प्रातःस्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू के

सत्संग-प्रवचन

सत्संग सुमन


पूज्य बापू का पावन संदेश

हम धनवान होंगे या नहीं, यशस्वी होंगे या नहीं, चुनाव जीतेंगे या नहीं इसमें शंका हो सकती है परन्तु भैया ! हम मरेंगे या नहीं, इसमें कोई शंका है? विमान उड़ने का समय निश्चित होता है, बस चलने का समय निश्चित होता है, गाड़ी छूटने का समय निश्चित होता है परन्तु इस जीवन की गाड़ी के छूटने का कोई निश्चित समय है?

आज तक आपने जगत का जो कुछ जाना है, जो कुछ प्राप्त किया है... आज के बाद जो जानोगे और प्राप्त करोगे, प्यारे भैया ! यह सब मृत्यु के एक ही झटके में छूट जायेगा, जाना अनजाना हो जायेगा, प्राप्ति अप्राप्ति में बदल जायेगी।

अतः सावधान हो जाओ। अन्तर्मुख होकर अपने अविचल आत्मा को, निज स्वरूप के अगाध आनन्द को, शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लो। फिर तो आप ही अविनाशी आत्मा हो।

जागो.... उठो..... अपने भीतर सोये हुए निश्चयबल को जगाओ। सर्वदेश, सर्वकाल में सर्वोत्तम आत्मबल को अर्जित करो। आत्मा में अथाह सामर्थ्य है। अपने को दीन-हीन मान बैठे तो विश्व में ऐसी कोई सत्ता नहीं जो तुम्हें ऊपर उठा सके। अपने आत्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो गये तो त्रिलोकी में ऐसी कोई हस्ती नहीं जो तुम्हें दबा सके।

सदा स्मरण रहे कि इधर उधर भटकती वृत्तियों के साथ तुम्हारी शक्ति भी बिखरती रहती है। अतः वृत्तियों के साथ तुम्हारी शक्ति भी बिखरती रहती है। अतः वृत्तियों को बहकाओ नहीं। तमाम वृत्तियों को एकत्रित करके साधना-काल में आत्मचिन्तन में लगाओ और व्यवहार काल में जो कार्य करते हो उसमें लगाओ। दत्तचित्त होकर हर कोई कार्य करो। सदा शान्त वृत्ति धारण करने का अभ्यास करो। विचारवन्त एवं प्रसन्न रहो। जीवमात्र को अपना स्वरूप समझो। सबसे स्नेह रखो। दिल को व्यापक रखो। आत्मनिष्ठा में जगे हुए महापुरुषों के सत्संग एवं सत्साहित्य से जीवन को भक्ति एवं वेदान्त से पुष्ट एवं पुलकित करो।

अनुक्रम

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निवेदन

हर मनुष्य चाहता है कि वह स्वस्थ रहे, समृद्ध रहे और सदैव आनंदित रहे, उसका कल्याण हो। मनुष्य का वास्तविक कल्याण यदि किसी में निहित है तो वह केवल सत्संग में ही है। सत्संग जीवन का कल्पवृक्ष है। गोस्वामी तुलसीदासजी ने कहा हैः

बिनु सत्संग विवेक न होई राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।

सतसंगत मुद मंगल मूला सोई फल सिचि सब साधन फूला।।

'सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और श्रीरामजी की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में नहीं मिलता। सत्संगति आनंद और कल्याण की नींव है। सत्संग की सिद्धि यानी सत्संग की प्राप्ति ही फल है। और सब साधन तो फूल हैं।'

सत्संग की महत्ता का विवेचन करते हुए गोस्वामी तुलसीदास आगे कहते हैं-

एक घड़ी आधी घड़ी आधी में पुनि आध।

तुलसी संगत साधु की हरे कोटि अपराध।।

आधी से भी आधी घड़ी का सत्संग यानी साधु संग करोड़ों पापों को हरने वाला है। अतः

करिये नित सत्संग को बाधा सकल मिटाय।

ऐसा अवसर ना मिले दुर्लभ नर तन पाय।।

हम सबका यह परम सौभाग्य है कि हजारो-हजारों, लाखों-लाखों हृदयों को एक साथ ईश्वरीय आनन्द में सराबोर करने वाले, आत्मिक स्नेह के सागर, वेदान्तनिष्ठ सत्पुरूष पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू सांप्रत काल में समाज को सुलभ हुए हैं।

आज के देश-विदेश में घूमकर मानव समाज में सत्संग की सरिताएँ ही नहीं अपितु सत्संग के महासागर लहरा रहे हैं। उनके सत्संग व सान्निध्य में जीवन को आनन्दमय बनाने का पाथेय, जीवन के विषाद का निवारण करने की औषधि, जीवन को विभिन्न सम्पत्तियों से समृद्ध करने की सुमति मिलती है। इन महान विभूति की अमृतमय योगवाणी से ज्ञानपिपासुओं की ज्ञानपिपासा शांत होती है, दुःखी एवं अशान्त हृदयों में शांति का संचार होता है एवं घर संसार की जटिल समस्याओं में उलझे हुए मनुष्यों का पथ प्रकाशित होता है।

ऐसे हृदयामृत का पान कराने वाले पूज्यश्री की निरन्तर सत्संग-वर्षा से कुछ बिन्दू संकलित करके लिपिबद्ध आपके करकमलों में प्रस्तुत है।

ऋषियों की यह पावन वाणी तर जाते जिससे सब प्राणी।

गुरूवर के अनमोल वचन प्रस्तुत यह 'सत्संग सुमन'।।

श्री योग वेदान्त सेवा समिति

अहमदाबाद आश्रम

अनुक्रम

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सत्संग उद्यान के सुमन

पूज्य बापू का पावन संदेश.. 3

निवेदन.. 3

सत्संग उद्यान के सुमन.. 4

विवेकपूर्ण दृष्टि.. 5

सदगुरू-महिमा... 23

आत्मदर्शन.. 32

ईश्वरकृपा की समीक्षा... 46

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला... 53

स्वधर्म-निष्ठा.. 59

बीज में वृक्ष..... जीव में ब्रह्म..... 63

सत्संग का महत्त्व... 67

सच्चाई का प्रभाव. 70

सामर्थ्य का सदुपयोग.. 74

तू ही तू. 83

यमराज के दरबार में जिन्दा मनुष्य... 92

जागता नर सेवीए. 96

 

 

विवेकपूर्ण दृष्टि

जिनको मनुष्य जन्म की महत्ता का पता नहीं, वे लोग देह के मान में, देह के सुख में, देह की सुविधा में अपनी अक्ल, अपना धन, अपना सर्वस्व लुटा देते हैं। जिनको अपने जीवन की महत्ता का पता है, जिन्हें वृद्धावस्था दिखती है, मौत दिखती है, बाल्यावस्था का, गर्भावास का दुःख जिन्हें दिखता है, विवेक से जिन्हें संसार की नश्वरता दिखती है एवं संसार के सब संबंध स्वप्नवत दिखते हैं, ऐसे साधक मोह के आडंबर और विलास के जाल में न फँसकर परमात्मा की गहराई में जाने की कोशिश करते हैं।

जिस तरह भूखा मनुष्य भोजन के सिवाय अन्य किसी बात पर ध्यान नहीं देता है, प्यासा मनुष्य जिस तरह पानी की उत्कंठा रखता है, ऐसे ही विवेकवान साधक परमात्मशांतिरूपी पानी की उत्कंठा रखता है। जहाँ हरि की चर्चा नहीं, जहाँ आत्मा की बात नहीं वहाँ साधक व्यर्थ का समय नहीं गँवाता। जिन कार्यों को करने से चित्त परमात्मा की तरफ जावे ही नहीं, जो कर्म चित्त को परमात्मा से विमुख करता हो, सच्चा जिज्ञासु व सच्चा भक्त वह कर्म नहीं करता। जिस मित्रता से भगवद् प्राप्ति न हो, उस मित्रता को वह शूल की शैया समझता है।

सौ संगति जल जाय,

जिसमें कथा नहीं राम की।

बिन खेती, बिन बाड़ी के,

बाढ़ भला किस काम की।।

वे नूर बेनूर भले,

जिस नूर में पिया की प्यास नहीं।

यह जीवन नरक है,

जिस जीवन में प्रभुमिलन की आस नहीं।।

वह मति दुर्गति है, जिसमें परमात्मा की तड़प नहीं। वह जीवन व्यर्थ है जिस जीवन में ईश्वर के गीत गूँज न पाए। वह धन बोझा है जो आत्मधन कमाने के काम न आए। वह मन तुम्हारा शत्रु है जिस मन से तुम अपने आपसे मिल न पाओ। वह तन तुम्हारा शत्रु है जिस तन से तुम परमात्मा की ओर न चल पाओ। ऐसा जिनका अनुभव होता है वे साधक ज्ञान के अधिकारी होते हैं।

जो व्यक्ति देह के सुख, देह की प्रतिष्ठा, देह की पूजा, देह के ऐश तथा देह का आराम पाने के लिए धार्मिक होता है, वह अपने आपको ठगता है। देह को एकाग्र रखने का अभ्यास करो।

कई लोग घुटना व शरीर हिलाते रहते हैं, वे ध्यान के अधिकारी नहीं होते, योग के अधिकारी नहीं होते। मन को एकाग्र करने के लिए तन भी संयत होने चाहिए।

एक बार भगवान बुद्ध परम गहरी शांति का अनुभव लेकर भिक्षुकों को कुछ सुना रहे थे। सुनाते सुनाते बुद्ध एकाएक चुप हो गये, मौन हो गये। सभा विसर्जित हो गई। किसी की हिम्मत न हुई तथागत से कारण पूछने की। समय बीतने पर कोई ऐसा अवसर आया तब भिक्षुओं ने आदरसहित प्रार्थना कीः

"भन्ते ! उस दिन आप गंभीर विषय बोलते-बोलते अचानक चुप हो गये थे, क्या कारण था?"

बुद्ध ने कहा, "सुनने वाला कोई न था, इसलिए मैं चुप हो गया था।"

भिक्षुकों ने कहाः "हम तो थे।"

बुद्धः "नहीं। किसी का सिर हिल रहा था तो किसी का घुटना। तुम वहाँ न थे। आध्यात्मिक ज्ञान के लिए, चित्त तब तक एकाग्र नहीं होगा, जब तक शरीर की एकाग्रता सिद्ध न हो।"

आप अपने तन को, मन को स्वस्थ रखिये। संसार का सर्वस्व लुटाने पर भी यदि परमात्मा मिल जाय तो सौदा सस्ता है और सारे विश्व को पाने से यदि परमात्मा का वियोग होता है तो वह सौदा खतरनाक है। ईश्वर के लिए जगत को छोड़ना पड़े तो छोड़ देना लेकिन जगत के लिए कभी ईश्वर को मत छोड़ देना मेरे भैया ! ॐ.....ॐ.....ॐ....

ईश्वर के लिए प्रतिष्ठा छोड़नी पड़े तो छोड़ देना लेकिन प्रतिष्ठा के लिए ईश्वर को मत छोड़ना। स्वास्थ्य और सौन्दर्य परमात्मा के लिए छोड़ना पड़े तो छोड़ देना लेकिन स्वास्थ्य और सौन्दर्य के लिए परमात्मा को मत छोड़ना क्योंकि एक न एक दिन वह स्वास्थ्य और सौन्दर्य, मित्र और सत्ता, पद और प्रतिष्ठा सब प्रकृति के तनिक से झटके से छूट जायेंगे। इसलिए तुम्हारा ध्यान हमेशा शाश्वत ईश्वर पर होना चाहिए। तुम्हारी मति में परमात्मा के सिवाय किसी अन्य वस्तु का मूल्य अधिक नहीं होना चाहिए।

जैसे समझदार आदमी वृद्धावस्था होने से पहले ही यात्रा कर लेता है, बुद्धि क्षीण होने के पूर्व ही बुद्धि में बाह्यी स्थिति पा लेता है, घर में आग लगने से पहले ही जैसे कुआँ खुदाया जाता है, भूख लगने से पहले जैसे भोजन की व्यवस्था की जाती है, ऐसे ही संसार से अलविदा होने के पहले ही जो उस प्यारे से संबंध बाँध लेता है, वही बुद्धिमान है और उसी का जन्म सार्थक है।

जिसने मौन का अवलंबन लिया है, जिसने अपने चंचल तन और मन को अखंड वस्तु में स्थिर करने के लिए अभ्यस्त किया है, वह शीघ्र ही आत्मरस का अमृतपान कर लेता है।

रविदास रात न सोइये, दिवस न लीजिये स्वाद।

निशदिन प्रभु को सुमरिये, छोड़ि सकल प्रतिवाद।।

कई रात्रियाँ तुमने सो-सोकर गुजार दीं और दिन में स्वाद ले लेकर तुम समाप्त होने को जा रहे हो। शरीर को स्वाद दिलाते-दिलाते तुम्हारी यह उम्र, यह शरीर बुढ़ापे की खाई में गिरने को जा रहा है। शरीर को सुलाते-सुलाते तुम्हारी वृद्धावस्था आ रही है। अंत में तो.... तुम लम्बे पैर करके सो जाओगे। जगाने वाले चिल्लायेंगे फिर भी तुम नहीं सुन पाओगे। डॉक्टर और हकीम तुम्हें छुड़ाना चाहेंगे रोग और मौत से, लेकिन नहीं छुड़ा पायेंगे। ऐसा दिन न चाहने पर भी आयेगा। जब तुम्हें स्मशान में लकड़ियों पर सोना पड़ेगा और अग्नि शरीर को स्वाहा कर देगी। एक दिन तो कब्र में सड़ने गलने को यह शरीर गाड़ना ही है। शरीर कब्र में जाए उसके पहले ही इसके अहंकार को कब्र में भेज दो..... शरीर चिता में जल जाये इसके पहले ही इसे ज्ञान की अग्नि में पकने दो।

मुझे वेद पुरान कुरान से क्या ?

मुझे प्रेम का पाठ पढ़ा दे कोई।।

मुझे मंदिर मस्जिद जाना नहीं।

मुझे प्रभु के गीत सुना दे कोई।।

साधक की दृष्टि यही होती है। साधक का लक्ष्य परमात्मा होता है, दिखावा नहीं। साधक का जीवन स्वाभाविक होता है, आडंबरवाला नहीं। साधक की चेष्टाएँ ईश्वर के लिए होती हैं, दिखावे के लिए नहीं। साधक का खान-पान प्रभु को पाने में सहयोगी होता है, स्वाद के लिए नहीं। साधक की अक्ल संसार से पार होने के लिए होती है, संसार में डूबने के लिए नहीं। साधक की हर चेष्टा आत्मज्ञान के नजदीक जाने की होती है, आत्मज्ञान से दूर जाने की नहीं।

साँझ पड़ी दिन आथम्या, दीना चकवी रोय।

चलो चकवा वहाँ जाइये, जहाँ दिवस-रैन न होय।।

चकवा चकवी को समझाता हैः

रैन की बिछड़ी चाकवी, आन मिले प्रभात।

सत्य का बिछड़ा मानखा, दिवस मिले न ही रात।।

हे चिड़िया ! सन्ध्या हुई। तू मुझसे बिछड़ जायेगी, दूसरे घोंसले में चली जाएगी किन्तु प्रभात को तू फिर मुझे मिल जायेगी लेकिन मनुष्य जन्म पाकर भी उस सत्य स्वरूप परमात्मा के सत्य से बिछड़नेवाला मनुष्य पुनः सत्य से न सुबह मिलेगा, न शाम को, न रात में मिलेगा न दिन में।

सत्य का, परमात्मा का बलिदान देकर तुमने जो कुछ पाया है, वह सब तुमने अपने साथ जुल्म किया है। ईश्वर को छोड़कर यदि अन्यत्र कहीं तुम अपना दिल लगा रहे हो तो अपने साथ शत्रुता कर रहे हो, अन्याय कर रहे हो। ॐ....ॐ....ॐ....

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमसांदयेत्।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।

'अपने द्वारा संसार-समुद्र से अपना उद्धार करें और अपने को अधोगति में न डालें क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।'

(श्रीमद् भगवदगीताः 6.5)

हे अर्जुन ! तूने यदि अपने मालिक से मन लगाया और अपने मन को चंचलता से, हलन-चलन से तथा प्रकृति के बहाव से रोका तो तू अपने-आपका मित्र है और यदि प्रकृति के बहाव में बहा तो अपने-आपका शत्रु है।

यह मन यदि संसार में उलझता है तो अपना ही सत्यानाश करता है और परमात्मा में लगता है तो अपना और अपने संपर्क में आने वालों का बेड़ा पार करता है। इसलिए कदम-कदम पर सावधान होकर जीवन व्यतीत करो क्योंकि समय बड़ा मूल्यवान है। बीता हुआ क्षण, छूटा हुआ तीर और निकले शब्द कभी वापस नहीं आते। निकली हुई घड़ियाँ वापस नहीं आतीं।

सरिता के पानी में तुम एक बार स्नान कर सकते हो, दो बार नहीं। दूसरी बार तो वह पानी बहकर न जाने कहाँ पहुँच जाता है। ऐसे ही वर्तमान भूत में चला गया तो फिर कभी नहीं लौटेगा। इसलिए सदैव वर्तमान काल का सदुपयोग करो।

रविदास रात न सोइये, दिवस न लीजिये स्वाद।

निशदिन प्रभु को सुमरिये, छोड़ि सकल प्रतिवाद।।

"कौन क्या करता है? कौन क्या कहता है?" इस झंझट में मत पड़ो। इसकी जात क्या है? उसकी जात क्या है? इसका गाँव कौन सा है? उसका गाँव कौन सा है?"

अरे ! ये सब पृथ्वी पर हैं और आकाश के नीचे हैं। छोड़ दो मेरे और तेरे नाम पूछने की झंझट। लोग यात्रा में जाते हैं तो सामने निहारते हैं- "कहाँ के हो? किस गाँव के हो? किधर से आये हो?" अरे भाई ! हमारा गाँव ब्रह्म है। हम वहीं से आये हैं। उसी में खेलते हैं और उसी में समाप्त हो जाएँगे। लेकिन इस भाषा को समझने वाला कोई नहीं मिलता। सब इस मुर्दे शरीर का नाम, गाँव पूछते हैं कि कहाँ से आये हो।

जो मिट्टी से पैदा हुआ है, मिट्टी में घूम रहा है और मिट्टी में ही मिलने को बढ़ रहा है, उसी का नाम, उसी का गाँव उसी का पंथ-सम्प्रदाय आदि पूछकर लोग अपना ही समय गँवाते हैं और संतों का भी समय गँवा देते हैं।

तुम्हारा गाँव और तुम्हारा नाम, सच पूछो तो एक बार भी यदि तुमने जान लिया तो बेड़ा पार हो जायेगा। तुम्हारा गाँव तुमने आज तक नहीं देखा। तुम्हारे घर का पता तुम दूसरों से भी नहीं पूछ पाते हो और स्वयं भी नहीं जानते लेकिन संत तो तुम्हें सच्चा पता बता रहे हैं फिर भी तुम अपने घर के पते को नहीं समझ पा रहे हो।

द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान एक सिपाही को चोट लगी और वह बुरी तरह जख्मी होकर बेहोश हो गया। साथी उसे अपनी छावनी में उठा लाये। डॉक्टरों ने इलाज किया तो वह अच्छा तो हो गया लेकिन अपनी स्मृति पूर्णतः खो बैठा। मनोवैज्ञानिकों को भी लाया गया लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा। अपना नाम, पता, कार्ड, बिल्ला आदि सब खो बैठा था वह फौजी। मनोवैज्ञानिकों ने सलाह दी कि इसे अपने देश में घुमाया जाये। जहाँ इसका गाँव होगा, घर होगा, वहाँ इसकी स्मृति वापस जाग उठेगी और स्वयं ही अपने घर चला जायेगा। तब इसका पता चलेगा कि यह कौन है व कहाँ से आया है।

तदनुसार व्यवस्था की गई। दो आदमी साथ भेजे गये। इंग्लैंड के सभी रेलवे स्टेशनों पर उसे उतारा जाता और साइन बोर्ड दिखाये जाते कि कदाचित अपने गाँव का साइन बोर्ड देख लें और स्मृति जग जाए। लेकिन कहीं भी स्मृति न जगी। साथी निराश हो गये। वे अब तक लोकल ट्रेन में यात्रा कर रहे थे। एक छोटा सा गाँव आया, गाड़ी रूकी। साथियों ने सोचा कि इसे नीचे उतारना व्यर्थ है लेकिन चलो चाय पीने उतर जाते हैं।

वह फौजी, जिसकी स्मृति की गहराई में उसका गाँव, उसका नाम चला गया था, रेलवे स्टेशन पर अपने गाँव का साईन बोर्ड देखते ही उसकी स्मृति जग आई। यह फाटक के बाहर हो गया और फटाफट चलने लगा। सड़कें, गलियों, मोहल्ले, लांघता हुआ वह अपने घर में पहुँच गया। वहाँ उसने देखा कि यह मेरी माँ है, यह मेरा बाप है। वह बोल पड़ाः This is my  House. उसकी खोई स्मृति जाग गई।

सदगुरू भी तुम्हें अलग-अलग प्रयोगों से, अलग-अलग सुख-दुःख से, अलग अलग प्रक्रियाओं से तुम्हें यात्रा कराते हैं ताकि तुम कदाचित अपने गाँव की गली को देख लो, शायद अपना पुराना घर देख लो। जहाँ से तुम सदियों से निकल आये हो, उस घर की स्मृति तुम खो बैठे हो। अब शायद तुम्हें उस घर का, उस गाँव का कुछ पता चल जाए। काश, तुम्हें स्मृति आ जाए।

जगदगुरू श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई गाँव दिखाये-साँख्य के द्वारा, योग के द्वारा और निष्काम कर्म के द्वारा, लेकिन अर्जुन अपने घर में नहीं जा रहा था। श्रीकृष्ण ने कहाः "अर्जुन ! अब तेरी मर्जी। यथेच्छसि तथा कुरु।"

अर्जुन कहता हैः "नहीं प्रभु ! ऐसा न करें। मेरी बुद्धि उचित निर्णय नहीं ले सकती। मेरी बुद्धि गाँव में प्रवेश नहीं कर सकती।" तब श्री कृष्ण कहते हैं- "तो फिर छोड़ दे अपनी अक्ल और होशियारियों का भरोसा। छोड़ दे अपनी ऐहिक बातों का और मेरे तेरे का, जीने मरने का ख्याल। छोड़ दे धर्म-कर्म की झंझट को और आ जा मेरी शरण में।"

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।

"सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात् सम्पूर्ण कर्त्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान् सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा। तू शोक मत कर।"

(गीताः 18.66)

डूब जा मेरी गहरी शांति में। तुझे पता चल जाएगा कि तेरा गाँव तुझमें ही है, कहीं आकाश-पाताल में नहीं।

हमारे ऐसे दिन कब आवेंगे कि हमें हमारे गाँव की प्यास जग जाएगी ताकि हम भी अपने आत्मगाँव में प्रविष्ट हो जाएँ !

दक्षिण भारत के एक सम्राट ने नई रानियों के कहने में आकर पुरानी रानी के पुत्र को घर से बाहर निकाल दिया। यद्यपि यह उस राजा की एक मात्र संतान थी और पुरानी रानी (बड़ी रानी) से उत्पन्न हुई थी लेकिन नई रानियाँ उस पुत्र के विरुद्ध हमेशा राजा के कान भरा करतीं थीं किः "यह तो अलमस्त है, पागल है, सारा दिन घूमता रहता है और गाता फ़िरता है। यह आपकी प्रतिष्ठा को धूल में मिला रहा है।"

बार-बार सुनने पर बात असर कर जाती है। राजा भी उस राजकुमार को गिरी हुई नज़रों से देखने लगा और वे गिरी हुई निगाहें पक्की होती चली गईं। राजकुमार को पिता से प्रेम न मिलने के कारण, उसका प्रेम प्रभु की ओर होने लगा। वह टूटी फूटी भाषा में मस्तानों जैसा कुछ न कुछ गुनगुनाया करता था। उसके खान-पान, रहन-सहन की कोई व्यवस्था नहीं थी। जैसा भी आया खा लिया, पी लिया और जी लिया।

मैं सिरोही गया था तो सिरोही के भूतपूर्व राजा के पुत्र ने मुझे अत्यधिक श्रद्धा व आदर के साथ अपने महल में बुलवाया लेकिन उसके पहले उसका भाई मेरे पास कई बार आ गया। वह बहुत ही सीधा-सादा था। इतना सीधा-सादा कि सायकल पर ही आ जाता था। लोगों ने मुझे बताया कि राजा अपने इस भाई को पागल समझता है। यद्यपि वह पागल नहीं था, उसका स्वभाव ही सरलतायुक्त था। जैसे तैसे आदमी से बात करने लग जाये, जहाँ-तहाँ बैठने लग जाये, एकदम अपने साधारण वेश में, साधारण भाव में ही रखता था लेकिन सिरोही नरेश अपने पुराने सिरोहीपुर को संभालने में अधिक विश्वास रखता था।

कुटुम्बी और सिरोही के लोग समझते थे कि 'यह तो ऐसा ही है..... राजा का भाई तो है लेकिन ऐसा ही है।' वास्तव में वह ऐसा-वैसा कुछ न था, ठीक था, परंतु सांसारिक आडम्बर न संभाल पाया इसलिए लोगों ने 'ऐसा है.... वैसा है....' कहना प्रचारित कर दिया था।

इसी प्रकार उस सम्राट के एकमात्र पुत्र को भी द्वेषवश नई रानियों ने 'ऐसा है.... वैसा है....' कहना आरंभ कर दिया। दासियाँ भी उसे ऐसा ही कहती थीं। राजा ने जब उसे निकाल दिया तो वह सड़कों पर रहने लगा, मवालियों के साथ हो गया। ईश्वर के गीतों की बजाय उसके मुँह से तेरे मेरे के गीत गूँजने लगे। संग का बड़ा रंग लगता है। राजा ने देखा कि यह मेरे राज्य में रहकर मेरी ही इज्जत का कचरा कर रहा है तो उसे अपने राज्य से बाहर निकाल दिया। अब वह भीखमंगों की टोली में शामिल हो गया। भीख माँगकर खा लेता और जहाँ कहीं सो लेता।

कुछ दिन किसी गाँव में रहता। गाँव वाले भीख देकर ऊब जाते तो दूसरे गाँव में चला जाता। ऐसा करते-करते वह कई वर्षों के बाद किसी मरुभूमि के गाँव में पहुँच गया। कपड़े जूते वही थे लेकिन फटकर चिथड़े हो गये थे। शरीर मैला और बदबूदार, वेशभूषा बिल्कुल दरिद्रों जैसी और पहुँचा है उस मरुभूमि के गाँव के एक छोटे से होटल के पास.... बिछाई है अपनी भीख माँगने की फटी पुरानी चदरिया।

"एक पैसा दे दो बाबू जी ! जूता लेने के लिए दे दो.... चाय पीने के लिए दुअन्नी-चवन्नी दे दो.... तुम्हारा भला होगा..." इस प्रकार की भीख माँगकर वह सम्राट पुत्र अपना गुजारा कर रहा है।

इधर सम्राट बूढ़ा होने जा रहा है। ज्योतिषियों ने कह दिया कि अब तुम्हारे नसीब में संतान नहीं है। राज्य परम्परा यदि सम्भालनी ही है तो जो एकमात्र पुत्र था उसे ही बुलाकर उसी का राजतिलक कर दो अन्यथा तुम्हारे कुल का अंत हो जाएगा।

राजा ने अपने पुत्र की तलाश में चारों ओर वजीर और सिपाही भेजे। वजीर के नेतृत्व में एक टुकड़ी घूमती-फिरती उसी मरुभूमि के छोटे से देहाती गाँव में पहुँची और देखा कि एक छोटे से होटल के सामने कोई भिखारी भीख माँग रहा है।

यद्यपि वर्षों का फासला बीत गया था लेकिन वजीर की बुद्धि पैनी थी। विलक्षण, बुद्धिमान वजीर ने रथ रोककर देखा कि जो 'एक पैसा दे दो...... कल से भूखा हूँ... कुछ खिला दो.... इस गरीब को.... तुम्हारा कल्याण होगा....' की आवाज लगा रहा है, इस आवाज में हमारे राजकुमार के कुछ गुण दिखाई पड़ते हैं।

वजीर रथ से उतरकर सामने गया तो वह वजीर को दुहाइयाँ देने लगाः "तुम्हारा कल्याण होगा... तुम्हारा राज और तुम्हारी इज्जत कायम रहेगी..... तुम्हारा पद और प्रतिष्ठा कायम रहेगी..... जनाब ! मुझे गरीब को पैसे दे दो।"

वजीर ने पूछाः "तू कहाँ से आया है?"

वह कुछ स्मृति खो बैठा था, बोलाः "मैं गरीब हूँ.... भीख माँगकर जैसे तैसे अपना जीवन यापन कर रहा हूँ।" वजीर पूछते पूछते उसे अपनी असलियत की ओर ले गया तो स्वतः ही ये प्रमाण प्रकट होने लगे कि यह वही राजकुमार है जिसकी तलाश में हम यहाँ तक पहुँचे हैं।

वजीर ने उससे कहाः "तुम तो अमुक राजकुमार हो और अमुक राजा के एकमात्र कुलदीपक हो। राजा तुम्हारा राजतिलक करने के लिए उत्सुक है और पागल ! तुम यहाँ बैठकर पैसे पैसे के लिए भीख माँगते हो?"

उसे तुरन्त स्मृति आ गई। उसने कहाः "मेरे स्नान के लिए गंगाजल लाओ। पहनने के लिए सुन्दर वस्त्राभूषणों की तैयारी करो और सुन्दर रथ की सजावट करो।"

एक क्षण में उसकी सारी दरिद्रता चली गई। सारे भिक्षापात्र एक क्षण में व्यर्थ हो गये और वह उसी समय सम्राटतत्व का अनुभव करने लगा।

वह राजा तो रानियों के चक्कर में आ गया था इसलिए राजकुमार को निकाल दिया था और बाद में अपने स्वार्थ के लिए बुला रहा था लेकिन परमात्मा रूपी राजा किसी रानी के चक्कर में नहीं आया फिर भी संतरूपी वजीर को तुम्हारी तरफ भेज रहा है कि तुम विषयों की भीख कब तक माँगते रहोगे? मुझे धन दे दो.... मकान दे दो... कुर्सी दे दो... सत्ता दे दो..... मुझे सुहाग दे दो.... मेरी मँगनी करा दो..... मुझे पुत्र दे दो.....' तुम्हें इस तरह भीख माँगता देख सुनकर संतरूपी वजीर भीतर ही भीतर बड़े दुःखी होते हैं कि अरे ! परमात्मा के इकलौते पुत्र !.... तुम सब परमात्मा के इकलौते पुत्र हो क्योंकि परमात्मा और तुम्हारे बीच तिनकामात्र भी दूर नहीं। परमात्मा का राज्य पाने का तुम्हारा पूर्ण अधिकार है, फिर भी तुम भीख माँगने से रुकते नहीं। अब रूक जाना...ठहर जाना भैया......! बहुत भीख माँग ली........... कई जन्मों से माँगते आए हो।

सम्राट का पुत्र तो दस बारह साल से भीख माँग रहा था इसलिए उसे वजीर की बात पर विश्वास आ गया और अपने राज्य को संभाल लिया, लेकिन तुम तो सदियों से भीख माँगते आ रहे हो इसलिए तुम वजीर के वचनों में विश्वास नहीं करते हो।

तुम्हें संदेह होता है किः "आत्मा ही परमात्मा है....? चलो, साईं कहते हैं तो ठीक है, लेकिन मेरा प्रमोशन हो जाए।"

"अरे ! चल, मैं तुझे सारे विश्व का सम्राट बनाये देता हूँ।"

"साँईं ! यह सब तो ठीक है, लेकिन मेरा यह इतना सा काम हो जाये।"

अरे ! कब तक ये कंकड़ और पत्थर माँगते रहोगे ? कब तक कौड़ियाँ और तिनके बटोरते रहोगे?

ईश्वर के राज्य के सिवाय और परमात्मा के पद के सिवाय, आज तक तुमने जो बटोरा है और जो बटोरोगे, आज तक तुमने जो जाना है और आज के बाद जो जानोगे, आज तक तुमने जो मित्र बनाये और आज के बाद जिन्हें संसार के मित्र बनाओगे, मृत्यु के एक झटके में सब के सब छूट जाएँगे। दरिद्रता के पात्र कब तक सजाए रखोगे? भीख की चीजें कब तक अपने पास रखोगे?

छोड़ो दरिद्रता को.... उतार फेंको फटे पुराने चीथड़ों को..... फोड़ डालो भिक्षा के पात्रों को......'शिवोऽहं' का गान गूँजने दो.... 'मैं आत्मा परमात्मा हूँ.... मैं अपने घर की ओर कदम बढ़ाऊँगा.... हरि ॐ.... ॐ....ॐ....'

अपनी स्मृति को जगाओ......। दूसरा कुछ नहीं करना है। परमात्मा को लाना नहीं है, सुख को लाना नहीं है, सुख को पाना नहीं है, जन्म मरण के चक्कर को किसी हथौड़े से तोड़ना नहीं है लेकिन तुम केवल अपनी स्मृति को जगाओ। और कुछ तुम्हें नहीं करना है। तुम केवल परमात्मा की हाँ में हाँ मिलाकर तो देखो.....! गुरू की हाँ में हाँ मिलाकर तो देखो कि तुम कितने महान हो सकते हो......!

गुरु तुम्हें कहते हैं कि 'तुम अमृतपुत्र हो' तो तुम क्यों इन्कार करते हो? गुरू तुम्हें कहते हैं कि तुम देह नहीं हो तो तुम क्यों अपने को देह मानते हो? गुरू कहते हैं कि तुम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र नहीं, तुम तो परमात्मावाले हो, गुरू की बात जरा मानकर तो देखो, भाई!

ईश्वरः सर्वभूतानां हृदयेऽर्जुन तिष्ठसि।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।

'हे अर्जुन ! शरीर रूपी यन्त्र में आरूढ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।'

(गीताः 18.61)

सबके हृदय में मैं ईश्वर ज्यों का त्यों विराजमान हूँ लेकिन माया रूपी यंत्र से सब भ्रमित हो रहे हैं। माया का अर्थ है धोखा। धोखे के कारण ही हम दीन हीन हुए जा रहे हैं कि 'हे धन ! तू कृपा कर, सुख दे। हे कपड़े! तू सुख दे। हे गहने ! तू सुख दे।'

अरे ! ये जड़ चीजें तुम्हें कब सुख देंगी? कपड़े नहीं हैं? परवाह नहीं। गहने नहीं हैं। परवाह नहीं। अरे, खाने को नहीं हो तो भी परवाह नहीं करना। खाकर भी तो मरना ही है और बिना खाये भी इस शरीर को मरना ही है। तुम्हारे हृदय में परमात्मा का आराम परमात्मा के गीत हो तो बस... इतना भी पर्याप्त है। इसके सिवाय सब कुछ भी हो गया तो व्यर्थ है और यह हो गया तो सब कुछ की भी आवश्यकता नहीं। वह सब कुछ तुम्हारा दास हो जाएगा।

एक बार गुरू की बात मानकर तो देखो। एक बार छलांग लगाकर तो देखो ! सौदा मंजूर नहीं हो तो वापस कर देना भैया !....। ॐ.....ॐ.....ॐ....... अपने रिश्ते-नाते को कम से कम बढ़ाओ।

बहुत पसारा मत करो, कर थोड़े की आस।

बहुत पसारा जिन किया, वे भी गये निराश।।

बहुत पसारा तुम्हारे दिल को बिखेर देता है, तुम्हारी गति को विक्षिप्त कर देता है फिर यहाँ कब तक पसारा करोगे.....? मरने वालों से कब तक मित्रता बनाते रहोगे? छूटने वालों को कब तक संभालोगे? तुम अपनी बुद्धि में यह ज्ञान अवश्य ही भर देना कि 'मैं उनकी बात कभी नहीं मानूँगा जो मुझे मौत से छुड़ा नहीं सकते। मैं उन चीजों को कभी जानने की कोशिश ही नहीं करूँगा जो मुझे गर्भावास में धकेल दें। वे कर्म मेरे लिए विष हैं, जो मौत के बाद मुझे मालिक से मिलाने में रूकावट देते हैं।

एक पौराणिक कथा हैः

शुकदेव जी जब सोलह वर्ष के हुए तो वे घर को छोड़कर जाने लगे। पिता वेदव्यास जी उनके पीछे पीछे आवाज लगाते हुए आ रहे हैं- "पुत्र....! सुनो.....रूको... कहाँ जाते हो....? मैं तुम्हारा पिता हूँ.....। रूको.....! रूको.....! रूको.....!"

पुत्र जा रहा है लेकिन उसे ध्यान आया कि पिता कोई साधारण पुरूष नहीं हैं अतः उनकी आशिष लेकर जाना ही उचित है।

शुकदेव जी वापस लौटे तो पिता ने उन्हें स्नेह से बाँहों में भर लिया। पिता पूछते हैं- "वत्स ! मुझे छोड़कर कहाँ जा रहे थे?"

शुकदेव जी कहते हैं- "पिताजी ! मैं आपको एक कथा सुनाता हूँ। फिर यदि आपको उचित लगे तो मुझे रोक लीजिएगा।

पिताजी ! किसी गाँव के बाहर नदी के किनारे एक ब्रह्मचारी रहता था। वह प्रातःकाल में उठकर संध्या-वंदन, आसन-प्राणायाम-ध्यान आदि करता था। ध्यान के बाद जब उसे भूख लगती तो अपना भिक्षापात्र लेकर वह गाँव में एक समय मधुकरी करता था।

धीरे-धीरे उस ब्रह्मचारी का संयम, साधना, ओज, तेज बढ़ता चला गया। उसी गाँव में दुल्हन बनकर कोई कुलटा स्त्री आई थी जो अपने पति के साथ एक दुमंजिले मकान के ऊपरी भाग में रहती थी।

ब्रह्मचारी जब गाँव में भिक्षा लेने निकला तो खिड़की से उस कुलटा स्त्री की नजर ब्रह्मचारी के तेजस्वी मुखमंडल पर पड़ी। वह युवा ब्रह्मचारी पर अत्यंत कामातुर हो गई। उसका पति थोड़ी देर पहले ही कुछ कार्यवश बाहर गाँव जाने के लिए घर से निकल चुका था। अतः उसने ब्रह्मचारी को ऊपर बुलाते हुए कहाः "इधर आओ.... मैं तुम्हें भिक्षा देती हूँ।"

वह ब्रह्मचारी सहज स्वभाव से भिक्षा हेतु ऊपर पहुँच गया तो उस कुलटा स्त्री ने दरवाजा बंद करके उसे भीतर घेर दिया और उसके साथ अनाधिकृत चेष्टा करने की कोशिश की।

ब्रह्मचारी घबराया। उसने मन ही मन परमात्मा को पुकारा किः "प्रभु ! मेरी साधना अधूरी न रह जाए ! हे मेरे नाथ ! यहाँ एक तू ही मेरा रक्षक है। काम तो वैसे भी तीर लिए खड़ा होता है। ऊपर से यह कामिनी अपना प्रयास कर रही है। हे राम ! तू कृपा करेगा, तो ही मैं बचूँगा, अन्यथा तो मारा जा रहा हूँ। तू कृपा कर, मेरे नाथ !"

उस ब्रह्मचारी की भीतरी प्रार्थना अन्तर्यामी परमात्मा ने सुन ली। बाहर गाँव जाने के लिए निकला हुआ कुलटा का पति साधन न मिलने के कारण एवं एकाएक शौच जाने का दबाव आने के कारण वापस घर लौट आया और द्वार पर आकर दस्तक दी।

पत्नी आवाज सुनकर घबराई कि अब क्या करू? युवक को कहाँ छुपाऊँ? घर में शौचालय था। उस शौचालय की मोरी (होद) में कुलटा ने उस युवक को धक्का देकर दबा दिया। उसके पति को शौच जाना था। वह शौचालय में गया और उसने उसी होद में विष्ठा, मलमूत्र त्यागा जिसमें ब्रह्मचारी को धकेला गया था। फिर वह आदमी उस कुलटा को भी साथ लेकर बाहर गाँव चला गया।

पिताजी ! वहाँ से वह ब्रह्मचारी नवयुवक बेचारा, जैसे बालक गर्भावास में ओंधा होता है, ऐसा औंधा और बेहोश अवस्था में लुढ़कता-खिसकता हुआ एक दिन के बाद उस शौचालय की नाली में नीचे उतरा। जब सफाईवाले को उसमें सिर के बाल दिखे तो उसने उसे बाहर खींच लिया।

वह सफाई वाला निःसंतान था अतः उस मूर्छित ब्रह्मचारी को अपने घर ले गया और उपचार किया तब कहीं ब्रह्मचारी को होश आया। होश आया तो वहाँ से भागकर अपनी पुरानी झोपड़ी में गया। अच्छी तरह रगड़-रगड़कर स्नान किया। फिर सन्ध्या पूजन, प्राणायाम, ध्यान, जप आदि करके अपने आपको शुद्ध व स्वस्थ किया। उसे फिर से भूख लगी। दो चार दिन बाद उसे पुनः उसी गाँव में भिक्षा माँगने आना ही पड़ा। तब तक वह कुलटा स्त्री भी अपने घर पहुँच गई थी।

अब वह ब्रह्मचारी उस मोहल्ले से तो गुजरता भी नहीं था लेकिन पिताजी ! अनजाने में वह उस मोहल्ले से गुजरे और वह कुलटा स्त्री उसे पूड़ी पकवान आदि खिलाने के लिए आमंत्रित करे तो वह जाएगा क्या? वह स्त्री उसे कई-कई बार बुलाए और सुन्दर वस्त्र-आभूषण भी दे तो वह जाएगा क्या?

कई प्रलोभनों के बावजूद भी वह ब्रह्मचारी उस कुलटा के पास नहीं जाएगा क्योंकि उसे एक बार मोरी से गुजरने का अनुभव याद है.... उस नाली से पसार होने की उसको स्मृति है।

पिताजी ! एक बार नाली से गुजरा हुआ ब्रह्मचारी दोबारा हजार-हजार प्रलोभनों पर भी वापस नहीं जाता तो मैं तो हजारों नालियों से घूमता घूमता आया हूँ। हजारों माताओं की नालियों से पसार होता होता आया हूँ। पिता जी! अब मुझे क्षमा कीजिये। मुझे जाने दीजिए। संसार की झंझटों से मुझे बचने दीजिये।

मुझे जन्मों-जन्मों की उन मोरियों का स्मरण है कि माता की मोरी कैसी होती है। उस कुलटा स्त्री के शौचालय की मोरी तो एक दिन की थी लेकिन यहाँ नौ महीने और तेरह दिन मोरी में औंधे होकर लटकना पड़ता है। मल, मूत्र, विष्ठा आदि सब कुछ इसमें बना रहता है। माँ तीखा-तेज खाती है तो जलन पैदा होती है। मुँह से कीटाणु भी काटते रहते हैं कोमल चमड़ी को, उससे जो पीड़ा होती है वह तो बच्चा ही जानता है। माँ की उस गंदी योनि से जन्म लेते समय बच्चे को जो पीड़ा होती है, वह जन्म देने वाली माँ की पीड़ा से दस गुना अधिक होती है। बच्चा बेचारा मूर्छित सा हो जाता है। वह रोना चाहता है लेकिन उसका रुदन भी बंद हो जाता है।

पिता जी ! वह पीड़ा और लोग क्या जानें? प्रसूति की पीड़ा जैसे माँ ही जानती है, वैसे ही जन्म की पीड़ा तो बेचारा बच्चा ही जानता है। ऐसी पीड़ा से मैं एक बार नहीं, अनंत-अनंत बार पसार होकर आया हूँ। पिताजी ! अब मुझे क्षमा कर दो। उन मोरियों में मुझे वापस मत धकेलो।"

"बहुत पसारा मत करो" क्योंकि बहुत पसारा करने से फिर मोरियों से पसार होना पड़ेगा, नालियों से पसार होना पड़ेगा। कभी दो पैरवाली माँ की नाली से पसार हुए हैं तो कभी चार पैरवाली माँ की नाली से पसार हुए हैं तो कभी आठ पैर वाली माँ की नाली से पसार हुए हैं तो कभी सौ पैरवाली माँ की नाली से भी हम पसार हुए हैं। अब कब तक उन नालियों से तुम पसार होओगे?

इन नालियों से अब उपराम हो जाओ और उस यार से मुलाकात कर लो ताकि फिर पसार न होना पड़े। उस यार से मिलो जिसकी मुलाकात के बाद फिर कभी नालियों में औंधा लटकना न पड़े।

अपने विवेक और वैराग्य को सतत् जागृत रखना। जरा सा भी वैराग्य कम हो जायेगा तो नाली तैयार ही समझो। जरा-सी विस्मृति हो जाए तो ब्रह्मचारी को वह कुलटा फिर से बुलाने को उत्सुक है।

आप सदा ही याद रखनाः "आखिर क्या? आखिर कब तक? इतना मिल गया, फिर क्या? इतना खा लिया, फिर क्या? इतना अखबारों में फोटो और नाम छपवा दिया, फिर क्या? आखिर क्या? आखिर क्या होगा?" इसलिए खूब सतर्क रहें।

संत एकनाथजी से एक सेठ ने कहाः "तुम भी गृहस्थी, मैं भी गृहस्थी। तुम बच्चों वाले, मैं भी बच्चों वाला। तुम सफेद कपड़ों वाले, मैं भी सफेद कपड़ों वाला लेकिन तुम्हें लोग इतना पूजते हैं, तुम्हारी इतनी प्रतिष्ठा है, तुम इतने खुश और निश्चिंत रहकर जी सकते हो लेकिन मैं इतना परेशान क्यों? तुम इतने महान और मैं इतना तुच्छ क्यों?"

एकनाथ जी ने देखा कि इसे सैद्धांतिक उपदेश देने से काम नहीं चलेगा। कुछ अलग ही प्रयोग किया जाय। एकनाथ जी ने उससे कहाः "बाबा ! सात दिन में तू मरने वाला है, फिर मुझसे यह सब पूछकर तू क्या करेगा?"

अब एकनाथ जी कहें और वह आदमी विश्वास न करे, ऐसा संभव ही नहीं था। एकनाथ जी ने तो कह दी थी आखिरी बात।

वह आदमी दुकान पर आया। बेचैन होकर घूम रहा है क्योंकि सात दिन में तो मौत है। उसके भीतर जो भी लोग था, हाय-हाय थी वह शांत हो गई। अपने प्रारब्ध का जो कुछ था वह सहजता से उसे मिलने लगा। पैसे वसूल करने जाने वाला जो आदमी ग्राहकों में बिना लड़े-भिड़े वापस नहीं लौटता था। वह आज प्रेम से उनसे पैसे निकाल लाया।

शाम होने पर रोज शराब के घूँट लेने के अभ्यस्त जीव के सम्मुख आज शराब फीकी हो गई।

एक दिन बीता.... दूसरा दिन बीता.... तीसरा दिन बीता....। रोज भोजन में चटनी-नमक, अचार आदि चाहिए था, अब कोई आग्रह न रहा। जो जरा-जरा बात पर आग-बबूला हो जाता था उसे अब याद आता है कि सात दिन में से चार गये, तीन ही बाकी हैं। इतना खाकर आखिर क्या?

इस तरह पाँचवा दिन बीता। बहू पर जिसे क्रोध आ जाता था, बेटे जिसे नालायक दिखते थे, वही अब मौत को सामने देख रहा है कि तीन दिन बचे हैं। बेटों की नालायकी व गद्दारी वह भूल गया और सोचने लगाः

"इस संसार में ऐसा ही होता है। यह मेरा सौभाग्य है कि वे गद्दारी और नालायकी करते हैं ताकि उनका आसक्तिपूर्ण चिन्तन नहीं होता। यदि उनका आसक्तिपूर्ण चिन्तन होगा तो क्या पता इस घर में चूहा होकर आना पड़े कि कुत्ता होकर आना पड़े साँप होकर आना पड़े कि चिड़िया होकर घोंसले में शब्द करने को आना पड़े.... कोई पता नहीं। अच्छा है.... पुत्र और बहुएँ गद्दार हुई तो अच्छा ही है क्योंकि तीन दिन के बाद तो जाना ही है। अब जो समय बचा है उसमें विठोबा को याद कर लूँ- विट्ठल्ला.... विट्ठल्ला... करके वह चालू हो गया।

जीवन भर जो मंदिर नहीं गया, जो संतों को भी नहीं मानता था वह सेठ तेरा-मेरा भूलकर 'विट्ठल्ला......विट्ठल्ला....' रटने में मगन हो गया।

छठा दिन बीता। ज्यों-ज्यों समय आगे बढ़ता गया त्यों-त्यों सेठ में भक्तिभाव, स्वाभिवकता, सहनशक्ति आदि सदगुण स्वतः ही विकसित होने लगे। परिजन भी विस्मित हैं कि इनका जीवन इतना परिवर्तित ! हम तो रोज मनौति मानते थे कि 'कब मरेगा? कब जान छूटेगी? हे देवी-देवता ! इसका स्वर्गवास हो जाय तो हम भंडारा करेंगे?'

जिन बच्चों को तुम रिश्वत लेकर, अपना पेट काटकर पाल-पोसकर, पढ़ा-लिखाकर बड़ा करते हो, उन्हें मिसेज (बहू) मिलने दो और तुम्हारा बुढ़ापा आने दो, फिर देखो कि क्या होता है....

बहुत पसारा मत करो, कर थोड़े की आस।

बहुत पसारा जिन किया, वे भी गये निराश।।

चार-चार पुत्र होने पर भी बूढ़ा परेशान है क्योंकि बूढ़े ने पुत्रों पर आधार रखा है, परमात्मा पर नहीं। तुमने परमात्मा का आधार छोड़कर पुत्र पर, पैसे पर, राज्य पर, सत्ता पर आधार रखा है तो अंत में रोना ही पड़ेगा।

विश्व की सारी सुविधाएँ जिसके पास थीं ऐसी इंदिरा को भी बेचारी को विवश होकर अपने पुत्र की अकाल मौत की हालत देखनी पड़ी थी। मौत कहाँ आती है, कब आती है, कैसे आती है, कोई पता-ठिकाना नहीं। कई-कई दृष्टांत अपने सामने हैं जिनमें सामूहिक मौते हुईं.... मोरबी कांड, भोपाल गैस कांड, मराठावाड़ा का भूकम्प कांड.... जिनमें हजारों आदमी देखते-देखते चल बसे।

हमारा भी क्या ठिकाना कि यहाँ से घर पहुँच भी न पाएँ और रास्ते में कुछ हो जाए... दुकान से घर जाएँ और रास्ते में ही खत्म हो जाएँ.... क्या पता? इस नश्वर शरीर का कोई पता नहीं, भैया !

सेठ का अब छठा दिन पूरा हो गया है। वह बड़ा उत्सुक हो रहा है किः 'भगवान मैं क्या करूँ? मेरे कर्म कैसे कटेंगे? विट्ठल्ला...... विट्ठल्ला....' धुन चालू है।

छठे दिन की रात्रि आखिरी रात्रि है। रात्रि को नींद नहीं आई। रविदास की बात याद आ गई होगी शायद उसे। अनजाने में रविदास उसके जीवन में चमका होगाः

रविदास रात न सोइये, दिवस न लीजिये स्वाद।

निशदिन हरि को सुमरिये, छोड़ि सकल प्रतिवाद।।

उस सेठ की रात अब सोने में नहीं जाती, सत्य में जा रही है। 'विट्ठल्ला... विट्ठल्ला.... विट्ठल्ला.....' करते-करते प्रभात हुई। कुटुम्बियों को जगाया और कहाः

"मुझमें अभी तक जो भी गलतियाँ हुई हों या मैंने किसी को कुछ गलत भी बोला हो तो मुझे माफ कर देना। मैं अब जा रहा हूँ।"

कुटुम्बी रो रहे हैं किः "अब तो तुम बहुत अच्छे हो गये हो। तुम न जाते तो अच्छा है।"

जो भगवान को प्यारा होता है वह कुटुम्ब का भी प्यारा होता है और समाज का भी प्यारा होता है लेकिन जो भगवान को विस्मृत करके केवल कुटुम्बियों के लिये ही जुटा रहता है उसे कुटुम्बी भी बाद में गद्दारी से देखते हैं।

अब सेठ के लिए लोगों को जिज्ञासा हो रही है कि ये क्या कर रहे हैं !

सेठ बोल रहे हैं- "चौका लगाओ, तुलसी के पत्ते मेरे मुँह में डालो। तुलसी का एकाध मनका गले में डालकर मरूँ तो ठीक है, कम से कम नरक और यमदूतों से तो बचूँगा।"

तुलसी के पत्ते लाये जा रहे हैं। एकाध तुलसी का मनका भी तलाशा जा रहा है।

सेठ को अब खटिया से उतारकर लिपे-पुते चौके में लिटा दिया गया है। बस, अब कौन सी घड़ी मौत आएगी... क्या पता?

प्रभात से सातवाँ दिन शुरू हो रहा है। सेठ कहता है परिजनों सेः "आप रोना मत। मुझे मरने देना विठोबा के चिंतन में।"

कुटुम्बी परेशान हैं। इतने में एकनाथजी महाराज उधर से निकले। कुटुम्बियों ने पैर पकड़ लियेः "गुरूजी! आपका चेला है, भक्त है। हम भी आपको पूजते हैं, कृपया पधारिये।"

एकनाथ जी आये और सेठ को देखकर बोलेः "क्यों इस तरह चौके में लेटे हो? क्या बात है?"

वह बोलाः "गुरूजी ! आप ही ने तो कहा था कि 'सात दिन में तुम्हारी मौत है। एक सप्ताह में तुम मरोगे।' तो छः दिन तो मैं जी लिया और आज आखिरी दिन है। संत का वचन कभी मिथ्या नहीं होता।

एकनाथ जी कहते हैं- "हाँ, मैंने कहा था कि एक सप्ताह में ही मरोगे तुम।"

मैं भी तुम्हें कह देता हूँ कि तुम भी एक सप्ताह में ही मरने वाले हो। आपकी मौत का दिन सोमवार होगा या मंगलवार, मंगल नहीं तो बुध, बुध नहीं तो गुरू, गुरू नहीं तो शुक्र.... शनि... रवि.... इन सात दिनों के भीतर ही तो तुम मरोगे, इससे अलग किसी नये दिन में तुम थोड़े ही मरने वाले हो। ॐ..... ॐ..... ॐ.....

एकनाथ जी ने उसका ज्ञान बढ़ाने के लिए गुप्त संकेत कर दिया था कि तुम एक सप्ताह के अन्दर ही अन्दर मरोगे। बात तो सच्ची थी। संत झूठ क्यों बोलेंगे? हम उनके वचनों के गूढ़ रहस्यों को अपनी मंदमति से जान नहीं पाते इसीलिए हम उल्टा संतों को ही झूठा साबित कर देते हैं?

एक आदमी आया और कहने लगाः बाबा जी ! मैं फलाने अपराध में फँस गया हूँ।" बाबा जी बोलेः "तू चिन्ता मत कर। मुक्त हो जाएगा।" और वह छूट गया अदालत से। फिर गया बाबाजी के पासः "बाबाजी ! आपने कहा था तो मैं मुक्त तो हो गया लेकिन दस रूपये का जुर्माना देना पड़ा।"

अरे, जुर्माना देकर भी तू मुक्त तो हो गया, फिर भले कैसे भी मुक्त हुआ। हमने तो सिर्फ इतना कहा था कि तू मुक्त हो जायेगा। तेरी जब श्रद्धा बड़ी है तो इस जुर्माने से क्या, मौत के जुर्माने से भी तू मुक्त हो जायेगा। तू डरता क्यों है....?

शेर की दाढ़ में आया हुआ शिकार क्वचित् छटक सकता है लेकिन सच्चे सदगुरूओं के हृदय में जिसका स्थान आ जाए वह कैसे छटक सकता है? संसार में वह कैसे भटक सकता है? वह मुक्त होगा ही।

'एकनाथ जी ने कहा थाः 'सात दिन में तेरी मृत्यु है।' एकनाथ जी के वचन उसने सत्य माने इसलिए जीवन में परिवर्तन हो गया।

एकनाथ जी कहते हैं- "भाई ! तुमने पूछा था न कि मुझमें व तुममें क्या फर्क है ? तुम ऐसे महान् और मैं सामान्य क्यो ? तुम इतने पवित्र और मैं ऐसा पापी क्यों? तो मैंने तुम्हें बताया था कि सात दिन में तुम्हारी मौत होगी।

तुमने मौत को सात दिन ही दूर समझा था। अब बताओ, मेरी उस मुलाकात के बाद, सात दिन में होने वाली मौत के बारे में सुनने के बाद, तुमने कितनी बार शराब पी ?"

वह बोलाः "एकबार भी नहीं, छुआ तक नहीं।"

"माँस कितना खाया?"

"बिल्कुल नहीं खाया। विट्ठल्ला का नाम ही जपता रहा, और कुछ भी नहीं किया मैंने।"

"कितनी बार झगड़ा किया?"

"नहीं, झगड़ा-वगड़ा मुझे कुछ याद ही नहीं रहा सिवाय तीन दिन..... दो दिन... एक दिन..... मैं भला किससे झगड़ा करता ? मैं अब केवल तुम्हारी शरण में हूँ।" ऐसा कहकर 'विट्ठल्ला..... विट्ठल्ला' करते हुए वह एकनाथ जी के चरणों में पड़ा।"

एकनाथ जी कहते हैं- "चलो ठीक है। अब एक बात समझ लो। तुमको छः दिन, पाँच दिन, चार दिन, तीन दिन मौत दूर दिखी, जितनी-जितनी मौत नजदीक आती गई, तुम उतने अधिक ईश्वरमय होते गये और संसार फीका होता गया। यह तुम्हारा अपना अनुभव है कि दूसरे किसी का ?"

वह कहता हैः "सब मेरा अनुभव है गुरूजी ! कुछ रस नहीं दिखता, संसार में कहीं कोई रस नहीं है।"

एकनाथ जीः "तुझे अब यह पता चला कि  तेरी मौत केवल सात दिन दूर है तो तुझे कहीं रस नहीं दिखता लेकिन मेरे गुरूदेव ने तो मुझे अपने सामने ही मौत दिखा दी है। मैं रोज मौत को याद करता हूँ, इसलिए मुझे संसार में आसक्ति नहीं और प्रभु में प्रीति है। प्रभु में जिसकी प्रीति है उसके साथ दुनियादार प्रीति करते हैं, इसलिए मैं बड़ा दिखता हूँ और तुम छोटे दिखते हो, वरना तुम और मैं दोनों एक ही तो है।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।

बन्धुरात्मात्मस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।

अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।

'अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले, क्योंकि यह मनुष्य आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है।'

(गीताः 6.5,6)

यदि अनात्म वस्तुओं में चित्त लगाया, अनात्म पदार्थों में मन लगाया तो आप अपने आपके शत्रु हो जाते हैं और छोटे हो जाते हैं लेकिन अनात्म वस्तुओं से मन को हटाकर यदि आत्मा में लगाते हैं तो आप श्रेष्ठ हो जाते हैं। आप अपने आपके मित्र हो जाते हैं और बड़े हो जाते हैं।

नानक तुमसे बड़े नहीं थे, कबीर तुमसे बड़े नहीं थे, महावीर तुमसे बड़े नहीं थे, बुद्ध तुमसे बड़े नहीं थे, क्राईस्ट तुमसे बड़े नहीं थे, श्रीकृष्ण भी तुमसे बड़े नहीं थे अपितु तुम्हारा ही रूप थे लेकिन वे सब इसलिए बड़े हो गये कि उन्होंने अपने आप में स्थिति की और हम लोग पराये में स्थिति करते हैं। इसलिये हम मारे गये और वे लोग तर गये। बस, इतना ही फर्क है। जो हो गया सो हो गया, समय बीत गया सो बीत गया लेकिन अब बात समझ में आ गई तो आप याद रखना कि सात दिन में ही आपको भी मरना है। उस सेठ को तो सचमुच एकनाथ जी ने रहस्य खोलकर नहीं बताया इस कारण उसका कल्याण हुआ। मैंने तो तुम्हें इसलिए रहस्य खोलकर बताया कि तुम समझदार हो। इस रहस्य को समझते हुए भी तुम सात दिन में मौत को याद रखोगे तो कल्याण हो जाएगा।....और सच बोलता हूँ कि सात दिन के अन्दर ही अन्दर मौत होने वाली है। उस मौत को सामने रखना कि आखिर कब तक....?

कल रविवार है.... छुट्टी मनाएँगे..... खेलेंगे......घूमेंगे... लेकिन एक रविवार ऐसा भी हो तो हो सकता है जिस दिन हमें अर्थी पर सवार होकर जाना पड़े। सोमवार को हम किसी मित्र से मिलने को जा रहे हैं..... हो सकता है कि कोई ऐसा सोमवार हो कि हमें शमशान में ही जाना पड़े।

मंगल को हम इससे मिलेंगे, उससे मिलेंगे.... हो सकता है कोई मंगल ऐसा भी आएगा कि हम अर्थी से मिलेंगे। बुध को हम यह करेंगे..... वह करेंगे.....  हो सकता है बुध को बुद्धू की नाई हमारा शव पड़ा हो।

गुरूवार को हम यह करेंगे..... वह करेंगे.... ऐसा करेंगे..... लेकिन क्या पता गुरू को हम गुरू के द्वार जाते हैं कि यम के द्वार जाते हैं, कोई पता नहीं। हाँ, शुक्र को हम यह करेंगे......। अरे ! शुक्र को शुक्रचार्य जैसे ज्ञान को पाते हैं कि शूकर जैसी योनियों की तरफ जाते हैं, कोई पता नहीं।

शनिवार को भी वहीः यह करेंगे..... वह करेंगे..... अरे, उस मौत को भूलो मत। सुबह उठो तो परमात्मा और मौत को याद करो कि क्या पता कौन-से दिन चले जाएँगे। आज सोमवार है तो क्या पता इस देह का अंत किस सोमवार को हो जाए। आज मंगल है तो क्या पता किस मंगल को चले जाएँ।

आप तो चतुर हैं, समझदार हैं इसलिए मौत और परमात्मा दोनों को सामने रखोगे तो फिर महान् होने में देर नहीं होगी। मौत और परमात्मा को सामने रखोगे तो अपने गाँव का साईन बोर्ड देखने में भी जरा उत्साह होगा। अपने गाँव के नाम का बोर्ड आ जाए तो फिर तुम सीधे चले ही जाना, पूछने मत लग जाना कि 'मेरा गाँव है या तेरा गाँव? तुम तो चले ही जाना अपने गाँव में।

अमुक भाई गया है कि नहीं? उसका इंतजार मत करना।

कई लोग आश्चर्यजनक बातें करता हैं। उस परमात्मा के वातावरण में बैठते ही उनका चित्त शांत हो जाता है। चित्त जब शांत होता है तो खुली आँखों से भी आनन्द आने लगता है और जब चित्त ही शांत नहीं तो बन्द आँखों से भी कुछ नहीं होता है।

जब-जब तुम्हें आनन्द आने लग जाय तो समझना है कि अनजाने में चित्त शांत हो गया है। तुम्हारे परिश्रम के बिना, वातावरण की कृपा से, भगवान की, संतों की करुणा-कृपा से तुम्हारा मन अनजाने में ही ध्यानस्थ हो जाता है, धारणा में आ जाता है, तभी तुम्हें आनन्द आता है।

कई लोग अजीब किस्म के होते हैं जो कहते हैं-

"साँईं ! मुझ पर दया कर दो।"

मैंने पूछाः "क्या बात है?"

"मेरा ध्यान नहीं लगता, दया कर दो।" जबकि चेहरा खबर दे रहा था कि अमृत पिया है, एकाध घूँट झेल लिया है।

मैंने फिर पूछाः "क्या होता है?"

"आनन्द तो बहुत आता है।"

"आनन्द तो बहुत आता है और ध्यान नहीं लगता? अरे, बड़े मियां ! ध्यान का फल क्या है? आनंद है कि दुःख? ध्यान का फल क्या है? ईश्वर प्राप्ति का फल क्या है?"

मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।।

भगवान कहते हैं – मेरे दर्शन का फल अनुपम है, वह यह कि जीव अपना स्वरूप पा ले, अपने सहज सुखस्वरूप की उसे अनुभूति होने लगे।

सुखस्वरूप की झलकें आने लगे इस हेतु यह जरूरी नहीं है कि गुरू दीक्षा लेंगे, गुरूजी फूँक मारेंगे, सिर पर हाथ रखेंगे और हम नारियल देंगे, पैसे देंगे, फिर गुरू अपना ब्रह्मज्ञान देंगे या अपनी करूणा कृपा देंगे। यह तो पंडित गुरू का काम है, भैया !

सदगुरू तो बिना लिये ही दे देते हैं। ढूँढते रहते हैं कि कोई मिल जाए पाने वाला। विधि-विधान बने, हम शिष्य बनें, तभी वे कुछ देंगे, ऐसी बात नहीं। वे पहले ऐसे ही करूणा-कृपा बरसा देते हैं, बाद में हमारी श्रद्धा होती है तो हम उन्हें गुरू मानते हैं अन्यथा उन्हें तो गुरू मनवाने की इच्छा नहीं होती क्योंकि वे तो गुरूओं के भी गुरू हैं, विश्वात्मा हैं। वे कोई दो, चार, दस, बीस, पचास आदमियों के गुरू नहीं हैं अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के गुरू हैं। जिन्होंने जगत के पदार्थों की आस भीतर से छोड़ रखी है, वे तो सारे जगत के गुरू हैं, फिर चाहे हम उन्हें मानें या न मानें। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

कबीरा जोगी जगत गुरू, तजै जगत की आस।

जो जग की आशा करे, जग गुरू वह दास।।

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अनुक्रम

सदगुरू-महिमा

जिनके जीवन में आत्मशांति प्राप्त करने की रूचि व तत्परता है, वे इस पृथ्वी के देव ही हैं। देव दो प्रकार के माने जाते हैं- एक तो स्वर्ग में रहने वाले और दूसरे धरती पर के देव। इनमें भी धरती पर के देव को श्रेष्ठ माना जाता है क्योंकि स्वर्ग के देव तो स्वर्ग के भोग भोगकर अपना पुण्य नष्ट कर रहे हैं जबकि पृथ्वी के देव अपने दान, पुण्य, सेवा, सुमिरन आदि के माध्यम से पाप नष्ट करते हुए हृदयामृत का पान करते हैं। सच्चे सत्संगी मनुष्य को पृथ्वी पर का देव कहा जाता है।

कबीर जी के पास ईश्वर का आदेश आया कि तुम वैकुण्ठ में पधारो। कबीर जी की आँखों में आँसू आ गये। इसलिए नहीं कि अब जाना पड़ता है, मरना पड़ता है.... बल्कि इसलिए कि वहाँ सत्संग नहीं मिलेगा। कबीर जी लिखते हैं-

राम परवाना भेजिया, वाँचत कबीरा रोय।

क्या करूँ तेरी वैकुण्ठ को, जहाँ साध-संगत नहीं होय।।

ईश्वर का साकार दर्शन करने के बाद मोह हो सकता है, काम, क्रोध, कपट, बेईमानी रह सकती है। कैकेयी, मंथरा, शूर्पणखा, दुर्योधन, शकुनि आदि ईश्वर का दर्शन करते थे फिर भी उनमें दुर्गुण मौजूद थे क्योंकि भगवान का दर्शन आत्मरूप से कराने वाले सदगुरूओं का संग उन्होंने नहीं किया।

शरीर की आँखों से भले ही कितना भी दर्शन करो, लेकिन जब तक ज्ञान की आँख नहीं खुलती तब तक आदमी थपेड़े खाता ही रहता है। दर्शन तो अर्जुन ने भी किये थे श्री कृष्ण के, परंतु जब श्रीकृष्ण ने उपदेश देकर कृष्ण तत्त्व का दर्शन कराया तब अर्जुन कहता हैः

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।

स्थितिऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव।।

'हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गई है। मैं सन्देह रहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।'

(गीताः 18.73)

शिवजी का दर्शन हो जाय, राम जी का हो जाय या श्री कृष्ण का हो जाय लेकिन जब तक सदगुरू आत्मा-परमात्मा का दर्शन नहीं कराते तब तक काम, क्रोध, लोभ, मोह, पाखंड और अहंकार रह सकता है। सदगुरू के तत्त्वज्ञान को पाये बिना इस जीव की, बेचारे की साधना अधूरी ही रह जाती है। तब तक वह मन के ही जगत् में ही रहता है और मन कभी खुश तो कभी नाराज। कभी मन में मजा आया तो कभी नहीं आया। इसलिये कबीर जी ने कहा हैः

भटक मूँआ भेदू बिना पावे कौन उपाय।

खोजत-खोजत जुग गये, पाव कोस घर आय।।

यह जीव चाहता है तो शांति, मुक्ति और अपने नाथ से मिलना। मृत्यु आकर शरीर छीन ले और जीव अनाथ होकर मर जाय उसके पहले अपने नाथ से मिलना चाहिए, परंतु मन भटका देता है बाहर की, संसार की वासनाओं में। कोई-कोई भाग्यशाली होते हैं वे ही दान-पुण्य करना समझ पाते होंगे। उनसे कोई ऊँचा होता होगा वह सत्संग में आता है और उनसे भी ऊँचाई पर जब कोई बढ़ता है तब वह सत्यस्वरूप आत्मा परमात्मा में पहुँचता, उसे परम शांति मिलती है, जिस परम शांति के आगे, इन्द्र का वैभव भी कुछ नहीं।

आपूर्यमाणचलं प्रतिष्ठं, समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।

तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी।।

'जैसे जल द्वारा परिपूर्ण समुद्र में सम्पूर्ण नदियों का जल चारों ओर से आकर मिलता है पर समुद्र अपनी मर्यादा में अचल प्रतिष्ठित रहता है, ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य में विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परम शांति को प्राप्त होता है, भोगों की कामना वाला नहीं।'

(गीताः 2.70)

जैसे समुद्र में सारी नदियाँ चली जाती हैं फिर भी समुद्र अपनी मर्यादा नहीं छोड़ता, सबको समा लेता है, ऐसे ही उस निर्वासनिक पुरूष के पास सब कुछ आ जाय फिर भी वह परम शांति में निमग्न पुरूष ज्यों का त्यों रहता है। ऐसी अवस्था का ध्यान कर अगर साधन-भजन किया जाय तो मनुष्य शीघ्र ही अपनी उस मंजिल पर पहुँच ही जाता है।

निम्न तीन बातें सब लोगों को अपने जीवन में लानी ही चाहिए। ये तीन बातें जो नहीं जानता वह मनुष्य के वेश में पशु ही हैः

पहली बातः मृत्यु कभी भी, कहीं भी हो सकती है, यह बात पक्की मानना चाहिए।

दूसरी बातः बीता हुआ समय पुनः लौटता नहीं है। अतः सत्यस्वरूप ईश्वर को पाने के लिए समय का सदुपयोग करो।

तीसरी बातः अपना लक्ष्य परम शांति यानि परमात्मा होना चाहिए।

यदि आप लक्ष्य बना कर नहीं आते तो क्या सत्संग में पहुँच पाते? अतः पहले लक्ष्य बनाना पड़ता है फिर यात्रा शुरू होती है। भगवान की भक्ति का उच्च लक्ष्य बनाते नहीं है इसलिये हम वर्षों तक भटकते-भटकते अंत में कंगले के कंगले ही रह जाते हैं।

आप पूछेंगेः "महाराज ! कंगले क्यों? भक्ति की तो धन मिला, यश मिला।"

भैया ! यह तो मिला लेकिन मरे तो कंगले ही रह गये। सच्चा धन तो परमात्मा की प्राप्ति है। यह तो बाहर का धन है जो यहीं पड़ा रह जायेगा। इस शरीर को भी कितना ही खिलाओ-पिलाओ, यह भी यहीं रह जायेगा। सच्चा धन तो आत्मधन है। कबीर जी ने ठीक ही कहा हैः

कबीरा यह जग निर्धना, धनवंता नहीं कोई।

धनवंता तेहुँ जानिये, जाको राम नाम धन होई।।

जिसके जीवन में रोम-रोम में रमने वाला परम शांति परम सुख व आनंदस्वरूप रामनाम का धन नहीं है वह धनवान होते हुए भी कंगाल ही तो है।

मनुष्य में इतनी सम्भावनाएँ हैं कि वह भगवान का भी माता-पिता बन सकता है। दशरथ-कौशल्या ने भगवान राम को जन्म दिया और देवकी-वसुदेव भगवान श्रीकृष्ण के माता-पिता बने। मनुष्य में इतनी सम्भावनाएँ हैं लेकिन यदि वह सदगुरू के चरणों में नहीं जाता और सूक्ष्म साधना में रूचि नहीं रखता तो मनुष्य भटकता रहता है।

आज भोगी भोग में भटक रहा है, त्यागी त्याग में भटक रहा है और भक्त बेचारा भावनाओं में भटक रहा है। हालाँकि भोगी से और त्याग के अहंकारी से तो भक्त अच्छा है लेकिन वह भी बेचारा भटक रहा है। इसीलिए नानकजी ने कहाः

संत जना मिल हर जस गाइये।

उच्च कोटि के महापुरूषों के चरणों में बैठकर हरिगुण गाओ, उनसे मार्गदर्शन लेकर चलो। कबीर जी ने कहा हैः

सहजो कारज संसार को, गुरू बिना होत नाहीं।

हरि तो गुरू बिन क्या मिले, समझ ले मन मांहीं।।

संसार का छोटे-से-छोटा कार्य भी सीखने के लिए कोई न कोई तो गुरू चाहिए और फिर बात अगर जीवात्मा को परमात्मा का साक्षात्कार करने की आती है तो उसमें सदगुरू की आवश्यकता क्यों न होगी भैया ?

मेरे आश्रम में एक महंत रहता है। मुझे एक बार सत्संग के लिए कहीं जाना था। मैंने उस महंत से कहाः "रोटी तुम अपने हाथों से बना लेना, आटा-सामान यहाँ पड़ा है।"

उसने कहाः "ठीक है।"

वह पहले एक सेठ था, बाद में महंत बन गया। तीन दिन के बाद जब मैं कथा करके लौटा तो महंत से पूछाः "कैसा रहा? भोजन बनाया था कि नहीं?"

महंतः "आटा भी खत्म और रोटी एक भी नहीं खाई।"

मैंने पूछाः "क्यों, क्या हुआ?"

महंतः "एक दिन आटा थाल में लिया और पानी डाला तो रबड़ा हो गया। फिर सोचाः थोड़ा-थोड़ा पानी डालकर बनाऊँ तो बने ही नहीं। फिर सोचाः वैसे भी रोटी बनाते हैं तो आटा ही सिकता है तो क्यों न तपेली में डालकर जरा हलवा बना लें ? हलवा बनाने गया तो आटे में गाँठें ही गाँठें हो गई तो गाय को दे दिया। फिर सोचाः चलो मालपूआ जैसा कुछ बनावें लेकिन स्वामी जी ! कुछ जमा ही नहीं। आटा सब खत्म हो गया और रोटी का एक ग्रास भी नहीं खा पाया।"

जब आटा गूँथने और सब्जी बनाने के लिए भी बेटी को, बहू को किसी न किसी से सीखना पड़ता है तो जीवात्मा का भी यदि परमात्मा का साक्षात्कार करना है तो अवश्य ही सदगुरू से सीखना ही पड़ेगा।

गुरू बिन भवनिधि तरहिं न कोई।

चाहे विरंचि संकर सम होई।।

गुरू की कृपा के बिना तो भवसागर से नहीं तरा जा सकता। ऐसे महापुरूषों को पाने के लिए भगवान से मन ही मन बातचीत करो किः "प्रभु ! जिंदगी बीती जा रही है, अब तो तेरी भक्ति, तेरा ध्यान और परम शांति का प्रसाद लुटाने वाले किसी सदगुरू की कृपा का दीदार करा दे।"

दुनिया भर की बातें तो तुमने बहुत सुनी, लाला ! बहुत कही.... बहुत कहोगे.... लेकिन अंत में उससे कुछ न मिलेगा, रोते रह जाओगे.... इसलिए कभी कभी उस दुनिया के स्वामी के साथ बातचीत किया करो। कभी रोना नहीं आता है तो इस बात पर रोओ कि पैसों के लिए रोता है, वाह-वाही के लिए रोता है, लेकिन ऐ मेरे पापी मन ! परमात्मा के लिए तुझे रोना ही नहीं आता ? कभी उसको प्यार करते-करते हँसो, फिर देखो कि धीरे-धीरे कैसे तुम्हारी चेतना जागृत होती है। कोई सच्चे सदगुरू ब्रह्मवेत्ता मिल जाएँगे और उनकी सम्प्रेक्षण शक्ति का यदि थोड़ा सा अंश भी मिल गया तो आप लोग जिस तरह यहाँ शिविरों में सहज ही ध्यानमग्न हो जाते हो, ऐसा अनुभव आप अपने घर में भी पूजनकक्ष में कर सकते हो।

आप जितनी अधिक अन्तरंग साधना उपासना करेंगे, अन्दर के देवता का दर्शन करने जाएँगे, उतनी ही आपकी पर्ते हटती जाएँगी। बाहर के देव के दर्शन करने में तो तुम्हें लाईन लगानी पड़ेगी, पर्ची कटवाने पर भी चाहे दर्शन हो या न हो लेकिन इस अंदर के देव के दर्शन एक बार ठीक से हो गये तो फिर बाहर के देव के दर्शन तुमने नहीं किये तो भी चिन्ता की बात नहीं। तुम जहाँ भी हो, वहाँ देव ही देव है।

उस परमात्मा की कृपा पाने के लिए आप छटपटाओ, कभी यत्न करो। जिन्दगी का इतना समय बीता चला जा रहा है, अब कुछ ही शेष बचा है...... डेढ़ साल..... दो साल..... पाँच.... दस..... बीस या तीस साल और अंत में क्या....? यह जीवन बहती गंगा की तरह बह रहा है। उसमें से अपना समय बचाकर काम कर लो भैया.....!

उस सत्यस्वरूप का संग करो। सुबह नींद से उठते ही संकल्प करोः "प्रभु ! तेरा संग कैसे हो?" कभी व्यवहार करते-करते बार-बार सोचो किः "ऐ मेरे परमात्मा ! तू मेरे साथ है लेकिन मैं अभी तक तेरा संग नहीं कर रहा हूँ और मिटने वाली चीजों और मरने वाले दोस्तों के संग में पड़ा हूँ लेकिन हे मेरे अमिट-अमर मालिक ! तेरी दोस्ती का रंग मुझे कब लगेगा ? तू क्या कर दे प्रभु !"

अगर आपने सच्चे हृदय से ऐसी प्रार्थना की है तो वह काम कर लेगी। यदि हृदय से सच्ची प्रार्थना नहीं निकल पाती है तो कम से कम