
प्रातःस्मरणीय
पूज्यपाद संत
श्री आसारामजी
बापू के
सत्संग पावन
सत्संग-प्रवचन
समता
साम्राज्य
बहूनां
जन्मनामन्ते
ज्ञानवान्मां
प्रपद्यते।
वासुदेवः
सर्वमिति स
महात्मा
सुदुर्लभः।।
'बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में तत्त्वज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही है – इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।'
(भगवद्
गीताः 7.12)
ऐसे संतों के अनुभव-सम्पन्न हृदय से पूरे जीवन, पूरे सुख, पूरी शांति और पूरी अमरता का सन्देश बरसता है। उन ज्ञानवानों की वाणी सत्य स्वरूप ईश्वर को छूकर सत्संग बन जाती है। वह मानव मात्र के लिए महा मूल्यवान खजाना है। उनके अनुभव सम्पन्न वचनों को शांत और शुद्ध भाव से पढ़कर मनन करने वाले महान् पुरुष बन जाएँ और अपने दैनिक व्यवहार में सुख-दुःख, अनुकूलता-प्रतिकूलता के सिर पर पैर रखकर अमरता के अनुभव में, समता के सिंहासन पर विराजें... इसी भावना से प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-अमृत को केसेटों से ज्यों का त्यों इस पुस्तक में लिपिबद्ध किया गया है।
कृपया साधक-वृन्द बार-बार इस आत्मानुभव-सम्पन्न सत्संग को पढ़ें। अपने मित्रों को, स्नेहियों को यह सुन्दर सौगात देने की कृपा करें।
श्री
योग वेदान्त
सेवा समिति
अमदावाद
आश्रम
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
राग-द्वेष
की निवृत्तिरूप
अभ्यासयोग
ब्रह्माकार
वृत्ति बनाओः पार
हो जाओ
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
अनपेक्षः
शुचिर्दक्ष
उदासीनो
गतव्यथः।
सर्वारम्भपरित्यागी
यो मद् भक्तः
स मे प्रियः।।
'जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध, चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है-वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है।'
(भगवद्
गीताः 12.16)
अनपेक्षः जिसे तुच्छ विकारों की अपेक्षा नहीं।
शुचिः बाहर-भीतर से शुद्ध।
दक्षः चतुर, कार्य में कुशल।
उदासीनः उत्+आसीनः। ऊपर ब्रह्म में बैठा हुआ पुरुष, तटस्थ।
छोटी-छोटी आवश्यकताओं की तरफ बेपरवाह रहकर अपनी मानसिक शक्ति का विकास करने के लिए कहा गया कि उदासीन रहो। उदासीन का मतलब यह नहीं कि मूर्ख बन जाओ, पलायनवादी बन जाओ। घर में झगड़ा हो गया तो हो गये पलायन। कहीं कुछ अनुचित होता दिखा तो मुँह फेर लियाः 'हमें क्या ? चलो, जाने दो... कौन झंझट में पड़े... जो करेगा सो भरेगा।' धार्मिक जगत में उदासीन का ऐसा विकृत अर्थ लगाया जाता है।
जो व्यक्ति व्यवहार में कुशल नहीं है वह परमार्थ में भी कुशल नहीं हो सकता। व्यवहार में कुशलता क्या है ? छोटी-छोटी अनुकूलता-प्रतिकूलता से प्रभावित न होना, छोटे-छोटे मान-अपमान से आक्रान्त न होना यह व्यवहार की कुशलता है। छोटी-छोटी चीजों से प्रभावित न होना यह व्यवहार की कुशलता है। छोटी-छोटी चीजों से प्रभावित हो जाने से अपनी शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। अतः सावधान रहो। अनपेक्षः। तुच्छ मान और अपमान की परवाह मत करो। तुच्छ विषयविकारों की अपेक्षा मत करो। प्रारब्ध में जो होगा वह झख मारके, चक्कर खाकर तुम्हारे चरणों में आ गिरेगा।
हो तो भगवान के भक्त और टुकड़ों की चिन्ता करते हो ? हो तो भगवान के भक्त और चीथड़ों की चिन्ता करते हो ? हो तो प्रभु के प्यारे और खुशामद की अपेक्षा करते हो ? दूर हटा दो इन अपेक्षाओं को। अनपेक्ष शुचिर्दक्षः। अपेक्षा रहित हो जाओ शुद्ध हो जाओ।
भक्त बाहर से और भीतर से शुद्ध होना चाहिए। एक बाह्य शुद्धि होती है दूसरी भीतरी शुद्धि होती है। नहाना-धोना, मिट्टी-साबुन आदि से शरीर को स्वच्छ रखना यह बाह्य शुद्धि है। मन से दिव्य विचार करना, किसी का बुरा न सोचना, किसी की निन्दा न करना, किसी की माँ-बहन-बेटी पर बुरी नजर न करना यह भीतरी शुद्धि है।
महापुरुष कहते हैं कि डेढ़ पुण्य होता है और डेढ़ पाप होता है। डेढ़ पुण्य कैसे ? बाहर के शिष्टाचार-सदाचार से रहना, शरीर को साफ-सुथरा रखना, अपने कुल-मर्यादा के अनुसार धर्म का पालन करना यह आधा पुण्य है। भगवान को अपना मानना और अपने को भगवान का मानकर, उसे पाने का यत्न करना यह पूरा पुण्य है।
डेढ़ पाप कैसे ? मन से किसी का बुरा सोचना, वाणी से गलत शब्द बोलना, किसी का अहित सोचकर बोलना यह वाणी का पाप है। हिंसा आदि करना यह शरीर का पाप है। मन, वाणी और शरीर के सब पाप मिलकर आधा पाप होता है। ईश्वर को अपना न मानना, उसको पाने का यत्न न करना यह पूरा पाप है।
कटुवाणी बोलना, दूसरों को चुभे ऐसा बोलना यह वाणी का पाप है। व्यर्थ बोलना यह वाणी का क्षय है। ईश्वर से दूर ले जाने वाली बातें बोलना यह वाणी का पाप है। ईश्वर के करीब ले जाने वाली बातें बोलना यह वाणी का पुण्य है। ईश्वर के करीब ले जाने वाले दृश्य देखना यह आँखों का पुण्य है। ईश्वर के करीब ले जाने वाले शब्द सुनना यह कानों का पुण्य है। ईश्वर के करीब ले जाने वाली यात्रा करना यह पैरों का पुण्य है। ईश्वर को अपने आप में खोज लेना यह आन्तर हृदय का पुण्य है।
तुच्छ अपेक्षाओं से ऊपर उठो। तुम भारतवासी हो, मनुष्य जन्म पाया है, श्रद्धा है, बुद्धि है, फिर क्यों चिन्ता करते हो ? मारो छलांग.....! जो होगा वह देखा जाएगा। छोटी-छोटी अपेक्षाओं को कुचल डालो। अन्यथा, ये अपेक्षाएँ तुम्हारा समय, तुम्हारी निगाहों की शक्ति, तुम्हारे कानों की शक्ति, तुम्हारी वाणी की शक्ति, तुम्हारे मनन की शक्ति छीन लेगी। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-
अनपेक्षः
शुचिर्दक्षः।
सनातन धर्म ने शुद्धि पर खूब ध्यान दिया है। जिसके दाँत मैले हैं, कपड़े मैले-कुचैले-गन्दे हैं, जो सूर्योदय के समय तक सोता रहता है वह साक्षात् चक्रपाणि हो, भगवान विष्णु हो तो भी लक्ष्मी जी उसका त्याग कर जायेगी। शांति उसका त्याग कर देगी। कोई सोचे कि 'हम तो भगत हैं.... मुँह धोया न धोया, चलेगा... कपड़े ऐसे-वैसे पहन लिये, चलेगा....' तो यह कोई भक्त का चिन्ह नहीं है। भक्त का मतलब बुद्धू ? भक्त का मतलब पलायनवादी ? भक्त का मतलब आलसी ? भक्त का मतलब प्रमादी ? भक्त का मतलब पराधीन ? नहीं हो सकता है। भक्त का मतलब अगर ऐसा है तो हमें ऐसी भक्ति की कोई जरूरत नहीं है। कबीर जी कहते हैं-
भगत
जगत को ठगत है
भगत को ठगे न
कोई।
एक
बार जो भगत
ठगे अखण्ड
यज्ञफल होई।।
भक्त का मतलब हैः जो अपने चैतन्यस्वरूप अन्तर्यामी परमात्मा से विभक्त न हो। संसारी लोग नश्वर संसार में जितना भरोसा करते हैं उससे अनन्त गुना भरोसा उसे परमात्मा में होता है। वह सच्चा भक्त है।
विश्वासो
फलदायकः।
एक होती है शिक्षा, दूसरी होती है दीक्षा। शिक्षा ऐहिक वस्तुओं का ज्ञान देती है। स्कूल-कॉलेजों में हम लोग जो पाते हैं वह है शिक्षा। शिक्षा की आवश्यकता है शरीर का पालन-पोषण करने के लिए, गृहस्थ व्यवहार चलाने के लिए। यह शिक्षा अगर दीक्षा से रहित होती हैं तो वह विनाशक भी हो सकती है। शिक्षित आदमी समाज को जितना हानि पहुँचाता है उतना अशिक्षित आदमी नहीं पहुँचाता। शिक्षित आदमी जितना धोखा कर सकता है उतना अशिक्षित आदमी नहीं करता। विश्व में शिक्षित आदमी जितना उपद्रव पैदा कर चुके हैं उतना अशिक्षित आदमी ने नहीं किया। साथ ही साथ, शिक्षित आदमी अगर सेवा करना चाहे तो अशिक्षित आदमी की अपेक्षा ज्यादा कर सकता है।
शिक्षित आदमी के जीवन में अगर दीक्षा नहीं है तो वह शिक्षा के बल से अपने अहंकार का पोषण करेगा, शिक्षा के बल से दूसरों का शोषण करेगा। 'इस्लाम खतरे में है... धर्म खतरे में है... राष्ट्र खतरे में है....' ऐसा करके अपनी पद-प्रतिष्ठा मजबूत करेगा। दीक्षा के बिना की शिक्षा का पूरा लक्ष्य होगा व्यक्तित्व का श्रृंगार, भोगों का संग्रह। इसके लिए चाहे झूठ बोलना पड़े चाहे कपट करना पड़े, नीति का द्रोह करना पड़े चाहे धर्म का विद्रोह करना पड़े, दीक्षारहित शिक्षित आदमी यह सब करेगा। देख लो रावण का जीवन, कंस का जीवन। उनके जीवन में शिक्षा तो है लेकिन आत्मज्ञानी गुरुओं की दीक्षा नहीं है। अब देखो, रामजी का जीवन, श्रीकृष्ण का जीवन। शिक्षा से पहले उन्हें दीक्षा मिली है। ब्रह्मवेत्ता सदगुरु से दीक्षित होने के बाद उनकी शिक्षा का प्रारम्भ हुआ है। दीक्षा संयुक्त शिक्षा से अपना भी कल्याण किया और विश्व का भी कल्याण किया। जनक के जीवन में शिक्षा और दीक्षा, दोनों है तो सुन्दर राज्य किया है।
आध्यात्मिकता कोई दरिद्रता का चिन्ह नहीं है। व्यक्ति आध्यात्मिक होता है तो प्रकृति उसके अनुकूल हो जाती है। वह जमाना था कि लोग सोने के बर्तनों में भोजन करते थे। जितना-जितना आध्यात्मिक बल बढ़ता है उतनी-उतन भौतिक वस्तुएँ खिंचकर आती ही हैं। अगर कोई ज्ञानी विरक्ति के प्रारब्धवाला हो, शुकदेव जी जैसा, तो उसे भौतिक चीजों की परवाह नहीं रहती।
व्यक्ति वास्तव में अगर आध्यात्मिक है तो वह लातमाह हो जाता है, अनपेक्ष हो जाता है। जो व्यक्ति अपेक्षाओं से भरा है, आध्यात्मिकता का जामा पहन लिया है, पलायनवादी है वह सच्चा भक्त नहीं हो सकता। चिलम पीने वाले, सुलफा फूँकने वाले, गंजेड़ी, भंगेड़ी सच्चे भक्त नहीं हो सकते। भक्त तो अनपेक्ष होता है, भीतर-बाहर से शुद्ध होता है। गाँजा, अफीम, तम्बाकू आदि अशुद्धि बढ़ानेवाली चीजें हैं। एक माला जाप जपने से तन-मन में जो सात्त्विकता पैदा होती है वह एक बीड़ी पीने से नष्ट हो जाती है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि एक बीड़ी पीने से छः मिनट आयुष्य नष्ट हो जाता है। भक्त के जीवन में ऐसे किसी मादक द्रव्यों की आवश्यकता नहीं रहती। वह अनपेक्ष होता है। वह जानता है संसार के क्षणिक सुख और दुःख, मान और अपमान, प्रशंसा और निन्दा आदि के भाव और अभाव की इच्छा रखने की आवश्यकता नहीं है। संसार की 'तू-तू.... मैं-मैं' में उलझने की आवश्यकता नहीं है। सृष्टिकर्त्ता के सर्जन में सब बना बनाया आयोजन है। हमारे द्वारा जो काम करवाना होगा वह करवाके रहेगा, धन-मान, पद-प्रतिष्ठा आदि जो देना होगा वह देगा ही। अपेक्षा करके हम अपनी इज्जत क्यों खराब करें ?
सोचा
मैं न कहीं
जाऊँगा यहीं
बैठकर अब
खाऊँगा।
जिसको
गरज होगी आयगा
सृष्टिकर्त्ता
खुद लायेगा।।
अगर हमारा प्रारब्ध होगा तो सृष्टिकर्त्ता खुद आने को तैयार है। तू अमृतपुत्र है। तू परमात्मा की संतान है और किस उलझन में उलझा है भैया ? फेंक ये मैले-कुचैले इच्छा वासना के चीथड़ों को। ठोकर मार इन कंकड़-पत्थरों को। तू हीरे-जवाहरात से खेलने को आया है। फूटी कौड़ियों में जिन्दगी गँवा रहा है ! छोड़ इन तुच्छ चीजों की इच्छाओं को। इच्छा छोड़ते ही तेरे अन्दर संगीत गूँजते लगेगा। तेरे भीतर से रस छलकने लगेगा। संसार का गुलाम समझता है कि बाहर से सुख आता है। सुख बाहर से कभी नहीं आता। सुख हृदय से छलकता है। चाहे देखकर, सुनकर, छूकर, सूँघकर, चखकर सुख लो लेकिन सुख की अनुभूति हृदय में होती है।
अज्ञानी लोग बोलते हैं कि भगवान फलानी जगह में हैं किन्तु जानकारों का अनुभव है कि-
ईश्वरः
सर्वभूतानां
हृदयेशेऽर्जुन
तिष्ठति....
ईश्वर तो सर्वत्र है। उसको पाने की इच्छा रखने वाला दुर्लभ है। ईश्वर-प्राप्ति का मार्ग दिखानेवाले महापुरुषों का मिलना दुर्लभ है। ईश्वर दुर्लभ नहीं है। वह तो सर्वत्र है, सदा है। ईश्वर सुलभ है।
तस्याहं
सुलभः
पार्थ...।
'मैं तो सुलभ हूँ लेकिन मेरा साक्षात्कार कराने वाले महात्मा दुर्लभ हैं।'
बहूनां
जन्मनामन्ते
ज्ञानवान्मां
प्रपद्यते।
वासुदेवः
सर्वमिति स महात्मा
सुदुर्लभः।।
"बहुत जन्मों के अन्त के जन्म में तत्त्वज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही है – इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।'
(भगवद्
गीताः 7.19)
ऐसे दुर्लभ महात्माओं के देश में, भारत देश में तुम्हारा जन्म हुआ है। कुल की परंपरा से तुमको श्रद्धा का शृंगार मिला है। तुम्हारा कोई न कोई सत्कर्म उस प्रभु को जच गया है इसीलिए तुमको सत्संग मिला है। फिर भी निराश क्यों हो रहे हो ? कब तक बैठे रहोगे ? कमर कसो। केवल गलत विचारों को हटा दो, सही तत्त्व अपने आप प्रकट हो जाएगा। जमीन से मिट्टी-कंकड़-पत्थरों को हटा दो, पानी अपने आप फूट निकलेगा।
अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष बढ़ानेवाले विचार करने से, ऐसे विचारों से प्रेरित होकर प्रवृत्ति करने से हमारी शक्ति क्षीण हो जाती है। आपमें ईश्वर का असीम बल छुपा है। छोटी-छोटी आकांक्षाओं से, छोटी-छोटी अपेक्षाओं से आप अपनी शक्ति नाश किये जा रहे हो।
एक मुनीम ने सेठ से कहाः "मेरी तनख्वाह 800 रूपये है। बढ़ाकर 1500 कर दो।"
सेठ ने कहाः "तू चला जा। हम 1500 नहीं करते।"
"चला तो जाऊँगा सेठजी ! लेकिन तुम्हारी पेढ़ी भी बन्द हो जाएगी।"
"कैसे?"
"आपने मेरे द्वारा इन्कमटैक्स के बचाव के लिए कई ऐसे-वैसे काम करवाये हैं। मैं आपकी सब पोल जानता हूँ। इन्कमटैक्सवालों को जाकर कह दूँगा तो....।"
सेठ ने कहाः 1500 ही नहीं 1600 ले, पर रह यहीं।"
क्यों ? मुनीम सेठ की कमजोरी जानता है इसीलिए सेठ का गला घोंटता है। ऐसे ही तुम भी कुछ छोटी-मोटी अपेक्षा करके मन से कुछ गलत काम करवा लेते हो तभी मनरूपी मुनीम तुम्हारा गला घोंटता आ रहा है। सदियों से, युगों से तुम्हारा गला घोंटा जा रहा है। तुमको पता ही नहीं भैया ! कब तक अपना गला घुटवाओगे ? कब तक चार टुकड़ों के लिए जीवन को दाँव पर लगाओगे ? कब तक बाहर की तुच्छ वाहवाही के लिए अपने को दाँव पर लगाते रहोगे ? अब जागो। तुच्छ अपेक्षाओं को छोड़ो। देह की प्रतिष्ठा, पूजा, यश, मन, बड़ाई को लात मारो। जिसको गरज होगी वह तुम्हारा यशोगान करके अपने दिल को पवित्र कर ले यह अलग बात है लेकिन तुम अपने यश की इच्छा छोड़ो। यशस्वी काम करो, यश की इच्छा छोड़ो। बुरे काम से बचो लेकिन अपनी बुराई होती है तो खुश हो जाओ कि मेरे पाप धुल रहे हैं। कोई तुम्हारी अच्छाई करे तो सिकुड़ जाओ। लोग प्रशंसा करते हैं तो तुम्हारे पुण्य क्षीण होते हैं। निन्दा करते हैं तो पाप क्षीण होते हैं।
ऋषि दयानन्द अलीगढ़ में प्रवचन कर रहे थेः "अल्लाह हो अकबर... करके चिल्ला रहे हो-
कंकड़
पत्थर जोरिके
मसीद दिया
बनाय।
ता
पर चढ़ि
मुल्ला बांग
दे क्या बहरा
हुआ खुदाय ?
सुबह को उठकर चिल्लाते हो, लोगों की शांति भंग करते हो...."
इस प्रकार ऋषि दयानन्द ने रुआंटे खड़े हो जाये ऐसा प्रवचन अलीगढ़ में दिया। मुसलमानों के अगवानों ने जाँचा कि यह साधु कहाँ ठहरा है? पता चला कि हिन्दुओं ने तो इस साधु का बहिष्कार किया है। ऋषि दयानन्द के लिए हिन्दुओं की धर्मशाला में जगह नहीं, हिन्दुओं के मठ-मन्दिर में जगह नहीं, हिन्दुओं के आश्रम में जगह नहीं, हिन्दुओं की होटलों में जगह नहीं आखिर एक मुसलमान ने इनको रहने को दिया है। ये मुसलमान के वहाँ रहते हैं। मुसलमानों का (सीधा) लेकर हाथ से भोजन बनाकर खाते हैं और रात को प्रवचन में मुसलमानों को ही गाली देते हैं ? क्या बात है बाबा की ?
अगवान मिलने को आये ऋषि दयानन्द सेः
"महाराज ! आप हमारे कुराने शरीफ पर प्रवचन करके हमारे पोल खोलकर हमको दो कौड़ी का बना देते हैं। हिन्दुओं ने आपका बहिष्कार किया। मुसलमान ने आपको रहने को घर दिया, खाने को सीधा सामान दिया और फिर उन्हीं को आप डाँटते हो ?"
ऋषि दयानन्द ने कहाः "भैया ! जिसने आवास दिया, जिसने अन्न दिया उस कौम को न जगाऊँ तो मैं क्या करूँ ? कृतघ्न हो जाऊँ ?"
ऐसे ही तुम लोगों ने मुझे बुलाया, आवास दिया, खिलाने की व्यवस्था की, मंच बना दिया, तो मैं तुमको न जगाऊँ तो काले कुत्तों को और भैंसों को जगाऊँगा ? तुमको नहीं चमकाऊँगा तो किसको चमकाऊँगा ? पत्थर और कोयले को चमकाऊँगा ?
तुम्हें चमकना होगा। अपेक्षाओं की काई हटाओ। जल कितना ही सुन्दर हो, निर्मल हो लेकिन काई से ढका हो तो उसकी क्या कीमत हैं ?
जल को प्रकट होने दो। तुम्हारा परमात्मा महान् सुन्दर है। किन्तु अपेक्षाओं की काई से ढका है। इसीलिए तुम सिकुड़ते हो, चिन्तित होते हो। अभी तुम देवी-देवता आकर तुम्हारा दीदार करेंगे और अपना भाग्य बना लेंगे। यह मैं 'चेलेंज' से कहता हूँ।
कहने का तात्पर्य यह नहीं कि शिवजी को दूध नहीं चढ़ाओ। देखना, कहीं समझने में गड़बड़ न हो जाय ! पर हाँ, दूध चढ़ाते-चढ़ाते अपना 'मैं' भी चढ़ा दिया करो, अहंकार भी समर्पित किया करो।
हम लोग क्या करते हैं ? दूध चढ़ाते समय ध्यान रखते हैं कि कोई देखता है कि नहीं। हजारों को कहते फिरेंगे कि हमने महान् अभिषेक किया, महारूद्री की। खाक डाल दी अपने सत्कृत्य पर। सत्कृत्य को छुपा दो। वह और गति पकड़ेगा, जोर पकड़ेगा। दुष्कृत्य को प्रकट होने दो, यह मिट जायेगा। हम लोग क्या करते हैं ? सत्कार्यों को जाहिर करते हैं और दुष्कृत्यों को छुपाते हैं। भीतर हमारा खोखला हो जाता है। भीतर से काँपते रहते हैं।
अरे ! विश्वनियंता तुम्हारे साथ है और तुम काँप रहे हो ? विश्वेश्वर सदा साथ है और तुम चिन्तिन रहे तो बड़े शर्म की बात है। दुःख और चिन्ता में तो वे डूबें जिनके माई-बाप मर गये हों। तुम्हारे माई-बाप तो हृदय की हर धड़कन में तुम्हारे साथ हैं। फिर क्यों दुःखी होते हो ? क्यों चिन्तिन होते हो ? क्यों भयभीत होते हो ?
केवल व्यवहार में अदक्षता है, असावधानी है। विचारों में असावधानी है।
बेवकूफी जैसा दुनियाँ में और कोई पाप नहीं। सारे दोष, सारे दुःख बुद्धि की कमी के कारण, अपनी बेवकूफी के कारण उठाने पड़ते हैं। इसलिए बेवकूफी को हटाओ। मनरूपी मुनीम को सिर पर चढ़ातेत जाओगे, उससे गलत काम करवाते जाओगे तो मुनीम आप पर शासन करता रहेगा।
भैया ! मेरी भाषा आपको जरा कड़क लगती होगी लेकिन मैं आपको परम मांगल्य के द्वार पर पहुँचना चाहता हूँ। मैं आपको प्यार करता हूँ। आपका यश करवाना चाहता हूँ, आपको चमकाना चाहता हूँ। पर हाँ, आपके मन की कल्पनाओं को नहीं, आपके मन के धोखों को नहीं अपितु आपको चमकाना चाहता हूँ। आपका असली स्वरूप प्रकट करना चाहता हूँ।
शुद्ध रहो। स्वच्छ रहो। दोष को जिनता दबायेंगे उतना दोष का गहरा प्रभाव पड़ जायगा। लोभ-लालच को जितना पोसेंगे उतना उसका गहरा प्रभाव हो जायगा।
हमारे भीतर अन्तर्यामी परमात्मा सदा मौजूद बैठा है। हर समय वह अपना निर्णय सुना रहा है, 'यह ठीक है.... यह गलत है। यह शुद्ध है... यह अशुद्ध है।' वह सदा जागृत रहकर बोल रहा है पर हमारी अपेक्षाओं का तूफान इतना है कि उसका अनहद नाद सुनाई नहीं पड़ता।
सेठ दीवानखाने में शांति से बैठे थे। दीवार पर घड़ी की टिक्.... टिक्... आवाज आ रही थी। इतने में मार्ग से बारात गुजरी। उसके शोरगुल में घड़ी की टिक्... टिक्... आवाज दब गई। सेठ जी ने पूछाः 'घड़ी बन्द हो गई क्या ? जरा देखो तो ?' नौकर ने जाँचकर कहाः 'सेठ जी ! घड़ी तो टिक्... टिक्... आवाज से चल रही है। बारातियों के शोरगुल के कारण आवाज सुनाई नहीं देती।'
ऐसे ही इन्द्रियोंरूपी बारातियों के साथ आप जुड़ जाते हैं। विषयों के शोरगुल में बह जाते हैं और अन्तर्यामी की आवाज का अनादर कर देते हैं। अन्तर्यामी ईश्वर की आवाज का अनादर करोगे तो कुदरत तुम्हारा अनादर करेगी। चार पैरवाला बना देगी। डण्डे पड़ेंगे और रेत उठानी पड़ेगी तब क्या करोगे ? घोड़ा बन जाओगे और चाबुक खाते हुए गाड़ी खींचना पड़ेगा तब क्या करोगे ? तब तुम्हारे चित्र और प्रशंसक क्या काम आएंगे ?
'राजाधिराज गौब्राह्मणप्रतिपाल अन्नदाता घणी खम्मा.... घणी खम्मा....' महाराजा गुजरते तो फूलों से सड़कें लद जातीं ऐसे लोगों का अब क्या हाल है, योगदृष्टि से जरा देखो तो.... दया आ जायेगी उनकी हालत पर।
बाह्य चीजों की अपेक्षा करके अपने अन्दर का खजाना मत खोइये। बिल्ली के बदले में अपनी माँ को मत खोइये। माँ के बदले में, घर के चूहे भगाने के लिए बिल्ली लाते हो तो अपने साथ बड़ा धोखा करते हो।
ब्रह्मविद्यारूपी माता है, आत्मज्ञानरूपी माता है, गीताज्ञानरूपी माता है। इस आत्मप्रकाशरूपी माता का अनादर करके बाह्य चीजों की गुलामी नहीं करनी चाहिए।
अनपेक्षः
शुचिर्दक्ष.....।
अपना हृदय जितना शुद्ध होगा उतना ईश्वरीय बल तुम्हारे द्वारा काम करेगा। साधारण मनुष्य सोचता है कि 'मैंने किया.... मैंने किया....' किन्तु जो सच्चा भक्त है, समझदार है वह देखता है कि यह मेरी अपेक्षाओं से नहीं हुआ। विश्वनियंता ने मेरे द्वारा करवाया। उसी प्रभु की जय हो... जय हो....। ऐसा समर्पण का भाव होगा, अकर्त्तापन का भाव होगा तो विराट परमात्मा उसके द्वारा और अधिक अच्छे-अच्छे कार्य करवायेगा।
सब करवाता है प्रभु, यशस्वी बनाता है परमात्मा और तुम ले बैठों कि, 'मैंने किया..... मैंने किया....' अपने अहंकार के ढोल पीटते रहो तो यह कृतघ्नता है। अहंकार को आगे करने से योग्यता क्षीण हो जाती है।
तुम्हारे संकल्प के पीछे जितनी पवित्रता और दृढ़ता होगी, तुम जितने उन्नत विचार करोगे उतनी ही तुम्हें उस प्रभु की अधिक सत्ता और स्फूर्ति मिला करेगी।
पुत्र पिता के प्रति वफादार रहता है, कृतज्ञ रहता है और बोलता है कि सब पिता जी की संपत्ति है, मैंने तो केवल सँभाला है, तो पिता जी सारी संपत्ति पुत्र के हवाले करने को तत्पर हैं। ऐसे ही ईश्वरीय शक्तियाँ तुम्हारे द्वारा काम करने को तत्पर हैं। तुम क्यों बेईमानी कर रहे हो ? क्यों अपेक्षाएँ कर रहे हो ? क्यों सिकुड़ रहे हो ? क्यों मन के गुलाम बन रहे हो ? मन की कल्पनाओं के पीछे भाग रहे हो ? मारो ॐकार की गदा...। अपेक्षाओं को चूर... चूर कर दो। वासनाओं को कुचल डालो। फिर देखो, क्या रहस्य खुलने लगते हैं !
अगर तुम अनपेक्षः होकर काम करने लगो तो धिक्कार है उन किन्नर और गन्धर्वों को जो तुम्हारे सेवा में तत्पर न हो जाएँ। वे हवाएँ भी तुम्हारे हवाले हो जाएगी और देव भी तुम्हारे अनुकूल होने का शपथ ले लेंगे।
कर्त्तव्यों से उदासीन मत बनो, एषणाओं से उदासीन बनो, अपेक्षाओं से उदासीन बनो। कर्म में प्रमाद नहीं अपितु कुशलता लाओ। अपनी योग्यता का विकास करो। योगः कर्मसु कौशलम्। कर्म में कुशलता ही योग है। कर्म करके भी कर्म-फल से अनासक्त रहना यह योग है।
जबसे सनातन धर्म के लोगों ने, हिन्दू धर्म के लोगों ने अकुशलता को सिर पर सवार कर दिया, बुद्धुपने को सिर पर सवार कर दिया, 'उदासीन बनो... उदासीन बनो....' का पलायनवादी मार्ग पकड़ लिया तबसे हिन्दू धर्म की गरिमा दबती गई। धार्मिकता की और समाज की हानि होने लगी। 'अपना क्या ? जो करेगा सो भरेगा....' करके अच्छे लोग किनारा कर जाते हैं तो समाज की बागडोर बदमाशों के हाथ में आ जाती है। आलसी, पलायनवादी और मूर्ख होकर ठगा जाना यह कोई धार्मिकता का चिन्ह नहीं है।
अपना कर्त्तव्य बराबर पालो। नेता हो तो ठीक से नेता बनो। पार्लियामेंट में जाओ तो सरकारी व्यर्थ के खर्च और अपव्यय कम हो, थकी-मंदी-गरीब जनता का शोषण न हो, टेक्स पर टेक्स न पड़े, प्रजा संयमी हो और चैन का जीवन बिता सके ऐसा यत्न करो। जिससे तुम इस लोक में यशस्वी बनो और परलोक में परम पद की प्राप्ति हो जाये।
समाजसेवक बनो तो ऐसे निरपेक्ष बनो कि ईश्वरीय प्रभाव तुम्हारे द्वारा काम करने लगे। कोई वाहवाही करने लगे तो उसकी बात को टाल दो।
तुम महिला हो तो ऐसी रोटी बनाओ कि खाने वाले का स्वास्थ्य और चारित्र्य दृढ़ होने लगे। सब्जी बनाओ तो ऐसी बनाओ की न ज्यादा नमक न ज्यादा मिर्च। नवजवान खाने वाले हैं तो मिर्च कम डालो, काली मिर्च का उपयोग करो। आँवले का उपयोग करो। बच्चे तन्दुरुस्त रहें ऐसी बाते जानकर जीवन को तेजोमय बनाओ।
ऐसा नहीं कि अभी-अभी बच्चे ने दूध पिया हो और ऊपर से मक्खन खिलाओ। 'हम तो भाई भगत लोग हैं। हमको सब चलता है....' ऐसा करके भगतड़ा नहीं होना है। बच्चे के शरीर में कोढ़ के डाघ करने हैं क्या ? नहीं। तो पहले मक्खन खिला दो बाद में दूध।
कभी दो ठण्डी चीजें, दो खट्टी चीजें साथ में नहीं खानी चाहिए, जैसे दही भी खाया और नींबू भी खाया, मौसमी का रस और ग्लुकोज मिला दिया। यह तो बीमारी को बुलाना है।
व्यवहार में दक्ष बनना चाहिए, होशियार रहना चाहिए।
स्नान करो तो शरीर को रगड़-रगड़कर, मल-मलकर स्नान करो ताकि नस-नाड़ियाँ मजबूत रहे। शरीर दुर्बल होगा तो जरा सी बीमारी में कराहने लगोगेः 'एं.... एं..... एं....एं... एं.. ।' अरे 'एं... एं...' क्या करते हो ? उसका ठीक उपाय खोजो। जाँच करो कि बीमारी हुई कैसे ? क्यों हुई ? ज्यादा खाय ? ज्यादा भूखामरी की ?
आज एकादशी का उपवास और कल पेट में ठूँस-ठूँसकर लड्डू ! बीमार नहीं पड़ोगे तो और क्या होगा ? एक दिन उपवास किया तो दूसरे दिन सादा सुपाच्य भोजन खाओ।
रात्रि को ठूँस-ठूँसकर भोजन न खुद करो न दूसरों को कराओ।
भगवान बुद्ध कहा करते थेः अप्पदीपो भव। अपना दीया आप बनो।
जिन कारणों से तुम्हारा मन दुर्बल होता हो, जिन आहार और पदार्थों से तुम्हारा तन बीमार होता हो, दुर्बल होता हो, उन सबको विष की नाँई त्याग दो। जिन कारणों से मन बलवान होता हो, तन मजबूत होता हो उन कारणों को आप आमंत्रित कर दो। यह है दक्षता।
'क्या करें...? पार्टी में गये थे, शादी में गये थे, लोगों ने कहा यह जरा-सा खा लो, यह पी लो। पीते नहीं थे, शादी में जरा-सा पी लिया तबसे आदत बिगड़ गई।'
अरे ठोकर मारो ऐसी पार्टियों को। अपने निश्चय में डट जाओ, अडिग हो जाओ तो वे भी अपनी पार्टी का रूख बदल देंगे। पतन के मार्ग में जाने वाले लोगों को कंपनी देकर अपना सत्यानाश मत करो। मौत के समय वे लोग सहायरूप बनेंगे क्या ? यमपुरी में जायेंगे तब उनकी कंपनी काम आयगी क्या ? कंपनी उनको दो जिनसे अपनी भक्ति बढ़ती हो, आत्मबल बढ़ता हो, अपनी सच्चाई बढ़ती हो, दृढ़ता बढ़ती हो।
इस बात पर हमारे गुरुदेव बहुत जोर दिया करते थे। एक बार गुलाब दिखाकर मुझसे कहा था, अभी तक ठीक से याद है। वे बोलेः
"देख बेटा ! यह क्या है ?"
"साँईं ! यह तो गुलाब है।"
"यह ले जा दुकान में और डालडा के डिब्बे पर रख, गुड़ के थैले पर रख, शक्कर की बोरी पर रख, तिल के थैले पर रख, दुकान की सारी चीजों पर रख। फिर सूँघेगा तो खुश्बू किसकी आयेगी ?
"खुश्बू गुलाब की ही आयेगी।"
"नाली के आगे रख, फिर सूँघेगा तो खुश्बू किसकी आयगी ?"
"गुलाब की ही।"
"बस ऐसा तू बन जाना। दूसरों की दुर्गन्ध अपने में मत आने देना। अपनी सुगन्ध फैलाते रहना, आगे बढ़ते रहना।"
मेरे गुरुदेव ने मुझसे कहा था और मैं आप लोगों को कह रहा हूँ- तू गुलाब होकर महक तुझे जमाना जाने। दूसरों की बदबू से बचो। अपनी मन की ही चालबाजी से बचो। कब तक मन के गुलाम बने रहोगे ? Nothing is impossible. Everything is possible. असंभव कुछ नहीं, सब कुछ संभव है। जब वालिया लुटेरा वाल्मीकि ऋषि बन सकता है तो तुम मालिक के प्यारे नहीं बन सकते ? मालिक के प्यारे नहीं बनोगे तो हम आपको मार से, प्यार से, पुचकार से भी मालिक के प्यारे बनाएँगे। आप जाओगे कहाँ ? हम आपको उस आनंदस्वरूप आत्म-सागर में बहाकर ले जाएँगे। आप स्वयं रस-स्वरूप बन जाओगे। बन क्या जाओगे, हो ही यह जान लोगे। वह अच्छा न लगे तो चाहे वापस लौट आना पर एक बार हम ले अवश्य जाएंगे।
कर्षति आकर्षति इति कृष्णः। जो आकर्षित कर ले, खींच ले, आनन्दित कर दे उसका नाम है कृष्ण।
भगत का मतलब यह नहीं कि मौका आने पर 'अपना क्या ?' करके कर्त्तव्य से फिसल जाय। नहीं। आप अपना कर्त्तव्य पूरा करो।
ऑफिस जाओ तो ऑफिस का काम करो कि प्रजाजनों के समय-शक्ति का ह्रास न हो। उनको धक्के खाने पड़े ऐसे टालमटोल काम नहीं करो। कामचोर होकर अपनी शक्तियों का नाश मत करो।
दुकानदारी करते हो तो ग्राहक के साथ ऐसा बढ़िया व्यवहार करो कि बस...। फिर उसकी ताकत है कि दूसरी जगह जाय ! सबकी गहराई में परमात्मा देखकर कार्य करो।
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पैठण में एकनाथ जी महाराज हो गये। वे जब दस-बारह साल के थे तब देवगढ़ गये और दीवान साहेब जनार्दन स्वामी के शिष्य बने।
जिस आदमी का कोई सदगुरु नहीं उस आदमी जैसा अभागा दुनियाँ में मिलना मुश्किल होगा। जो निगुरा है, चाहे दुनियाँ की सारी विद्याएँ जानता हो, बाल की खाल उतारता हो, बड़ा वैज्ञानिक हो, 'सब कुछ जानता हो फिर भी जिसके जीवन में कोई सदगुरु नहीं है वह शिक्षित हो सकता है, दीक्षित नहीं।
जिसके जीवन में दीक्षा नहीं है वह चाहे लोगों की नज़रों में कितने भी ऊँचे पहाड़ों पर रहता हो पर भीतर में असन्तुष्ट होगा, दुःखी होगा। जो दीक्षित है वह चाहे रमण महर्षि जैसा हो, रामकृष्ण जैसा हो, कौपीन का टुकड़ा धारण करने वाला जड़भरत या तो शुकदेव जैसा हो, वह ईश्वर के साथ खेलनेवाला होता है, भीतर से पूर्ण तृप्त रहता है।
नन्हा सा बालक एकनाथ रात्रि को उठा, चुपके दरवाजा खोला, दादा-दादी को सोते हुए छोड़कर घर से निकल गया। पैदल चलकर देवगढ़ पहुँचा। वहाँ के दीवान साहब जनार्दन स्वामी के चरणों में जा पहुँचा। दीवान साहब ने कहाः
"मैं तो किसी को शिष्य नहीं बनाता।"
"महाराज ! आप भले शिष्य नहीं बनाते मगर मैं आपको गुरुदेव के रूप में स्वीकार करके दीक्षित होना चाहता हूँ।"
दीक्षा का अर्थ क्या है ? दी = जो दिया जाता है। क्षा = जो पचाया जाता है।
सत्यं ज्ञानं अनन्तं ब्रह्म का सामर्थ्य जो दे सकते हैं वे 'दी' की जगह पर हैं और उस सामर्थ्य को जो पचा सकता है वह 'क्षा' की जगह पर है। इन दोनों का जो मेल है उसे दीक्षा कहते हैं।
'गुरु' का मतलब क्या ? गु = अन्धकार। कई जन्मों में हमारे स्वरूप पर अविद्या का अन्धकार पड़ा है। 'रू' = प्रकाश। अविद्या के अन्धकार को आत्मज्ञान के प्रकाश से जो हटा दें उनका नाम गुरु है। कान फूँककर, कंठी बाँधकर दक्षिणा छीन ले उसका नाम गुरु नहीं है। वह कुलगुरु हो सकता है, सांप्रदायिक गुरु हो सकता है। सच्चे गुरु तो वे हैं जो तुम्हारी अविद्या को मिटाकर तुम्हें अपनी महिमा में जगा दें।
कबीर जी ने कहाः
कबीरा
जोगी जगत गुरु
तजे जगत की
आस।
जो
जग का आशा करे
तो जग गुरु वह
दास।।
जो जगत की आशा से रहित है, संसार के पदार्थों की आसक्ति से मुक्त है, अनपेक्षः है वह सच्चा गुरु है। जो जगत की आशा करता है वह तो जगत का दास है और जगत उसका गुरु है।
जिसके जीवन में ऐसे गुरु आ जाते हैं उसका उद्धार तो हो ही जाता है, उसकी निगाहों में आनेवाला भी निष्पाप हो जाता है। जो सच्चे महापुरुष हैं उनके दर्शन से, उनको छूकर आनेवाली हवा के स्पर्श से भी हमें हृदय में तसल्ली मिलने लगती है। ऐसा अनुभव करनेवाले बोलते भी हैं-
तुम
तसल्ली न दो,
सिर्फ बैठे ही
रहो....।
मेहफिल
का रंग बदल
जाएगा।
गिरता
हुआ दिल भी
सँभल जायगा।।
हे गुरुदेव ! आप आश्वासन न दो, प्रवचन न करो, केवल हमारे समक्ष विराजमान रहो.... आपका दीदार होता रहे.... बस। दर्शन मात्र से हमें बहुत-बहुत लाभ होता है।
अपेक्षाओं में, कामनाओं में, चिन्ताओं में, भय में, ग्लानि में, घृणा में, राग-द्वेष में, लोभ-मोह में हमारा दिल गिर रहा है। पूर्ण बोधवान आत्मवेत्ता सदगुरुदेव को देखते ही हमारा गिरता हुआ दिल सँभलने लगता है।
बालकर एकनाथ ने दीवान साहब को रिझाया। दीवान साहब ने कहाः "मैं तो राजा का नौकर हूँ। देवगढ़ के राजा साहब का मैं दीवान हूँ। तू किसी साधु-सन्यासी का चेला हो जा।"
"महाराज ! साधयन्ते परं कार्यं इति साधु। जिसने परम कार्य साध लिया है वह साधु है। आपने परम कार्य साध लिया है देव ! मुझे अपनी शरण में रहने दो।"
सदगुरु ने बालक एकनाथ को शरण में रख लिया। एकनाथ जी वर्षों तक गुरु की सेवा में रहे। वे हर समय कुछ न कुछ सेवा ढूँढ लेते थे। बड़ी तत्परता से, बड़े चाव से, उत्साहपूर्वक सेवा करके अपना समय सार्थक कर लेते थे। हररोज प्रभात काल में दीवान साहब ध्यानमग्न जो जाते तब एकनाथ जी द्वार के बाहर चौकीदार बनकर खड़े हो जाते ताकि कोई गुरुदेव के ध्यान में विक्षेप न डाले। गुरु महाराज स्नान करते तब एकनाथ जी रामा बन जाते, मौसम के अनुसार गर्म या ठण्डा पानी रख देते। कपड़े ला देते गुरुदेव के उतरे हुए कपड़े धो लेते। गुरु महाराज बेटा स्कूल जाता तो सेवक बनकर एकनाथ जी उसे छोड़ने और लेने जाते। दीवान साहब ऑफिस का काम करते तब एकनाथजी मेहता जी बनकर सेवा में जुट जाते। हर समय सेवा खोज लेते।
जिन
सेव्या तिन
पाया मान.....।
सेवक को सेवा में जो आनन्द आता है वह सेवा की प्रशंसा से नहीं आता। सेवा की प्रशंसा में जिसे आनन्द आता है वह सच्चा सेवक भी नहीं होता।
आप अपनी सेवा, अपना सत्कर्म, अपना जप-तप, अपनी साधना जितनी गुप्त रखोगे उतनी आपकी योग्यता बढ़ेगी। अपने सत्कर्मों का जितना प्रदर्शन करोगे, लोगों के हृदय में उतनी तुम्हारी योग्यता नष्ट होगीष लोग बाहर से तो सलामी कर देंगे किन्तु भीतर समझेंगे कि यह तो यूँ ही कर दिया। कोई नेता बोलेगा तो लोग तालियाँ बजाएँगे, फिर पीछे बोलेंगे, यह तो ऐसा है। संत महापुरुषों के लिए ऐसा नहीं होता। महात्मा की गैरहाजरी में उनके फोटो की, प्रतिमाओं की भी पूजा होती है।
हम अपने श्रोताओं को यह सब क्यों सुना रहे हैं ? क्योंकि उन्हें जगाना है। मैं तुम लोगों को दिखावे का यश नहीं देना चाहता। वास्तविक यश के भागी बनो ऐसा मैं चाहता हूँ। इसीलिए सेवाधर्म के संकेत बता रहा हूँ।
अब वापस देवगढ़ चलते हैं।
प्रातःकाल का समय है। दीवान साहब जनार्दन स्वामी अपने ध्यान-खण्ड में समाधिस्थ हैं। बाहर एकनाथ जी सतर्क होकर पहरा दे रहे हैं। इतने में देवगढ़ के राजा का संदेशवाहक आदेशपात्र लेकर भागता-भागता आ पहुँचा। शीघ्रता से दीवान साहब के पास जाने लगा तो एकनाथ जी गर्ज उठेः "रूको।"
"अरे क्या रुकना है ? अभी राजा साहब को दीवान जी की खास जरूरत है, शत्रुओं ने अपने नगर पर घेरा डाला है। तोपों की आवाज आ रही है, सुनते नहीं ? राजा साहब ने दीवानजी को तत्काल बुलाया है। फौजी लोग दीवान साहब को खूब मानते हैं। वे संकेत करेंगे तो फौज में प्राणबल आ जायेगा। अपने गुरुजी को जल्दी बुलाओ।"
"नहीं....अभी नहीं। गुरुदेव अभी राजाओं के राजा विश्वेश्वर से मिले हैं। अभी उनको राजाजी का आदेशपत्र नहीं पहुँचेगा।"
"अरे बच्चा ! तू क्या करता है ? कैसी विकट परिस्थिति....।"
"कुछ भी हो, मैं अपने कर्त्तव्य पर दृढ़ हूँ। चाहे कोई भाला भोंक दे, मैं अपने निश्चय से च्युत नहीं होऊँगा।"
"ऐ बालक ! मैं बहुत जल्दी में हूँ। अपने नगर पर खतरा है। समय गँवाया तो संभव है शत्रुओं का दल नगर को खेदान-मैदान कर देगा। तू जल्दी मुझे दीवानजी से मिलने दे।"
"मेरे गुरुदेव से अभी कोई नहीं मिल सकता।" एकनाथजी अपने कर्त्तव्य में दृढ़ रहे।''
"अरे छोकरा ! "गुरु.... गुरु..." करके कब तक समय बिगाड़ता रहेगा ? तेरे गुरु तो राजा साहब के नौकर हैं।" दूत अब व्याकुल होने लगा था।
"नौकर तो गुरुदेव का शरीर हो सकता है। मेरे गुरु तो जो अनंत अनंत ब्रह्मांड के स्वामी हैं वहाँ पहुँचे हैं। मेरे गुरुदेव के लिए तुम क्या बोलते हो ?"
"अरे पगले ! तू समय को नहीं पहचान रहा है ? मैं राजा साहब का खास आदमी हूँ और दीवानजी राजा साहब के वहाँ काम करते हैं। उनके लिए मैं राजा साहब का परवाना लाया हूँ। शीघ्रातिशीघ्र उन्हें ले जाना है। राज्य पर खतरा है। सुन, तोपों की आवाज आ रही है। तू पागलपन करेगा तो नहीं चलेगा। ले यह परवाना। मैं तो जाता हूँ। अब तेरी जिम्मेदारी है।" दूत रवाना हो गया।
परवाना हाथ में उलट-पलटकर एकनाथजी सोचने लगेः "अब क्या करना चाहिए ? गुरुदेव ! अब आप ही प्रेरणा कीजिये। अगर मैं आपको जगाता हूँ तो आपके मन में होगा कि इतनी-सी सेवा नहीं कर पाया ? अगर नहीं जगाता हूँ तो बाद में आपको होगा कि अरे नादान ! जब राज्य के कल्याण का प्रश्न था, सुरक्षा का प्रश्न था तो मुझे जगाकर कह देता ? राज्य पर शत्रुओं ने घेरा डाला और तू ऐसे ही बैठा रहा चुपचाप, मुझे बताया तक नहीं ? बस, यही है तेरी सेवा ? गुरुदेव....! गुरुदेव....!! अब मैं व्यवहार में कैसे दक्ष बनूँ ? आपको जगाता हूँ तो भी और नहीं जगाता हूँ तो भी मेरी अदक्षता ही सिद्ध हो सकती है। मैं क्या करुँ मेरे प्रभु ?"
आपके जीवन में भी ऐसा प्रश्न आएगा ही। इन इतिहासों की कथाओं के साथ हमारे जीवन की कथाएँ भी जुड़ी हैं। कोई भी कथा तुम्हारे जीवन की कथा से नितान्त अलग नहीं हो सकती। चाहे वह कथा रामजी की हो या श्रीकृष्ण की हो, देवी-देवता की हो या फरिश्ते की हो, जोगीश्वर की हो या झुलेलाल की हो, उन कथाओं के साथ तुम्हारे जीवन की कथा भी मिलती जुलती है। इन सारी कथाओं से सार लेकर तुम्हें अपने जीवन की कथा सुलझाना है।
एकनाथ जी भीतर ही भीतर गुरुदेव से मार्गदर्शन पाने के लिए पूछ रहे हैं, आर्तभाव से प्रार्थना कर रहे हैं, व्याकुल हो रहे हैं। आँखों से टप....टप... आँसू बह रहे हैं। "नाथ ! अब बताओ, मैं क्या करूँ.... मैं क्या करूँ ?"
भावपूर्वक भगवान से प्रार्थना की जाय, हृदयपूर्वक गुरुदेव से प्रार्थना की जाय तो तुरन्त सुनी जाती है। ऐसा जरूरी नहीं कि प्रार्थना में कोई खास शब्द-रचना होनी चाहिए, प्रार्थना श्लोकबद्ध हो, दोहे-चौपाई में हो, कोई विशेष भाषा में हो। नहीं। प्रार्थना कैसे भी की जाय लेकिन अपने हृदय के निजी भाव से रंगी हुई हो, दिल की गहराई से की हुई तो वह तुरन्त सुनी जाती है।
एकनाथजी ने हृदयपूर्वक प्रार्थना की और रोये।
संसारी संसार के लिए रोता है जबकि प्रभु और सदगुरु का प्यारा प्रभु के लिए, सदगुरु के लिए रोता है।
एकनाथ जी रोये। हृदय से प्रार्थना की धारा चली, आँखों से आँसुओं की धारा चली। फिर आँखे बन्द हो गई, थोड़ी देर शांत हो गये। गुरुतत्त्व का संस्पर्श हो गया। कुछ तसल्ली मिल गई। आँखें खोली। सामने देखा तो गुरुदेव जिन वस्त्रों को धारण करके फौज की सलामी लेने जाते थे वे वस्त्र टँगे हुए हैं। एकनाथजी के चित्त में चमकारा हुआ, कुछ युक्ति हाथ लग गई। मुख पर एक विलक्षण दीप्ति छा गई। वे उठे, गुरुदेव के वस्त्र पहन लिए, घोड़े पर छलांग मारी और पहुँच गये फौजियों के समक्ष। उनको हिम्मत देते, उनका उत्साह जगाते हुए, उनकी देशभक्ति को प्रकटाते हुए बोलने लगेः
"ऐ देश के वीर जवानों ! अपनी मातृभूमि पर शत्रुओं ने आक्रमण किया है। आज मातृभूमि के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने का मौका आया है। देखते क्या हो ? टूट पड़ो आततायी नराधमों पर। विजय हमारी ही है। सदा धर्म की जय होती आयी है। अधर्मी लोग चाहे हजारों की संख्या में हों लेकिन धर्मवीर अगर धर्म में डटकर कर्त्तव्य लगे रहे तो ईश्वरीय शक्ति उन वीरों के लिए कार्य करेगी। पांडव पाँच ही थे, कौरव सौ थे फिर भी धर्म के पक्षकार पाँच पांडव विजयी बने। कौरव-कुल नष्ट-भ्रष्ट हो गया।
क्या अपने पास साधन कम हैं ऐसा सोचकर झिझकते हो ? ऐ बहादुर जवान ! जरा सोचो तो सही ! लंकापति रावण का मुकाबलता करते समय रामजी के पास कौन-सा बड़ा सैन्य था ? वे धर्म के लिए युद्ध खेल रहे थे तो रीछ और बन्दरों ने उनके लिए कार्य किया।
क्रियासिद्धि
सत्वे भवति
महतां
नोपकरणे।
महान् वीरों का विजय अपने सत्त्व के कारण होता है, साधनों के कारण नहीं।
आज हमें अपनी माँ-बेटियो की सुरक्षा के लिए, अपनी मातृभूमि की सुरक्षा के लिए हिम्मत जुटाना है। 'बहुजनहिताय बहुजनसुखाय' हमें अधर्मी दुष्टों का मुकाबला करना है। अपने स्वार्थ के लिए नहीं, समष्टि हित के लिए समरांगण में कूद पड़ना है। ईश्वर का अनंत बल हमारे साथ है, डरो नहीं।"
जो
तो को काँटा
बोए वा को बो
तू भाला।
वो
भी क्या याद
करेगा पड़ा था
किसी से
पाला।।
"ऐ वीर जवानों ! शस्त्र-सज्ज होकर निकल पड़ो धर्मयुद्ध खेलने के लिए।"
फौजी जवानों को आज दीवान साहब का शौर्यपूर्ण कुछ विलक्षण स्वरूप दिखाई दिया। ललकार सुनकर वे बहादुर जवान शत्रु सेना पर टूट पड़े और उसे तहस-नहस करके मार भगाया।
तुम अगर ब्रह्मविद्या के पथिक हो, ईश्वर के मार्ग पर चल रहे हो, सत्य की तरफ चल रहे हो तो वातावरण तुम्हारे अनुकूल आज नहीं कल होकर रहेगा। तुम डरो नहीं।
ऐसे नेताओं को मैं जानता हूँ जिनके झुण्ड के झुण्ड एम.पी. और एम.एल.ए. हाथ में थे। उनके पुण्य क्षीण हो गये तो कुर्सी से हटाये गये, दूसरे लोग आ गये और मुख्य मंत्री बन गये।
मैं ऐसे लोगों को भी जानता हूँ कि जो जेल में थे और समय पाकर राष्ट्रपति बन गये। ऐसे लोगों को भी हम सब जानते हैं जिन पर घोर अन्याय हो रहा था, बार-बार जेल में डाल दिये जाते थे फिर भी धर्म को पकड़े रहे वे समय पाकर राष्ट्रपिता होकर आदर पाने लगे।
आपके अन्दर ईश्वर का असीम बल छुपा है भैया ! आप डटे रहो अपनी निष्ठा में, अपने धर्म में, अपने कर्त्तव्य कर्म में। लगे रहो सत्कर्म में। अपनी निष्ठा छोड़ो मत। ऐसा नहीं कि गंगा गये तो गंगा दास.... यमुना गये तो यमुनादास... नर्मदा गये तो नर्मदा शंकर....। गये बिहार तो हो गये बिहारी लाल के।
अपनी आत्म-निष्ठ का भरोसा करो।
जिसके जीवन में आत्मज्ञान पाने का सर्वोच्च लक्ष्य नहीं है वह इधर-उधर के झोंकों में उलझ जायेगा।
शिवजी की पूजा करो लेकिन शिवतत्त्व को अपने से भिन्न मानकर नहीं। शिवजी की दृष्टि में समानता है। उनके दरबार में परस्पर जन्मजात शत्रु प्राणी भी शांत भाव से बैठते हैं। तुम अपने जीवन में समानता लाओ तो शिवजी तुम्हें प्रसन्न मिलेंगे।
हिलाने वाली परिस्थितियाँ तो आयेंगी, पर तुम दक्ष रहो।
अपनी फौज की विजय हो गई। एकनाथ जी वापस लौट आये। अपने साधारण वेश में पुनः चौकीदार बैठ गये, मानो कुछ हुआ ही न हो। नगर के लोगों में चर्चा हो रही थीः
"अरे भाई ! दीवान साहब जनार्दन स्वामी धन्य हैं ! आज तो उनका निराला ही रूप देखने को मिला। जवान की नाईं बोल रहे थे। फौज को ऐसा उत्साहित किया कि जवानों में प्राणबल उमड़ पड़ा। अपनी विजय हो गई।"
लोग रास्ते में जाते-जाते इस प्रकार की बातें कर रहे थे और कमरे में बैठे-बैठे जनार्दन स्वामी सुन रहे थे। वे बाहर निकले, लोगों से जानकारी प्राप्त की। उनको आश्चर्य हो रहा था कि मैं तो कमरे में ही बैठा था। यह कैसे हुआ ?
आकर एकनाथजी से पूछा तो एकनाथजी प्रणाम करते हुए विनीत भाव से कहने लगेः
"क्षमा करें गुरुदेव ! आपकी आज्ञा के बिना आपके वस्त्रों का मैंने उपयोग किया। राजा साहब के वहाँ से दूत परवाना लेकर आया था, आप समाधि में थे और....।"
एकनाथजी ने सारी बात बताकर आखिर में फिर से क्षमा माँगते हुए कहाः "स्वामी ! मुझसे कुछ अनुचित हो गया हो तो क्षमा करना नाथ !"
"नहीं बेटा ! तू व्यवहार में दक्ष है। शाबाश ! बहुत अच्छा किया तूने। मैं प्रसन्न हूँ।"
दिन बीतते गये। एकनाथ जी की सेवा जोर पकड़ती गई। वर्ष के आखिरी दिन आये। दीवानजी को राज्य के हिसाब की बहियाँ पेश करनी थी। उसमें कुछ गलती रह गई थी। दीवानजी ने एकनाथ जी से कहाः
"बेटा ! जरा जाँच करना, हिसाब तो ठीक है न !"
"जी गुरुदेव !"
एकनाथजी ने हिसाब देखते-देखते पूरा दिन लगा दिया और तो सब ठीक था लेकिन एक पाई की भूल आ रही थी। कहाँ गड़बड़ थी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। एकनाथजी लगे रहे। शाम ढली। रात्रि का प्रारंभ हुआ। सर्वत्र अंधेरा छा गया। फिर भी खाना पीना भूलकर एकनाथ लगे हैं हिसाब के पीछे। नौकर कब दीया रख गया, कुछ पता नहीं। मध्यरात्रि हुई फिर भी हिसाब पूरा नहीं जमा।
ब्रह्ममुहूर्त हुआ। गुरुदेव जागे। दैनिक नियमानुसार एकनाथ दिखे नहीं। जनार्दन स्वामी ने सोचाः दिन में दसों बार दर्शन करनेवाला एकनाथ कल से दिखता नहीं। क्या बात है ! गुरुजी गये कमरे में तो दीपक जल रहा है। एकनाथ बहियों के ढेर के बीच बैठा है, हिसाब जाँचने में मशगूल होकर। गुरुदेव पधारे फिर भी कुछ पता नहीं। दीवान साहब दीये का प्रकाश रोकते हुए खड़े रह गये। अक्षरों पर अन्धेरा छा गया फिर भी हिसाब में एकाग्र एकनाथ को सब कुछ ज्यों का त्यों दिख रहा था।
इतने में पाई की भूल पकड़ में आ गई। हिसाब सुलझ गया। एकनाथ खुश होकर बोल उठेः
"मिल गई..... मिल गई.....!"
"क्या मिल गई बेटा ?"
अरे ! यह तो गुरुदेव की आवाज ! एकनाथ ने ऊपर देखा तो गुरुदेव स्वयं खड़े हैं।
"गुरुदेव ! आप....?"
"अरे ! मैं तो आधे घण्टे से यहाँ खड़ा हूँ।"
"मुझे पता नहीं चला नाथ ! आपकी दी हुई सेवा में निमग्न था, आपके दर्शन नहीं कर पाया। एक पाई की भूल आ रही थी हिसाब में। अब वह मिल गई।"
"बेटा ! एक पाई की भूल के लिए रात-दिन लगा रहा खाये-पिये बिना ?"
"गुरुदेव ! भूल एक पाई की हो चाहे लाख रुपये की हो। भूल तो भूल ही है। आपने भूल निकालने के लिए कहा था तो मैं भूल को कैसे रहने दूँ ?"
मुनीम बनो तो ऐसे बनो। अपने कर्त्तव्य में चुस्त। आज का काम कल पर रखा तो कल का काम परसों पर चला जायेगा। एक सप्ताह में तो चढ़े हुए काम का ढेर हो जाएगा। वह काम का बोझ दिमाग में 'टेन्शन' पैदा करेगा।
व्यवहार में दक्ष बनो। इस काम के बाद वह काम करना है, उसके बाद यह। एक बार संकल्प करके आप संकल्प के मुताबिक काम कर लेते हैं तो आपकी योग्यता बढ़ने लगती है। एक बार संकल्प करके उसके मुताबिक आप काम नहीं करते तो मन आलसी और दुर्बल हो जाता है। आप पर हावी हो जाता है और अपनी गुलामी में पीसता रहता है। इस गुलामी से छूटने के लिए पहले सत्संकल्प करो और फिर डटकर उस संकल्प के मुताबिक कार्य पूर्ण करो। दक्षता बढ़ाओ।
एकनाथ जी का जवाब सुनकर गुरुमहाराज का हृदय बरस पड़ा। उसके नयनों से ईश्वरीय कृपा का प्रपात एकनाथ जी के हृदय में हो गया। सदगुरु और सत्शिष्य एकाकार बन गये। सत्शिष्य निहाल हो गया। वे कुछ समय के लिए आनन्दस्वरूप परमात्मा में खो गये, समाधिस्थ हो गये। गुरुदेव भी अधिकारी उर-आँगन में ईश्वरीय अमृत की वर्षा करके मानो आहलादित हो गये। अपना सारा आध्यात्मिक खजाना शिष्य के हृदय में उड़ेलते हुए मधुर वाणी से बोलेः
"एकनाथ ! बेटा ! यह तेरे अकेले के लिए नहीं दिया है। लोग विषय-विकारों में और मनःकल्पित साधनों में समय बरबाद कर रहे हैं। दिल के देवता का पता ही नहीं। अब तू समाज में विचर। लोगों को दिल के देवता की तरफ आकर्षित कर। आध्यात्मिक खजाने का अमृत उनको चखा।"
एकनाथजी तीर्थों में लोगों को आंतर तीर्थ की खबर देते, आत्म-तीर्थ में स्नान करने की विधि का प्रचार करते हुए आखिर पैठण में स्थिर हुए। अपने घर के प्रांगण में ही कथा-सत्संग करना शुरु किया। प्रारंभ में पाँच सात व्यक्ति आये, फिर दस-पन्द्रह, बीस-पच्चीस-पचास-सौ-दौ सौ भक्त सत्संग सुनने आने लगे। घर का प्रांगण छोटा पड़ने लगा। खिले हुए मधुर फूल की सुगन्ध की तरह एकनाथ जी की ख्याति चहुँ ओर फैलने लगी। उनकी कथा में लोग आत्मरस के घूँट भरने लगे। टूणा-टोटका-तावीज करनेवाले पाखण्डी लोगों की ग्राहकी कम होने लगी।
एकनाथ जी आत्मवेत्ता संत थे। आत्मबल बढ़ाने की बात कहते थे। स्वावलंबी और स्वाधीन बनने की बात होने लगी।
जो दूसरों को गुलाम बनाता है वह स्वयं गुलाम बनता है। जो दूसरों को मूर्ख बनाता है वह स्वयं मूर्ख रहता है। जो दूसरों से धोखा करता है वह स्वयं पहले अपने दिल को ही धोखा देता है बाद में ही दूसरों से धोखा कर पाता है।
दूसरों को स्वतन्त्र बनाओ तो आप स्वतंत्र रहोगे। दूसरों को जितने पराधीन बनाओगे उतने ही आप पराधीन बने रहोगे। दूसरों को खीर खांड खिलाओगे तो आपकी भी खीर-खांड बढ़ती रहेगी। यह ईश्वरीय अकाट्य नियम है।
शक्कर
खिला शक्कर
मिले टक्कर
खिला टक्कर
मिले।
नेकी
का बदला नेक
है बदों की
बदी देख ले।।
दुष्ट लोग एकनाथ जी का विरोध करने लगे। कुप्रचार करने वालों की संख्या बढ़ गई। अच्छी बात फैलाने में समय, शक्ति चाहिए। गन्दी बात फैलाने में उतनी समय-शक्ति नहीं लगानी पड़ती। निम्न स्तर पर जीने वालों की संख्या सदा अधिक हुआ करती है। ऐसे लोगों की टोली बन गयी। टोली का लक्ष्य रहा कि एकनाथजी का प्रभाव कैसे तोड़ें। फैसला हुआ कि हररोज दो-चार लोग एकनाथ जी के सत्संग में पहुँच जाय और उनकी हिलचाल-चेष्टा का निरीक्षण करें। उनकी कुछ कमजोरी हाथ लग जाय तो उसका कुप्रचार करें।
एकनाथ जी जब सत्संग करते तो प्रारंभ में अपने प्रियतम परमात्म-भाव में गोता, लगाते, सबमें बसे हुए अपने सर्वव्यापक ईश्वर से एकता का स्मरण कर लेते। सब श्रोताओं में बसे हुए ईश्वर का स्मरण करके, सबमें अपने आपका अनुसंधान करके जो स्वागत किया जाता है इससे बढ़कर और कोई स्वागत नहीं होता। 'फलाने मिनिस्टर का स्वागत करता हूँ, फलाने बाबा का स्वागत करता हूँ....' ऐसा कहकर जो मौखिक स्वागत किया जाता है उससे बढ़िया स्वागत यह है कि उनमें छुपे हुए सर्व व्यापार परमात्म चैतन्य को प्रणाम करके एक अद्वैत तत्त्व में गोता लगाकर जाय। यह सबसे बढ़िया स्वागत है।
मैं आपका ऐसा स्वागत हररोज करता हूँ ऐसा मुझे लगता है। एकनाथ जी महाराज भी अपने श्रोताजनों का ऐसा ही स्वागत किया करते थे। सबका ऐसा स्वागत करते थे तो जो चंड लोग थे उनका भी तो स्वागत हो जाता था। संत की नज़रों में वे चंड नहीं थे। संसार के व्यवहारु लोगों की नज़रों में वे चंड थे, सज्जनों की नज़रों में वे चंड थे। संत की नज़रों में उनमें भी अपना राम छुपा था।
एकनाथ जी महाराज के सत्संग में एक प्रतिभा-सम्पन्न महिला आया करती थी। गौरवर्ण देह, घुंघराले बाल, सफेद साड़ी, रत्नजड़ित गहने, आकर्षक तेजस्वी व्यक्तित्व। वह महिला मानो कोई अतिमानवीय हस्ती थी। सबसे आगे आकर बैठती थी।
कथा-प्रसंग में कोई विशेष महत्त्वपूर्ण बात आती तो एकनाथ जी उस महिला की ओर निहारते हुए बात बताते, गहरी बातों की अमृतधारा बहती। एक सामान्य नियम है कि जो विद्यार्थी ठीक से ध्यानपूर्वक सुनता हो, समझता हो उसकी तरफ अध्यापक भी अधिक ध्यान देता है, उसी को लक्ष्य करके सिखाता है। जो श्रोता एकाग्र होकर सुनता है उसकी ओर वक्ता की दृष्टि बार-बार जाती ही है।
चंड लोगों ने नोट कर लिया कि संत उस महिला की तरफ बार-बार निहारते हैं। वह महिला भी सबसे आगे जाकर बैठती है। दाल में कुछ काला है।
एक दिन कथा सुनकर महिला बाहर निकली तो चंड लोगों ने उसका पीछा किया। ऐसे लोग जैसा गुंडागर्दी का आचरण करते हैं वह सब वे पीछे-पीछे जाते हुए करने लगे। ऐसी-वैसी बातें बकते गये और वह महिला उनकी उपेक्षा करके अपना रास्ता तय करती गई, गोदावरी नदी की ओर आगे बढ़ती गई। चंड सोचने लगे कि नदी के उस पार कोई बंगला-महल होगा वहाँ रहती होगी।
महिला गोदावरी के तीर पहुँची, पानी में उतरी, कमर तक पानी में गई तब भी दुष्टों को कोई अन्दाज नहीं आ रहा था कि क्या हो रहा है। वे तो बक रहे थेः
"वहाँ कहाँ मरने जा रही है ? " एक बोला।
"मेरे घर में ही चली आ...।" दूसरे ने कहा।
"मेरी लुगाई हो जा मैं सुखी कर दूँगा....।" तीसरे ने अपना पापीपना प्रकट किया।
इस प्रकार न जाने क्या-क्या बकते रहे और महिला गहरे पानी में आगे बढ़ती रही। जब गरदन तक पानी आ गया तब ये चांडाल चौकड़ी घबड़ायी। सोचा कि अब वह मरेगी। उसकी आत्महत्या हमारे सिर पर पड़ेगी। इतने में तो वह महिला पानी में अदृश्य हो गई।
अब चंड लोग आपस में लड़ने लगे कि तूने गालियाँ दी, तूने ऐसा-वैसा कहा इसलिए वह मरी। आपस में लड़ाई-टंटा करने लगे तो दूसरे चंड लोग भी आ पहुँचे। किसी ने सलाह दी कि आपस में लड़ोगे तो मारे जाओगे, बेमौत मारे जाओगे। तुम सब मिलकर घोषणा कर दो कि एकनाथ जी महाराज ने माई को कुछ ऐसा-वैसा कह दिया कि माई ने बुरा मानकर गोदावरी नदी में डूबकर आत्महत्या कर ली। अपना काम बन जायगा।
चंड लोगों की मंडली ने ऐसा ही किया। जनता को किसी के बारे कोई अच्छी बात सुनाओगे तो उसे सन्देह होगा कि यह ऐसा होगा कि नहीं परन्तु कोई बुरी बात सुनायी जायगी तो लोग तुरन्त स्वीकार कर लेंगे कि हाँ, यह सच्ची बात है। इन बाबा लोग का क्या भरोसा? समाज में बाबा लोग, संत-महात्मा लोग यदा कदा बदनाम हुआ करते हैं।
भारत के सच्चे संत-महात्मा लोग नहीं होते न, तो संसार में जो कुछ शांति दिखती है, थोड़े बहुत आनन्द की झलक दिखती है वह भी नहीं होती। सचमुच, जो आत्मज्ञानी, ब्रह्मवेत्ता महापुरुष हैं वे हमारे सच्चे माई-बाप हैं। उन्होंने तो हमें जीवनदान दिया। भारत में अगर सच्चे संत न होते तो हमारी अभी तो न जाने कैसी बुरी दशा होतती। स्वामी रामतीर्थ कहते थेः
"अभी भी दुनियाँ में थोड़ी भी रौनकर दिखती है वह भी ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के कारण दिखती है।"
एकनाथजी महाराज के विषय में कुप्रचार किया गया। दूसरे दिन कथा के समय उनका प्राँगण ही नहीं गलियाँ भी लोगों से भर गईं। एकनाथ जी महाराज सत्संग करने व्यासपीठ पर बिराजे। आँख बन्द करके परमात्मा में गोता लगाकर बोलना प्रारंभ करने को ही थे इतने में वह कलवाली महिला आकर अपनी नियत जगह में बैठ गई। चंड़ों की टोली में हिलचाल मच गई। आपस में गुसफुस होने लगीः 'अरे यार ! यही तो थी कल। वह नदी में.... और आज फिर यहीं वापस?' कुछ समझ में नहीं आ रहा था उनकी खोपड़ी को।
एकनाथ जी जब आँखें खोलकर बोलते तो लोग सावधान हो जाते, चुप होकर सुनने लग जाते और आँखें बन्द करते तो श्रोताओं में चंचलता आ जाती। संतश्री ने जान लिया कि आज की भीड़ कुतूहल-प्रिय है सत्संग-प्रिय नही है। चालू कथा में एकनाथ जी महाराज ने सबके दिल में चमकने वाले चैतन्य से तादात्म्य करके सारी हकीकत जान ली। कथा जब पूरी हुई तो वह महिला अदब से नमस्कार करने आयी। तब एकनाथ जी ने कहाः "माताजी....!"
सब लोग चौकन्ने होकर सुनने लगे थे कि क्या बात हो रही है। जब एकनाथजी के मुँह से "माताजी" शब्द निकला तो उन लोगों को दिल में धक्का लग गया कि अरे ! हम जो कुछ सोच रहे थे वह बात नहीं है।
एकनाथ जी कहने लगेः "माता जी ! मैंने ऐसा महसूस किया कि कल आपको अपने स्थान जाते समय रास्ते में बड़ा कष्ट सहना पड़ा ! आपकी बड़ी बेइज्जती हुई ! आपके साथ अन्याय हुआ है ऐसा मुझे लगता है।"
माताजी ने कहाः "महाराज ! हमने आपकी कथा को पचाया है। कोई कितना भी कुछ कहे, दुःखी न होना अपने हाथ की बात है।"
जब तक अपने हस्ताक्षर नहीं होते तब तक मजाक उड़ाने वाले सफल नहीं हो सकते। आप जब अपने भीतर से गिरते हैं तब गिराने वाले सफल होते हैं। यह बिल्कुल सच्ची बात है।
जग
में वैरी कोई
नहीं जो मनवा
शीतल होय।
सुखी-दुःखी होना आपके हाथ की बात है। आप बहुत स्वतन्त्र हैं। भगवान स्वतन्त्र हैं तो भगवान का प्यारा जीव भी स्वतन्त्र हैं, आप जाग्रत जगत देखकर हटा देते हो, स्वप्न देखकर हटा देते हो, सुषुप्ति देखकर हटा देते हो। सुख आता है हट जाता है, दुःख आता है हट जाता है। आप वही के वही दृष्टा, साक्षी, स्वतन्त्र मौत आई, चली गई। मौत अगर आपको मारती तो हजारों बार मौत हुई। फिर आप अभी यहाँ कैसे होते ? मौत आपकी नहीं होती, शरीर की होती है। मौत आपको छू नहीं सकती, आप ऐसे स्वतन्त्र हो। लेकिन... पता नहीं है, अपनी समझ नहीं है।
वह महिला एकनाथजी महाराज से कहने लगीः
"हर स्थिति में चित्त की समता रखना आपने सिखाया है। लोगों ने अपमान किया तो मैंने मन से सोचा कि अपमान तो देवता है। अपमान अपने को देहासक्ति से छुड़ाकर निजस्वरूप में जगाता है। अपमान होता है देह का। देह नश्वर है और मैं देह नहीं हूँ। तो मेरा क्या बिगड़ा ? अपमान की हवा लगी देह को। मैंने बढ़िया विचार करके इसको काट दिया।"
आपके विचार बढ़िया होंगे तो अपमान को, विघ्नों को, प्रतिकूलताओं को आप साधना बना देंगे। आपके विचार अगर घटिया होंगे तो अपमान-विघ्न-बाधाएँ आप पर प्रभाव डाल देंगे। आप स्वामी बनेंगे तो ये सेवक हो जाएँगे। आप भोले रहेंगे तो ये अपमान, विघ्न-बाधाएँ, प्रतिकूलताएँ आदि आपके स्वामी बन जाएँगे और आपको कुचलेंगे।
आप एकदम भोला मत बनिये। देवाधिदेव भगवान शंकर को 'भोलेनाथ' कहा जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि वे भोले-भाले हैं, बेवकूफ हैं। जो निर्दोष भाव से उनको याद करते हैं उनके आगे वे दयानिधि प्रकट हो जाते हैं। ऐसे वे नाथ हैं। इसीलिए उनका नाम है भोलेनाथ। वे भोले थोड़े ही है ! जब तीसरा नेत्र खोलते हैं तब कामदेव जैसों को भस्म कर देते हैं, त्रिभुवन भुवन भंग कर देते हैं। वे बेचारे थोड़े ही हैं ! दया के पात्र थोड़े ही हैं भोलेनाथ !
भगवान भोले नहीं हैं तो भगवान के सच्चे भक्त भी भोले नहीं रह सकते।
भगत
जगत को ठगत है
जगत को ठगत न
कोई।
एक
बार जो भगत
ठगे अखण्ड
यज्ञ फल होई।।
नारदजी सच्चे भक्त थे। वालिया लुटेरा ने उनको एक बार ठग लिया, उनकी विद्या, उनका ज्ञान, उनकी कृपा आत्मसात कर ली, पचा ली तो वह वाल्मीकि ऋषि बन गया। कबीर जी सच्चे भक्त थे। सलूका मलूका ने सेवा करके उनका आध्यात्मिक खजाना पा लिया, उनको ठग लिया तो सलूका मलूका का बेड़ा पार हो गया। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य महान् भक्त थे, वे परमात्म-तत्त्व से रंच मात्र भी विभक्त नहीं थे। जिन्होंने उनको ठग लिया, उनका दिव्य खजाना स्वीकार कर लिया उनका बेड़ा पार हो गया।
सच्चे भक्त, सच्चे संत महापुरुष अपने को ठगवाने के लिए घूमते हैं, अपना मधुर, भव्य, दिव्य खजाना लुटाने के लिए घूमते हैं लेकिन आप लोग बड़े ईमानदार हैं। सोचते हैं कि संतों का खजाना क्यों लूटें ? नहीं...। नहीं....। आप लोग संतो का भीतरी खजाना लूट लेंगे तो बढ़िया रहेगा।
एकनाथ जी कहते हैं- "भगवती ! मैं अपना रहस्यमंत्री आपके साथ भेजूँ। आपको किनारे तक छोड़ आयेगा।"
"नहीं नहीं, कोई आवश्यकता नहीं महाराज ! जब तक आदमी का अपना मनोबल नहीं होता तब तक पहुँचाने वाले भी कहाँ तक रक्षा करेंगे ?"
कितनी सुन्दर बात है ! आपका मनोबल नहीं है तो रक्षक भी भक्षक बन सकता है। वह शोषण करने लग जाता है। इसलिए आपका दक्ष हो जाओ। छोटी-मोटी घटनाओं से अपने को प्रभावित मत होने दो, भयभीत मत करो। उन बातों से आप उदासीन हो जाओ ताकि मनःशक्ति का विकास हो जाये।
उदासीन का मतलब पलायनवादी नहीं। छोटे-मोटे आकर्षणों से उदासीन होकर मनःशक्ति को, बुद्धिशक्ति को बढ़ाने का मौका लेकर अपने साक्षी स्वरूप ब्रह्म में बैठना इसी का नाम उदासीन होना है।
एकनाथ जी ने कहाः "देवी ! तो ऐसा करें, मैं आपके किनारे आकर रोज आपको कथा सुनाया करूँ ?"
"नहीं महाराज ! "गोदावरी माता की जय....' करके लोग मुझमें गोता मारते हैं और अपने पाप मुझमें छोड़ जाते हैं। मैं लोगों के पापों से बोझिल हो जाती हूँ। फिर महाराज ! मैं नारी का रूप धारण करके आप जैसे आत्मज्ञानी ब्रह्मवेत्ता संत-महात्मा के द्वार पर एक-एक कदम चलकर आती हूँ तो पाप-ताप नष्ट हो जाते हैं। परमात्म-तत्त्व से छूकर आती हुई आपकी अमृतवाणी मेरे कानों में पड़कर मेरे हृदय का बोझा विच्छिन्न कर देती है। मुझे शीतलता मिलती है, आत्मशांति मिलती है। मुझे देखकर आप अपने ऊँचे अनुभव की बातें भी बताते हैं तो मेरे साथ अन्य लोगों को भी लाभ मिलता है। यहाँ बहुजनहिताय.... बहुजनसुखाय सत्संग हो रहा है और वहाँ मेरे किनारे पर आप संत पुरुष चलकर आवें, मुझ अकेली के लिए कष्ट उठाएँ यह मुझे अच्छा नहीं लगता। कृपा करके आप यहीं सत्संग चालू रखें। मैं आया करूँगी, अपने को पावन किया करूँगी। मुझे कोई कष्ट नहीं। आपका कथा अमृत पीकर अपने को निर्द्वन्द्व तत्त्व में जगाऊँगी।"
चांडाल चौकड़ी के लोग यह सुनकर दंग रह गयेः "अरे ! ये तो साक्षात् गोदावरी मैया ! लोगों के पाप हरकर पावन करने वाली भगवती गोदावरी माता स्वयं पावन होने के लिए एकनाथ जी महाराज की कथा में आती हैं ?.... और हम लोगों ने एकनाथ जी महाराज के लिए क्या-क्या सोचा और किया !
साक्षात् गोदावरी माता भी जिनके दर्शन करने और सत्संग सुनने आती है ऐसे महान् संत पुरुष के सत्संग दूषित भाव से आये, कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से बैठे तो भी हमें गोदावरी माता के दर्शन हो गये। कुभाव से आने पर भी संत-समागम से इतना फायदा होता तो सुभाव से आने वालों का तो बेड़ा पार हो जाय।"
कभी-कभी ब्रह्मज्ञानी संतों का सत्संग सुनने के लिए कई सूक्ष्म जगत की आत्माएँ भी आती हैं। आकाश में विचरने वाले सिद्ध भी गुप्त रूप से आ जाते हैं और तत्त्वेत्ता की वाणी सुनकर गुपचुप रवाना हो जाते हैं।
जो कष्ट सहन करता है उसको सिद्धि मिलती है। मैं आपको दो तीन घण्टे बिठा रहा हूँ। लगातार बैठकर, कष्ट सहकर सत्संग सुनते-सुनते आपकी भी सिद्धि हो रही है। पाप कट रहे हैं। पुण्य बढ़ रहे हैं।
अनपेक्षः
शुचिर्दक्षः
उदासीनो
गतव्यथः।
अब शब्द आता है गतव्यथः। व्यथा से रहित।
एक सेठ के चार बेटे थे। तीन तो सुबह जल्दी उठ जाते थे, चौथा आलसी-प्रमादी था। सूर्योदय होने के बाद देरी से उठता था। सेठ व्यथित हो जाते थे। आप बेटे को जल्दी उठाओ, नहीं उठे तो अपने हृदय को व्यथित मत करो। 'बेटा नहीं मानता... बेटी नहीं मानती.... बहू नहीं मानती.... यह नहीं होता.... वह नहीं होता...।' ऐसा करके छोटी-छोटी बातों में आप अपने हृदय को व्यथित कर देते हैं, व्यग्र कर देते हैं, शोकाकुल कर देते। व्यथित होना यह दक्षता से गिरना है। हृदय को व्यथित करने से अपनी ही शक्ति क्षीण होने लगती है। आप संतानों को अनुशासन में चलाओ। इसमें शास्त्र संमत है किन्तु आप व्यथित होकर अपने बच्चों, नौकरों को सुधारने लगोगे तो वे सुधरेंगे नहीं, बगावत नहीं करेंगे।
बाबाजी सेठजी के साथ कार में जा रहे थे। ड्राईवर ने एकदम से मोड़ ले लिया। सेठ जी ने उसे डाँटाः
"बदतमीज ! यह क्या कर रहा है ? अभी गाड़ी को ठोकर लग जाती ! हार्न बजाना चाहिए था !... " इत्यादि। आग-बबूला होकर सेठ जी बरस पड़े।
बाबाजी ने धीरे से कहाः "सेठजी ! यह क्या कर रहे हो ?"
"मैं इस कम्बख्त को सुधार रहा हूँ।"
"आप अपना दिल बिगाड़कर उसे सुधार रहे हो तो वह कैसे सुधरेगा ?"
आप अपना दिल मत बिगाड़ो। अपने को व्यथित करके किसी को सुधारेगा तो वह नहीं सुधरेगा।
पहले अपना दिल पावन कर लो, प्यार से भर लो, कल्याण से भर लो। दिल को व्यथा में मत भरो। प्यार से लोगों को सुधरने का मौका दो और परिणाम रूप फल की आशा मत करो। फिर देखो, ईश्वर क्या नहीं करवाता।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
12-13 साल का एक लड़का था रोहित। एक बार अपने बाप से साथ किसी ब्रह्मज्ञानी संत के दर्शन करने गया। सत्संग सुना तो उसे मजा आ गया। फिर संत श्री से मंत्रदीक्षा ली और घर आकर उत्साह पूर्वक गुरुजी के बताये अनुसार साधना करने लगा। क्रमशः उसका प्राणोत्थान हुआ, कुण्डलिनी शक्ति जागृत हुई। कभी गुरुदेव के श्रीरचरणों में पहुँच जाता, साधना में नये संकेत, नया प्रसाद पाकर वापस लौट आता। महीने बीते, साल बीतने लगे।
रोहित जब 18-19 साल का हुआ तो उसने गुरु जी के पास आना बंद कर दिया। महीने बीत गये। एक बार रोहित के गाँव के कुछ लोग उन महात्मा जी के दर्शनार्थ गये तो उन्होंने पूछाः
"तुम्हारे गाँव का वह रोहित आज कल नहीं दिखता, क्या बात है ?"
"गुरुजी महाराज ! रोहित की तो मंगनी हो गई है। अब उसकी शादी होने वाली है।" लोगों ने बताया।
"रोहित शादी करे, कोई बात नहीं। शादी करने का इन्कार नहीं है, बरबादी करने का जरूर इन्कार है। तुम लोग अपने गाँव जाओ तब रोहित से कहनाः गुरु महाराज ने याद किया है।"
"जी स्वामी जी।"
लोग शाम को गाँव पहुँचे। रोहित की तलाश की तो पता चला, रोहित की शादी हो रही है। पहुँचे लग्न-मण्डप में। सोचा कि गुरु महाराज का सन्देशा तो दे दें ! रोहित ने कन्या के साथ दो फेरे फिर लिये थे, तीसरा फेरा फिर रहा था और चार बाकी थे। तब गाँव वालों ने बताया कि हम गुरु महाराज के वहाँ गये थे। उन्होंने तेरे को याद किया है।
रोहित ने क्रिया-काण्ड करानेवाले गोर महाराज को कहाः
"पुरोहित जी ! रुक जाओ। शादी के फेरे तो मैं बाद में फिर लूँगा। पहले मेरे गुरुदेव का पैगाम लाने वालों की बात सुन लूँ।" गाँव वालों की ओर मुड़कर पूछाः
"आप लोग गुरु महाराज के वहाँ गये थे? गुरुदेव क्या बोले ?"
"गुरुदेव बोले कि शादी तो भले करना, मैं मना नहीं करता, पर आना क्यों बन्द कर दिया बेटे ? और गुरुदेव ने कहा है कि रोहित को बोलना, गुरुजी तेरे को याद कर रहे हैं। रोहित अगर मेरा शिष्य होगा तो वह समझ जायेगा।"
रोहित का हृदय गदगद हो गया। जिनके दिल में परमात्मा प्रकट हुआ है, जिनके दिल में अनन्त अखण्ड ब्रह्माण्ड-नायक सच्चिदानन्दघन चैतन्य परमात्मा हिलोरें ले रहा है, लोग जिनको याद करके पावन हो रहे हैं ऐसे मेरे गुरुदेव ने मुझे याद किया !!
रोहित शादी छोड़कर भागा। पुरोहित से कहता गयाः "मैं बाकी के फेरे बाद में फिरूँगा। शादी Cancel नहीं करता, अभी Postpone करता हूँ। मेर गुरुदेव का सन्देशा आया है, मैं रुक नहीं सकता।"
रोहित तत्काल गुरुदेव के गाँव जाने के लिए रवाना हो गया। शाम ढली, रात्रि हुई। रोहित चला रहा, भागता रहा। मध्यरात्रि होने को आई। गुरुदेव का गाँव काफी दूर था। रात्रि बिताने के लिए, थोड़ा विश्राम लेने के लिए रोहित को किसी गाँव की धर्मशाला में ठहरना पड़ा।
उसी धर्मशाला में कोई वेश्या ठहरी थी। रात्रि में बाथरूम जाने के लिए रोहित उठा तो वेश्या के रूप-लावण्य पर दृष्टि पड़ गई। परफ्यूम, सेन्ट, आदि की मादक सुगन्धी फैल रही थी।
इत्र, सेन्ट, परफ्यूम आदि कामुक उत्तेजना पैदा करते हैं। जो लोग इत्र आदि लगाकर पूजा में बैठते हैं, ध्यान-भजन करते हैं अथवा इत्र आदि लगाकर बारात में जाते हैं वे लोग अपने आपसे दुश्मनी करते हैं। डॉ. डायमंड कहते हैं कि इन चीजों से जीवन-शक्ति का ह्रास होता है। पाश्चात्य देशों में खोजबीन की जा रही है कि कौन से रसायनों से कैसे-कैसे बनाये हुए परफ्यूम्स से पुरुष की कामोत्तेजना उकसायी जा सकती है, कौन सा सेन्ट पुरुष को स्त्री के प्रति अधिक आकर्षित करता है। संक्षेप में, किस प्रकार जीवन की ऊर्जा का अधिक सत्यानाश हो यह खोजा जा रहा है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहाः
पुण्यो
गन्धः
पृथ्वियां
च....।
'पृथ्वी
में पवित्र
गन्ध मैं
हूँ...।'
(गीताः7.9)
सुगन्धी मैं हूँ – ऐसा श्रीकृष्ण ने नहीं कहा। जिस गन्ध से भगवदभाव पैदा हो वह गन्ध पुण्यशाली है। जिस गन्ध से कामोत्तेजना पैदा हो वह गन्ध आन्तर यात्रा में सहायक नहीं है।
भक्त का रास्ता और भोगी का रास्ता अलग है। भक्त भगवान को भोग लगाकर, पदार्थ को पावन बनाकर उसका यथोचित उपयोग करता है जबकि भोगी के क्रिया-कलापों में वासना की दुर्गन्ध मिली रहती है। वे लोग रामजी को भोग नहीं लगाते, श्रीकृष्ण को भोग नहीं लग