
प्रातःस्मरणीय
पूज्यपाद संत
श्री
आसारामजी
बापू के
सत्संग-प्रवचन
शीघ्र
ईश्वरप्राप्ति
घुटनों के जोड़ों
के दर्द के लिए
व्यायाम
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गुरूपूर्णिमा के पावन पर्व पर 'शीघ्र ईश्वरप्राप्ति' नाम की पुस्तक आपके करकमलों तक पहुँचाते हुए आनन्द का अनुभव कर रहे हैं।
पुंसां
कलिकृताना
दोषान्
द्रव्यदेशात्मसम्भवान्।
सर्वान्
हरति
चित्तस्थो
भगवान
पुरूषोत्तमः।।
'कलियुग के अनेको दोष हैं। सब वस्तुएँ दोषित हो जाती हैं, स्थानों में भी दोष की प्रधानता आ जाती है। परंतु जब भगवान पुरूषोत्तम हृदय में आ विराजते हैं, तब उनकी संन्निधि मात्र से ही सबके सब दोष नष्ट हो जाते हैं।'
(श्रीमद् भागवतः 12.3.45)
श्रीमद् भागवत की यह उक्ति अपने इसी जीवन में अनुभूत हो सकती है। पूज्यश्री की पापनाशिनी विद्युन्मय अमृतवाणी में से संकलित इस सामग्री में पूज्यश्री के ऐसे पावन प्रेरक संकल्प निहित हैं कि इसके वाचन-मनन से कलियुग के दोषों को निवारण होने लगता है, हृदय पवित्र होने लगता है। पवित्र हृदय में परमात्मा को आमंत्रित एवं प्रतिष्ठित करने की लालसा एवं योग्यता आती है। इस प्रकार साधक आगे चलकर मुक्तिलाभ प्राप्त कर सकता है। फलतः उसका जीवन तनावरहित, अहंकाररहित, सुखमय, शांतिमय, आनन्दमय अर्थात् परमात्मामय बनता है। उसके दिव्य जीवन की सुहास से आसपास का वातावरण भी पुलकित और पावन होता है।
इस भगवन्निष्ठा में दृढ़स्थित पुरूष जहाँ भी रहता है, जहाँ भी जाता है, जो भी बोलता है, जो भी करता है सब भगवन्मय होता है। उसकी उपस्थिति मात्र से मनुष्य को बल, उत्साह, सांत्वना, सुख और ज्ञान मिलता है। हृदय परमात्मा के प्रेम से भर जाता है।
आओ, हम इस दिव्यातिदिव्य अमृतवाणी को अपने में अवतरित करें। अपने जीवन को उन्नत बनायें, कृतार्थता का अनुभव करें और हम पर जो गुरू, शास्त्र एवं संतों का ऋण है उससे उऋण होने की भावना को पुष्ट करें, आत्म-परमात्म-साक्षात्कार के पथ पर अग्रसर बनें और दूसरों को भी इसी कल्याणमय पथ की पुण्यमयी यात्रा कराने का पुण्यलाभ प्राप्त करें।
श्री योग वेदान्त सेवा समिति
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बहुत
से रास्ते यूँ
तो दिल की तरफ
जाते हैं।
राहे
मोहब्बत से आओ
तो फासला बहुत
कम है।
जीवत्मा अगर परमात्मा से मिलने के लिए तैयार हो तो परमात्मा का मिलना भी असंभव नहीं। कुछ समय अवश्य लगेगा क्योंकि पुरानी आदतों से लड़ना पड़ता है, ऐहिक संसार के आकर्षणों से सावधानीपूर्वक बचना पड़ता है। तत्पश्चात् तो आपको रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होगी, मनोकामनाएँ पूर्ण होने लगेगी, वाकसिद्धि होगी, पूर्वाभ्यास होने लगेंगे, अप्राप्य एवं दुर्लभ वस्तुएँ प्राप्य एवं सुलभ होने लगेंगी, धन-सम्पत्ति, सम्मान आदि मिलने लगेंगे।
उपरोक्त सब सिद्धियाँ इन्द्रदेव के प्रलोभन हैं।
कभी व्यर्थ की निन्दा होने लगेगी। इससे भयभीत न हुए तो बेमाप प्रशंसा मिलेगी। उसमें भी न उलझे तब प्रियतम परमात्मा की पूर्णता का साक्षात्कार हो जाएगा।
दर्द
दिल में
छुपाकर
मुस्कुराना
सीख ले।
गम
के पर्दे में
खुशी के गीत
गाना सीख ले।।
तू
अगर चाहे तो
तेरा गम खुशी
हो जाएगा।
मुस्कुराकर
गम के काँटों
को जलाना सीख
ले।।
दर्द का बार-बार चिन्तन मत करो, विक्षेप मत बढ़ाओ। विक्षेप बढ़े ऐसा न सोचो, विक्षेप मिटे ऐसा उपाय करो। विक्षेप मिटाने के लिए भगवान को प्यार करके 'हरि ॐ' तत् सत् और सब गपशप का मानसिक जप या स्मरण करो। ईश्वर को पाने के कई मार्ग हैं लेकिन जिसने ईश्वर को अथवा गुरूतत्त्व को प्रेम व समर्पण किया है, उसे बहुत कम फासला तय करना पड़ा है।
कुछ लोग कहते हैं- "बापू ! इधर आने से जो मुनाफा मिलता है उसे यदि समझ जाएँ तो फिर वह बाहर का, संसार का धन्धा ही न करें।"
कोई पूछता हैः "तो संसार का क्या होगा ?"
बड़ी चिन्ता है भैया ! तुम्हें संसार की ? अरे यह तो बनाने वाले, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जानें। तुम तो अपना काम कर लो।
कोई पूछता हैः "स्वामी जी ! आप तन्दरूस्ती के ऐसे नुस्खे बताते हैं कि कोई बीमार ही न पड़े। तो फिर बेचारे डॉक्टर क्या खाएँगे ?"
अरे भैया ! पहले इतने डॉक्टर नहीं थे तब भी लोग खा रहे थे। वे डॉक्टरी नहीं करते थे, दूसरा काम करते थे। या अभी तो तुम तंदुरुस्त रहो और डॉक्टर लोग जब भूखों मरें तब तुम बीमार हो जाना।
कोई पूछता हैः "सब अगर मुक्ति चाहेंगे तो संसार का क्या होगा ?"
अरे, फिर नये जन्म होंगे और संसार की गाड़ी चलती रहेगी, तुम तो मुक्त हो जाओ।
कोई पूछता हैः "हम बीमार न पडेंगे तो दवाइयों का क्या होगा ?"
अरे, दवाइयाँ बनना कम हो जाएगी और क्या होगा ? हम गुनाह न करें तो जेल खाली पड़ी रह जाएगी इसीलिए गुनाह कर रहे हैं। यह कैसी बेवकूफी की बात है ! अरे सरकार को तो आराम हो जाएगा बेचारी को।
ऐसे ही हम साधन भजन करके इन विकारों से, अपराधों से जब बच जाते हैं तो नरक थोड़ा खाली होने लगता है। यमराज व देवताओं को आराम हो जाता है।
दूसरों को आराम पहुँचाना तो अच्छी बात है न कि अपने को या दूसरों को सताना। अतः आप सत्कार्यों के माध्यम से स्नेहमयी वाणी व प्रेमपूर्वक व्यवहार को अपने में उतारकर प्रसन्नात्मा होकर स्वयं भी स्व में प्रतिष्ठित होकर आराम प्राप्त करने की चेष्टा करना व हमेशा औरों को खुशी मिले ऐसे प्रयास करना।
जीना
उसी का है जो
औरों के लिये
जीता है।
ॐ नारायण..... नारायण...... नारायण....
किसी इन्सान का धन-सम्पदा, रूपया पैसा चला जाए अथवा मकान-दुकान चली जाए तो इतना घाटा नहीं क्योंकि वे तो आँख बन्द होते ही चले जाने वाले हैं लेकिन श्रद्धा चली गई, साधन भजन चला गया तो फिर कुछ भी शेष नहीं रहता, वह पूरा कंगाल ही हो जाता है। ये चीजें चली गई तो तुम इसी जन्म में दो चार वर्षों तक कुछ कंगाल दिखोगे लेकिन भीतर का खजाना चला गया तो जन्मों तक कंगालियत बनी रहेगी।
इसलिए हे तकदीर ! अगर तू मुझसे धोखा करना चाहती है, मुझसे छीनना चाहती है तो मेरे दो जोड़ी कपड़े छीन लेना, दो लाख रूपये छीन लेना, दो साधन छीन लेना, गाड़ियाँ मोटरें छीन लेना लेकिन मेरे दिल से भगवान के गुरू के दो शब्द मत छीनना। गुरू के लिए, भगवान के लिए, साधना के लिए जो मेरी दो वृत्तियाँ हैं – साधन और साध्य वृत्तियाँ हैं, ये मत छीनना।
एक प्रौढ़ महिला भोपाल में मेरे प्रवचन काल के दौरान मुझसे मिलने आई। वह बोलीः "बाबाजी ! आप कृपया मेरे स्कूल में पधारिये।"
वह बंगाली महिला स्कूल की प्रधानाध्यापिका थी।
मैंने कहाः "बहन ! अभी समय नहीं है।"
इतना सुनते ही उस महिला की आँखों से आँसू टपक पड़े। वह कहने लगीः "बाबा जी ! मैं आनन्दमयी माँ की शिष्या हूँ।"
मैंने महसूस किया है कि शिष्य की नजरों से जब गुरू का पार्थिव शरीर चला जाता है तो शिष्य पर क्या गुजरती है। मैं जानता हूँ। मैंने तुरन्त उस महिला से कहाः
"माई ! मैं तुम्हारे स्कूल में भी आऊँगा और घर भी आऊँगा।" उसे आश्चर्य हुआ होगा परन्तु मैं उसके घर भी गया और स्कूल में भी गया।
शिष्य को ज्ञान होता है कि गुरू के सान्निध्य से जो मिलता है वह दूसरा कभी दे नहीं सकता।
हमारे जीवन से गुरू का सान्निध्य जब चला जाता है तो वह जगह मरने के लिए दुनिया की कोई भी हस्ती सक्षम नहीं होती। मेरे लीलाशाह बापू की जगह भरने के लिए मुझे तो अभी कोई दीख नहीं रहा है। हजारों जन्मों के पिताओं ने, माताओं ने, हजारों मित्रों ने जो मुझे नहीं दिया वह हँसते हँसते देने वाले उस सम्राट ने अपने अच्युत पद का बोध व प्रसाद मुझे क्षणभर में दे डाला।
गुरू जीवित है तब भी गुरू, गुरू होते हैं और गुरू का शरीर नहीं होता तब भी गुरू गुरू ही होते हैं।
गुरू नजदीक होते हैं तब भी गुरू गुरू ही होते हैं और गुरू का शरीर दूर होता है तब भी गुरू दूर नहीं होते।
गुरू प्रेम करते हैं, डाँटते हैं, प्रसाद देते हैं, तब भी गुरू ही होते हैं और गुरू रोष भरी नजरों से देखते हैं, ताड़ते हैं तब भी गुरू ही होते हैं।
जैसे माँ मिठाई खिलाती है तब भी माँ ही होती है, दवाई पिलाती है तब भी माँ ही होती है, तमाचा मारती है तब भी माँ होती है। माँ कान पकड़ती है तब भी माँ होती है, ठण्डे पानी से नहलाती है तब भी माँ होती है और गरम थैली से सेंक करती है तब भी वह माँ ही होती है। वह जानती है कि तुम्हें किस समय किस चीज की आवश्यकता है।
तुम माँ की चेष्टा में सहयोग देते हो तो स्वस्थ रहते हो और उसके विपरीत चलते हो तो बीमार होते हो। ऐसे ही गुरू और भगवान की चेष्टा में जब हम सहयोग देते हैं तो आत्म-साक्षात्कार का स्वास्थ्य प्रकट होता है।
बच्चे का स्वास्थ्य एक बार ठीक हो जाए तो दोबारा वह पुनः बीमार हो सकता है लेकिन गुरू और भगवान द्वारा जब मनुष्य स्वस्थ हो जाता है, स्व में स्थित हो जाता है तो मृत्यु का प्रभाव भी उस पर नहीं होता। वह ऐसे अमर पद का अनुभव कर लेता है। ऐसी अनुभूति करवाने वाले गुरू, भगवान और शास्त्रों के विषय में नानकजी कहते हैं-
नानक
! मत करो
वर्णन हर
बेअन्त है।
जिस तरह भगवान के गुण अनन्त होते हैं उसी प्रकार भगवत्प्राप्त महापुरूषों की अनन्त करूणाएँ हैं, माँ की अनन्त करूणाएँ हैं।
एक बार बीरबल ने अपनी माँ से कहाः "मेरी प्यारी माँ ! तूने मुझे गर्भ में धारण किया, तूने मेरी अनगिनत सेवाएँ की। मैं किसी अन्य मुहूर्त में पैदा होता तो चपरासी या कलर्क होता। तू मुझे राजा होने के मुहूर्त में जन्म देना चाहती थी लेकिन विवशता के कारण तूने मंत्री होने के मुहूर्त में जन्म दिया। कई पीड़ाएँ सहते हुए भी तूने मुझको थामा और मेरे इतने ऊँचे पद के लिए क्या क्या कष्ट सहे ! माँ ! मेरी इच्छा होती है कि मैं अपने शरीर की चमड़ी उतरवाकर तेरी मोजड़ी बनवा लूँ।
माँ हँस पड़ीः "बेटे ! तू अपने शरीर की चमड़ी उतरवाकर मेरी मोजड़ी बनवाना चाहता है लेकिन यह चमड़ी भी तो मेरे ही शरीर से बनी हुई है।"
बच्चा कहता हैः "मेरी चमड़ी से तेरी मोजड़ी बना दूँ। लेकिन उस नादान को पता ही नहीं कि चमड़ी भी तो माँ के शरीर से बनी है। ऐसे ही शिष्य भी कहता है कि मेरे इस धन से, मेरी इस श्रद्धा से, इस प्रेम से, इस साधन से गुरूजी को अमुक-अमुक वस्तु दे दूँ लेकिन ये साधन और प्रेम भी गुरूजी के साध्य और प्रेम से ही तो पैदा हुए हैं !
चातक
मीन पतंग जब
पिया बिन नहीं
रह पाय।
साध्य
को पाये बिना
साधक क्यों रह
जाय।।
समुद्र जैसी गंभीरता और सुमेरू जैसी दृढ़ता दीक्षित साधक को पार पहुँचाने में समर्थ है। साधक उसके आविष्कारों तथा रिद्धि-सिद्धियों में आकर्षित नहीं होता है तो और अधिक सूक्ष्मतर स्थिति में पहुँचता है। सूक्ष्मतर अवस्था में भी जो उपलब्धियाँ हैं – दूरश्रवण, दूरदर्शन, अणिमा, गरिमा, लघिमा आदि जो सिद्धियाँ हैं इनमें भी जो नहीं रूकता वह सूक्ष्मतम सचराचर में व्यापक परमेश्वर का साक्षात्कार करके जीवन्मुक्त हो जाता है तथा जिस पद में भगवान ब्रह्मा, विष्णु और महेश प्रतिष्ठित हैं उसका वह अनुभव कर लेता है। जैसे, पानी के एक बुलबुले में से आकाश निकल जाए तो बुलबुले का पेट फट जाएगा। जीवत्व का, कर्त्ता का, बँधनों का, बुलबुले का आकाश महाकाश से मिल जाएगा। घड़े का आकाश महाकाश से मिल जाएगा। बूँद सिंधु हो जाएगी। ऐसे ही अहं का पेट फट जाएगा। तब अहं हटते ही जीवात्मा परमात्मा से एक हो जाएगा।
जिस तरह पानी की एक बूँद वाष्पीभूत होती है तो वह तेरह सौ गुनी अधिक शक्तिशाली हो जाती है। ऐसे ही प्राणायाम, ध्यान और जप से प्राणशक्ति, सूक्ष्म करने पर आपका मन प्रसन्न, निर्मल और सूक्ष्म होता है। प्राण एक ऐसी शक्ति है जो सारे विश्व को संचालित करती है। बीजों का अंकुरण तथा पक्षियों का किलौल प्राणशक्ति से ही होता है। यहाँ तक कि मानुषी एवं दैवी सृष्टि भी प्राणशक्ति के प्रभाव से ही संचालित एवं जीवित रहती है। ग्रह-नक्षत्र भी प्राणशक्ति से ही एक दूसरे के प्रति आकर्षित होकर कार्य करते हैं अर्थात् प्राणशक्ति जितनी स्थूल होगी उतनी ही साधारण होगी और जितनी सूक्ष्म होगी उतनी ही महत्त्वपूर्ण होगी।
संसार का सार शरीर है शरीर का सार इन्द्रियाँ हैं। इन्द्रियों का सार मन है और मन का सार प्राण है। अगर प्राण निकल जाए तो तुम्हारे हाथ, पैर, आँख, कान, नाक आदि होते हुए भी तुम कुछ नहीं कर पाते। प्राण निकलने पर आदमी भीतर बाहर ठप्प हो जाता है। प्राण जितने स्वस्थ होंगे, आदमी उतना ही स्वस्थ और तंदरूस्त रहेगा। जैसे कोई रोगी अगर तरूण है तो उसका रोग शीघ्रता से दूर होगा तथा शल्यक्रिया के घाव शीघ्रता से भरेंगे। वृद्ध है तो देर से भरेंगे क्योंकि उसकी प्राणशक्ति वृद्धावस्था के कारण मंद हो जाती है। जो योगी लोग हैं, उनकी उम्र अधिक होने पर भी साधारण युवान की अपेक्षा उनकी रोगप्रतिकारक क्षमता अधिक होती है क्योंकि प्राणायाम आदि के माध्यम से वृद्धावस्था में भी वे अपनी प्राणशक्ति को जवान की भाँति सँभाले रहते हैं।
प्रत्येक धर्म के उपदेशक अथवा नेता व्यक्ति जो कि भाषण या उपदेश देते हैं अथवा प्रभावशाली व्यक्तित्व रखते हैं उनके पीछे भी प्राणशक्ति की सूक्ष्मता का ही प्रभाव रहता है।
प्राणशक्ति नियंत्रित और तालबद्ध होती है तो आपका मन प्रसन्न और नियंत्रित रहता है। जितने अशों में आपका मन नियंत्रित एवं प्रसन्न तथा प्राणशक्ति तालबद्ध रहती है उतने ही अंशों में आपके विचार उन्नत एवं व्यक्तित्व प्रभावशाली दिखता है।
बजाज कम्पनी वाले जमनादास बजाज के दामाद श्रीमन्नारायण गुजरात के गवर्नर रह चुके हैं। वे एक बार रिसर्च की दुनियाँ में बहुत सारे सुंदर आविष्कार करने वाले आइन्स्टीन से मिलने गये और उनसे पूछाः "आपकी उन्नति का क्या रहस्य है जिससे आपका विश्व के इतने आदरणीय वैज्ञानिक हो गये ?"
आइन्स्टीन ने स्नेह से श्रीमन्नारायण का हाथ पकड़ा और वे उन्हें अपने प्राइवेट कक्ष में ले गये। उस कमरे में फर्नीचर नहीं था। उसमें ऐहिक आकर्षण पैदा करके आदमी को धोखे में गुमराह करने वाले नाचगान के टी.वी., रेडियो आदि साधन नहीं थे अपितु वहाँ भूमि पर एक साफ सुथरी चटाई बिछी थी। उस पर एक आसन था और ध्यान करने के लिए सामने दीवार पर एक प्रतिमा, मूर्ति थी। आइन्स्टीन ने कहाः
"मेरे विकास का मूल कारण यही है कि मैं प्रतिदिन यहाँ ध्यान करता हूँ।"
ध्यान से मन एकाग्र होता है। प्राण तालबद्ध चलते हैं। प्राणायाम करने से भी प्राप्त तालबद्ध होकर मन की एकाग्रता में वृद्धि करते हैं। दुनिया के जितने भी प्रभावशाली उपदेशक, प्रचारक आदि हो गये हैं, चाहे वे राम हों, कृष्ण हों, मोहम्मद हों, ईसा हों, कबीर हों, नानक हों, इनका प्रभाव आमजनता पर इसलिए पड़ा कि उन्होंने धारणाशक्ति का अवलम्बन, बंदगी, प्रार्थना आदि का अवलम्बन लेकर जाने-अनजाने में अपनी प्राणशक्ति का विकास कर लिया था।
भगवान सबमें उतने का उतना ही है और शरीर का मसाला भी सबके पास करीब-करीब एक जैसा ही है। रक्त, हाड-माँस, श्वास लेने के लिए नाक और देखने की आँखे ये साधन तो एक से ही हैं फिर भी एक आदमी एकाध साधारण नौकरी करना चाहता है तो उसको मिलती नहीं और दूसरा आदमी बड़ी ऊँची कुर्सी पर होकर त्यागपत्र दे देता है तो भी उसकी दूसरी ऊँची नौकरी मिल जाती है। इसमें आकाश पाताल में बैठकर देवी-देवता भाग्य में परिवर्तन नहीं करते। वह तो तुम्हारा मन जितना एकाग्र होता है तथा प्राणों की रीधम जितनी तालबद्ध होती है उतना ही व्यवहार में तुम सुयोग्य बन जाते हो।
तुलसीदास जी ने कहा हैः
को
काहू को नहीं
सुख दुःख करि
दाता।
निज
कृत करम भोगत
ही भ्राता।।
मनुष्य और पशु में अगर अन्तर देखना हो तो बल में मनुष्य से कई पशु आगे हैं जैसे सिंह, बाघ आदि। मानुषी बल से इनका बल अधिक होता है। हाथी का तो कहना ही क्या ? फिर भी मनुष्य महावत, छः सौ रूपये की नौकरी वाला, चपरासी की योग्यतावाला मनुष्य हाथी, सिंह और भालू को नचाता है, क्योंकि पशुओं के शारीरिक बल की अपेक्षा मनुष्य में मानसिक सूक्ष्मता अधिक है।
मनुष्य के बच्चों में और पशुओं के बच्चों में भी यह अन्तर है कि पशु के बच्चे की अपेक्षा मनुष्य का बच्चा अधिक एकाग्र है। पशुओं के बच्चों को जो बात सिखाने में छः मास लगते हैं, फिर भी सैंकड़ों बेंत लगाने पड़ते हैं वह बात मनुष्य के बेटे को कुछ ही मिनटों में सिखाई जा सकती है। क्योंकि पशुओं की अपेक्षा मनुष्य के मन, बुद्धि कुछ अंशों में ज्यादा एकाग्र एवं विकसित है। इसलिए मनुष्य उन पर राज्य करता है।
साधारण मनुष्य और प्रभावशाली मनुष्य में भी यही अंतर है। साधारण मनुष्य किसी अधीनस्थ होते हैं जैसे चपरासी, सिपाही आदि। कलेक्टर, मेजर, कर्नल आदि प्रभावशाली पुरूष हुकुम करते हैं। उनकी हुकूमत के पीछे उनकी एकाग्रता का हाथ होता है जिसका अभ्यास उन्होंने पढ़ाई के वक्त अनजाने में किया है। पढ़ाई के समय, ट्रेनिंग के समय अथवा किसी और समय में उन्हें पता नहीं कि हम एकाग्र हो रहे हैं लेकिन एकाग्रता के द्वारा उनका अभ्यास सम्पन्न हुआ है इसलिए वे मेजर, कलेक्टर, कर्नल आदि होकर हुकुम करते हैं, बाकी के लोग दौड़-धूप करने को बाध्य हो जाते हैं।
ऐसे ही अगले जन्म में या इस जन्म में किसी ने ध्यान या तप किया अर्थात् एकाग्रता के रास्ते गया तो बचपन से ही उसका व्यक्तित्व इतना निखरता है कि वह राजसिंहासन तक पहुँच जाता है। सत्ता संभालते हुए यदि वह भय में अथवा राग-द्वेष की धारा में बहने लगता है तो उसी पूर्व की निर्णयशक्ति, एकाग्रताशक्ति, पुण्याई क्षीण हो जाती है और वह कुर्सी से गिराया जाता है तथा दूसरा आदमी कुर्सी पर आ जाता है।
प्रकृति के इन रहस्यों को हम लोग नहीं समझते इसलिए किसी पार्टी को अथवा किसी व्यक्ति को दोषी ठहराते हैं। मंत्री जब राग-द्वेष या भय से आक्रान्त होता है तब ही उसकी एकाग्रताशक्ति, प्राणशक्ति अन्दर से असन्तुलित हो जाती है। उसके द्वारा ऐसे निर्णय होते हैं कि वह खुद ही उनमें उलझ जाता है और कुर्सी खो बैठता है। कभी सब लोग मिलकर इन्दिरा गांधी को उलझाना चाहते लेकिन इन्दिरा गाँधी आनन्दमयी माँ जैसे व्यक्तित्व के पास चली जाती तो प्राणशक्ति, मनःशक्ति पुनः रीधम में आ जाती और खोई हुई कुर्सी पुनः हासिल कर लेती।
मैंने सुना था कि योगी, जिसकी मनःशक्ति और प्राणशक्ति नियंत्रित है, वह अगर चाहे तो एक ही मिनट में हजारों लोगों को अपने योगसामर्थ्य के प्रभाव से उनके हृदय में आनन्द का प्रसाद दे सकता है।
यह बात मैंने 1960 के आसपास एक सत्संग में सुनी थी। मेरे मन में था कि संत जब बोलते हैं तो उन्हें स्वार्थ नहीं होता, फिर भला क्यों झूठ बोलेंगे ? व्यासपीठ पर झूठ वह आदमी बोलता है जो डरपोक हो अथवा स्वार्थी हो। ये दो ही कारण झूठ बुलवाते हैं। लेकिन संत क्यों डरेंगे श्रोताओं से ? अथवा उन्हें स्वार्थ क्या है ? वे उच्च कोटि के संत थे। मेरी उनके प्रति श्रद्धा थी। आम सत्संग में उन्होंने कहा थाः "योगी अगर चाहे तो अपने योग का अनुभव, अपनी परमात्मा-प्राप्ति के रस की झलक हजारों आदमियों को एक साथ दे सकता है। फिर वे सँभाले, टिकायें अथवा नहीं, यह उनकी बात है लेकिन योगी चाहे तो दे सकता है।"
इस बात को खोजने के लिए मुझे 20 वर्षों तक मेहनत करनी पड़ी। मैं अनेक गिरगुफाओं में, साधु-संतों के सम्पर्क में आया। बाद में इस विधि को सीखने के लिए मैं मौन होकर चालीस दिनों के लिए एक कमरे में बँद हो गया। आहार में सिर्फ थोड़ा-सा दूध लेता था, प्राणायाम करता था। जब वह चित्तशक्ति, कुण्डलिनी शक्ति जागृत हुई तो उसका सहारा मन और प्राण को सूक्ष्म बनाने में लेकर मैंने उस किस्म की यात्रा की। तत्पश्चात् डीसा में मैंने इसका प्रयोग प्रथम बार चान्दी राम और दूसरे चार-पाँच लोगों पर किया तो उसमें आशातीत सफलता मिली।
मैंने जब यह सुना था तो विश्वास नहीं हो रहा था क्योंकि यह बात गणित के नियमों के विरूद्ध थी। योगी अगर अपना अनुभव करवाने के लिए एकएक के भीतर घुसे और उसके चित्त में अपना तादात्म्य स्थापित करने के लिए सूक्ष्म दृष्टि, सूक्ष्म शरीर से आए-जाए तो भी एक-एक के पास कम से कम एक-एक सेकण्ड का समय तो चाहिए। ऐसी मेरी धारणा थी। जैसे स्कूलों में हम पढ़ते हैं कि पृथ्वी गोल है, यह स्कूल और साधक की बात है, लेकिन बच्चे को समझ में नहीं आती फिर भी पृथ्वी है तो गोल। बच्चा अध्ययन करके जब समझने लगता है तब उसे ठीक से ज्ञान हो जाता है।
ऐसा ही मैंने उस विषय को समझने के लिए अध्ययन किया और चालीस दिन के अनुष्ठान का संकल्प किया तो मात्र सैंतीस दिन में ही मुझे परिणाम महसूस हुआ और उसका प्रयोग भी बिल्कुल सफल हुआ और अभी तो आप देखते ही हैं कि हजारों हजारों पर यह प्रयोग एक साथ होता ही रहता है।
हरिद्वार वाले घाटवाले बाबा कहते थेः "आत्म-साक्षात्कारी पुरूष ब्रह्मलोक तक के जीवों को सहायता करते हैं और उन्हें यह अहसास भी नहीं होने देते हैं कि कोई सहायता कर रहा है। यह भी गिनती नहीं कि उन्होंने किन-किन को सहायता की है। जैसे हजारों लाखों मील दूरी पर स्थित सूर्य की कभी इसकी गणना नहीं होती कि मैं कितने पेड़-पौधों, पुष्पों, जीव-जन्तुओं को ऐसा सहयोग दे रहा हूँ। हालाँकि सूर्य का हमारे जीवन में ऐसा सहयोग है कि अगर सूर्य ठण्डा हो गया। हम उसी क्षण यहीं मर जायेंगे। इतने आश्रित हैं हम सूर्य की कृपा पर। सूर्य को कृपा बरसाने की मेहनत नहीं करनी पड़ती। चन्द्रमा को औषधि पुष्ट करने के लिए परिश्रम नहीं करना पड़ता अपितु उसका स्वभाव ही है।
चन्द्रमा और सूर्य का सहज स्वभाव है लेकिन पेड़-पौधों का, जीव जंतुओं का, मनुष्यों का तो कल्याण हो जाता है। ऐसे ही आप मन और प्राणों को इतना सूक्ष्म कर दें.... इतना सूक्ष्म कर दें कि आपका जीवन बस..... जैसे बिन्दु में सिन्धु आ पड़े अथवा घड़े में आकाश आ पड़े तो घड़े का क्या हाल होगा ? ऐसे की आपके 'मैं' में व्यापक ब्रह्म आ जाये तो आपकी उपस्थिति मात्र से ही अथवा आप बोलेंगे वहाँ और जहाँ तक आपकी दृष्टि पड़ेगी वहाँ तक के लोगों का तो भला होगा ही लेकिन आप जब एकान्त में, मौन होकर अपनी मस्ती में बैठेंगे तो ब्रह्मलोक तक की आपकी वृत्ति व्याप्त हो जाएगी। वहाँ तक के अधिकारी जीवों को फायदा होगा।
जैसे बर्फ तो हिमालय पर गिरती है लेकिन तापमान पूरे देश का कम हो जाता है और त्वचा के माध्यम से आपके शरीर पर असर पड़ता है। ऐसे ही किसी ब्रह्मवेत्ता को साक्षात्कार होता है अथवा कोई ब्रह्मवेत्ता एकान्त में कहीं मस्ती में बैठे हैं तो अधिकारियों के हृदय में कुछ अप्राकृतिक खुशी का अन्दर से एक बहाव प्रस्फुरित होने लगता है। ऐसे थोड़े बहुत भी जो अधिकारी लोग हैं, आध्यात्मिक खुशी का अन्दर से एक बहाव प्रस्फुरित होने लगता है। ऐसे थोड़े बहुत भी जो अधिकारी लोग हैं आध्यात्मिक जगत के, उन्हें अवश्य ही अनुभव होता होगा कि कभी कभी एकाएक उनके भीतर खुशी की लहर दौड़ जाती है।
मन और प्राण को आप जितना चाहें सूक्ष्म कर सकते हैं, उन्नत कर सकते हैं। सूक्ष्म यानी छोटा नहीं अपितु व्यापक। अर्थात् अपनी वृत्ति को सूक्ष्म करके व्यापक बना सकते हैं। जैसे बर्फ वाष्पीभूत होकर कितनी दूरी तक फैल जाती है ? उससे भी अधिक आपके मन और प्राण को सूक्ष्म कर साधना के माध्यम से अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्डों में अपनी व्यापक चेतना का अनुभव आप कर सकते हैं। उस अनुभव के समय आपके संकल्प में अद्भुत सामर्थ्य आ जाएगा और आप इस प्रक्रिया से नई सृष्टि बनाने का सामर्थ्य तक जुटा सकेंगे।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
मुक्ति मुख्य दो प्रकार की होती है। एक होती है क्रममुक्ति और दूसरी होती है सद्योमुक्ति। धारणा, ध्यान, भजन, जप, तप, सुमिरन, सत्संग, ब्रह्मज्ञान आदि के बाद भी जिसे सुख लेने की वासना होती है, उसकी सद्योमुक्ति नहीं होगी, क्रममुक्ति होगी। शरीर छूटेगा तो उसका अन्तःकरण चन्द्रमण्डल, सूर्यमण्डल को लांघता हुआ अन्तवाहक शरीर से ब्रह्मलोक तक पहुँचकर वहाँ भोग-काया पाकर ब्रह्माजी के समान सुविधाएँ और भोग पदार्थ भोगता है। जब ब्रह्मा जी के कल्प का अन्त होता है तब वहाँ ब्रह्मदेवता के श्रीमुख से पुनः ब्रह्मज्ञान सुनता है। इससे उसे अपने स्वरूप का स्मरण हो जाता है और वह मुक्त हो जाता है। इसे क्रममुक्ति कहते हैं।
क्रममुक्ति भी दो प्रकार की होती हैः एक तो जीव ब्रह्मलोक में कल्प तक सुख भोगता रहे और अन्त में ब्रह्माजी जब अपनी काया विलय करना चाहते हों, जब आत्यंतिक प्रलय हो, तब उसमें उपदेश मात्र से जगकर अन्तःकरण परब्रह्म परमात्मा में लीन होता है।
दूसरी क्रममुक्ति में ऐसे लोग होते हैं, जिन्होंने साधन-भजन तो किया लेकिन किसी सुख-भोग की इच्छा रह गई तो सद्योमुक्ति नहीं हुई। वे ऊपर के लोग-स्वर्गलोक ब्रह्मलोक आदि में गये और वहाँ फिर स्मरण हुआ की सभी भोग पुनरागमन करवाने वाले हैं, मुझे तो शीघ्रातिशीघ्र अपने परमात्मपद में जागना है। ऐसे लोग फिर किसी धनवान श्रीमान और सदाचारी के कुल में जन्म लेते हैं। सब सुख-सुविधाएँ होने के बावजूद भी उनका चित्त उनमें नहीं लगता। उन्हें त्याग की एकाध बात मिल जाती है, सत्संग में विवेक, वैराग्य की बात मिल जाती है तो पिछले जन्म का किया हुआ साधन भजन पुनः जाग्रत हो जाता है और वे साधन-भजन में जुटकर यहीं पर परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार करके उनकी काया जब पंचभूतों में लीन होती है तो वे परब्रह्म परमात्मा में लीन होते हैं। ये भी क्रममुक्ति में आते हैं।
त्यागो
हि
महत्पूज्यो
सद्यो
मोक्षपदायकः।
त्याग महान पूजनीय है। इससे शीघ्र मोक्ष मिलता है।
अतः इस लोक के सुख-सुविधा, भोग सब नश्वर हैं, स्वर्ग का सुख भी नश्वर है, ब्रह्मलोक का सुख भी नश्वर है..... ऐसा तीव्र विवेक जिसे होता है उसके चित्त में सांसारिक सुखों के भोग की वासना नहीं होती अपितु परमपद को पाकर मुक्त हो जाएँ, ऐसी तीव्र लालसा होती है। ऐसे महाभाग्यवान विरले ही होते हैं जो सद्योमुक्ति का अनुभव करते हैं। उन्हें किसी भी लोक-लोकांतर के सुख-वैभव की इच्छा नहीं होती है। वे साक्षात् नारायण स्वरूप हो जाते हैं।
ऐसे ज्ञानवान जो सद्योमुक्ति को प्राप्त हैं, वे अपना शेष प्रारब्ध लेना-देना, खाना-पीना इत्यादि करते हैं। किसी से कुछ लेते हैं तो उसके आनन्द के लिए किसी को कुछ देते हैं तो उसके आनन्द के लिए। वे अपने आनन्द के लिए कुछ देते-लेते हुए दिखते हैं परन्तु उनके चित्त में लेने देने का भाव नहीं रहता है। वे हँसने के समय हँसते हैं, ताड़न के समय ताड़न करते हैं, अनुशासन के समय अनुशासन करते हैं तथा आवश्यकता पड़ने पर सारथि बनकर अर्जुन जैसों का रथ भी चलाते हैं। ऐसे ही वे जीवन्मुक्त महापुरूष हमारे जीवनरूपी रथ का भी मार्गदर्शन करते हैं तथापि उनके चित्त में कर्त्तृत्व भाव नहीं आता है।
अष्टावक्र मुनि राजा जनक से कहते हैं-
अकर्त्तृत्वममोकृत्वं
स्वात्मनो
मन्यते यदा।
तदा
क्षीणा
भवन्त्येव
समस्ताश्चित्तवृत्तयः।।
जब पुरूष अपने अकर्त्तापन और अभोक्तापन को जान लेता है तब उस पुरूष की संपूर्ण चित्तवृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं।
(अष्टावक्र गीताः 18.59)
अर्थात् अपनी आत्मा को जब अकर्त्ता-अभोक्ता जानता है तब उसके चित्त के सारे संकल्प और वासनाएँ क्षीण होने लगती हैं।
हकीकत में करना-धरना इन हाथ पैरों का होता है। उसमें मन जुड़ता है। अपनी आत्मा अकर्त्ता है। जैसे बीमार तो शरीर होता है परन्तु चिन्तित मन होता है। बीमारी और चिन्ता का दृष्टा जो मैं है वह निश्चिन्त, निर्विकार और निराकार है। इस प्रकार का अनुसंधान करके जो अपने असली मैं में आते हैं, फिर चाहे मदालसा हो, गार्गी हो, विदुषी सुलभा हो अथवा राजा जनक हो, वे जीते जी यहीं सद्योमुक्ति का अनुभव कर लेते हैं।
सद्योमुक्ति का अनुभव करने वाले महापुरूष विष्णु, महेश, इन्द्र, वरूण, कुबेर आदि के सुख का एक साथ अनुभव कर लेते हैं क्योंकि उनका चित्त एकदम व्यापक आकाशवत् हो जाता है और वे एक शरीर में रहते हुए भी अनन्त ब्रह्माण्डों में व्याप्त होते हैं। जैसे घड़े का आकाश एक घड़े में होते हुए भी ब्रह्माण्ड में फैला है वैसे ही उनका चित्त चैतन्य स्वरूप के अनुभव में व्यापक हो जाता है।
रामायण में आता है-
चिदानंदमय
देह
तुम्हारी।
विगतविकार
कोई जाने
अधिकारी।।
रामजी को विरले ही जान पाते हैं। भगवान राम के बाहर के श्रीविग्रह का दर्शन तो कैकेयी, मन्थरा को हो सकता है, लेकिन रामतत्त्व को तो कोई विरला योगी महापुरूष ही समझ पाता है। ऐसे ही अपने बाहर के, एक दूसरे के शरीरों क दर्शन तो हो जाता है लेकिन अपना जो वास्तविक 'रामतत्त्व' है, 'मैं' तत्त्व है, जहाँ से 'मैं' स्फुरित होता है वह चिदानन्दमय है, निर्विकार है। उस पर जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि का प्रभाव नहीं पड़ता।
बीमार शरीर होता है, वास्तव में तुम कभी बीमार नहीं होते। तुम कभी चिन्तित नहीं होते, चिन्तित मन होता है। तुम कभी भयभीत नहीं होते, मन में भय आता है। तुम कभी शोक नहीं करते, शोक तुम्हारे चित्त में आता है लेकिन तुम अपने को उसमें जोड़े देते हो।
एक बार काशी नरेश ने संत कबीर के पैर पकड़ कर याचना कीः
"महाराज ! मैं कई वर्षों से कथा-वार्ता सुनता हूँ, राज्य के ऐशो-आराम को अन्त में नाशवान समझता हूँ फिर भी मुझे भगवान का, आत्मभाव का अनुभव नहीं हो रहा है, बन्धन से मुक्ति का अनुभव नहीं हो रहा है। लगता है कि मर जाऊँगा, पराधीन हो जाऊँगा। मैं कथा तो सुनता हूँ और मेरा मन संसार के विषय विकारों में भी नहीं है। मेरे यहाँ एक पंडित जी कथा करते हैं लेकिन मुझे अपने देशातीत, कालातीत स्वरूप का अनुभव नहीं होता। कृपया आप मुझे मुक्ति का अनुभव करवाइये।
कबीरजीः "हम कल तुम्हारे दरबार में आएँगे। तुम कथा कितने बजे सुनते हो ?"
काशीनरेशः "प्रातः आठ से दस बजे तक पंडित जी कथा सुनाते हैं।"
कबीरजीः "अच्छा ! देखो मुझसे उपदेश प्राप्त करना है तो मेरी आज्ञा का पालन करने के लिए तुम्हें वचनबद्ध होना होगा, तभी काम बनेगा।"
काशीनरेशः "महाराज ! मैं कल तो क्या सदा के लिए आपकी आज्ञा का पालन करने को वचनबद्ध होता हूँ।"
काशी नरेश ने सोचा कि अगर महापुरूष की आज्ञा मानने से चौरासी लाख जन्म-मृत्यु का बँधन टूट जाता है तो उनकी आज्ञानुसार यदि हम एक जीवन बिता दें तो घाटा क्या है ? उन्होंने कबीर जी से कहाः
"मैं आजीवन आपकी आज्ञा का दास बन कर रहूँगा।"
कबीरजीः "अच्छा ! मैं कल आऊँगा।"
कबीर जी काशीनरेश के दरबार में पहुँचे। राजा उस समय कथा सुन रहा था। कबीर जी को देखकर वह उठ खड़ा हुआ।
कबीर जी पूछते हैं- "राजा ! कल का वादा ?"
राजाः "आप जो आज्ञा करेंगे, वही होगा।"
कबीर जीः "मंत्रियों से कह दो कि अब सिंहासन पर मैं बैठता हूँ। अब मेरी आज्ञा चलेगी, तुम्हारी नहीं।"
राजा ने मंत्रियों से कह दियाः "अब इनकी ही आज्ञा मानें, मेरी नहीं।"
कबीर जी सिंहासन पर आसन जमाकर बैठ गये। फिर आज्ञा दी।
"राजा को दाहिनी ओर के खम्भे से बाँध दिया जाए।"
मंत्रियों ने आदेश का पालन कर राजा को बाँध दिया। कबीर जी ने दूसरा आदेश दियाः
"पंडित जी को बाँयी ओर के खम्भे से बाँध दो।"
एक खम्भे से पंडित को व दूसरे से राजा को बाँध दिया गया। अब कबीर जी ने कहाः
"राजन ! पंडित को आज्ञा करो कि यह तुमको छुड़वा दे।"
राजाः "महाराज ! पंडित मुझे नहीं छुड़ा सकेंगे।"
कबीर जीः "क्यों ?"
राजाः "इसलिए वे स्वयं बँधे हुए हैं।"
तब कबीर जी कहते हैः "राजन ! तुम इतना तो समझते हो कि वे स्वयं बँधे हुए हैं, इसलिए तुम्हें नहीं छुड़ा सकते। ऐसे ही शरीर को मैं मानते हैं, अन्तःकरण को मैं मानते हैं तथा दक्षिणा के लिए सत्संग सुनाते हैं तो बँधे हुए हैं। उन बेचारे को ज्ञान तो है नहीं, वे तुम्हें कैसे ज्ञान कराएँगे ?"
बन्धे
को बन्धा
मिले, छूटे
कौन उपाय।
सेवा
कर निर्बन्ध
की, पल में दे
छुड़ाय।।
जो इन्द्रियों से, शरीर से, मन और कर्म से, कर्त्तृत्वभाव से नहीं बँधे हुए हैं, ऐसे ब्रह्मवेत्ता की आज्ञा मानो..... उनकी सेवा करो।
अष्टावक्र निर्बन्ध थे और जनक अधिकारी थे तो बँधन से छूट गये। शुकदेव जी निर्बन्ध थे और परीक्षित की सात दिन में मृत्यु होने वाली थी..... उसे दूसरे कोई आकर्षण नहीं दिखे और वासना भी नहीं थी..... इसलिए हो गई मुक्ति।
ज्ञानवान, निर्बन्ध, असंग, निर्विकार, व्यापक, सच्चिदानंद, नित्य, शुद्ध, बुद्ध और मुक्त स्वभावयुक्त, महापुरूषों का चिन्तन अथवा उनकी चर्चा करने से, उनकी स्नेहमयी चेष्टाओं का, वार्ताओं का बयान करने अथवा अहोभाव करने से चित्त पावन हो जाता है तथा उनका अहोभाव करने से हृदय भक्तिभाव एवं पवित्रता से भर जाते हैं।
राजा खटवांग बड़े ही प्रतापी और पुण्यात्मा राजा थे। उनका नाम सुनकर शत्रुओं का हृदय काँपने लगता था। देवासुर संग्राम में इन्द्र को कोई सुयोग्य सेनापति नहीं मिला तो उन्होंने भूमण्डल के महाप्रतापी राजा खटवांग को सेनापति का पद सँभालने हेतु अनुरोध किया था। उल्लेखनीय है कि देवताओं का एक दिन मनुष्य का एक वर्ष होता है। अतः कई मानवीय वर्ष तक राजा खटवाँग देवताओं की सहायता करते रहे। खटवाँग ने कई वर्षों तक देव-दानव युद्ध में सेनापति का पद सँभाला। अश्विनीकुमार जैसे योग्य सेनानायक मिल जाने पर देवेन्द्र ने कहाः
"राजन ! आपका मंगल हो। कल्याण हो। आपने हमें बहुत सहयोग दिया। आपने देवलोक में कई दिव्य वर्ष बिताये तो मृत्युलोक में आपके पुत्र परिवार और राज्य व्यव्स्था आदि सब काल के कराल मुख में जाकर खत्म हो चुके हैं। अतः आप मुक्ति के सिवाय हमसे जो कुछ भी माँगेगे, हम आपको सेवा के रूप में प्रदान कर सकेंगे।"
खटवाँग ने देवेन्द्र से कहाः
"मेरे माँगने से जो मिलेगा उसे भोगते-भोगते हमारे कुटुम्ब परिवार के सदस्य समय की धारा में उसी प्रकार बह गये जैस नदी की धारा में तिनके एवं रेत बह जाती है। आप तो कृपा करके अब इतना बतलाइये कि मेरी आयु कितनी शेष है।"
दो मुहूर्त यानि तीन घण्टे। देवताओं का एक दिव्य वर्ष मनुष्य के 360 वर्षों के बराबर होता है। इस तरह देवताओं के तीन घण्टे यानि मानुषी जीवन की कुछ जिन्दगी तो मिली।
खटवाँग ने कहाः "अगर दो मुहूर्त ही आयुष्य है तो क्या माँगूगा और क्या माँगूगा ? क्योंकि कुछ भी तो स्थिर नहीं है।"
अच्युतपद की प्राप्ति का उद्देश्य बनाकर खट्वाँग शिवजी के चरणों में गये और ज्ञान का उपदेश पाकर मोक्ष की प्राप्ति व मुक्ति का अनुभव कर लिया । महिम्न स्तोत्र में भी राजा खटवाँग का उल्लेख आता है।
मुक्ति का अनुभव करने में कोई अड़चन आती है तो वह है यह जगत सच्चा लगना तथा विषय, विकार व वासना के प्रति आसक्ति होना। यदि सांसारिक वस्तुओं से अनासक्त होकर 'मैं कौन हूँ ?' इसे खोजें तो मुक्ति जल्दी मिलेगी। निर्वासनिक चित्त में से भोग की लिप्सा चली जाएगी और खायेगा, पियेगा तो औषधवत्.... परंतु उससे जुड़ेगा नहीं।
एक बार रंग अवधूत महाराज (नारेश्वरवाले) के पास बलसाड़ के कुछ भक्त केसर आम ले गये और भारी प्रशंसा करने लगे। ऐसी प्रशंसा करने लगे कि मानो उसके आगे स्वर्ग का अमृत भी कुछ नहीं। वे बोलेः
"बापू ! यह प्रथम दर्जे का मीठा आम है।"
अवधूत कहते हैं- "तुम श्रद्धा-भक्ति से देते तो शायद एकाध टुकड़ा मैं खा लेता लेकिन तुमने इतनी बड़ाई की, फिर भी मेरे मुँह में अभी पानी नहीं आया। अगर पानी आ जाएगा तो जरूर खाऊँगा, अन्यथा नहीं।
हम किसी के हाथ में नींबू देखते हैं तो मुँह में पानी आ जाता है, कहीं हलवा बन रहा है तो पानी आ जाता है। ये आदतें बाहर की तुच्छ चीजों में ऐसे रस टपका देती है कि अन्दर का रस कितना है इसका पता ही नहीं चलता।
महादेव गोविंद रानडे की पत्नी ने उन्हें दो तीन आम काट कर दिये। रानडे ने एक फाँक खायी और कहाः
"नौकरों को, बच्चों को और पड़ोस के बच्चों को बाँट दो।"
पत्नी ने पूछाः "आम अच्छे नहीं लगे क्या ? बहुत मीठे और स्वादिष्ट तो थे।"
"इसलिए तो कहता हूँ कि सबको बाँट दो।"
"इतने अच्छे और स्वादिष्ट हैं फिर सबको क्यो ?"
"जो अच्छा लगेगा उसे अधिक खाएँगे तो आसक्ति होगी। अच्छी चीज बाँटने की आदत डालो ताकि अच्छे में अच्छा हृदय बनना शुरू हो जाए।"
हम लोग क्या करते हैं कि मिर्च-मसालेयुक्त, खट्टे-मीठे व्यंजन अथवा मिठाइयों के दो कौर अधिक खाते हैं, ठूँस-ठूँसकर खाते हैं और जब अजीर्ण होता है तो कहते हैं- 'मुझे किसी ने कुछ कर दिया...... मुझे भूत का चककर है।'
भूत नहीं है भाई ! गैस है गैस।
किसी वक्त गोला इधर दौड़ता है तो किसी वक्त उधर.....। आवश्यकता से अधिक भोजन करने से अजीर्ण हो जाता है। अजीर्ण में पानी औषधि है और भोजन पच जाये उसके बाद पानी बलप्रद है, लेकिन भूख अत्यधिक लगी हो और पानी पी लिया तो वह जहर हो जाता है। शास्त्रों में भी आया हैः
अजीर्णे
भेषजं वारि,
जीर्णे वारि
बलप्रदम्।
भोजने
चामृतं वारि,
भोजनान्ते
विषप्रदम।।
'अजीर्ण होने पर जल पीना औषधि का काम करता है। भोजन के पच जाने पर जल पीना बलदायक होता है। भोजन के मध्यकाल में जल पीना अमृत और भोजन के अन्त में जल पीना पाचन क्रिया के लिए हानिकारक है।"
पानी तो वही का वही लेकिन समयानुसार उपयोग का असर पृथक-पृथक होता है। ऐसे ही मन तो वही, शरीर भी वही लेकिन किस समय शरीर से, मन से क्या काम लेना है इस प्रकार का ज्ञान जिसके पास है वह मुक्त हो जाता है। अन्यथा कितने ही मंदिर-मस्जिदों में जोड़ो एवं नाक रगड़ो, दुःख और चिन्ता तो बनी ही रहेगी।
कभी
न छूटे पिण्ड
दुःखों से।
जिसे
ब्रह्म का
ज्ञान नहीं।।
यह आत्मा ही ब्रह्म है, ऐसा ज्ञान, वास्तविक ज्ञान निर्वासनिक होने से होता है।
सुख बाँटने की चीज है तथा दुःख को पैरों तले कुचलने की चीज है। दुःख को पैरों तले कुचलना सीखो, न ही दुःख में घबराहट।
सुखं
वा यदि वा
दुःखं स योगी
परमो मतः।
एक सामान्य योगी होता है जो ध्यान, समाधि आदि करके शांति व आनंद का अनुभव करता है। दूसरे होते हैं अभ्यास योगी। ये आनन्द का अनुभव करते हुए ऊपर आते हैं तो इनका हृदयकमल खिलता है। कभी भी गोता मारते हैं और शांत हो जाते हैं, लेकिन जो सुख-दुःख के समय भी विचलित न हो, अपने आत्मा-परमात्मा में टिका रहे वह गीता के मत में परम योगी है। उसका चित्त सुख-दुःख के आकर्षण में प्रवाहित न होकर सम रहता है। ऐसे योगी नित्य अपने प्रेमस्वरूप परमात्मा को, ईष्ट को, गुरू को स्नेह करते हैं और उन्हें यह नया रस प्राप्त होता है जिसके सम्मुख संसार का साम्राज्य तो क्या, इन्द्र का वैभव भी कुछ नहीं।
अतः आप भी मन में गांठ बाँध लें। सुख-दुःख में सम रहते हुए, सासांरिक आकर्षणों में प्रवाहित होते लोगों की दौड़ में सम्मिलित न होकर 'मुझे तो सत्य-स्वरूप ईश्वरीय आत्मसमता में रहना है' इस हेतु नित्य प्रातः ब्राह्ममुहूर्त में उठकर, सूर्योदय से पहले स्नानादि करके शुद्ध होकर शांत बैठो। अपनी त्रुटियों और कमजोरियों को याद करके 'हरि ॐ' गदा मारकर उन्हें भगाकर सोऽहम्..... शिवोऽहम् स्वरूप में स्वयं को प्रतिष्ठित करो।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः
पुनरावर्तिऽनोजुन।
मामुपेत्य
तु कौन्तेय
पुनर्जन्म न
विद्यते।।
'हे अर्जुन ! ब्रह्मलोक तक के सभी लोक पुनरावर्ती हैं, परंतु हे कौन्तेय ! मुझे प्राप्त होने पर पुनर्जन्म नहीं होता।'
(भगवदगीताः 8.16)
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि प्राकृत जगत में इस लोक से लेकर ब्रह्मलोक तक के सबके सब लोक के जो सुख-वैभव हैं, उन्हें भोगने के उपरान्त बारम्बार जन्म-मृत्यु रूपी क्लेश सहते हुए इस जीव को माता के गर्भ में आना पड़ता है किन्तु मुझ चैतन्य स्वरूप को प्राप्त व्यक्ति पुनः गर्भावास को प्राप्त नहीं होता अर्थात् उसका संसार में पुनर्जन्म नहीं होता।
जैसे स्वप्न में मिली हुई सजा जागृत अवस्था में नहीं रहती, दूध में से घी निकलने के बाद वह दूध में नहीं मिलता अपितु पृथक ही रहता है, लकड़ी जल जाने के बाद वह अग्निरूप हो जाती है और लकड़ी का कहीं नामोनिशान नहीं रहता है, उसी प्रकार संसारस्वप्न में से जो जीव जाग जाता है उसे फिर संसार स्वप्न की कैद में, माता के गर्भ में आने का दुर्भाग्य नहीं होता।
जो
सपने सिर काटे
कोई।
बिन
जागे दुःख दूर
न होई।।
स्वप्नावस्था में कोई हमारा सिर काटे तो उसका दुःख जागे बिना दूर नहीं होता।
एक संत ने मुझसे कहाः ''उक्त पंक्ति तुलसीदासजी ने लिखी तो है लेकिन सपने में किसी ने हमारा सिर काटा हो और दूसरा कोई मनुष्य हमारा सिर जोड़ दे तो दुःख दूर हो जाएगा।"
मैंने कहाः "दुःख दूर नहीं होगा क्योंकि जुड़ा हुआ सिर होने से जब-जब इसकी याद आएगी तब-तब काटने वाले के प्रति द्वेष की भावना उत्पन्न होगी और साधना के मार्ग में रूकावट आयेगी। आँख खुलेगी तभी दुःख दूर होगा नहीं तो जोड़ने वाले के प्रति राग और काटनेवाले के प्रति द्वेष का दुःख तो रहेगा ही।"
तमाम प्रकार के सृष्टि के प्रकोप, तमाम प्रकार के बम भी यदि एक व्यक्ति पर गिरते हैं तो मात्र व्यक्ति के नश्वर शरीर का ही विनाश होता है। परन्तु व्यक्ति की आत्मा कभी नष्ट नही होती, ऐसे तुम अमर चैतन्य आत्मा हो।
ममैवांशो
जीवलोके
जीवभूतः
सनातनः।
हे मानव ! तू सनातन है, मेरा अंश है। जैसे मैं नित्य हूँ वैसे ही तू भी नित्य है। जैसे मैं शाश्वत हूँ वैसे ही तू भी शाश्वत है। परन्तु भैया ! भूल सिर्फ इतनी हो रही है कि नश्वर शरीर को तू मान बैठा है। नश्वर वस्तुओं को तू अपनी मान बैठा है। लेकिन तेरे शाश्वत स्वरूप और मेरे शाश्वत सम्बन्ध की ओर तेरी दृष्टि नहीं है इस कारण तू दुःखी होता है।
उत्तिष्ठत
जागृत। उठ ! जाग !!
वास्तव में मनुष्य पहले जागता है फिर उठता है, लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं- "पहले अपनी तुच्छ मान्यताओं से उठ और चल, जागृत हो। किस स्थान पर जा ? आत्मज्ञानी संतों के पास जा, जो तुझे आत्मोपदेश देंगे, आत्मप्रसाद देंगे और उस प्रसाद से तेरे सारे दुःख दूर हो जाएँगे।"
जो तत्त्वदर्शी महापुरूष हैं, जिनको भगवान का तात्त्विक स्वरूप दिखता है अथवा जो भगवान और अपने बीच की दूरी को पूर्णतः मिटा चुके हैं ऐसे पुरूषों के पास जा।
जिस प्रकार अज्ञानी का चित्त संकल्प, विकल्प और अज्ञान से भरा रहता है उस प्रकार ज्ञानी का चित्त इनमें प्रवाहित नहीं होता अपितु ज्ञान के प्रसाद से पावन होकर आकाशवत् होता है।
जिस प्रकार मूर्ख मनुष्य दो पैसे की वस्तुओं के पीछे अपना चित्त बिगाड़ देता है उस प्रकार तू नश्वर वस्तुओं के पीछे अपना जीवन बरबाद मत करना।
तू अजर, अमर आत्मा-परमात्मा का ज्ञान प्राप्त करके यहीं पर मुक्ति का अनुभव कर ले भैया !
प्रारंभ में दिये हुए श्लोक में पहला चरण सकाम भक्तों की बात बतलाता है और दूसरा चरण निष्काम भक्तों की बात बतलाता है।
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः
पुनरावर्तिनोऽर्जुन।
ब्रह्मलोक तक के लोकों में जो सकाम भाव से भक्ति करता है वह स्वर्ग अथवा अन्य लोक-लोकान्तर में जाकर अपने पुण्यों के क्षीण होने तक मौज करके पुनः माता के गर्भ में जाता है लेकिन-
मामुपेत्य
तु कौन्तेय
पुनर्जन्म न
विद्यते।
जो निष्काम भाव से मुझे प्राप्त होता है, जिसमें भोगवासना की इच्छा नहीं, स्वर्ग के सुख की तनिक भी इच्छा नहीं, ब्रह्मलोक तक के मौज मजे मारने की इच्छा नहीं, परन्तु जो शाश्वत सुख में, अमर पद में विश्वास रखता है ऐसे लोगों का कभी पुनरागमन नहीं होता।
शरीर तन्दुरूस्त हो, सम्पूर्ण पृथ्वी पर अपना राज्य हो, पत्नी आज्ञाकारिणी एवं मधुरभाषिणी हो, पुत्र आज्ञाकारी हो तथा मंत्री व नौकर-चाकर वफादार हों तो यह मानुषी सुख की पराकाष्ठा कहलाती है। उसकी अपेक्षा सौ गुना सुख गन्धर्वों को मिलता है। गन्धर्वों के विमान संकल्पों से चलते हैं और वे गुरूत्वाकर्षण की सीमा से भी बाहर जा सकते हैं।
गन्धर्वों से सौ गुना अधिक सुख मर्त्य देवों को मिलता है। मर्त्य देव उन्हें कहा जाता है जो इस लोक में तप, यज्ञ, पुण्य आदि करके मृत्यु के बाद देवता बने हैं और स्वर्ग का सुख भोगते हैं। जब उनका पुण्य नष्ट हो जाता है तब उन्हें पुनः मृत्युलोक में आना पड़ता है।
इन मर्त्य देवों से भी सौ गुना अधिक सुख आजान देवों को मिलता है। आजान देव उन्हें कहा जाता है जो कल्प के आदि में देवता बने हैं और कल्प के अन्त तक देवता बने रहेंगे, तत्पश्चात् दूसरे कल्प में उन्हें भी मृत्युलोक में आना पड़ेगा। इन आजान देवों से भी सौ गुना अधिक सुख देवताओं के राजा इन्द्र का माना गया है लेकिन उस इन्द्र को भी कभी दैत्यों का संकट आता है तो कभी विश्वामित्र जैसे तपस्या करके नाक में दम कर देते हैं।
इन्द्र के सुख से सौ गुना अधिक सुख ब्रह्मलोक का माना गया है और ब्रह्मलोक के सुख से भी अनन्त गुना अधिक सुख भगवत्प्राप्त, तत्त्वज्ञ, जीवन्मुक्त महापुरूषों का माना गया है। कहने का तात्पर्य यह है कि परमोच्च प्राकृत लोक अथवा देवलोकों में प्रवेश करने वाले भी जन्म-मृत्यु के चक्र के आधीन बने रहते हैं, उससे मुक्त नहीं हो पाते लेकिन आत्मज्ञानी, तत्त्वज्ञ, ब्रह्मवेत्ता महापुरूषों का सुख अनंत है, अपार है, अगाध है, अविनाशी है। अनन्त ब्रह्म और अनन्त ब्रह्माण्ड समाप्त हो जाये तो भी यह आत्मज्ञान का सुख, परमात्मप्राप्ति का सुख कभी नष्ट नहीं होता, अक्षुण्ण बना रहता है।
आत्मलाभात्
परं लाभं न
विद्यते।
आत्मसुखात्
परं सुखं न
विद्यते।।
आत्मलाभ से बढ़कर कोई लाभ नहीं, आत्मसुख से बढ़कर कोई सुख नहीं और आत्मज्ञान से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं है। आत्मज्ञान की थोड़ी सी वार्ता भी अगर सुनने को मिल जाती है तो मात्र इससे ही मनुष्य के कई जन्मों के पाप-ताप निवृत्त होने लगते हैं, सहज में शांति व तनावरहित अवस्था आने लगती है। जहाँ आत्मज्ञान की चर्चा होती है, आत्मज्ञानी महापुरूषों के नजदीक हम रहते हैं वहाँ हमारे चित्त के विकार, मोह, ममता, काम, क्रोध, भय, शोक, ये सारे नियंत्रित होने लगते हैं।
तुम
तसल्ली न दो
सिर्फ बैठे ही
रहो,
महफिल
का रंग बदल
जाएगा.....
गिरता
हुआ दिल संभल
जाएगा।
काम-क्रोध में, लोभ-मोह में, भय शोक में हमारा दिल हमारे विचार आदि गिरते रहते हैं और आत्मज्ञानी महापुरूष की हाजरी मात्र से वे गिरने से थम जाते हैं।
सत्संग में बैठने मात्र से, आत्मज्ञान का श्रवण करने मात्र से ही पापों का नाश हो जाता है। चित्त प्रसन्न होता है, ज्ञान की वृद्धि सहज में होती है तथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, में हमारा जो आसक्तियुक्त स्वभाव है, आसक्ति करने वाला चित्त है वह भी स्थिर होने लगता है। इसी कारण साधक कहता है कि गुरूदेव ! आप केवल हमारे बीच बैठ ही रहिए क्योंकि आपकी उपस्थिति मात्र से ही हमें अनेकानेक अनुभूतियाँ होने लगती हैं।
मोरारजी देसाई कहते हैं- "मैं कलेक्टर से लेकर प्रधानमंत्री तक के पद पर गया और अनेकानेक अनुभव किये लेकिन रमण महर्षि के चरणों में बैठने से जिस सुख और शांति का अनुभव हुआ उस प्रकार का आनंद और सुखदायी अनुभूति और कहीं भी नहीं हुई। रमण महर्षि के पास ऐहिक सुविधा से युक्त कुछ भी नहीं था। उनके वहाँ नीचे जमीन पर ही बैठना पड़ता था। बैठे-बैठे संत को अपलक निहारते-निहारते जिस शांति का अनुभव करते हैं, जिस सुख की अनुभूति करते हैं ऐसा सुख प्रधानमंत्री पद तक पहुँचने पर भी नहीं मिला।"
जिन महापुरूष के हृदय में आत्मलाभ होता है, उनके चरणों में बैठने मात्र से, उनका सत्संग सुनने मात्र से, उनके दर्शन मात्र से अथवा महापुरूष जहाँ भजन करते हों ऐसी जगह की यात्रा करने से हमें इतना अधिक लाभ होता है।
ऐसे महापुरूषों की सेवा से जन्म, मृत्यु एवं गर्भावास का दुःख दूर होता है। उनकी सेवा यह नहीं कि उन्हें फल-फूल भेंट कर दिया, पैर दबा दिये....नहीं।
वे
चाहते सब झोली
भर लें।
निज
आत्मा का
दर्शन कर
लें।।
वे दूसरा कुछ भी नहीं चाहते। भगवान प्रेम के भूखे होते हैं। वे मोहनथाल के भूखे हैं ऐसा कभी सुना है आपने ? किसी दिन पुजारी कहे कि भगवान को रबड़ी पसंद है तो समझ लीजिए कि पुजारी को रबड़ी पसंद है। मंदिर के भगवान ने तो कभी किसी से कुछ नहीं माँगा। इसी तरह हृदयमंदिर के भगवान जिसमें प्रकट हुए हैं वे महापुरूष भी कुछ माँगते नहीं अपितु ऐसा देते हैं कि कभी खत्म न हो। वे तो ऐसा अनुभव करवाते हैं कि जिसके आगे सम्पूर्ण विश्व व स्वर्ग के सुख वैभव भी तुच्छ हो जाते हैं।
मामुपेत्य
तु कौन्तेय
पुनर्जन्म न
विद्यते।
'मामुपेत्य' का अर्थ है कि, मेरे दर्शन हो जाए, मेरे स्वरूप का बोध हो जाय तथा मुझमें प्रवेश हो जाए। श्रीकृष्ण जहाँ से मैं बोल रहे हैं, वहीं से तुम भी मैं बोल रहे हो लेकिन श्रीकृष्ण अपने मैं को जानते हैं और तुम अपने मैं से अनभिज्ञ हो इसलिए इसे जानने के लिए श्रीकृष्ण तुम्हें आमंत्रित कर रहे हैं।
कितना सरल है.....! पूरे विश्व का ज्ञान मिल जाये, जगत की वस्तुएँ मिल जाएँ, जगत की वाह-वाही मिल जाए लेकिन 'तुम कौन हो' इसका ज्ञान न मिले और इसमें विश्रांति न मिले तो सारा मिला हुआ एक दिन ठन-ठन पाल.....।
एक मजेदार किस्सा बतलाता हूँ-
एक श्रीमति के श्रीमान का नाम था ठनठनपाल। विवाहोपरांत उस श्रीमती को बच्चे, बूढ़े सभी 'मिसेज ठनठनपाल' के नाम से पुकारते थे। उसने समझ लिया कि यह सब मेरे पति के इस नाम के कारण चिढ़ाते हैं। एक दिन उसने परेशान होकर अपने पति से कहाः
"आप अपना नाम बदल डालो।"
पति ने कहाः "मैंने आज ही नाम बदल लिया और कल फिर कोई तुझे उस नाम से चिढ़ाने लगेगा तो तू फिर मुझे अपना नाम बदलने के लिए कहेगी। इससे अच्छा यह है कि तू ही मेरा नाम ढूँढ दे।"
अन्ततः किसी रविवार के दिन मिसेज ठनठनपाल ने अपने पति का नया नामकरण दिन रखा। वह पति का नया नाम ढूँढने को निकली। रास्ते में गोबर ढूँढने वाली गरीब बाई से उसका नाम पूछा तो उसने बतायाः "मेरा नाम लक्ष्मी है लक्ष्मी।"
वह कुछ आगे बढ़ी। सब्जी मंडी में भिखमंगा भीख माँग रहा था। कहीं से पाँच दस पैसे, तो कहीं से आलू टमाटर आदि.....। उससे नाम पूछाः
"तुम्हारा नाम क्या है ?"
उस भिखमंगे ने कहाः "मेरा नाम जगपाल है, जगपाल।"
वह आश्चर्य करती हुई घर लौट रही थी तो रास्ते में शवयात्रा जा रही थी। उसने लोगों से पूछाः "कौन मर गया ?"
किसी ने बतायाः "अमरसिंह मर गया है अमर सिंह।"
वह घर पहुँची। सहेलियाँ और उसके पति के दोस्त नया नाम सुनने को उत्सुक थे। उसने घर पहुँचते ही सबसे कहाः
गोबर
ढूँढत है
लक्ष्मी, भीख
माँगे जगपाल।
अमरसिंह
तो मरत है,
अच्छा मेरा
ठनठनपाल।।
मेरा ठनठनपाल ही अच्छा है, दो हजार कमाता है।
नाम तो रख दिया अमुक-अमुक भाई लेकिन दिल में आत्म-साक्षात्कार की योग्यता होने के बाद भी यदि विषय, विकार, काम, क्रोध आदि से आसक्ति नहीं मिटी तो कहना ही पड़ेगा-
नाम
बड़ा किस काम
का, जो किसी के
काम न आये।
सागर
से नदियाँ
भली, जो सबकी
प्यास
बुझाए।।
ब्रह्मलोक तक जाओ और पुण्यों का क्षय होने पर वापस आओ इससे उचित होगा कि मनुष्य जन्म में ही आत्मज्ञान प्राप्त कर लो ताकि पुनः जन्म-मरण के चक्कर में फँसना ही न पड़े।
देवदुर्लभ मनुष्य देह में जो मनुष्य ऐसी वैसी तुच्छ बातों में अथवा राग-द्वेष में स्वयं को बरबाद करता है उसे तुलसीदास जी 'आत्महत्या कहते हैं। वह अपनी आत्मा का घात करता है।
आज का इन्सान अपनी आत्मा को तो पहचानता नहीं लेकिन उसे रूपयों-पैसों तथा पद प्रतिष्ठा के लिए स्पर्धा करना आता है कि उसके पास दस हजार का हीरा है तो मैं बीस हजार का पहन कर दिखला दूँ। लेकिन जो अखिल ब्रह्माण्ड का हीरा है उसे प्राप्त कर दिखला और तेरा बेड़ा पार कर ले भैया....!
जिसे पुनरागमन नहीं करना है, उसे गीता के इस श्लोक पर अच्छी तरह मनन करना चाहिए। जिसे जगत की नश्वरता और परमात्मा की शाश्वतता का ज्ञान नहीं है, समझ नहीं है, उसे जगत के सारे ही पदार्थों की समझ हो तो भी वह नासमझी की समझ है।
राष्ट्रपति डॉ. राधाकृष्णन् लन्दन गये थे तब लोगों ने उन्हें वहाँ के सारे आविष्कार दिखाये। पानी के भीतर यात्रा करने वाली पनडुब्बी दिखलाई, आकाश में तीव्र गति से उड़नेवाला विमान दिखलाया तथा अन्य कई आविष्कार दिखलाये।
डॉ. राधाकृष्णन् दार्शनिक थे। उन्होंने कहाः "तुमने पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना तो सीख लिया है, पनडुब्बी के आविष्कार से मछली की भाँति पानी में दौड़ना भी सीख लिया है लेकिन अभी भारत के मनिषियों की भाँति आत्म-साक्षात्कार कर लेने का आविष्कार तुम्हारा बाकी है।"
इटली में मुसोलिनी के यहाँ भारत के प्रतिनिधि के रूप में ओंकारनाथ गये थे। मुसोलिनी ने उन्हें भोजन दिया। भोजन करते समय वार्तालाप के दौरान मुसोलिनी ने ओंकारनाथ से प्रश्न कियाः
"तुम्हारे भारत में ऐसा क्या है कि एक ग्वाला गायों के पीछे जाता है और बाँसुरी बजाता है तो लोग उसे देखकर आनन्दविभोर हो जाते हैं ? भारत के लोग उसके गीत गाते नहीं थकते और प्रति वर्ष जन्माष्टमी के उत्सव पर, 'कृष्ण कन्हैयालाल की जय' का सब गुँजन करते हैं ! आखिर ऐसा क्यों होता है ?"
ओंकारनाथ को लगा कि उस बेचारे को अभी खबर नहीं कि मनुष्य को क्या चाहिए। मनुष्य को आनन्द चाहिए... सुख चाहिए और यह सुख शुद्ध रूप से प्राप्त हो, निर्विकारी हो तो फिर कहना ही क्या ? मनुष्य परिश्रमवाले और पराधीन सुखों को त्याग कर परिश्रम रहित तथा स्वतंत्र रूप से प्राप्त सुखों की ओर आकर्षित होता है। यह अपना सब का अनुभव होगा।
परिश्रम रहित स्वाधीन सुख का नाम है भक्ति और योग।
अत्यधिक परिश्रम करके संसार की वस्तुएँ लाकर उनका भोग करें फिर सुख की प्राप्ति की इच्छा करें, बीड़ी सिगरेट आदि पीकर खों-खों करें, फिर वापस सुलगावें तो दुःख ही मिलता है, परन्तु यदि भक्ति, ज्ञान आदि की थोड़ी-सी किरण मिल जाय तो.....
दिले
तस्वीर है
यार,
जबकि
गर्दन झुका
ली, और
मुलाकात कर
ली।
वो
थे न मुझसे
दूर, न मैं
उनसे दूर था।
आता
न था नजर तो
नजर का कसूर
था।।
जिसको ऐसी अनुभूति हो जाती है, ऐसे शाश्वत सुख को मनुष्य पहचान जाता है, उसे जहाँ जरूरत पड़ती है वहाँ गोता मार लेता है। घर का खजाना है।
मुसोलिनी को अपने घर के इस खजाने की खबर न थी। ओंकारनाथ ने भोजन के दौरान ही एक प्रयोग किया। भोजन की थाली में रखे गये दो चम्मचों को उठाकर वे बर्तनों के साथ प्रसन्नात्मा होकर तालबद्ध तरीके से बजाते हुए श्रीकृष्ण का एक गीत गाने लगे। कुछ ही देर में भोजन करता हुआ मुसोलिनी झूमने लगा व ओंकारनाथ द्वारा चम्मचों पर तालबद्ध गीत को सुनकर अत्यधिक प्रसन्न होकर नाचने लगा। फिर मुसोलिनी कहता हैः "कृपया बन्द करो।"
ओंकारनाथ कहते हैं- "मैं बजा रहा हूँ तो आपको क्या हो रहा है ? आप अपना खाना खाइये।"
तब मुसोलिनी कहता हैः "मुझसे खाया नहीं जा रहा है, भीतर कुछ हो रहा है।"
ओंकारनाथ कहते हैं- "तुम भीतर के मजे की एक किरण मात्र से मिर्च-मसालेयुक्त स्वादिष्ट वस्तुओं को भूल गये और जूठे चम्मचों को मेरे जैसे साधारण व्यक्ति द्वारा बजाने पर भी चित्तशक्ति, कुण्डलिनी शक्ति जागृत हुई तो तुम्हें खाने की अपेक्षा अन्दर का मजा अधिक आ रहा है तो जिन्होंने सदा आत्मा में रमण किया, ऐसे जीवन्मुक्त श्रीकृष्ण की आँखों से नित्य नवीन रस उछल उछल कर ग्वाल-गोपियों के समूह पर गिरता होगा तो उन्हें कितना आनन्द होता होगा। ?
तुम्हारे इस डाइनिंग रूम में तुम्हें इतना आनन्द आ रहा है..... वह भी इस छोटे से ही गीत से, तो जहाँ से गीत उत्पन्न होता है वहाँ निवास करने वाले श्रीकृष्ण की निगाहों व उनकी बँसी के नाद से ग्वाल-गोपियाँ और भारतवासी कितना आनन्द प्राप्त करते होंगे ? कैसे नाचते-झूमते होंगे ? फिर कृष्ण कन्हैयालाल की जय न करें तो क्या करें ?"
मान की, यश की और नश्वर वस्तुओं की प्रीति से मन भीतर गोता नहीं मार सकता। भीतर गोता मारने के लिए मन को उत्कंठा नहीं है। अगर उत्कंठा है तो फिर कोई कठिनाई भी नहीं है। तत्काल मुलाकात होती है, जैसे की राजा जनक को घोड़े के रकाब में पैर डालते-डालते अनुभूति हुई। परीक्षित को सात दिन में हुई।
एक बार महाराष्ट्र में कोई वैश्य एकनाथ जी महाराज के पास गया। एकनाथ जी महाराज से उसने प्रश्न कियाः
"आपमें और मुझमें क्या अन्तर है ? मेरी भी पत्नी है, पुत्र है, तथा आप भी विवाहित होकर पुत्रयुक्त हैं। हम भी कपड़े पहनते हैं, खाते पीते हैं और आप भी यही सब करते हैं। फिर भी लोग आपको भगवान के रूप में मानते हैं और हमें.....हमारी तो कोई गिनती ही नही करता। आपकी फोटो की पूजा होती है लेकिन हमारे तो सामने भी कोई आदर से देखना पसंद नहीं करता। हम उधार देते हैं तो वापस लेने जाओ तब भी खाली हाथ लौटाना पड़ता है किन्तु आप कुछ भी नहीं देते फिर भी कतारबद्ध होकर आपके श्रीचरणों में कुछ न कुछ अर्पण कर जाते हैं। आखिर ऐसा क्या है आपके पास कि आप इतने महान हैं और हम इतने सड़कछाप बन कर घूम रहे हैं ? आपमें और हममें अन्तर क्या है ?"
एकनाथ जी ने विचार किया कि यह सीधा उपदेश नहीं पचा सकता। ऑपरेशन के माध्यम से ही इसका इलाज संभव है। उन्होंने उस वैश्य से कहाः "तुम मुझसे क्या पूछते हो ? आने वाले सात दिनों में तो तुम्हारी मौत होने वाली है।"
सेठ भयभीत होकर चौंका। वह दुकान पहुँचा और बैठे-बैठे विचारने लगा कि सात दिन में मृत्यु.....? हुक्का पीना बन्द कर दिया। घर पहुँचते ही चटनी, मसालेदार खाना आदि न मिलने पर थाली आदि फेंककर वह जो चिढ़चिढा व्यवहार करता था, वह भी बन्द हो गया और दो दिनों में तो ऐसा लगने लगा था मानो दुकान पर कोई सेठ नहीं संत बैठा हो।
तीसरे और चौथे दिन तो 'माझा विट्ठला...... माझा विट्ठला' शुरू कर दिया। पत्नी विचारती है कि ये कल तक तो धमपछाड़ करते थे, प्यालियाँ-हुक्का पीते थे और उधारी वसूल करने जाते तो लड़ाई झगड़ा कर आते थे लेकिन अब तो भगत जैसे बन गये हैं !
पाँचवाँ और छट्ठा दिन बीता परन्तु ज्यों-ज्यों समय बीतता गया त्यों-त्यों उसकी व्यर्थ की तमाम भागदौड़ कम हो गई। उसका व्यवहार भी संत तुल्य परिवर्तित होने लगा। घर में, परिवार में, पड़ौस में, दुकान में, वसूली में, सभी में परिवर्तन हो गया क्योंकि भीतर जब परिवर्तन होता है तो बाहर सहज ही परिवर्तन प्रकट होता है।
ऐसा करते-करते छट्ठे दिन की रात आई। उस रात सोने की लिए बिस्तर लगाया। वह बिस्तर पर बैठा और 'माझा विट्ठला.... विट्ठला.... मैं जैसा-तैसा हूँ पर तेरा हूँ... विट्ठला.... विट्ठला.....! ऐसा करते करते उसे नींद आ गई। सुबह चार बजे ही उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर वह ध्यान जप आदि करने बैठ गया।
प्रातः सात बजे वह अपने परिजनों को कहता हैः
"आज तक जो भी कुछ हुआ हो, मैंने कभी तुम्हें परेशान किया हो, कुछ कहा सुना हो तो मुझे माफ कर देना। मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ और तुम मुझे छोड़ रहे हो। आज के बाद फिर हमारी मुलाकात न हो सकेगी।"
पत्नी आश्चर्यचकित होकर पूछती हैः "कैसी बहकी-बहकी बातें कर रहे हैं आप ? क्या हुआ है आपको ?"
सेठ बोलाः "एकनाथ जी महाराज ने मुझे कहा था कि सातवें दिन तेरी मृत्यु होगी। छः दिन तो पूरे हो गये और आज सातवाँ दिन है। आज मैं किस समय मर जाऊँ कोई निश्चित नहीं। अतः अब एक काम करो कि मेरे लिए भूमि लीप दो, तुलसी के पत्ते मेरे मुँह में रख दो। तत्पश्चात तुम सभी गीता का पाठ और विट्ठल का कीर्तन करो।"
कुटुम्बी कहते हैं- "ऐसा दो महीने पहले होता तो हमें अधिक दुःख नहीं होता लेकिन सप्ताहभर से आप बहुत बदल चुके हो अतः अब हम आपको जाने नहीं देंगे।"
सेठ कहता हैः "परन्तु यह तुम्हारे कहने से तो होगा नहीं।"
इतने में एकनाथजी महाराज अनजाने होकर उधर घूमने निकले। उन्होंने उसके घर के आगे खड़े रहकर चिन्ताग्रस्त परिवार के सदस्यों से पूछाः
"क्या हो गया ?"
घर को लोगों ने दौड़ कर उनका चरणस्पर्श किया और निवेदन कियाः "स्वामी जी ! आपके इन भक्त ने केवल एक बार ही आपके दर्शन किये और इनका जीवन बदल गया लेकिन आज ये जा रहे हैं। कृपया इन्हें मौत से बचा लीजिए।"
एकनाथ जी ने कहते हैं- "ठहरो, रूको।"
फिर उस सेठ से पूछते हैं- "भाई ! तूने कितने झगड़े किये ? कहता था न कि रोज दो तीन झगड़े करता हूँ तो इन छः दिनों में तूने कितने किये ?"
"स्वामी जी ! एक भी नहीं।"
"क्यों ?"
"अरे ! सात दिन में तो मरना ही है फिर क्यों झगड़ा करें।"
"हुक्के कितने पिये ?"
"सब छूट गये।"
"प्यालियाँ कितनी पी ?"
"वह भी छूट गई।"
"घर में थालियाँ कितने दिन फैंकी ?"
"एक दिन भी नहीं।"
"क्यों ?"
"क्योंकि मुझे दिखता था कि अब सात दिनों में मरना है फिर यह सब क्यों...?"
एकनाथ जीः "तुझे सात दिन दूर मृत्यु दिखाई दी तो तू संत जैसा हो गया। हमें तो इस शरीर की मृत्यु हमेशा दिखती है। यह साँस बाहर जाए तो वापस आएगी कि नहीं, किसको पता है ? इस कारण हमारा हृदय संत तुल्य बना है भैया !
तुझे तो सात-सात दिन दूर मृत्यु दिखी तब भी तेरे विकार दूर हुए लेकिन हमें तो रोज दिखता है कि यह नश्वर है। मैं नश्वर देह नहीं, मैं तो वह शाश्वत आत्मा हूँ जहाँ से देह की आँख को दर्शन की शक्ति, मन को मनन की शक्ति, कानों को श्रवण की शक्ति, नासिका को गंध की शक्ति, जिह्वा को स्वाद की शक्ति और बुद्धि को निर्णय करने की शक्ति मिलती है। वह आत्मा स्थिर रहती है जबकि निर्णय बदलते हैं, विचार बदलते हैं, देखने के दृश्य व सुनने के शब्द बदलते हैं फिर भी जो नहीं बदलता वह मेरा विट्ठल चैतन्य आत्मा ही मुझे सत्य लगता है। यह शरीर तो मुर्दे जैसा है जो चैतन्य की सत्ता से चलता है, फिरता है और पुनः थककर सो जाता है। सोने से इन्द्रियों को पुनः थोड़ी चेतना विशेष प्राप्त होती है इस कारण तरोताजा होकर फिर संसार में जुटता है और अपनी ऊर्जा-शक्ति को बिखेरकर है, पुनः थकता है। थकता है तो फिर सोकर चेतना ले आता है और फिर बिखेरता है, चुम्बन आदि लेने जाता है फिर बिखेरता है..... ऐसा करते करते जीवन पूरा कर देता है। इसकी अपेक्षा जहाँ से नित्य सत्ता, स्फूर्ति, चेतना मिलती है उस परमेश्वर को जागने के लिए प्रयत्न करता है तो धन्य हो जाता है। वह तो धन्य हो जाता है, जिनके ऊपर उसकी मीठी निगाह पड़ती है वे लोग भी धन्य हो जाते हैं।"
एकनाथ जी कहते हैं- "हे वैश्य ! तू बाहर का धन्धा तो कर परन्तु इसे करने की शक्ति जिस चैतन्य आत्मा विट्ठल से आती है उसे श्वासोच्छ्वास में भी जानने का थोड़ा धन्धा कर। हकीकत में तू मरने वाला नहीं है परन्तु यह समझने का प्रयास करना कि मरता यह शरीर है।"
मैं भी तुमसे यही कहता हूँ कि तुम्हारी मृत्यु सात दिन में ही होगी। सोमवार नहीं तो मंगलवार की होगी, मंगलवार नहीं तो बुधवार को, गुरूवार नहीं तो शुक्रवार की होगी और शनिवार नहीं तो रविवार को तो अवश्य ही होगी। इन सात में से किसी एक दिन तो जरूर ही जाना है क्योंकि आठवाँ दिन आता ही नहीं। इसलिए मौत आकर तुम्हारा शरीर निष्क्रिय कर दे उसके पहले इस शरीर को प्रदान करने वाले उस पावन परमात्मा की याद में अपने आप को लगा देना भैया.....!
दो
बातन को भूल
मत, जो चाहत
कल्याण।
नारायण
एक मोत को,
दूजो श्री
भगवान।।
मृत्यु और ईश्वर को जो नहीं भूलता है उसकी चेतना शीघ्र जाग्रत होती है। अतः ईश्वर और मृत्यु को मत भूलो। मृत्यु को याद करने से वैराग्य आयेगा और ईश्वर को याद करने से अभ्यास होगा।
असंशयं
महाबाहो मनो
दुर्निग्रहं
चलम्।
अभ्यासेन
तु कौन्तेय
वैराग्येण च
गृह्यते।।
'हे महाबाहो ! यह मन बड़ा चंचल है और उसका निग्रह भी बड़ा कठिन है। वह तुम्हारा कहना बिल्कुल ठीक है । परंतु हे कुन्तीनंदन ! अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसका निग्रह किया जा सकता है।'
(भगवदगीताः 6.35)
भगवान कहते हैं- "अभ्यास और वैराग्य से तू आत्मा को ग्रहण कर सकता है, पा सकता है, अनुभव कर सकता है। मन को बारम्बार ध्येय में लगाने का नाम अभ्यास है। उसमें महत्त्व और आदरबुद्धि होनी चाहिए। ऐसा करने से अभ्यास दृढ़ हो जाता है।
अभ्यास के दो भेद हैं-
सारे चिन्तनों की अपेक्षा करते हुए, उनसे उदासीन होकर अपनी मनोवृत्ति को केवल लक्ष्य की ओर ही लगाएँ।
मन जहाँ-जहाँ भी विचरण करे वहाँ सर्वत्र अपने इष्ट की सत्ता को व्याप्त देखें।
अभ्यास की सहायता के लिए वैराग्य की आवश्यकता है क्योंकि सांसारिक आकर्षणों से जितनी अधिक विरक्ति होगी मन उतना ही परमात्मा की ओर आकर्षित होगा।
इस तरह अभ्यास और वैराग्य से मन वशीभूत हो जाता है।
किसी गाँव से कुछ दूर एक महात्मा का आश्रम था। एक दिन वे आश्रम के बाहर बैठे थे। कुछ अनजान पथिक आये और उनसे पूछाः "बाबाजी ! बस्ती(गाँव) किधर है ?"
बाबाजी ने गाँव की विपरीत दिशा में बतलायाः
"बस्ती इस तरफ है।" वहाँ हकीकत में बस्ती नहीं थी श्मशान था।
वे अनजान पथिक वहाँ जाकर वापिस आये और महात्मा जी से कहाः "बाबाजी ! हमने आपसे बस्ती का पूछा और आपने श्मशान का बता दिया ! बस्ती कहाँ है ?"
महात्मा जी कहते हैं- "भाई ! बस्ती तो दाहिनी ओर है लेकिन वह बस्ती, बस्ती नहीं है। कोई कहीं भी आये-जाये सारा जीवन दौड़ धूप मचाये मगर आखिर में आकर सब श्मशान में ही बसते हैं। यहाँ आकर फिर कोई लौटते नहीं। वास्तविक बस्ती तो यही है।"
अन्त में श्मशान जाकर इस देह को वहाँ बसना पड़े उसके पहले तुम्हारे मन को आत्मा-परमात्मा स्वरूप में बसा दो भैया ! ताकि तुम्हारा पुनरागमन न हो।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
राजा तेजबहादुर की शोभायात्रा निकल रही थी, उस समय रास्ते पर एक संत बैठे हुए थे। उनका नाम धूलीशाह था। वे हमेशा भूल पर ही बैठे रहते। राजा की सवारी आ रही थी, इसलिए सिपाहियों ने जाकर कहाः
"महाराज ! उस किनारे हो जाइये। राजा की सवारी आ रही है।"
धूलीशाहजी बोलेः "राजा की सवारी आ रही है तो क्या बड़ी बात है ? उसको कहो कि सहजता से प्रणाम करके यहाँ से निकल जाये क्योंकि यहाँ महाराज विद्यमान हैं।"
सिपाहियों ने कहाः यदि राजा अकेले होते तो नमस्कार करके संकोच से निकल जाते, पर उनके हाथी, रथ, घोड़े आदि सब कैसे निकलें ? महाराज ! आप जरा किनारे हो जाइये।"
धूलीशाहजी बोलेः "यदि हाथी-घोड़े पर ही जाना हो तो दूसरा रास्ता पकड़ लो। उसे बता दो कि यदि तुम राजा हो तो मैं महाराजा हूँ। महाराजा यहाँ पर ही बैठेंगे। महाराजा की सवारी नहीं हट सकती।"
बात राजा तक पहुँची। राजा इतना आवेशी नहीं था। वह रथ से उतरकर आया और धूलीशाह की ओर निहारकर बोलाः
"महाराज ! आप राजा-महाराजा हो ?"
धूलीशाह जी बोलेः "हाँ, मैं महाराजा हूँ।"
राजाः "राजा के पास तो राज्य होता है, सिपाही होते हैं....खजाना होता है, नौकर होते हैं। राजा के पास अपनी पताका होती है, झंडा होती है। आपके पास क्या है ?"
धूलिशाहजी बोलेः "तेरा राज्य कोई छीन न ले इसलिये तू शत्रुओं से डरता है और तुझे सीमाओं की रक्षा करनी पड़ती है। मेरा तो कोई शत्रु ही नहीं है और मुझे सीमाओं की रक्षा की फिकर नहीं तो मैं सिपाही क्यों रखूँ ? तुझे तो नौकरों को वेतन भी देना पड़ता है, इसलिए धन भी चाहिए। मुझे तो कोई नौकरों को वेतन देना नहीं पड़ता इसलिए धन भी नहीं चाहिए। तेरे नौकर तो पैसे के लालच से तेरी सेवा करेंगे और अंदर से सोचेंगे कि कब राजा जाये। तेरा तो इस इलाके में ही आदर होगा, जबकि हम तो जहाँ जाएँगे वहाँ सब लोग मुफ्त में हमारी सेवा करेंगे। हमको नौकरों की जरूरत नहीं। हमको धन की भी जरूरत नहीं क्योंकि हमारा कोई खर्च नहीं है। हमें किसी से डर भी नहीं कि हम अंगरक्षक रखें। बात रही झोली, झंडा और पताका की, तो तेरी यह बाह्य पताका है, जबकि हमारी तो सोहं और शिवोहं की भीतर की पताका लहरा रही है। हम जहाँ भी नजर डालते हैं, वहाँ हमारा राज्य खड़ा हो जाता है। सीमाओं को सँभालने के लिए सिपाहियों की जरूरत नहीं पड़ती। तेरा राज्य तो जमीन पर कुछ दिन के लिए है, लेकिन फकीरों का राज्य तो दिलों पर होता है। फकीरों की हयाती (उपस्थिति) में तो होता ही है, परन्तु यदि वे चले जायें, फिर भी उनका राज्य तो समाज के दिलों पर शाश्वत रहता है। इसलिये भैया ! मैं तो महाराजा और तू राजा है। मेरी इच्छा है कि तू भी महाराजा हो जा।"
दास
कबीर चढ्यो
गढ़ ऊपर।
राज
मिल्यो
अविनाशी।।
साधक जब सहस्रार में चढ़ता है तो वह गढ़ पर पहुँच जाता है। दास कबीर चढयो....। वह अविनाशी राज्य को प्राप्त कर लेता है, जहाँ कोई वासना नहीं रहती, कोई कर्त्तत्व नहीं रहता। वहाँ परम शांति मिलती है। त्याग से शान्ति मिलती है, लेकिन आत्म साक्षात्कार से परम शांति मिलती है। त्यागी को एकान्त और शुद्ध आहार, शुद्ध व्यवहार चाहिए। लेकिन आत्म साक्षात्कारी को एकान्त की भी आवश्यकता नहीं क्योंकि आत्म-साक्षात्कार हो गया तो एक ही में वह सारी वृत्तियों का अंत कर देता है।
बद्रीनाथ की यात्रा पर एक संत तथा उनके शिष्य साधु जा रहे थे। रास्ते में पहाड़ी इलाका आया। वहाँ पहाड़ी लोगों का कुछ उत्सव था और पहाड़ी भाषा में भजन बनाकर गा रहे थे। कोई झूम रहे थे। उनके गाने में रस था, मीठास थी, पर साधु लोग उनकी भाषा नहीं समझ पा रहे थे। वे एक-दूसरे में चर्चा कर रहे थे कि ये लोग क्या गा रहे हैं ? आखिर उन अनुभवी संत के पास बात गईः
"बाबाजी ! ये लोग क्या गा रहे हैं ?"
बाबाजी बोलेः "सब एक ही गा रहे हैं और एक ही से गा रहे हैं। तुम चाहे समझो या न समझो, वह प्रभु तो जानता है कि सब एक ही को गा रहे हैं और एक से ही गा रहे हैं।"
तुझमें
राम मुझमें
राम सब में
राम समाया है......
तुझमें
ॐ मुझमें ॐ सब
में ॐ समाया
है......
हमारे चैतन्य की वास्तविक ध्वनि ॐकार से मिलती जुलती है। इसीलिए बच्चा जब पैदा होता है तो उसका रूदन ॐकार की ध्वनि से ही होता है, ऊँवाँ....ऊँवाँ....ऊँवाँ ही होता है। बच्चा चाहे किसी भी देश, किसी भी मजहब का हो, उसकी ध्वनि ॐकार से जुड़ी होती है। वही बालक जब बूढ़ा होता है या मरीज होकर अस्पताल में पड़ा होता है तब भी उसकी आवाज ॐकार से मिलती होती है। चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो ?
हरेक का नित्य संबंध उसी अन्तर्यामी परमात्मा के साथ है, चाहे किसी भी देह में हो। देह बदलती रहती है परन्तु परमात्मा के साथ उसका सम्बन्ध वैसा का वैसा रहता है। इसलिए ईश्वर किसी को मिलता नहीं है। अर्जुन को भी नहीं मिला है। अर्जुन कहता हैः
नष्टो
मोहः
स्मृतिर्लब्धवा
त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि
गतसन्देहः
करिष्ये वचनं
तव।।
अर्जुन को
स्मृति हुई
है। विस्मृति
हो गई थी, स्मृति
हुई है, इससे
मिला हुआ कहा
जाता है, बाकी
तो वह हमेशा
मिला हुआ ही
है। जो वस्तु मिलती
है उसके छीने
जाने का भय
होता है।
जिसका संयोग
होगा उसका
वियोग
निश्चित ही
होगा। ईश्वरत्व
की स्मृति
होती है इसलिए
अर्जुन कहता हैः
नष्टो
मोहः......।
गीता में एक प्रश्न करने का मन होता है। भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
यदा
यदा ही
धर्मस्य
ग्लानिर्भवति
भारत।
'जब-जब धर्म की हानि होती है तब-तब मैं आता हूँ और धर्म की स्थापना करते हूँ।'
वे ही श्रीकृष्ण आगे जाकर गीता के अठारहवें अध्याय में अर्जुन से कहते हैं-
सर्वधर्मान्
परित्यज्य
मामेकं शरणं
व्रज।
एक ओर तो 'मैं धर्म की स्थापना करने आता हूँ' ऐसा कहते हैं और वे ही भगवान श्रीकृष्ण आगे जाकर अर्जुन से कहते हैं किः "सब धर्मों को छोड़कर तू मेरी शरण में आ जा।' अब इन दोनों में कौन-सा वचन हमें स्वीकार करना चाहिए ? सब धर्मों को छोड़ देना चाहिए कि भगवान धर्म की स्थापना करने आते हैं यह बात माननी चाहिए ?
ब्रह्मसूत्र, उपनिषद् और गीता के प्रस