
हम धनवान
होंगे या
नहीं, यशस्वी
होंगे या नहीं,
चुनाव
जीतेंगे या
नहीं इसमें
शंका हो सकती
है परन्तु
भैया ! हम
मरेंगे या
नहीं इसमें
कोई शंका है?
विमान उड़ने
का समय
निश्चित होता
है, बस चलने का
समय निश्चित
होता है,
गाड़ी छूटने
का समय निश्चित
होता है
परन्तु इस
जीवन की गाड़ी
के छूटने का
कोई निश्चित
समय है?
आज तक आपने
जगत का जो कुछ
जाना है, जो
कुछ प्राप्त
किया है.... आज के
बाद जो जानोगे
और प्राप्त करोगे,
प्यारे भैया ! वह
सब मृत्यु के
एक ही झटके
में छूट
जायेगा, जाना
अनजाना हो
जायेगा,
प्राप्ति
अप्राप्ति
में बदल
जायेगी |
अतः सावधान
हो जाओ |
अन्तर्मुख
होकर अपने
अविचल आत्मा
को, निजस्वरूप
के अगाध आनन्द
को, शाश्वत
शांति को
प्राप्त कर लो | फिर तो आप ही
अविनाशी
आत्मा हो |
जागो.... उठो.....
अपने भीतर
सोये हुए
निश्चयबल को
जगाओ |
सर्वदेश,
सर्वकाल में
सर्वोत्तम
आत्मबल को अर्जित
करो | आत्मा
में अथाह
सामर्थ्य है | अपने को
दीन-हीन मान
बैठे तो विश्व
में ऐसी कोई
सत्ता नहीं जो
तुम्हे ऊपर
उठा सके |
अपने
आत्मस्वरूप
में
प्रतिष्ठित
हो गये तो त्रिलोकी
में ऐसी कोई
हस्ती नहीं जो
तुम्हे दबा
सके |
सदा स्मरण
रहे कि
इधर-उधर
वृत्तियों के
साथ तुम्हारी
शक्ति भी
बिखरती रहती
है | अतः
वृत्तियों को
बहकाओ नहीं | तमाम
वृत्तियों को
एकत्रित करके
साधना-काल में
आत्मचिन्तन
में लगाओ और
व्यवहार काल
में जो कार्य
करते हो उसमें
लगाओ |
दत्तचित्त
होकर हर कोई
कार्य करो | सदा शान्त
वृत्ति धारण
करने का
अभ्यास करो | विचारवन्त
और प्रसन्न
रहो |
जीवमात्र को
अपना स्वरूप
समझो | सबसे
स्नेह रखो | दिल को
व्यापक रखो | आत्मनिष्ठा
में जगे हुए
महापुरुषों
के सत्संग तथा
सत्साहित्य
से जीवन की
भक्ति और
वेदान्त से
पुष्ट तथा
पुलकित करो |
श्रीमद् भगवदगीता के विषय में जानने योग्य विचार
गीता में श्रीकृष्ण भगवान के नामों के अर्थ
अध्याय चौथाः ज्ञानकर्मसन्यासयोग
पाँचवाँ अध्यायः कर्मसंन्यासयोग
तेरहवाँ अध्यायः क्षेत्रक्षत्रज्ञविभागयोग
चौदहवाँ अध्यायः गुणत्रयविभागयोग
पंद्रहवाँ अध्यायः पुरुषोत्तमयोग
सोलहवाँ अध्यायः दैवासुरसंपद्विभागयोग
सत्रहवाँ अध्यायः श्रद्धात्रयविभागयोग
अठारहवाँ अध्यायः मोक्षसंन्यासयोग
गीता
मे हृदयं
पार्थ गीता मे
सारमुत्तमम्।
गीता
मे
ज्ञानमत्युग्रं
गीता मे
ज्ञानमव्ययम्।।
गीता
मे चोत्तमं
स्थानं गीता
मे परमं पदम्।
गीता
मे परमं
गुह्यं गीता
मे परमो
गुरुः।।
गीता मेरा
हृदय है |
गीता मेरा
उत्तम सार है | गीता मेरा
अति उग्र
ज्ञान है | गीता मेरा
अविनाशी
ज्ञान है | गीता मेरा
श्रेष्ठ
निवासस्थान
है | गीता
मेरा परम पद
है | गीता
मेरा परम
रहस्य है | गीता मेरा
परम गुरु है |
भगवान
श्री कृष्ण
गीता
सुगीता
कर्तव्या
किमन्यैः
शास्त्रविस्तरैः।
या
स्वयं
पद्मनाभस्य मुखपद्माद्विनिःसृता।।
जो अपने आप
श्रीविष्णु
भगवान के
मुखकमल से निकली
हुई है वह
गीता अच्छी
तरह कण्ठस्थ
करना चाहिए | अन्य
शास्त्रों के
विस्तार से
क्या लाभ?
महर्षि
व्यास
गेयं
गीतानामसहस्रं
ध्येयं
श्रीपतिरूपमजस्रम्
।
नेयं
सज्जनसंगे
चित्तं देयं
दीनजनाय च
वित्तम ।।
गाने योग्य
गीता तो श्री
गीता का और
श्री विष्णुसहस्रनाम
का गान है | धरने योग्य
तो श्री
विष्णु भगवान
का ध्यान है | चित्त तो
सज्जनों के
संग पिरोने
योग्य है और वित्त
तो दीन-दुखियों
को देने योग्य
है |
श्रीमद्
आद्य
शंकराचार्य
गीता में
वेदों के
तीनों काण्ड
स्पष्ट किये
गये हैं अतः
वह मूर्तिमान
वेदरूप हैं और
उदारता में तो
वह वेद से भी
अधिक है |
अगर कोई
दूसरों को
गीताग्रंथ
देता है तो
जानो कि उसने
लोगों के लिए
मोक्षसुख का
सदाव्रत खोला
है |
गीतारूपी
माता से
मनुष्यरूपी
बच्चे वियुक्त
होकर भटक रहे
हैं | अतः
उनका मिलन कराना
यह तो सर्व
सज्जनों का
मुख्य धर्म है |
संत
ज्ञानेश्वर
'श्रीमद्
भगवदगीता'
उपनिषदरूपी
बगीचों में से
चुने हुए
आध्यात्मिक
सत्यरूपी
पुष्पों से
गुँथा हुआ
पुष्पगुच्छ
है |
स्वामी
विवेकानन्द
इस अदभुत
ग्रन्थ के 18
छोटे
अध्यायों में
इतना सारा
सत्य, इतना
सारा ज्ञान और
इतने सारे
उच्च, गम्भीर
और सात्त्विक
विचार भरे हुए
हैं कि वे
मनुष्य को
निम्न-से-निम्न
दशा में से
उठा कर देवता
के स्थान पर
बिठाने की
शक्ति रखते
हैं | वे
पुरुष तथा
स्त्रियाँ
बहुत
भाग्यशाली हैं
जिनको इस
संसार के
अन्धकार से
भरे हुए सँकरे
मार्गों में
प्रकाश देने
वाला यह
छोटा-सा लेकिन
अखूट तेल से
भरा हुआ
धर्मप्रदीप
प्राप्त हुआ
है |
महामना
मालवीय जी
एक बार
मैंने अपना
अंतिम समय
नजदीक आया हुआ
महसूस किया तब
गीता मेरे लिए
अत्यन्त
आश्वासनरूप
बनी थी |
मैं जब-जब
बहुत भारी
मुसीबतों से
घिर जाता हूँ
तब-तब मैं
गीता माता के
पास दौड़कर
पहुँच जाता
हूँ और गीता
माता में से
मुझे समाधान न
मिला हो ऐसा
कभी नहीं हुआ है |
महात्मा
गाँधी
जीवन के
सर्वांगीण
विकास के लिए
गीता ग्रंथ अदभुत
है | विश्व
की 578 भाषाओं
में गीता का
अनुवाद हो
चुका है | हर
भाषा में कई
चिन्तकों,
विद्वानों और
भक्तों ने
मीमांसाएँ की
हैं और अभी भी
हो रही हैं, होती
रहेंगी |
क्योंकि इस
ग्रन्थ में सब
देशों,
जातियों, पंथों
के तमाम
मनुष्यों के
कल्याण की
अलौकिक सामग्री
भरी हुई है | अतः हम सबको
गीताज्ञान
में अवगाहन
करना चाहिए | भोग, मोक्ष,
निर्लेपता,
निर्भयता आदि
तमाम दिव्य गुणों
का विकास करने
वाला यह गीता
ग्रन्थ विश्व
में अद्वितिय
है |
पूज्यपाद
स्वामी श्री
लीलाशाहजी
महाराज
प्राचीन युग
की सर्व रमणीय
वस्तुओं में
गीता से
श्रेष्ठ कोई
वस्तु नहीं है | गीता में
ऐसा उत्तम और
सर्वव्यापी
ज्ञान है कि
उसके रचयिता
देवता को
असंख्य वर्ष
हो गये फिर भी
ऐसा दूसरा एक
भी ग्रन्थ
नहीं लिखा गया
है |
अमेरिकन
महात्मा थॉरो
थॉरो के
शिष्य,
अमेरिका के
सुप्रसिद्ध
साहित्यकार
एमर्सन को भी
गीता के लिए,
अदभुत आदर था | 'सर्वभुतेषु
चात्मानं
सर्वभूतानि
चात्मनि' यह
श्लोक पढ़ते
समय वह नाच
उठता था |
बाईबल का
मैंने यथार्थ
अभ्यास किया
है | उसमें
जो
दिव्यज्ञान
लिखा है वह
केवल गीता के
उद्धरण के रूप
में है |
मैं ईसाई होते
हुए भी गीता
के प्रति इतना
सारा आदरभाव
इसलिए रखता
हूँ कि जिन
गूढ़ प्रश्नों
का समाधान
पाश्चात्य
लोग अभी तक
नहीं खोज पाये
हैं, उनका
समाधान गीता
ग्रंथ ने शुद्ध
और सरल रीति
से दिया है | उसमें कई
सूत्र अलौकिक
उपदेशों से
भरूपूर लगे
इसीलिए गीता
जी मेरे लिए
साक्षात्
योगेश्वरी
माता बन रही
हैं | वह तो
विश्व के तमाम
धन से भी नहीं
खरीदा जा सके
ऐसा भारतवर्ष
का अमूल्य
खजाना है |
एफ.एच.मोलेम
(इंग्लैन्ड)
भगवदगीता
ऐसे दिव्य
ज्ञान से
भरपूर है कि
उसके अमृतपान
से मनुष्य के
जीवन में
साहस, हिम्मत,
समता, सहजता,
स्नेह, शान्ति
और धर्म आदि
दैवी गुण
विकसित हो उठते
हैं, अधर्म और
शोषण का
मुकाबला करने
का सामर्थ्य आ
जाता है |
अतः प्रत्येक
युवक-युवती को
गीता के श्लोक
कण्ठस्थ करने
चाहिए और उनके
अर्थ में गोता
लगा कर अपने
जीवन को तेजस्वी
बनाना चाहिए |
पूज्यपाद
संत श्री
आसारामजी
बापू
श्री
गणेशाय नमः
धरोवाच
भगवन्परमेशान
भक्तिरव्यभिचारिणी
।
प्रारब्धं
भुज्यमानस्य
कथं भवति हे प्रभो
।।1।।
श्री पृथ्वी
देवी ने पूछाः
हे भगवन ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! प्रारब्धकर्म को भोगते हुए मनुष्य को एकनिष्ठ भक्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?(1)
श्रीविष्णुरुवाच
प्रारब्धं
भुज्यमानो हि
गीताभ्यासरतः
सदा ।
स
मुक्तः स सुखी
लोके कर्मणा
नोपलिप्यते ।।2।।
श्री विष्णु
भगवान बोलेः
प्रारब्ध को
भोगता हुआ जो
मनुष्य सदा
श्रीगीता के
अभ्यास में
आसक्त हो वही
इस लोक में
मुक्त और सुखी
होता है तथा
कर्म में
लेपायमान नहीं
होता |(2)
महापापादिपापानि
गीताध्यानं
करोति चेत् ।
क्वचित्स्पर्शं
न कुर्वन्ति
नलिनीदलमम्बुवत्
।।3।।
जिस प्रकार
कमल के पत्ते
को जल स्पर्श
नहीं करता उसी
प्रकार जो
मनुष्य
श्रीगीता का
ध्यान करता है
उसे
महापापादि
पाप कभी
स्पर्श नहीं
करते |(3)
गीतायाः
पुस्तकं यत्र
पाठः
प्रवर्तते।
तत्र
सर्वाणि
तीर्थानि
प्रयागादीनि
तत्र वै।।4।।
जहाँ
श्रीगीता की
पुस्तक होती
है और जहाँ
श्रीगीता का
पाठ होता है
वहाँ
प्रयागादि
सर्व तीर्थ
निवास करते
हैं |(4)
सर्वे
देवाश्च ऋषयो
योगिनः
पन्नगाश्च
ये।
गोपालबालकृष्णोsपि
नारदध्रुवपार्षदैः
।।
सहायो
जायते शीघ्रं
यत्र गीता
प्रवर्तते ।।5।।
जहाँ
श्रीगीता
प्रवर्तमान
है वहाँ सभी
देवों,
ऋषियों, योगियों,
नागों और
गोपालबाल
श्रीकृष्ण भी
नारद, ध्रुव
आदि सभी
पार्षदों
सहित जल्दी ही
सहायक होते
हैं |(5)
यत्रगीताविचारश्च
पठनं पाठनं
श्रुतम् ।
तत्राहं
निश्चितं
पृथ्वि
निवसामि सदैव
हि ।।6।।
जहाँ श्री
गीता का
विचार, पठन,
पाठन तथा
श्रवण होता है
वहाँ
हे पृथ्वी ! मैं
अवश्य निवास
करता हूँ | (6)
गीताश्रयेऽहं
तिष्ठामि
गीता मे
चोत्तमं
गृहम्।
गीताज्ञानमुपाश्रित्य
त्रींल्लोकान्पालयाम्यहंम्।।7।।
मैं
श्रीगीता के
आश्रय में
रहता हूँ,
श्रीगीता
मेरा उत्तम घर
है और
श्रीगीता के
ज्ञान का आश्रय
करके मैं
तीनों लोकों
का पालन करता
हूँ |(7)
गीता
मे परमा
विद्या
ब्रह्मरूपा न
संशयः।
अर्धमात्राक्षरा
नित्या
स्वनिर्वाच्यपदात्मिका।।8।।
श्रीगीता
अति अवर्णनीय
पदोंवाली,
अविनाशी, अर्धमात्रा
तथा
अक्षरस्वरूप,
नित्य,
ब्रह्मरूपिणी
और परम
श्रेष्ठ मेरी
विद्या है
इसमें सन्देह
नहीं है |(8)
चिदानन्देन
कृष्णेन
प्रोक्ता
स्वमुखतोऽर्जुनम्।
वेदत्रयी
परानन्दा
तत्त्वार्थज्ञानसंयुता।।9।।
वह श्रीगीता
चिदानन्द
श्रीकृष्ण ने
अपने मुख से
अर्जुन को कही
हुई तथा तीनों
वेदस्वरूप, परमानन्दस्वरूप
तथा
तत्त्वरूप
पदार्थ के ज्ञान
से युक्त है |(9)
योऽष्टादशजपो
नित्यं नरो
निश्चलमानसः।
ज्ञानसिद्धिं
स लभते ततो
याति परं
पदम्।।10।।
जो मनुष्य
स्थिर मन वाला
होकर नित्य
श्री गीता के 18
अध्यायों का
जप-पाठ करता
है वह ज्ञानस्थ
सिद्धि को
प्राप्त होता
है और फिर परम
पद को पाता है |(10)
पाठेऽसमर्थः
संपूर्णे
ततोऽर्धं
पाठमाचरेत्।
तदा
गोदानजं
पुण्यं लभते
नात्र
संशयः।।11।।
संपूर्ण पाठ
करने में
असमर्थ हो तो
आधा पाठ करे,
तो भी गाय के
दान से होने
वाले पुण्य को
प्राप्त करता
है, इसमें
सन्देह नहीं |(11)
त्रिभागं
पठमानस्तु
गंगास्नानफलं
लभेत्।
षडंशं
जपमानस्तु
सोमयागफलं
लभेत्।।12।।
तीसरे भाग
का पाठ करे तो
गंगास्नान का
फल प्राप्त
करता है और
छठवें भाग का
पाठ करे तो
सोमयाग का फल
पाता है |(12)
एकाध्यायं
तु यो नित्यं
पठते
भक्तिसंयुतः।
रूद्रलोकमवाप्नोति
गणो भूत्वा
वसेच्चिरम।।13।।
जो मनुष्य
भक्तियुक्त
होकर नित्य एक
अध्याय का भी
पाठ करता है,
वह रुद्रलोक
को प्राप्त होता
है और वहाँ
शिवजी का गण
बनकर चिरकाल
तक निवास करता
है |(13)
अध्याये
श्लोकपादं वा
नित्यं यः
पठते नरः।
स
याति नरतां
यावन्मन्वन्तरं
वसुन्धरे।।14।।
हे पृथ्वी ! जो
मनुष्य नित्य
एक अध्याय एक
श्लोक अथवा
श्लोक के एक
चरण का पाठ
करता है वह
मन्वंतर तक
मनुष्यता को प्राप्त
करता है |(14)
गीताया
श्लोकदशकं
सप्त पंच
चतुष्टयम्।
द्वौ
त्रीनेकं
तदर्धं वा
श्लोकानां यः
पठेन्नरः।।15।।
चन्द्रलोकमवाप्नोति
वर्षाणामयुतं
ध्रुवम्।
गीतापाठसमायुक्तो
मृतो
मानुषतां
व्रजेत्।।16।।
जो मनुष्य
गीता के दस,
सात, पाँच, चार,
तीन, दो, एक या
आधे श्लोक का
पाठ करता है
वह अवश्य दस
हजार वर्ष तक चन्द्रलोक
को प्राप्त
होता है |
गीता के पाठ
में लगे हुए
मनुष्य की अगर
मृत्यु होती
है तो वह (पशु
आदि की अधम
योनियों में न
जाकर) पुनः
मनुष्य जन्म
पाता है |(15,16)
गीताभ्यासं
पुनः कृत्वा
लभते
मुक्तिमुत्तमाम्।
गीतेत्युच्चारसंयुक्तो
म्रियमाणो
गतिं लभेत्।।17।।
(और वहाँ)
गीता का पुनः
अभ्यास करके
उत्तम मुक्ति
को पाता है | 'गीता' ऐसे
उच्चार के साथ
जो मरता है वह
सदगति को पाता
है |
गीतार्थश्रवणासक्तो
महापापयुतोऽपि
वा।
वैकुण्ठं
समवाप्नोति
विष्णुना सह
मोदते।।18।।
गीता का अर्थ
तत्पर सुनने
में तत्पर बना
हुआ मनुष्य
महापापी हो तो
भी वह वैकुण्ठ
को प्राप्त
होता है और
विष्णु के साथ
आनन्द करता है |(18)
गीतार्थं
ध्यायते
नित्यं
कृत्वा
कर्माणि भूरिशः।
जीवन्मुक्तः
स विज्ञेयो
देहांते परमं
पदम्।।19।।
अनेक कर्म
करके नित्य
श्री गीता के
अर्थ का जो
विचार करता है
उसे
जीवन्मुक्त
जानो | मृत्यु
के बाद वह परम
पद को पाता है |(19)
गीतामाश्रित्य
बहवो भूभुजो
जनकादयः।
निर्धूतकल्मषा
लोके गीता
याताः परं
पदम्।।20।।
गीता का
आश्रय करके
जनक आदि कई
राजा पाप रहित
होकर लोक में
यशस्वी बने
हैं और परम पद
को प्राप्त
हुए हैं |(20)
गीतायाः
पठनं कृत्वा
माहात्म्यं
नैव यः पठेत्।
वृथा
पाठो
भवेत्तस्य
श्रम एव
ह्युदाहृतः।।21।।
श्रीगीता का
पाठ करके जो
माहात्म्य का
पाठ नहीं करता
है उसका पाठ
निष्फल होता
है और ऐसे पाठ
को श्रमरूप
कहा है |(21)
एतन्माहात्म्यसंयुक्तं
गीताभ्यासं
करोति यः।
स
तत्फलमवाप्नोति
दुर्लभां
गतिमाप्नुयात्।।22।।
इस
माहात्म्यसहित
श्रीगीता का
जो अभ्यास करता
है वह उसका फल
पाता है और
दुर्लभ गति को
प्राप्त होता
है |(22)
सूत
उवाच
माहात्म्यमेतद्
गीताया मया
प्रोक्तं
सनातनम्।
गीतान्ते
पठेद्यस्तु
यदुक्तं
तत्फलं लभेत्।।23।।
सूत जी
बोलेः
गीता का यह
सनातन
माहात्म्य
मैंने कहा | गीता पाठ के
अन्त में जो
इसका पाठ करता
है वह उपर्युक्त
फल प्राप्त
करता है |(23)
इति
श्रीवाराहपुराणे
श्रीमद्
गीतामाहात्म्यं
संपूर्णम्।
इति
श्रीवाराहपुराण
में श्रीमद्
गीता
माहात्म्य
संपूर्ण।।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
श्रीगीतामाहात्म्य
का अनुसंधान
शौनक
उवाच
गीतायाश्चैव
माहात्म्यं
यथावत्सूत मे
वद।
पुराणमुनिना
प्रोक्तं
व्यासेन
श्रुतिनोदितम्।।1।।
शौनक ऋषि
बोलेः हे सूत
जी ! अति
पूर्वकाल के
मुनि श्री
व्यासजी के
द्वारा कहा
हुआ तथा
श्रुतियों
में वर्णित
श्रीगीताजी
का माहात्म्य
मुझे भली
प्रकार कहिए |(1)
सूत
उवाच
पृष्टं
वै भवता
यत्तन्महद्
गोप्यं
पुरातनम्।
न केन
शक्यते
वक्तुं
गीतामाहात्म्यमुत्तमम्।।2।।
सूत जी
बोलेः आपने जो
पुरातन और
उत्तम गीतामाहात्म्य
पूछा, वह
अतिशय गुप्त है | अतः वह कहने
के लिए कोई
समर्थ नहीं है |(2)
कृष्णो
जानाति वै
सम्यक्
क्वचित्कौन्तेय
एव च।
व्यासो
वा
व्यासपुत्रो
वा
याज्ञवल्क्योऽथ
मैथिलः।।3।।
गीता
माहात्म्य को
श्रीकृष्ण ही
भली प्रकार जानते
हैं, कुछ
अर्जुन जानते
हैं तथा
व्यास, शुकदेव,
याज्ञवल्क्य
और जनक आदि
थोड़ा-बहुत
जानते हैं |(3)
अन्ये
श्रवणतः
श्रृत्वा
लोके
संकीर्तयन्ति
च।
तस्मात्किंचिद्वदाम्यद्य
व्यासस्यास्यान्मया
श्रुतम्।।4।।
दूसरे लोग
कर्णोपकर्ण
सुनकर लोक में
वर्णन करते
हैं | अतः
श्रीव्यासजी
के मुख से
मैंने जो कुछ
सुना है वह आज
कहता हूँ |(4)
गीता
सुगीता
कर्तव्या
किमन्यैः
शास्त्रसंग्रहैः।
या
स्वयं
पद्मनाभस्य
मुखपद्माद्विनिःसृता।।5।।
जो अपने आप
श्रीविष्णु
भगवान के
मुखकमल से निकली
हुई है गीता
अच्छी तरह
कण्ठस्थ करना
चाहिए |
अन्य
शास्त्रों के
संग्रह से
क्या लाभ?(5)
यस्माद्धर्ममयी
गीता
सर्वज्ञानप्रयोजिका।
सर्वशास्त्रमयी
गीता तस्माद्
गीता विशिष्यते।।6।।
गीता
धर्ममय,
सर्वज्ञान की
प्रयोजक तथा
सर्व शास्त्रमय
है, अतः गीता
श्रेष्ठ है |(6)
संसारसागरं
घोरं
तर्तुमिच्छति
यो जनः।
गीतानावं
समारूह्य
पारं यातु
सुखेन सः।।7।।
जो मनुष्य
घोर
संसार-सागर को
तैरना चाहता
है उसे
गीतारूपी
नौका पर चढ़कर
सुखपूर्वक पार
होना चाहिए |(7)
गीताशास्त्रमिदं
पुण्यं यः
पठेत् प्रयतः
पुमान्।
विष्णोः
पदमवाप्नोति
भयशोकादिवर्जितः।।8।।
जो पुरुष इस
पवित्र
गीताशास्त्र
को सावधान होकर
पढ़ता है वह
भय, शोक आदि से
रहित होकर
श्रीविष्णुपद
को प्राप्त
होता है |(8)
गीताज्ञानं
श्रुतं नैव
सदैवाभ्यासयोगतः।
मोक्षमिच्छति
मूढात्मा
याति
बालकहास्यताम्।।9।।
जिसने सदैव
अभ्यासयोग से
गीता का ज्ञान
सुना नहीं है
फिर भी जो
मोक्ष की
इच्छा करता है
वह मूढात्मा,
बालक की तरह
हँसी का पात्र
होता है |(9)
ये
श्रृण्वन्ति
पठन्त्येव
गीताशास्त्रमहर्निशम्।
न ते
वै मानुषा
ज्ञेया देवा
एव न
संशयः।।10।।
जो रात-दिन
गीताशास्त्र
पढ़ते हैं
अथवा इसका पाठ
करते हैं या
सुनते हैं
उन्हें
मनुष्य नहीं
अपितु
निःसन्देह
देव ही जानें |(10)
मलनिर्मोचनं
पुंसां
जलस्नानं
दिने दिने।
सकृद्
गीताम्भसि स्नानं
संसारमलनाशनम्।।11।।
हर रोज जल से
किया हुआ
स्नान
मनुष्यों का
मैल दूर करता
है किन्तु
गीतारूपी जल
में एक बार किया
हुआ स्नान भी
संसाररूपी
मैल का नाश
करता है |(11)
गीताशास्त्रस्य
जानाति पठनं
नैव पाठनम्।
परस्मान्न
श्रुतं
ज्ञानं
श्रद्धा न
भावना।।12।।
स एव
मानुषे लोके
पुरुषो विड्वराहकः।
यस्माद्
गीतां न
जानाति
नाधमस्तत्परो
जनः।।13।।
जो मनुष्य
स्वयं गीता
शास्त्र का
पठन-पाठन नहीं
जानता है,
जिसने अन्य
लोगों से वह
नहीं सुना है,
स्वयं को उसका
ज्ञान नहीं
है, जिसको उस
पर श्रद्धा
नहीं है,
भावना भी नहीं
है, वह मनुष्य
लोक में भटकते
हुए शूकर जैसा
ही है
| उससे
अधिक नीच
दूसरा कोई
मनुष्य नहीं
है, क्योंकि
वह गीता को
नहीं जानता है |
धिक्
तस्य
ज्ञानमाचारं
व्रतं
चेष्टां तपो यशः।
गीतार्थपठनं
नास्ति
नाधमस्तत्परो
जन।।14।।
जो गीता के
अर्थ का पठन
नहीं करता
उसके ज्ञान को,
आचार को, व्रत
को, चेष्टा को,
तप को और यश को
धिक्कार है | उससे अधम और
कोई मनुष्य
नहीं है |(14)
गीतागीतं
न यज्ज्ञानं
तद्विद्धयासुरसंज्ञकम्।
तन्मोघं
धर्मरहितं
वेदवेदान्तगर्हितम्।।15।।
जो ज्ञान
गीता में नहीं
गाया गया है
वह वेद और वेदान्त
में निन्दित
होने के कारण
उसे निष्फल,
धर्मरहित और
आसुरी जानें |
योऽधीते
सततं गीतां
दिवारात्रौ
यथार्थतः।
स्वपन्गच्छन्वदंस्तिष्ठञ्छाश्वतं
मोक्षमाप्नुयात्।।16।।
जो मनुष्य
रात-दिन, सोते,
चलते, बोलते
और खड़े रहते
हुए गीता का
यथार्थतः सतत
अध्ययन करता
है वह सनातन
मोक्ष को
प्राप्त होता
है |(16)
योगिस्थाने
सिद्धपीठे
शिष्टाग्रे
सत्सभासु च।
यज्ञे
च
विष्णुभक्ताग्रे
पठन्याति
परां गतिम्।।17।।
योगियों के
स्थान में,
सिद्धों के
स्थान में, श्रेष्ठ
पुरुषों के
आगे, संतसभा
में, यज्ञस्थान
में और
विष्णुभक्तोंके
आगे गीता का
पाठ करने वाला
मनुष्य परम
गति को
प्राप्त होता
है |(17)
गीतापाठं
च श्रवणं यः
करोति दिने
दिने।
क्रतवो
वाजिमेधाद्याः
कृतास्तेन
सदक्षिणाः।।18।।
जो गीता का
पाठ और श्रवण
हर रोज करता
है उसने दक्षिणा
के साथ
अश्वमेध आदि
यज्ञ किये ऐसा
माना जाता है |(18)
गीताऽधीता
च येनापि
भक्तिभावेन
चेतसा।
तेन
वेदाश्च
शास्त्राणि
पुराणानि च
सर्वशः।।19।।
जिसने
भक्तिभाव से
एकाग्र, चित्त
से गीता का अध्ययन
किया है उसने
सर्व वेदों,
शास्त्रों तथा
पुराणों का
अभ्यास किया
है ऐसा माना
जाता है |(19)
यः
श्रृणोति च
गीतार्थं
कीर्तयेच्च
स्वयं
पुमान्।
श्रावयेच्च
परार्थं वै स
प्रयाति परं
पदम्।।20।।
जो मनुष्य
स्वयं गीता का
अर्थ सुनता
है, गाता है और
परोपकार हेतु
सुनाता है वह
परम पद को प्राप्त
होता है |(20)
नोपसर्पन्ति
तत्रैव यत्र
गीतार्चनं
गृहे।
तापत्रयोद्भवाः
पीडा नैव
व्याधिभयं
तथा।।21।।
जिस घर में
गीता का पूजन
होता है वहाँ
(आध्यात्मिक,
आधिदैविक और
आधिभौतिक) तीन
ताप से
उत्पन्न होने
वाली पीड़ा
तथा
व्याधियों का
भय नहीं आता
है | (21)
न
शापो नैव पापं
च दुर्गतिनं च
किंचन।
देहेऽरयः
षडेते वै न
बाधन्ते
कदाचन।।22।।
उसको शाप या
पाप नहीं
लगता, जरा भी
दुर्गति नहीं
होती और छः
शत्रु (काम,
क्रोध, लोभ,
मोह, मद और
मत्सर) देह
में पीड़ा नहीं
करते | (22)
भगवत्परमेशाने
भक्तिरव्यभिचारिणी।
जायते
सततं तत्र
यत्र
गीताभिनन्दनम्।।23।।
जहाँ
निरन्तर गीता
का अभिनंदन
होता है वहाँ
श्री भगवान
परमेश्वर में
एकनिष्ठ
भक्ति उत्पन्न
होती है | (23)
स्नातो
वा यदि
वाऽस्नातः
शुचिर्वा यदि
वाऽशुचिः।
विभूतिं
विश्वरूपं च
संस्मरन्सर्वदा
शुचिः।।24।।
स्नान किया
हो या न किया
हो, पवित्र हो
या अपवित्र हो
फिर भी जो
परमात्म-विभूति
का और विश्वरूप
का स्मरण करता
है वह सदा
पवित्र है | (24)
सर्वत्र
प्रतिभोक्ता
च
प्रतिग्राही
च सर्वशः।
गीतापाठं
प्रकुर्वाणो
न लिप्येत
कदाचन।।25।।
सब जगह भोजन
करने वाला और
सर्व प्रकार
का दान लेने
वाला भी अगर
गीता पाठ करता
हो तो कभी लेपायमान
नहीं होता | (25)
यस्यान्तःकरणं
नित्यं
गीतायां रमते
सदा।
सर्वाग्निकः
सदाजापी
क्रियावान्स
च पण्डितः।।26।।
जिसका चित्त
सदा गीता में
ही रमण करता
है वह संपूर्ण
अग्निहोत्री,
सदा जप
करनेवाला,
क्रियावान तथा
पण्डित है | (26)
दर्शनीयः
स धनवान्स
योगी
ज्ञानवानपि।
स एव
याज्ञिको
ध्यानी
सर्ववेदार्थदर्शकः।।27।।
वह दर्शन
करने योग्य,
धनवान, योगी,
ज्ञानी, याज्ञिक,
ध्यानी तथा
सर्व वेद के
अर्थ को जानने
वाला है | (27)
गीतायाः
पुस्तकं यत्र
नित्यं पाठे
प्रवर्तते।
तत्र
सर्वाणि
तीर्थानि
प्रयागादीनि
भूतले।।28।।
जहाँ गीता
की पुस्तक का
नित्य पाठ
होता रहता है
वहाँ पृथ्वी
पर के
प्रयागादि
सर्व तीर्थ निवास
करते हैं | (28)
निवसन्ति
सदा गेहे देहेदेशे
सदैव हि।
सर्वे
देवाश्च ऋषयो
योगिनः
पन्नगाश्च
ये।।29।।
उस घर में और
देहरूपी देश
में सभी
देवों, ऋषियों,
योगियों और
सर्पों का सदा
निवास होता है |(29)
गीता
गंगा च
गायत्री सीता
सत्या
सरस्वती।
ब्रह्मविद्या
ब्रह्मवल्ली
त्रिसंध्या
मुक्तगेहिनी।।30।।
अर्धमात्रा
चिदानन्दा
भवघ्नी
भयनाशिनी।
वेदत्रयी
पराऽनन्ता
तत्त्वार्थज्ञानमंजरी।।31।।
इत्येतानि
जपेन्नित्यं
नरो
निश्चलमानसः।
ज्ञानसिद्धिं
लभेच्छीघ्रं
तथान्ते परमं
पदम्।।32।।
गीता, गंगा,
गायत्री,
सीता, सत्या,
सरस्वती, ब्रह्मविद्या,
ब्रह्मवल्ली,
त्रिसंध्या,
मुक्तगेहिनी,
अर्धमात्रा,
चिदानन्दा,
भवघ्नी,
भयनाशिनी,
वेदत्रयी,
परा, अनन्ता
और
तत्त्वार्थज्ञानमंजरी
(तत्त्वरूपी
अर्थ के ज्ञान
का भंडार) इस
प्रकार (गीता
के) अठारह
नामों का
स्थिर मन से जो
मनुष्य नित्य
जप करता है वह
शीघ्र
ज्ञानसिद्धि
और अंत में
परम पद को
प्राप्त होता
है | (30,31,32)
यद्यत्कर्म
च सर्वत्र
गीतापाठं
करोति वै।
तत्तत्कर्म
च निर्दोषं
कृत्वा
पूर्णमवाप्नुयात्।।33।।
मनुष्य
जो-जो कर्म
करे उसमें अगर
गीतापाठ चालू
रखता है तो वह
सब कर्म
निर्दोषता से
संपूर्ण करके
उसका फल
प्राप्त करता
है | (33)
पितृनुद्दश्य
यः श्राद्धे
गीतापाठं
करोति वै।
संतुष्टा
पितरस्तस्य
निरयाद्यान्ति
सदगतिम्।।34।।
जो मनुष्य
श्राद्ध में
पितरों को
लक्ष्य करके
गीता का पाठ
करता है उसके
पितृ
सन्तुष्ट होते
हैं और नर्क
से सदगति पाते
हैं | (34)
गीतापाठेन
संतुष्टाः
पितरः
श्राद्धतर्पिताः।
पितृलोकं
प्रयान्त्येव
पुत्राशीर्वादतत्पराः।।35।।
गीतापाठ से
प्रसन्न बने
हुए तथा
श्राद्ध से तृप्त
किये हुए
पितृगण पुत्र
को आशीर्वाद
देने के लिए
तत्पर होकर
पितृलोक में
जाते हैं | (35)
लिखित्वा
धारयेत्कण्ठे
बाहुदण्डे च
मस्तके।
नश्यन्त्युपद्रवाः
सर्वे
विघ्नरूपाश्च
दारूणाः।।36।।
जो मनुष्य
गीता को लिखकर
गले में, हाथ
में या मस्तक
पर धारण करता
है उसके सर्व
विघ्नरूप दारूण
उपद्रवों का
नाश होता है | (36)
देहं
मानुषमाश्रित्य
चातुर्वर्ण्ये
तु भारते।
न
श्रृणोति
पठत्येव
ताममृतस्वरूपिणीम्।।37।।
हस्तात्त्याक्तवाऽमृतं
प्राप्तं
कष्टात्क्ष्वेडं
समश्नुते
पीत्वा
गीतामृतं
लोके लब्ध्वा
मोक्षं सुखी भवेत्।।38।।
भरतखण्ड में
चार वर्णों
में मनुष्य
देह प्राप्त
करके भी जो
अमृतस्वरूप
गीता नहीं
पढ़ता है या
नहीं सुनता है
वह हाथ में
आया हुआ अमृत
छोड़कर कष्ट
से विष खाता
है | किन्तु
जो मनुष्य
गीता सुनता
है, पढ़ता तो वह इस
लोक में
गीतारूपी अमृत
का पान करके
मोक्ष
प्राप्त कर
सुखी होता है | (37, 38)
जनैः
संसारदुःखार्तैर्गीताज्ञानं
च यैः श्रुतम्।
संप्राप्तममृतं
तैश्च
गतास्ते सदनं
हरेः।।39।।
संसार के
दुःखों से
पीड़ित जिन
मनुष्यों ने गीता
का ज्ञान सुना
है उन्होंने
अमृत प्राप्त
किया है और वे
श्री हरि के
धाम को
प्राप्त हो
चुके हैं | (39)
गीतामाश्रित्य
बहवो भूभुजो
जनकादयः।
निर्धूतकल्मषा
लोके गतास्ते
परमं
पदम्।।40।।
इस लोक में
जनकादि की तरह
कई राजा गीता
का आश्रय लेकर
पापरहित होकर
परम पद को
प्राप्त हुए हैं | (40)
गीतासु
न
विशेषोऽस्ति
जनेषूच्चावचेषु
च।
ज्ञानेष्वेव
समग्रेषु समा
ब्रह्मस्वरूपिणी।।41।।
गीता में
उच्च और नीच
मनुष्य विषयक
भेद ही नहीं
हैं, क्योंकि
गीता
ब्रह्मस्वरूप
है अतः उसका
ज्ञान सबके
लिए समान है | (41)
यः
श्रुत्वा नैव
गीतार्थं
मोदते
परमादरात्।
नैवाप्नोति
फलं लोके
प्रमादाच्च
वृथा श्रमम्।।42।।
गीता के
अर्थ को परम
आदर से सुनकर
जो आनन्दवान
नहीं होता वह
मनुष्य
प्रमाद के
कारण इस लोक में
फल नहीं
प्राप्त करता
है किन्तु
व्यर्थ श्रम
ही प्राप्त
करता है | (42)
गीतायाः
पठनं कृत्वा
माहात्म्यं
नैव यः पठेत्।
वृथा
पाठफलं तस्य
श्रम एव ही
केवलम्।।43।।
गीता का पाठ
करे जो
माहात्म्य का
पाठ नहीं करता
है उसके पाठ
का फल व्यर्थ
होता है और
पाठ केवल
श्रमरूप ही रह
जाता है |
एतन्माहात्म्यसंयुक्तं
गीतापाठं
करोति यः।
श्रद्धया
यः
श्रृणोत्येव
दुर्लभां
गतिमाप्नुयात्।।44।।
इस माहात्म्य
के साथ जो
गीता पाठ करता
है तथा जो श्रद्धा
से सुनता है
वह दुर्लभ गति
को प्राप्त होता
है |(44)
माहात्म्यमेतद्
गीताया मया
प्रोक्तं
सनातनम्।
गीतान्ते
च पठेद्यस्तु
यदुक्तं
तत्फलं लभेत्।।45।।
गीता का
सनातन
माहात्म्य
मैंने कहा है | गीता पाठ के
अन्त में जो
इसका पाठ करता
है वह
उपर्युक्त फल
को प्राप्त
होता है | (45)
इति
श्रीवाराहपुराणोद्धृतं
श्रीमदगीतामाहात्म्यानुसंधानं
समाप्तम् |
इति
श्रीवाराहपुराणान्तर्गत
श्रीमदगीतामाहात्म्यानुंसंधान
समाप्त |
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
अनन्तरूपः
जिनके
अनन्त रूप हैं
वह |
अच्युतः
जिनका
कभी क्षय नहीं
होता, कभी
अधोगति नहीं
होती वह |
अरिसूदनः
प्रयत्न
के बिना ही
शत्रु का नाश
करने वाले |
कृष्णः
'कृष्' सत्तावाचक
है | 'ण' आनन्दवाचक
है | इन
दोनों के एकत्व
का सूचक
परब्रह्म भी
कृष्ण कहलाता
है |
केशवः
क माने
ब्रह्म को और ईश – शिव
को वश में
रखने वाले |
केशिनिषूदनः
घोड़े
का आकार वाले
केशि नामक
दैत्य का नाश
करने वाले |
कमलपत्राक्षः
कमल
के पत्ते जैसी
सुन्दर विशाल
आँखों वाले |
गोविन्दः
गो
माने वेदान्त
वाक्यों के
द्वारा जो
जाने जा सकते
हैं |
जगत्पतिः
जगत
के पति |
जगन्निवासः
जिनमें
जगत का निवास
है अथवा जो
जगत में सर्वत्र
बसे हुए है |
जनार्दनः
दुष्ट
जनों को,
भक्तों के
शत्रुओं को
पीड़ित करने
वाले |
देवदेवः
देवताओं
के पूज्य |
देववरः
देवताओं
में श्रेष्ठ |
पुरुषोत्तमः
क्षर
और अक्षर
दोनों
पुरुषों से
उत्तम अथवा शरीररूपी
पुरों में
रहने वाले
पुरुषों यानी
जीवों से जो
अति उत्तम,
परे और
विलक्षण हैं
वह |
भगवानः
ऐश्वर्य,
धर्म, यश,
लक्ष्मी,
वैराग्य और
मोक्ष... ये छः
पदार्थ देने
वाले अथवा
सर्व भूतों की
उत्पत्ति,
प्रलय, जन्म,
मरण तथा
विद्या और
अविद्या को
जानने वाले |
भूतभावनः
सर्वभूतों
को उत्पन्न
करने वाले |
भूतेशः
भूतों
के ईश्वर, पति |
मधुसूदनः
मधु
नामक दैत्य को
मारने वाले |
महाबाहूः
निग्रह
और अनुग्रह
करने में
जिनके हाथ
समर्थ हैं वह |
माधवः
माया
के, लक्ष्मी
के पति |
यादवः
यदुकुल
में जन्मे हुए |
योगवित्तमः
योग
जानने वालों
में श्रेष्ठ |
वासुदेवः
वासुदेव
के पुत्र |
वार्ष्णेयः
वृष्णि
के ईश, स्वामी |
हरिः
संसाररूपी
दुःख हरने
वाले |
अनघः पापरहित,
निष्पाप |
कपिध्वजः
जिसके
ध्वज पर कपि
माने हनुमान
जी हैं वह |
कुरुश्रेष्ठः
कुरुकुल
में उत्पन्न
होने वालों
में श्रेष्ठ |
कुरुनन्दनः
कुरुवंश
के राजा के
पुत्र |
कुरुप्रवीरः
कुरुकुल
में जन्मे हुए
पुरुषों में
विशेष तेजस्वी |
कौन्तेयः
कुंती
का पुत्र |
गुडाकेशः
निद्रा
को जीतने
वाला, निद्रा
का स्वामी
अथवा गुडाक
माने शिव
जिसके स्वामी
हैं वह |
धनंजयः
दिग्विजय
में सर्व
राजाओं को
जीतने वाला |
धनुर्धरः
धनुष को
धारण करने
वाला |
परंतपः
परम
तपस्वी अथवा
शत्रुओं को
बहुत तपाने
वाला |
पार्थः
पृथा
माने कुंती का
पुत्र |
पुरुषव्याघ्रः
पुरुषों
में व्याघ्र
जैसा |
पुरुषर्षभः
पुरुषों
में ऋषभ माने
श्रेष्ठ |
पाण्डवः
पाण्डु
का पुत्र |
भरतश्रेष्ठः
भरत के
वंशजों में
श्रेष्ठ |
भरतसत्तमः
भरतवंशियों
में श्रेष्ठ |
भरतर्षभः
भरतवंशियों
में श्रेष्ठ |
भारतः
भा माने
ब्रह्मविद्या
में अति प्रेमवाला
अथवा भरत का
वंशज |
महाबाहुः
बड़े
हाथों वाला |
सव्यसाचिन्
बायें
हाथ से भी
सरसन्धान
करने वाला |
श्री
पार्वती जी ने
कहाः भगवन् ! आप सब
तत्त्वों के
ज्ञाता हैं | आपकी कृपा
से मुझे
श्रीविष्णु-सम्बन्धी
नाना प्रकार
के धर्म सुनने
को मिले, जो
समस्त लोक का
उद्धार करने
वाले हैं | देवेश ! अब मैं
गीता का
माहात्म्य
सुनना चाहती
हूँ, जिसका
श्रवण करने से
श्रीहरि की
भक्ति बढ़ती है |
श्री
महादेवजी
बोलेः जिनका
श्रीविग्रह
अलसी के फूल
की भाँति
श्याम वर्ण का
है, पक्षिराज
गरूड़ ही जिनके
वाहन हैं, जो
अपनी महिमा से
कभी च्युत नहीं
होते तथा
शेषनाग की
शय्या पर शयन
करते हैं, उन
भगवान
महाविष्णु की
हम उपासना
करते हैं |
एक समय
की बात है | मुर
दैत्य के नाशक
भगवान विष्णु
शेषनाग के रमणीय
आसन पर
सुखपूर्वक
विराजमान थे | उस समय
समस्त लोकों
को आनन्द देने
वाली भगवती
लक्ष्मी ने
आदरपूर्वक
प्रश्न किया |
श्रीलक्ष्मीजी
ने पूछाः भगवन ! आप
सम्पूर्ण जगत
का पालन करते
हुए भी अपने
ऐश्वर्य के
प्रति उदासीन
से होकर जो इस
क्षीरसागर
में नींद ले
रहे हैं, इसका
क्या कारण है?
श्रीभगवान
बोलेः सुमुखि ! मैं
नींद नहीं
लेता हूँ,
अपितु तत्त्व
का अनुसरण
करने वाली
अन्तर्दृष्टि
के द्वारा
अपने ही
माहेश्वर तेज
का
साक्षात्कार
कर रहा हूँ | यह वही
तेज है, जिसका
योगी पुरुष
कुशाग्र बुद्धि
के द्वारा
अपने
अन्तःकरण में
दर्शन करते हैं
तथा जिसे
मीमांसक
विद्वान
वेदों का
सार-तत्त्व
निश्च्चित करते
हैं | वह
माहेश्वर तेज
एक, अजर,
प्रकाशस्वरूप,
आत्मरूप,
रोग-शोक से
रहित, अखण्ड
आनन्द का
पुंज,
निष्पन्द तथा
द्वैतरहित है | इस जगत
का जीवन उसी
के अधीन है | मैं उसी
का अनुभव करता
हूँ |
देवेश्वरि ! यही
कारण है कि
मैं तुम्हें
नींद लेता सा
प्रतीत हो रहा
हूँ |
श्रीलक्ष्मीजी
ने कहाः हृषिकेश
! आप ही
योगी पुरुषों
के ध्येय हैं | आपके
अतिरिक्त भी
कोई ध्यान
करने योग्य
तत्त्व है, यह
जानकर मुझे
बड़ा कौतूहल
हो रहा है | इस
चराचर जगत की
सृष्टि और
संहार करने
वाले स्वयं आप
ही हैं | आप
सर्वसमर्थ
हैं | इस
प्रकार की
स्थिति में
होकर भी यदि
आप उस परम
तत्त्व से
भिन्न हैं तो
मुझे उसका बोध
कराइये |
श्री
भगवान बोलेः प्रिये ! आत्मा
का स्वरूप
द्वैत और
अद्वैत से
पृथक, भाव और
अभाव से मुक्त
तथा आदि और
अन्त से रहित
है | शुद्ध
ज्ञान के
प्रकाश से
उपलब्ध होने
वाला तथा
परमानन्द
स्वरूप होने
के कारण
एकमात्र
सुन्दर है | वही
मेरा ईश्वरीय
रूप है | आत्मा
का एकत्व ही
सबके द्वारा
जानने योग्य है |
गीताशास्त्र
में इसी का
प्रतिपादन
हुआ है | अमित
तेजस्वी
भगवान विष्णु
के ये वचन
सुनकर लक्ष्मी
देवी ने शंका
उपस्थित करे हुए
कहाः भगवन ! यदि
आपका स्वरूप
स्वयं
परमानंदमय और
मन-वाणी की
पहुँच के बाहर
है तो गीता
कैसे उसका बोध
कराती है? मेरे इस
संदेह का
निवारण कीजिए |
श्री
भगवान बोलेः सुन्दरी
! सुनो,
मैं गीता में
अपनी स्थिति
का वर्णन करता
हूँ | क्रमश
पाँच
अध्यायों को
तुम पाँच मुख
जानो, दस
अध्यायों को
दस भुजाएँ
समझो तथा एक अध्याय
को उदर और दो
अध्यायों को
दोनों चरणकमल जानो | इस
प्रकार यह
अठारह
अध्यायों की
वाङमयी ईश्वरीय
मूर्ति ही
समझनी चाहिए | यह
ज्ञानमात्र
से ही महान
पातकों का नाश
करने वाली है | जो
उत्तम
बुद्धिवाला
पुरुष गीता के
एक या आधे
अध्याय का
अथवा एक, आधे
या चौथाई
श्लोक का भी
प्रतिदिन
अभ्यास करता
है, वह
सुशर्मा के
समान मुक्त हो
जाता है |
श्री
लक्ष्मीजी ने
पूछाः देव !
सुशर्मा कौन
था? किस
जाति का था और
किस कारण से
उसकी मुक्ति
हुई?
श्रीभगवान
बोलेः प्रिय !
सुशर्मा बड़ी
खोटी बुद्धि
का मनुष्य था |
पापियों का तो
वह शिरोमणि ही
था | उसका
जन्म वैदिक
ज्ञान से
शून्य और
क्रूरतापूर्ण
कर्म करने
वाले
ब्राह्मणों
के कुल में
हुआ था | वह न
ध्यान करता
था, न जप, न होम
करता था न
अतिथियों का
सत्कार | वह
लम्पट होने के
कारण सदा
विषयों के
सेवन में ही
लगा रहता था | हल
जोतता और
पत्ते बेचकर
जीविका चलाता
था | उसे
मदिरा पीने का
व्यसन था तथा
वह मांस भी खाया
करता था | इस
प्रकार उसने
अपने जीवन का
दीर्घकाल
व्यतीत कर
दिया | एकदिन
मूढ़बुद्धि
सुशर्मा
पत्ते लाने के
लिए किसी ऋषि
की वाटिका में
घूम रहा था | इसी बीच
मे कालरूपधारी
काले साँप ने
उसे डँस लिया |
सुशर्मा की
मृत्यु हो गयी |
तदनन्तर वह
अनेक नरकों
में जा वहाँ
की यातनाएँ
भोगकर
मृत्युलोक
में लौट आया
और वहाँ बोझ
ढोने वाला बैल
हुआ | उस समय
किसी पंगु ने
अपने जीवन को
आराम से व्यतीत
करने के लिए
उसे खरीद लिया | बैल ने
अपनी पीठ पर
पंगु का भार
ढोते हुए बड़े
कष्ट से सात-आठ
वर्ष बिताए | एक दिन
पंगु ने किसी
ऊँचे स्थान पर
बहुत देर तक
बड़ी तेजी के
साथ उस बैल को
घुमाया | इससे वह
थककर बड़े वेग
से पृथ्वी पर
गिरा और मूर्च्छित
हो गया | उस समय
वहाँ
कुतूहलवश
आकृष्ट हो
बहुत से लोग एकत्रित
हो गये | उस
जनसमुदाय में
से किसी
पुण्यात्मा
व्यक्ति ने उस
बैल का कल्याण
करने के लिए
उसे अपना पुण्य
दान किया |
तत्पश्चात्
कुछ दूसरे
लोगों ने भी
अपने-अपने पुण्यों
को याद करके
उन्हें उसके
लिए दान किया | उस भीड़
में एक वेश्या
भी खड़ी थी | उसे
अपने पुण्य का
पता नहीं था
तो भी उसने
लोगों की
देखा-देखी उस
बैल के लिए
कुछ त्याग
किया |
तदनन्तर
यमराज के दूत
उस मरे हुए
प्राणी को पहले
यमपुरी में ले
गये | वहाँ यह
विचारकर कि यह
वेश्या के
दिये हुए पुण्य
से पुण्यवान
हो गया है, उसे
छोड़ दिया गया
फिर वह भूलोक
में आकर उत्तम
कुल और शील
वाले
ब्राह्मणों
के घर में
उत्पन्न हुआ | उस समय
भी उसे अपने
पूर्वजन्म की
बातों का स्मरण
बना रहा | बहुत
दिनों के बाद
अपने अज्ञान
को दूर करने वाले
कल्याण-तत्त्व
का जिज्ञासु
होकर वह उस वेश्या
के पास गया और
उसके दान की
बात बतलाते हुए
उसने पूछाः 'तुमने कौन
सा पुण्य दान
किया था?' वेश्या
ने उत्तर
दियाः 'वह
पिंजरे में
बैठा हुआ तोता
प्रतिदिन कुछ
पढ़ता है | उससे
मेरा
अन्तःकरण
पवित्र हो गया
है | उसी का
पुण्य मैंने
तुम्हारे लिए
दान किया था |' इसके
बाद उन दोनों
ने तोते से
पूछा | तब उस
तोते ने अपने
पूर्वजन्म का
स्मरण करके
प्राचीन
इतिहास कहना
आरम्भ किया |
शुक
बोलाः पूर्वजन्म
में मैं
विद्वान होकर
भी विद्वता के
अभिमान से
मोहित रहता था | मेरा
राग-द्वेष
इतना बढ़ गया
था कि मैं
गुणवान
विद्वानों के
प्रति भी
ईर्ष्या भाव
रखने लगा | फिर
समयानुसार
मेरी मृत्यु
हो गयी और मैं
अनेकों घृणित
लोकों में
भटकता फिरा | उसके
बाद इस लोक
में आया | सदगुरु
की अत्यन्त
निन्दा करने
के कारण तोते के
कुल में मेरा
जन्म हुआ | पापी
होने के कारण
छोटी अवस्था
में ही मेरा माता-पिता
से वियोग हो
गया | एक दिन
मैं ग्रीष्म
ऋतु में तपे
मार्ग पर पड़ा
था | वहाँ से
कुछ श्रेष्ठ
मुनि मुझे उठा
लाये और
महात्माओं के
आश्रय में
आश्रम के भीतर
एक पिंजरे में
उन्होंने
मुझे डाल दिया | वहीं
मुझे पढ़ाया
गया | ऋषियों
के बालक बड़े
आदर के साथ
गीता के प्रथम
अध्याय की
आवृत्ति करते
थे | उन्हीं
से सुनकर मैं
भी बारंबार
पाठ करने लगा | इसी बीच
में एक चोरी
करने वाले
बहेलिये ने
मुझे वहाँ से
चुरा लिया |
तत्पश्चात्
इस देवी ने
मुझे खरीद
लिया |
पूर्वकाल में
मैंने इस
प्रथम अध्याय
का अभ्यास
किया था,
जिससे मैंने
अपने पापों को
दूर किया है | फिर उसी
से इस वेश्या
का भी
अन्तःकरण
शुद्ध हुआ है
और उसी के पुण्य
से ये
द्विजश्रेष्ठ
सुशर्मा भी
पापमुक्त हुए
हैं |
इस
प्रकार
परस्पर
वार्तालाप और
गीता के प्रथम
अध्याय के
माहात्म्य की
प्रशंसा करके
वे तीनों
निरन्तर
अपने-अपने घर
पर गीता का
अभ्यास करने
लगे, फिर
ज्ञान
प्राप्त करके
वे मुक्त हो गये | इसलिए
जो गीता के
प्रथम अध्याय
को पढ़ता,
सुनता तथा
अभ्यास करता
है, उसे इस
भवसागर को पार
करने में कोई
कठिनाई नहीं
होती |
भगवान
श्रीकृष्ण ने
अर्जुन को
निमित्त बना कर
समस्त विश्व
को गीता के
रूप में जो
महान् उपदेश दिया
है, यह अध्याय
उसकी
प्रस्तावना
रूप है | उसमें
दोनों पक्ष के
प्रमुख
योद्धाओं के
नाम गिनाने के
बाद मुख्यरूप
से अर्जुन को
कुटुंबनाश की
आशंका से
उत्पन्न हुए
मोहजनित
विषाद का
वर्णन है |
।। अथ
प्रथमोऽध्यायः
।।
धृतराष्ट्र
उवाच
धर्मक्षेत्रे
कुरुक्षेत्रे
समवेता
युयुत्सवः।
मामकाः
पाण्डवाश्चैव
किमकुर्वत
संजय।।1।।
धृतराष्ट्र
बोलेः हे संजय
!
धर्मभूमि
कुरुक्षेत्र
में एकत्रित,
युद्ध की
इच्छावाले
मेरे पाण्डु
के पुत्रों ने
क्या किया? (1)
संजय
उवाच
दृष्टवा
तु
पाण्डवानीकं
व्यूढं
दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंङगम्य
राजा वचनमब्रवीत्।।2।।
संजय
बोलेः उस समय
राजा
दुर्योधन ने
व्यूहरचनायुक्त
पाण्डवों की
सेना को देखकर
और द्रोणाचार्य
के पास जाकर
यह वचन कहाः (2)
पश्यैतां
पाण्डुपुत्राणामाचार्य
महतीं चमूम्।
व्यूढां
द्रुपदपुत्रेण
तव शिष्येण
धीमता।।3।।
हे
आचार्य ! आपके
बुद्धिमान
शिष्य द्रुपदपुत्र
धृष्टद्युम्न
के द्वारा
व्यूहाकार
खड़ी की हुई
पाण्डुपुत्रों
की इस बड़ी भारी
सेना को
देखिये |(3)
अत्र
शूरा
महेष्वासा
भीमार्जुनसमा
युधि।
युयुधानो
विराटश्च
द्रुपदश्च
महारथः।।4।।
धृष्टकेतुश्चेकितानः
काशिराजश्च
वीर्यवान्।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च
शैब्यश्च
नरपुंङगवः।।5।।
युधामन्युश्च
विक्रान्त
उत्तमौजाश्च
वीर्यवान्।
सौभद्रो
द्रौपदेयाश्च
सर्व एव
महारथाः।।6।।
इस सेना
में बड़े-बड़े
धनुषों वाले
तथा युद्ध में
भीम और अर्जुन
के समान
शूरवीर
सात्यकि और विराट
तथा महारथी
राजा द्रुपद,
धृष्टकेतु और चेकितान
तथा बलवान काशीराज,
पुरुजित,
कुन्तिभोज और
मनुष्यों में
श्रेष्ठ
शैब्य,
पराक्रमी,
युधामन्यु
तथा बलवान उत्तमौजा,
सुभद्रापुत्र
अभिमन्यु और
द्रौपदी के
पाँचों पुत्र
ये सभी महारथी
हैं | (4,5,6)
अस्माकं
तु विशिष्टा
ये तान्निबोध
द्विजोत्तम।
नायका
मम सैन्यस्य
संञ्ज्ञार्थं
तान्ब्रवीमि
ते।।7।।
हे
ब्राह्मणश्रेष्ठ
! अपने
पक्ष में भी
जो प्रधान
हैं, उनको आप
समझ लीजिए | आपकी
जानकारी के
लिए मेरी सेना
के जो-जो सेनापति
हैं, उनको
बतलाता हूँ |
भवान्भीष्मश्च
कर्णश्च
कृपश्च
समितिंञ्जयः।
अश्वत्थामा
विकर्णश्च
सौमदत्तिस्तथैव
च।।8।।
आप, द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्