनरूपी तुम्बा जब ठीक तरह से धुलकर फिर सूख जाता है तब सब वस्तुएँ उसमें अमृत जैसी रहती हैं। मनरूपी तुम्बा जब पवित्र हो जाता है तब अमृतमय जीवन का अनुभव करा देता है।

....तो सब तीर्थों में उत्तम तीर्थ है अपना अन्तर्मुख मन, आत्माकार वृत्तिवाला मन। अपने मन के पवित्र होने पर तीर्थों में जाएँगे तो महापुण्य होगा। मन पवित्र नहीं तो तीर्थ में जाने का पूरा लाभ नहीं होगा।

पवित्र मनवाला मनुष्य महापुरूषों के पास जाते ही तत्त्वज्ञान में पहुँच सकता है। अपवित्र मनवाला शंकाशील आदमी घृणा से युक्त होकर सत्संग में बढ़िया-से-बढ़िया बात सुनेगा तो भी उसको रंग नहीं लगेगा। हमारा चित्त जितना पवित्र और निर्दोष होता है उतना ही हमें तीर्थ का भी लाभ होता है।

तीसरी बातः जगत में त्यागने योग्य क्या है ? कनक और कान्ता। कनक माने सुवर्ण अर्थात् धन और कान्ता माने स्त्री। त्यागी, विरक्त संन्यासी के लिए ये दोनों चीजें मूल से और भाव से त्याग देने योग्य हैं। गृहस्थ इन दोनों को मूल से नहीं त्याग सकता क्योंकि इन दोनों के बिना गृहस्थ जीवन टिकेगा नहीं। अतः इनकी आसक्ति त्यागें। 'कनक-कान्ता के बिना मैं जी नहीं सकता' – ऐसी धारणा जो घुस गई है उसका भीतर से त्याग करें। वास्तव में, हम सब चीजों के बिना भी जी सकते हैं, परन्तु अपने चैतन्यस्वरूप आत्मदेव के बिना नहीं जी सकते।

कनक और कान्ता का आकर्षण जीव को उन्नति से गिरा देता है। इस आकर्षण ने कई जपी-तपी-योगी-त्यागियों को गिराकर रख दिया है। गिर जाना यह प्रमाद है, लेकिन गिरकर न उठना यह पाप है।

अन्तःकरण की अवस्थाएँ बदलती रहती हैं। जो अन्तःकरण की अवस्थाओं से पार गये हैं उन महापुरूषों की बात निराली है, लेकिन अन्तःकरण के दायरे में जीनेवाले हम लोगों को शील और ज्ञान का अति आदर करके सावधान होकर रहना चाहिए।

पुरूष साधक के लिए स्त्री का आकर्षण छोड़ना आवश्यक है और महिला साधक के लिए पुरूष का आकर्षण छोड़ना आवश्यक है। जब तक देह के विकारी आकर्षणों में चित्त डूबा रहेगा, तब तक न संसार में रस मिलेगा और न तत्त्वज्ञान में रस मिलेगा। बाह्य आकर्षण का रस जितना कम होता जायेगा उतना आन्तरिक रस शुरू होता जायेगा। जितना आन्तरिक रस बढ़ेगा उतना बाह्य आकर्षण नहीं रहेगा। तब तुम संसार में दिखोगे, व्यापार-धन्धा-रोजगार करने वाले दिखोगे, सन्तान को जन्म देने वाले दिखोगे, दूसरों की नजरों में तमाम क्रिया-कलाप करते हुए दिखोगे लेकिन वास्तव में तुम कहाँ हो यह तुम्ही जानोगे अथवा कोई और ब्रह्मवेत्ता जानेंगे।

अपने विषय में ज्ञान होता है और दूसरे के विषय में अनुमान होता है। अनुमान से भले कोई बुरा कह दे लेकिन तुम्हारे दिल में दुःख नहीं होगा। तुम्हें कोई भला कह दे लेकिन भीतर से भला नहीं हो तो दूसरों का भला कहना भी तुम्हें तसल्ली नहीं देगा। कोई तुम्हें भला कह दे इससे इतना भला नहीं होता जितना तुम्हारा मन स्थिर होने से तुम्हारा भला होता है। कोई तुम्हें बुरा कर दे इससे इतना बुरा नहीं होता जितना तुम्हारा मन अस्थिर, विकारी होने से तुम्हारा बुरा होता है। अपनी आत्मनिष्ठा और अपना स्वरूप ही कल्याण का धाम है। देह को सजाना, उसे ठीक रखना, देह की मृत्यु से भयभीत होना, निन्दा से भयभीत होना, प्रशंसा के लिए लालायित होना, ये सब कल्याण से वंचित करने वाली बातें हैं। इनमें उलझे हुए लोग परेशान रहते हैं।

क्षमा, शौच, जितेन्द्रियता ये सब सदगुण शील के अन्तर्गत आते हैं, दैवी संपत्ति के अंतर्गत आते हैं। ईश्वर-प्राप्ति की तीव्र इच्छा से आधी साधना हो जाती है, तमाम दोष दूर होने लगते हैं। जगत के भोग पाने की इच्छामात्र से आधी साधना नष्ट हो जाती है, अन्तःकरण मलिन होने लगता है।

'श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण' में लिखा हैः "इस जीव की इच्छा जितनी-जितनी बढ़ती है उतना-उतना वह छोटा हो जाता है। जितनी इच्छा और तृष्णाओं का त्याग करता है उतना वह महान् हो जाता है।"

संसार के सुख पाने की इच्छा दोष ले आती है और आत्मसुख पाने की इच्छा सदगुण ले आती है। ऐसा कोई दुर्गुण नहीं जो संसार के भोग की इच्छा से पैदा न हो। व्यक्ति बुद्धिमान हो, लेकिन भोग की इच्छा उसमें दुर्गुण ले आयेगी। चाहे कितना भी बुद्धू हो, लेकिन ईश्वर-प्राप्ति की इच्छा उसमें सदगुण ले आएगी।

बहुत भोगियों के बीच साधक जाता है तो बहुतों के संकल्प, श्वासोच्छवास साधक को नीचे ले आते हैं। उसका पुराना अभ्यास फिर उसे सावधान कर देता है। अतः योगाभ्यासी साधकों को चाहिए कि वे भोगियों के संपर्क से अपने को बचाते रहें, आदर से शील का पालन करते रहें। शील को ही अपना जीवन बना लें। इससे साधना की रक्षा होगी। .....ओर चलते-चलते कौन नहीं गिरा ? गिरावट के, पतन के कई प्रसंग जीवन में आ जाते हैं। गिरकर फिर सँभल जाने वाला साधक कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।

एक विधवा थी। कामातुर होकर किसी के साथ संसार-व्यवहार कर लिया। बात खुल गई तो गाँववालों ने उसे दुराचारिणी घोषित कर दिया। गाँव के मुखिया ने हुक्म कर दिया कि कल इस पापिनी को सजा देने के लिए गाँव के सब लोग एकत्रित होंगे और एक-एक पत्थर उठाकर मारेंगे।

सब लोग हाथ में पत्थर लेकर मारने के लिए तैयार हो गये तो एक कवि ने बुलन्द आवाज में गाया किः "इस अपराधिनी को अपराध की सजा तो वही देगा, जो स्वयं निरपराध हो। जिसने अपने जीवन में कभी कोई अपराध न किया हो वही इसको पत्थर मारेगा।"

सबके हाथ से पत्थर एक-एक करके नीचे गिर पड़े। अपराधिनी नारी ने पश्चाताप के पावन झरने में नहाकर अपना पाप धो लिया।

'सामने वाले व्यक्ति में भी मैं ही हूँ' ऐसा सोच-समझकर उसको सुधरने का मौका देना चाहिए। स्वामी रामतीर्थ बोलते थेः "कुछ लोग अल्प बुद्धि के होते हैं जो दूसरों के दोष ही देखते रहते हैं। 'फलाना आदमी ऐसा है....वैसा है....' इस दोषदृष्टि के कीचड़ से बाहर ही नहीं निकलते। गुणों को छोड़कर दोषों पर ही उनकी दृष्टि टिकती है। 'घोड़ा दूध नहीं देती है इसलिए वह बेकार है और गाय सवारी के काम नहीं आती इसलिए बेकार है। हाथी चौकी नहीं करता इसलिए बेकार है और कुत्ते पर शोभायात्रा नहीं निकाली जाती इसलिए बेकार है....' आदि-आदि।"

अरे भैया ! घोड़े से सवारी का काम ले लो और गाय से दूध पा लो। हाथी शोभायात्रा में ले लो और कुत्ते से चौकी करवाओ। सब उपयोगी हैं। अपनी-अपनी जगह सब बढ़िया हैं।

किसी में सौ गुण हों और एक अवगुण हो तो इस अवगुण के कारण उसकी अवहेलना करना यह तो अपने ही जीवन-विकास की अवहेलना करने के बराबर है। तुझे जो अच्छा लगे वह ले ले, बुरे के लिए वह जिम्मेदार है। दूसरों की बुराई का चिन्तन करने से अन्तःकरण तेरा मलिन होगा भैया ! उस अवगुण के कारण उसका अन्तःकरण तो मलिन हुआ ही है लेकिन तू उसका चिन्तन करके अपना दिल क्यों खराब करता है ?

भगवान बुद्ध के पास दो मित्र आये और बोलेः "भगवान ! यह मेरा साथी कुत्ते को सदा साथ रखता है। सदा 'टीपू-टीपू' किया करता है। सोता है तो भी साथ में सुलाता है। ...तो बताइये, मरते समय तक टीपू का ही चिन्तन करेगा तो कुत्ता बनेगा कि नहीं ?"

दूसरे मित्र ने कहाः "भन्ते ! मेरी बात भी सुनिये। मेरा यह मित्र बिल्ली को सदा साथ में रखता है, खिलाता-पिलाता है, घुमाता है, अपने साथ सुलाता है और सदा 'मीनी-मीनी' किया करता है। ....तो बताइये, वह बिल्ली बनेगा कि नहीं ?"

बुद्ध मुस्कुराकर बोलेः 'नहीं, वह बिल्ली नहीं बनेगा। बिल्ली तू बनेगा क्योंकि उसकी बिल्ली का चिन्तन तू ज्यादा करता है। वह तेरे कुत्ते का चिन्तन करता है इसलिए वह कुत्ता बनेगा।"

किसी के दोष देखकर हम उसके दोषों का चिन्तन करते हैं। हो सकता है, वह इतना उन दोषों का अपराधी न हो जितना हमारा अन्तःकरण हो जायेगा। इसलिए अपने अन्तःकरण की सुरक्षा करनी चाहिए, उसके शुद्धीकरण में लगे रहना चाहिए। शील और सन्तोषरूपी भूषण से उसे सजाना चाहिए। शील ही बढ़िया-से-बढ़िया आभूषण है। बाहर के आभूषण खतरा पैदा करते हैं, बाहर के आभूषण ईर्ष्या पैदा करते हैं।

बुद्ध एक विशाल मठ में पाँच मास तक ठहरे हुए थे। गाँव के लोग शाम के समय उनकी वाणी सुनने आ जाते। सत्संग पूरा होता तो लोग बुद्ध के समीप आ जाते। उनके समक्ष अपनी समस्याएँ रख देते। किसीको बेटा चाहिए तो किसीको धन्धा चाहिए, किसीको रोग का इलाज चाहिए तो किसीको शत्रु का उपाय चाहिए। किसी को कुछ परेशानी, किसी को कुछ और। भिक्षुक आनन्द ने पूछाः

"भगवन् ! यहाँ श्रीमान लोग भी आते हैं, मध्यम वर्ग के लोग भी आते हैं और छोटे-छोटे लोग भी आते हैं। सब दुःखी-ही-दुःखी। इनमें कोई सुखी होगा ?"

"हाँ, एक आदमी सुखी है।"

"बताइये, कौन है वह ?"

"जो आकर पीछे चुपचाप बैठ जाता है और शांति से सुनकर चला जाता है। कल भी आएगा। उसकी ओर संकेत करके बता दूँगा।"

दूसरे दिन बुद्ध ने इशारे से बताया। आनन्द विस्मित होकर बोलाः "भन्ते ! वह तो मजदूर है। कपड़ों का ठिकाना नहीं और झोंपड़ी में रहता है। वह सुखी कैसे ?"

"आनन्द ! अब तू ही देख लेना।"

बुद्ध ने सब लोगों से पूछाः "आपको क्या चाहिए ?"

सबने अपनी-अपनी चाह बतायी। किसी को धन चाहिए, किसी को सत्ता चाहिए, किसी को यश चाहिए, किसी को विद्वता चाहिए। जिसके पास धन था, सत्ता थी उसको शांति चाहिए। सब लोग किसी-न-किसी परेशानी से ग्रस्त थे। उनके अन्तःकरण खदबदाते थे। आखिर में उस मजदूर को बुलाकर पूछा गयाः

"तुझे क्या चाहिए ? क्या होना है तुझे ?"

मजदूर प्रणाम करते हुए बोलाः "प्रभो ! मुझे कुछ चाहिए भी नहीं और कुछ होना भी नहीं। जो है, जैसा है, प्रारब्ध बीत रहा है। धन में या धन के त्याग में, वस्त्र और आभूषणों में सुख नहीं है। सुख तो है समता के सिंहासन पर और हे भन्ते ! वह आपकी कृपा से मुझे प्राप्त हो रहा है।"

मुझे यह पाना है..... यह करना है..... यह बनना है.... ऐसी खट-खट जिसकी दूर हो गई हो, वह अपने राम में आराम पा लेता है।

चौथी बातः "हमेशा सुनने योग्य क्या है ? सदगुरू और वेद के वचन।

सागर विशाल जलराशि से भरा है लेकिन हम उस जल से न चाय बना सकते हैं, न खिचड़ी पका सकते हैं। वही सागर का पानी सूर्य-प्रकाश से ऊपर उठकर बादल बन जाता है। स्वाति नक्षत्र की बूँद बनकर बरसता है तो सीप में मोती बन जाता है।

ऐसे ही वेद के वचनों की अपेक्षा ब्रह्मज्ञानी सदगुरूओं के वचन ज्यादा मूल्यवान होते हैं। वेद सागर है तो ब्रह्मज्ञानी गुरू का वचन बादल है। सदगुरू वेदों में से, शास्त्रें में से वाक्य लेकर अपने अनुभव की मिठास मिलाकर साधक के हृदय को परमात्म रस से परितृप्त करते हैं। वे ही वचन साधक हृदय में पचकर मोती बन जाते हैं।

ईशकृपा बिन गुरू नहीं, गुरू बिना नहीं ज्ञान।

ज्ञान बिना आत्मा नहीं, गावहिं वेदपुरान।।

ब्रह्म मन एव इन्द्रियों से परे है। ब्रह्मज्ञानी सदगुरू जब ‘मैं उपदेश दे रहा हूँ..’ इस भाव से भी परे होते हैं तब उनका ज्ञान साधक के हृदय में अपरोक्ष होता है। वेद की ऋचाएँ पवित्र हैं, वेद का ज्ञान पवित्र है, लेकिन ब्रह्मवेत्ता आत्मज्ञानी महापुरूष के वचन तो परम पवित्र हैं। वे साधक को आत्मानुभूति में पहुँचा देते हैं।

वेद पढ़ने से किसी को आत्म-साक्षात्कार हो जाय यह गारंटी नहीं लेकिन सदगुरू के वचनों से आत्म-साक्षात्कार हो जाय यह कइयों के जीवन में घटित हुआ है। इसीलिए नानकजी ने कहा है किः

गुरू की बानी बानी गुर।

बानी बीच अमृत सारा।।

गुरुओं की वाणी ही गुरू है। उनकी वाणी में ही सारा अमृत भरा रहता है।

....हमेशा सुनने योग्य क्या है ? सदगुरू और वेद के वचन। ये वचन अगर जीवन में आ जायें तो जीवन बड़ा निर्भीक, निर्द्वन्द्व और निश्चिंत बन जाता है। द्वन्द्वों के बीच, भयों के बीच, चिन्ताओं के बीच जीते हुए भी जीवन निश्चिंत होता है।

मनुष्य अपनी आगामी स्थिति का आप निर्माता है, अपने भाग्य का आप विधाता है। वह जो कुछ सोचता है, बोलता है, सुनता है, देखता है उसका प्रभाव उसके जीवन में प्रतिबिम्बित होता है।

ध्वनि के प्रभाव का निरीक्षण करने के लिए कुछ प्रयोग किये गये। एक कागज पर बारीक रेती के कण बिछा दिये गये। कागज के नीचे विभिन्न प्रकार के शब्द और ध्वनि किये गये। हरेक शब्द व ध्वनि के प्रभाव से कागज पर बिछे हुए बारीक कणों में अलग-अलग आकृतियाँ बनती देखी गईं। जैसे ॐ.......का उच्चारण, राम की धुन, अल्ला हो अकबर... की बाँग, कोई संगीत की तर्ज, गन्दी गाली इत्यादि। सूक्ष्म यंत्रों से यह निरीक्षण किया गया।

रेत के कण पर ध्वनि का प्रभाव पड़ता है तो हमारे रक्तकणों पर, श्वेतकणों पर, मन पर, बुद्धि पर, ध्वनि के प्रभाव पड़े इसमें क्या सन्देह है ? विभिन्न ध्वनियों के प्रभाव से हमारी जीवन-शक्ति का विकास या विनाश अवश्य होता है। यह वैज्ञानिक सत्य है।

भारत के प्रसिद्ध संगीत कार ओमकारनाथ ठाकुर देश के प्रतिनिधि के रूप में इटली गये हुए थे। भोजन समारंभ के समय वहाँ के शासक मुसोलिनी ने उनसे पूछाः

"मैंने सुना है कि भारत में श्रीकृष्ण नामक गायें चरानेवाला चरवाहा बंसी में फूँक मारता और अंगुलियाँ घुमाता तो गायें एकतान खड़ी रह जातीं, बछड़े थिरकने लगते, मोर पंख फैलाकर नाचने लगते, अनपढ़ ग्वालबाल और गोपियाँ आनन्द से झूमने लगतीं। मेरी समझ में नहीं आता। क्या यह सच है ? मुझे इन बातों में विश्वास नहीं होता। इसके खिलाफ मैंने कई वक्तव्य दिये हैं। आप भारत से आये हें। इस विषय में आपका क्या कहना है ?"

किसी की समझ में आ जाये वही सत्य होता है क्या ? सत्य असीम है और समझने वाली बुद्धि सीमित है। फिर, बुद्धि भी सत्त्वप्रधान, रजोप्रधान, तमोप्रधान हुआ करती है। तमोप्रधान बुद्धि की अपनी सीमा होती है, तुच्छ। रजोप्रधान बुद्धि की अपनी सीमा होती है, कुछ-कुछ। सत्त्वप्रधान बुद्धि की अपनी सीमा होती है, कुछ ठीक-ठीक लेकिन असीम नहीं होती।

बुद्धि माने मति। मति से जो निर्णय या सिद्धान्त निश्चित किये जाते हैं उन्हें मत कहते हैं। मतियाँ बदलती रहती हैं, मत-मतान्तर होते रहते हैं लेकिन सत्य अबदल है।  उस अबदल सत्य में जो सुप्रतिष्ठित हैं ऐसे श्रीकृष्ण जब बंसी बजाते होंगे तो बंसी की ध्वनि, बंसी का संगीत उस सत्य को छूकर गोप-गोपियों को झुमाने लगे, इसमें क्या आश्चर्य है ?

ओमकारनाथ ठाकुर ने कहाः "श्रीकृष्ण जैसी हैसियत तो मैं नहीं रखता। उनकी चरणरज के बराबर भी मैं नहीं हूँ। उनके विषय में बोलना मेरे साहस के परे की बात है। लेकिन हाँ...... शब्द की, ध्वनि की अपनी गरिमा होती है। सात्त्विक साज और संगीत में हमारी सुषुप्त शक्तियों को आन्दोलित करने की क्षमता होती है। अभी तो यहाँ भोजन कर रहे हैं। संगीत के कोई साज-वाज नहीं है और मैं कोई अच्छा संगीतज्ञ भी नहीं हूँ, अन्यथा कुछ प्रयोग करते....." इस प्रकार उन्होंने मुसोलिनी को बातों में लगाया। सामने टेबल पर कोई वाद्य नहीं था, चीनी की प्लेटें और छुरी-काँटे, चम्मच आदि पड़े थे। ओमकारनाथ ने बातों-बातों में उन चम्मच-काँटों से प्लेटों को धीरे-धीरे तालबद्ध रूप से बजानी शुरू की। बातें बन्द होती गईं.... संगीत की महफिल जमती गई। कुछ ही मिनटों में वहाँ उपस्थित सब अतिथिगण संगीत के साथ एकतान हो गये। स्वयं मुसोलिनी भी झूमने लग गया। संगीतज्ञ ने अपने साजों को और रंग दिया। वातावरण में मानो कोई विलक्षण नशा सा छा गया। मुसोलिनी का सिर झूमते झूमते टेबल पर टकराने लगा। ओमकारनाथ ने ऐसा बजाया कि उसका सिर लहूलुहान होने लगा। तब मुसोलिनी चिल्ला पड़ाः

"बस.... बस.... बन्द करो अपना बजाना।"

ठाकुर ने कहाः "अपने सिर को रोक दो, झूमना बन्द करो।"

"अब नहीं रोका जाता। सिर से खून बह रहा है.... सहा नहीं जाता।"

ओमकारनाथ ने संगीत बन्द कर दिया। वातावरण शान्त हो गया। मुसोलिनी स्वस्थ हुआ तो ओमकारनाथ ने प्यार भरी निगाहों से निहारते हुए उससे कहाः "मेरे जूठे चम्मचों और प्लेटों के संगीत से तुम्हारी जीवन-शक्ति आनन्दित होकर तीव्रता से आन्दोलित हो सकती है तो परमात्मस्वरूप श्रीकृष्ण बंसी बजाते हुए नुरानी नजरों से गोप गोपियों को निहारकर आनन्द से झुमा दें तो इसमें क्या आश्चर्य है ?"

हमारे जीवन में बहुत सारी संभावनाएँ सोयी हुई पड़ी हैं। हम जिस जगत में जी रहे हैं, जो कुछ जान रहे हैं वह जगत बहुत छोटा है। हम तो एक ही सूर्य को देख रहे हैं लेकिन इस सूर्य से भी लाखों गुना बड़े-बड़े सूर्य और तारे आकाशगंगा में हैं। ऐसी कई आकाशगंगाएँ एक ब्रह्माण्ड में हैं। ऐसे कई ब्रह्माण्डों को यथाविधि चलानेवाली जो सत्ता है, वही सत्ता हमारे शरीर में बाल उगाती है, पैरों को पसारने की ताकत देती है, मन को फुरने और बुद्धि को निर्णय करने की शक्ति देती है। सर्वत्र व्यापक सत्ता एक ही है। मन और बुद्धि जितने प्रमाण में उसमें विश्रांति पाते हें उतने वे दिव्य हो जाते हैं। इस व्यापक सत्ता में सर्वथा विश्राम पाने का यत्न करना चाहिए। श्रीकृष्ण कहते हैं:

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना।

परमं पुरूषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्।।

'हे पार्थ ! परमेश्वर के ध्यान के अभ्यासरूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरन्तर चिन्तन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाशरूप दिव्य पुरूष को अर्थात् परमेश्वर को ही प्राप्त होता है।'

(गीताः 8.8)

अभ्यास तो सब करते हैं। झाडू लगाने का अभ्यास नौकरानी भी करती है और मतंग ऋषि के आश्रम में शबरी भी करती है। रोटी बनाने का अभ्यास बावर्ची भी करता है, माँ भी करती है और गुरू के आश्रम में शिष्य भी करता है। बावर्ची का रोटी बनाना नौकरी हो जाता है, माँ का रोटी बनाना सेवा हो जाती है और शिष्य का रोटी बनाना भक्ति हो जाती है। नौकरानी का झाड़ू लगाना नौकरी हो जाती है और शबरी का झाड़ू लगाना बन्दगी हो जाती है।

अभ्यास तो हम करते हैं लेकिन अभ्यास में योग को मिला दो। जिस अभ्यास का प्रयोजन ईश्वर प्राप्ति है, इष्ट की प्रसन्नता है, सदगुरू की प्रसन्नता है वह अभ्यास योग हो जाता है। जिस अभ्यास का प्रयोजन विकारों की तृप्ति है, वह अभ्यास संसार हो जाता है।

जीवन दोधारी तलवार जैसा है। अपने क्रिया-कलापों से मोक्षमार्ग में आनेवाले विघ्नों को भी काट सकते हैं और आत्मोत्थान करने वाले गुणों को भी काट सकते हैं, क्षीण कर सकते हैं। संगीत के साधनों का उपयोग 'रोक एण्ड रोल' में करके जीवन-शक्ति का ह्रास भी कर सकते हैं और भक्तिमय धुन-कीर्तन में करके जीवन-शक्ति का विकास भी कर सकते हैं। देवर्षि नारदजी ने 'भक्तिसूत्र' में कहा हैः तत् कीर्तनात्।

कीर्तन, ध्यान और सत्संग जीवन-शक्ति का विकास करके जीवनदाता में मिल जाने के लिए परम श्रेष्ठ साधन हैं। ब्रह्मवेत्ता संत-महापुरूष-सदगुरू के सान्निध्य में यह दिव्य काम सहजता से हो जाता करता है। इसीलिए कबीरजी कहते हैं:

सत्संग की आधी घड़ी सुमिरन वर्ष पचास।

वर्षा वरसे एक घड़ी अरट फिरे बारों मास।।

सुख देवे दुःख को हरे करे पाप का अन्त।

कह कबीर वे कब मिलें, परम सनेही संत।।

परम के साथ जिनका स्नेह है ऐसे संत जब मिलते हैं तब जीवन-शक्ति का विकास होता है। कबीर जी की यह बात सैंकड़ों वर्ष पूर्व की है, शंकराचार्यजी की बात सदियों पूर्व की है, शास्त्रों की बात हजारों-लाखों वर्ष पूर्व की हे। इसी बात को आज के युग में डॉ. डॉयमण्ड ने रिसर्च (अनुसंधान) करके सिद्ध किया तो लोग विश्वास करने लगे हैं।

सत्य किसी रिसर्च का विषय नहीं होता, अपितु सारा रिसर्च उस सत्य के आधार पर होता है। सामाजिक सत्य रिसर्च का विषय हो सकता है, प्राकृतिक रहस्य रिसर्च का विषय हो सकता है, लेकिन सनातन सत्य किसी रिसर्च का विषय नहीं हो सकता। सारे रिसर्च का जहाँ अन्त आ जाता है, वहाँ से सनातन सत्य का श्रीगणेश होता है।

मत मति के होते हैं, इसलिए मतान्तर हो सकते हैं। हमारा इष्ट मति नहीं, हमारा इष्ट मत नहीं लेकिन करोड़ों-करोड़ों मतियाँ जिस सच्चिदानंदघन परमात्मा में प्रकट होकर लीन  हो जाती हैं, वह इष्ट हमारा राम..... हमारा अपना आत्मा है। यह है सनातन सत्य की बात। इसी को वेद भगवान ने कहाः सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म। वह सत्यस्वरूप है, ज्ञानस्वरूप है।

मच्छर को कौन-से स्कूल-कॉलेज में शिक्षा दी गई कि यहाँ पर बैठोगे तो खाना मिलेगा ? किसी ने सिखाया तो नही। जहाँ रक्त था वहीं पर वह बैठा। .....तो परमात्मा की ज्ञान- सत्ता सूक्ष्म जीवों में भी है। खाने-पीने की और अपनी पार्टी की रक्षा करने की बुद्धि अगर किसी व्यक्ति में है तो इस बुद्धि का कोई विशेष फायदा नहीं। इतनी बुद्धि तो बैक्टेरिया (जीवाणुओं) में भी है। अपनी पार्टीवाले में और दूसरी पार्टीवाले में भी जो सत्य है उस सनातन सत्य को स्वीकार करके अपने अहंकार का आग्रह छोड़कर जो जीवन की यात्रा करता है, वह सच्चा धनी है, सच्चा बुद्धिमान है, सच्चा शीलवान् है। बाहर के आभूषण सच्चे आभूषण नहीं हैं। सच्चा आभूषण तो व्यक्ति का आन्तरिक जीवन है। बाहर के आभूषण तो बाहर के शरीर को थोड़ी चमक-दमक दे सकते हें, लेकिन तुमको वे नहीं चमकाते। तुम्हारी वास्तविक चमक को वे दबाते हें और अहंकार को जगाते हैं। श्री शंकराचार्यजी कहते हें- "सच्चा आभूषण शील है और नित्य कर्त्तव्य सत्संग है।" वेदवचन, शास्त्रवचन की अपेक्षा जीवन्मुक्त ब्रह्मवेत्ता के वचन साधक के लिए अधिक हितावह है। अपौरूषेय सनातन तत्त्व में बैठकर ब्रह्मवेत्ता जब बोलते हैं तब उनकी वाणी हमारी जीवन-शक्ति का विकास करके जीवनदाता से मुलाकात करा देती है। हृदय की गहराई से आने वाले उनके अनुभवनिष्ठ वचन हमारे कानों के द्वारा हृदय की गहराई में पहुँच जाते हैं... चित्त में विश्रान्ति मिलती है.... जीवन में आनन्द, उल्लास और मधुरता छा जाती है।

अनुक्रम

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सत्संग-सुधा

शील का दान

जिस मनुष्य में शील है वह सब चीजों का अधिकारी है। उसके पास शील के साथ धर्म, सत्य, सदाचार, बल और लक्ष्मी बराबर निवास करते हैं। वह हमेशा अपने शील के प्रभाव से सारे संसार में श्रेय पाता है। उसे हर व्यक्ति वन्दन करता है। उसके पास की इतनी बड़ी शक्ति हमेशा उसका साथ देती है जिससे कि उसके विचारों में कोई दुविधा उत्पन्न नहीं होती। वह किसी से भी ईर्ष्या, द्वेष और राग नहीं करता, न तो किसी पर क्रोध करता है, न किसी से उद्विग्न होता है। अपने ज्ञान के बल पर वह दूसरों से सदव्यवहार ही करता है। जिस देश या समाज में ऐसे महापुरूष होते हैं, वह देश या समाज धन्य हो जाता है।

महाभारत का प्रसंग हैः

इन्द्रप्रस्थ में राजा युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय सभामण्डप को नाना प्रकार के उपकरणों से सजाया गया। उन्हें देखकर दुर्योधन को बड़ा सन्ताप हुआ। वहाँ से लौटने पर अपने पिता धृतराष्ट्र से उसने ये सब बातें कहीं। तब धृतराष्ट्र ने कहाः

"बेटा ! यदि तुम युधिष्ठिर की भाँति या उनसे भी आगे बढ़कर राजलक्ष्मी पाना चाहते हो तो शीलवान् बनो। शील से तीनों लोक जीते जा सकते हैं। शीलवानों के लिए इस संसार में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं है। महाभाग ने सात रातों में, जन्मेजय ने तीन रातों में और मान्धाता ने एक ही रात में इस पृथ्वी का राज्य प्राप्त किया था। वे सभी राजा शीलवान् तथा दयालु थे। अतः उनके द्वारा गुणों के मोल खरीदी हुई यह पृथ्वी स्वयं ही उनके पास आ गई थी।''

दुर्योधन ने पूछाः "महाराज ! जिसके द्वारा उन राजाओं ने शीघ्र ही भूमण्डल का राज्य पा लिया, वह शील कैसे प्राप्त होता है ?"

धृतराष्ट्र बोलेः "वत्स ! इसके विषय में एक इतिहास है, जिसे नारदजी ने सुनाया था।

प्राचीन समय की बात है। दैत्यराज प्रह्लाद ने अपने शील के प्रभाव से इन्द्र का राज्य ले  लिया और तीनों लोकों को अपने वश में कर शासन करने लगा। उस समय इन्द्र ने बृहस्पतिजी के पास जाकर उनसे ऐश्वर्य-प्राप्ति का उपाय पूछा और बृहस्पति ने उन्हें इस विषय का विशेष ज्ञान प्राप्त करने के लिए शुक्राचार्य के पास जाने की आज्ञा दी। इन्द्र ने प्रसन्नतापूर्वक शुक्राचार्य के पास जाकर फिर वही प्रश्न दोहराया। शुक्राचार्यजी बोलेः "इसका विशेष ज्ञान महात्मा प्रह्लाद को ही है।"

यह सुनकर इन्द्र बहुत खुश हुए और ब्राह्मण का रूप धारण कर प्रह्लाद के पास गये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने कहाः

"राजन ! मैं श्रेय-प्राप्ति का उपाय जानना चाहता हूँ। आप बताने की कृपा करें।"

प्रह्लाद ने कहाः "विप्रवर ! मैं तीनों लोकों के राज्यों का प्रबन्ध करने में व्यस्त रहता हूँ इसलिए मेरे पास आपको उपदेश देने का समय नहीं है।"

ब्राह्मण ने कहाः "महाराज ! जब समय मिले तभी मैं आपसे उत्तम आचरण का उपदेश लेना चाहता हूँ।"

ब्राह्मण की सच्ची निष्ठा देखकर प्रह्लाद बड़े प्रसन्न हुए और शुभ समय आने पर उन्होंने उसे ज्ञान का तत्त्व समझाया। ब्राह्मण ने भी अपनी उत्तम गुरूभक्ति का परिचय दिया। उसने प्रहलाद की इच्छानुसार न्यायोचित रीति से भलीभाँति उनकी सेवा की। फिर समय पाकर उनसे अनेकों बार यह प्रश्न कियाः

"त्रिभुवन का उत्तम राज्य आपको कैसे मिला ? इसका रहस्य बताइये।"

प्रह्लाद ने कहाः "विप्रवर ! मैं राजा हूँ, इस अभिमान में आकर किसी ब्राह्मण की निन्दा नहीं करता। शुक्राचार्य जब मुझे नीति का उपदेश करते हैं उस समय मैं संयमपूर्वक उनकी बातें सुनता हूँ, उनकी आज्ञा को सिर पर धारण करता हूँ। शुक्राचार्य जी के बताये हुए नीतिमार्ग पर यथाशक्ति चलता हूँ। ब्राह्मणों की सेवा करता हूँ। क्रोध को जीतकर मन को काबू में रखकर इन्द्रियों को भी सदा वश में किये रहता हूँ। मेरे इस बर्ताव को जानकर ही विद्वान मुझे अच्छे-अच्छे उपदेश दिया करते हैं और मैं उनके वचनामृत का पान करता रहता हूँ। इसलिए जैसे चन्द्रमा नक्षत्रों पर शासन करते हैं उसी प्रकार मैं भी अपने जातिवालों पर राज्य करता हूँ। शुक्राचार्य जी का नीतिशास्त्र ही इस भूमण्डल  का अमृत है, यह उत्तम नेत्र है और यही श्रेय-प्राप्ति का उत्तम उपाय है।"

प्रह्लाद से इस प्रकार उपदेश पाकर भी वह ब्राह्मण उनकी सेवा में लगा ही रहा। तब प्रह्लाद ने कहाः

"विप्रवर ! तुमने गुरू के रूप में मेरी सेवा की है। तुम्हारे इस बर्ताव से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ। तुम्हारी जो इच्छा हो वह माँग लो, मैं उसे अवश्य पूर्ण करूँगा।"

ब्राह्मण वेश में छुपे हुए इन्द्र ने कहाः "महाराज ! यदि आप प्रसन्न हैं और मेरा प्रिय करना चाहते हैं तो मुझे आपका ही शील ग्रहण करने की इच्छा है। वही वर दीजिए।"

यह सुनकर प्रह्लाद को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने सोचाः "यह कोई साधारण मनुष्य नहीं होगा।" फिर भी तथास्तु कहकर उसे वर दे दिया। वर पाकर विप्र-वेशधारी इन्द्र तो चले गये, परन्तु प्रह्लाद के मन में बड़ी चिन्ता हुई। सोचने लगे कि क्या करना चाहिए मगर किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके। इतने में उनके शरीर से एक परम कांतिमान्, तेजस्वी और मूर्तिमान छाया प्रकट हुई। उसे देखकर प्रह्लाद ने पूछाः

"आप कौन हैं ?"

"मैं शील हूँ। तुमने मुझे त्याग दिया इसलिए जा रहा हूँ। अब उसी ब्राह्मण के शरीर में निवास करूँगा जो तुम्हारा शिष्य बनकर एकाग्र चित्त से सेवापरायण हो यहाँ रहा करता था।" यह कहकर वह तेज वहाँ से अदृश्य हो गया और इन्द्र के शरीर में प्रवेश कर गया।

उसके अदृश्य होते ही उसी तरह का दूसरा तेज प्रह्लाद के शरीर से प्रकट हुआ। प्रह्लाद ने पूछाः "आप कौन हैं ?"

"प्रह्लाद ! मुझे धर्म समझो। मैं भी उस श्रेष्ठ ब्राह्मण के पास जा रहा हूँ, क्योंकि जहाँ शील होता है, वहीं मैं भी रहता हूँ।"

वह विदा हुआ तो तीसरा तेजोमय विग्रह प्रकट हुआ। उससे भी प्रश्न पूछा गयाः

"आप कौन हैं ?"

"असुरेन्द्र ! मैं सत्य हूँ और धर्म के पीछे जा रहा हूँ।

सत्य के जाने पर एक और महाबली पुरूष प्रकट हुआ और पूछने पर उसने कहा-

"प्रह्लाद ! मुझे सदाचार कहते हैं। जहाँ सत्य हो वहीं मैं भी रहता हूँ।"

उसके चले जाने पर प्रह्लाद के शरीर से बड़ी गर्जना करता हुआ एक तेजस्वी पुरूष प्रकट हुआ। पूछने पर उसने बतायाः

"मैं बल हूँ और जहाँ सदाचार गया है वहीं स्वयं मैं भी जा रहा हूँ।" वह चला गया।

तत्पश्चात प्रह्लाद के शरीर से एक प्रभामयी देवी प्रकट हुई। पूछने पर उन्होंने बतायाः

"मैं लक्ष्मी हूँ। तुमने मुझे त्याग दिया है इसलिए यहाँ से जा रही हूँ क्योंकि जहाँ बल रहता है, वहीं मैं भी रहती हूँ।

प्रह्लाद ने पुनः पूछाः "देवी आप कहाँ जाती हैं ? वह श्रेष्ठ ब्राह्मण कौन था ? मैं इसका रहस्य जानना चाहता हूँ।

लक्ष्मी बोलीः "तुमने जिसे उपदेश दिया है उस ब्राह्मण के रूप में साक्षात इन्द्र थे। तीनों लोकों में जो तुम्हारा ऐश्वर्य फैला हुआ था, वह उन्होंने हर लिया। हे धर्मज्ञ ! तुमने शील के द्वारा तीनों लोकों पर विजय पायी थी, यह जानकर इन्द्र ने तुम्हारे शील का अपहरण किया है। धर्म, सत्य, सदाचार, बल और मैं (लक्ष्मी) यह सब शील के ही आधार पर रहते हैं। शील ही सबका मूल है।"

यह कहकर लक्ष्मी आदि सब शील के पीछे चले गये।

इस कथा को सुनकर दुर्योधन ने पुनः अपने पिता से पूछाः

"हे तात ! मैं शील का तत्त्व जानना चाहता हूँ। मुझे समझाइये और जिस तरह उसकी प्राप्ति हो सके वह उपाय भी बताइये।"

धृतराष्ट्र ने कहाः "शील का स्वरूप और उसे पाने का उपाय ये दोनों बातें महात्मा प्रह्लाद की कथा से पहले ही प्रकट हुई हैं। मैं संक्षेप में शील की प्राप्ति का उपायमात्र बता रहा हूँ। ध्यान देकर सुनो।

मन, वाणी और शरीर से किसी भी प्राणी के साथ द्रोह न करो। सब पर दया करो। अपनी शक्ति के अनुसार दान दो। परस्त्री को माता के समान समझो। ऐसा कार्य करो कि चार सत्पुरूषों की सभा में प्रशंसा हो। ऐसा कार्य कभी न करो कि चार सत्पुरूषों की सभा में सिर नीचा करना पड़े। गुरूजनों का आदर करो। यही वह उत्तम शील है जिसकी सब लोग प्रशंसा करते हैं। अपने जिस किसी कार्य या पुरूषार्थ से दूसरों का हित न होता हो तथा जिसे करनें में संकोच का सामना करना पड़े वह सब किसी तरह भी नहीं करना चाहिए। जिस काम को जिस तरह करने से मानव-समाज में प्रशंसा हो, मानव-समाज का कल्याण हो, उसी तरह करना चाहिए। इस तत्त्व को ठीक से समझ लो। यदि युधिष्ठिर से भी अच्छी सम्पत्ति पाना चाहते हो तो शीलवान् बनो।"

इस कथा से शील का महत्त्व प्रकट होता है। मनुष्य अपने शील को कभी न छोड़ते हुए सब प्राणियों का हित चाहे, दूसरों के संकट में सहायक बने और अपने मन से उदारता का बर्ताव करे, बड़ों का सम्मान करे, गुणीजनों की पूजा करे और शील का महत्त्व समझकर अपनेको प्राणीमात्र का सेवक समझे।

अनुक्रम

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चतुराई चूल्हे पड़ी........

भक्त का हृदय भक्त की ओर स्वाभाविक रूप से आकर्षित होता है और दुर्जन मनुष्य का मन दुर्जन की ओर ही मुड़ता है।

भक्त रैदासजी की ख्याति उनके समकालीन महान् रामभक्त गोस्वामी श्री तुलसीदासजी के कानों तक पहुँची तो संत तुलसीदासजी के दिल में रैदासजी से मिलने की उत्कण्ठा हो गयी। वे जानते नहीं थे कि भक्त रैदासजी चमार जाति में उत्पन्न हुए हैं और अपनी जाति का व्यवसाय करते हुए ही प्रभु-भजन में तल्लीन रहते हैं। वे अपने शिष्यवृन्द के साथ रैदासजी से मिलने के लिए चल पड़े।

रैदासजी के गाँव में आकर तुलसीदास जी रूके और वहाँ रहने वाले अपने एक भक्त ब्राह्मण को बुलवाकर पूछाः

"यहाँ रैदासजी नाम के परम भक्त कहाँ रहते हैं ?"

ब्राह्मण ने हाथ जोड़कर कहाः "महाराजजी ! यहाँ रैदास नाम का कोई संत-महात्मा या ब्राह्मण भक्त नहीं रहता। हाँ, रैदास नाम का एक शूद्र(चमार) है। वह शालिग्राम की पूजा करता है। थोड़ा बहुत प्रसिद्ध भी हो गया है लेकिन आप जैसे महात्मा का वहाँ जाना उचित नहीं। वह चमार कितना भी शुद्ध हो, फिर भी आप जैसे संत-महात्मा के बराबर नहीं है।"

भक्तप्रवर रैदासजी चमार जाति के हैं, यह जानकर तुलसीदासजी के चित्त में संकोच हुआ। इतनी दूर तक उन्हीं से मिलने आये हैं, अब मिले बिना कैसे लौट जायें ? गोस्वामीजी अन्य तमाम शिष्यों को वहीं छोड़कर हरिदास नाम के एक अल्पबुद्धि शिष्य को साथ लेकर रैदासजी की पर्णकुटी की ओर चल पड़े। ज्यादा चतुर शिष्य तो कहीं गड़बड़ भी कर सकता है। बुद्धू कहीं बोलेगा नहीं। बोलेगा भी तो कोई उसकी बात पर ध्यान नहीं देगा। अतः ऐसे नाजुक प्रसंग में बुद्धू शिष्य हरिदास ही साथ में रहे तो ठीक है।

योगानुयोग ऐसा हुआ कि जब वे उनकी कुटी तक पहुँचे तो रैदास जी अपने आँगन में मरे हुए बैल का चाम उतार रहे थे। परमात्मा में चित्त लगाकर, राग-द्वेष से रहित होकर वे अपना कुलधर्म, स्वाभाविक कर्त्तव्य कर्म निभा रहे थे। कर में काम और मुख में राम। उनके हाथ बैल के रक्त से रंगे हुए थे और हृदय प्रभु की भक्ति में रँगा था।

गोस्वामीजी को दूर से ही रैदासजी ने पहचान लिया। रैदासजी के हृदय में उनके लिए बड़ा आदरभाव था। 'आज अनायास ही वे अपने घर पधार रहे हैं....' यह देखकर रैदासजी का आत्मिक प्यारभरा दिल उमड़ पड़ा। प्रेमावेश में आकर वे क्या कर रहे हैं यह न सोचकर हथियार फेंक दिये.... ऐसे ही रँगे हाथ सामने दौड़ गये और गोस्वामीजी को आलिंगन करने गये परन्तु गोस्वामीजी दो-चार कदम पीछे हट गये। अतः रैदास जी ने चरणों में प्रणाम किया। वे तुलसीदासजी का संकोच समझ गये। मन में अपनी ऐसी दशा के कारण थोड़ी ग्लानि हुई लेकिन अब क्या करें ? जो हो गया सो हो गया। पलभर दोनों मौन रहे और दोनों ने भीतर-ही- भीतर इस घटना का समाधान पा लिया। चित्तवृत्ति के संकोच को लेकर तुलसीदासजी का चित्त थोड़ा अप्रसन्न हुआ फिर भी यथायोग्य वार्त्तालाप करके रैदासजी से विदा माँगी। दण्डवत् प्रणाम करके रैदासजी ने क्षमा माँगी और गोस्वामीजी को विदा किया। अपने शिष्यों को लेकर तुलसीदासजी वापस लौटे।

रैदासजी बैल के रक्त से रँगे हुए हाथों से जब आलिंगन करने के लिए आगे दौड़ आये तब तुलसीदासजी संकोच करके दो-चार कदम पीछे खिसक गये थे फिर भी रक्त की कुछ बूँदें उनके वस्त्र पर पड़ गईं थीं। रास्ते में तालाब पर उन्होंने स्नान कर लिया, वस्त्र बदल लिये। वस्त्र पर लगे रक्त के धब्बे धो डालने के लिए अपने अल्पबुद्धि शिष्य हरिदास को वह वस्त्र दे दिया और जो घटना घटी थी उसे गुप्त रखने की आज्ञा देकर अपने निवास पर लौट आये।

हरिदास ज्यों-ज्यों वस्त्र धोता गया, त्यों-त्यों रंग सुरंग होता गया। कुछ भी करे लेकिन दाग मिटते ही नहीं थे। शिष्य परेशान हो गया। गुरूदेव की सेवा और आज्ञा को ही सब कुछ माननेवाला वह हरिदास सोच में पड़ गया। अब क्या किया जाय ? कार्य पूरा किये बिना गुरूदेव के सामने भी कैसे जायें ?

संत-महात्मा-सदगुरू की सेवा बड़े भाग्य से मिलती है। अभागे आदमी को तो संत की सेवा मिलती ही नहीं। उसे संत दर्शन की रूचि भी नहीं होती।

तुलसी पूर्व के पाप से हरिचर्चा न सुहाय।

कोई पुण्यात्मा है कि दुरात्मा, इसकी कसौटी करना है तो उसे ले जाओ किसी सच्चे संतपुरूष के पास। अगर वह आता है तो तुम उसे जितना पापी समझते हो उतना वह पापी नहीं है। अगर नहीं आता है तो तुम उसे जितना धर्मात्मा मानते हो उतना वह धर्मात्मा नहीं है। शास्त्रवेत्ता कहते हैं कि सात जन्म के पुण्य जब जोर मारते हैं तब संत-दर्शन की इच्छा होती है। लेकिन इच्छा पूरी होते-होते समय पूरा हो जाता है।

बुद्ध जब महानिर्वाण को जा रहे थे तब कोई अभागा व्यक्ति भागता-भागता आया और बोलाः "पिछले चालीस साल से मैंने भगवान बुद्ध की ख्याति सुनी थी। आज जाऊँ, कल जाऊँ.... ऐसा करते-करते समय बीत गया। फिर उनके विषय में अफवाहें सुनने को मिलीं तो अपने को रोक दिया। कभी होता कि दर्शन करूँ और कभी होता कि नहीं जाना है। ऐसा करते-करते चालीस वर्ष गुजर गये। अब मुझे उनके दर्शन करने हैं।"

बुद्ध के विशेष शिष्य आनन्द ने कहाः "अब समय पूरा हो गया। भगवान बुद्ध अब महानिर्वाण को जा रहे हैं। दर्शन नहीं हो सकते।"

सात जन्मों के पुण्यों के जोर से संतदर्शन की इच्छा होती है लेकिन जीव दर्शन कर नहीं पाता। दूसरे सात जन्मों के सत्कृत्य जब जोर मारेंगे तब दर्शन के द्वार पर पहुँचेगे फिर दर्शन नहीं कर पायेंगे। तीसरे सात जन्मों के पुण्य जब जोर पकड़ते हैं तब संत का सान्निध्य और उनके अमृत वचन सुनने को मिलते हैं।

शिष्य हरिदास श्रीहरि से प्रार्थना करने लगाः

"हे प्रभो ! गुरूदेव की सेवा करने का सदभाग्य मिला है लेकिन मैं सेवा कर नहीं पा रहा हेँ। गुरूजी का बताया हुआ यह छोटा सा काम भी नहीं कर पाता हूँ। क्या करूँ कि ये लाल धब्बे दूर हों ? हे नाथ ! तू ही मार्ग बता।" शिष्य की आँखें डबडबा आईं। गला रूँधने लगा। प्रार्थना ने जोर पकड़ा। उसे हुआ कि वस्त्र का दाग मुँह में डालकर चूसूँ तो शायद निकल जाय।

आज्ञापालन और सेवा की धुन में शुद्धि-अशुद्धि का सोच-विचार न करके हरिदास वस्त्र में लगे हुए रक्त के दाग मुँह में डालकर चूसने लगा। बाहर का दाग तो मिटता गया, साथ-ही-साथ अन्तःकरण का मैल भी धुलता गया। हृदय में त्रिकालज्ञान का प्रकाश हो गया। अनुपम दिव्य दृष्टि खुल गई। उसने वस्त्र को शुद्ध जल में फिर से धोकर सुखा दिया और गुरूजी के पास पहुँचा दिया।

संध्या का समय था। हजारों भक्तों के बीच गोस्वामी श्री तुलसीदासजी रामायण की कथा सुना रहे थे। प्रतिदिन होनेवाले इस सत्संग-कथा-प्रवचन में दूर दूर से लोग आते थे और भक्त कवि संतश्री की कथा सुनते थे।

रैदासजी से मिलकर काशी में वापस लौटने के बाद यह पहली बार ही कथा हो रही थी। काफी लोग कथा सुनने के लिए इकट्ठे हो गये थे। कथा का प्रसंग थाः वनवास से अयोध्या वापस लौटने के बाद सीताजी का सब बन्दरों को वस्त्रालंकार, भेंट सौगात और विभिन्न प्रकार के भोजन-पकवान देना। सीता जी ने हनुमानजी को अपना अमूल्य मणिहार भेंट किया तो हनुमान  हार के एक-एक मणि को मुँह में डालकर दाँतों से तोड़ने लगे। यह देखकर सभा के लोग सोचने लगे कि हनुमानजी कैसे भी हों लेकिन आखिर बन्दर जाति के ठहरे ! उनको ऐसे अमूल्य हार का मूल्य कैसे पता चले !

यहाँ तक कथा-प्रसंग चलने के बाद गोस्वामीजी को अभी-अभी का रैदासवाला प्रसंग याद आ गया। जाति-स्वभाव पर विशेष विवेचना करने की इच्छा उनको हो आई। जीवन में चतुराई और आचार-विचार की आवश्यकता है। रैदास ने जो किया, वह बेहूदा था। रैदास के बारे में वह प्रसंग बोलने का वह सोच ही रहे थे तो उनकार वह बुद्धू शिष्य हरिदास खड़ा हुआ और हाथ जोड़कर बड़े विनय भाव से तुलसीदासजी के कान में धीरे से बोलाः

"गुरूदेव ! अब आगे जो बात आप बोलनेवाले हैं वह कृपा करके न बोलें तो अच्छा है।"

"कौन-सी बात ?" तुलसीदासजी ने चकित होकर पैनी दृष्टि डालते हुए पूछा।

"स्वामीजी ! आप कलवाली घटना लेकर भक्तराज रैदास की जाति विषयक, उनके आचार विषयक जो विवेचना करना चाहते हें, उसमें भक्ति की निन्दा और जाति की स्तुति होगी। यह होना उचित नहीं।" हरिदास ने चमचमाता हुआ सत्य प्रकट किया।

हरिदास का वचन सुनकर गोस्वामीजी आश्चर्यमुग्ध हो गये। मेरे मन की बात यह बुद्धिहीन शिष्य कैसे जान गया ! उनको कुछ समझ में नहीं आ रहा था। पूछाः

"बेटा ! मेरे भीतर की बात तूने कैसे जान ली।"

"गुरू महाराज ! आपकी ही कृपा से। आपका दिया हुआ वह वस्त्र धोते-धोते एवं उस पर पड़े लाल दाग चूसते-चूसते वे मिट गये और साथ-ही-साथ मेरे दिल के दाग भी धुल गये। आपकी कृपा से मुझे त्रिकालज्ञान की दिव्य दृष्टि प्राप्त हो गई है।"

यह सुनकर तुलसीदासजी को लगा कि हमने संत रैदासजी को पहचानने में भूल की है। आचार में उनके साथ अन्याय हो गया है। रैदासजी के प्रति जातीय घृणा के स्थान पर उनके भक्तिभाव, सबके प्रति आत्मभाव और अपने निर्मल आत्मस्वरूप में स्थितिवाली उनकी अवस्था पर तुलसीदास जी को प्यार उमड़ आया। उनकी आत्मनिष्ठा का प्रभाव वे पहचान गये। उसी समय उन्होंने कथा में कहाः

चतुराई चूल्हे पड़ी, पूर पर्यो आचार।

तुलसी हरि के भजन बिन, चारों वर्ण चमार।।

कथा समाप्त हुई। अब रैदासजी को पूर्ण प्रेम से आलिंगन करने के लिए गोस्वामीजी  तड़प उठे। उन्होंने ऐसे भक्तप्रवर का मानो अपमान ही किया था। वह प्रसंग उनके दिल में चुभने लगा।

महात्माओं के निश्चय अडिग हुआ करते हैं। निश्चय हो जाने के बाद वे समय खोते नहीं। गोस्वामीजी अपने सारे शिष्यों को साथ में लेकर रैदासजी से मिलने के लिए चल पड़े। इस बार भी रैदासजी उनका स्वागत करते हुए सामने द