
प्रातः
स्मरणीय
पूज्यपाद
संत
श्री
आसारामजी
बापू के
सत्संग-प्रवचन
श्रीकृष्ण
दर्शन
जितना मनुष्य जन्म दुर्लभ है उससे भी ज्यादा मनुष्यता दुर्लभ है और उससे भी ज्यादा मानुषी शरीर से, मन से, बुद्धि से पार परमात्मदेव का साक्षात्कार दुर्लभ है। श्रीकृष्ण के अवतार से यह परम दुर्लभ कार्य सहज सुलभ हो पाया। राजसी वातावरण में, युद्ध के मैदान में किंकर्त्तव्यमूढ़ अवस्था में पड़ा अर्जुन आत्मज्ञान पाकर – 'नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा' – अपने आत्म-वैभव को पाकर सारे कर्मबन्धनों से छूट गया। जीते जी मुक्ति का ऐसा दुर्लभ अनुभव कर पाया।
श्रीकृष्ण को अगर मानुषी दृष्टि से देखा जाये तो वे आदर्श पुरूष थे। उनका उद्देश्य था मनुष्यत्व का आदर्श उपस्थित करना।
मनुष्य व्यावहारिक मोह-ममता से ग्रस्त न होकर, धर्मानुष्ठान करता हुआ दुर्लभ ऐसे आत्मबोध को पा ले, इस हेतु मनुष्य में शौर्य, वीर्य, प्राणबल की आवश्यकता है। इस छोटे से ग्रंथ में संग्रहित प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू के अनुभवसिद्ध प्रयोग और उपदेशों से हम अपनी प्राणशक्ति, जीवनशक्ति, मनःशक्ति और बुद्धि का विकास करके इहलोक और परलोक में ऊँचे शिखरों को सर कर सकते हैं और तीव्र विवेक-वैराग्यसम्पन्न जिज्ञासु लोकातीत, देशातीत, कालातीत अपना आत्म-साक्षात्कार का दुर्लभ अनुभव पाने में अग्रसर हो सकता है।
आज हम सब भी रजो-तमोगुणी वातावरण में पनपे हैं और घसीटे जा रहे हैं। भीतर विकारों-आकांक्षाओं का युद्ध मचा है। इस समय श्रीकृष्ण की लीला, चरित्र, ज्ञानोपदेश, प्राणोपासना, जीवनयोग और विभिन्न प्रसंगों पर अनुभव-प्रकाश डालते हुए प्रातःस्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू ने आज के मानव की आवश्यकता अनुसार पथ-प्रदर्शन किया है।
संतों के वचनों को लिपिबद्ध करके सुज्ञ पाठकों के करकमलों में अर्पित करते हैं।
श्री
योग वेदान्त
समिति
अमदावाद
आश्रम
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वेदमालि ब्राह्मण
की आत्मोपलब्धि
अनूठी महिमा......
सत्संग की और सदगुरू
की
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भगवान श्रीकृष्ण ने जेल में प्रकट होना पसंद किया। रोहिणी नक्षत्र, श्रावण के कृष्णपक्ष की अष्टमी, अन्धकारमय रात्रि और वह भी मध्यरात्रि। जो नित्य, मुक्त, प्रकाशमय है वह अन्धकार की रात्रि पसंद कर लेता है। जो घट-घटवासी है वह कारावास को पसंद कर लेता है। जो नित्य है, निरंजन है, अगम है, अगोचर है वह साकार नन्हा-मुन्ना रूप स्वीकार कर लेता है।
भगवान की यह गरिमा है, महिमा है कि वे बन्धन में पड़े हुए को मुक्त कर दें, बिछुड़े हुए को मिला दें, अज्ञानी को ज्ञान दे दें। शोकातुरों का शोक निवृत्त करने के लिए बँसी बजानी पड़े या बछड़े की पूँछ पकड़नी पड़े फिर भी उनको कोई बाधा नहीं आती। भगवान को कोई भी काम छोटा नहीं लगता। जिसे कोई सेवाकार्य छोटा न लगे वही तो वास्तव में बड़ा है।
श्रीकृष्ण के जीवन में ऐसे-ऐसे उतार और चढ़ाव आते हैं कि जिनको समझने से हमारे नर जीवन में नारायण का प्रकाश हो जाय।
श्रीकृष्ण जब करीब ७० साल के थे तब घोर आंगिरस ऋषि के आश्रम में गये। तेरह वर्ष उन्होंने एकान्त में उपनिषदों का अभ्यास किया। ‘छान्दोग्य उपनिषद’ (३ - १७ - ६ ) में यह कथा आती है।
श्रीकृष्ण के जीवन में ज्ञान भी अव्वल नंबर का था। युद्ध के मैदान में उन्होंने भगवद्- ज्ञान बरसाया है। उनके जीवन में उतार-चढ़ाव भी कैसे आये !
भगवान के जीवन का एक दृश्य और देखो। कालयवन की सारी संपत्ति हाथियों, बैलगाड़ियों, भैंसों, घोड़ों और गधों पर लादकर यदुवंशी द्वारका जा रहे थे। श्रीकृष्ण ने सोचा कि यह संपत्ति हमारे घर में जायेगी तो कुछ न कुछ हानि पहुँचाएगी। हमारे कुल के लोगों की संपत्ति बढ़ेगी तो उनमें विलासिता आ जायेगी। परिश्रम करके संपत्ति, धन-दौलत मिले तो ठीक, अगर ऐसे ही मिल जाये तो जीवन को विलासी बना देती है, खोखला कर देती है।
इसलिए श्रीकृष्ण ने जरासंध को छेड़ दिया तो उसने यदुवंशियों पर आक्रमण कर दिया। यदुवंशियों की सारी संपत्ति छीन ली। श्रीकृष्ण और बलराम जरासन्ध का सामना करना उचित न समझकर भाग निकले।
हमारे परम प्रेमास्पद भगवान नंगे पैर, नंगे सिर भाग रहे हैं। साथ में केवल एक धोती। माँगकर खाते हैं, धरती पर सोते हैं, साधुओं के आश्रमों में रहते हैं, सत्संग करते हैं। यह भी एक झाँकी है श्रीकृष्ण के जीवन की।
गिरनार के पर्वतों में रहते थे, वहाँ आग लगी तो वहाँ से भी भागे और समुद्र में द्वारका बसायी। उस नगरी पर भी शाल्व ने वायुयान से आक्रमण किया। उनके ससुर के घर में डाका पड़ा, वे मारे गये। उनके वहाँ से स्यमंतक मणि की चोरी हो गयी। स्वयं श्रीकृष्ण के ऊपर मणि चुराने का आरोप लगाया गया। बड़े भाई बलरामजी भी उन्हीं के ऊपर शंका की। भागवत में स्वयं श्रीकृष्ण कहते हैं :
किन्तु
मामग्रजः
सम्यङ् न
प्रत्येति
मणिं प्रति।
'बलराम जी मणि के बारे में मेरा विश्वास नहीं करते।'
जीवन में ऐसे-ऐसे विरोधी प्रसंग आने पर भी श्रीकृष्ण के चित्त में क्षोभ नहीं हुआ।
श्रीकृष्ण सदा साधु-संतों का संग करते थे। घोर आंगिरस ऋषि के आश्रम में वर्षों तक उपनिषद का अध्ययन किया और एकान्त-विरक्तता में रहे। दुर्वासा जैसे ऋषि का आतिथ्य खूब प्रेम से किया। जबकि श्रीकृष्ण के कुल में उत्पन्न हुए यदुवंशी साधु-संतों की मजाक उड़ाते थे। जाम्बवतीनन्दन साम्ब को स्त्री का वेश पहनाकर फिर ऋषि से जाकर पूछते हैं कि "महाराज ! यह सुंदरी गर्भवती है। उसे बेटा होगा कि बेटी होगी ?"
ऋषि ने कहाः "तुम संतों की मजाक उड़ाते हो तो जाओ, न बेटा होगा न बेटा होगी। पेट पर जो मूसल बाँधा है उसी से तुम्हारा सत्यानाश होगा।"
....तो श्रीकृष्ण साधू-संतों का आदर करते थे जबकि उनके कुटुम्बीजन साधू-संतों की मजाक उड़ाते थे। श्रीकृष्ण तो संयमी होकर ब्रह्मानन्द में रमण करते थे और उनके कुल के लोग शराब पीते थे।
श्रीकृष्ण के जीवन के चढ़ाव-उतार समाज को यह बताते हैं कि तुम्हारा जन्म अगर हथकड़ियोंवाले माँ-बाप के घर हो गया हो तभी भी तुम अपने को दीन-हीन मत मानना।
हे जीव ! तेरा जन्म अगर कारावास में हो गया हो तभी भी तू चिन्ता मत कर। अपने आन्तरिक दिव्यत्व को जगा। उन्नत कार्य कर। सत्संग कर। समाधि लगा। धर्म, नीति और आत्मज्ञान के अनुकूल आचरण कर। अपने छुपे हुए भगवदभाव को प्रकट कर क्योंकि तू मेरा स्वरूप है। तेरे कुटुम्बी तेरे विरोधी हों फिर भी तू घबड़ाना नहीं। कभी मामा से भानजे की अनबन हो जाय और दोनों का युद्ध हो जाय, मामा चल बसे तभी भी चिन्ता, दीनता, हीनता महसूस नहीं करना। तेरे परिवार वाले तेरे कहने में न चलें तभी भी तू निराश नहीं होना। जरासंध जैसा राजा तुझसे युद्ध करे तो तू वीर होकर उसका मुकाबला करना। सत्रह-सत्रह बार श्रीकृष्ण ने जरासंध को भगाया। अठारहवीं बार श्रीकृष्ण स्वयं जानबूझकर भागे। उनके भागने में भी लाभ था। अपने कुटुम्बीजनों को सबक सिखाना था।
श्रीकृष्ण के जीवन में कभी हताशा नहीं आयी, कभी निराशा नहीं आयी, कभी पलायनवाद नहीं आया, कभी उद्वेग नहीं आया, कभी चिन्ता नहीं आयी, कभी भय नहीं आया, कभी शोक नहीं आया, कभी विषाद नहीं आया और कभी क्षुद्र अहंकार नहीं आया कि यह देह मैं हूँ।
अन्तिम समय में श्रीकृष्ण के कुटुम्बियों की मति ऋषि के शाप से विपरीत हो गई और आपस में लड़ मरे। श्रीकृष्ण का भी अपमान कर दिया, कुछ-का-कुछ सुना दिया, फिर भी श्रीकृष्ण के चित्त में क्षोभ नहीं हुआ।
उनका मृत्यु भी कैसा ? उनका देहविलय समाधि करते हुए या पलंग पर आराम करते-करते प्राण छोड़े या तुलसीदल मुँह में डालकर प्राण छोड़े ऐसा नहीं हुआ। एक बहेलिये ने बाण मारा। आखिरी घड़ियाँ हैं तब भी उनके चित्त की समता नहीं जाती। बाण मारने वाले को भी क्षमा करते हुए बोलते हैं- "तू चिन्ता मत करना। ऐसा ही होने वाला था। नियति में जो होना निश्चित हुआ था वही हुआ।"
श्रीकृष्ण ने इन्द्रियों को मन में लगा दिया, मन को बुद्धि में और बुद्धि को अपने शुद्ध-बुद्ध चिदघन चैतन्य आत्मा के चिन्तन में लगाकर कलेवर त्याग दिया।
श्रीकृष्ण का जो प्रागट्य है वह नर को अपने नारायण स्वभाव में जगाने का प्रागट्य है। जन्माष्टमी एक ऐसा उत्सव है कि कितना भी थका-हारा जीव हो, उसे अपने भीतर के रस, प्रेम को प्रकटाने की प्रेरणा मिल जाय। हँसते-खेलते, प्रेम को छलकाते, बाँटते-बरसाते, अहंकारियों को और शोषकों को सबक सिखाते, थके-मांदे-असहायों को सहाय देते, निर्बलों में बल फूँकते, समाज में आध्यात्मिक क्रांति करते हुए, नर को अपने नारायण-स्वरूप में पहुँचाने का अदभुत सफल प्रयास श्रीकृष्ण-लीला से हुआ।
यह कृष्ण-अवतरण रोहिणी नक्षत्र में हुआ। मध्यरात्रि के घोर अन्धकार में भी भगवान ने प्रकाश कर दिया। जो कैद से बाहर आ जायें वे भगवान हैं। हम भी तो कैद में बैठे हैं, जैसे वसुदेव-देवकी कंस की जेल में बन्द थे। हमारा भी जीवरूपी वसुदेव और बुद्धिरूपी देवकी देहाभिमान के कारावास में पड़े हैं। हम हाड़-मांस के शरीर में बन्द हैं। इस कैद से हम बाहर आ जायें। इस देह को 'मैं' मानने की गलती से बाहर आ जायें। इस देह की उपलब्धियाँ या देह के वियोग वास्तव में हमारे आत्मा पर कोई प्रभाव नहीं डालते हैं। इस बात का ज्ञान हो जाय तो जोगी का जोग, तपी का तप, जपी का जप और सदगृहस्थ का सदाचारयुक्त जीवन सफल हो जाता है।
मनुष्य अगर तत्पर हो जाय तो दुःख खोजने पर भी नहीं मिलेगा। सत्य को समझने के लिए, अपने को खोजने के लिए अगर वह तत्पर हो जाय तो दुःख खोजने पर नहीं मिलेगा। हम अपनी असलियत को खोजने में तत्पर नहीं हैं अतः सुखी होने के लिए खूब यत्न करते हैं। सुबह से शाम तक और जीवन से मौत तक प्राणिमात्र यह करता हैः दुःख को हटाना और सुख को थामना।
धन कमाते हैं तो भी सुख के लिये, धन खर्च करते हैं तो भी सुख के लिये। शादी करते हैं तो भी सुख के लिए और पत्नी को मायके भेजते हैं तो भी सुख के लिये। पत्नी के लिये हीरा-जवाहरात ले आते हैं तो भी सुख के लिये और तलाक भी देते हैं तो भी सुख के लिये। प्राणीमात्र जो कुछ चेष्टा करता है वह सुख के लिए ही करता है। सुख को थामना और दुःख को हटाना। फिर भी देखा जाये तो आदमी दुःखी-का-दुःखी है क्योंकि जहाँ सुख है वहाँ उसने खोज नहीं की। जहाँ दुःख का प्रवेश नहीं उस आत्मा में जीव जाता नहीं। भगवान हमारे परम सुहृद हैं। उन परम सुहृद के उपदेश को सुनकर अगर जीव भीतर अपने स्वरूप में जाय तो सुख और दुःख की चोटों से परे परमानन्द का अनुभव हो जाय।
श्रीकृष्ण संधिदूत होकर गये। युद्ध टालने की कोशिश की, युद्ध टला नहीं। संधि न हो पायी फिर भी भीष्म का सत्कार किया, मान दिया। 'मैं संधि करने गया.... मेरी बात ये लोग नहीं मानते....' ऐसा समझकर उनको चोट नहीं लगी। चोट हमेशा अहंकार को लगती है, आत्मा को नहीं लगती। दुःख हमेशा अहंकार को होता है, मन को होता है, आत्मा को नहीं होता। साधारण जीव मन में जीते हैं और उन साधारण जीवों को अपने शिवत्व का ज्ञान कराने के लिए भगवान को जो आविर्भाव हुआ उसे बोलते हैं कृष्णावतार।
मैंने सुनी है एक कहानी।
एक बार अंगूर और करेलों की मुलाकात हुई। अंगूरों ने कहाः "हम कितने मीठे-मधुर और स्वादिष्ट हैं। हमको देखकर लोगों के मुँह में पानी आ जाता है। तुम तो कडुवे कडुवे करेले।"
करेलों ने कहाः "बस बस, चुप बैठो। तुमको देखकर लोगों के मन की लोलुपता बढ़ जाती है। तुम्हारा स्वाद लेते हैं, मजा लेते हैं तो उनको सूइयाँ (इंजेक्शन ) चुभानी पड़ती हैं। लोग बीमार होते हैं, मधुप्रमेह (डायबिटीज़) हो जाता है। हम जब लोगों की जिह्वा पर जाते हैं तो कडुवे जरूर लगते हैं, किन्तु लोगों में स्फूर्ति ले आते हैं, डायबिटीज़ को मार भगाते हैं और तन्दुरूस्ती का दान करते हैं। लगते कडुवे हैं पर काम बढ़िया करते हैं।''
कभी-कभी कोई प्रसंग, कोई दुःख आ जाता है तो लगता कडुवा है पर वह दुःख भी सत्संग में भेज देता है। संसार की समस्याएँ भी हरि के चरणों तक पहुँचा देती हैं। दुःख आये तब समझ लेना कि वह करेले का काम करता है।
हम मीठी-मीठी कथाएँ सुने, मीठे-मीठे चुटकुले सुनें, अच्छा-अच्छा लगे वह सुनें, देखें, खाये, पियें – यह तो सब ठीक लेकिन कभी-कभी ब्रह्मज्ञान की सूक्ष्म बात भी सुनना चाहिए। समझ में न आये तब भी सुनना चाहिए। अच्छा न लगे तब भी स्वास्थ्य-सुरक्षा के लिए, मधुप्रमेहवालों (डायबिटीज़वालों) को करेलों का रस पीना पड़ता है। ऐसे ही जन्म मरण की डायबिटीज़ लगी है तो साधन-भजनरूपी करेलों का रस अच्छा न लगे तब भी आदर से पीना चाहिए।
जब व्यास जी बोलते हैं, नारदजी बोलते हैं, भगवान बोलते हैं, शास्त्र बोलते हैं वह सब मीठा मीठा ही लगे यह जरूरी नहीं है। बुद्धि की सूक्ष्मता कैसी होगी ? वक्ता जितना ऊँचा है, महान है, उन्नत है और श्रोता भी बढ़िया योग्यतावाला है तो उन दोनों के बीच का संवाद हम लोगों के लिए उन्नति करने वाला है। चक्रम की कथाएँ, नॉवेल और साधारण किस्से-कहानियाँ-कथाएँ पढ़ें-सुनें तो वे अच्छे तो लगते हैं मगर बुद्धि को स्थूल बना देते हैं। उपनिषद, ब्रह्मसूत्र आदि कठिन तो लगते हैं मगर बुद्धि को सूक्ष्म बना देते हैं और सूक्ष्म बुद्धि ही ठीक आत्मिक प्रकाश पा सकती है।
भगवान की कथा जब पढ़ते हैं, बोलते हैं, सुनते हैं उस समय भीतर अन्तःकरण धुलता है, चित्त में प्रसन्नता आती है, वक्ता की कुशलता से श्रोताओं में आत्मानन्द छलकता है। मानों कभी उबासी भी आये फिर भी भगवान की कथा, हरिचर्चा, सत्संग कल्याणकारी है।
भगवान श्रीकृष्ण की लीलाएँ बड़ी अनूठी है। उनके जीवन के चढ़ाव उतार से जीव को सीखने को मिलता है कि हमारे जीवन में भी उतार चढ़ाव आ जाय तो क्या बड़ी बात है ? जब सोलह कलाधारी पूर्णावतार भगवान श्रीकृष्ण के कुटुम्बी उनके विरोधी हो सकते हैं तो हमारी श्रीमती, हमारे श्रीमान या बेटा-बेटी हमारा कहा नहीं मानते तो क्या बड़ी बात है ? श्रीकृष्ण में इतनी शक्ति थी कि सत्रह बार जरासंध को मार भगाया फिर भी अठारहवीं बार खुद को भागना पड़ा तो कभी-कभी हमें भी घर छोड़कर, गाँव छोड़कर कहीं और जगह जाना पड़े तो क्या हो गया?
"बापू ! मेरी बदली होती है। मुझे अपना घर, गाँव छोड़ना पड़ता है।"
अरे, तेरे भगवान को भी छोड़ना पड़ा था तो तू क्यों घबड़ाता है ?
हारे हुए जीव को भगवान की लीलाओं से आश्वासन मिल जाता है। उदास को प्रेम का दान मिल जाता है। अहंकारी को निरहंकारी होने का सबक मिल जाता है।
कहाँ संकल्प मात्र से उथल-पुथल कर देने का सामर्थ्य रखने वाले श्रीकृष्ण और कहाँ नंगे पैर, नंगे सिर, एक ही धोती में तीन महीने तक उनका ऋषियों के आश्रम में रहना। टुकड़ा माँगकर खाया और सत्संग सुना। तेरह वर्ष घोर आंगिरस ऋषि के आश्रम में उपनिषदों का अध्ययन किया और विरक्त जीवन जिये एकान्त में। एकान्त में विरक्त जीवन जीने से योग्यता बढ़ती है, शक्ति बढ़ती है। श्रीकृष्ण का प्रभाव बढ़ गया, सामर्थ्य बढ़ गया, यश बढ़ गया। घोर आंगिरस ऋषि के आश्रम का एकान्तवास और उपनिषदों का अध्ययन युद्ध के मैदान में भगवद्गीता होकर प्रकट हो गया।
श्रीकृष्ण के चरित्र महाभारत में, हरिवंशपुराण में, ब्रह्मवैवर्तपुराण में, भागवत में आते हैं। उन चरित्रों से आप अपने जीवन में जो खटकने वाले भाव हैं उनको हटाकर, संसार की परिवर्तनशीलता को समझकर, अपने अपरिवर्तनशील कूटस्थ आत्मा को पहचान कर आप भी श्रीकृष्ण-तत्त्व का साक्षात्कार करें इसलिए श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी का उत्सव होता है।
श्रीकृष्ण का जीवन सर्वांगी विकसित है। उन्हें चार वेदों का ज्ञान है। गीता वेदों का प्रसाद है, उपनिषदों का ज्ञान है। चार वेद हैं- ऋग्वेद , यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। चार उपवेद हैं- आयुर्वेद, धनुर्वेद, स्थापत्यवेद और गांधर्ववेद। आयुर्वेद में भी श्रीकृष्ण कुशल थे। आरोग्य के सिद्धान्त बढ़िया जानते थे। गीता में भी उन्होंने कहाः
युक्ताहारविहारस्य
युक्तचेष्टस्य
कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य
योगो भवति
दुःखहा।।
'दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है।'
(भगवद् गीताः ६.१७)
युद्ध के मैदान में भी तंदुरूस्ती की तरफ इशारा कर दिया। युद्ध में थके, मांदे, घावों से भरे घोड़ों को शाम के समय ऐसी मरहमपट्टी ऐसी मालिश करते थे कि दूसरे दिन वे फिर से भागदौड़ करने के लिए तैयार हो जाते थे।
धनुर्विद्या,
शस्त्रविद्या
में भी वे
अदभुत थे।
सत्रह बार
जरासंध को
बिना शस्त्र
ही हरा दिया। युद्ध
की विद्या में
ऐसे कुशल थे।
राजनीति में
भी अव्वल नंबर
थे।
वे पुत्र का पार्ट निभाने में भी अव्वल नंबर, मित्र का पार्ट निभाने में भी अव्वल नंबर, शिष्य का पार्ट निभाने में भी अव्वल नंबर और गुरु का पार्ट अदा करने में भी अव्वल नंबर I
स्थापत्य वेद का ज्ञान भी श्रीकृष्ण में खूब था। द्वारिका नगरी बनायी। रथों के चलने की सड़क अलग, पैदल जानेवालों का रास्ता अलग। बीच में बगीचे, विश्रामगृह, प्याऊ आदि। आदमी को वैकुण्ठ जैसा सुख मिले ऐसी रचना थी, ऐसा सुन्दर नक्शा बनाया, बड़ी अनूठी द्वारिका बसायी।
गांधर्ववेद में भी उन्होंने अपनी कुशलता दिखायी। गांधर्ववेद में नृत्य, गीत और वाद्य होते हैं, गाना-बजाना होता है। बजाना भी दो प्रकार का होता हैः एक ठोककर बजाया जाता है, जैसे तबला, ढोलक, मंजीरा आदि। दूसरा फूँककर बजाया जाता है, जैसे बँसी, बिगुल, तुरी, शहनाई आदि। ठोककर बजाने वाले वाद्यों से फूँककर बजाये जाने वाले वाद्य अच्छे माने जाते हैं। उसमें भी बँसी बढ़िया है।
श्रीकृष्ण बँसी ऐसी बजाते कि जो दूध के लिए विरह में छटपटाने वाले बछड़े गाय आने पर दूध पीने लगते वे श्रीकृष्ण की बँसी सुनकर दूध पीना भूल जाते और बँसी का सुख पाकर तन्मय हो जाते। श्रीकृष्ण अपनी बँसी में अपने ऐसे प्राण फूँकते, प्रेम फूँकते कि सुननेवालों के चित्त चुरा लेते।
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जीव का जीवन सर्वांगी विकसित हो इसलिए भगवान के अवतार होते हैं। उस समय उन अवतारों से तो जीव को प्रेरणा मिलती है, हजारों वर्षों के बाद भी प्रेरणा मिलती रहती है।
ईश्वर के कई अवतार माने गये हैं- नित्य अवतार, नैमित्तिक अवतार, आवेश अवतार, प्रवेश अवतार, स्फूर्ति अवतार, आविर्भाव अवतार, अन्तर्यामी रूप से अवतार, विभूति अवतार, आयुध अवतार आदि।
भगवान की अनन्त-अनन्त कलाएँ जिस भगवान की समष्टि कला से स्फुरित होती है, उन कलाओं में से कुछ कलाएँ जो संसार व्यवहार को चलाने में पर्याप्त हो जाती हैं वे सब कलाएँ मिलकर सोलह होती हैं। इसलिए भगवान श्रीकृष्ण को षोडश कलाधारी भी कहते हैं और पूर्णावतार भी कहते हैं। वास्तव में, भगवान में सोलह कलाएँ ही हैं ऐसी बात नहीं है। अनन्त-अनन्त कलाओं का सागर है वह। फिर भी हमारे जीवन को या इस जगत को चलाने के लिए भगवान-परब्रह्म-परमात्मा, सच्चिदानन्द की सोलह कलाएँ पर्याप्त होती हैं। कभी दस कलाओं से प्रकट होने की आवश्यकता पड़ती है तो कभी दो कलाओं से काम चल जाता है, कभी एक कला से। एक कला से भी कम में जब काम चल जाता है, ऐसा जब अवतार होता है उसे अंशावतार कहते हैं। उससे भी कम कला से काम करना होता है तो उसे विभूति अवतार कहते हैं।
अवतार का अर्थ क्या है ?
अवतरति इति अवतारः। जो अवतरण करे, जो ऊपर से नीचे आये। कहाँ तो परात्पर परब्रह्म, निर्गुण, निराकार, सत् चित् आनन्द, अव्यक्त, अजन्मा.... और वह जन्म लेकर आये ! अव्यक्त व्यक्त हो जाय ! अजन्मा जन्म को स्वीकार कर ले, अकर्त्ता कर्तृत्व को स्वीकार कर ले, अभोक्ता भोग को स्वीकार कर ले। यह अवतार है। अवतरति इति अवतारः। ऊपर से नीचे आना।
जो शुद्ध बुद्ध निराकार हो वह साकार हो जाय। जिसको कोई आवश्यकता नहीं वह छछियन भरी छाछ पर नाचने लग जाय। जिसको कोई भगा न सके उसको भागने की लीला करनी पड़े। ऐसा अवतार मनुष्य के हित केलिए है, कल्याण के लिए है।
भगवान का एक अवतार होता है प्रतीक अवतार, जैसे भक्त भगवान की प्रतिमा बना लेता है, जिस समय भोग लगाता है, जो भोग लगाता है, जिस भाव से भोग लगा देता है, पत्र, पुष्प और जो कुछ भी अर्पण करता है उस रूप में ग्रहण करके वह भगवान अन्तर्यामी प्रतिमा अवतार में भक्त की भावना और शक्ति पुष्ट करते हैं। कभी भगवान की मूर्ति से, प्रतिमा से, चित्र से फूल या फूलमाला गिर पड़ी तो वह भक्त की पूजा स्वीकार हो गयी इसका संकेत समझा जाता है।
हम जब साधना काल के प्रारंभ में पूजा करते थे तब कभी-कभी ऐसा होता था। फूल की माला भगवान को चढ़ा दी, फिर पूजा में तन्मय हो गये। एकाएक माला गिर पड़ी तो चित्त में बड़ी प्रसन्नता होती कि देव प्रसन्न हैं।
प्रतिमा में भगवद् बुद्धि करके उपासना की और प्रतिमा से शांति, आनंद और प्रेरणा मिलने लगी। यह प्रतिमा अवतार। कोई श्रीकृष्ण की प्रतिमा रखता है कोई श्रीराम की की, कोई किसी और की। धन्ना जाट जैसे को पण्डित जी ने भाँग घोटने का सिलबट्टा दे दिया ' ये ठाकुरजी हैं' कहकर। धन्ना जाट ने उसमें भगवान की दृढ़ भावना की तो भगवान प्रकट हो गये।
भगवान प्रतिमा के द्वारा हमारी उन्नति कर दें, प्रतिमा के द्वारा अवतरित हो जायें उसको कहते हैं प्रतिमा अवतार। जिस प्रतिमा को आप श्रद्धा-भक्ति से पत्र-पुष्प अर्पण करते हो, भोग लगाते हो, उस प्रतिमा से आपको प्रेरणा मिलती है।
अंतर्यामी अवतार दो प्रकार का होता है। सबके अंतर्यामी भगवान सबको सत्ता-स्फूर्ति देते हैं, कुछ कहते नहीं। जन-साधारण के साथ भी भगवान हैं। वह उन्हें माने चाहे न माने, आस्तिक हो या नास्तिक, भगवान को गालियाँ देता हो फिर भी भगवान उसकी आँख को देखने की सत्ता देते हैं, कान को सुनने की सत्ता देते हैं। पेट में उसका भोजन पचाने की शक्ति देते हैं। दुराचारी-से-दुराचारी, पापी से भी पापी, महापापी हो उसको भी अपनी सत्ता, स्फूर्ति और चेतना देते हैं क्योंकि वे प्राणिमात्र के सुहृद हैं। वे सबके भीतर अंतर्यामी आत्मा होकर बैठे हैं। 'यह दुष्ट मुझे मानता नहीं, भजता नहीं.... चलो उसके हृदय को बंद कर दूँ...' ऐसा भगवान 'नहीं' कभी नहीं कहते। बिजली का बिल दो महीने तक नहीं भरो तो 'Connection Cut' हो जाता है, किन्तु भगवान को दस साल तक सलाम न भरो, रामनाम का बिल न भरो तो भी आपकी जीवन चेतना का Connection Cut नहीं होता। जितने श्वास उसके भाग्य में होते हैं उतने चलने देते हैं। यह भगवान का अंतर्यामी अवतार अंतर्यामी सत्ता स्वरूप से सब जनों के लिए होता है। भक्तजनों के लिए है अन्तर्यामी प्रेरणा अवतार। जो भक्त हैं, जो भक्ति करते हैं, उनका अंतर्यामी प्रेरक होता है, चित्त में प्रेरणा देता है किः 'अब यह करो, वह करो। सावन का महीना आया है तो अनुष्ठान करो। इतने जप-तप हो गये, अब आत्मज्ञान के सत्संग में जाओ। गुरूमुख बनो। निगुरे रहने से कोई काम नहीं बनेगा....' इस प्रकार अंतर्यामी भगवान प्रेरणा देते हैं।
इस प्रकार भगवान के कई तरह के अवतार होते हैं। युग-युग में, वक्त-वक्त पर, हर दिल और हर व्यक्ति की योग्यता पर भिन्न-भिन्न प्रेरणा और प्रकाश मिले ऐसे अवतार होते हैं।
श्रीकृष्ण का अवतार सोलह कला से सम्पन्न, सर्वांगी विकास कराने वाला, सब साधकों को, भक्तों को प्रकाश मिल सके, दुर्जनों का दमन हो सके, मदोन्मत्त राजाओं का मद चूर कर सके, माली, कुब्जा, दर्जी और तमाम साधारण जीवों पर अहैतुकी कृपा बरसा सके ऐसा पूर्ण लीला अवतार था। जो बँधे हुए को छुड़ा दे, निराश को आश्वासन दे, रूखे को रस से भर दे, प्यासे को प्रेम से भर दे ऐसा अवतार था श्रीकृष्ण का। कभी-कभी छोटे-मोटे काम के लिए आवेशावतार हो जाता है, कभी अंशावतार हो जाता है, जैसे वामन अवतार, नृसिंह अवतार, परशुराम अवतार। कभी आयुधावतार हो जाते हैं। कभी संकल्प किया और भगवान के पास आयुध आ जाता है, सुदर्शन चक्र आदि आ जाता है।
परात्पर परब्रह्म की शक्ति कभी अंशावतार में तो कभी आयुध-अवतार में तो कभी संतों के हृदय द्वारा संत-अवतार में तो कभी कारक अवतार में अवतरित होते हुए मानव-जात को अपने उन्नत शिखरों पर ले जाने का काम करती है। मानव अगर तत्पर होकर अपने उन्नत शिखरों पर पहुँचे तो उसे सुख और दुःख दोनों दिखाई पड़ता है खिलवाड़, उपलब्धि और हानि दोनों दिखाई पड़ता है खिलवाड़, शरीर और शरीर के सम्बन्ध दिखाई पड़ते हैं खिलवाड़। उसे अपनी आत्मा की सत्यता का अनुभव हो जाता है।
आत्मा की सत्यता का अनुभव हो जाये तो ऐसा कोई आदमी नहीं जो दुःख खोजे और उसे दुःख मिल जाय । ऐसा कोई आदमी नहीं जो मुक्त न हो। अपने आत्मा की अनुभूति हो जाय तो फिर आपको दुःख नहीं होगा, आपके संपर्क में आने वाले लोग भी निर्दुःख जीवन जीने के मार्ग पर आगे कूच कर सकते हैं।
श्रीकृष्ण को जो प्रेम करे उसको तो वे प्रेम दें ही, उनको जो देखे नहीं उस पर भी प्रेम से बरस पड़े ऐसे श्रीकृष्ण दयालु थे। वे मथुरा में गये तो दर्जी से ग्वालबालों के कपड़े ठीक करवाकर उसका उद्धार किया। पर कुब्जा ? जिसने श्रीकृष्ण की ओर देखा तक नहीं फिर भी उसका कल्याण करना चूके नहीं।
विकारी व्यक्तियों का, भोग-वासना में फँसे हुए लोगों का संपर्क करने वाली बुद्धि कुब्जा है।
कुब्जा छोटी जाति की थी। राजा-महाराजाओं को तेल-मालिश करती, अंगराग लगाती, कंस की चाकरी करती। ऐसा उसका धंधा था।
श्रीकृष्ण का दर्शन करने के लिए सारा मथुरा उमड़ पड़ा था लेकिन कुब्जा कृष्ण के साथ ही पैदल जा रही है फिर भी आँख उठाकर देखती नहीं। श्रीकृष्ण तो उदारता का उदधि थे। उन्होंने सोचाः जब इतने सारे लोग आनन्दित हो रहे हैं, प्रसन्न हो रहे हैं तो यह क्यों थोबड़ा चढ़ाकर जाती है ? कृष्ण कहने लगेः
"हे सुन्दरी !"
कुब्जा सोचने लगी कि मैं सुन्दरी नहीं.... आज तक मुझे किसी ने सुन्दरी कहा ही नहीं। ये किसी और को बुलाते होंगे। कुब्जा ने सुना-अनसुना कर दिया। श्रीकृष्ण ने दुबारा कहाः
"हे सुन्दरी !"
कुब्जा ने सोचाः "कोई और सुन्दरी होगी। मगर ग्वालबालों के टोले में तो कोई स्त्री नहीं थी। जब तीसरी बार श्रीकृष्ण ने कहाः
"हे सुन्दरी !"
तब कुब्जा से रहा न गया। वह बोल उठीः
"बोलो सुन्दर ! क्या बोलते हो ?"
जो कुरूप में भी सौन्दर्य को देख लें वे कृष्ण हैं। सच पूछो तो कुरूप से कुरूप आदमी में भी आत्म-सौन्दर्य छुपा है। श्रीकृष्ण को उस कुरूप कुब्जा में भी अपना सौन्दर्य स्वरूप सच्चिदानंद दिखा। उन्होंने कुब्जा से कहाः
"यह चन्दन तू मुझे देगी ?"
"हाँ लो, लगा लो अपने बदन पर।"
उस कुब्जा को किसी ने सुन्दर कहा नहीं था और श्रीकृष्ण जो कुछ कहते, सच्चे हृदय से कहते। उनका व्यवहार कृत्रिम नहीं था। कुछ विनोद भले किसी से कर लें वह अलग बात है, बाकी भीतर से जो भी करते, गहराई से करते। पूर्णावतार तो जो कुछ करेगा, पूर्ण ही करेगा। विनोद करते तो पूरा, उपदेश करते तो पूरा, नरो वा कुंजरो वा का आयोजन किया तो पूरा, संधि-दूत होकर गये तो पूरे, शिशुपाल को क्षमा की तो पूरी की, पूरी सौ गालियाँ सुन ली। वे जो कुछ भी करते हैं, पूरा करते है फिर भी कभी कर्तृत्व भार से बोझिल नहीं होते। यह नारायण की लीला नर को जगा देती है कि हे नर ! तू भी बोझील मत हो। चार पैसे का कपड़ा, लकड़ा, किराना बेचकर, 'मैंने इतना सारा धंधा किया' यह अहंकार मत रख। पाँच-पच्चीस हजार की मिठाई बेचकर अपने को मिठाईवाला मत मान। तू तो ब्रह्मवाला है।
'मैं मिठाईवाला हूँ.... मैं कपड़े वाला हूँ.... मैं सोने-चाँदी वाला हूँ.... मैं मकानवाला हूँ... मैं दुकानवाला हूँ.... मैं ऑफिसवाला हूँ... मैं पेंटवाला हूँ..... मैं दाढ़ीवाला हूँ..... ' यह सब मन का धोखा है। 'मैं आत्मावाला हूँ... मैं ब्रह्मवाला हूँ...' इस प्रकार हे जीव ! तू तो परमात्मावाला है। तेरी सच्ची मूड़ी तो परमात्मा-रस है।
श्रीकृष्ण ऐसे महान नेता थे कि उनके कहने मात्र से राजाओं ने राजपाट का त्याग करके ऋषि-जीवन जीना स्वीकार कर लिया। ऐसे श्रीकृष्ण थे फिर भी बड़े त्यागी थे, व्यवहार में अनासक्त थे। हृदय में प्रेम.... आँखों में दिव्य दृष्टि....। ऐसा जीवन जीवनदाता ने जीकर प्राणीमात्र को, मनुष्य मात्र को सिखाया कि हे जीव ! तू मेरा ही अंश है। तू चाहे तो तू भी ऐसा हो सकता है।
ममैवांशो
जीवलोके
जीवभूतः
सनातनः।
मनः
षष्ठानीन्द्रियाणि
प्रकृतिस्थानि
कर्षति।।
'इस देह में यह सनातन जीव मेरा ही अंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षण करता है।'
(भगवद् गीताः १५.७)
तुम मेरे अंश हो, तुम भी सनातन हो। जैसे, मेरे कई दिव्य जन्म हो गये, मैं उनको जानता हूँ। हे अर्जुन ! तुम नहीं जानते हो, बाकी तुम भी पहले से हो।
अर्जुन को निमित्त करके भगवान सबको उपदेश देते हैं कि आप भी अनादि काल से हो। इस शरीर के पहले तुम थे। बदलने वाले शरीरों में कभी न बदलने वाले ज्ञानस्वरूप आत्मा को जान लेना ही मनुष्य जन्म का फल है।
'मैं हूँ' जहाँ से उठता है उस ज्ञानस्वरूप अधिष्ठान में जो विश्रांति पा लेता है वह श्रीकृष्ण के स्वरूप को ठीक से जान लेता है।
इस ज्ञान को पचाने के लिए बुद्धि की पवित्रता चाहिए। बुद्धि की पवित्रता के लिए यज्ञ, होम, हवन, दान, पुण्य ये सब बहिरंग साधन हैं। धारणा-ध्यान आदि अंतरंग साधन हैं और आत्मज्ञान का सत्संग परम अंतरंग साधन हैं। सत्संग की बलिहारी है।
सत्संग सुनने से जितना पुण्य होता है उसका क्या बयान करें !
तीरथ
नहाये एक फल
संत मिले फल
चार।
सदगुरू
मिले अनन्त फल
कहे कबीर
विचार।।
तीर्थ में स्नान करो तो पुण्य बढ़ेगा। संत का सान्निध्य मिले तो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों के द्वार खुल जाएँगे। वे ही संत जब सदगुरू के रूप में मिल जाते हैं तो उनकी वाणी हमारे हृदय में ऐसा गहरा प्रभाव डालती है कि हम अपने वास्तविक 'मैं' में पहुँच जाते हैं।
हमारा 'मैं' तत्त्व से देखा जाय तो अनन्त है। एक शरीर में ही नहीं बल्कि हरेक शरीर में जो 'मैं.... मैं.... मैं... मैं....' चल रहा है वह अनन्त है। उस अनन्त परमात्मा का ज्ञान जीव को प्राप्त हो जाता है। इसलिए कबीर जी न ठीक ही कहा है किः
तीरथ
नहाये एक फल
संत मिले फल
चार।
सदगुरू
मिले अनन्त फल
कहे कबीर
विचार।।
सदगुरू
मेरा शूरमा करे
शब्द की चोट।
मारे
गोला प्रेम का
हरे भरम की
कोट।।
जीव को भ्रम हुआ है कि 'यह करूँ तो सुखी हो जाऊँ, यह मिले तो सुखी हो जाऊँ....' लेकिन आज तक जो मिला है, आज के बाद जो भी संसार का मिलेगा, आज तक जो भी संसार का जाना है और आज के बाद जो भी जानोगे, वह मृत्यु के एक झटके में सब पराया हो जायेगा।
मृत्यु झटका मारकर सब छीन ले उसके पहले, जहाँ मौत की गति नहीं उस अपने आत्मा को 'मैं' स्वरूप में जान ले, अपने कृष्ण तत्त्व को जान ले, तेरा बेड़ा पार हो जायेगा।
श्रीकृष्ण कहते हैं-
अमृतं
चैव
मृत्युश्च
सदसच्चाहमर्जुन।
'हे अर्जुन ! मैं अमृत हूँ, मैं मृत्यु हूँ, मैं सत् हूँ और मैं असत् हूँ।'
(गीताः ९.१९)
कितना दिव्य अनुभव ! कितनी आत्मनिष्ठा ! कितना सर्वात्मभाव ! सर्वत्र एकात्मदृष्टि ! जड़-चेतन में अपनी सत्ता, चेतनता और आनन्दरूपता जो विलस रही है उसक प्रत्यक्ष अनुभव !
आप दुनियाँ की मजहबी पोथियों, मत-मतांतरों, पीर-पैगम्बरों को पढ़ लीजिये, सुन लीजिये। उनमें से किसी में ऐसा कहने की हिम्मत है ? किन्तु श्रीकृष्ण भगवान के इस कथन से सर्वत्र एकात्मदृष्टि और उनके पूर्णावतार, पूर्ण ज्ञान, पूर्ण प्रेम, पूर्ण समता आदि छलकते हैं।
श्रीकृष्ण जेल में पैदा हुए हैं, मुस्कुरा रहे हैं। मथुरा में धनुषयज्ञ में जाना पड़ता है तो भी मुस्करा रहे हैं। मामा के षडयंत्रों के समय भी मुस्करा रहे हैं। संधिदूत होकर गये तब भी मुस्करा रहे हैं। शिशुपाल सौ-सौ बार अपमान करता है, हर अपमान का बदला मृत्युदंड हो सकता है, फिर भी चित्त की समता वही की वही। युद्ध के मैदान में अपने ज्ञानामृत से मुस्कराते हुए उलझे, थके, हारे अर्जुन को भक्ति का, योग का, ज्ञान का आत्म-अमृतपान कराते हैं।
संसार की किसी भी परिस्थिति ने उन पर प्रभाव नहीं डाला। जेल में पैदा होने से, पूतना के विषपान कराने से, मामा कंस के जुल्मों से, मामा को मारने से, नगर छोड़कर भागने से, भिक्षा माँगते ऋषियों के आश्रम में निवास करने से, धरती पर सोने से, लोगों का और स्वयं अपने भाई का भी अविश्वास होने से, बच्चों के उद्दण्ड होने से, किसी भी कारण से श्रीकृष्ण के चेहरे पर शिकन नहीं पड़ती। उनका चित्त कभी उद्विग्न नहीं हुआ। सदा समता के साम्राज्य में। समचित्त श्रीकृष्ण का चेहरा कभी मुरझाया नहीं। किसी भी वस्तु की प्राप्ति-अप्राप्ति से, किसी भी व्यक्ति की निन्दा-स्तुति से श्रीकृष्ण की मुखप्रभा म्लान नहीं हुई।
नोदेति
नास्तमेत्येषा
सुखे दुःखे
मुखप्रभा।
श्रीकृष्ण यह नहीं कहते कि आप मंदिर में, तीर्थस्थान में या उत्तम कुल में प्रगट होगे तभी मुक्त होगे। श्रीकृष्ण तो कहते हैं कि अगर आप पापी से भी पापी हो, दुराचारी से भी दुराचारी हो फिर भी मुक्ति के अधिकारी हो।
अपि
चेदसि
पापेभ्यः
सर्वभ्यः
पापकृत्तमः।
सर्वं
ज्ञानप्लवेनैव
वृजिनं
संतरिष्यसि।।
'यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञानरूप नौका द्वारा निःसन्देह संपूर्ण पाप-समुद्र से भलीभाँति तर जायेगा।'
(भगवद् गीताः ४.३६)
हे साधक ! इस जन्माष्टमी के प्रसंग पर तेजस्वी पूर्णावतार श्रीकृष्ण की जीवन-लीलाओं से, उपदेशों से और श्रीकृष्ण की समता और साहसी आचरणों से सबक सीख, सम रह, प्रसन्न रह, शांत हो, साहसी हो, सदाचारी हो। स्वयं धर्म में स्थिर रह, औरों को धर्म के मार्ग में लगाता रह। मुस्कराते हुए आध्यात्मिक उन्नति करता रह। औरों को सहाय करता रह। कदम आगे रख। हिम्मत रख। विजय तेरी है। सफल जीवन जीने का ढंग यही है।
जय श्रीकृष्ण ! कृष्ण कन्हैयालाल की जय....!
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
उदासीना
वयं नूनं न
स्ञ्यापत्यार्थकामुकाः।
आत्मलब्ध्याऽऽस्महे
पूर्णा गेहयोर्ज्योतिर्क्रिया:।।
'निश्चय ही हम उदासीन हैं। हम स्त्री, संतान और धन के लोलुप नहीं हैं। निष्क्रिय और देह-गेह से सम्बन्धरहित हैं दीपशिखा के समान साक्षी मात्र हैं। हम अपने आत्मा के साक्षात्कार से ही पूर्णकाम हैं।'
(श्रीमद्
भागवतः १०-६०-२०)
भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी से कह रहे हैं।
रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को पत्र लिखा था। साधु-ब्राह्मणों से रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण के गुण, यश, पराक्रम, चातुर्य, सहजता, सरलता, निर्द्वन्द्वता, निरामयता आदि सदगुण सुनकर मन-ही-मन संकल्प किया कि वरूँगी तो गिरधर गोपाल को ही। उसके भाई रुक्मि, पिता, भीष्मक तथा अन्य लोगों की मर्जी शिशुपाल के साथ उसका विवाह करने की थी, जबकि रुक्मिणी की मर्जी श्रीकृष्ण के साथ विवाह करने की थी।
जीव जब भगवान की सहजता, आनन्द, मुक्तता, रसमयता जानता है तो वह भी इच्छा करता है कि मैं भगवान को ही प्राप्त हो जाऊँ। जैसे श्रीकृष्ण को सन्देशा पहुँचाने के लिए रुक्मिणी को ब्राह्मण की जरूरत पड़ी थी ऐसे ही जीव को ब्रह्मवेत्ता सदगुरू की आवश्यकता पड़ती है कि परमात्म-स्वरूप में सन्देशा पहुँचा दें।
रुक्मिणी ने पत्र लिखा तथा श्रीकृष्ण तक पहुँचाने के लिए एक ब्राह्मण को द्वारिका भेजा। ब्राह्मणदेव द्वारिका पहुँचे और पत्र दे दिया। उस पत्र में रुक्मिणी ने श्रीकृष्ण को विनती की थी कि मेरे कुटुम्बीजन मेरा विवाह ऐहिक मोह-माया में पड़े हुए, वासना के कीड़े समान राजाओं से करना चाहते हैं लेकिन मैं आपको दिल से वर चुकी।
रुक्मिणी की तरह स्त्रियाँ जब जिज्ञासु बनती हैं तब सोचती हैं कि संसार का वर हमको छोड़कर चला जाय तो हम विधवा हो जाती है अथवा हम उसको छोड़कर चली जायें तो दूसरे जन्म में दूसरे वर को वरना पड़ता है। इस देह के वर तो कितने ही जन्मों में कितने ही बदले और इस जन्म में भी न जाने कौन कितना किसके साथ रहेगा, कोई पता नहीं। इन वरों के साथ रहते हुए भी जो महिलाएँ आत्मवर को वरने के लिए तत्पर रहती हैं वे जिज्ञासु कही जाती है।
मैं
तो वरूँ मेरे
गिरधर गोपाल को,
मेरो
चुडलो अमर हो
जाय।
रुक्मिणी श्रीकृष्ण को वरना चाहती है।
यह जीव जब अपने शुद्ध, बुद्ध चैतन्यस्वरूप को वरना चाहता है तो वह प्रेम में चढ़ता है। जीव किसी हाड़-मांस के पति या पत्नी को वरकर विकारी सुख भोगना चाहता है तब वह प्रेम में पड़ता है। शरीर के द्वारा जब सुख लेने की लालच होती है तो प्रेम में पड़ता है और अन्तर्मुख होकर जब परम सुख में गोता मारने की इच्छा होती है तब वह प्रेम में चढ़ता है। प्रेम किये बना तो कोई रह ही नहीं सकता। कोई प्रेम में पड़ता है तो कोई प्रेम में चढ़ता है।
प्रेम में जो पड़े वह संसार है....... प्रेम में जो चढ़े वह साक्षात्कार है।
रुक्मिणी का सन्देशा पाकर श्रीकृष्ण प्रसन्न हुए कि यह जीव मुझे वरना चाहता है। ईश्वर का यह सहज स्वभाव है कि अगर कोई उन्हें पाना चाहे तो वे उसका हाथ पकड़ लेते हैं। किसी भी समय, कैसा भी प्रयोग करके जीव का हाथ पकड़ ही लेते हैं।
जीव जब ईश्वर का साक्षात्कार करने चलता है तब देवता लोग प्रसन्न नहीं होते, क्योंकि जीव होगा तो जन्मेगा, यज्ञ होम-हवन-पूजन करेगा, भोग चढ़ायेगा, देवताओं आदि का गाड़ा चलता रहेगा। जीव अगर साक्षात्कार करेगा तो उनके सारे प्रभावों से अलग हो जायेगा, ऊपर उठ जायगा। देवी-देवता तो नहीं चाहते कि तुम साक्षात्कार कर लो, तुम्हारे कुटुम्बीजन भी नहीं चाहते, तुम्हारी पत्नी भी नहीं चाहती और तुम्हारा पति भी नहीं चाहता। अगर तुम थोड़ा-सा ही साक्षात्कार के मार्ग पर आगे बढ़े तो टाँग खींचनेवाले तैयार ही हैं।
भक्ति के मार्ग पर, ईश्वर के मार्ग पर नहीं चलोगे तो लोग बोलेंगे नास्तिक है। थोड़ा सा चलोगे और सर्वसामान्य ढंग से मंदिर गये, घंटनाद कर दिया, आरती कर दी, टीला-टपका कर दिया, किसी संप्रदाय का भक्त कहला दिया....... तब तक तो ठीक है। जब आत्मा-परमात्मा की एकता की तरफ आगे कदम रखोगे तो कुटुम्बी लोग तुमको विघ्न डालेंगे। जो तुमको ध्यान सिखाते थे, जो तुमको मंदिर में, आश्रम में ले गये वे ही तुम्हें फिर समझाएँगे कि, 'इतनी सारी भक्ति क्या करना ? हम भी तो भक्त हैं, हम भी तो बापू के शिष्य हैं। आप जरा ध्यान-भजन करना कम-करो-कम.... ऐसे कुछ चलता है क्या ?'
जो माँ ध्यान सिखाती थी वही माँ आसुमल को समझाने लगी थी कि : 'बेटा इतना सारा भजन नहीं करना चाहिए। मुझे पड़ोसी माई बोलती है कि तुम्हारा बेटा प्रभात में भगवान के ध्यान में बैठा रहता है, रात को भी घण्टों तक बैठा रहता है। वह बहुत भजन करता है तो भगवान को बार-बार विक्षेप होता होगा। लक्ष्मीजी की सेवा लेना छोड़कर उन्हें बार-बार भगत के पास आना पड़ता होगा तो लक्ष्मीजी रूठ जायेंगी तुम्हारे घर से। अतः बेटा ! ज्यादा ध्यान भजन करना ठीक नहीं।'
भोली माँ ने हमें समझाया कि ज्यादा भक्ति नहीं करना, शायद लक्ष्मी रूठ जाय तो ?
जो लोग आपको ईश्वर के मार्ग ले जाते हैं वे ही लोग आपको रोकेंगे, यदि आपकी साधना की गाड़ी ने जोर पकड़ा तो। अगर वे लोग नहीं रोकते अथवा उनके रोकने से आप नहीं रुके तो देवता लोग कुछ-न-कुछ प्रलोभन भेजेंगे। अथवा यश आ जायगा, रिद्धि-सिद्धि आ जायेगी, सत्य-संकल्प सिद्धि आ जायगी। महसूस करोगे कि मैं जो संकल्प करता हूँ वह पूर्ण होने लगता है।
अपने आश्रम के एक साधक ने पंचेड़ (रतलाम) के आश्रम में रहकर साठ दिन का अनुष्ठान किया। छोटी-मोटी कुछ इच्छा हुई और जरा सा ऐसा हो गया। उसने गाँठ बाँध ली कि मेरे पास सत्य-संकल्प सिद्धि आ गयी। अरे भाई ! इतने में ही संतुष्ट हो गये ? साधना में रुक गये ?
सितारों
से आगे जहाँ
कुछ और भी है।
इश्क
के इम्तीहाँ
कुछ और भी हैं।।
आगे बढ़ो। यह तो केवल शुरूआत है। थोड़ी-सी संसार की लोलुपता कम होने से अन्तःकरण शुद्ध होता है। अन्तःकरण शुद्ध होता है तो कुछ-कुछ आपके संकल्प फलित होते हैं। संकल्प फलित हुआ और उसके भोग में आप पड़ गये तो आप प्रेम में पड़ जायेंगे। अगर संकल्प-फल के भोग में नहीं पड़े और परमात्मा को ही चाहा तो आप प्रेम में चढ़ जाओगे। प्रेम में पड़ना एक बात है और प्रेम में चढ़ना कोई निराली ही बात है।
थोड़ी बहुत साधना करने से पुण्य बढ़ते हैं, सुविधाएँ आ जाती है, जो नहीं बुलाते थे वे बुलाने लगेंगे, जो अपमान करते थे वे मान की निगाहों से देखने लगेंगे, किन्तु मनुष्य जन्म केवल इसीलिए नहीं है कि लोग मान से देखने लग जायें। जिसको वे देखेंगे वह (देह) भी तो स्मशान में जलकर खाक हो जायेगी भाई ! मनुष्य जन्म इसलिए भी नहीं है कि बढ़िया मकान मिल जाय रहने को।
'हमें तो ठाठ से रहना है.....।'
यह तो अहंकार पोसने की बात है। न ठाठ से रहना ठीक है न बाट से रहना ठीक है, जिससे रहने का विचार उत्पन्न होता है वह अन्तःकरण जिससे संचालित होता है उस तत्त्व को अपने आत्मा के रूप में जानना अर्थात् आत्म-साक्षात्कार करना ही ठीक है, बाकी सब मन की कल्पना है। स्वामी रामतीर्थ ने बहुत बढ़िया बात कही। वे बोलते हैं-
कोई
हाल मस्त, कोई
माल मस्त, कोई
तूती मैना सूए
में।
कोई
खान मस्त,
पहरान मस्त,
कोई राग
रागिनी दोहे
में।।
कोई
अमल मस्त, कोई
रमल मस्त, कोई
शतरंज चौपड़ जूए
में।
इक
खुद मस्ती बिन
और मस्त, सब
पड़े अविद्या
कूए में।।
कोई
अकल मस्त, कोई
शक्ल मस्त,
कोई चंचलताई
हांसी में।
कोई
वेद मस्त,
कितेब मस्त,
कोई मक्के में
कोई काशी
में।।
कोई
ग्राम मस्त, कोई
धाम मस्त, कोई
सेवक में कोई
दासी में।
इक
खुद मस्ती बिन
और मस्त, सब
बंधे अविद्या
फाँसी में।।
कोई
पाठ मस्त, कोई
ठाट मस्त, कोई
भैरों में,
कोई काली में।
कोई
ग्रंथ मस्त,
कोई पन्थ
मस्त, कोई
श्वेत पीतरंग
लाली में।।
कोई
काम मस्त, कोई
खाम मस्त, कोई
पूरन में, कोई खाली
में।
इक
खुद मस्ती बिन
और मस्त सब
बंधे अविद्या
जाली में।।
कोई
हाट मस्त, कोई
घाट मस्त, कोई
बन पर्वत ऊजारा१ में।
कोई
जात मस्त, कोई पाँत
मस्त, कोई तात भ्रात सुत दारामें।
कोई कर्म
मस्त, कोई
धर्म मस्त,
कोई मसजिद
ठाकुरद्वारा में।
इक
खुद मस्ती बिन
और मस्त, सब
बहे अविद्या
धारा में।।
कोई
साक२ मस्त,
कोई खाक मस्त,
कोई खासे में
कोई मलमल में।
कोई
योग मस्त, कोई
भोग मस्त, कोई
स्थिति में,
कोई चलचल
में।।
कोई
ऋद्धि मस्त,
कोई सिद्धि
मस्त, कोई लेन
देन की कलकल
में।
इक
खुद मस्ती बिन
और मस्त, सब
फँसे अविद्या
दलदल में।।
कोई
ऊर्ध्व मस्त,
कोई अधः मस्त,
कोई बाहर में
कोई अंतर में।
कोई
देश मस्त,
विदेश मस्त,
कोई औषध में,
कोई मन्तर
में।।
कोई
आप मस्त, कोई
ताप मस्त, कोई
नाटक चेटक
तन्तर में।
इक
खुद मस्ती
बिन, और मस्त,
सब फँसे
अविद्या जन्तर
में।।
कोई
शुष्ट३ मस्त,
कोई तुष्ट४ मस्त,
कोई दीरध में
कोई छोटे में।
कोई
गुफा मस्त,
कोई सुफा
मस्त, कोई
तूंबे में कोई
लोटे में।।
कोई
ज्ञान मस्त,
कोई ध्यान
मस्त, कोई
असली में कोई
खोटे में।
इक
खुद मस्ती
बिन, और मस्त,
सब रहे
अविद्या टोटे
में।।
१ उजाड़ बियावान २ रिश्तेदारी ३ खाली, अतृप्त ४ प्रसन्नचित्त
ऐसा रहने
का हो, ऐसा
खाने का हो,
ऐसी
इज्जत-आबरू हो
ऐसा जीवन हो
तो मजा है। I am very happy. I am very lucky.
अगले जन्म या इस जन्म का थोड़ा-बहुत ध्यान-भजन-जप-तप-पुण्य, जाने अनजाने कोई एकाग्रता फली है तो आप जरा-सा सुखी हैं, ऐहिक जगत में सामान्य जीवन जीनेवालों से आपका जीवन थोड़ा ऐश-आरामवाला होगा, जरा ठीक होगा। इसमें अगर आप सन्तुष्ट होकर बैठ गये, जीवन की सार्थकता समझकर बैठ गये तो आप अपने पैर पर कुल्हाड़ा मार रहे हैं, आप कृष्ण का वरण नहीं करना चाहते हैं।
रुक्मिणी के पास राजा की रानी होने का जीवन सामने था। शिशुपाल जैसे राजा थे जो शिशुओं के, बच्चों के पालन-पोषण में लगे रहें, स्त्री का आज्ञा मानें, स्त्री के लिए छटपटायें ऐसे कामुक लोग रुक्मिणी को मिल रहे थे। प्रेम में पड़ने के लिए उसके पास पूरा माहौल था लेकिन रुक्मिणीजी प्रेम में नहीं पड़ी। वह प्रेम में चढ़ना चाहती थी।
ऐसे ही तुम्हारी बुद्धिरूपी रुक्मिणी संसार की सुविधाओं में अगर तन्मय हो जाती है तो वह रुक्मिणी शिशुपाल के हाथ चली जायगी।
अगर वह बुद्धिरूपी रुक्मिणी कृष्ण को ही वरना चाहती है, आत्मा को ही वरना चाहती है तो फिर ब्रह्मवेत्ता को खोजेगी, छुपकर पत्र देगी। बुद्धि हृदयपूर्वक प्रार्थना करेगी और ब्रह्मवेत्तारूपी ब्राह्मण को पत्र देगी किः 'हे गुरू महाराज ! मुझे तो चारों ओर से गिराने वाले, घसीटने वाले हैं। आप मेरा सन्देशा पहुँचा दो। मुझे भगवान ही वरें, और कोई न वरे। मैं भगवान के योग्य हूँ और भगवान मेरे लिये योग्य वर हैं।
सच पूछो तो प्राणीमात्र का योग्य वर तो परमात्मा है, बाकी सब गुड्डा-गुड्डी है।
रुक्मिणी का दूसरा अर्थ है प्रकृति। प्रकृति का योग्य वर तो पुरूष ही है।
प्रकृति के देह को जब हम 'मैं' मानते हैं तो हम सब दाढ़ी-मूँछवाले रूक्मिणी हैं। कोई दाढ़ी-मूँछवाली रुक्मिणी तो कोई कम दाढ़ी-मूँछवाली रुक्मिणी तो कोई बिना दाढ़ी-मूँछवाली रुक्मिणी तो कोई चूड़ियोंवाली रुक्मिणी। हम लोग सब रुक्मिणी हैं अगर प्राकृतिक शरीर को 'मैं' मानकर प्राकृतिक पदार्थ पर ही आधारित रहते हैं तो।
रुक्मिणी को अगर बुद्धि की जगह पर रखें तो जिसकी बुद्धि संसार का सुख चाहती है वह प्रेम में पड़ती है और जिसकी बुद्धि आत्मसुख चाहती है, शुद्ध सुख चाहती है वह रुक्मिणी कृष्ण को वरती है।
अब, हमारी रुक्मिणी कहाँ है ? हमारी बुद्धिरूपी रुक्मिणी सुख-सुविधाओं में तन्मय हो जाती है कि सुखों को नश्वर समझकर, सापेक्ष समझकर, कल्पित समझकर सत्य की खोज करना चाहती है ?
बुद्धि अगर सूक्ष्म है तो सत्य की खोज करेगी। उसमें विवेक-वैराग्य होगा, मोक्ष की इच्छा होगी। अगर बुद्धि सूक्ष्म है तो आत्म विचार करना चाहिए। बुद्धि इतनी सूक्ष्म नहीं है तो आत्म-ध्यान करना चाहिएI बुद्धि आत्म-ध्यान के भी योग्य नहीं है, सूक्ष्म नहीं है, पवित्र नहीं है तो फिर श्री भगवान के गुणानुवाद गाते हुए श्रीमद् भगवदगीता, श्रीमद्भागवत आदि ग्रन्थों का पारायण करना चाहिए, अवलोकन करना चाहिए। अगर उन ग्रंथों को भी नहीं समझ सकते हैं तो कथा और सत्संग के द्वारा बुद्धि को सूक्ष्म बनाना चाहिए ताकि यह बुद्धिरूपी रुक्मिणी कृष्ण को ही वरे और कृष्ण आकर रुक्मिणी का हाथ पकड़कर अपनी बना लें।
अपनी बुद्धिरूपी रुक्मिणी को ब्रह्मरूपी कृष्ण हाथ पकड़कर अपनी बना लें। जब परमात्मा तुम्हारी बुद्धि को अपनी बना लेंगे तो वह तुम्हारी बुद्धि मन की दासी नहीं बनेगी, इन्द्रियों की गुलाम नहीं बनेगी। जो बुद्धि मन की दासी या इन्द्रियों को गुलाम नहीं बनती उस बुद्धि बाई के आगे मन-इन्द्रियाँ आज्ञाकारी चाकर हो जाते हैं। सारे सुख-सुविधाएँ उसके आगे मँडराते हैं। बुद्धि उसका यथायोग्य थोड़ा-बहुत उपयोग करके बाकी का समय बचाकर अपने ब्रह्मस्वरूप श्रीकृष्ण में खेलने लगती है।
श्रीकृष्ण जब रुक्मिणी का हाथ पकड़ लेते हैं तब एक तेजपुंज प्राप्त होता है। श्रीमद् भागवत की कथा कहती है कि रुक्मिणी जब श्रीकृष्ण को प्राप्त हुई तब समय पाकर तेजस्वी पुत्र प्रद्युम्न का जन्म हुआ। साधक की बुद्धि को जब परमात्मा पकड़ लेते हैं तब बुद्धि में निर्मल तेज प्रकट होता है।
सच्चे भक्तो को सोचने की फुरसत नहीं होती कि लोग क्या कहेंगे। जो लोग अधिक वाचाल होते हैं, अधिक बोलते हैं, चें.....चें, करते रहते हैं वे आध्यात्मिक मार्ग में जल्दी से सफल नहीं होते। रुक्मिणी पत्र में लिखती है कि मैं अपने कुलदेवी के दर्शन करने जाऊँगी, व्रत रखूँगी और हे नाथ ! गाँव के बाहर कुलदेवी के मंदिर में जाते समय आप मेरा हाथ पकड़ लेना।
ऐसे ही हम साधक अपने व्यवहार, अपने मोह-ममता में सम्बन्धों से परे, कुछ दूरी पर चले जायें और आराधना, उपासना करें उस समय हे देव ! हे परब्रह्म परमात्मा ! हमारी बुद्धिरूपी रुक्मिणी का हाथ पकड़ोगे तो आसानी हो जायेगी।
आप लोग आज घर-बार सब छोड़कर, शहर से दूर आश्रम में आये हो तो अभी तुम्हारी बुद्धिरूपी रुक्मिणी श्रीकृष्ण से मिलने में सुविधा का अनुभव करेगी। अगर भीड़-भड़ाके में यह कथा हो या इसकी केसेट सुन लो तो वह मजा नहीं आयेगा जो अभी आ रहा है।
इसलिए साधक को चाहिए कि कभी ऐसा समय निकालकर रुक्मिणी की तरह कुटुम्ब-परिवार से थोड़ा समय अलग होकर एकांत में निर्जन जगह पर जाए।
रुक्मिणी पूजा की थाली लिये जा रही है। उसकी दृष्टि नासाग्र दृष्टि है। बीच में भाई रुक्मि आता है, दूसरे लोग आते हैं तो उनसे अगर बात करनी पड़ती है तो संक्षेप में ही बात करके मंदिर की ओर आगे बढ़ती है।
बाहर से तो हाथ में पूजा की थाली है और मंदिर की तरफ आगे बढ़ रही है पर भीतर से जिज्ञासा में ऐसी तीव्रता है कि हृदयमंदिर का स्वामी कहाँ से आयेगा.... कैसे बुलाएगा.... कैसे उठायेगा !! रुक्मिणी के हृदय में बड़ी उत्सुकता है।
जीव जब ईश्वर को आमंत्रित करता है तब ईश्वर उसका हाथ पकड़ते हैं। नहीं तो चलो, खेलते हो तो खेलो।
श्रीकृष्ण ने जब रुक्मिणी के प्रार्थना-पत्र के अनुसार रुक्मिणी को स्वीकार किया तब रुक्मिणी का भाई रुक्मि तथा अन्य लोग आये। वे लोग उद्विग्न हुए। रास्ते में विरोध करने आये। रुक्मि के हथियार भगवान ने नष्ट कर दिये। वह खड्ग लेकर आया तो उसको भी ठिकाने लगा दिया। भगवान उसको सजा देने जाने लगे, वध करने जाने लगे। रुक्मिणी के चेहरे पर देखा तो वह ढीला-ढाला हो रहा था।
भक्त कैसा भी हो, जब वह परिवार के तरफ देखता है तो भक्त का हृदय भी ढीला-ढाला हो जाता है।
वहाँ बलराम रुक्मिणी को समझाते हैं कि तुमने किसको वरा है। तेरा तो स्वामी परमात्मा है, फिर कुटुम्ब के मोह में गिरती है ?
बलराम रामावतार में लक्ष्मण रूप थे और कृष्णावतार में बलराम रूप थे। वे शेषावतार हैं। 'नेति....नेति...' करके जो बच जाय वह शेष। शेष ने न रासलीला में भाग में लिया न महाभारत के संग्राम में भाग लिया। क्योंकि शेष जो ठहरे, उपराम। शेष भोला-भाला, सीधा-सादा। शेष श्रीकृष्ण की अपेक्षा थोड़ा सा अपने ढंग का था।
श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी के भाई रुक्मि को बाँध दिया। उसके बाल काट दिये। दाढ़ी-मूँछ का मुंडन कर दिया। उस जमाने में दाढ़ी-मूँछ बिना के लोगों की मश्करी होती थी। उससे बचने के लिए लोग मरना पसंद करते थे लेकिन बिना दाढ़ी-मूँछ के रहना पसन्द नहीं करते थे। रुक्मि अपने नगर नहीं गया। अपना दूसरा गाँव भोजकट बसा लिया।
ऐसे ही तुम्हारी बुद्धिरूपी रुक्मिणी जब भगवान को वरण करने जाती है तो अहंकार रूपी रुक्मि बीच में विघ्न करता है। उसको जब भगवान मारने को उद्यत होते हैं तब आपको लगता है कि भगवान मुझे मिले तो सही लेकिन मेरा Ego (अहं) न मरे। अहं नहीं मरे तो भगवान उसकी दाढ़ी-मूँछ काटकर संन्यासी बना देते हैं। संन्यासी अपने गाँव में, अपने परिवार में, अपने घर में नहीं रहते। फिर नया मठ-मंदिर-आश्रम बसाते हैं।
भगवान की कथा से तत्त्वज्ञान समझने योग्य है।
ब्रह्म और बुद्धि का जब मिलन होता है तब एक तेजपुंज साधक के जीवन में प्रकट होता है। उस तेज को अगर ठीक से न सँभाला तो तेज फिर प्रेम में पड़ जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण रुक्मिणी को ले गये और समय पाकर बड़ा तेजस्वी पुत्र प्रद्युम्न का जन्म हुआ।
शंबरासुर प्रद्युम्न को चुराकर समुद्र में डाल देता है। समुद्र में मछली प्रद्युम्न को निगल जाती है। राजा का मछुआ मछली पकड़कर रसोईघर में देता है। रसोई बनानेवाली महिला मायावती जब मछली को चीरती है तो कोई सुन्दर बालक ! बड़ा तेजस्वी! उसको देखकर उसका मन मोहित हो गयाः "तुम तो साक्षात् कामदेव हो और मैं आपकी पत्नी रति हूँ।"
रति ने उसको महामायारुपी विद्या सिखायी। उस विद्या के बल से प्रद्युम्न ने शंबरासुर का विनाश कर दिया। फिर रति के साथ आकाश मार्ग से जाकर अपने माता-पिता से मिले। रुक्मिणी ने अपने बेटे और बहू को पहचान लिया।
यह कथा दूसरी एक कथा से जुड़ी है। भगवान शिव जब आत्मरमण कर रहे थे, निष्कलंक नारायण तत्त्व में समाधिस्थ थे तब कामदेव ने शिवजी को बाण मारा। शिवजी निर्विकल्प तत्त्व में थे। वहाँ वासना का बाण असर नहीं करता। कामदेव ने दो-तीन बार प्रयास किया। शिवजी की समाधि खुली। उन्होंने तीसरा नेत्र खोला तो कामदेव जलकर भस्म हो गये। काम की पत्नी रति रोती-रोती आयीः
"मेरे पति भस्म हो गये अब मेरा क्या होगा ?"
पति मर गये उसकी चिन्ता पत्नी को नहीं होती। मेरा क्या होगा इसी बात से चिन्तित होकर रोती है।
जो आत्मारामी हैं भगवान साम्ब सदाशिव, त्रिनेत्रधारी, उनका कोप कोई अज्ञानियों की तरह नहीं होता। वह तो आ गया था क्षणभर के लिए, बहते हुए पानी में लकीर जैसा। नाराज हो गये तो भस्म कर दिया। फिर रति ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की तो राजी हो गये। बोलेः
"तेरा पति कामदेव अब अव्यक्त रूप में रहेगा।"
"प्रभो ! वे अव्यक्त तो रहेंगे लेकिन मैं पति को कैसे पाऊँ ?"
"वही कृष्णावतार में कृष्ण का पुत्र प्रद्युम्न होकर आयेगा और तुझे मिलेगा।"
यह वरदान भी सच्चा हो गया। परमात्मा की लीला, परमात्मा की शक्तियाँ, कलाएँ जिसमें जितनी विकसित होती हैं उतना ही उनका संकल्प वैसा होता है ऐसी फिर व्यवस्था हो जाती है।
देश के संसद के लोग या राज्य की विधानसभा के लोग जो कुछ कायदा-कानून बनाते हैं उसके मुताबिक व्यवस्था हो जाती हैं। लौकिक सरकार के बनाये हुए कायदे देशभर में फैल जाते हैं ऐसे ही सरकारों की भी जो सरकार है, जिनमें कलाएँ विकसित हुई हैं ऐसे भगवान शिव, भगवान कृष्ण या भगवान के परम प्यारे ब्रह्मवेत्ता, संत महापुरूष लोग जो संकल्प करते हैं, देर-सवेर उसके मुताबिक घटना घटती है।
स्वायंभुव मनु के युग में सुतपा प्रजापति थे, पृष्णी उनकी पत्नी थी। ब्रह्माजी ने सृष्टि बढ़ाने का संकल्प किया और पति-पत्नी को आशीर्वाद दिया कि प्रजा का विकास हो ऐसा कुछ करो। वे तप करने लगे।
देवकी के घर जब कृष्ण प्रकट हुए तो पहले चतुर्भुज रूप में जेल में भगवान ने दर्शन दियाः "हे माता ! हे वसुदेव ! मैंने तुम्हें वचन दिया था। तुमने मन्वन्तर के प्रारंभ में अपना जीवन सादा-सीधा, संयम से गुजारा था। गर्मी सहने में तुम पीछे नहीं हटे। सर्दी भी तुम पचा लेते थे। भूख-प्यास को भी पचा लेते थे, मान अपमान को भी पचा लेते थे। जैसे अनन्त-अनन्त सृष्टियों की उत्पत्ति होती है, स्थिति होती है, प्रलय होता है, आँधी तूफान आते-जाते हैं, उन सबको ब्रह्म पचा लेता है, जैसे आकाश सब कोलाहल को अपने में पचा लेता है और ऐसे ही हे पिता माता ! आपने सब कुछ पचा लिया था और आपकी ऐसी दिव्य योग्यता हुई कि देवों के बारह हजार वर्ष आपने वैसी उग्र तपस्या की। उस समय तुम्हारा मन हमेशा मुझमें डूबा रहता था। मैं तुम पर प्रसन्न होकर वरदान देने आया तो मेरी योगमाया ने आपकी बुद्धि को, आपकी रुक्मिणी को मेरे सगुण साकार अवतार की तरफ आकर्षित कर दिया। मेरे स्वरूप में विश्रांति पाकर मुक्ति के बजाय तुमने मुझे अपने पुत्र रूप में माँगा। तो तुम्हारे तप, तुम्हारी सहनशक्ति, तुम्हारी सच्चाई, तुम्हारे परदुःख कातरता के स्वभाव और तुम्हारे ध्यान-भजन और एकान्त चिन्तन ने मुझे इतना प्रसन्न किया कि मैंने कहाः मैं एक बार नहीं, तीन-तीन बार तुम्हारा बेटा होऊँगा, तुम संकोच मत करो।
हे माता ! तू जब पृष्णी और पिता सुतपा नाम के थे उस समय सतयुग में मैं अवतरित हुआ तो मैंने पृष्णीगर्भ नाम धारण किया था। फिर तुम अदिति और कश्यप बने थे तब मैं उपेन्द्र नाम से वामन भगवान होकर आया था। अभी तुम देवकी और वसुदेव बने हो और मैं श्रीकृष्ण बन कर आ रहा हूँ। यह मेरा चतुर्भुज रूप मैं इसलिए दिखा रहा हूँ कि तुम मानो कि मैंने जो वरदान दिया था उसके मुताबिक तुम्हारा पुत्र होकर तुम्हारा प्रेम संपादन करने आया हूँ और यह तुम्हारा आखिरी जन्म है। फिर तुम मेरे लोक को प्राप्त होगे।"
ऐसा कहकर भगवान नन्हें मुन्ने बाल-गोपाल हो गये।
भगवान वह है जो अन्धकार में प्रकाश कर दे, बन्धे हुए को छुड़ा दे, हारे हुए को आश्वासन दे दे, गिरे हुए को उठा ले, सदाचारी की सतचेतना को बढ़ा दे और दुराचारी को भी मिलने में इन्कार न करे। यह भगवान का भगवतत्त्व है।
अपि
चेदसि
पापेभ्यः
सर्वेभ्यः
पापकृत्तमः।
सर्वं
ज्ञानप्लवेनैव
वृजिनं
संतरिष्यसि।।
'यदि तू अन्य सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाला है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौका द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पाप-समुद्र से भली-भाँति तर जायेगा।'
(भगवद्
गीताः ४.३६)
भूतकाल में कैसा भी पाप हो गया हो, दुराचार हो गया हो, उस पाप और दुराचार को तथा उसके चिंतन को छोड़कर अगर तुम्हारी मतिरूपी रुक्मिणी अभी कृष्ण को वरना चाहती है तो श्रीकृष्ण सारे विघ्न-बाधाओं को चीरते हुए तुम्हारा हाथ पकड़ लेते हैं। तुम्हारी मति जब भगवान की हो जाती है तब तेजपुंजरूपी बालक का जन्म होता है, सामर्थ्य का जन्म होता है। उसको फिर इच्छा-वासनारूपी राक्षस ले जाता है और संसार समुद्र में फेंकता है। वहाँ कोई मछली अर्थात् कोई मान्यता उसे निगल जाती है। जैसे, 'मैं जगत का सुधार करूँगा.... इस्लाम खतरे में है उसे निकालूँगा..... धर्म कहीं फँस गया है उसे निकालूँगा.... उसको ऐसे करूँगा वैसे करूँगा....।'
बुद्धि जब ईश्वर को मिलने के करीब होती है तो जो प्रभाव और तेज आता है उसकी अगर सुरक्षा नहीं की तो उसको जरा चक्कर में पड़ना पड़ता है।
रुक्मिणी अपने पुत्र-पुत्रवधू को पाकर बड़ी प्रसन्न हुई। समय बीतता चला गया।
अभी प्रारंभ में आये हुए श्लोक की भूमिका बन रही है।
ऐसा कोई कार्य नहीं जिसमें श्रीकृष्ण पीछे रहे हों। युद्ध में भी उनका पहला नंबर और रणमैदान छोड़कर भागने में भी उनका पहला नंबर। शिष्य बनने में पहला नंबर और गुरू बनने में पहला नंबर। 'बारह साल व्रत रखो, उपवास करो, नियम करो फिर उपदेश मिलेगा, ज्ञान मिलेगा.....' ऐसा नहीं। युद्ध के मैदान में भी अगर जरूरी है तो उपदेश चालू। नहीं तो ब्रह्मविद्या का उपदेश ? परंपरा तो यह है कि विवेक हो, वैराग्य हो, षटसंपत्ति हो, मोक्ष की तीव्र इच्छा हो, वह अधिकारी है। उसके आगे आत्मज्ञान का उपदेश करना चाहिए। सोलह कला के पूर्णावतार में भगवान कभी-कभी इस सामान्य नियम को किनारे रख देते हैं। सामान्य नियम देश, काल, व्यक्ति के लिए है और जो देशातीत है, कालातीत है, व्यक्तित्व से परे है ऐसे पूर्णावतार के लिए ये नियम नन्हें हो जाते हैं।
कभी-कभी समाज का हित होता है तो अपना नियम तोड़ देना पड़ता है। अपना कोई छोटा-मोटा प्रण बहुजनहिताय बहुजनसुखाय वापस ले लेना पड़ता है। ऐसा करने में भगवान पीछे नहीं हटे हैं। वे रण छोड़कर भागे हैं तो भी 'रणछोड़राय की जय....!' भागते समय हृदय में कायरता नही लेकिन यहाँ भागना व्यवस्था के अनुकूल है, वरदानों के अनुकूल है तो भागने में भी पीछे नहीं रहे। वे किसी भी काम में पीछे नहीं रहे।
गुरू देखो तो श्रीकृष्ण अव्वल नंबर के और शिष्य देखो तो आहाहा.....! सांदीपनि ऋषि के आश्रम में और घोर आंगिरस मुनि के पास भगवान ब्रह्मविद्या की चर्चा सुनते हैं या मनन करते हैं तब पूरा शिष्यत्व निभाते हैं। गुरू का हृदय तो जीत लेते हैं, गुरूपत्नी की सेवा करके भी उनका आशीर्वाद पाने में पीछे नहीं हटते हैं।
खेलकूद में भी श्रीकृष्ण अव्वल नंबर। कभी गोपी की चोटी खींचकर भी उसका मन अपने तत्त्व की तरफ आकर्षित करना तो कभी गायों के बछड़े खोलकर भी उन निर्दोष बछड़ों को पोषण देना और अहंकारी, प्रजा-शोषक कंस के दूध-मक्खन में गड़बड़ कर देना।
उपदेशकों में भी श्रीकृष्ण अव्वल नंबर और प्रेमाभक्ति में भी अव्वल नंबर। प्रेम की नजर से निहारते हुए जरा-सी बँसी फूँक देते हैं तो लोगों के हृदय पुलकित हो जाते हैं।
संसारी लोग पत्नी आती है तब प्रेम में पड़ जाते हैं ऐसे श्रीकृष्ण अगर प्रेम में पड़े होते तो शिशुपाल ने उन्हें व्यभिचारी कहा होता। शिशुपाल ने श्रीकृष्ण को सौ-सौ गालियाँ दी पर उन्हें व्यभिचारी नहीं कहा, यह गाली नहीं दी। अगर वे कामासक्त हुए होते तो ऐसी गाली देने में शिशुपाल क्यों रुकता ? उसने यह नहीं कहा कि तुम दुराचारी हो, व्यभिचारी हो।
श्रीकृष्ण प्रेम में पड़े नहीं हैं लेकिन प्रेम में पड़े हुए लोगों को उठाया है। इसीलिए भगवान पूर्णावतार हैं।
प्रेम में पड़े वह जीव। प्रेम में तरे वह साधक और प्रेम में तारे वह सिद्ध।
रुक्मिणी भगवान के प्रेम में चढ़ना चाहती थी। जीव का स्वभाव है कि प्रेम में चढ़ते-चढ़ते कभी प्रेम में पड़ भी जाता है। रुक्मिणी के मन में हुआ कि मैं कितनी गोरी हूँ ! कितनी सुन्दर हूँ !
भगवान रुक्मिणी के मनोभावों को समझ गये। जीव की और कोई अंगड़ाई हो तो ईश्वर सह लेते हैं लेकिन जीव का अहंकार ईश्वर नहीं सहते, गुरू नहीं सहते। अहंकार बड़ी बाधा है।
रुक्मिणी के अहंकार को निवृत्त करने के लिए श्रीकृष्ण बात बात में रुक्मिणी को कहते हैं- "हमारा कजोड़ा हुआ है। तू गौरवर्ण है, सुन्दर है और मैं सांवला हूँ, श्यामवर्ण हूँ। कहाँ तू राजकन्या और कहाँ हम चरवाहे ! बचपन में गायें चराने का धंधा किया। युवावस्था में रथ चलाया। जरासंध आदि राजाओं से भय पाकर द्वारिका जा बसे और हमारी नगरी का मार्ग कोई जानता ही नहीं। हम ऐसी नगरी में बसे हैं।
तुम तो विदर्भनरेश भीष्मक की पुत्री, रुक्मि की बहन, तुम्हारे लिए शिशुपाल और दूसरे भोगी राजा तैयार थे। हमारे पास तो भोग के साधन भी नहीं और हमें भोग की रुचि भी नहीं। हम तो आत्मरस में तृप्त रहने वाले हैं। पुत्र में, परिवार में उदासीन रहने वाले हैं। ऐसे हमारे जैसे को वरकर तुमने बड़ी गलती की।" यहाँ श्रीकृष्ण रुक्मिणी से कहते हैं-
उदासीना
वयं नूनं न स्त्र्याप्त्यार्थकामुका: ।
आत्मलब्ध्याऽऽस्महे
पूर्णा गेहयोर्ज्योतिरक्रियाः
।।
'निश्चय ही हम उदासीन हैं। हम स्त्री, संतान और धन लोलुप नहीं हैं। निष्क्रिय और देह-गेह से सम्बन्धरहित हैं। दीपशिखा के समान साक्षीमात्र हैं। हम अपने आत्मा के साक्षात्कार से ही पूर्णकाम हैं।'
"हम प्रेम में पड़ने वाले नहीं हैं। तुमने हमारा वरण करने में जरा जल्दबाजी कर ली। खैर, अभी भी कोई बात बीती नहीं। अभी अपने योग्य किसी राजा को तुम वर सकती हो।"
जीव के भीतर कोई बात छुपी हुई होती है तो उसे ऐसी वैसी बात कहकर उसके अन्तःकरण से बात निकालने के लिए ईश्वर और गुरू ऐसी लीला किया करते हैं।
श्रीकृष्ण ने रुक्मिणी को जब यह बात कही तो वह बेहोश हो गई। वह भगवान की भक्त तो थी ही। पवित्र बुद्धि को थोड़ा-सा भी कह दो तो वह सचेत हो जाती है। रुक्मिणी भगवान को पंखा झलते-झलते बेहोश हो गई तो भगवान पलंग से नीचे उतरे और अपने पीतांबर से रुक्मिणी को पंखा झलने लगे, मुँह पर पानी छिड़का। उसे जगाने लगेः
"ऐ रुक्मिणी ! रुक्मिणी ! तू क्या करती है ? गृहस्थ जीवन में कभी-कभी विनोद, आनन्द-प्रमोद करने के लिए ऐसी बातचीत होती है। तेरे अंतर के भावों को निहारने के लिए और विनोद के लिए मैंने ऐसा कहा। तेरा मेरे प्रति कितना स्नेह है, मैं जानता हूँ। तू धन्य है। तेरे लिए इतनी-इतनी सुख-सुविधाएँ थी, राजसुख था, तुझे वरण करने के लिए इतने राजा उत्सुक थे फिर भी तूने मेरा वरण किया, तुझे धन्यवाद है। मैं तुझे पहचानता हूँ। इसीलिए तो मैं भागा-भागा तेरा हाथ पकड़ने को आया था। रुक्मिणी ! मैंने तो यह विनोद मात्र किया था। तू सच्चा समझकर बेहोश हो गई ? यह सारा संसार विनोद मात्र है और मेरी इस बात को सच्ची समझकर तू बेहोश होती है ? हे रुक्मिणी ! तू अपने होश में आ जा।"
अर्थात् हे बुद्धि ! तू अपने शुद्ध होश में आ जा। संसार की बातों में बेहोश मत हो।
तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारी रुक्मिणी होश में आ जाय ऐसी श्रीकृष्ण की और सदगुरूओं की इच्छा है।
रुक्मिणी सचेत हुई। जाग्रत होकर भगवान से बोलीः
''स्वामी ! आप जो कहते हैं वह बिल्कुल यथार्थ कहते हैं। हमारा कजोड़ा हुआ है। कहाँ तो मैं हाड़-मांस की देह में रमण करने वाली और कहाँ आप आत्मारामी..... निष्कलंक निजानन्द में रमण करने वाले ? आप कहते हैं कि हमारे नगर का रास्ता कोई नहीं जानता। हे प्रभु ! आप अंतर्यामी सर्वनियंता हैं और हृदय-गुहा में रहते हैं। इसलिए रजोगुणी-तमोगुणी राजा और मोहपाश में बंधे हुए जीव आपके गाँव का मार्ग नहीं जानते हैं। कोई विरला जिज्ञासु गुरू प्रसाद से आपके गाँव पहुँचने का प्रयास करता है तब द्वारका से निकलकर कृपा करके उसका हाथ पकड़ते हो तभी मुलाकात होती है। आपने यथार्थ कहा है देव !
आपका हमारा कजोड़ा हुआ है इसमें दूसरी बात यह है कि हे प्रभु ! मैं मति, छोटी-छोटी बातों में उलझने वाली और आप मति के साक्षी, अनन्त-अनन्त मतियाँ जिससे प्रकट हो-होकर लीन हो जाय। कहाँ एक बूँद और कहाँ महासागर ! यह तो कजोड़ा ही है लेकिन आपकी उदारता से सुन्दर जोड़ा बना लिया है तो हे नाथ ! यह सजोड़ा बना ही रहे ऐसी कृपा करना।
हे स्वामी ! आपने कहा कि राजा आपका द्रोह करते हैं। हे प्रभु ! आपकी यह बात भी यथार्थ है। जो धन के मद में है, सत्ता के मद में हैं वे सच्चिदानंद परमात्म-रस से विमुख हैं, वे आपका द्रोह करते हैं।
हे नाथ ! आप कहते हैं कि हम एकाकी आत्मारामी हैं। तो आप एकाकी हैं, अनेकों में भी सब आप ही दिखते हैं। अनेक अन्तःकरणों में, अनेक मनों में, अनेक आँखों में आप एकाकी सत् चित् आनन्द स्वरूप देखने वाले हैं। अनेक में आप ही तो हैं। अनेक वृक्षों में रस लेने की सत्ता आप हैं, अनेक पक्षियों में किलोल करने की सत्ता आप हैं। अनेक आँखों में देखने की सत्ता आप ही की है। अनेक मनों में संकल्प-विकल्प के साक्षी आप हैं। अनेक बुद्धियों के उदभवस्थान आप हैं। अनेक सृष्टियों की उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय के आधारभूत अधिष्ठान आप हैं। इसलिए आप एकाकी हैं।
श्रीकृष्ण ने कहा था कि हम तो उदासीन हैं। स्त्री, पुत्र-परिवार, धन आदि से अनासक्त हैं।
साधक को चाहिए की वह स्त्री का पालन-पोषण तो करे, बच्चों को ठीक से देखभाल, पढ़ाई-लिखाई करे, करवाये मगर भीतर से उदासीन भी रहे। उद्=ऊँचा अर्थात् परमात्मा। उस परमात्मा में आसीन हुआ करे।
जब साधक की मति उदासीन होगी, परमात्मा में आसीन होगी तब उसकी मति से पुकार होगी किः "हे परमात्मा ! मैं तो तुझे ही वरूँ , तुझे ही पाऊँ।"
भगवान कहते हैं: "हे रुक्मिणी ! मैं तुझे वरदान देता हूँ। श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ है 'वरदान'। वर माना अभीष्ट। अभीष्ट का दान = वरदान। मैं तुझे वरदान देता हूँ और वरदान में श्रेष्ठ-से-श्रेष्ठ होता है अपने आपको दे डालना। मैं तुझे अपने-आपका ही दान दे डालता हूँ।"
श्रीकृष्ण की राजनीति से और श्रीकृष्ण के व्यवहार से भारत ने अगर ठीक से प्रेरणा पा ली होती तो अभी ५५ साल में अपने भारत देश का विश्वभर की महान् सत्ताओं में पहला नंबर होता । श्रीकृष्ण का जीवन ऐसा था। हम लोगों नें श्रीकृष्ण की समता और राजनीति से पूरा लाभ उठाया होता तो विश्व में हमारे देश का अव्वल नंबर होता। हम लोगों ने क्या किया ? कृष्ण कन्हैया को मक्खन धर दियाः "कृष्ण कन्हैयालाल की जय.....।" फिर मक्खन बाँटा तो जो अपना कीका है उधर हाथ ज्यादा गया, पड़ोसी के कीके की तरफ हाथ कम गया। 'हम भगत हैं' ऐसा कहलाने की लालच हो गई। हम 'उदासीन' नहीं हुए, आसक्त हो गये। माया में पड़ गये।
तुलसीदास जी महाराज कहते हैं
मोहनिशा
सब सोवनहारा।
देखहिं
सपने अनेक
प्रकारा।।
गंगापुत्र भीष्म पितामह गंगाद्वार-हरिद्वार में तप करने गये। तप करते-करते उनका तन कृश हो गया। उनका प्रेम संसार की तरफ न पड़ते हुए ऊपर की ओर उठा, परमात्मा के तरफ गया।
योग साधकों और योगी पुरुषों का अनुभव होता है कि मन और प्राण जब ऊपर के केन्द्रों में होते हैं तब निर्भीक और सत्य-संकल्प के सामर्थ्यवान होने लगते हैं। क्षुद्र आकांक्षाओं से मन और प्राण नीचे के केन्द्रों में रहते हैं। जब काम-वासना होती है तब मन और प्राण नीचे के केन्द्रों में आ जाते हैं। जब आप शुद्ध भाव में होते हो तब ऊपर के केन्द्रों में होते हो।
उपवास आदि मन और प्राण को ऊपर उठाने में सहयोगी हैं। शरीर में दोष न हो तो उपवास से चित्त एकाग्र होता है। अलबत्ता, उपवास यथायोग्य करना चाहिए।
उपवास, प्राणायाम, धारणा, ध्यान आदि करके गंगापुत्र भीष्म ने गंगाद्वार-हरिद्वार में तपस्या की। तपस्या का यह मतलब नहीं कि नंगे पैर चलना, पानी उबालकर पीना। तपस्याएँ कई प्रकार की होती हैं: शारीरिक तप, मानसिक तप आदि। सब तपों में श्रेष्ठ तप माना गया है एकाग्रता। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य ने कहाः
'मन-इन्द्रियों को संयत करके एकाग्रचित्त होना सब धर्मों में श्रेष्ठ धर्म है, सब तपों में श्रेष्ठ तप है।
तपः
सु सर्वेषु
एकाग्रता परं
तपः।
भीष्म ने एकाग्रतापूर्वक समाधि की। उनका संकल्प था कि भगवान ब्रह्माजी प्रसन्न हों। संकल्प के अनुसार आपका चित्त जब एकाकार होता है तब जिसके प्रति आपका संकल्प होता है उसको संकल्पपूर्ति के लिए आमंत्रित कर देता है।
भगवान ब्रह्माजी ने अपने मानस पुत्र पुलस्त्य को बुलाया। आदेश दिया किः "गंगापुत्र गंगाद्वार में तप कर रहे हैं। उनकी सब मनोकामनाएँ पूर्ण होने का वरदान दे आओ। वे जो चाहते हैं वह जाकर दे आओ।"
आकाश मार्ग से महातेजवान भगवान ब्रह्माजी के मानस पुत्र पुलस्त्य ऋषि आये और गंगापुत्र को कहाः
"हमारे पिता ब्रह्माजी आपके तप से खूब प्रसन्न हैं। आप क्या चाहते हैं ?"
तब भीष्म कहते हैं: "हम चाहते हैं कि हमको सत्संग मिल जाय।"
जीव के पास धन न हो, सत्ता न हो और उसको तरना हो तो क्या करे ? व्रत भी एक बड़ा साधन है, भगवन्नाम का जप भी एक बड़ा साधन है। जीव को जल्दी मोक्ष चाहिए तो वह क्या करे ?
राजनीति के प्रश्न, समाज के उद्धार के प्रश्न और जीव के मुक्त होने के प्रश्न, तमाम प्रकार के प्रश्न भीष्म ने पूछे और सत्संगति की।
यह प्रश्नोत्तर पद्मपुराण में एकत्रित है।
भीष्म की तपस्या से साधकों को प्रकाश मिलता है कि अगर किसी सत्संग में आत्मज्ञान का सूक्ष्म रहस्य मिल जाय, ज्ञान-प्रकाश मिल जाय तो ठीक है, अन्यथा सत्संग प्राप्ति के लिए तप करना चाहिए और तप से संतुष्ट होकर भगवान किसी-न-किसी अपने प्यारे संत को भेजकर आपके जीवन में ज्ञान का प्रकाश कर देते हैं।
सत्संगति से गंगापुत्र भीष्म के जीवन में ऐसा ज्ञान का प्रकाश हो गया कि महाभारत के युद्ध के बाद बावन दिन तक बाणों की शय्या पर रह सके।
भीष्म पितामह जब बानों की शय्या पर पड़े थे तब धर्मराज युधिष्ठिर श्रीकृष्ण के दर्शन करने गये। देखा तो श्रीकृष्ण ध्यानमग्न हैं। युधिष्ठिर चकित हो गये कि त्रिलोकी जिनका ध्यान करती हैं ऐसे पूर्णावतार त्रिलोकीनाथ भगवान श्रीकृष्ण किनका ध्यान कर रहे हैं।
भगवान जब ध्यान से उठे तो युधिष्ठिर बोलेः
"भगवान ! मैं जो पूछने आया हूँ वह तो बाद में पूछ लूँगा पर अब मेरा प्रश्न है कि आप किसका ध्यान कर रहे थे ?"
"मैं ध्यान कर रहा था भीष्म पितामह का। वे अभी बाणों की शय्या पर पड़े हैं और अन्तःकरणपूर्वक मेरा ध्यान कर रहे हैं। हे युधिष्ठिर ! इस समय पृथ्वी पर भीष्म जैसा राजनीतिज्ञ दूसरा कोई नहीं, भीष्म जैसा धर्म-धुरंधर कोई नहीं, भीष्म जैसा वीर कोई क्षत्रिय नहीं, भीष्म जैसा इस लोक और परलोक के कल्याण के मार्ग का ज्ञाता कोई नहीं। अभी भीष्म का अन्त समय है इसलिए तुम वहाँ चलो और भीष्म से कुछ ज्ञान पा लो।"
श्रीकृष्ण सलाह दे रहे हैं धर्मराज युधिष्ठिर को।
युधिष्ठिर कहने लगे किः "भीष्म पितामह अपने प्रतिपक्ष में थे। हमारे सैन्य ने उन्हें बाणों से बींधा है। हम उनके पास जाएँगे तो वे कुपित हो जाएँगे और शाप दे देंगे।"
श्रीकृष्ण : "नहीं, वे कुपित नहीं होंगे। वे जानते हैं कि जो होने वाला था वही हुआ। वे राग-द्वेष से रहित महापुरूष हैं।"
युद्ध के पहले श्रीकृष्ण संधि-दूत बनकर गये थे। संधि कराने में असफल रहे, क्योंकि जो होनेवाला था उस तरतीव्र को कौन रोके ? श्रीकृष्ण को उद्वेग नहीं हुआ कि हाय रे हाय ! मैं असफल हो गया। '