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प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू के

सत्संग-प्रवचन

व्यास पूर्णिमा

इस पुस्तक में है-

साधना के लिए उत्साहित करने वाले और संसार की नश्वरता से बचाने के सचोट प्रसंग। भिन्न-भिन्न भक्तों, योगियों, साधकों की कथा द्वारा भक्ति, योग व साधना की पुष्टि और सब वृत्तियों से परे परमात्मा का साक्षात्कार.....विवेक, वैराग्य, भक्ति, उत्साह और परम सत्य का साक्षात्कार....


निवेदन

व्यास पूर्णिमा के पावन पर्व पर साधकों, भक्तों और मोक्षमार्ग के पथिकों के जीवन में प्रभु-प्राप्ति का उत्साह एवं साधन-भजन-नियम का संकेत मिले, ज्ञान और वैराग्य की वृद्धि हो इस हेतु पूज्यपाद स्वामी जी ने प्रेरणा पीयूष परोसा है। 'हमी बोलतो वेद बोलते' – संत तुकाराम जी की यह उक्ति साकार करते हुए मानो वेदवाणी का अमृत बहाया है। इन आत्मारामी महापुरूष के व्यवहार में, निष्ठा में और वचनों में हम उस वेदवाणी का मूर्त स्वरूप पाते हैं।

ये अनुभवयुक्त वचन जिज्ञासु श्रोताओं को अवश्य उत्साहित करेंगे, पथ-प्रदर्शन करेंगे, जीवन की उलझी हुई तमाम गुत्थियों को सुलझाने में सहयोग देंगे।

प्यारे साधक गण ! बार-बार इस पावन प्रसाद का पठन और मनन करके अवश्य लाभान्वित हो, यही विनम्र प्रार्थना....

श्री योग वेदान्त सेवा समिति

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अनुक्रम

निवेदन.. 3

व्यास पूर्णिमा... 3

राही रूक नहीं सकते. 14

साध्य को पाये बिना.......?. 30

प्रपत्तियोग.. 39

ऐ राही ! बचके....... 46

आत्यंतिक दुःखनिवृत्ति.. 50

कामना की निवृत्ति.. 51

निराकार आधार हमारे................ 53

 

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व्यास पूर्णिमा

अन्य देवी देवताओं की पूजा के बाद भी किसी की पूजा करना शेष रह जाता है लेकिन सच्चे ब्रह्मनिष्ठ सदगुरू की पूजा के बाद और किसी की पूजा करना शेष नहीं रहता। गुरू वे हैं जो शिष्य को सदा के लिए शिष्य न रखे, शिष्य को संसार में डूबने वाला न रखें, शिष्य को जन्मने और मरने वाले न रखें। शिष्य को जीव में से ब्रह्म बनाने का मौका खोजते हों वे गुरू हैं, वे परम गुरू हैं, वे सदगुरू हैं। सच्चे गुरू शिष्य को शिष्यत्व से हटाकर, जीवत्व से हटाकर, ब्रह्मत्व में आराम और चैन दिलाने के लिए, ब्रह्मरस की परम तृप्ति और परमानन्द की प्राप्ति कराने की ताक में रहते हैं। ऐसे गुरू की आज्ञा को स्वीकार कर जो चल पड़े वह सच्चा शिष्य है।

दुनियाँ के सब धर्मग्रन्थ, संप्रदाय, मजहब रसातल में चले जायें फिर भी पृथ्वी पर एक सदगुरू और एक सत्शिष्य हैं तो धर्म फिर से प्रकट होगा, शास्त्र फिर से बन जाएंगे, क्योंकि सदगुरू शिष्य को अमृत-उपदेश दिये बिना नहीं रहेंगे। और वही अमृत-उपदेश शास्त्र बन जायेगा। जब तक पृथ्वी पर एक भी ब्रह्मवेत्ता सदगुरू हैं और उनको ठीक से स्वीकार करने वाला सत्शिष्य है तब तक धर्मग्रन्थों का प्रारंभ फिर से हो सकता है। मानव जाति को जब तक ज्ञान की पिपासा रहेगी तब तक ऐसे सदगुरूओं का आदर-पूजन बना रहेगा।

प्राचीन काल में उन महापुरूषों को इतना आदर मिलता था किः

गुरू गोविन्द दोनों खड़े किसको लागूं पाय।

बलिहारी गुरूदेव की गोविन्द दियो दिखाय।।

वे लोग अपने हृदय में गोविन्द से भी बढ़कर स्थान अपने गुरू को देते थे। गोविन्द ने जीव करके पैदा किया लेकिन गुरू ने जीव में से ब्रह्म करके सदा के लिए मुक्त कर दिया। माँ-बाप देह में जन्म देते हैं लेकिन गुरू उस देह में रहे हुए विदेही का साक्षात्कार कराके परब्रह्म परमात्मा में प्रतिष्ठित कराते हैं, अपने आत्मा की जागृति कराते हैं।

न्यायाधीश न्याय की कुर्सी पर बैठकर, न्याय तो कर सकता है लेकिन न्यायालय की तौहीन नहीं कर सकता, उससे न्यायालय का अपमान नहीं किया जाता। उस ऋषिपद का, गुरूपद का उपयोग करके हम संसारी जाल से निकलकर परमात्म-प्राप्ति कर सकते हैं। ईश्वर अपना अपमान सह लेते हैं लेकिन गुरू का अपमान नहीं सहता ।

देवर्षि नारद ने वैकुण्ठ में प्रवेश किया। भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी उनका खूब आदर करने लगे। आदिनारायण ने नारदजी का हाथ पकड़ा और आराम करने को कहा। एक तरफ भगवान विष्णु नारद जी की चम्पी कर रहे हैं और दूसरी तरफ लक्ष्मी जी पंखा हाँक रही हैं। नारद जी कहते हैं- "भगवान ! अब छोड़ो। यह लीला किस बात की है ? नाथ ! यह क्या राज समझाने की युक्ति है ? आप मेरी चम्पी कर रहे हैं और माता जी पंखा हाँक रही हैं ?"

"नारद ! तू गुरूओं के लोक से आया है। यमपुरी में पाप भोगे जाते हैं, वैकुण्ठ में पुण्यों का फल भोगा जाता है लेकिन मृत्युलोक में सदगुरू की प्राप्ति होती है और जीव सदा के लिए मुक्त हो जाता है। मालूम होता है, तू किसी गुरू की शरण ग्रहण करके आया है।"

नारदजी को अपनी भूल महसूस कराने के लिए भगवान ये सब चेष्टाएँ कर रहे थे।

नारद जी ने कहाः "प्रभु ! मैं भक्त हूँ लेकिन निगुरा हूँ। गुरू क्या देते हैं ? गुरू का माहात्म्य क्या होता है यह बताने की कृपा करो भगवान !"

"गुरू क्या देते हैं..... गुरु का माहात्म्य क्या होता है यह जानना हो तो गुरूओं के पास जाओ। यह वैकुण्ठ है, खबरदार....."

जैसे पुलिस अपराधियों को पकड़ती है, न्यायाधीश उन्हें नहीं पकड़ पाते, ऐसे ही वे गुरूलोग हमारे दिल से अपराधियों को, काम-क्रोध-लोभ-मोहादि विकारों को निकाल निकाल कर निर्विकार चैतन्य स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति में सहयोग देते हैं और शिष्य जब तक गुरूपद को प्राप्त नहीं होता है तब तक उस पर निगरानी रखते रखते जीव को ब्रह्मयात्रा कराते रहते हैं।

"नारद ! जा, तू किसी गुरू की शरण ले। बाद में इधर आ।"

देवर्षि नारद गुरू की खोज करने मृत्युलोक में आये। सोचा कि मुझे प्रभातकाल में जो सर्वप्रथम मिलेगा उसको मैं गुरू मानूँगा। प्रातःकाल में सरिता के तीर पर गये। देखा तो एक आदमी शायद स्नान करके आ रहा है। हाथ में जलती अगरबत्ती है। नारद जी ने मन ही मन उसको गुरू मान लिया। नजदीक पहुँचे तो पता चला कि वह माछीमार है, हिंसक है। (हालाँकि आदिनारायण ही वह रूप लेकर आये थे।) नारदजी ने अपना संकल्प बता दिया किः "हे मल्लाह ! मैंने तुमको गुरू मान लिया है।"

मल्लाह ने कहाः "गुरू का मतलब क्या होता है ? हम नहीं जानते गुरू क्या होता है ?"

"गु माने अन्धकार। रू माने प्रकाश। जो अज्ञानरूपी अन्धकार को हटाकर ज्ञानरूपी प्रकाश कर दें उन्हें गुरू कहा जाता है। आप मेरे आन्तरिक जीवन के गुरू हैं।" नारदजी ने पैर पकड़ लिये।

"छोड़ो मुझे !" मल्लाह बोला।

"आप मुझे शिष्य के रूप में स्वीकार कर लो गुरूदेव!"

मल्लाह ने जान छुड़ाने के लिए कहाः "अच्छा, स्वीकार है, जा।"

नारदजी आये वैकुण्ठ में। भगवान ने कहाः

"नारद ! अब निगुरा तो नहीं है ?"

"नहीं भगवान ! मैं गुरू करके आया हूँ।"

"कैसे हैं तेरे गुरू ?"

"जरा धोखा खा गया मैं। वह कमबख्त मल्लाह मिल गया। अब क्या करें ? आपकी आज्ञा मानी। उसी को गुरू बना लिया।"

भगवान नाराज हो गयेः "तूने गुरू शब्द का अपमान किया है।"

न्यायाधीश न्यायालय में कुर्सी पर तो बैठ सकता है, न्यायालय का उपयोग कर सकता है लेकिन न्यायालय का अपमान तो न्यायाधीश भी नहीं कर सकता। सरकार भी न्यायालय का अपमान नहीं करती।

भगवान बोलेः "तूने गुरूपद का अपमान किया है। जा, तुझे चौरासी लाख जन्मों तक माता के गर्भों में नर्क भोगना पड़ेगा।"

नारद रोये, छटपटाये। भगवान ने कहाः "इसका इलाज यहाँ नहीं है। यह तो पुण्यों का फल भोगने की जगह है। नर्क पाप का फल भोगने की जगह है। कर्मों से छूटने की जगह तो वहीं है। तू जा उन गुरूओं के पास मृत्युलोक में।"

नारद आये। उस मल्लाह के पैर पकड़ेः "गुरूदेव ! उपाय बताओ। चौरासी के चक्कर से छूटने का उपाय बताओ।"

गुरूजी ने पूरी बात जान ली और कुछ संकेत दिये। नारद फिर वैकुण्ठ में पहुँचे। भगवान को कहाः "मैं चौरासी लाख योनियाँ तो भोग लूँगा लेकिन कृपा करके उसका नक्शा तो बना दो ! जरा दिखा तो दो नाथ ! कैसी होती है चौरासी ?

भगवान ने नक्शा बना दिया। नारद उसी नक्शे में लोटने-पोटने लगे।

"अरे ! यह क्या करते हो नारद ?"

"भगवान ! वह चौरासी भी आपकी बनाई हुई है और यह चौरासी भी आपकी ही बनायी हुई है। मैं इसी में चक्कर लगाकर अपनी चौरासी पूरी कर रहा हूँ।"

भगवान ने कहाः "महापुरूषों के नुस्खे भी लाजवाब होते हैं। यह युक्ति भी तुझे उन्हीं से मिली नारद ! महापुरूषों के नुस्खे लेकर जीव अपने अतृप्त हृदय में तृप्ति पाता है। अशान्त हृदय में परमात्म शान्ति पाता है। अज्ञान तिमिर से घेरे हुए हृदय में आत्मज्ञान का प्रकाश पाता है।"

जिन-जिन महापुरूषों के जीवन  गुरूओं का प्रसाद आ गया है वे ऊँचे अनुभव को, ऊँची शान्ति को प्राप्त हुए हैं। हमारी क्या शक्ति है कि उन महापुरूषों का, गुरूओं का बयान करे ? वे तत्त्ववेत्ता पुरूष, वे ज्ञानवान पुरूष जिसके जीवन में निहार लेते हैं, ज्ञानी संत जिसके जीवन में जरा-सी मीठी नजर डाल देते हैं उसका जीवन मधुरता के रास्ते चल पड़ता है।

ऐसे परम पुरूषों की हम क्या महिमा गायें ? जिन्होंने जितना सुना, जितना जाना, जितना वह कह सके उतना कहा लेकिन उन ज्ञानवान पुरूषों की महिमा का पूरा गान कोई नहीं कर सका। लोग गाते थे, गा रहे हैं और गाते ही रहेंगे। श्रीकृष्ण और श्रीरामचन्द्रजी अपने गुरूओं के द्वार पर जाकर ब्रह्मविद्या का पान करते थे। व्यासपुत्र शुकदेवजी ने जनक से ज्ञान पाया। जनक ने अष्टावक्र से पाया।

एक सत्शिष्य ने गौड़देश से पैदल चलकर आत्मज्ञान की जिज्ञासा व्यक्त की, शुकदेवजी के चरणों में आत्मलाभ हुआ तब उनका नाम गौड़पादाचार्य। गौड़पादाचार्या से आत्मलाभ पाया गोविन्दपादाचार्या ने। वे भगवान गोविन्दपादाचार्य नर्मदा किनारे ओंकारेश्वर तीर्थ में एकान्त अरण्य आत्मलाभ प्राप्त करके उसी आत्मशान्ति में, उसी अलौकिक परब्रह्म परमात्मा की शान्ति में ध्यानमग्न थे।

कई संन्यासियों को पता चला कि भगवान गोविन्दपादाचार्य परब्रह्म परमात्मा को पाये हुए आत्म-साक्षात्कारी महापुरूष हैं। उन्हें अपने स्वरूप का बोध हो गया है। उन्होंने अपने दिल में दिलबर का आराम पाया है। नर्मदा किनारे तप करने वाले तपस्वी गोविन्दपादाचार्य के दर्शन करने के लिए वहीं कुटिया बनाकर रहने लगे। रहते रहते बूढ़े हो गये लेकिन गोविन्दपादाचार्य की समाधि नहीं खुली। इतने में दक्षिण भारत के केरल प्रान्त से पैदल चलते हुए दो महीने से भी अधिक समय तक यात्रा करने के बाद शंकर नाम का बालक पहुँचा उन संन्यासियों के पास।

"मैंने नाम सुना है भगवान गोविन्दपादाचार्य का। वे पूज्यपाद आचार्य कहाँ रहते हैं ?"

संन्यासियों ने बताया किः "हम भी उनके दर्शन का इन्तजार करते-करते बूढ़े हो चले। उनकी समाधि खुले, उनकी अमृत बरसाने वाली निगाहें हम पर पड़ें, उनके ब्रह्मानुभव के वचन हमारे कानों में पड़े और कान पवित्र हों इसी इन्तजार में हम भी नर्मदा किनारे अपनी कुटियाएँ बनाकर बैठे हैं।"

संन्यासियों ने उस बालक को निहारा। वह बड़ा तेजस्वी लग रहा था। इस बाल संन्यासी का सम्यक् परिचय पाकर उनका विस्मय बढ़ गया। कितनी दूर केरल प्रदेश ! यह बच्चा वहाँ से अकेला ही आया है श्रीगुरू की आश में। जब उन्होंने देखा कि इस अल्प अवस्था में ही वह भाष्य समेत सभी शास्त्रों में पारंगत है और इसके फलस्वरूप उसके मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया है तो उन सबका मन प्रसन्नता से भर गया। मुग्ध होते हुए पूछाः

"क्या नाम है बेटे ?"

"मेरा नाम शंकर है।"

बच्चे की ओजस्वी वाणी और तीव्र जिज्ञासा देखकर उन्होंने समाधिस्थ बैठे महायोगी गुरूवर्य श्री गोविन्दपादाचार्य के बारे में कुछ बातें कही। वह निर्दोष नन्हा बालक भगवान गोविन्दपादाचार्य के दर्शन के लिए तड़प उठा। संन्यासियों ने कहाः

"वह दूर जो गुफा दिखाई दे रही है उसमें वे समाधिस्थ हैं। अन्धेरी गुफा में दिखाई नहीं पड़ेगा इसलिए यह दीपक ले जा।"

दीया जलाकर उस बालक ने गुफा में प्रवेश किया। विस्मय से विमुग्ध होकर देखा तो एक अति दीर्घकाय, विशाल-भाल-प्रदेशवाले, शान्त मुद्रा, लम्बी जटा और कृश देहवाले फिर भी पूरी आध्यात्मिकता के तेज से आलोकित एक महापुरूष पद्मासन में समाधिस्थ बैठे थे। शरीर की त्वचा सूख चुकी थी फिर भी उनका शरीर ज्योतिर्मय था। भगवान का दर्शन करते ही शंकर का रोम-रोम पुलकित हो उठा। मन एक प्रकार से अनिर्वचनीय दिव्यानन्द से भर उठा। अबाध अश्रुजल से उनका वक्षः स्थल प्लावित हो गया। उसकी यात्रा का परिश्रम सार्थक हो गया। सारी थकान उतर गयी। करबद्ध होकर वे स्तुति करने लगेः

"हे प्रभो ! आप मुनियों में श्रेष्ठ हैं। आप शरणागतों को कृपाकर ब्रह्मज्ञान देने के लिए पतंजली के रूप में भूतल पर अवतीर्ण हुए हैं। महादेव के डमरू की ध्वनि के समान आपकी भी महिमा अनंत एवं अपार है। व्याससुत शुकदेव के शिष्य गौड़पाद से ब्रह्मज्ञान का लाभ पाकर आप यशस्वी हुए हैं। मैं भी ब्रह्मज्ञान-प्राप्ति की कामना से आपके श्रीचरणों में आश्रय की भिक्षा माँगता हूँ। समाधि-भूमि से व्युत्थित होकर इस दीन शिष्य को ब्रह्मज्ञान प्रदान कर आप कृतार्थ करें।"

इस सुललित भगवान की ध्वनि से गुफा मुखरित हो उठी। तब अन्य संन्यासी भी गुफा में आ इकट्ठे हुए। शंकर तब तक स्तवगान में ही  मग्न थे। विस्मय विमुग्ध चित्त से सबने देखा कि भगवान गोविन्दपाद की वह निश्चल निस्पन्द देह बार-बार कम्पित हो रही है। प्राणों का स्पन्दन दिखाई देने लगा। क्षणभर में ही उन्होंने एक दीर्घ निःश्वास छोड़कर चक्षु उन्मीलित किये।

शंकर ने गोविन्दपादाचार्य भगवान को साष्टांग प्रणाम किया। दूसरे संन्यासी भी योगीश्वर के चरणों में प्रणत हुए। आनंदध्वनि से गुफा गुंजित हो उठी। तब प्रवीण संन्यासीगण योगीराज को समाधि से सम्पूर्ण रूप से व्यथित कराने के लिए यौगिक प्रकियाओं में नियुक्त हो गये। क्रम से योगीराज का मन जीवभूमि पर उतर आया। यथा समय आसन का परित्याग कर वे गुफा से बाहर निकले।

योगीराज की सहस्रों वर्षों की समाधि एक बालक संन्यासी के आने से छूट गई है, यह संवाद द्रुतगति से चतुर्दिक फैल गया। सुदूर स्थानों से यतिवर की दर्शनाकांक्षा से अगणित नर-नारियों ने आकर ओंकारनाथ को एक तीर्थक्षेत्र में परिणत कर दिया। शंकर का परिचय प्राप्त कर गोविन्दापादाचार्य ने जान लिया कि यही वह शिवावतार शंकर है, जिसे अद्वैत ब्रह्मविद्या का उपदेश करने के लिए हमने सहस्र वर्षों तक समाधि में अवस्थान किया और अब यही शंकर वेद-व्यास रचित ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखकर जगत में अद्वैत ब्रह्मविद्या का प्रचार करेगा।

तदनंतर एक शुभ दिन श्रीगोविन्दपादाचार्य ने शंकर को शिष्य रूप में ग्रहण कर लिया और उसे योगादि की शिक्षा देने लगे। अन्यान्य संन्यासियों ने भी उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। प्रथम वर्ष उन्होंने शंकर को हठयोग की शिक्षा दी। वर्ष पूरा होने के पूर्व ही शंकर ने हठयोग में पूर्ण सिद्ध प्राप्त कर ली। द्वितीय वर्ष में शंकर राजयोग में सिद्ध हो गये। हठयोग और राजयोग की सिद्धि प्राप्ति करने के फलस्वरूप शंकर बहुत बड़ी अलौकिक शक्ति के अधिकारी बन गये। दूरश्रवण, दूरदर्शन, सूक्ष्म देह से व्योममार्ग में गमन, अणिमा, लघिमा, देहान्तर में प्रवेश एवं सर्वोपरि इच्छामृत्यु शक्ति के वे अधिकारी हो गये। तृतीय वर्ष में गोविन्दपादाचार्य अपने शिष्य को विशेष यत्नपूर्वक ज्ञानयोग की शिक्षा देने लगे। श्रवण, मनन, निदिध्यासन, ध्यान, धारणा, समाधि का प्रकृत रहस्य सिखा देने के बाद उन्होंने अपने शिष्य को साधनकर्मानुसार अपरोक्षनुभूति के उच्च स्तर में दृढ़ प्रतिष्ठित कर दिया।

ध्यानबल से समाधिस्थ होकर नित्य नव दिव्यानुभूति से शंकर का मन अब सदैव एक अतीन्द्रिय राज्य में विचरण करने लगा। उनकी देह में ब्रह्मज्योति प्रस्फुटित हो उठी। उनके मुखमण्डल पर अनुपम लावण्य और स्वर्गीय हास झलकने लगा। उनके मन की सहज गति अब समाधि की ओर थी। बलपूर्वक उनके मन को जीवभूमि पर रखना पड़ता था। क्रमशः उनका मन निर्विकल्प भूमि पर अधिरूढ़ हो गया।

गोविन्दपादाचार्य ने देखा कि शंकर की साधना और शिक्षा अब समाप्त हो चुकी है। शिष्य उस ब्राह्मी स्थिति में उपनीत हो गया है जहाँ प्रतिष्ठित होने से श्रुति कहती हैः

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः।

क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे।।

यह परावर ब्रह्म दृष्ट होने पर दृष्टा का अविद्या आदि संस्काररूप हृदयग्रन्थि-समूह नष्ट हो जाता है एवं (प्रारब्धभिन्न) कर्मराशि का क्षय होने लगता है। शंकर अब उसी दुर्लभ अवस्था  में प्रतिष्ठित हो गये।

वर्षा ऋतु का आगमन हुआ। नर्मदा-वेष्टित ओंकारनाथ की शोभा अनुपम हो गयी। कुछ दिनों तक अविराम दृष्टि होती रही। नर्मदा का जल क्रमशः बढ़ने लगा। सब कुछ जलमय ही दिखाई देने लगा। ग्रामवासियों ने पालतू पशुओं समेत ग्राम का त्यागकर निरापद उच्च स्थानों में आश्रय ले लिया।

गुरूदेव कुछ दिनों से गुफा में समाधिस्थ हुए बैठे थे। बाढ़ का जल बढ़ते-बढ़ते गुफा के द्वार तक आ पहुँचा। संन्यासीगण गुरूदेव का जीवन विपन्न देखकर बहुत शंकित होने लगे। गुफा में बाढ़ के जल का प्रवेश रोकना अनिवार्य था क्योंकि वहाँ गुरूदेव समाधिस्थ थे। समाधि से व्युत्थित कर उन्हे किसी निरापद स्थान पर ले चलने के लिये सभी व्यग्र हो उठे। यह व्यग्रता देखकर शंकर कहीं से मिट्टी का एक कुंभ ले आये और उसे गुफा के द्वार पर रख दिया। फिर अन्य संन्यासियों को आश्वासन देते हुए बोलेः "आप चिन्तित न हों। गुरूदेव की समाधि भंग करने की कोई आवश्यकता नहीं। बाढ़ का जल इस कुंभ में प्रविष्ट होते ही प्रतिहत हो जायेगा, गुफा में प्रविष्ट नहीं हो सकेगा।"

सबको शंकर का यह कार्य बाल क्रीड़ा जैसा लगा किन्तु सभी ने विस्मित होकर देखा कि जल कुंभ में प्रवेश करते ही प्रतिहत एवं रूद्ध हो गया है। गुफा अब निरापद हो गई है। शंकर की यह अलौकिक शक्ति देखकर सभी अवाक् रह गये।

क्रमशः बाढ़ शांत हो गई। गोविन्दपादाचार्य भी समाधि से व्युत्थित हो गये। उन्होंने शिष्यों के मुख से शंकर के अमानवीय कार्य की बात सुनी तो प्रसन्न होकर उसके मस्तक पर हाथ रखकर कहाः

"वत्स ! तुम्हीं शंकर के अंश से उदभूत लोक-शंकर हो। गुरू गौड़पादचार्य के श्रीमुख से मैंने सुना था कि तुम आओगे और जिस प्रकार सहस्रधारा नर्मदा का स्रोत एक कुंभ में अवरूद्ध कर दिया है उसी प्रकार तुम व्यासकृत ब्रह्मसूत्र पर भाष्यरचना कर अद्वैत वेदान्त को आपात विरोधी सब धर्ममतों से उच्चतम आसन पर प्रतिष्ठित करने में सफल होंगे तथा अन्य धर्मों को सार्वभौम अद्वैत ब्रह्मज्ञान के अन्तर्भुक्त कर दोगे। ऐसा ही गुरूदेव भगवान गौड़पादाचार्य ने अपने गुरूदेव शुकदेव जी महाराज के श्रीमुख से सुना था। इन विशिष्ट कार्यो के लिए ही तुम्हारा जन्म हुआ है। मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ कि तुम समग्र वेदार्थ ब्रह्मसूत्र भाष्य में लिपिबद्ध करने में सफल होंगे।"

श्री गोविन्दपादाचार्य ने जान लिया कि शंकर की शिक्षा समाप्त हो गई है। उनका कार्य भी सम्पूर्ण हो गया है। एक दिन उन्होंने शंकर को अपने निकट बुलाकर जिज्ञासा कीः

"वत्स ! तुम्हारे मन में किसी प्रकार का कोई सन्देह है क्या ? क्या तुम भीतर किसी प्रकार अपूर्णता का अनुभव कर रहे हो ? अथवा तुम्हें अब क्या कोई जिज्ञासा है ?"

शंकर ने आनन्दित हो गुरूदेव को प्रणाम करके कहाः

"भगवन ! आपकी कृपा से अब मेरे लिए ज्ञातव्य अथवा प्राप्तव्य कुछ भी नहीं रहा। आपने मुझे पूर्णमनोरथ कर दिया है।  अब आप अनुमति दें कि मैं समाहित चित्त होकर चिरनिर्वाण लाभ करूँ।"

कुछ देर मौर रहकर श्री गोविन्दपादाचार्य ने शान्त स्वर में कहाः

"वत्स ! वैदिक धर्म-संस्थापन के लिए देवाधिदेव शंकर के अंश से तुम्हारा जन्म हुआ है। तुम्हें अद्वैत ब्रह्मज्ञान का उपदेश करने के लिए मैं गुरूदेव की आज्ञा से सहस्रों वर्षों से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था। अन्यथा ज्ञान प्राप्त करते ही देहत्याग कर मुक्तिलाभ कर लेता। अब मेरा कार्य समाप्त हो गया है। अब मैं समाधियोग से स्वस्वरूप में लीन हो जाऊँगा। तुम अब अविमुक्त क्षेत्र में जाओ। वहाँ तुम्हें भवानिपति शंकर के दर्शन प्राप्त होंगे। वे तुम्हें जिस प्रकार का आदेश देंगे उसी प्रकार तुम करना।"

शंकर ने श्रीगुरूदेव का आदेश शिरोधार्य किया। तदनन्तर एक शुभ दिन श्रीगोविन्दपादाचार्य ने सभी शिष्यों को आशीर्वाद प्रदान कर समाधि योग से देहत्याग कर दिया। शिष्यों ने यथाचार गुरूदेव की देह का नर्मदाजल में योगीजनोचित संस्कार किया।

गुरूदेव की आज्ञा के अनुसार शंकर पैदल चलते-चलते काशी आये। वहाँ काशी विश्वनाथ के दर्शन किये। भगवान वेदव्यास का स्मरण किया तो उन्होंने भी दर्शन दिये।

अपनी की हुई साधना, वेदान्त के अभ्यास और सदगुरू की कृपा से अपने शिवस्वरूप में जगे हुए शंकर 'भगवान श्रीमद् आद्य शंकराचार्य' हो गये।

बाद में वे मंडनमिश्र के घर शास्त्रार्थ करने गये। मंडनमिश्र बड़े विद्वान थे। उनके घर में पाले हुए तोते मैना भी वेद का पाठ करते थे वे ऐसे धुरन्धर पंडित थे। लेकिन शंकराचार्य सदगुरू प्रसाद से आत्मानुभव में परितृप्त थे। उन्होंने मंडनमिश्र को शास्त्रार्थ में परास्त किया। वे ही मंडनमिश्र फिर शंकराचार्य के चार मुख्य शिष्यों में से एक हुए, सुरेश्वाचार्य। शंकराचार्य का दूसरा शिष्य तोटक तो अनपढ़ था। फिर भी शंकराचार्य की कृपा पचाने में सफल हो गया। तोटक, तोटक नहीं बचा, तोटकाचार्य हो गया।

देवगढ़ के दीवान साहब जनार्दन स्वामी से आत्मज्ञान पाकर एकनाथ, संत एकनाथ जी के रूप में प्रकट हुए। उनके आश्रम में एक विधवा माई का लड़का पूरणपोड़ी खाने के लिए रहा करता था। उसका नाम ही पड़ गया था पूरनपोड़ा। संत एकनाथ जी में उसकी अटूट श्रद्धा-भक्त थी। संत एकनाथजी जब संसार से प्रयाण करने को थे तब उन्होंने अपने शिष्यों को बुलाया और कहाः "मैं एक ग्रन्थ लिख रहा हूँ जिसे पूरा नहीं कर सकूँगा। मेरे जाने के बाद पूरनपोड़ा से कहना, वह उस ग्रन्थ को पूरा कर देगा।"

व्यवस्थातंत्र के लोगों ने कहा किः "आपका बेटा हरि पण्डित पढ़ लिखकर शास्त्री हुआ है, वह ग्रंथ पूरा करेगा। यह अनपढ़ लड़का क्या पूरा करेगा ?"

एकनाथ जी ने कहाः "वह लड़का मुझे पिता मानता है, गुरू नहीं मानता। मेरे प्रति उसकी पिताबुद्धि है, गुरूबुद्धि नहीं है। मेरे प्रति उसमें श्रद्धा नहीं है और बिना श्रद्धा के ज्ञान हृदय में प्रविष्ट नहीं होता। पूरनपोड़ा पूरनपूड़ी खाने की आदतवाला तो है लेकिन साथ ही साथ उसके अन्दर श्रद्धा की सुहावनी धारा है। वही पूरनपोड़ा ग्रन्थ पूरा कर सकेगा। तुम चाहो तो पहले भले मेरे बेटे को ग्रंथ पूरा करने के लिए देना। लेकिन जब न कर पाये तो पूरनपोड़ा तो जरूर ही कर देगा।

हुआ भी ऐसा ही। वह शास्त्री बना हुआ लड़का ग्रंथ पूरा न कर सका लेकिन गुरू के वचनों में श्रद्धा रखकर यात्रा करने वाला वह अनपढ़ पूरनपोड़ा ने ग्रंथ पूरा कर दिया। यह है गुरूओं के कृपा-प्रसाद का चमत्कार।

ईशकृपा बिना गुरू नहीं गुरू बिना नहीं ज्ञान।

ज्ञान बिना आत्मा नहीं गावहिं वेद पुरान।।

उन गुरूओं का ज्ञान हम लोगों में अधिक से अधिक स्थिर हो, अधिक से अधिक फले फूले.......! गुरू की पूजा, गुरू का आदर कोई व्यक्ति की पूजा नहीं है, व्यक्ति का आदर नहीं है लेकिन गुरू की देह के अन्दर जो विदेही आत्मा है, परब्रह्म परमात्मा हैं उनका आदर है। किसी व्यक्ति की पूजा नही लेकिन व्यक्ति में जो लखा जाता है, उसमें जो अलख बैठा है उसका आदर है..... ज्ञान का आदर है..... ज्ञान का पूजन है..... ब्रह्मज्ञान का पूजन है।

गुरू तो यह इन्तजार करते हैं कि ऐसी घड़िया आ जाय कि शिष्य बदलकर गुरू के अनुभव से एक हो जाय। इसलिए जिन महापुरूषों ने शिष्यों के, साधकों के उद्धार के लिए संसार में ऐसे मार्ग प्रचलित किये हैं उन सबको पूरे-पूरे हृदय से कृतज्ञतापूर्वक, श्रद्धापूर्वक हम सब प्रणाम  करते हैं। वे महापुरूष किसी रूप में हों...... दत्तात्रेय भगवान हों, शंकराचार्य भगवान हों, शुकदेव जी मुनि हों, जनक राजा हों, ज्ञानेश्वर महाराज हों, अखा भगत हों, संत तुकाराम हों, संत एकनाथ हों, जो संसार से पार हैं उन सब महापुरूषों को हम लोग बड़े प्यार से अपने हृदय  में स्थापित करते हैं, उनके ज्ञान को अपने हृदय में धारण करते हैं। ॐ......ॐ.....ॐ......

हे आत्मारामी ब्रह्मवेत्ता गुरू ! हमारा हृदय खुला है। आप और आपका ज्ञान हमारे हृदय में प्रविष्ट हो। आपका हम आवाहन करते हैं, आपको बुलाते हैं, आपके ज्ञान को हम निमंत्रण देते हैं। हमारे हृदय में जिज्ञासा, ज्ञान और शान्ति का प्रागट्य हो। आपकी कृपा का सिञ्चन हो। हमारा हृदय उत्सक है। आप जैसे ब्रह्मवेत्ता के वचन हमारे हृदय में टिके।

गुरूपूर्णिमा के पावन पर्व पर हम यह पावन प्रार्थना करते हैं कि हे गुरूदेव ! वे दिन कब आयेंगे कि हमें यह संसार स्वप्न जैसा लगेगा ? वे दिन कब आयेंगे कि हर्ष के समय हमारे हृदय में हर्ष न होगा.... शोक के समय हमारे हृदय में शोक न होगा और हम सुख-दुःख दोनों के साक्षी हो जायेंगे। वे दिन कब आयेंगे कि ब्रह्मज्ञानी महापुरूषों का अनुभव हमारा अनुभव हो जायेगा ?

हम भाग्यवान तो हैं..... सचमुच हम महाभाग्यवान हैं कि हम ब्रह्मविद्या सुन पाते हैं, ब्रह्मज्ञान सुन पाते हैं। ॐ...... ॐ......ॐ......

अब हम गुरूदेव की मानस पूजा कर लेंगे। मानसिक ढंग से, हृदय के भाव से उनकी प्रार्थना कर लेंगे। उनके प्रति हृदय में अहोभाव भरते-भरते पवित्र होते जायेंगे.... कृतज्ञता व्यक्त करते जायेंगे।

मन ही मन भावना करो कि हम उनके चरण धो रहे हैं। सप्ततीर्थों के जल से गुरूदेव के पदारविंद को नहला रहे हैं। बड़े आदर और कृतज्ञता के साथ गुरूदेव के श्रीचरणों में दृष्टि रखते हुए.... श्रीचरणों को प्यार करते हुए पैर पखार रहे हैं....। उनके पावन ललाट में शुद्ध चन्दन का तिलक कर रहे है.... अक्षत चढ़ा रहे हैं। अपने हाथों से बनायी हुई गुलाब के फूलों की सुहावनी माला अर्पित करके अपने हाथ पवित्र कर रहे हैं.... हाथ जोड़कर, सिर झुकाकर उनको अपना अहंकार भेंट कर रहे हैं। पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ और ग्यारहवें मन की चेष्टाएँ उन गुरूदेव के चरणों में समर्पित कर रहे हैं.....।

कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुध्यात्मना वा प्रकृतेः स्वभावात्।

करोमि यद् यद् संकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयामि।।

शरीर से, वाणी से, मन से, इन्द्रियों से, बुद्धि से अथवा प्रकृति के स्वभाव से जो-जो करते हैं वह सब समर्पित करते हैं। हमारे जो कुछ भी कर्म हैं। हे गुरूदेव ! वह सब आपके चरणों में समर्पित हैं.....। हमारा कर्त्तापन का भाव, भोक्तापन का भाव आपके चरणों में समर्पित है।

राजा जनक को जब बोध हुआ तब उनका हृदय कृतज्ञता से भर गया। गद् गद् कण्ठ होकर गुरूदेव अष्टावक्र मुनि से कहाः "गुरूदेव ! आपने मुझे शाश्वत का बोध दिया है.... शाश्वत के अमृत से परितृप्त किया है। बदले में मैं आपको क्या दे सकता हूँ ? फिर भी मैं कृतघ्न न होऊँ इसलिए आपसे माफी माँगता हूँ कि आप नाराज न होना। मुझे फूल नहीं तो फूल की पंखुड़ी देने का मौका देना। हँसी मत उड़ाना, नाराज मत होना। आपने तो दिया है अखण्ड अमृत और मैं दे रहा हूँ मिटने वाली चीजें। फिर भी नाराज न होना। हे मेरे गुरूदेव ! आज तक जो मैंने सत्कृत्य किये हैं वे सब आपको समर्पित हों। आपकी दीर्घ आयु रहे। आपका सामर्थ्य और बढ़ता रहे। आपके श्रीचरणों में यह प्रार्थना करते हुए  मैं, मेरा परिवार और मेरा राज्य आपको समर्पित हो रहे हैं। मैंने जो तालाब, बावड़ियाँ खुदवाई थी, गौशालाएँ खुलवाई थीं, प्याऊ लगवाये थे, अन्नक्षेत्र चालू करवाये थे, ये सब सत्कृत्य आपके पावन श्रीचरणों में अर्पित हैं। फिर भी हे नाथ ! मैं आपके ऋण से मुक्त नहीं हो सकता। सदगुरू के कर्जे से मुक्त होने की मुझे जरूरत भी नहीं दिखती है। गुरूदेव का कर्जा भले ही सिर पर रहे। संसार के कर्जदार होने की अपेक्षा गुरू के ज्ञान का कर्जा जिसके सिर पर है उसके सिर पर संसार का कर्जा, जन्म-मरण का कर्जा नहीं टिक सकता।"

"गुरूदेव ने कहाः "बेटा ! तू चिन्ता मत कर। मैंने ज्ञान दिया उसका कर्जा वसूल करने के लिए मैं तुझे किसी जन्म में नहीं डालूँगा। इस ज्ञान में तू निरन्तर प्रतिष्ठित रह और अगर कोई प्यासा आवे तो उसकी प्यास भी मिटाया कर। उसको भी आत्म-अमृत से तृप्त किया कर।"

क्या महापुरूषों की उदारता है ! क्या ब्रह्मवेत्ताओं की महानता है ! जीवन की बाजी लगाकर जो चीज पायी वह बीज प्रेम से सहज स्वाभाविक ढंग से हमारे दिलों में भर देते हैं। इससे लिए क्या-क्या नुस्खे आजमाते हैं ! क्या-क्या युक्तियाँ खोजते हैं ! न जाने क्या-क्या तरकीबें लड़ाते हैं ! ......ताकि यह जन्मों से सोया हुआ, युगों से कर्मों की जाल गूँथता हुआ जीव मुक्त हो जाय।

जिन मुक्त पुरूषों ने ऐसे मार्ग बनाये हैं, ब्रह्मज्ञान को प्रकट करने के नुस्खे पैदा किये हैं उन महापुरूषों में से एक थे अष्टावक्र। उनके चरणों में जनक अपना सर्वस्व सौंपकर भी कहता है किः "मैंने अभी कुछ नहीं दिया गुरूदेव ! क्योंकि आपने तो शाश्वत दिया और मैं जो भी दे रहा हूँ वह नश्वर है। यह देखकर आप नाराज न होना और मेरी हँसी न उड़ाना। प्रेम से स्वीकार करना नाथ !" ऐसा कहते हुए राजा जनक गुरूदेव के चरणों में मस्तक रख देते हैं। मानो कहते हैं कि अब यह मस्तक अन्यत्र कहीं नहीं झुकेगा। गुरूदेव की पूजा के बाद दूसरी कोई पूजा शेष नहीं बचती। देवी देवताओं की पूजा के बाद कोई पूजा रह जाय लेकिन ब्रह्मवेत्ताओं का ब्रह्मज्ञान जिसके जीवन में प्रतिष्ठित हो गया फिर उसके जीवन में किसकी पूजा बाकी रहे ? जिसने सदगुरू के ज्ञान को पचा लिया, सदगुरू की पूजा कर ली उसे संसार खेलमात्र प्रतीत होता है। राजा जनक ने संसार में खेल की नाँई व्यवहार करते हुए जीवन्मुक्त होकर परम पद में विश्रान्ति पायी।

ऐसे ही तुम भी उन महापुरूषों की, ब्रह्मवेत्ता गुरूओं की कृपा को हृदय में भरते हुए, ज्ञान को भरते हुए, आत्म-शान्ति को भरते हुए, उनके वचनों पर अडिगता से चलते हुए गुरूपूर्णिमा के इस पावन पर्व पर घड़ीभर अन्तर्मुख हो जाओ।

गुरूपूर्णिमा के पर्व पर परमात्मा स्वयं अपना अमृत बाँटते हैं। वर्ष भर के अन्य पर्व और उत्सव यथाविधि मनाने से जो पुण्य होता है उससे कई गुना ज्यादा पुण्य यह गुरूपूर्णिमा का पर्व दे जाता है।

अनुक्रम

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राही रूक नहीं सकते

ब्रिटिश शासन के जमाने की बात है।

इटावा में सप्रू साहब डिप्टी कलेक्टर थे। उनका चाकर था मनहर नायी। एक रात भोजन करके सप्रू साहब पलंग पर आराम कर रहे थे। मनहर पैर दबा रहा था। साहब बोलेः

"अरे मनहर ! कोई कहानी सुना।"

"साहब ! आपने तो बहुत किताबें पढ़ी हैं और कहानियाँ सुनी हैं। आप ही सुनाओ।"

"नहीं.....। तू कहानी सुना। मैं सोते सोते सुनुँगा।"

"वाह जी....! मैं कहानी सुनाऊँ और आप सोते रहें। मैं क्या ऐसे ही बकता रहूँ ?"

"नहीं... नहीं....। मैं चाव से सुनुँगा।"

"अच्छा, तो सुनो। लेकिन 'हूँ.... हूँ...'. करते रहना। मुझे पता रहे कि आप सुन रहे हैं। नहीं तो आप सो जायें और मैं सुनाता रहूँ तो मेरी शक्ति ऐसे ही व्यर्थ चली जायगी।"

वाणी का जो संयम करता है उसकी वाणी का प्रभाव भी होता है। बिन जरूरी बोलना नहीं, बिन जरूरी सुनना नहीं, बिन जरूरी देखना नहीं। ऐसे मनुष्य की वाणी का, मन का, बुद्धि का, जीवन का विशेष प्रभाव होता है।

मनहर नायी ने कहानी प्रारंभ करते हुए कहाः "साहब जी ! तैयार हो जाइये। कहानी सुनिये।

गर्मियों के दिन थे। अरब का सम्राट अपने महल की छत पर शाही पलंग लगवाकर आराम किया करता था। केवड़े का छिड़काव किया जाता था। शय्या पर सुगन्धित सुकोमल पुष्प बिछाये जाते थे।

पूनम की रात थी। सोने का पलंग था, रेशम की निवाड़ से भरा गया था, कालीन बिछा था, उस पर गद्दा बिछा था। फिर एक कालीन बिछा था। उस पर सफेदी बिछी थी। अगल-बगल चार तकिये रखे थे। चाँद की अमृतवृष्टि हो रही थी। पलंग सजाने वाली दासी ने पलंग सजाया। दिनभर की थकी माँदी थी। बिस्तर सजाकर सोचा कि राजा साहब इस पर आराम फर्माते हैं। पुष्पों की सुगन्ध आ रही है। चाँद से शीतलता बरस रही है। मन्द मन्द पवन लहरा रहा है। कितना मजा आता होगा ! बादशाह सलामत अभी भोजन करेंगे, बाद में आयेंगे। तब तक जरा सा लेटकर देख लूँ दो-चार मिनट।

वह पलंग पर लेटी। थकी तो थी ही। पलंग पर पुष्पों की गुदगुदी। केवड़े की सुगन्ध। मन्द मस्तानी हवा। पूनम की चाँदनी। तीन मिनट भी नहीं बीते, दासी टप से सो गयी।

बादशाह सलामत भोजन करके आये। देखा तो पलंग पर दासी ! जवानी हो..... सत्ता हो.... राजवैभव हो.... भोग की सामग्री हो... चापलूसी करने वाले लोग हों..... फिर..... अहंकार को बाकी बचता भी क्या है ? वह आग बबूला हो गया। अपनी बेगम को बुलाया। पूछाः 'इसको क्या सजा देनी चाहिए ? तू जो कहेगी वह सजा दी जाएगी, क्योंकि इसने तेरा अपमान किया है। तू ही फर्मान कर, इसको क्या सजा दी जाय ?"

दासी तो बेचारी भय से थर-थर काँप रही थी। पसीने से तरबतर हो गई। प्राण सभी को प्यारे होते हैं। प्राण बचाने के लिए वह दासी बादशाह सलामत के कदमों में गिर पड़ी और रोने लगी। धन, सत्ता, यौवन और उसमें अहंकार मिलता है तो आदमी में क्रूरता भी आती है।

'बादशाह सलामत की बेगम का अपमान....! बादशाह का अपमान.....! बादशाह के बिस्तर पर सोने की गुस्ताखी....! ....और फिर माफी ? हरगिज नहीं। वैसे तो फाँसी की सजा होनी चाहिए लेकिन दया करते हैं। बेगम ! तू ही सजा का फर्मान दे।'

बेगम ने कहाः "यह घण्टाभर पलंग में सोयी है। साठ मिनट के साठ कोड़े फटकारे जायें।' साठ कोड़े आदमी मारे तो वह बेचारी मर ही जाय ! ऐसा बादशाह सोच ही रहा था इतने में बेगम ने कहाः "मैं ही अपने हाथ से इसको मारूँगी। स्त्री है तो इसको मैं ही सजा दूँगी।"

बेगम ने कोड़ा दे मारा दासी की पीठ परः एक... दो... तीन.....। राजा गिनता जा रहा था। चार-पाँच कोड़ों में तो दासी गिर पड़ी। बेगम साहिबा भी थक गई। औरत की जात मुलायम होती ही है।

बादशाह एक..... दो....तीन....चार....पाँच..... कहकर गिनती गिनने लगा। तीस कोड़े तक दासी जोर-जोर से रोती रही, परन्तु इसके बाद दासी की मति पलट गई। तीस से साठ तक दासी खूब हँसती रही।

वह हास्य भी कोई गहराई को छूकर आ रहा था। कोई समझ की धारा से प्रकट हो रहा था। बादशाह ने पूछाः "पहले रोती थी और बाद में हँसने लगी। क्या बात थी ?"

"जहाँपनाह ! प्रारंभ में कोड़े लगे तब बहुत पीड़ा हो रही थी। सोचा कि अब क्या करूँ ? यह शरीर तो एक दिन जलने वाला ही है। कोड़े खाकर मरे चाहे मिठाइयाँ खाकर मरे इस मरने वाले शरीर को कोड़े लगते हैं। किसी बाबा की वाणी सुनी थी वह याद आ गई तो सहनशक्ति आ गई। सहनशक्ति आते ही ज्ञान की किरण मिली कि मैं तो केवल साठ मिनट सोयी हूँ और साठ कोड़े लगे हैं लेकिन जो रोज सोते हैं, रातभर सोते हैं, उनको न जाने कितनी सजा होगी ? अच्छा है कि मुझे अभी सजा मिल गयी और मैं ऐसी आदत से बच गई, अन्यथा मुझे भी आदत पड़ जाती तो मैं भी ऐसे पलंग की इच्छा करती, केवड़े की सुगन्ध की, पुष्पाच्छादित शय्या की इच्छा करती। अल्लाह की बन्दगी की इच्छा नहीं होती। भोग में विघ्न डालकर मेरे मालिक ने मुझे योग में प्रेरित कर दिया। मैं यह सोचकर हँसी कि सजा देने वालों को अपनी सजा की खबर ही नहीं है।"

इतना सुनते ही बादशाह की बुद्धि बदल गई। बादशाह ने ताज फेंक दिया, इमामा फेंक दिया, जामा फेंक दिया और जूते फेंककर फकीरी कफनी पहन ली। श्रीरामचन्द्रजी दिन में वन की ओर गये थे, बादशाह ठीक आधी रात को वनगामी हो गया।"

मनहर ने यह कहानी डिप्टी कलेक्टर साहब को सुनायी।

"फिर क्या हुआ ?"

"फिर होगा क्या ? धीरज रखो। सुनो। फिर उस बादशाह ने खुदा की बन्दगी की, मालिक को याद किया। जीवन धन्य किया।"

सप्रू साहब जा तो रहे थे नींद में लेकिन सदा सदा के लिए उनकी नींद खुल गई। वे बोलेः

"मनहर ! तुमने बहुत अच्छा किस्सा कहा, किन्तु अब हमको भी इस पलंग से उतरना चाहिए। हम साड़े पाँच सौ रूपये तनख्वाह पाते हैं। जो गरीब हैं, भूखे हैं, नंगे हैं, लाचार हैं, थके हैं, माँदे हैं उनसे भी सरकार टैक्स लेकर हमको पगार देती है। पीड़ित व्यक्तियों का पैसा लेकर मैं भी गिलम गालीचे बसा रहा हूँ। मैं भी चैन की नींद लेकर आयुष्य बरबाद कर रहा हूँ। नहीं, नहीं.... अब यह हरगिज नहीं होगा।"

मनहर कहता हैः "साहब ! आप क्या कहते हैं ? क्या हो गया आपको ?"

"आज तूने बहुत बढ़िया कथा सुनायी।"

"साहब ! यह तो कहानी है।"

"नहीं....! यह सत्य घटना है अथवा सत्य को छूती हुई बात है।"

सप्रू साहब पलंग से नीचे उतरे। भूमि पर एक सादी चद्दर बिछाकर उस पर निद्राधीन हुए।

दूसरे दिन सुबह सप्रू साहब उठे। अपनी डिप्टी कलेक्टर की पोस्ट का इस्तीफा लिख दिया। पत्नी को  माँ कहकर पैर छू लिये। बेटे से कहाः "तू भगवान का बेटा है। अगले जन्म में किसी का बेटा था। इस जन्म के बाद भी न जाने किसका बेटा होगा"

बेटा बड़ा हो और सुख दे यह मूर्खों की मान्यता है। सुख तो अपनी समझ से, अपनी तपस्या से होता है। बेटे बड़े हों और सुख दें ऐसी भावना से जो बेटों को पालते हैं उनको बुढ़ापे में दुःख के सिवा भी कुछ नहीं मिलता।

'"क्या इन हाड़ मांस के पुतलों से भगवान अनन्त गुने शक्तिशाली नहीं हैं ? जो मिट्टी के पुतलों में भरोसा रखता है और परमात्मा में भरोसा खोता है उसको तो रोना ही पड़ता है। मुझे बुढ़ापे में रोना पड़े उसके पहले ही मैं चेत गया। अब तू जान और तेरा काम जाने। पढ़ो, लिखो, जो तुम्हारा प्रारब्ध होगा वह मिलेगा।"

उस समय इटावा जिले में एक अंग्रेज कलेक्टर थे और तीन डिप्टी कलेक्टर थे। उन सबने सुना कि सप्रू साहब ने इस्तीफा दे दिया है और अपने बंगले के पास इमली के पेड़ के नीचे एक मात्र फटा कम्बल लेकर फकीरी वेश में बैठ गये हैं। कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, सुपरिन्टेंडेंट पुलिस, कोतवाल आदि सब उनको समझाने आये। अंग्रेज कलेक्टर बोलाः

"अरे सप्रू ! तुम क्या करते हो ? फकीर का वेश बनाया है ?"

"हाँ।"

"मेमसा'ब का क्या होगा ? लड़के का क्या होगा ? अभी सरकार की नौकरी करो। पाँच घण्टे का फर्ज अदा करो, बाकी के समय में फकीरी करो। जब लड़का बड़ा हो जाय, मेमसा'ब बूढ़ी हो जाय, पेन्शन मिलने लगे तब पूरे फकीर बनना। हम भी तुम्हारे साथ फकीर बनेंगे। राम राम करेंगे। तुम्हारे जैसे अमलदार का इस्तीफा हम नहीं लेते।

"तुम लो चाहे न लो। मैं अब बन्दों की गुलामी छोड़कर मालिक की गुलामी करूँगा। तुमको रिझाने के बदले उसी को ही रिझाऊँगा।"

उन्होंने बहुत समझाया लेकिन सप्रू साहब दृढ़ रहे अपने निर्णय में। साथवाले डिप्टी कलेक्टर ने अंग्रेज से कहाः

"साहब ! कभी-कभी कुछ पुण्य की घड़ियाँ होती हैं तब बात लग जाती है और आदमी की जिन्दगी बदल जाती हैं। किसी पावन क्षण में एक लब्ज भी लग जाय तो जीवन करवट ले लेता है। अब इनकी राह बदल गई है। इनका मन काम में से मुड़कर राम की ओर चल पड़ा है। तुम्हारे हमारे समझाने से कुछ न होगा।

मेरा भाई बाँदा जिले में तहसीलदार था। वह नदी के किनारे कहीं जा रहा था। नदी की उस हरियाली भूमि में एक साँप मेढक को पकड़े हुए था। मेंढक 'ट्रें.....ट्रें....ट्रें....' चिल्ला रहा था। उसका आक्रन्द सुनकर मेरा भाई घर आया और नौकरी से इस्तीफा दे दिया। बोलाः "हम लोग भी काल के मुँह में पड़े हैं। हमें भी काल ने पकड़ा ही है। संसार के दुःखों से कराह रहे है फिर भी हम अपने को तहसीलदार मानते हैं, वकील मानते हैं, डॉक्टर मानते हैं, इंजीनियर मानते हैं, सेठ-साहूकार मानते हैं। धिक्कार है ऐसे जीवन को !"

"मेरा भाई तहसीलदार छोड़कर फकीर हो गया। अब पता नहीं कहाँ है, गंगा किनारे है कि जमुना किनारे है कि नर्मदा किनारे है. किसी भी किनारे हो लेकिन है मोक्ष के किनारे।"

सप्रू साहब को और भी उत्साह मिल गया। अंग्रेज साहब ने सप्रू साहब को बहुत समझाया।

नासमझ लोग साधकों को समझाने का ठेका ले बैठते हैं। यह सोये हुए लोगों की दुनियाँ है। इसमें कोई कोई जागता है तो फिर उसे सुलाने की कोशिश करते हैं। लेकिन जिसको शब्द की चोट लग जाती है वह फिर नहीं सोता। सप्रू साहब सोये नहीं। जगने की यात्रा पर चलते रहे। इटावा  दक्षिण दिशा में यमुना के किनारे पर अपना डेरा डाला। हाथ में एक डण्डा रखते थे। मन लगता तो हरि का ध्यान स्मरण करते। नहीं तो डण्डे से खटक खटक करते थे। अतः लोग उनको खटखटा बाबा कहने लगे।

दस बजे के करीब वे झोली लेकर भिक्षा लेने शहर में जाते थे। पब्लिक उनको पहचानती तो थी ही। सभी चाहते थे कि वे आज हमारे द्वार पर आयें। झोली में रोटी लेते थे और उस झोली को यमुना जी में डुबाते थे। तदनन्तर उस झोली को एक इमली की डाली पर लटका देते थे। चार बजे तक झोली लटकती रहती थी। फिर कुछ स्वयं खाते और बाकी बन्दरों को खिला देते थे। फटी कमली के सिवा कोई वस्त्र पास नहीं रखते थे। इस प्रकार इटावा के उस डिप्टी कलेक्टर ने इटावा में ही बारह साल घोर तपस्या की।

एक बार इन खटखटा बाबा ने भण्डारा किया। घी की कमी पड़ गई। कड़ाही चढ़ी हुई थी। शहर दूर था। बाबा ने एक चेले से कहा कि दो कलसा यमुनाजल लाकर कड़ाही में छोड़ दो। वैसा ही किया गया। यमुना का जल घी बन गया। पूड़ी तली गई।

यमुनाजी के बहाव में पद्मासन में बैठे हुए कोई सिद्ध जा रहे थे। उन्होंने कहाः "अरे खटखटा ! जरा पानी तो पिला दे !" खटखटा बाबा कमण्डल में पानी लेकर यमुनाजी में पानी पर चलते चलते गये और सिद्ध को पानी पिलाया। तब सिद्ध ने कहाः "मैं भी सिद्ध और तू भी सिद्ध हो गये।"

खटखटा बाबा की समाधि पर अब अनेक इमारतें बन गयी हैं। समाधि का मन्दिर और विद्यापीठ की इमारत दर्शनीय है। सहस्रों प्राचीन पुस्तकों का अपूर्व संग्रह किया गया है। साल में एक बार मेला लगता है। भारत के विद्वानों, योगियों और पण्डितों को निमंत्रण देकर बुलाया जाता है। खूब व्याख्यान होते हैं। खटखटा बाबा की समाधि इटावा का तीर्थस्थान है। इटावा जिले का बच्चा बच्चा खटखटा बाबा के नाम से परिचित है।

कहाँ तो अपने बंगले पर आराम और विलास.... और कहाँ कठोरता भरी फकीरी ! जिनके खून पसीने के पैसों से ऐशोआराम कर रहे हैं उनका बदला चुकाने का अवसर आ जाय उससे पहले ही चेत जायें तो अच्छा है।

जो शरीर का चैन और आराम चाहते हैं, शरीर का सुख और सुविधा चाहते हैं, ऐसे ही विलास में जीवन पूरा कर देते हैं वे साँप के मुँह में मेंढक जैसे हैं। काल के मुँह में पड़ा हुआ जीव शरीर के चैन और आराम की फिक्र करता है। लेकिन सच्चे साधक, सच्चे जिज्ञासु इस बात की फिक्र करते हैं कि आयु बीत रही है। जीवन नष्ट हो रहा है। देखते ही देखते दादा मरा.... दादी मरी.... चाचा मरा.... फूफी मरी... सब मरने वाला यहाँ हैं। काल-कराल किसी को छोड़ता नहीं। अनेक रूप लेकर, अनेक निमत्त बनाकर काल प्राणी मात्र को अपने पाश में बाँधकर मौत की खाई में ले जाता है।

राजा विक्रमादित्य प्रजा का खूब ख्याल रखते थे। वेश बदलकर नगरचर्चा सुनने निकलते थे ताकि राज्य में क्या हो रहा है इसका पता चले।

जिसको जो पद है, जो सत्ता है उस पद और सत्ता का ठीक उपयोग नहीं है कि उसके द्वारा बहुजन हिताय प्रवृत्ति हो। वह राजा ऐसा मानता था कि जो राजा प्रजा के दुःख पर दृष्टि नहीं डालता, प्रजा के दुःख मिटाने की चिन्ता नहीं करता, केवल वाहवाही और ऐशोआराम के लिए राज्य करता है, वह राजा नरक का अधिकारी होता है।

एक बार विक्रमादित्य ने देखा कि सामने से रीछ आ रहा है। आते-आते लोटने पोटने लगा। बड़ी विचित्रता थी उसके लोटने-पोटने में। यह कोई साधारण रीछ मालूम नहीं होता था। राजा कुछ सोचे इतने में वह रीछ एक सुन्दरी षोडश वर्षीया आकर्षक युवती बन गयी। राजा आश्चर्यचकित होकर देखता रह गया। युवती नयनलुभावन चाल ढाल से चलती हुई किसी पनघट पर जा बैठी। इतने में दो सिपाही वहाँ से गुजरे। उनको तिरछी नजर से निहारती, घायल करती हुई वह बोलीः "क्यों जी ! आपके पास कुछ खाने-पीने का है क्या ?"

"खाने को हमारे पास अभी नहीं है लेकिन तुम्हारे जैसी सुन्दरी को इस एकान्त में भूख लगी है तो हम लाये बिना रह भी कैसे सकते हैं ?"

एक तो युवान ललना का नेत्र-कटाक्ष और दूसरा वाणी का लालित्य ! सिपाही घायल हो गये। दोनों भाई थे। कुछ कारणवश नौकरी से छुट्टी लेकर अपने गाँव  जा रहे थे। बड़ा भाई बोलाः

"आप बैठिये। मैं नगर से खाने पीने को लाता हूँ।"

वह नगर में गया और छोटा भाई वहाँ रहा। वह सुन्दरी छोटे से बोलती हैः "तुम मेरे साथ भाग चलो।"

"देवी ! तुमने मेरे बड़े भाई से मीठी बातें की है, मेरे भाई से नजर मिलायी है अतः तुम मेरी भाभी हुई । भाभी तो माता के समान होती है। ऐसी बात मत करो।"

"बेवकूफ कहीं का ! तेरे भाई की उम्र कितनी है ? उस बूढ़े के बाल सफेद हैं....।"

"वे होंगे 48-50 के।"

"और तेरी उम्र कितनी है ?"

"मेरी उम्र तीस वर्ष की।"

"और मेरी उम्र ?"

"वह तो मैं नहीं जानता।"

"फिर भी....?"

"होगी सोलह-सत्रह साल।"

"मैं सोलह साल की.... 50 वर्ष के बूढ़े के साथ शादी करूँगी कि तेरे जैसे जवान के साथ....?"

वह निरूत्तर हो गया।

"कुछ भी लेकिन तुम तो मेरी भाभी हो।"

"बेवकूफ कहीं का ! मेरा कहना मान। भाग चल मेरे साथ।"

"नहीं... मैं भारत के धर्मग्रन्थों से परिचित हूँ। बड़े भाई के साथ जिसने औरत के भाव से निगाह डाल दी वह मेरी भाभी है..... माता के समान है।"

इतने में उस सुन्दरी ने अपनी आकर्षक साड़ी को इधर उधर से चीर डाला। कपड़े अस्त-व्यस्त कर लिये। बाल बिखेर दिये। बड़ा भाई मिठाई  की पुड़िया लेकर आया।

"लो खाओ।"

"डाल दो कुँए में और तुम भी डूब मरो। मिठाई खिलाने आये। मुँह तो देखो ?"

"अरे कमललोचनी ! क्या हुआ तेरे को ?"

"पूछो अपने भाई से ! तुम चले गये तो वह मुझसे अनुचित व्यवहार करने लगा.....।" ऐसा कहकर वह रोने लगी। बड़ा भाई छोटे पर आग बबूला हो गयाः

"क्यों बे ! इतनी बदतमीजी ? तू मुझे जानता नहीं ?"

"भाई साब ! यह झूठ बोल रही है।"

"आया बड़े सच्चे का बेटा ! कमबख्त कहीं का।" लगा दिया तमाचा।

काम हमेशा अंधा होता है। काम को विकृत कर दो तो क्रोध का रूप ले लेगा। लेकिन काम को राम में बदल दो तो मोक्ष का रूप ले लेगा।

बड़ा भाई क्रुद्ध हो गया। कुछ का कुछ बड़बड़ाने लगा। स्त्री के आगे अपमान होता है तो ज्यादा चुभता है। थोड़ी शक्ति होती है तो भी ज्यादा उछल कूद मचाती है। यह माया ऐसी ही है।

यह सब व्यवहार में आप लोग भी अनुभव कर सकते हैं। जब बाजार से गुजरें और कोई मजाक कर दे या जरा सा अपमान कर दे तो इतना दुःख न होगा। जब मेमसा'ब साथ में हो फिर देखो। आपका रंग निराला होगा। अपने ढंग से स्कूटर पर जा रहे हो तो रंग एक होगा लेकिन पीछे माया बैठी है तो दिमाग में उसकी हवा भी साथ में होगी। इस माया से बचते रहना। वह अहं ले आती है, झगड़े ले आती है। लेकिन उसमें अगर मालिक को देखा, उसको भी मालिक के रास्ते लगा दिया तो वह तुम्हारा कल्याण कर सकती है और तुम उसका कल्याण कर सकती हो। नहीं तो ? तुम अकेले देवदर्शन के लिये जाते हो, आश्रम में अकेले सत्संग सुनते हो, अपने ढंग से मस्ती लूटते हो, लेकिन श्रीमती जी साथ में होती है और पास-पास में बैठे हो तो जब कोई बढ़िया बात सत्संग में आती है तब भीतर डूबने के बदले श्रीमती जी की तरफ ध्यान जाता है और इशारे से बताते हो कि कैसी बढ़िया बात है !

कई अनजान लोग मुझसे कहते हैं कि आप आदमियों को और महिलाओं को अलग-अलग क्यों बैठाते हैं ? मैं बोलता हूँ- "भाई ! हम ऐसे ही हैं।" हर एक को क्या बोलें ? सही बात यह है कि पुरूष का चुम्बकत्व स्त्रियों पर प्रभाव डालता है और स्त्रियों का चुम्बकत्व पुरूषों पर प्रभाव डालता है। इसीलिए अपने जीवन को महान् बनाने वाले व्यक्ति साधनमार्ग में जितना हो सके, एक दूसरे के कल्याण के लिए एक दूसरे के शरीर से बचते हैं। इस प्रकार कल्याण शीघ्र होता है। ऐसा महापुरूषों का कहना है।

तो उस बड़े भाई ने निकाली तलवार। छोटा भाई थोड़ा मर्यादावाला था लेकिन था तो कलयुगी ही। उसने भी म्यान से तलवार निकाली और दोनों ने एक दूसरे को खत्म कर दिया।

राजा विक्रमादित्य दूर बैठे सब देख रहे हैं कि वाह रे रीछ में से बनी हुए नारी ! वह महिला थोड़ी आगे चली फिर से जमीन पर लोटपोट हुई। लोटते लोटते सर्पिणी बन गई। राजा को आश्चर्य हुआ।

सर्पिणी चलती-चलती नदी की ओर जाने लगी। नदी में एक बड़ी नाव में तीन सौ आदमी आ रहे थे। सर्पिणी पानी को काटते हुए नदी में चली और नाव में जा गिरी। सब यात्री घबरा गये और एक तरफ हो गये। नाव उल्टी हो गई। तीन सौ आदमी डूब गये।

वह सर्पिणी नदी से बाहर आयी और एक ज्योतिषी का रूप ले लिया। गले में रूद्राक्ष की माला, ललाट में तिलक, बगल में पोथी। प्राचीन काल का ज्योतिषी टप-टप आगे जा रहा है। विक्रमादित्य ने पैर पकड़ लिये।

"भगवन् ! आप कौन हैं ? सच बताओ।"

"क्या मतलब ?"

"यह दास आपको तभी से देख रहा है जब आप रीछ बनकर आ रहे थे। फिर सुन्दरी बने, फिर सर्पिणी बने। अभी आप इस रूप में हैं। अभी तक मुझे पता नहीं चला कि आप कौन है ?"

"मैं काल कराल हूँ।"

"आप ऐसा क्यों करते हैं ?"

"जिस समय जिसकी जिस निमित्त में मृत्यु निर्मित हुई है उसको उस निमित्त से मैं मार देता हूँ। बहाने अलग-अलग हो जाते हैं.... जैसे नाव डूब गई, लेकिन व्यवस्था मेरी ही होती है। किन व्यक्तियों को कब मारना है, मुझे पता है। ईश्वर ने मुझे यह काम सौंपा है और योग्यता भी दी है।"

"तो बताने की कृपा करो कि मेरी मौत कब होगी ?" विक्रमादित्य ने पूछा।

"यह बताने की सरकार की आज्ञा नहीं है। तुम अभी बहुत दिनों तक जीवित रहोगे। तुम्हारे द्वारा ईश्वर अनेकों परोपकार के काम करायेंगे। तुम भी ईश्वराधीन और मैं भी ईश्वराधीन। अब जाओ।"

"फिर भी इतना तो बतला दीजिये कि मेरी मौत कैसे होगी ?"

"कोठे पर से गिरकर। जिस दिन तुम रपट पड़ोगे, समझ लेना कि बस मौत आ गयी।"

"अब आप किसकी घात में हैं ?"

"तुम्हारे अधिकार से बाहर का प्रश्न है।"

"प्रभु ! कृपा करके बताओ कि आपने रीछ बनकर क्या किया था ?"

"एक आदमी पेड़ पर चढ़ा लकड़ी काट रहा था। उसको पेड़ पर से गिराने के लिए मैं रीछ बन गया था और पेड़ पर चढ़ गया था, उसे गिराकर मारा था।"

"आप विविध प्रकार के रूप क्यों बनाते हैं।"

"जिसकी मौत जिस रूप से लिखी होती है, उसे मैं उसी बहाने से मारता हूँ।"

"हे देव ! क्या कोई आपके कराल हाथ से बचा भी है ?"

"हाँ....।"

कोई कोई जोगी बच गये, पारब्रह्म की ओट।

चक्की चलती काल की, पड़ी सभी पर चोट।।

ऐसे कोई विरले बच जाते हैं बाकी सब शिकार हो जाते हैं।"

"क्या करने से मौत नहीं आती ?"

"परमात्मा की शरणागति से।"

अच्छे काम करवाता ईश्वर है और आदमी की खोपड़ी में भूत घुस जाता है कि मैंने किया। मैंने मिल सँभाली..... मैंने मंदिर सँभाला... मैंने आश्रम सँभाला.... मैंने मठ सँभाला... मैंने समिति सँभाली.... मैंने इतना इतना काम किया।

अरे भाई ! तू अपने प्राण तो सँभालकर दिखा उसकी कृपा के बिना ? जिस व्यक्ति को अहं आ जाता है, काल का जोर उस पर चलता है।

"हे विक्रम ! जो अपने को अकर्त्तापद में स्थित करता है, जो परमात्मा की लीला में सहमत होता है, परमात्मा जो करता है वह होने देता है उस पर मेरा जोर नहीं चलता है। बाकी के जीवों का मैं भक्षण कर जाता हूँ।"

जब मौत आती है तब किसी का वश नहीं चलता और जब तक नहीं आती है तब तक मारने का वश भी किसी का नहीं चलता।

मौत से डरना या चिरंजीवी होने के लिए बचाव करना, टिकड़ियाँ खाना...... टॉनिक लेना.... इससे काम नहीं बनेगा। मौत को याद रखकर मौत से पार होने की तजवीज में जो रहता है उसके लिए फिर मौत नहीं होती।

इन कथाओं से, घटनाओं से हमें जगना है। विक्रमादित्य का विवेक तो जग गया, उसका तो काम हो गया। भरथरी का विवेक भी जग गया। बात अब हमारी है कि हम इतनी-इतनी कथाएँ सुनते हैं.... शायद हमारा भी खटका जग जाय..... ऐसी घड़ियाँ आ जाय कि हमें भी कोई कहानी चोट पहुँचा दे। ऐसा क्षण आ जाय कि कोई किस्सा, कोई कहानी, कोई घटना हमारे जीवन की घटना को बदल दे। ॐ......ॐ.......ॐ.........ॐ.......

बुद्ध ने देखा रोगी आदमी...... कोई आदमी मरा जा रहा था। घटना घट गई..... चल पड़े बुद्धत्व के रास्ते और भगवान बुद्ध हो गये। डिप्टी कलेक्टर ने कहानी सुनते-सुनते सब दे मारा। कम्बल लेकर फकीर हो गये।

ऐसे ही सिंध देश में पारूमल नाम का सिपाही था। वायसराय के आगमन के बन्दोबस्त में था। दो दिने से बेचारे को चैन की नींद नहीं और बैठकर कहीं भोजन नहीं खाया था। तीसरे दिन उसे छुट्टी मिली घर आने की। भोजन करने बैठा। एक ग्रास खाया, दूसरा हाथ में था..... इतने में साहब का आदमी आकर बोलाः

"डी.एस.पी. सा'ब बुलाते हैं।"

पारूमल को लगा कि अरे ! बन्दों की इतनी-इतनी खिदमत करते हैं फिर भी जिस रोटी के लिए वर्दी पहनते हैं, घरबार छोड़कर डयूटी पर जाते हैं, उस रोटी को खाने की भी फुरसत नहीं देते ? बन्दों की गुलामी का आखिर यही नतीजा ? उसने अपनी वर्दी और तमंचा बगल में लिया। धोती फाड़ी और दो टुकड़े कर दिये। एक टुकड़ा पहन लिया और दूसरा कन्धे पर ओढ़ लिया। वर्दी के कपड़े जाकर साहब के आगे दे मारे। बोलाः "यह तुम्हारी डयूटी और यह तुम्हारी वर्दी तुम्हीं सँभालो।"

"साहब बोलाः "हम तुम्हें प्रमोशन देना चाहते थे। यह तुम क्या कर रहे हो ?"

"साहब ! तुम्हारा प्रमोशन तो तुम्हारा दिया हुआ ही होगा। आखिर तो तुम्हारे नीचे ही रहेंगे। तुम भी किसी के नीचे और वह भी किसी के नीचे है। उन सबके ऊपर मौत। मौत के भी ऊपर है उसी मालिक की गुलामी अब करूँगा।"

साहब ने खूब समझाया लेकिन......

राही रूक नहीं सकते.......

जिसको सच्चे हृदय से लगन लग जाती है, चोट लग जाती है फिर वे नही रूकते। समझाने वाले समझाते रहो।

पारूमल चल पड़े। उनकी पत्नी मायके थी। गये वहाँ। ससुर जी दातुन कर रहे थे। देखा कि सूबेदार साहब पारूमल और यह भिखारी का वेश ? फकीर का वेश ? चिढ़ गये। पारूमल ने पूछाः "गंगा कहाँ है ?" पत्नी का नाम गंगा था।

"अब जा, तेरे जैसे लूखे को थोड़े ही गंगा दूँगा।"

"मैं गंगा को लेने नहीं आया हूँ, गंगा माता कहने को आया हूँ। मुझे दर्शन करा दो।"

"जा.......जा.......दर्शन परशन.....।"

"अच्छा हुआ।"

भलुं थयुं भांगी जंजाळ सुखे भजीशुं श्रीगोपाळ।।

पारूमल वापस आ गये। अपने घर में कमरा बन्द करके बैठ गये। जब जरूरी कुदरती हाजत होती थी तब उठते थे, बाकी बैठे रहते। परमात्मा से प्रार्थना करतेः

"हे प्रभु ! मैं कुछ नहीं जानता हूँ। लेकिन मुझे तुझको पाना है यह तू जानता है। मैं जैसा हूँ, अब तेरा हूँ। तू ही राह दिखा। तू ही मेरा राहबर हो जा। तू ही मेरा पथप्रदर्शक हो जा...... तू ही मेरा दाता.... तू ही मेरा स्वामी.....। प्रभु..... प्रभु......प्रभु !"

पारूमल कभी रोता, कभी हँसता, कभी सुन्न मुन्न हो जाता। कभी ध्यानस्थ रहता। आठ दिन तक कमरे में बन्द रहा। कुछ साधना की। एकाध कड़ी उसके हाथ लग गई। अनजाने में शिवनेत्र खुल गया। सामर्थ्य का केन्द्र सक्रिय हो गया।

पारूमल ने सोचा कि घरवालों से छुट्टी लूँगा तो देंगे नहीं। कोई कहेगा तू मेरा बेटा है, कोई कहेगा मेरा भाई है, कोई कहेगा मेरा काका है, कोई कहेगा मेरा मामा है। ये सब रोयेंगे, चीखेंगे। अब इनकी ममता को भी जरा आजमाकर देखें।

उनके कुटुम्ब का जवाहरात का धन्धा था। हीरे जवाहरात जड़ित सुहावने सुन्दर अलंकार आभूषण बनाकर शो केस में रखते थे बेचने के लिए। कई सुनार उनके यहाँ काम करते थे। बड़ी पेढ़ी थी। पारूमल जवाहरात लेकर हमाम दस्ते  में डालकर कूटने लगा। गहनों पर दस्ते के एक धक्के से भाई का भाईपना टूट गया, चाचा का चाचापना चूर हो गया, मामा का मामापना मिटने लगा, भतीजे का भतीजापन भाग गया। संसारी सम्बन्धों में हमाम-दस्ते का एक प्रहार सहने की ताकत नहीं है। गहनों पर दो प्रहार किये तो सब अपने पराये हो गये। कोई कुछ बोले कोई कुछ बोले लेकिन पारूमल ने पाँच दस दे मारे। सब गुड़ गोबर कर दिया गहनों का। काका डाँटने लगाः

"हमारा ऑर्डर का माल थाष इज्जत का सवाल है। पिछले 150 साल की पेढ़ी का नाम खराब कर दिया। तूने सब बरबाद कर दिया। आठ दिन से नौकरी छोड़कर बाबा बन कर बैठा है और हमारे ऊपर मर्ज होकर बैठा है।"

आज तक तो बोलते थे पारूमल..... पारूमल.... लेकिन आठ दिन से नौकरी गई तो पारूमल तुम्हें बोझीला लगता है ?

संसार का सम्बन्ध यही है। तुम लोग आजमाना मत लेकिन भीतर से समझना जरूर। ॐ....ॐ.....ॐ....

सुर नर मुनि सब यह रीति।

स्वारथ लागि करहिं सब प्रीति।।

स्त्री में रूप लावण्य है, सौन्दर्य है तब तक वह पति के लिए प्यारी है। पति में शक्ति है और कमाता है तब तक स्त्री के लिए पति प्यारा है। पुत्र में भावि सुख की आकांक्षा है इसलिए पुत्र प्यारा लगता है। पिता पालता-पोसता है, बाद में पिता की संपत्ति मिलेगी इसलिए पिता प्यारा लगता है। ये सब रिश्ते-नाते एक दूसरे को शोषते हैं। जिसको परमात्मा प्यारा लगता है वह सचमुच प्यारा हो जाता है, बाकी के लोग ठोकर मारकर खाते हैं। ॐ.....ॐ......ॐ......

हमाम दस्ते के थोड़े धक्के लगे तो सारे सम्बन्ध गिर पड़े। लोग कुछ का कुछ बोलने लगे। पारूमल तो भीतर से जगे हुए थे। सँभलकर देख लेते थे कि किसका कितना प्रेम है। सारा प्रेम पूरा हो गया। संसार के प्रेम को आजमाकर देखो तो आपको लगेगा कि हमारे जैसा कोई बेवकूफ नहीं। आपका सूर्य जब तक चमकता होगा तब तक सब आपके इर्द गिर्द होंगे। आप चुनाव में जीत गये और किसी पोस्ट पर पहुँच गये तो पराये लोग भी अपने हो जायेंगे। लेकिन चुनाव या नौकरी से इधर-उधर हुए तो देख लो संसारियों के रंग !

इसीलिए परमात्मा पर भरोसा रखने के बजाय जो संसार के सम्बन्धों पर भरोसा रखता है वह आखिर में बुरी तरह ठुकराया जाता है। अपने अन्तर्यामी प्रभु के ऊपर भरोसा रखना चाहिए, उस प्रभु की खोज करनी चाहिए। वह खोज छोड़कर यदि संसार के सुखों की खोज की तो तुम्हें अन्त में अवश्य पछताना पड़ेगा।

पाँच दस हमाम दस्ते लगाकर पारूमल ने तो सारे सम्बन्धों का पोल खोल दिया। अब आसाराम यह आशा करते हैं कि तुम बिना हमाम दस्ता लगाये सम्बन्धों का पोल जान लो ऐसे दिन कब आयेंगे ?

पत्नी कहती हैं- "मैं आपकी हूँ" बच्चे कहते हैं- "हमारे पप्पा।" नौकर कहते हैं- "साहब.....।" लेकिन कब तक ?

साहेब तेरी साहेबी घट घट रही समाय।

जैसी मेंहदी बीच में लाली रही छुपाय।।

मेंहदी हरी दिखती है लेकिन उसमें लाली छुपी है। ऐसे यह देह नश्वर है लेकिन उसमें शाश्वत चेतना छपी है। उस चेतना का जो दीदार कर लेता है उसने सब कुछ कर लिया। उसका जो अनादर कर देता है, मानो उसने अपने जीवन का अनादर कर लिया। अपने आपका वह दुश्मन हो गया।

धन कमा-कमाकर कितना कमाओगे ? लाख.... दो लाख....दस लाख.... पचास लाख..... करोड़.... दस करोड़..... पचास करोड़.... हजार करोड़.... लेकिन आखिर क्या ? खाना दो रोटी और उसी शरीर को श्मशान में जला देना है। कबीर जी ने ठीक कहा हैः

सांई ते इतना मांगू जो नव कोटि सुख समाय।

मैं भी भूखा ना रहूँ साधू भी भूखा न जाय।।

इतना धन है तो काफी है। बाकी का समय बचाकर बन्दगी कर ली जाय। एकान्त में कभी रहा जाय। कभी अनुष्ठान किया जाय।

गुरूपूनम से चतुर्मास का प्रारम्भ होता है। साधना का कोष भरने के लिय चार महीने हैं। आठ महीने तो तिजोरी का कोष भरने और सँभालने के हैं और चतुर्मास के चार महीने योग साधना, भक्ति, ज्ञान को बढ़ाने के लिए हैं। आठ महीने वाल ऐहिक कोष यहीं पड़ा रह जायगा लेकिन यह चार महीनों वाला आध्यात्मिक कोष तुम्हें भी निहाल कर देगा और तुम्हारे द्वारा कइयों को निहाल करेगा फिर भी खूटेगा नहीं। ऐसा कोष भरने का प्रारंभिक दिन है गुरूपूर्णिमा।

पारूमल ने देखा कि सब ऐसा ही है। एक बूढ़े ने कहाः "तेरा दिमाग तो खराब नहीं हुआ है ! ऐसा क्यों किया ?"

"खराब दिमागवालों के बीच में जब किसी का दिमाग खुलता है तो उनको लगता है कि इसका दिमाग खराब हो गया। यह दुनियाँ पागलखाना है। पागलों के बीच में कोई अक्लवाला मिलता है तो सब पागल उसे पागल ही कहते हैं।"

"मतलब क्या ? तू अक्लवाला है तो ये जेवर तोड़े क्यों ?"

"मैंने तोड़े नहीं। मैंने कुछ किया नहीं। मैंने होने दिया। वह विधाता की मर्जी थी। और जेवर तो वैसे के वैसे पड़े हैं।"

जाकर देखा तो हमाम दस्ते में जो चूर – चूर हुए जेवर थे वे हैं नहीं और सब के सब शोकेस में यथावत् पड़े हैं। नाहक का टोला हो गया और लड़ रहे हैं।

"पारूमल ! ये कैसे बनाये तुमने ?"

"हमने तो नहीं बनाया लेकिन एक पानी की बूँद से जो राजा, महाराजा, सम्राट बना सकता है वह टूटे हुए गहनों को जैसे थे वैसे कर  दे इसमें क्या आश्चर्य है ? ईश्वर ने ही मेरे मोह को तोड़ने के लिए मेरे द्वारा करवाया। मैं अगर करने बैठता, जेवर कूटने और फिर ठीक करने बैठता तो मैं क्या मेरा बाप भी नहीं कर सकता। लेकिन मैं अनजाने में हट गया तो उसी की लीला हो गयी।"

फिर तो लोग वाह-वाह करने लगे कि अरे भाई ! तू तो बड़ा अच्छा आदमी है..... यह है.... वह है....।

"जान लिया.... जान लिया। अपने ही पास रखो ये खुशामद भरे वचन। " कहकर पारूमल चले गये एकान्त में।

एकान्त में आदमी की शक्तियों का विकास होता है। एकान्त में खतरा भी होता है। अगर साधक में प्रमाद आलस्य आ जाय, वह सो जाये, कुविचार आ जाये। जिस साधक ने सदगुरू से मंत्र प्राप्त किया है उसको एकान्त में कुविचार नहीं घेरेगा।

पारूमल चले गये हिमालय की झाड़ियों में। काफी दिनों के बाद उनकी धारणा-ध्यान-समाधि में पुष्टि होती गई। जीवत्व हटता गया और शिवत्व प्रकट होता गया। प्राणी मात्र में समभाव, असंगता, सहजता, सरलता, निर्मलता, विषयलोलुप-रहितता, निश्चिंतता और सहज स्वभाव में परमात्म दृष्टि इत्यादि सदगुणों का सामर्थ्य, सत्ता का सामर्थ्य इनके जीवन में आ गया। रूपयों का सामर्थ्य, सत्ता का सामर्थ्य गिने-गिनाये स्थानों में प्रभाव डालता है लेकिन साधना का सामर्थ्य जिसके पास है वह कहीं भी चला जाये, वह सामर्थ्य काम आता है।

वकील का सामर्थ्य वकालत की जगह पर, डाक्टर का सामर्थ्य प्रेक्टिस की जगह पर, राजा का सामर्थ्य राजगद्दी पर लेकिन साधना का सामर्थ्य सब जगह काम आता है। जिसके पास साधना का खजाना है वह इधर जाय, उधर जाय, परदेश जाय, अतल में जाए, वितल में जाय, रसातल जाय, पाताल जाय, भुःलोक जाय, भुवःलोक जाय, महःलोक जाय, तप लोक जाय, जनलोक जाय, जनलोक जाय, स्वर्गलोक जाय, उसकी साधना का प्रभाव सब जगह उसका बेड़ा पार कर देगा।

तुम यह संकल्प करो कि ये जो चतुर्मास शुरू  हो रहे हैं उसमें हम साधना का खजाना बनायेंगे। कुछ अपनी पूँजी बनायेंगे। यहाँ के रूपये तुम्हारी पूँजी नहीं है, तुम्हारे शरीर की पूँजी है। लेकिन साधना तुम्हारी पूँजी होगी। कोई अनुष्ठान का नियम ले लो, चतुर्मास में एक टाइम  भोजन और एकांतवास का नियम ले लो। योगवाशिष्ठ महारामायण के पारायण करने का नियम ले लो अथवा 'ईश्वर की ओर' पुस्तक कुछ दफा पढ़ने या उसकी केसेट सुनने का नियम ले लो। इस प्रकार अपने सामर्थ्य के अनुसार कुछ न कुछ साधन भजन का नियम ले लेना।

जो घड़ियाँ बीत गईं वे बीत गईं, वापस नहीं आयेंगी। जो साधन भजन कर लिया सो कर लिया, वही तुम्हारा असली धन है। रूपया-पैसा, पद-सत्ता, पत्नी परिवार वास्तव में तुम्हारे नहीं हैं। साधन भजन करके, अपनी बुद्धि को शुद्ध करके जितनी आध्यात्मिक प्रगति कर ली वही तुम्हारा धन है। तुम्हारे इस खजाने को चोर लूट नहीं सकते, डाकू डाका नहीं डाल सकते, सरकार उस पर टैक्स नहीं लगा सकती, मौत छीन नहीं सकती। मौत आती है, सब छीन लेती है। तुम्हारा शरीर भी छीना जाता है लेकिन तुम्हारे साधन भजन की तपस्या, मौत के बाप की ताकत नहीं जो छीन सके। ऐसे अखूट धन का कोष भरने के दिन चतुर्मास के दिन हैं।

मैत्री, क्षमा, मुदिता, सहजता, स्वाभाविकता, प्राणीमात्र में मित्रभाव, जीवमात्र के कल्याण की भावना, ये सारे सदगुणों के खजाने होने लगे। बड़े छोटे सब इकट्ठे हुए। संत का स्वभाव है देना। आश्रम आदि तो कुछ था नहीं। एक दुकान पर खड़े रहे और दुकान से मुट्ठियाँ भरकर रेवड़ियाँ बच्चों में बाँटी। बच्चों के झुण्ड के झुण्ड हो गये। हररोज ऐसा सिलसिला जारी रहा। जिस दुकान पर खड़े रहते वहीं से प्रसाद उठाते। दुकानदार लोग भी अपना धनभाग्य समझकर प्रसाद तैयार रखने लगे।

समाज में हमेशा दैवी और आसुरी प्रकृति के लोग हुआ करते हैं। दैवी संपदा के सात्त्विक लोग कम संख्या में होते हैं और आसुरी संपदा के लोगों की संख्या ज्यादा होती है। लेकिन अन्त में विजय तो दैवी संपदावाले लोगों की ही होती है। पांडव पाँच हैं, कौरव सौ है, प्रभाव कौरवों का होता है, पाँडव पिछड़े से लगते हैं लेकिन अन्त में विजय पांडवों की होती है।

ऐसे ही आपके जीवन में विघ्न बाधाएँ आती हैं। मुझे पता है, मैं जानता हूँ।

"साँई ! हमने तो आपसे कहा नहीं। आपको कैसे पता चला ?"

ऐसा कोई भगवान का प्यारा साधक है ही नहीं जिसके जीवन में विघ्न-बाधाएँ नहीं हैं। .....और जिसके जीवन में विघ्न-बाधाएँ नहीं है तो वह साधक किस बात का ? विघ्न-बाधाएँ होना तुम्हारे साधकपने की निशानी है, संसार से निराले मार्ग पर जाने वालों की निशानी है। सोते हुए जिन्दगी बिताने वालों के जीवन से आपका मेल नहीं होगा। ऐसा नहीं कि आप उनसे मेल नहीं करते लेकिन वे लोग आपको देखकर चिढ़ेंगे। हमारे एकमात्र भाई थे। बड़ा प्यार करते थे लेकिन जब हमको ईश्वर का रंग लगा तो वे चिढ़कर बोलते थेः "सुधर जा..... सुधर जा.... सुधर जा.....।" लेकिन अब कबीरो बिगड़ गयो रे.....

सुनो मेरे भाइयो ! सुनो मेरे मितवा

कबीरो बिगड़ गयो रे....

दही संग दूध बिगड़यो मक्खन रूप भयो रे,

कबीरो बिगड़ गयो रे....

पारस संग भाई ! लोहा बिगड़यो

कंचन रूप भयो रे...... कबीरो बिगड़ गयो रे......

संतन संग दास कबीरो बिगड़यो

संत कबीर भयो रे.... कबीरो बिगड़ गयो रे....

आप अगर अकेले किसी जीवन्मुक्त महापुरूष के पास जाते हैं तो जीवन्मुक्त महापुरूष की मुलाकात व्यर्थ नहीं जायेगी। उनकी नूरानी निगाह, वाणी और वातावरण आपके दिल में परिवर्तन कर देगा। आपको लग जायेगा भक्ति का रंग। जब आपको राम का रस मिल गया तो पहले पत्नी के साथ कामरस में सहयोग देते थे उस स्वभाव में परिवर्तन आ जायगा। पत्नी कहेगी कि आप बिगड़ गये। वह रोना चालू कर देगी। वह सोचेगी कि आप इतने दिन अच्छे थे लेकिन बाबा के पास जाकर बिगड़ गये। पत्नी अगर ईश्वर की राह पर चलने लगी तो पति भी यही सोचेगा। अगर पति और पत्नी दोनों चल पड़े साधना के मार्ग पर तो जो लोग आपके ऊपर हुक्म चलाकर, आपको भय अथवा प्रलोभन देकर आपको उल्लू बना रहे थे उन लोगों का प्रभाव आपके ऊपर नहीं पड़ेगा। परिवारवाले कहेंगे कि ये पति-पत्नी दोनों बिगड़ गये हैं। अगर पूरा कुटुम्ब सत्संग में आता है तो पड़ोसी जरूर बड़बड़ायेंगे। यह बिल्कुल अनुभव की बात है। एक दो का अनुभव नहीं, मेरे हजारों हजारों साधकों का अनुभव है।

अगर ये पड़ोसी, नाते रिश्तेदार भी भक्त होंगे तो वे भी मुडेंगे। जैसी जिनकी बुद्धि होगी वैसा प्रत्याघात होगा। तामसी प्रकृति के लोग होंगे तो ईर्ष्या करके आपको गिराने की कोशिश करेंगे। लेकिन जो गिरकर लौट जाये वह साधक कैसा ? गिरना अपराध तो है लेकिन गिरकर वापस न उठना यह महा अपराध है।

पारूमल दुकानों से प्रसाद उठा-उठाकर बच्चों को बाँटते। कुछ लोग तो कहते कि आज हमार भाग्य खुल गये जो ऐसे संत के हाथ से हमारा प्रसाद बँटा। मरकर तो सब छोड़ना ही है फिर भी जीते जी छूटता नहीं था। बाबाजी ने जीते जी छुड़वा दिया। अच्छा हुआ।

कुछ लोग संत की इन चेष्टाओं से भीतर ही भीतर क्रुद्ध होते थे और अफवाहें फैलाते थे। अफवाहों का शिकार हमेशा तामसी या राजसी लोग बनते हैं बेचारे। जो मजबूत सात्त्विक साधक है वह सावधान रहता है। अफवाह का शिकार नहीं बनता। कदाचित सुन ले तो भी ज्यादा देर तक प्रभावित नहीं रहेगा।

धर्मदास नाम का रेवड़ी का कोई व्यापारी था। बच्चे पारूमल को घेरा डालकर वहाँ से आनन्द कल्लोल करते जा रहे थे तो वही दुकान सामने आयी। पारूमल ने दो चार मुट्ठियाँ रेवड़ी की भरकर बच्चों में बाँटी। धर्मदास ने तो गन्दी अफवाह सुनी थी। जानता था कि पारूमल पहले सिपाही थे। वह बोल पड़ाः

"सपाटे में से साधू बना है तो अभी भी सपाटा ही रहा। सिपाही था तब लोगों को चूसता होगा। अभी भी लोगों का माल उड़ाता है। कमाकर उड़ा तो पता चले।"

पारूमल ने कहाः "ऐ धर्मो ! न जिया न जीने दिया....... न खाया न खाने दिया। धिक्कार है तुझे।"

संत की फटकार लगने से धर्मदास का ओज कम हो गया। दिन को चैन नही, रात को आराम नहीं। भक्तों ने भी थू.....थू.... किया तो उसका मनोबल और कम हो गया। दो चार दिन में ही वह पागल  होकर मर गया। इस घटना से गाँव में बात फैल गई कि पारूमल सिद्ध पुरूष है। फिर तो दुकानदारों पर प्रभाव पड़ने लगा। उन  लोगों ने अपने बेटों से, नौकरों से कह दिया कि हमारी गैरहाजिरी में भी पारूमल यहाँ से गुजरे तो दुकान से उतर कर पैर छूना और प्रसाद का टोकरा लेकर तैयार रहना।

चमत्कार के बिना नमस्कार नहीं। कलियुग का आदमी बाहर के चमत्कार देखता है, ज्ञान पर उसकी नजर नहीं रहती।

फिर तो बाजार में खूब वाह वाह होने लगी। पारूमल बाजार में आते तो दुकानदार सब अहोभाव से नतमस्तक खड़े रहते।

मुसलमानों ने देखा कि पारूमल का बड़ा प्रभाव है। ये अगर मुसलमान बन जायें तो हिन्दुओं को मुसलमान बनाने में सुविधा हो जायेगी।

अरे ! सब परमात्मा के हैं। सबका रास्ता ईश्वर-प्राप्ति का है। किसी का धर्मपरिवर्तन करने का लक्ष्य सही नहीं है। हिन्दू में से मुसलमान बनाने से खुदा रीझता है ऐसी बात नहीं है। यह तो बेवकूफों का प्रचार है।

ऐसे प्रचार के शिकार बने हुए लोगों ने षडयंत्र रचा। पारूमल को समझाया लेकिन देखा कि ये मानेंगे नहीं। उन लोगों में एक नवाब भी था। उसकी सत्ता के बल से मुल्ला-मौलवियों ने पारूमल को उठवाकर एक मस्जिद में पहुँचा दिया। सख्त बन्दोबस्त। सोचा था कि कुछ भी हो, एक बार सुन्नत करा दिया फिर क्या ?

नाई को बुलाया गया। वह अपने औजार तैयार करने लगा। पारूमल ने देखा कि यह षडयंत्र है। ये लोग कई हैं, मैं अकेला हूँ। लेकिन अकेला होते हुए भी जिसने परमात्मा में प्रतिष्ठा पा ली है उसके द्वारा आखिरी क्षण में भी परमात्मा क्या पता क्या करवा ले ! पारूमल बैठे रहे शान्त.....। तेरी मर्जी पूर्ण हो। उनका मन शान्त हो गया। उधर नाई उस्तुरा घिस रहा था और पारूमल को देख रहा था। फिर यकायक पारूमल ने झटके के साथ नाई पर नजर डाली। तुरन्त नाई के नाभि केन्द्र पर झटका लगा और उसकी जननेन्द्रिय गायब हो गई। नाई को लगा कि मुझे कुछ हो गया। बाथरूम में जाकर देखा तो मामला चौपट..... !