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प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू के

सत्संग-प्रवचन

श्रीकृष्ण अवतार दर्शन

निवेदन

श्रीकृष्ण के जीवन को तत्त्वतः समझना अत्यन्त कठिन है। भगवान श्रीकृष्ण स्वयं गीता में कहते हैं-

कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।

'कोई विरला ही मुझे तत्त्व से जानता है।'

ईश्वर को तत्त्वतः जानना और यथारूप विवेचन कर उसे दूसरों को समझना तो और भी कठिन है। कोई विरले महापुरूष ही यह कार्य लोकभोग्य शैली में कर पाते हैं।

इस छोटे से ग्रन्थ में भारत के तत्त्ववेत्ता महापुरूष पूज्यपाद संत श्री आसाराम जी बापू की अनुभवसम्पन्न योगवाणी में भगवान श्रीकृष्ण की मधुर लीलाओं का वर्णन संकलित कर लिपिबद्ध किया गया है।

संत श्री के वचनामृत त्रिविध तापों से संतप्त मानवजीवन को केवल शीतलता ही प्रदान नहीं करते हैं, अपितु उनका मनन करने वालों को तत्त्वज्ञान के उच्च शिखर पर आरूढ़ होने में भी सहायता करते हैं।

प्रस्तुत पुस्तक में प्रकाशित श्रीकृष्ण के जीवनादर्शों का अनुसरण कर आत्मकल्याण के इच्छुक साधक नित्य-निरन्तर तत्परतापूर्वक साधनापथ पर अग्रसर होंगे, इसी आशा के साथ.......

विनीत,

श्री योग वेदान्त सेवा समिति

अहमदाबाद आश्रम

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अनुक्रम

निवेदन.. 2

श्रीकृष्ण का प्रागट्य.... 3

जन्म के प्रकार. 4

श्रीकृष्ण की मधुर बाललीलाएँ. 9

पूर्णपुरूषः श्रीकृष्ण... 17

प्रेमस्वरूप श्रीकृष्ण... 22

पूतना-प्रसंग.. 26

'परित्राणाय साधूनां......' 30

श्रीकृष्ण का जीवन-संदेश.. 33

उद्धव को भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश.. 39

प्रपत्तियोग.. 44

आत्मखोज करो.. 54

जागो अपनी महिमा में......... 60

तीन प्रकार की विद्याएँ. 68

'परिप्रश्नेन.....' 73

जन्माष्टमी... 80

 

 

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श्रीकृष्ण का प्रागट्य

श्रीमद् भगवदगीता के चौथे अध्याय के सातवें एवं आठवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने श्रीमुख से कहते हैं-

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

'हे भरतवंशी अर्जुन ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ। साधुजनों (भक्तों) की रक्षा करने के लिए, पापकर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की भली भाँति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।'

जिस समय समाज में खिंचाव, तनाव व विषयों के भोग का आकर्षण जीव को अपनी महिमा से गिराते हैं, उस समय प्रेमाभक्ति का दान करने वाले तथा जीवन में कदम कदम पर आनंद बिखेरने वाले श्रीकृष्ण का अवतार होता है। श्रीकृष्ण का जन्मदिवस या अवतार ग्रहण करने का पावन दिवस ही जन्माष्टमी कहलाता है।

श्रीमद् भागवत में भी आता है कि दुष्ट राक्षस जब राजाओं के रूप में पैदा होने लगे, प्रजा का शोषण करने लगे, भोगवासना-विषयवासना से ग्रस्त होकर दूसरों का शोषण करके भी इन्द्रिय-सुख और अहंकार के पोषण में जब उन राक्षसों का चित्त रम गया, तब उन आसुरी प्रकृति के अमानुषों को हटाने के लिए तथा सात्त्विक भक्तों को आनंद देने के लिए भगवान का अवतार हुआ।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो श्रीकृष्ण का जन्म पाँच हजार दौ सौ तेइस वर्ष पूर्व माना जा सकता है। प्राचीन ऋषि-मुनि इतिहास पर ज्यादा जोर नहीं देते थे अपितु उन घटनाओं पर ध्यान देते थे जिनसे तुम्हारी भीतर की चेतना जागृत हो सके तथा तुम्हारा जीवन आत्ममस्ती से पूर्ण हो।

काल की दृष्टि से देखा जावे तो मनुष्य के वर्ष तथा देवताओं के वर्ष अलग-अलग हैं। मनु महाराज तथा ब्रह्माजी के वर्षों में भी अन्तर है। आपके 360 वर्ष बीतते हैं तब देवताओं का एक वर्ष होता है। देवताओं के ऐसे 12000 वर्ष बीतते हैं तब एक चतुर्युगी होती है तथा ऐसी 71 चतुर्युगी बीतती है तब एक मन्वन्तर होता है... तब कहीं जाकर ब्रह्माजी का एक दिन होता है।

ब्रह्माजी के इस एक दिन में 14 इन्द्र बदल जाते हैं तथा ब्रह्माजी की उम्र 100 वर्ष होती है। ऐसे ब्रह्माजी भगवान की नाभि से प्रकट होते हैं।

मनु ब्रह्माजी के पुत्र हैं फिर भी दोनों का समय अलग-अलग होता है। छगनलाल के घर मगनलाल का जन्म हुआ तो छगनलाल का समय और मगनलाल का समय अलग नहीं होता, पिता-पुत्र के वर्ष-काल अलग नहीं होते लेकिन ब्रह्माजी का वर्ष और उनके ही पुत्र मनु का वर्ष अलग-अलग होता है।

ब्रह्माजी के एक दिन तथा मनु के एक  दिन में, हमारे एक दिन और देवताओं के एक दिन में जमीन-आसमान का अंतर होता है। अतः काल भी अपनी-अपनी अपेक्षा रखता है। देश और काल सापेक्ष होते हैं अतः अलग-अलग कथाओं  अलग-अलग विचार मिलेंगे। इन पर ऐतिहासिक दृष्टि से आप सोचेंगे-समझेंगे तो आप भी अश्रद्धा के शिकार हो सकते हैं। अतः ऐतिहासिक दृष्टि से नहीं अपितु तत्त्व की दृष्टि व प्रेम की निगाहों से देखेंगे तो इन अवतारों का अपना बड़ा अस्तित्त्व है।

अतः भक्त लोग 'श्रीकृष्ण कब हुए' इस बात पर ध्यान नहीं देते बल्कि 'उन्होंने क्या कहा' इस बात पर ध्यान देते हैं, उनकी लीलाओं पर ध्यान देते हैं। भक्तों के लिए श्रीकृष्ण प्रेमस्वरूप हैं और ज्ञानियों को श्रीकृष्ण का उपदेश प्यारा लगता है फिर भी सामान्य रूप से यही माना जाता है कि आज से 5223 वर्ष पूर्व, द्वापर के 863875 वर्ष बीतने पर भाद्रपद मास में, कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में, बुधवार के दिन श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

वसुदेव-देवकी के यहाँ श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तभी से भगवान श्रीकृष्ण हैं, ऐसी बात नहीं है। ऋगवेद में श्रीकृष्ण का बयान आता है, सामवेद के छान्दोग्योपनिषद में श्रीकृष्ण का बयान मिलता है। योगवाशिष्ठ महारामायण में कागभुशुण्ड एवं वशिष्ठजी के संवाद से पता चलता है कि श्रीकृष्ण आठ बार आये, आठ बार श्रीकृष्ण का रूप उस सच्चिदानंद परमात्मा ने लिया।

अनुक्रम

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जन्म के प्रकार

जन्म के प्रकार के संबंध में भारतीय शास्त्रों में छः प्रकार के जन्म वर्णित हैं-

1.                  माता पिता के मैथुन व्यवहार से जो रज-वीर्य का मिलन होता है इसे लौकिक जन्म कहा जाता है अथवा ऐसा भी कहा जा सकता है कि मन की वासना के अनुसार जो जन्म मिलता है, यह जनसाधारण का जन्म है।

2.                  दूसरे प्रकार का जन्म संतकृपा से होता है। जैसे, किसी संत ने आशीर्वाद दे दिया, फल दे दिया और उससे गर्भ रह गया। तप करे, जप करे, दान करे अथवा किसी साधु पुरूष के हाथ का वरदान मिल जाये, उस वरदान के फल से जो बच्चा पैदा हो, वह जनसाधारण के जन्म से कुछ श्रेष्ठ माना जाता है। उदाहरणार्थः भागवत में आता है कि धुन्धुकारी का पिता एक संन्यासी के चरणों में गिरकर संतानप्राप्ति हेतु संन्यासी से फल लाया। वह फल उसने अपनी पत्नी को दिया तो पत्नी ने प्रसूति पीड़ा से आशंकित होकर अपनी बहन से कह दिया कि, "तेरे उदर में जो बालक है वह मुझे दे देना। यह फल मैं गाय को खिला देती हूँ और पति को तेरा बच्चा दिखला दूँगी।" ऐसा कहकर उसने वह फल गाय को खिला दिया।

उसकी बहन के गर्भ से धुन्धुकारी पैदा हुआ तथा संन्यासी द्वारा प्रदत्त फल गाय ने खाया तो गाय के उदर से गौकर्ण पैदा हुआ जो भागवत की कथा के एक मुख्य पात्र हैं।

3.                  कोई तपस्वी क्रोध में आकर शाप दे दे और गर्भ ठहर जाय यह तीसरे प्रकार का जन्म है।

एक ऋषि तप करते थे। उनके आश्रम के पास कुछ लड़कियाँ गौरव इमली खाने के लिए जाती थीं। लड़कियाँ स्वभाव से ही चंचल होती हैं, अतः उनकी चंचलता के कारण ऋषि की समाधि में विघ्न होता था। एक दिन उन ऋषि ने क्रोध में आकर कहाः "खबरदार ! इधर मेरे आश्रम के इलाके में अब यदि कोई लड़की आई तो वह गर्भवती हो जायेगी।"

ऋषि का वचन तो पत्थर की लकीर होता है। वे यदि ऊपर से ही डाँट लें तो अलग बात है लेकिन भीतर से यदि क्रोध में आकर कुछ कह दें तो चंद्रमा की गति रूक सकती है लेकिन उन ऋषि का वचन नहीं रूक सकता। सच्चे संत का वचन कभी मिथ्या नहीं होता।

दूसरे दिन भी रोज की भाँति लड़कियाँ आश्रम के नजदीक गई। उनमें से एक लड़की चुपचाप अन्दर चली गयी और ऋषि की नजर उस पर पड़ी। वह लड़की गर्भवती हो गई क्योंकि उस ऋषि का यही शाप था।

4.                  दृष्टि से भी जन्म होता है। यह चौथे प्रकार का जन्म है। जैसे वेदव्यासजी ने दृष्टि डाली और रानियाँ व दासी गर्भवती हो गई। जिस रानी ने आँखें बन्द की उससे धृतराष्ट्र पैदा हुए। जो शर्म से पीली हो गई। उसने पांडु को जन्म दिया। एक रानी ने संकोचवश दासी को भेजा। वह दासी संयमी, गुणवान व श्रद्धा-भक्ति से संपन्न थी तो उसकी कोख से विदुर जैसे महापुरूष उत्पन्न हुए।

5.                  पाँचवें प्रकार का जन्म है कारक पुरूष का जन्म। जब समाज को नई दिशा देने के लिए अलौकिक रीति से कोई जन्म होता है हम कारक पुरूष कहते हैं। जैसे कबीर जी। कबीर जी किसके गर्भ से पैदा हुआ यह पता नहीं। नामदेव का जन्म भी इसी तरह का था।

नामदेव की माँ शादी करते ही विधवा हो गई। पतिसुख उसे मिला ही नहीं। वह मायके आ गई। उसके पिता ने कहाः "तेरा संसारी पति तो अब इस दुनिया में है नहीं। अब तेरा पति तो वह परमात्मा ही है। तुझे जो चाहिए, वह तू उसी से माँगा कर, उसी का ध्यान-चिंतन किया कर। तेरे माता-पिता, सखा, स्वामी आदि सब कुछ वही हैं।"

उस महिला को एक रात्रि में पतिविहार की इच्छा हो गई और उसने भगवान से प्रार्थना की कि 'हे भगवान ! तुम्हीं मेरे पति हो और आज मैं पति का सुख लेना चाहती हूँ।' ऐसी प्रार्थना करते-करते वह हँसती रोती प्रगाढ़ नींद में चली गई। तब उसे एहसास हुआ कि मैं किसी दिव्य पुरूष के साथ रमण कर रही हूँ। उसके बाद समय पाकर उसने जिस बालक को जन्म दिया, वही आगे चलकर संत नामदेव हुए।

जीसस के बारे में भी ऐसा ही है। जीसस मरियम के गर्भ से पैदा हुए थे। मरियम जब कुंवारी थी तभी जीसस गर्भ में आ गये थे। सगाई के दौरान 'मरियम गर्भवती है' ऐसा सुनकर उसके भावी पति के परिवार वाले सगाई तोड़ रहे थे। कहते हैं कि भावी पति को स्वप्न आया कि 'मरियम कुंवारी ही है यदि तू सगाई तोड़ेगा तो तेरी बुरी हालत हो जाएगी।'

फिर सगाई  के बाद मरियम की शादी भी हुई लेकिन जीसस बिना बाप के ही पैदा हुए ऐसा कहा जाता है।

6.                  जन्म की अंतिम विधि है अवतार। श्रीकृष्ण का जन्म नहीं, अवतार है। अवतार व जन्म में काफी अन्तर होता है। सच पूछो तो तुम्हारा भी कभी अवतार था किन्तु अब नहीं रहा।

अवतरति इति अवतारः।

अर्थात् जो अवतरण करे, ऊपर से नीचे जो आवे उसका नाम अवतार है। तुम तो विशुद्ध सच्चिदानंद परमात्मा थे सदियों पहले, और अवतरण भी कर चुके थे लेकिन इस मोहमाया में इतने रम गये कि खुद को जीव मान लिया, देह मान लिया। तुम्हें अपनी खबर नहीं इसलिए तुम अवतार होते हुए भी अवतार नहीं हो। श्रीकृष्ण तुम जैसे अवतार नहीं हैं, उन्हें तो अपने शुद्ध स्वरूप की पूरी खबर है और श्रीकृष्ण अवतरण कर रहे हैं।

श्रीकृष्ण का अवतार जब होता है तब पूरी गड़बड़ में होता है, पूरी मान्यताओं को छिन्न भिन्न करने के लिये होता है। जब श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ तब समाज में भौतिकवाद फैला हुआ था। चारों ओर लग जड़ शरीर को ही पालने-पोसने में लगे थे। धनवानों और सत्तावानों का बोलबाला था।

भगवान का जन्म प्रत्येक युग में युग के अनुसार ही होता है। अब यदि श्रीकृष्ण आ जाएँ तो जरूरी नहीं कि वे हठ करेंगे कि पहले बँसी बजाई थी, अब भी बजाऊँगा, माखन चुराया था, अब भी चुराऊँगा या घोड़ागाड़ी ही चलाऊँगा। नहीं। अब यदि श्रीकृष्ण आते हैं तो मर्सीडीज भी चला सकते हैं, बुलेट भी चला सकते हैं। उनके जीवन में कोई जिद नहीं, कोई आग्रह नहीं।

....और तात्त्विक दृष्टि से श्रीकृष्ण आते हैं, न जाते हैं। एक सच्चिदानंद की सत्ता ही है जो श्रीकृष्ण का रूप लेकर, श्रीराम का रूप लेकर लीला करती है और समाज को मार्गदर्शन दे जाती है लेकिन अन्य अवतारों की अपेक्षा श्रीकृष्ण का अवतार बड़ा सहज है। उनके जीवन में कोई तनाव नहीं, कोई खिंचाव नहीं, कोई पकड़ नहीं, कोई त्याग नहीं, कोई ग्रहण नहीं। बस, उनका तो सदा सहज जीवन है। मौका आया तो गा लिया, मौका आया तो नाच लिया, बँसी बजा ली, मक्खन चुरा लिया। रथ चला लिया। और तो और, आवश्यकता पड़ने पर युद्ध के मैदान में अर्जुन को तत्त्वज्ञान का उपदेश भी दे दिया। श्रीकृष्ण का जीवन बड़ा ही निराला जीवन है।

कई लोग अवतरण या अवतार के संबंध में शंका करते हैं कि भगवान जब आप्तकाम हैं तो उन्हें ऊपर से नीचे आने की क्या जरूरत है ? जो शुद्ध है, निरन्तर है, अविनाशी है, निराकार है उन्हें साकार होने की क्या जरूरत है ?

वेदान्त के महापुरूष लोग कहते हैं कि परमात्मा निराकार हैं। परमात्मा का वास्तव में कोई जन्म नहीं है। वास्तव में न तो श्रीकृष्ण आये हैं, न गये हैं लेकिन माया के जगत में जब सारा जगत मायामय है, मिथ्या है, तो इस मिथ्या जगत में आना भी मिथ्या है और जाना भी मिथ्या है। इसलिए श्रीकृष्ण आने वालों की नजर से आये भी और जाने वालों की नजर से गये भी।

ज्ञानी बोलते है कि भगवान तो शुद्ध परब्रह्म परमात्मा हैं, निर्गुण हैं, निराकार हैं। निराकार का अवतार संभव नहीं है। निराकार में कृति हो जाय, यह संभव नहीं है।

हकीकत में निराकार का अवतार होना संभव नहीं है लेकिन अवतार उस निराकार का नहीं हुआ वरन् 'मायाविशिष्ट चैतन्य' ही श्रीकृष्ण का आकार लेकर प्रगट हुआ।

भक्तों का कहना है कि भगवान का अवतार हुआ और ज्ञानियों का कहना है कि माया का अवतार हुआ। माया ऊपर नीचे होती है, तुम्हारा शरीर ऊपर नीचे होता है लेकिन तुम्हारे ज्ञान की सवित् ऊपर-नीचे नहीं होती। तुम्हारा मन ऊपर नीचे होता है किन्तु सबको देखने वाला जो चैतन्य है, वह अपनी महिमा में ज्यों का त्यों होता है। इस प्रकार ईश्वर का अवतार होते हुए भी ईश्वर ने अवतार नहीं लिया और अवतार लेते हुए भी उनको कोई समस्या नहीं, ऐसा ज्ञानमार्गी कहते हैं।

भक्त कहते हैं कि रोहिणी नक्षत्र में, भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी तिथि को रात्रि के 12 बजे कंस के कारागार में श्रीकृष्ण का अवतरण हुआ है। कृष्णपक्ष की अंधेरी रात में ही ऐसे प्रकाश की आवश्यकता है।

भागवताकार कहते हैं कि वसुदेव-देवकी शादी के बाद जब अपने घर को जा रहे थे तब आकाशवाणी हुई किः "ऐ कंस ! तू जिसे छोड़ने जा रहा है उस देवकी के उदर से जो बालक पैदा होगा वही तेरा काल होगा।'

देहाभिमानी व भोगी व्यक्ति सदा भयभीत रहता है और मृत्यु से डरता है। कंस ने तत्क्षण ही तलवार निकालकर देवकी का अंत करना चाहा तब वसुदेव ने समझायाः "देवकी तो तेरी बहन है, जिसे शादी करवाकर अभी तू विदा कर  रहा है। उसे मारने से क्या होगा? मृत्यु तो सबकी होती है। मृत्यु के बाद जन्म तथा जन्म के बाद मृत्यु, यह क्रम तो सदा चलता रहता है। वास्तविक मृत्यु तो अज्ञान की करना है। अज्ञान की एक बार मौत कर दे फिर तेरी कभी मौत होगी ही नहीं और इस देह को तू कितना भी संभाले लेकिन अंत में यह मृत्यु के बिना रहेगी नहीं।"

जो पामर होते हैं उन्हें सज्जन पुरूषों के वचन समझ में नहीं आते हैं। बुद्धि में तमोगुण और रजोगुण होता है तो देहासक्ति बढ़ती है। यदि तामस प्रकृति बढ़ जाती है तो वह फिर दंड व अनुशासन से ही सुधरती है। कंस ने वसुदेव की बात नहीं मानी और समझाने के बाद भी वसुदेव-देवकी को कंस ने कैद कर लिया।

श्रीकृष्ण जब आने को थे तब वसुदेव का तेज बढ़ गया और उन्होंने देवकी को निहारा तो वह तेज देवकी में प्रविष्ट हो गया। भगवान नारायण का चतुर्भुजी रूप वसुदेव-देवकी ने देखा। फिर भगवान अन्तर्धान हो गये और श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुए।

वसुदेव और देवकी के यहाँ जेल में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। वसुदेव अर्थात् शुद्ध सत्त्वगुण और देवकी अर्थात् निष्ठावान भावना। इन दोनों का जब संयोग  होता है तब आपकी देहरूपी जेल में उस आनंदकंद परमात्मा का जन्म होता है, ऐसा तत्त्व की दृष्टि से आप समझ सकते हैं।

श्रीकृष्ण का जन्म अलौकिक है। माता-पिता हथकड़ियों के साथ जेल में बंद हैं। चारों ओर विपत्तियों के बादल मंडरा रहे हैं और उन विपत्तियों के बीच भी श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए अवतार ले रहे हैं। मानो यह संदेश दे रहे हों कि भले ही चारों ओर विपत्तियों ने घेर रखा हो किन्तु तुम एक ऐसे हो जिस पर विपत्तियों का असर हो नहीं सकता।

यमुना में बाढ़ आई हुई है। श्रीकृष्ण को उस पार ले जाना है और वसुदेव घबरा रहे हैं किन्तु श्रीकृष्ण मुस्कुरा रहे हैं। कथा कहती है कि श्रीकृष्ण ने अपना पैर पानी को छुआया और यमुना की बाढ़ का पानी उतर गया।

जिसे अपनी महिमा का पता है, जिसने अपना घात नहीं किया है, जो अपने को देह नहीं मानता है, ऐसे व्यक्ति के संकल्प में अदभुत सामर्थ्य होता है। कई ऐसे बालक जो भविष्य में अपने स्वरूप को जान सकते हैं, उनके बाल्यकाल में ऐसा चमत्कार नहीं देखा गया किन्तु श्रीकृष्ण के साथ तो जन्म से ही चमत्कार घटते रहे हैं।

जिन्होंने गूढ़ और सूक्ष्म तत्त्वज्ञान को समझाने का प्रयास किया तथा समाज को अपने प्रेम और अठखेलियों से प्रभावित किया ऐसे ब्रह्मज्ञान के प्रचारक, सदा समता में स्थित रहने वाले श्रीकृष्ण का जन्म सच पूछो तो जन्माष्टमी की रात के 12 बजे ही नहीं होता, अपितु तुम जब जन्म करवाना चाहो, तब होता है।

कहते हैं शुभ घड़ी में भगवान श्रीकृष्ण पैदा हुए। मैं कहूँगा - गलत है। जिन घड़ियों में भगवान श्रीकृष्ण पैदा हुए वे घड़ियाँ शुभ हो गयीं। जिसको मुस्कुराना आ जाता है, निर्वासनिक होना आ जाता है, अपने-आप में रमण करना आ जाता है, वह जहाँ जाता है, वहाँ मंगल हो जाता है, शुभ हो जाता है। वह जो करता है, देखता है और देता है वह भी शुभ होता है क्योंकि वह स्वयं परम शुभ से जुड़ा है।

क्या जन्माष्टमी ही श्रीकृष्ण का जन्मदिन है ? नहीं। ऐसे अनेक बार जन्मदिन हुए। आप जब चाहो, याद कर जन्मदिन मनाकर उसका मजा ले सकते हो क्योंकि वह तत्त्व कभी गया नहीं। गया इसलिये नहीं कि उसका कभी जन्म ही नहीं हुआ। वह तो अजन्मा है..... अनादि है.... अनंत है.... लेकिन तुम जब भावना से मनाते हो तब जन्मदिन हो जाता है। तुम रोज मनाना चाहो तो रोज मना सकते हो, हर दिल में.... हर साँस में मना सकते हो। वास्तव में उसके सिवा तो कोई जन्मा ही नहीं। जन्म देने की सत्ता प्रकृति की है लेकिन प्रकृति को सत्ता देने वाला भी वही एक चैतन्य है।

आपके जीवन में भी जन्माष्टमी तब होगी जब श्रीकृष्ण प्रगट होंगे। ये श्रीकृष्ण तो वसुदेव देवकी के यहाँ जन्मे थे और यशोदा के घर पले थे अर्थात् विवेक और समता के यहाँ श्रीकृष्ण का जन्म होता है तथा यशस्विनी बुद्धि, ऋतंभरा प्रज्ञा के पास वह पलता है। विवेक की मूर्ति वसुदेव हैं और समता की मूर्ति देवकी हैं। यशोदा यशस्विनी बुद्धि की परिचायक हैं।

तुम जब प्रखर विवेक और समता रखोगे तब तुम्हारे अंतर में भी श्रीकृष्णतत्त्व प्रगट हो सकता है।

निरंजन, निराकार, सच्चिदानंद परमात्मा ने साकार प्रगट होकर श्रीकृष्ण के रूप में अनेक लीलाएँ प्रगट कीं। लीलाएँ तो अनेक थीं किन्तु उन सबके पीछे लक्ष्य यही था कि आप भी अपने कृष्णतत्त्व को जान लो। आप स्वयं कृष्णतत्त्व ही हो, प्रत्येक व्यक्ति कृष्णतत्त्व है लेकिन वह देह को मैं मानता है इसलिए गड़बड़ में पड़ जाता है। यदि आत्मा को मैं मानें तो आप ही का नाम कृष्ण है।

यह बड़ा ही रहस्य भरा महोत्सव है। समाज के पहले से लेकर आखिरी व्यक्ति तक का ध्यान रखते हुए उसके उत्थान के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों को अपनाते हुए, इन्सान की आवश्यकताओं व महत्ता को समझाकर उसके विकास के लिए निर्गुण, निराकार परात्पर ब्रह्म सगुण-साकार होकर गुनगुनाता, गीत गाता, नाचता, खिलाता और खाता, अनेक अठखेलियाँ करता हुआ, इस जीव को अपनी असलियत  का दान करता हुआ,  उसे अपनी महिमा में जगाता हुआ प्रगट हुआ है। उसी को श्रीकृष्णावतार कहते हैं।

अनुक्रम

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श्रीकृष्ण की मधुर बाललीलाएँ

श्रीकृष्ण का सर्वस्व मधुर है। तभी तो कहते हैं-

अधरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम्।

हृदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्।।

श्रीकृष्ण की प्रत्येक क्रिया, प्रत्येक लीला मधुर है और बाललीला का तो कहना ही क्या ? प्रत्येक मन को आकर्षित कर दे, आनंदित कर दे, आह्लादित कर दे, ऐसी हैं उनकी बाललीलाएँ। फिर चाहे नंदबाबा हो चाहे माँ यशोदा, चाहे गोपियाँ हों चाहे गोपबाल, सभी उनकी लीलाओं से आनंदित हुए हैं, प्रभावित हुए हैं। उनकी बाललीलाएँ किसी सामान्य बालक की तरह नहीं रही। उसमें भी अनेक गूढ़

 संदेश छुपे हुए हैं और हो भी क्यों न ? क्योंकि ये सच्चिदानंद ब्रह्म द्वारा साकार रूप में की गई लीलाएँ हैं। मनुष्य चाहे तो उससे ज्ञान प्राप्त करे और चाहे तो उनके प्रेम में रंग जाय। यह उस पर निर्भर करता है। वह नटखटिया तो ज्ञान और प्रेम दोनों देता है।

एक बार यशोदा माँ से किसी ने फरियाद की कि कृष्ण ने मिट्टी खाई है। यशोदा पूछती हैं- 'बोल तूने मिट्टी खाई ?"

श्रीकृष्ण कहते हैं- "नहीं माँ ! नहीं खाई।"

यशोदाः "तू झूठ बोल रहा है। मुख खोलकर बता।"

श्रीकृष्ण ने मुख खोलकर बताया तो यशोदा माँ को उसमें त्रिभुवन के दर्शन हो गये और वह चकित हो गई। श्रीकृष्ण ने अपनी माया समेट ली तो फिर यशोदा अपने मातृभाव में आ गई।

सामर्थ्य होने पर भी श्रीकृष्ण में बालक होने की योग्यता है।

हमारे पास धन आता है तो छोटे बनने में हमें तकलीफ होती है। सत्ताधीश हो जाते हैं और सत्ता चली जाती है तो बड़ी तकलीफ होती है। महान् बनने के बाद छोटा बनते है तो तकलीफ होती है किन्तु श्रीकृष्ण के साथ ऐसा कुछ नहीं है क्योंकि उनका जीवन सर्वांगी है इसलिए ऋषियों ने उन्हें पूर्णावतार कहा है।

श्रीकृष्ण का अन्तःकरण इतना शुद्ध व विकसित है कि उन्होंने चौसठ दिन में चौसठ कलाएँ सीख लीं। बाल्यावस्था में श्रीकृष्ण पूरे बालक, युवावस्था में पूरे निर्भय और प्रौढ़ावस्था में पूर्ण ज्ञानी हैं। तभी तो अर्जुन को युद्ध के मैदान में गीता का उपदेश दिया।

बालकृष्ण की बाललीलाएँ ऐसी हैं कि यशोदा माँ को भी आश्चर्य हुए बिना न रहे और प्रभावती भी प्रसन्न हुए बिना न रहे। यमुनाजी के प्रवाह में कूद पड़े हैं और कालियानाग के सिर पर नाच रहे हैं। धेनुकासुर, बकासुर को ठीक कर दिया है और 'छछियन भरी छाछ' के लिए नाचने को भी तैयार हैं।

देवांगना नाम की अहीर की लड़की गौशाला में गोबर उठाते समय सोच रही है कि 'कब यह काम पूरा होगा ? कन्हैया के दर्शन करने जाना है... वह तो बंसी बजाता रहता है और मैं यहाँ गोबर उठाती रहती हूँ। हाय......। अब कोई  जाओ। अरे कन्हैया ! अब तू ही आ जा। मन से पुकारती हुई वह गोबर उठाती जा रही है, इतने में वहाँ पर तेज पुंज प्रगट हुआ है उसमें कन्हैया मुस्करा रहा है।

देवांगना बोलीः "तुम खड़े-खड़े क्या मुस्कुरा रहे हो ? यहाँ आकर तगारे तो उठवाओ। ....श्रीकृष्ण तगारे उठवाने लगे हैं। कितनी सरलता है....! इससे उनका बड़प्पन नहीं चला गया।

श्रीकृष्ण कहते हैं- "मैं तो मक्खन लेने आया हूँ और तू मुझसे तगारे उठवा रही है ?"

देवांगनाः "मक्खन तो दूँगी लेकिन पहले ये तगारे उठवा।"

श्रीकृष्णः "कितना दोगी ?"

देवांगनाः "एक तगारा उठवायेगा तो एक लोंदा मक्खन का दूँगी।"

श्रीकृष्ण ने एक..... दो.... तीन.... चार... तगारे उठवाये। उनको तो बाललीला करनी है अतः वे बोलेः "तू तो तगारे उठाती जाती है, फिर गिनेगा कौन ? मैं उठाने वाला एक आदमी हूँ। दूसरा गिनने वाला कहाँ से लाऊँ ? जा, मैं नहीं उठवाता।" कहकर श्रीकृष्ण खड़े रह गये।

देवांगना बोलीः "अरे ! कन्हैया !! उठवा..... उठवा, मैं गिनूँगी।"

श्रीकृष्णः "तू भूल जाएगी तो ?"

देवांगनाः "नहीं भूलूँगी। देख, तू जितने तगारे उठवाता जाएगा, उतने तेरे मुँह पर मैं गोबर के टिल्ले करती जाऊँगी।"

श्रीकृष्ण कहते हैं- "ठीक है।"

उन्हें कोई परेशानी नहीं है क्योंकि श्रीकृष्ण अपने को देह नहीं मानते हैं। उनका मैं त अनन्त-अनन्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है। वह कभी बिगड़ नहीं सकता।

मानो इस लीला से श्रीकृष्ण यही बताना चाहते हैं कि तुम भी अपने वास्तविक मैं को पहचान लो। इसलिए वे नाचकर, उपदेश देकर, विनोद करके, टिल्ले लगवाकर भी तुम्हें अपने आकर्षक स्वरूप की ओर ले जाते हैं और वह आकर्षक स्वरूप तुम्हारे ही हृदय में छुपा हुआ है।

तुम आनंदस्वरूप, सुखस्वरूप हो इसलिए तुम सुख और आनंद के लिए प्रयास करते हो किन्तु हकीकत में सुख लेने की नहीं, देने की चीज है यह श्रीकृष्ण के जीवन से सीखना चाहिए। कभी बंसी बजा कर सुख दे रहे हैं तो कभी माखन चुरा कर सुख दे रहे हैं। गोबर के तगारे उठवाते-उठवाते देवांगना मुख पर गोबर के टिल्ले करती है तब भी वे सुख ही बरसा रहे हैं।

किसी सेठ सत्ताधीश, या अधिकारी को उनका कोई हितैषी या नौकर आकर कहे कि, साहब ! इतने गोबर के तिलक करने दो आपके चेहरे पर। तो क्या वह करने देगा ? नहीं। ''मेरी इज्जत जायेगी.... लोग क्या कहेंगे ?" यही उसका प्रतिभाव होगा।

हमारे पास चार पैसे आ जाते हैं और हम ड्रायवर रख लेते हैं क्योंकि फिर स्वयं को गाड़ी चलाने में संकोच होता है। क्योंकि इज्जत का सवाल है। लेकिन उस विश्वंभर को घोड़ागाड़ी चलाने में भी संकोच नहीं होता। कितना सरल स्वभाव है !

यहाँ श्रीकृष्ण देवांगना के तगारे उठवा रहे हैं, देखते-देखते पूरी गौशाला साफ हो गई और श्रीकृष्ण का मुँह गोबर के तिलकों से भर गया। जैसे आकाश में तारे टिमटिमाते हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण के मुख पर टिल्ले टिमटिमा रहे हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं- "लाओ मक्खन।" कमर पर अपने पीताम्बर की गाँठ बाँधकर झोली बनाते हुए कहते हैं- "चल, इसमें रखती जा।"

देवांगना मक्खन का एक-एक लौंदा रखती जाती है और एक-एक टिल्ला पोंछती जाती है।

श्रीकृष्ण कहते हैं- "मैं केवल मक्खन थोड़े खाऊँगा ! साथ में थोड़ी ही मिश्री भी दे दे।"

देवांगनाः "मिश्री मुफ्त में थोड़ी ही मिलेगी ! उसके लिए दूसरा कुछ करो।"

श्रीकृष्णः "क्या करूँ ?"

देवांगनाः "थोड़ा नाच कर दिखाओ।"

श्रीकृष्ण नाच रहे हैं। उनकी अंगड़ाइयों में सुख के साथ ज्ञान और ज्ञान के साथ प्रेम मिलता है। वास्तव में देखो तो जैसे थे वैसे ही अकर्त्ता। यह श्रीकृष्ण की बाललीलाओं में देखने को मिलता है।

श्रीकृष्ण ने एक माखनचोर कंपनी बनाई थी जिसके सदस्य यह बताते थे कि आज अमुक-अमुक घर मक्खन बना है। जो अधिक चतुर गोपियाँ होतीं वे अपना मक्खन किसी दूसरे के घर रख आती थीं।

उनमें से प्रभावती बड़ी चतुर थी। चतुर व्यक्ति आत्मानंद से दूर रह जाता है, भले ही आत्मानंद उसके पास आता हो। प्रभावती कई बार यशोदा से श्रीकृष्ण की शिकायत कर चुकी थी तब यशोदा ने कहा थाः "मैं तो तब मानूँगी जब उसको रंगे हाथ पकड़कर लाओ।"

एक बार प्रभावती ने अपनी चतुराई से श्रीकृष्ण को रंगे हाथ पकड़ने की सारी योजना बनाई। उसने सींके पर मक्खन रख दिया और नीचे रस्सियाँ इस ढंग से बाँधी कि रस्सी के छूते ही घंटियाँ बज उठें फिर वह स्वयं छुप कर बैठ गई।

श्रीकृष्ण आये और देखा कि सींका तो बँधा है किन्तु आज कुछ षड्यंत्र है। पहले तो फौज को भेजते थे किन्तु आज स्वयं गये और गोपबालों से कहाः "ठहरो आज कुछ गड़बड़ है, रूको जरा।"

श्रीकृष्ण ने इधर-उधर देखा कि कोई है तो नहीं ! फिर धीरे से सींके के पास गये। वहाँ देखा कि हर रस्सी में घंटी लगी हैं और किसी का भी हाथ लगते ही बज उठेगी। फिर भी मक्खन तो चुराना ही है। जैसे साधक संसार की गड़बड़ सुनते हुए भी अपनी साधना नहीं छोड़ता तो भगवान संसार की गड़बड़ देखकर अपना मक्खन क्यों छोड़ेंगे भैया ?

भगवान ने शब्द के अधिष्ठाता देव को आदेश दियाः

"मेरी इस आज्ञा का पालन हो कि मैं अथवा मेरे साथी रस्सियों को छू भी लें अथवा गलती से हाथ-पैर लग जाय तो भी बजना मत। मेरी आज्ञा का पूरा पालन करना।"

देव ने श्रीकृष्ण की आज्ञा का पालन किया। सब बच्चे भीतर आ गये फिर भी घंटियाँ बजी नहीं। बच्चे एक दूसरों के कन्धों पर चढ़कर खड़े रहे और उन सब पर चढ़कर श्रीकृष्ण पहुँच गये सींके तक।

आज तक श्रीकृष्ण पहले सबको खिलाते थे, किन्तु इस बार देखा कि षड्यंत्री के घर का माल है तो कहीं कुछ गड़बड़ तो नहीं है ! क्योंकि वे कंपनी के नेता थे न ! नेता का यह गुण होना चाहिए कि सुख के समय साथियों को आगे करे किन्तु विपत्ति में स्वयं पहले जावे, इसलिए पहले श्रीकृष्ण स्वयं खाने लगे। ज्यों ही उनका हाथ खाने के लिए होठों तक पहुँचा कि टन.... टन..... टन.... टन..... करती घँटियाँ बज पड़ीं। श्रीकृष्ण ने डाँटकर कहाः "हे शब्द के अधिष्ठाता देव ! प्रगट हो जाओ।"

कथा कहती है कि शब्दब्रह्म साकार रूप होकर प्रगट हुए। श्रीकृष्ण ने कहाः "हे नादब्रह्म ! मेरी आज्ञा का उल्लंघन क्यों किया ?"

तब शब्दब्रह्म ने कहाः "भगवान् ! हम आपकी आज्ञा का पालन ही कर रहे थे। शास्त्र भी तो आपकी ही आज्ञा है। शास्त्रों में लिखा है कि और समय  घंटियाँ न बजे लेकिन भगवान जब भोग लगायें तब तो बजना ही चाहिए।"

घंटियाँ बजने से घर की मालकिन प्रभावती आ गई। प्रभावती का तात्पर्य है कि जिसकी बुद्धि संसार में प्रभावशाली है, वह परमात्मप्रेम को नहीं देख पाती है। जिसका प्रभाव शरीर के सुख में ही खर्च हो जाता है, वह आत्मसुख नहीं ले पाता है और आत्मसुख यदि उसके हाथ में आता भी है तो छूट जाता है। यही बात बताने का प्रयास वेदव्यासजी ने इस प्रसंग में किया है।

प्रभावती भागती-भागती आई लड़कों के सरदार श्रीकृष्ण को पकड़ लिया।

वे सरदार ही तो हैं ! लड़कों की कंपनी में लड़कों के योगियों की कंपनी में योगियों के, योद्धाओं की कंपनी में योद्धाओं के, नाचने वालों की कंपनी में नाचने वालों के वे सरदार नटवर नागर हैं क्योंकि वह चैतन्य सबका सरदार ही है।

श्रीकृष्ण कहते हैं- "छोड़ दे, छोड़ दे..... भूल हो गई। दूसरी बार नहीं करूँगा।"

प्रभावती कहती हैः "आज तो मैं नहीं छोड़ूँगी। आज तो मैंने तुझे रंगे हाथों पकड़ा है।" प्रभावती श्रीकृष्ण का हाथ पकड़कर घसीटते हुए यशोदा के पास ले जा रही है।

प्रभावती का लड़का कहता हैः "माँ....माँ....! इसको छोड़ दे, इसके बदले में मुझे पकड़ ले।"

प्रभावतीः "तू तो मेरा बेटा है।"

जिसको मेरा बेटा 'मेरा' लगता है, दूसरे का बेटा, 'दूसरे का बेटा' लगता है, उसके हाथ में आया हुआ आनंद भी टिकता नहीं।

श्रीकृष्ण कहते हैं- "छोड़ दे..... छोड़ दे......।"

प्रभावतीः "नहीं छोडूँगी।"

वह तो आगे बढ़ती चली। आखिर श्रीकृष्ण तो युक्तियों के राजा हैं। प्रभावती ने छोटा-सा घूँघट तान रखा था। श्रीकृष्ण उसके ससुर की आवाज में खाँसे तो प्रभावती ने अपना घूँघट और खींचा। परिस्थिति की अनुकूलता देखते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं- "अब तू छोड़ती है तो ठीक है और नहीं छोड़ती है तो मेरा यह हाथ थक गया है। तू यह हाथ ढीला कर। मैं तुझे अपना दूसरा हाथ पकड़ा देता हूँ।"

श्रीकृष्ण ने साथ चल रहे प्रभावती के बेटे को इशारे से बुलाकर उसका हाथ प्रभावती के हाथ में थमा दिया और खुद बीच के छोटे-से रास्ते से घर पहुँचकर अपने कमरे में जाकर सो गये।

प्रभावती अपने बेटे को लेकर यशोदा के घर पहुँची। वह अभी भी यही समझ रही है कि श्रीकृष्ण को पकड़कर आ रही हूँ।

उसने यशोदा का दरवाजा खटखटायाः "यशोदा माँ.....! यशोदा माँ....! द्वार खोलो। आज तो रंगे हाथों पकड़कर लाई हूँ तुम्हारे कन्हैया को। रोज यही चोरी करता है। इसने बहुत सताया है। केवल मेरे घर ही नहीं, सबके घर की चोरी यही करता है।

यशोदा माँ द्वार खोलती है तो प्रभावती कहती हैः

"देखो, तुम्हारे लाल को लाई हूँ। यही चोरी करता है।"

यशोदाः "तू घूँघट के पट तो खोल, देख तो जरा, किसको पकड़कर लाई है ?"

प्रभावती देखती है तो उसका ही बेटा निकलता है।

यशोदा कहती हैः "चोरी तो तेरा बेटा करता है और नाम तू मेरे बेटे का लगाती है !"

तभी श्रीकृष्ण 'ऊँ.... ऊँ.... करके करके करवट बदलते हैं और कहते हैं- "माँ, मुझे सपने में प्रभावती दिखती है... बड़ी बड़ी आँखें दिखाकर डरा रही है।" फिर बाहर आकर पूछते हैं-

"माँ ! क्या है ? यह कौन है ?"

यशोदाः "बेटा ! यह प्रभावती है। अपने बेटे को लेकर आई है और कहती है कि तेरा कृष्ण ही चोरी करता है।"

श्रीकृष्णः "माँ ! चोरी तो रोज इसका बेटा ही करता है और नाम यह मेरा लेती है। देख, मैं तो घर में ही सोया हूँ।"

देखो, प्रभावती का बेटा ही चोरी करता है, श्रीकृष्ण कभी चोरी नहीं करते। प्रभावती यानि मति, अक्ल, होशियारीवाला मन ही संसारी पदार्थ चुराता है। आत्मारामी कभी कुछ नहीं चुराते क्योंकि सारा विश्व उनकी अपनी मिल्कियत होती है फिर भला वे कहाँ से और क्यों कर चुरायेंगे ?

श्रीकृष्ण स्वयं आत्मा हैं, ब्रह्म हैं। उन्हीं की तो सारी मिल्कियत है, तो तुम श्रीकृष्ण को चोर कैसे कह सकते हो ?

फिर भी एक बार माखनचोरी के आरोप में माँ यशोदा ने श्रीकृष्ण को ऊखल से बाँधने का प्रयास किया, तब योगमाया ने हस्तक्षेप किया। ज्यों यशोदा रस्सी बाँधे त्यों रस्सी दो अंगुल छोटी पड़ जाय।

ज्ञानवान को कभी कोई बंधन नहीं बाँध सकता तो तुम भला कैसे बाँध सकते हो ? कर्म तो सूक्ष्म होते हैं, वे बाँध नहीं सकते तो तुम श्रीकृष्ण को कैसे बाँध सकते हो ?

हाँ ! श्रीकृष्ण यदि स्वयं बँधना चाहे तो थोड़ी देर के लिए ओखली से बँध जाते हैं बाकी तो सब रस्सियाँ छोटी पड़ जाती हैं। रस्सी का दो अंगुल पड़ना इस बात का संकेत करता है कि जो बुद्धि से या दादागिरी से परब्रह्म चैतन्य को या आत्मा के आनंद को बाँधना चाहता है, वह दो कदम पीछे रह जाता है किन्तु यदि प्रेम और समर्पण से कोई बाँधना चाहे तो परब्रह्म परमात्मा वहाँ स्वयं बँध जाता है।

श्रीकृष्ण ने देखा कि माँ को दुःख होगा कि 'अरे ! मैं उसे बाँध न पाई।' अतः श्रीकृष्ण ने योगमाया को आदेश दियाः "तू बीच में क्यों पड़ती है ? मुझे बँध जाने दे।' .......और श्रीकृष्ण ऊखल से बँध गये।

यशोदा के चले जाने के बाद ऊखल को खींचते-खींचते श्रीकृष्ण वहाँ पहुँचे जहाँ नारदजी के श्राप से शापित दो वृक्ष खड़े थे। उन दो वृक्षों के बीच में से ऊखल को ले जाकर जोर से खींचने पर वृक्ष धड़ाम से गिर पड़े और उसमें से दो दिव्य पुरूष प्रगट होकर स्तुति करने लगेः

"हे सच्चिदानंदस्वरूप परमात्मा ! हम जब मोहवश क्रीड़ा कर रहे थे तब नारदजी जैसे महान ऋषि आये और हम उनका आदर सत्कार न कर सके। हमारे मद को, हमारे विकारों को दूर करने के लिए नारदजी ने श्राप दिया कि 'देवताओं के सौ वर्ष बीतें तब तुम्हें वृक्ष जैसी जड़ योनि में रहना पड़ेगा। उसके बाद भगवान अवतार लेंगे और तुम लोगों का उद्धार होगा।' हे भगवन् ! तब से हम आपकी ही प्रतीक्षा कर रहे थे। आपके स्पर्श से आज हम मुक्त हो गये हैं, हमारी सारी थकान मिट गई है।'

श्रीकृष्ण का ऊखल से बँधना भी कल्याणकारी हो गया। हालाँकि यह उनकी बाललीला का ही एक अंग था किन्तु उसमें भी शापग्रस्त देवताओं का उद्धार छुपा था।

इस तरह श्रीकृष्ण ने अनेक बाललीलायें कीं। वे एक सामान्य ग्वालबाल की तरह जंगल में गायें चराने जब जाते थे तब अपने बालसखाओं के साथ भी बालसुलभ क्रीडाएँ किया करते थे। उनके साथ गायें चराना, गायों की पूँछ पकड़कर दौड़ना, ग्वालबालों के साथ खेलना और यहाँ तक कि साथ-साथ मिलकर भोजन करना, भोजन में भी छीनाझपटी करना.... इस प्रकार सहज रूप से बाललीला करते हुए सबको श्रीकृष्ण आनंदित कर रहे थे।

श्रीकृष्ण की इन बालसुलभ लीलाओं व चेष्टाओं को देखकर एक बार ब्रह्माजी को भी संदेह हुआ कि ये साक्षात् परब्रह्म नारायण हैं कि क्या हैं ? कुछ पता नहीं चलता। श्रीकृष्ण ग्वालबालों जैसे सामान्य लोगों के साथ रहते हैं, खाते-पीते, चलते-घूमते और वन में विहार करते हैं, लकड़ी लेकर गायों के पीछे दौड़ते हैं, बछड़ों से प्रेम करते हैं। यदि भगवान हैं तो नजर मात्र से भी सबका कल्याण कर सकते हैं, फिर उन्हें यह सब करने की क्या जरूरत है ? ग्वालबालों के साथ जंगल में अपनी गायें चराने वाला गोपाल परात्पर ब्रह्म ! यह कैसे हो सकता है ?

जिस समय ब्रह्मा जी वहाँ आये, उस समय ग्वालबालों की नजर भोजन पर थी और बछड़ों की नजर हरी-हरी घास पर। ग्वालबाल भोजन की तैयारी कर रहे थे और बछड़े चरने के लिए श्रीकृष्ण से दूर निकल गये थे। ब्रह्माजी ने अपनी माया से बछड़े चुरा लिये और सोचा कि देखें, अब श्रीकृष्ण क्या करते हैं। आकर देखा तो श्रीकृष्ण ग्वालबालों के साथ खा रहे हैं। भोजन के समय कोई विधिविधान की मानो उन्हें आवश्यकता ही नहीं। सब एक-दूसरे का भोजन आपस में मिश्रित करके खा रहे हैं।

श्रीकृष्ण जब बछड़ों को देखने गये तो ब्रह्माजी ने ग्वालबालों को भी चुरा लिया। उनको अचेत करके छुपाकर ब्रह्माजी अपने लोक में चले गये। फिर श्रीकृष्ण ने अपने संकल्प मात्र से वैसे से वैसे ग्वालबाल एवं बछड़े बना दिये और एक वर्ष (ब्रह्माजी का एक सेकेंड) तक ग्वालबालों व बछड़ों के साथ लीला करते रहे।

जब ब्रह्माजी पुनः व्रज में आये तो देखा कि उनके छुपाये हुए ग्वालबाल व बछड़े तो अचेतावस्था में पड़े हैं लेकिन श्रीकृष्ण तो उन्हीं जैसे दूसरे ग्वालबाल व बछड़ों के साथ विनोद कर रहे हैं। यह देखकर ब्रह्माजी चकित हो गये व सोच में डूब गये कि ये ग्वालबोल सच्चे हैं या वे सच्चे हैं जिन्हें मैंने छुपाया है ?

उन्होंने आँखें बन्द कर ध्यान में देखा तो सामने मौजूद सभी ग्वालबालों व बछड़ों में श्रीकृष्ण को ही बैठा पाया। वे अपनी आँखों से भगवान के उन रूपों को देखने में असमर्थ हो गये, उनकी आँखें चौंधिया गई।

ब्रह्मजी ने श्रीकृष्ण की परीक्षा लेनी चाही थी लेकिन वे स्वयं ही उलझ गये। श्रीकृष्ण ने जब ब्रह्माजी की यह दशा देखी तब तुरन्त ही अपनी माया का पर्दा हटा लिया। ब्रह्माजी को श्रीकृष्ण में साक्षात् नारायणस्वरूप का दर्शन हुआ। उन्होंने अत्यधिक विनम्र भाव से भगवान की स्तुति की जो श्रीमद् भागवत के दसवें स्कंध के चौदहवें अध्याय में आती है।

श्रीकृष्ण की बाललीलाओं को देखकर सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को भी आश्चर्य हो गया क्योंकि श्रीकृष्ण जो भी करते हैं सहज रूप से करते हैं। बालकों के साथ बालकों की तरह सहज व्यवहार था। उसे देखकर ब्रह्माजी को संशय हुआ था जिसे श्रीकृष्ण ने दूर कर दिया। यह केवल उनके लिए ही सम्भव है क्योंकि वे परात्पर ब्रह्म हैं। उनकी बाललीलाएँ उनके लिए तो सहज हैं किन्तु हमारे लिए चमत्कारपूर्ण, ज्ञानयुक्त और मार्गदर्शक भी हैं।

स्वयं परात्पर ब्रह्म होते हुए भी उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि 'मैं भगवान हूँ।' यशोदा को त्रिभुवन के दर्शन करवा दिये, यमलार्जुन वृक्ष का ऊखलबन्धन के माध्यम से उद्धार कर दिया और सृष्टिकर्त्ता द्वारा गाय-बछड़े एवं ग्वालबाल चुरा लेने पर पुनः वैसे के वैसे नये ग्वालबाल और गाय बछड़े बना दिये फिर भी उनमें तनिक भी कर्त्तापन का भाव नहीं क्योंकि वे अकर्त्ता है, अभोक्ता हैं, पूर्ण हैं और ऐसा ही बनने का संदेश इन लीलाओं के माध्यम से हमें देते हैं।

यदि हम भी कार्यों को करते हुए भी स्वयं को कर्त्ता न मानें, भोगों को भोगते हुए भी भोक्ता न मानें और दुःख, रोग एवं कष्ट के समय में भी हम अपने को नित्य, शुद्ध एवं मुक्त मानें तो जो सच्चिदानंद, निर्गुण, निराकार परमात्मा ग्वालबालों के, गोपियों के, यशोदा एवं अन्य गोकुलवासियों के समक्ष प्रकट हुआ है, जो श्रीकृष्ण के अंतःकरण में प्रकट हुआ है वह सच्चिदानंदस्वरूप हमारे अंतःकरण में भी प्रकट हो सकता है।

अनुक्रम

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पूर्णपुरूषः श्रीकृष्ण

श्रीकृष्ण बालकों के साथ पूरे बालक, युवाओं के साथ पूरे युवक, गोपियों के बीच पूरे प्रेमस्वरूप, योगियों के बीच महायोगी, राजाओं के बीच महाराजा, राजनीतिज्ञों के बीच पूरे राजनीतिज्ञ, शत्रुओं के बीच काल के समान और मित्रों के बीच पूर्ण प्रेमस्वरूप, आनन्दस्वरूप हैं। वे अर्जुन के लिए वत्सल सखा है तो वसुदेव-देवकी के लिए आनन्दकारी हितकारी पुत्र हैं। श्रीकृष्ण गुरूओं के समक्ष पूरे शिष्य और शिष्यों के लिए पूरे गुरू हैं ऐसे श्रीकृष्ण को वन्दन......

कृष्णं वन्दे जगद् गुरूम्।

कंस को मारकर जब श्रीकृष्ण वसुदेव के पास गये तब वसुदेवजी ने कहाः "मैंने तुम्हारे लिये हनुमानजी की मनौती मानी थी।"

श्रीकृष्ण बोलते हैं- "हाँ..... जब मैं मल्लयुद्ध कर रहा था तब एक बड़ी-बड़ी पूँछवाला कोई पुरूष मुझे मदद कर रहा था.... क्या वे हनुमानजी थे ?"

वसुदेव जी कहते हैं- "हाँ, हाँ, बेटा ! वे हनुमान जी ही होंगे। उन्होंने ही तुम्हारी रक्षा की।"

वसुदेव जी बेटा मानते हैं तो श्रीकृष्ण भी उनके साथ पुत्रवत् व्यवहार ही करते हैं। रानियों के लिये, पत्नियों के लिये जो पूरे पति हैं और पुत्रों के लिए जो पूरे पिता हैं अर्थात् जहाँ भी देखो, जिसके साथ भी देखो, वे सच्चिदानंदघन आनंदकंद श्रीकृष्ण पूरे के पूरे हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण को पूर्णपुरूष कहा गया है।

शरीर विज्ञान एवं मनोविज्ञान के ज्ञाताओं का कहना है कि हर पुरूष में स्त्रीत्व छिपा होता है और हर स्त्री में पुरूषत्व छिपा होता है। किसी पुरूष में 70 प्रतिशत पुरूष का स्वभाव है तो 30 प्रतिशत स्त्री का, किसी स्त्री में 40 प्रतिशत पुरूषतत्त्व है तो 60 प्रतिशत स्त्रीतत्त्व, किसी में 50-50 प्रतिशत दोनों होता है।

यदि स्त्री में पुरूषतत्त्व अधिक हो जाता है तो वह स्त्री घर में पुरूष हो जाती है और पुरूष में पुरूषतत्त्व अधिक होता है तो वह स्त्री को अपनी आज्ञा में रखता है।

श्रीकृष्ण पूरे पुरूष हैं और राधा पूर्ण स्त्री हैं, रूक्मिणी पूरी स्त्री नहीं है। राधा में पुरूषतत्त्व नहीं है और श्रीकृष्ण में स्त्रीतत्त्व नहीं है, इसलिए श्रीकृष्ण यदि अकेले होते तो इतने नहीं चमकते क्योंकि प्रकृति और पुरूष का संयोग चाहिए।

आधी प्रकृति और आधा पुरूष हो उसमें भी आनंद नहीं है लेकिन पूरी प्रकृति और पूर पुरूष का जीवन देखना हो तो श्रीकृष्ण का जीवन है, इसलिए श्रीकृष्ण से पूर्व राधा का नाम लिया जाता है.... राधा-कृष्ण।

महावीर पूर्ण पुरूष भी नहीं हैं और पूर्ण स्त्री भी नहीं हैं। वे वर्षों तक तप करते रहे। यदि उनके आगे तुम बंसी या मोरपंख ले जाओ तो वे नाराज हो जाएँगे, बोलेंगे कि यह क्या पागलपन है ? लेकिन श्रीकृष्ण का जीवन इतना समग्र है कि बस ! बंसी लाओ तो वह भी बजा देंगे, शंख रखो तो उसमें भी फूँक मार देंगे और ढोलक रखो तो वह भी बजा लेंगे, मोरपंख दो तो वह भी मुकुट में लगा लेंगे ऐसा श्रीकृष्ण का समग्र जीवन है।

भगवद् गीता के छठवें अध्याय में योग की महिमा बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं-

तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।

कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन।।

'योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और सकाम कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ हैं, इसलिए हे अर्जुन ! तू योगी हो।'

(गीताः 6.46)

श्रीकृष्ण युद्ध के मैदान में अर्जुन को ऐसा उपदेश दे रहे हैं। वैसे तो उपदेश का नियम है कि जो श्रद्धालु हो, जिज्ञासु हो, वह नीचे बैठे, वक्ता का सिंहासन ऊँचा हो तब उपदेश दिया जाता है लेकिन श्रीकृष्ण का जीवन इतना अनुपम है कि श्रोता ऊपर बैठा है और वक्ता रथ हाँक रहा है। युद्ध के मैदान में गीता का ज्ञान दिया जा रहा है अर्थात् उनके लिए कोई नियम नहीं है। सब सर्वोत्तम है। वे  जो करते हैं वह भी सब उत्तम है क्योंकि उनको सदा अपना ही स्वरूप सामने प्रत्यक्ष होता है कि मैं ही अर्जुन होकर शोक कर रहा हूँ और श्रीकृष्ण होकर उपदेश दे रहा हूँ और यहाँ का ज्ञान वहाँ पहुँच जाये तो घाटा ही क्या है ! यही तो उनके जीवन की पूर्णता है।

सौराष्ट्र में एक जगह श्रीकृष्ण का मंदिर है उससे एक मील की दूरी पर रूक्मिणी का मंदिर है। श्रीकृष्ण के इर्द-गिर्द गोपियाँ हैं, राधा हैं लेकिन रूक्मिणीजी एक मील दूर है। क्यों....?  क्योंकि रूक्मिणी पूर्ण स्त्री नहीं है, उसमें पुरूष छिपा है जबकि श्रीकृष्ण पूर्ण पुरूष हैं और राधा पूर्ण स्त्री हैं। राधा का कोई आग्रह नहीं है, कोई जिद नहीं है। राधा ऐसी स्त्री हैं कि उनमें पुरूषतत्त्व एक प्रतिशत भी नहीं है। ऐसी पूर्ण शरणागति है राधा की.... इसलिए राधा का नाम पहले आता है, बाद में श्रीकृष्ण का।

प्रकृति अपनी महिमा में पूरी हो और पुरूष भी अपनी महिमा में पूरे हों तो वे राधा-कृष्ण जैसे हो जाते हैं। उस मंदिर में ऐसा दिखाया गया है कि श्रीकृष्ण गोपियों के साथ बंसी बजा रहे हैं और राधा साथ में हैं, जबकि रूक्मिणी  का मंदिर एक मील की दूरी पर है जिसमें प्रतिमा की आँखे तिरछी हैं, जो फरियाद करने का स्वरूप है।

श्रीकृष्ण बताते हैं कि जिसके जीवन में कुछ फरियाद है, कुछ आग्रह है, वह मुझसे मीलों दूर है और जिसके जीवन में न आग्रह है, न फरियाद है वह मेरे नृत्य में नृत्य हो जाता है, मेरे साथ एक हो जाता है।

एक बार गौएँ चराते-चराते श्रीकृष्ण के बालसखाओं को बड़ी जोरों की भूख लगी। तब श्रीकृष्ण ने कहाः "जाओ, यज्ञ करने वाले जो कर्मकाण्डी हैं उनके पास से भोजन ले आओ।"

सब ग्वालबाल गये और उनसे भोजन माँगा। वे कर्मकाण्डी अपने को शुद्ध मानते हैं और श्रीकृष्ण को मूर्ख मानते हैं। वे कहने लगेः "अरे ! गोपबालकों ! यज्ञ तो पूरा कर लेने दो !''

यदि जीव को देहाध्यास है तो श्रीकृष्ण कुछ माँग रहे हैं फिर भी उन्हें कुछ देगा नहीं लेकिन स्वाहा... स्वाहा... करके आहूतियाँ डालेगा। स्वाहा-स्वाहा करके भी तुम क्या चाहते हो ? ...स्वर्ग। और स्वर्ग से क्या चाहते हो.....? थोड़ा सा सुख।

अरे ! सुख का सागर तुम्हारे पास उमड़ रहा है भैया.....!

श्रीकृष्ण के लिए उन्होंने भोजन नहीं दिया। श्रीकृष्ण ने कहाः "ये आधे पुरूष हैं। जाओ, गोपियाँ पूर्ण स्त्री हैं। उनके पास जाओ, वे भोजन दे देंगी।"

स्त्री का हृदय जरा नरम होता है। उन गोपियों ने, ब्राह्मण-पत्नियों ने ग्वालों को भोजन दे दिया।

श्रीकृष्ण सुख के लिए कुछ नहीं चाहते क्योंकि श्रीकृष्ण का जीवन पूर्ण विकसित जीवन है, मुस्कान का जीवन है। वे स्वयं में पूर्ण हैं।

श्रीकृष्ण की गीता पर असंख्य टीकाएँ हुई हैं। तिलक ने कर्मवाद ढूँढ लिया। गाँधी ने अहिसा परमो धर्मः ढूँढ लिया। शंकराचार्य ने अद्वैत, रामानुज ने भक्तिमार्ग, योद्धाओं ने युद्ध करने का कर्त्तव्य और सांख्यवादियों ने दर्शन ढूँढ लिया।

अर्थात् जिस जिसने जैसे चश्मे से देखा, श्रीकृष्ण की गीता में उसे वैसा ही मिल गया। जिसने नजर से जहाँ देखा, वहाँ श्रीकृष्ण पूर्ण ही दिखे क्योंकि श्रीकृष्ण सर्वत्र स्वयं में पूर्ण हैं फिर तुम जिस नजर से देखो। योद्धाओं में देखो तो श्रीकृष्ण के समान कोई योद्धा नहीं। राजनीति में देखना हो तो श्रीकृष्ण जैसा राजनीतिज्ञ नहीं और राजा के रूप में भी देखो तो श्रीकृष्ण पूर्ण हैं।

समाज के नैतिक मूल्य और सामाजिक जीवन के उत्थान के साथ-साथ बौद्धिक व आध्यात्मिक विकास करवाना, यह श्रीकृष्ण का कार्य कर रहा है।

यदि उनके किसी व्यवहार में समाज ने फरियाद की है तो एक बात में की हैः "जब श्रीकृष्ण कंस मामा को स्वधाम पहुँचाकर मथुरा में रहने लगे तब पड़ोसी राजा उत्पात करने लगे क्योंकि वे सब कंस के ही आदमी थे। मथुरा की जनता ने श्रीकृष्ण से निवेदन किया कि जब से आप मथुरा आये हैं, यहाँ की जनता को बहुत सहन करना पड़ रहा है।

जिस नगर में, जिस राज्य में झगड़े होते रहते हैं, वहाँ की प्रजा को सहन करना ही पड़ता है। श्रीकृष्ण जब इससे अवगत हुए तो उन्होंने जाना कि कंस का विनाश करने से और राजाओं ने वैरभाव मोल ले लिया है, इसलिए आपत्ति आ रही है। अतः श्रीकृष्ण समाज के हित का ख्याल रखते हुए मथुरा छोड़कर अज्ञातवास में चले गये।

अज्ञातवास में भी श्रीकृष्ण और बलराम चुप नहीं बैठे। वहाँ श्रीकृष्ण ने सुदर्शन चक्र एवं बलराम ने हल की रचना की। वह भी अपने लिये नहीं वरन् जिन्होंने कहा कि 'श्रीकृष्ण आये तब से हमारे ऊपर आपत्तियाँ आईं।' उन्हीं की सेवा व कल्याण के लिए सुदर्शन की रचना की। श्रीकृष्ण की कितनी उदारता है ! कितनी करूणा है ! कितनी समता है और कितना रचनात्मक जीवन है !

श्रीकृष्ण कभी आलसी या प्रमादी होकर नहीं बैठे हैं। कर्म तो कर रहे हैं लेकिन कर्त्तृत्व की आसक्ति नहीं है। फल भोग रहे हैं लेकिन भोक्तृत्व का भाव नहीं है। ऐसा भी नहीं कि आलोचनाएँ सुनकर त्यागपत्र दे दिया। नहीं। वे स्वयं में पूर्ण हैं।

राजाओं से युद्ध करना पड़ रहा है तो कर रहे हैं और रण छोड़कर भागने का मौका मिला तो भाग रहे हैं। यह नहीं सोचते कि लोग मुझे कायर कहेंगे। नहीं... ऋषि का वरदान फलित करने के लिए भाग रहे हैं। कितनी समता है !

श्रीकृष्ण राजनीति में भी पूरे हैं। उनमें अपने सुख के लिए राजनीति का कपट न था अपितु धर्म की स्थापना, अधर्म का विनाश, आसुरी वृत्तियों के दमन तथा सात्त्विक वृत्ति का सृजन करने के लिए, प्रजा के पालन के लिए तथा आसुरी वृत्तिवालों को भी अपने धाम में ले जाने के लिए श्रीकृष्ण उसका उपयोग करते थे।

श्रीकृष्ण के जीवन में सर्वोच्च एवं प्रमुख विशेषता यह है कि  प्रत्येक परिस्थिति में अपने स्व के छन्द में मस्त रहते थे। ऐसा नहीं कि श्रीकृष्ण आये और उनको मिसरी ही खाने को मिली, पूतना जहर लेकर भी तो आयी थी ! ऐसा नहीं कि उनके जीवन में चारों तरफ सफलताएँ ही थी और ऐसा भी नहीं कि श्रीकृष्ण सबके लिये मधुर-मधुर ही बोलते थे। वे डाँटते इस तरह थे मानो तलवार की तीक्ष्ण धार।

जब भगवान श्रीकृष्ण दुर्योधन के यहाँ संधिदूत बनकर गये तो दुर्योधन ने आमंत्रण दिया कि आप हमारे यहाँ भोजन कीजिये।

श्रीकृष्ण कहते हैं- "दुर्योधन ! तुम्हारे यहाँ मैं भोजन क्यों करूँ ? तुझे पता नहीं कि भोजन दो कारण से लिया जाता है। पहला तो जहाँ प्रीति होती है, वहाँ लिया जाता है। तुम्हारा मेरे प्रति प्रेम नहीं और मेरा तुम्हारे प्रति प्रेम नहीं, फिर मैं तुम्हारे घर में भोजन कैसे कर सकता हूँ ? दूसरा, किसी के यहाँ भोजन उस व्यक्ति को करना पड़ता है जो अन्न में महंगा हो तो मैं अन्न में महँगा भी नहीं। अन्न तो मुझे कहीं भी मिल जायेगा।

इतना स्पष्ट कहने में भी श्रीकृष्ण पूर्ण समर्थ थे और थोड़ी सी छाछ के लिए नाचने को भी पूर्ण तैयार थे। कूटनीतिज्ञ कहते हैं कि श्रीकृष्ण बड़े कूटनीतिज्ञ थे। अरे, श्रीकृष्ण का जीवन ऐसा समग्र है कि जो कुछ उनमें देखना चाहो, वह सब मिल जायेगा क्योंकि वे जो भी करते हैं, वह पूर्ण ही होता है। विनोद भी करेंगे तो पूरा करेंगे, रास्ता भी बतायेंगे तो पूरा बतायेंगे, भाग भी जायेंगे तो पूरे भाग जायेंगे, नाचेंगे तब भी पूरे नाचेंगे।

महाभारत के युद्ध के आरंभ के युद्धक्षेत्र में अलग-अलग योद्धाओं ने अलग-अलग शंख बजाये। किसी ने कुछ बजाया तो किसी ने कुछ। श्रीकृष्ण ने पंचजन्य नामक शंख बजाया। पाँचजन्य का बजाना इस बात का द्योतक है कि हमारी जो पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं उनमें प्राण फूँकता हूँ अर्थात् मैं पूरे का पूरा यहीं हूँ। दूसरे जो योद्धा थे उनमें से किसी का एक हिस्सा युद्धभूमि में था अर्थात् किसी की एक इन्द्रिय, किसी की दो और किसी की तीन इन्द्रियाँ वहाँ पर थीं लेकिन श्रीकृष्ण जहाँ होते हैं वहाँ उनकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों के साथ पूर्ण होते हैं अर्थात् श्रीकृष्ण जहाँ भी होते हैं पूरे होते हैं, जबकि हम बँटे हुए होते हैं।

हम जब सत्संग में होते हैं, तब कहीं और भी होते हैं। दुकान पर होते हैं तो थोड़े घर भी होते हैं और घर पर होते हैं तो थोड़े बाजार में भी होते हैं। बाजार में होते हैं तो थोड़े परिवार में भी होते हैं। परिवार में होते हैं तो थोड़े धर्म में भी होते हैं लेकिन श्रीकृष्ण जैसे व्यक्ति जहाँ भी होते हैं, पूर्ण ही होते हैं।

चीरहरण-लीला बताती है कि चीरहरण करके श्रीकृष्ण वृक्ष पर बैठ गये हैं और बंसी बजा रहे हैं। लोग क्या कहेंगे ? कुछ नहीं। विनोद में भी पूरे। पूरा वही हो सकता है जिसका जीवन विकारी नहीं। जिसके जीवन में सहजता है वह तो पूर्ण ही है।

कई लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने ऐसा किया, वैसा किया, चीरहरण-लीला की। वास्तव में चीरहरण लीला का आध्यात्मिक अर्थ तो यही है कि जब तक तुम अपने अहंकाररूपी वस्त्र को, देहाध्यासरूपी वस्त्र को अर्पित नहीं कर देते तब तक तुम मेरा नाद भी नहीं सुन सकते। यदि अपना अहंकाररूपी वस्त्र श्रीकृष्ण को दे दोगे तो फिर तत्त्वमसि का संगीत सुनने के भी अधिकारी हो जाओगे।

श्रीकृष्ण के जीवन में न पुकार है न आवाज है। श्रीकृष्ण के जीवन में केवल प्रसन्नता है। श्रीकृष्ण नाचते हैं तो पूरे नाचते हैं, हँसते हैं तो पूरे हँसते हैं। हम लोग हँसते हैं तो थोड़ा इज्जत-आबरू का, अड़ोस-पड़ोस का ख्याल रखकर हँसते हैं। आप हँसोगे तो इधर-उधर देखकर हँसोगे फिर भी पूरे नहीं हँसोगे। रोओगे तब भी पूरे नहीं रोओगे, नाचोगे तो भी पूरे नहीं नाचोगे किन्तु श्रीकृष्ण जिस समय जो करते हैं, पूरा करते हैं। खाते हैं तो पूरा, डाँटते हैं तो पूरा, नाचते हैं तो पूरा। इस अवतार ने, आदिनारायण ने हमारे जीवन को पूर्णता की ओर ले जाने के लिए ही सारी लीलाएँ की हैं।

साधुओं को, सज्जनों को पूर्ण जीवन व्यतीत करने की ओर ले जाने के लिए तथा जो दुर्जन हैं उनका मार्ग बदलने के लिये जो अनादि ब्रह्म का अवतरण हुआ है, उसका नाम है अवतार, फिर चाहे उसे श्रीराम कह दो या श्रीकृष्ण कह दो, मर्जी तुम्हारी है।

श्रीकृष्ण का जीवन नितांत सहज जीवन है। साधारण आदमी जो कुछ करता है, कुछ पाने के लिए या कुछ हटाने के लिए करता है लेकिन श्रीकृष्ण न पाने के लिए करते हैं, न हटाने के लिए, अपितु जो भी करते हैं, उसमें से पूर्णता की खबरें स्वतः ही प्रस्फुटित होती हैं। इसीलिए श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहा गया है।

अनुक्रम

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प्रेमस्वरूप श्रीकृष्ण

अहंकार के सिर पर द्वेष होता है, धारणाएँ होती हैं, मान्यताएँ होती हैं, बाह्य आडम्बर होता है लेकिन प्रेम तो एकदम आवरणरहित होता है। प्रेम के पास कोई पकड़ नहीं होती, कोई वासना नहीं होती, आडम्बर नहीं होता। प्रेम के पास बस, मुस्कान है, बलिहारी है, अहोभाव है, धन्यवाद है।

श्रीकृष्ण के भक्तों को देखोगे तो नाचते मिलेंगे, गाते मिलेंगे, गुनगुनाते मिलेंगे फिर चाहे चैतन्य महाप्रभु हों, नरसिंह मेहता हों या मीरा बाई हों।

चैतन्य महाप्रभु जब पूर्वाश्रम में निभाई पंडित थे तब शास्त्रार्थ में बड़े-बड़े विद्वानों को भी परास्त कर देते थे। तर्क में उनका कोई सामना नहीं कर सकता था। उन्होंने देखा कि तर्क से लोगों को परास्त करने में अहंकार को तो थोड़ा पोषण मिलता है परंतु गंभीर शांति नहीं है, आनंद नहीं आता।

प्रेम के सिवाय आनन्द कहाँ है ? निर्दोषता के सिवाय आनन्द कहाँ है ? एक छोटा सा बालक निर्दोषता से नाचता है, तोतली भाषा बोलता है तो अपने माता-पिता की थकान उतार देता है क्योंकि बालक इस समय निरहंकारी है, निर्वासनिक है इसलिए बालक की मुस्कान से उसके माता-पिता दोनों प्रसन्न हो जाते हैं। श्रीकृष्ण जब तक जिये छोटे होकर ही जिये, बालक होकर जिये।

जीवन जीने के दो ढंग हैं- एक तो एकदम छोटे होकर जियें, इतने छोटे होकर कि जैसे बालक जीता है। या फिर एकदम बड़े होकर जियें.... इतने बड़े हो जाओ कि तुम्हारे अतिरिक्त और कुछ बचे ही नहीं। स्वयं को इतना फैला दो, इतना व्यापक कर दो कि केवल तुम ही तुम रहो।

श्रीकृष्ण प्रेमस्वरूप हैं। अक्रूर जी जब श्रीकृष्ण को लिवाने बृज जाते हैं तब सोचते हैं कि श्रीकृष्ण मुझे देखकर कही अन्तर्धान न हो जावें, क्योंकि मेरे कर्म ऐसे हैं कि श्रीकृष्ण मुझे मिलेंगे ही नहीं। ऐसा सोचते-सोचते अक्रूर जी निराश होते हैं, हताश होते हैं लेकिन जब श्रीकृष्ण की कृपा की ओर, सहजता की ओर, सरलता की ओर तथा प्रेम के विषय में सोचते हैं तो अक्रूर जी में हिम्मत आती है। उनका रथ जब बृज के करीब पहुँचता है तो अक्रूर जी को श्रीकृष्ण के पदचिह्न दिखाई पड़ते हैं। वे रथ से उतर कर चरणरज को अपने शरीर पर मलते हैं। फिर कहीं पदचिह्न दिखते हैं तो उस पदधूलि से अपने मन को, तन को ललाट को पावन करते हैं।

अक्रूर जी जब स्वयं की ओर देखते हैं तो निराश हो जाते हैं, ऐसे ही जीव भी जब अपने कर्मों की ओर देखेगा तो निराश हो जायगा, अपनी नादानी की ओर देखेगा तो निराश हो जायेगा लेकिन जब अपने स्वरूप की ओर, अपनी आत्मा की ओर देखेगा, श्रीकृष्ण के प्रेम की ओर देखेगा तो उसमें हिम्मत आ जायेगी।

गोपियाँ जब बंसी का नाद सुनती थीं तो उसकी ध्वनि में कौन-सा शब्द और कौन सा अर्थ है उसकी चिन्ता नहीं करती थी। बस, ध्वनि किसकी है ? मेरे कन्हैया की है। वह पूर्ण पुरूष हैं कि अपूर्ण... वह बृजराज का पुत्र है कि साधारण मनुष्य का..... वह अन्तर्यामी है कि एक साधारण ग्वाल है..... गोपियों ने यह कभी नहीं सोचा। गोपियाँ तो बस, प्रेम करती थीं और प्रेम के आगे कोई नेम (नियम) नहीं होता, प्रेम के आगे कोई फरियाद नहीं होती, प्रेम के आगे कोई आडंबर नहीं होता।

प्रेम एक ईमानदारी है, एक सच्चाई है। चैतन्य को जब प्रेम उमड़ता है तो कभी नाचने लग जाते, कभी चुप हो जाते। मीरा को जब प्रेम उमड़ता को कभी प्यारे के लिए नाचती, कभी उसका चित्र देखकर हँसती तो कभी उसी के विरह में रोती थी।

प्रेम ईमानदारी सिखाता है जबकि स्वार्थ बेईमानी सिखाता। प्रेम सहजता और सरलता सिखाता है जबकि स्वार्थ कपट और कुटिलता सिखाता है।

आज का मनुष्य बाहर से चतुर व भीतर से बेईमान बन गया है। वह न ईमानदारी से रो सकता है न हँस सकता है, न नाच सकता है न कह सकता है और न ही ईमानदारी से सुन सकता है।

तुम प्रार्थना करना कि हे भगवान ! हमें आज जन्माष्टमी के दिन निर्दोषता सिखा दो। हँसना आये तो हम भरपेट हँस लें, रोना आये तो हम से लें, तेरे लिये नाचने का मन हो तो हम नाच लें। गीत गाना आय तो गा लें किन्तु हे ईश्वर ! बस, हम न बचें। हमारी  सामाजिक मान्यताएँ हैं, धारणाएँ हैं, वे न बचें। हे विश्वेश्वर....! हे गोवर्धनधारी......! हे गोपाल....! हे नंदनंदन.....! हे भक्तवत्सल....! हे गिरधारी......! हे मुरलीधर......! हे गोविन्द.....! हे कन्हैया.....! बस तू इतनी कृपा करना कि हम न बचें, तू ही रह जाय। कृष्ण कन्हैया.... बंसी बजैया.... वृन्दावन की कुँज गलिन में..... साधक की गलियों में.... ठुमक-ठुम्मक रास रचैया.....

वह अभी भी, इस समय, यहाँ भी है। वह तुम्हारी भक्ति, तुम्हारे प्रेम, तुम्हारी विवशता को भी देख रहा है। वह अन्तर्यामी-रूप से सदा तुम्हारे साथ है। शर्त यही है कि तुम भीतर डूबते जाओ....

तुम जितना भीतर डूबोगे, प्रेम करोगे, निर्दोष बनोगे, पुकार करोगे उतने ही बाहर के लोगों की नजर में तुम पागल दिखोगे, किन्तु भीतर तुम सचमुच 'गल' को पा रहे होगे।

अक्रूरजी के नेत्रों से आँसू बह रहे थे, हृदय से भाव बह रहा था। भक्त जहाँ भगवान के भाव में दो आँसू गिरा देता है, वह जगह भी पावन हो जाती है। वहाँ का वातावरण भी रिद्धि-सिद्धि से पूर्ण हो जाता है।

अक्रूर जी भगवान श्रीकृष्ण से मिले। भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गले लगाया, स्नानादि करवाया, वस्त्र पहनवाये तथा कुशलक्षेम पूछकर यथायोग्य आतिथ्य-सत्कार किया। उन्हें कंस का कोई भय नहीं था। जिसके जीवन में कोई पकड़ नहीं, उसको शत्रु का भय कैसे हो सकता है ? अक्रूर जी ने श्रीकृष्ण को षडयंत्र की सारी व्यवस्था बता दी।

कंस के आमंत्रण पर श्रीकृष्ण जा रहे हैं। कंस ने महल के अतिथिनिवास में उनके लिए व्यवस्था की लेकिन श्रीकृष्ण कहते हैं कि मेरे माँ-बाप जेल में पड़े हैं और मै महल का अतिथि बनूँ ? यह नहीं हो सकता। हम तो जंगल के रहवासी, जंगल में गौएँ चराने वाले, हमें तो किसी जंगल अथवा बगीचे में रहने की व्यवस्था करवा दो।

श्रीकृष्ण ने तीन दिन बगीचे में निवास किया। महल में रहने पर खुलकर बात नहीं हो सकती, निर्दोष प्रेम भी नहीं बँट सकता था बाँटा भी नहीं जा सकता। जैसे तुम किसी के बंगले में जाकर रहते हो तो अपने ही परिवार के सदस्य या किसी मित्र से खुलकर बात भी नहीं कर सकते। स्थान का भी अपना नियम होता है, स्वभाव होता है।

श्रीकृष्ण ने तीन दिन में लोगों को इतना तैयार कर दिया कि जिस सम्राट को मारा उसके अंगरक्षक आँख तक न उठा सके, इतना उन्हें अपना बना लिया। प्राणी मात्र प्रेम चाहता है और प्रेम तो श्रीकृष्ण के रोम रोम से टपकता है इसलिए तो शत्रु तक उनके मित्र बन गये फिर भक्तों की तो बात ही क्या है ?

एक बार श्रीकृष्ण के शरीर पर फफोले पड़ गये और शरीर में पीड़ा होने लगी। पटरानियाँ घबरा गईं। उद्धव के आँसू रूकते नहीं हैं। फफोले पड़े कैसे ? उसका कारण भी रहस्य युक्त था। प्रभास क्षेत्र में समुद्र के किनारे किसी ग्रहण के समय पटरानियाँ स्नान करने को आईं। भारत में ऐसी प्रथा है कि जब सूर्य ग्रहण एवं चंद्रग्रहण उतरते हैं नदी से संगमस्थान के स्नान से भी समुद्रस्नान का फल अधिक माना जाता है।

सागर तट पर एक हिस्से में ग्वालबाल एवं अन्य लोग स्नान कर रहे थे एवं दूसरे एकांत हिस्से में पटरानियाँ स्नान कर रही थीं। रानियों ने देखा कि उन ग्वालबालों एवं गोपियों के बीच एक महातेजस्वी नारी पटरानी जैसी चमक रही है। उन्हें आश्चर्य हुआ कि वे कौन होंगी ?

उन्होंने सोचाः 'चलो, जरा देखें।' जाकर उन्होंने कहाः "आप हमारे साथ आओ, हमारे साथ नहाओ।"

तब वह परम तेजस्वी देवी कहती हैः "नहीं, हमें वहाँ आने का अधिकार नहीं है। वे मुझे जिस जगह पर छोड़कर गये हैं मेरा स्थान वहीं होना चाहिए।" इतना कहते-कहते उसकी आँखे भर आईं।

तब उन रानियों ने कहाः "तुम्हारा स्वागत करने के लिए और तो क्या दें तुम्हें ? हम दूध का प्याला तुम्हें देते हैं, इसे अस्वीकार मत करना।"

वह तेजस्वी महिला कहती हैः "मैंने आभूषण और कीमती वस्त्र धारण करना छोड़ दिया है। मक्खन और मिश्री ग्रहण करना भी छोड़ दिया है। अब आप लोग बोलते हो तो दूध पी लेती हूँ किन्तु हे मेरे कृष्ण ! दुबारा ऐसा आग्रह का दिन मत लाना।"

श्रीकृष्ण की याद में उसकी आँखों से आँसू टपक पड़े और मुख से आह निकल पड़ी जिसके कारण दूध में विशेष गर्मी आई। वह दूध उसके पेट में गया, और फफोले श्रीकृष्ण को पड़ गये।

श्रीकृष्ण कहते हैं- "हे उद्धव ! वह कोई साधारण रानी नहीं थी अपितु रानियो की रानी, महारानी राधा थी। राधा ने 'आह' करके दूध पिया था। उसके विरह की तपन ने मेरे शरीर को तपाया है जिसके कारण मेरे शरीर पर फफोले पड़ गये हैं।

उद्धव पूछते हैं- "प्रभु ! किस वैद्य को बुलायें ? कौन-सा इलाज करवायें ? आप इतने छटपटा रहे है अतः आप ही बताइये कि इसका क्या इलाज है ?"

श्रीकृष्णः "मेरे दर्द की दवा वैद्यों के पास नहीं है। इसका एकमात्र इलाज यह है कि उद्धव ! तुम राधा के पास जाओ और उसके आँसू रूकवाओ। उसे आश्वासन देकर आओ और जिस पल्लू से वह अपने आँसू पोंछ रही हैं वह पल्लू (साड़ी का पल्ला) ले आना। आँसूओं से भीगा हुआ वह पल्लू इन फफोलों पर लगाओगे तभी ये मिट सकते है, वरना नहीं मिट सकते।"

देखो.....! प्रेम के बदले में श्रीकृष्ण कैसा प्रेम देते है। श्रीकृष्ण की आठ पटरानियाँ थीं जो सदा उनके साथ रहती थीं लेकिन उनमें से किसी का भी नाम श्रीकृष्ण के साथ नहीं आता परन्तु भीतर से जो साथ में थी उस राधा का नाम आता है। राधाकृष्ण....

'सत्यभामा-कृष्ण, रूक्मिणी कृष्ण, जामवंती-कृष्ण आदि नहीं बोला जाता है जबकि 'राधा-कृष्ण' का नाम बड़े प्यार के साथ लिया जाता है।

'राधा' को उलट दो तो 'धारा' बन जाता है। धारा अर्थात् वृत्ति। चैतन्य से जो वृत्ति निकलती है वह यदि संसार की ओर जाती है तो तुच्छ हो जाती है किन्तु वही वृत्ति चैतन्य से निकलकर चैतन्य को ही याद करती है तो चैतन्य भी उसकी याद में ऐसा हो जाता है।

वह 'राधा' तुम्हारे पास भी है और 'श्रीकृष्ण' भी तुम्हारे पास ही हैं। सच पूछो तो तुम नहीं हो, राधाकृष्ण ही हैं। चैतन्य और चैतन्य की सुरता ही है लेकिन हमारा अहंकार बोलता है कि 'मैं हूँ' इसलिए 'राधाकृष्ण' छुपे हुए हैं। छुपे हुए राधाकृष्ण को जीवन में प्रगट करने का यही अवसर है।

जप से, कीर्तन से, ध्यान से मनुष्य में जो सुषुप्त शक्तियाँ हैं वे जागृत होती है। ग्वाल-गोपियों के बीच छुपी हुई  जो 'राधा' है अर्थात् जीवन में अनेक वृत्तियों के बीच छुपी हुई जो धारा है, ब्रह्माकार वृत्ति है, वह प्रगट हो सकती है। बस शर्त इतनी ही है कि तुम उससे प्रेम करो और वह तो प्रेमस्वरूप है ही। तुम्हारी पुकार सुनकर वह अवश्य ही प्रगट हो जायेगा.... बस, जरा अन्तरात्मा से पुकारना सीख लो भैया....!

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पूतना-प्रसंग

भक्त जब भाव में होते हैं, प्रेम में होते हैं तो आनंद होता है और जब भाव एवं प्रेम में कमी होती है तो भक्त विषयों में गिर पड़ता है। इसी बात को समझाने के लिए भागवत में पूतना प्रसंग आता है।

जन्माष्टमी के दिन श्रीकृष्ण का जन्म होता है और छः दिन बाद चतुर्दशी को पूतना गोकुल पहुँचती है। पूतना के कई अर्थ लगाये गये है- 'पू' अर्थात् 'पवित्र''तना' अर्थात् नहीं। यानि जो पवित्र नहीं है उसका नाम है पूतना। उसे काम का भी रूप बताया गया है। भक्त के अन्दर का आनन्द जब नष्ट हुआ अर्थात् नंदबाबा गोकुल छोड़कर मथुरा गये तो गोकुल में अपशकुन होने लगे और पूतना गोकुल में पहुँच गयी।

नंद के आगे '' रख दो तो वह आनंद हो जायेगा। आनंद गोकुल (गो-यानि इन्द्रियाँ और कुल यानी समूह) छोड़कर जाता है। तुम्हारा शरीर इन्द्रियों का समूह है। तुम्हारे भीतर से अर्थात् गोकुल से आनंद जब दूसरी जगह चला जाता है तो तुम्हारे अन्दर पूतना अर्थात् अपवित्रता आ जाती है, विकार आ जाते हैं। आनंद जब भीतर रहता है तो विकार जोर नहीं पकड़ते हैं और जब आनन्द खत्म हो जाता है तब विकार जोर पकड़ते है तथा अपशकुन हो जाता है।

योगियों का कहना है कि तुम आत्मानंद में मस्त होने का अभ्यास करोगे तो तुम्हारे पास पूतना नहीं आयेगी। ऐसा आहार न करो जिससे तमोगुण बढ़ जाये। ऐसा व्यवहार न करो जिससे रजोगुण बढ़ जाये। ऐसे वातावरण में न जिओ जिससे तुम्हारे मन की शांति और आनंद नष्ट हो जायें। आप प्रातः काल उठो, स्नान करके प्राणायाम करो।

स्नान से शरीर शुद्ध होता है। प्राणायाम से अंतःकरण शुद्ध होता है। प्राणायाम करने के बाद थोड़ा ध्यान करोगे तो तुम्हारा आनन्द बना रहेगा। जैसे गोकुल में नंदबाबा के रहने पर पूतना नहीं आ सकती, वैसे ही इन्द्रियों के समूह रूपी गोकुल (शरीर) में यदि सदा आनंद रहेगा तो वासनारूपी पूतना नहीं आ सकती। वासनारूपी पूतना से बचने के लिए तुम्हारे चित्त को सदा साक्षी भाव से देखते रहो।

जब भी वासना उठे तब तुम उसके दृष्टा हो जाओ क्योंकि जब वासना को बुद्धि सहयोग देती है तब वासना क्रियाशील होती है। वासना को यदि बुद्धि सहयोग न दे तो वासना में क्रिया करने की शक्ति नहीं है। जब किसी कार्य को करने के लिए बुद्धि सहयोग दे देती है तब आपका शरीर, आपकी इन्द्रियाँ और आपका मन उस कार्य को करने में लग जाते हैं।

जब आपका कोई संकल्प होता है तब तुरन्त ही विकल्प भी उठता है। आपका अच्छा संकल्प बुरे संकल्प को काटता है तो आप सफल हो जाते हैं। बुरी वासना को अच्छी वासना द्वारा काट डालना चाहिए। जब बुरी वासना को अच्छी वासना काट नहीं पाती तब मनुष्यरूपी शिशु उस बुरी वासनारूपी पूतना के हाथों मारा जाता है लेकिन यदि हम अपनी बुद्धि के, मन के तथा कर्म के दृष्टा बन जाएँ तो पूतना रूपी वासना के फंदे से अवश्य बच सकते हैं।

पूतना शिशुओं को मार डालती थी अर्थात् जो समझ मे, ज्ञान में, सयंम में शिशु हैं, बालक हैं, उन्हें पूतना मार देती है लेकिन जो श्रीकृष्ण जैसे कुशाग्रबुद्धि हैं उन्हें पूतना मार नहीं पातीं अपितु स्वयं उनके हाथों मर जाती है।

पूतना जब गोकुल आती है तो एक बड़े घराने की स्त्री का रूप लेकर आती है। उस समय श्रीकृष्ण झूले में झूल रहे थे। पूतना यशोदा से पूछती हैः "मैं तुम्हारे बेटे को जरा ले लूँ ?"

यशोदा कहती हैः "ले लो।"

जब पूतना लेने जाती है तो श्रीकृष्ण मुख घुमा देते हैं, करवट बदल देते हैं। यदि वह बायें जाती है तो श्रीकृष्ण दाँयें हो जाते हैं और दाँये जाती है तो बाँये हो जाते हैं। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने छः बार करवट बदली।

अलग-अलग भक्ति के आचार्य करवट बदलने के अलग-अलग अर्थ लगाते हैं। कोई कहता है कि श्रीकृष्ण ने करवट यह सोचकर बदली होगी किः 'अरे ! मैं तो गोकुल में आया था मक्खन-मिश्री खाने और भक्तों को आनंदित करने के लिए। उन्हें तो अभी मैंने पूरा आनंद दिया नहीं, उनके साथ अभी खेला ही नहीं, इसके पहले ही इस राक्षसी के साथ खेलना पड़ता है। अभी तो मैं नन्हा-मुन्ना हूँ और इस मौसी के साथ अभी-अभी मुलाकात....? मैं आया तो था मक्खन-मिश्री खाने और यह वासनारूपी पूतना जहर ले आई।'

वासना भी तो जहर के समान होती है, इसलिए श्रीकृष्ण ने करवट ली।

कुछ लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण ने करवट यह सोचकर ली थी किः 'जो मुक्ति यशोदा को, नंदबाबा को, देवकी को वसुदेव को दूँगा, वही मुक्ति इसे भी देनी पड़ेगी क्योंकि इसका स्पर्श कर लिया है।'

'मक्खन मिश्री खिलाने वाले को भी मुक्ति और जहर पिलाने वाले को भी मुक्ति। देखो मेरी क्या माया है....!' अपनी माया को निहार कर श्रीकृष्ण करवट बदल रहे हैं।

कुछ लोगों की ऐसी धारणा है कि श्रीकृष्ण ने यह सोचकर करवट बदली किः 'यह सारा संसार मिथ्या है, करवटें ले रहा है। अब मैं भी इस मिथ्या जगत में मिथ्या आकृति लेकर आया हूँ तथा यह मिथ्या पूतना मेरी ओर आई है इसलिए इसमें एक मिथ्या घुमावा और भी डाल दो ताकि जगत को बताऊँ कि मैं भी घूम रहा हूँ और यह भी घूम रही है। जो भी दिख रहा है, सब घूम रहा है।'

तत्त्वज्ञानियों के लिए यह एक इशारा है, संकेत है।

खून पसीना बहाता जा या तान के चादर सोता जा।

यह नाव तो चलती जायगी, तू हँसता जा या रोता जा।।

जब सब घूम रहा है, सब चल रहा है तो तुम्हारा दुःख कैसे अचल रहेगा ? तुम्हारा शत्रु कैसे अचल रहेगा ? तुम्हें जहर पिलाने वाला भी कैसे अचल रह सकता है ? यह भी अब चलने को है, इस शरीर से अलविदा होने को है, इसलिए श्रीकृष्ण ने करवट घुमाई होगी।

श्रीकृष्ण का जीवन ऐसा समग्र है कि आप जो भी चाहो, अर्थ लगा सकते हो और वह संभावित हो सकता है।

छः बार करवट बदलने के बाद आखिर श्रीकृष्ण पूतना की गोद में गये और उसने अपना दूध पिलाना चालू किया। वासना बाहर से तो सुन्दर दिखती है किन्तु भीतर से कुरूप होती है। पूतना भी भीतर से कुरूप और बाहर से सुन्दरी होकर आई थी। ऊपर-ऊपर से दूध दिख रहा था और भीतर जहर भरा था।

वासना में भी ऊपर से दूध अर्थात् सुख दिखता है किन्तु भीतर तो केवल दुःख ही भरा होता है। स्पष्ट है कि श्रीकृष्ण की लीला में कदम-कदम पर तत्त्वज्ञान लेने वालों को तत्त्वज्ञान मिल जाता है, विनोदप्रेमियों को विनोद मिल जाता है, प्रेम लेने वालों को प्रेम मिल जाता है। जिसकी जैसी दृष्टि होती है उसको वैसा ही मिल जाता है।

पूतना दूध के बहाने जहर पिलाती है किन्तु श्रीकृष्ण तो सब हजम कर जाते हैं। उन्हें वासना क्या कर सकती है जो स्वयं में पूर्ण हो ? अमृत तो उनके आगे अमृत है ही, किन्तु वे जहर को भी अमृत बना देते है। श्रीकृष्ण जब अधिक नोचने लगे तो पूतना बोलती हैः "बस.... बस..... मेरे अंगों को पीड़ा हो रही है। छोड़ो.....छोड़ो...."

श्रीकृष्ण कहते हैं- "मौसी ! मैं किसी को जल्दी पकड़ता नहीं और यदि मैं पकड़ लेता हूँ तो फिर छोड़ता नहीं हूँ। लोग स्वयं मेरे पास आते हैं। पूतना ! मैं तेरे पास नहीं आया था, तू स्वयं मेरे पास आई है।"

ज्ञानी पुरूषों के पास जब तुम जाते हो तो अपनी मर्जी से जाते हो लेकिन लौटोगे उनकी मर्जी से।

पूतना बोलती हैः "छोड़-छोड़.....।"

श्रीकृष्ण बोलते है- "हम जल्दी पकड़ते नहीं और पकड़ते हैं तो जल्दी छोड़ते नहीं।"

भगवान के या ज्ञानी के हाथ में यदि यह जीव आ गया और भगवान ने या गुरू ने पकड़ लिया तो फिर वे उसे छोड़ते नहीं हैं। किनारे लगाकर, पार करके ही वे चुप होते हैं।

सिंह की दाढ़ में आया हुआ शिकार शायद छूट जाये लेकिन संत के हृदय में, भगवान के हृदय में आया हुआ व्यक्ति नहीं छूटता। वह पार होकर ही रहता है। थोड़ी देर-सबेर जरूर हो सकती है।

पयःपान कराने से पूतना को अत्यधिक पीड़ा होने लगी। उसने चिन्तन के बल से अपना जो नकली रूप बनाया था, वह पीड़ा के कारण गायब हो गया और वह असली राक्षसी के रूप में प्रगट हो गई। जब वासना असली रूप ले लेती है तो भयभीत भी होती है। जब पूतना असली राक्षसी के रूप में प्रगट हुई तो लोग मार डालेंगे इस भय से श्रीकृष्ण को लेकर आकाश में उड़ी। वासना आनंद को लेकर भागती है व गायब कर देती है।

देखो ! कथा बनाने वाले वेदव्यासजी की कितनी पवित्र बुद्धि रही होगी, कितनी उदार और विशाल बुद्धि रही होगी ताकि जो भावप्रधान व्यक्ति हैं, उन्हें भी ज्ञान मिल जाय !

वासना (पूतना) श्रीकृष्ण अर्थात् आनन्द के खजाने को लेकर उड़ी तो सही किन्तु लम्बे समय तक उड़ न सकी और श्रीकृष्ण की इच्छा से मामा कंस के बगीचे में जा गिरी जिससे बगीचा भी नष्ट हो गया।

कथा कहती है कि श्रीकृष्ण को लेकर पूतना जब उड़ने लगी तब गोकुल के सभी ग्वालबाल और गोपियाँ घर का काम छोड़कर नंगे पैर भागते-भागते मथुरा पहुँचे। उनकी नजर आकाश में श्रीकृष्ण की ओर होने के बावजूद भी किसी को कोई चोट नहीं आई।

कथाकार यहाँ कितनी सुन्दर बात समझा रहे हैं कि ग्वाल-गोपियों की नजर श्रीकृष्ण पर थी, वासना पर नहीं अपितु आनंदस्वरूप परमात्मा पर थी, अतः उन्हें कोई चोट नहीं लगी।

नजर यदि वासना पर होती है और संभल कर भी चलोगे तब भी चोट तो लग ही जायगी किन्तु परमात्मा पर यदि तुम्हारी नजर होती है तो फिर भले ही तुम देखकर न भी चलो, जैसे गोपियों का, ग्वालों का ध्यान श्रीकृष्ण की तरफ था तो उन्हें चोट नहीं लगी।

यदि नजर निर्वासनिक तत्त्व पर हो, ज्ञान पर हो, तो उसमें आपको चोट नहीं लगती है। न जन्म की चोट लगती है, न मृत्यु की चोट लगती है, न वियोग की चोट लगती है, न संयोग का आकर्षण होता है, न शोक की चोट लगती है न भय की ही।

यदि वासना आनंद को, आत्मा को दबाना चाहती है तो फिर आत्मदेव का प्रभाव ऐसा है कि वह भले ही छोटा सा नन्हा मुन्ना दिखता है फिर भी बड़ी से बड़ी वासनारूपी को नष्ट करना उसके बाँये हाथ का खेल है।

पूतना धड़ाम से गिरी किन्तु श्रीकृष्ण अछूते व सुरक्षित ही रहे। इससे सिद्ध होता है कि वासना चाहे कैसा भी रूप लेकर आनन्द को नष्ट करना चाहे किन्तु आनंदस्वरूप पर&