
दो
शब्द
आज तक
पूज्यश्री के
सम्पर्क में
आकर असंख्य लोगों
ने अपने
पतनोन्मुख
जीवन को यौवन
सुरक्षा के
प्रयोगों
द्वारा
ऊर्ध्वगामी
बनाया है। वीर्यनाश
और स्वप्नदोष
जैसी
बीमारियों की
चपेट में आकर
हतबल हुए कई
युवक-युवतियों
के लिए अपने
निराशापूर्ण
जीवन में
पूज्यश्री की
सतेज
अनुभवयुक्त
वाणी एवं उनका
पवित्र
मार्गदर्शन
डूबते को
तिनके का ही
नहीं, बल्कि
नाव का सहारा
बन जाता है।
समाज की
तेजस्विता का
हरण करने वाला
आज के विलासितापूर्ण,
कुत्सित और
वासनामय
वातावरण में
यौवन सुरक्षा
के लिए
पूज्यश्री
जैसे महापुरुषों
के ओजस्वी मार्गदर्शन
की अत्यंत
आवश्यकता है।
उस आवश्यकता
की पूर्ति
हेतु ही
पूज्यश्री ने
जहाँ अपने
प्रवचनों में
‘अमूल्य
यौवन-धन की
सुरक्षा’ विषय
को छुआ है, उसे
संकलित करके
पाठकों के सम्मुख
रखने का यह
अल्प प्रयास
है।
इस
पुस्तक में
स्त्री-पुरुष,
गृहस्थी-वानप्रस्थी,
विद्यार्थी
एवं वृद्ध सभी
के लिए अनुपम
सामग्री है।
सामान्य
दैनिक जीवन को
किस प्रकार
जीने से यौवन
का ओज बना
रहता है और
जीवन दिव्य
बनता है, उसकी
भी रूपरेखा
इसमें
सन्निहित है
और सबसे प्रमुख
बात कि योग की
गूढ़
प्रक्रियाओं
से स्वयं
परिचित होने
के कारण
पूज्यश्री की
वाणी में तेज,
अनुभव एवं
प्रमाण का
सामंजस्य है
जो अधिक
प्रभावोत्पादक
सिद्ध होता
है।
यौवन
सुरक्षा का
मार्ग आलोकित
करने वाली यह
छोटी सी
पुस्तक दिव्य
जीवन की चाबी
है। इससे स्वयं
लाभ उठायें
एवं औरों तक
पहुँचाकर
उन्हें भी
लाभान्वित
करने का
पुण्यमय
कार्य करें।
श्री
योग वेदान्त
सेवा समिति,
अमदावाद
आश्रम।
पालो
ब्रह्मचर्य
विषय-वासनाएँ
त्याग। ईश्वर
के भक्त बनो
जीवन जो
प्यारा है।।
उठिए
प्रभात काल
रहिये
प्रसन्नचित्त।
तजो शोक
चिन्ताएँ जो
दुःख का
पिटारा है।।
कीजिए
व्यायाम
नित्य भ्रात!
शक्ति
अनुसार। नहीं
इन नियमों पै
किसी का इजारा1
है।।
देखिये
सौ शरद औ’कीजिए
सुकर्म प्रिय!
सदा स्वस्थ
रहना ही कर्त्तव्य
तुम्हारा
है।।
लाँघ
गया पवनसुत
ब्रह्मचर्य
से ही सिंधु।
मेघनाद मार
कीर्ति लखन
कमायी है।।
लंका
बीच अंगद ने
जाँघ जब रोप
दई। हटा नहीं
सका जिसे कोई
बलदायी है।।
पाला
व्रत ब्रह्मचर्य
राममूर्ति,
गामा ने भी।
देश और विदेशों
में नामवरी2
पायी है।।
भारत
के वीरो! तुम
ऐसे वीर्यवान
बनो। ब्रह्मचर्य
महिमा तो वेदन
में गायी है।।
1- एकाधिकार।
2- प्रसिद्धि
अनुक्रम
सृष्टि क्रम के लिए मैथुन : एक प्राकृतिक व्यवस्था
सहजता की आड़ में भ्रमित न होवें
त्रिबन्धयुक्त प्राणायाम और योगाभ्यास करो
स्त्री-जाति के प्रति मातृभाव प्रबल करो
कामशक्ति का दमन या ऊर्ध्वगमन ?
हस्तमैथुन व स्वप्नदोष से कैसे बचें
वीर्यरक्षा का महत्त्वपूर्ण प्रयोग
‘यौवन सुरक्षा’
पुस्तक आज के युवा वर्ग के लिये एक अमूल्य भेंट है
‘यौवन सुरक्षा’
पुस्तक नहीं, अपितु एक शिक्षा ग्रन्थ है
हमारे देश का भविष्य हमारी युवा पीढ़ी पर निर्भर है किन्तु उचित मार्गदर्शन के अभाव में वह आज गुमराह हो रही है |
पाश्चात्य भोगवादी सभ्यता के दुष्प्रभाव से उसके यौवन का ह्रास होता जा रहा है | विदेशी चैनल, चलचित्र, अशलील साहित्य आदि प्रचार माध्यमों के द्वारा युवक-युवतियों को गुमराह किया जा रहा है | विभिन्न सामयिकों और समाचार-पत्रों में भी तथाकथित पाश्चात्य मनोविज्ञान से प्रभावित मनोचिकित्सक और ‘सेक्सोलॉजिस्ट’ युवा छात्र-छात्राओं को चरित्र, संयम और नैतिकता से भ्रष्ट करने पर तुले हुए हैं |
ब्रितानी औपनिवेशिक संस्कृति की देन इस वर्त्तमान शिक्षा-प्रणाली में जीवन के नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीनता बरती गई है | फलतः आज के विद्यार्थी का जीवन कौमार्यवस्था से ही विलासी और असंयमी हो जाता है |
पाश्चात्य आचार-व्यवहार के अंधानुकरण से युवानों में जो फैशनपरस्ती, अशुद्ध आहार-विहार के सेवन की प्रवृत्ति कुसंग, अभद्रता, चलचित्र-प्रेम आदि बढ़ रहे हैं उससे दिनोंदिन उनका पतन होता जा रहा है | वे निर्बल और कामी बनते जा रहे हैं | उनकी इस अवदशा को देखकर ऐसा लगता है कि वे ब्रह्मचर्य की महिमा से सर्वथा अनभिज्ञ हैं |
लाखों नहीं, करोड़ों-करोड़ों छात्र-छात्राएँ अज्ञानतावश अपने तन-मन के मूल ऊर्जा-स्रोत का व्यर्थ में अपक्षय कर पूरा जीवन दीनता-हीनता-दुर्बलता में तबाह कर देते हैं और सामाजिक अपयश के भय से मन-ही-मन कष्ट झेलते रहते हैं | इससे उनका शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य चौपट हो जाता है, सामान्य शारीरिक-मानसिक विकास भी नहीं हो पाता | ऐसे युवान रक्ताल्पता, विस्मरण तथा दुर्बलता से पीड़ित होते हैं |
यही वजह है कि हमारे देश में औषधालयों, चिकित्सालयों, हजारों प्रकार की एलोपैथिक दवाइयों, इन्जेक्शनों आदि की लगातार वृद्धि होती जा रही है | असंख्य डॉक्टरों ने अपनी-अपनी दुकानें खोल रखी हैं फिर भी रोग एवं रोगियों की संख्या बढ़ती ही जा रही है |
इसका मूल कारण क्या है ? दुर्व्यसन तथा अनैतिक, अप्राकृतिक एवं अमर्यादित मैथुन द्वारा वीर्य की क्षति ही इसका मूल कारण है | इसकी कमी से रोगप्रतिकारक शक्ति घटती है, जीवनशक्ति का ह्रास होता है |
इस देश को यदि जगदगुरु के पद पर आसीन होना है, विश्व-सभ्यता एवं विश्व-संस्कृति का सिरमौर बनना है, उन्नत स्थान फिर से प्राप्त करना है तो यहाँ की सन्तानों को चाहिए कि वे ब्रह्मचर्य के महत्व को समझें और सतत सावधान रहकर सख्ती से इसका पालन करें |
ब्रह्मचर्य के द्वारा ही हमारी युवा पीढ़ी अपने व्यक्तित्व का संतुलित एवं श्रेष्ठतर विकास कर सकती है | ब्रह्मचर्य के पालन से बुद्धि कुशाग्र बनती है, रोगप्रतिकारक शक्ति बढ़ती है तथा महान्-से-महान् लक्ष्य निर्धारित करने एवं उसे सम्पादित करने का उत्साह उभरता है, संकल्प में दृढ़ता आती है, मनोबल पुष्ट होता है |
आध्यात्मिक विकास का मूल भी ब्रह्मचर्य ही है | हमारा देश औद्योगिक, तकनीकी और आर्थिक क्षेत्र में चाहे कितना भी विकास कर ले , समृद्धि प्राप्त कर ले फिर भी यदि युवाधन की सुरक्षा न हो पाई तो यह भौतिक विकास अंत में महाविनाश की ओर ही ले जायेगा क्योंकि संयम, सदाचार आदि के परिपालन से ही कोई भी सामाजिक व्यवस्था सुचारु रूप से चल सकती है | भारत का सर्वांगीण विकास सच्चरित्र एवं संयमी युवाधन पर ही आधारित है |
अतः हमारे युवाधन छात्र-छात्राओं को ब्रह्मचर्य में प्रशिक्षित करने के लिए उन्हें यौन-स्वास्थ्य, आरोग्यशास्त्र, दीर्घायु-प्राप्ति के उपाय तथा कामवासना नियंत्रित करने की विधि का स्पष्ट ज्ञान प्रदान करना हम सबका अनिवार्य कर्त्तव्य है | इसकी अवहेलना करना हमारे देश व समाज के हित में नहीं है | यौवन सुरक्षा से ही सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण हो सकता है |
*
शरीरमाद्यं
खलु
धर्मसाधनम् |
धर्म का साधन शरीर है | शरीर से ही सारी साधनाएँ सम्पन्न होती हैं | यदि शरीर कमजोर है तो उसका प्रभाव मन पर पड़ता है, मन कमजोर पड़ जाता है |
कोई भी कार्य यदि सफलतापूर्वक करना हो तो तन और मन दोनों स्वस्थ होने चाहिए | इसीलिये कई बूढ़े लोग साधना की हिम्मत नहीं जुटा पाते, क्योंकि वैषयिक भोगों से उनके शरीर का सारा ओज-तेज नष्ट हो चुका होता है | यदि मन मजबूत हो तो भी उनका जर्जर शरीर पूरा साथ नहीं दे पाता | दूसरी ओर युवक वर्ग साधना करने की क्षमता होते हुए भी संसार की चकाचौंध से प्रभावित होकर वैषयिक सुखों में बह जाता है | अपनी वीर्यशक्ति का महत्व न समझने के कारण बुरी आदतों में पड़कर उसे खर्च कर देता है, फिर जिन्दगी भर पछताता रहता है |
मेरे पास कई ऐसे युवक आते हैं, जो भीतर-ही भीतर परेशान रहते हैं | किसीको वे अपना दुःख-दर्द सुना नहीं पाते, क्योंकि बुरी आदतों में पड़कर उन्होंने अपनी वीर्यशक्ति को खो दिया है | अब, मन और शरीर कमजोर हो गये गये, संसार उनके लिये दुःखालय हो गया, ईश्वरप्राप्ति उनके लिए असंभव हो गई | अब संसार में रोते-रोते जीवन घसीटना ही रहा |
इसीलिए हर युग में महापुरुष लोग ब्रह्मचर्य पर जोर देते हैं | जिस व्यक्ति के जीवन में संयम नहीं है, वह न तो स्वयं की ठीक से उन्नति कर पाता है और न ही समाज में कोई महान् कार्य कर पाता है | ऐसे व्यक्तियों से बना हुआ समाज और देश भी भौतिक उन्नति व आध्यात्मिक उन्नति में पिछड़ जाता है | उस देश का शीघ्र पतन हो जाता है |
पहले ब्रह्मचर्य क्या है- यह समझना चाहिए | ‘याज्ञवल्क्य संहिता’ में आया है :
कर्मणा
मनसा वाचा
सर्वास्थासु
सर्वदा |
सर्वत्र
मैथुनतुआगो
ब्रह्मचर्यं
प्रचक्षते ||
‘सर्व अवस्थाओं में मन, वचन और कर्म तीनों से मैथुन का सदैव त्याग हो, उसे ब्रह्मचर्य कहते हैं |’
भगवान वेदव्यासजी ने कहा है :
ब्रह्मचर्यं
गुप्तेन्द्रिस्योपस्थस्य
संयमः |
‘विषय-इन्द्रियों द्वारा प्राप्त होने वाले सुख का संयमपूर्वक त्याग करना ब्रह्मचर्य है |’
भगवान शंकर कहते हैं :
सिद्धे
बिन्दौ
महादेवि किं न
सिद्धयति
भूतले |
‘हे पार्वती! बिन्दु अर्थात वीर्यरक्षण सिद्ध होने के बाद कौन-सी सिद्धि है, जो साधक को प्राप्त नहीं हो सकती ?’
साधना द्वारा जो साधक अपने वीर्य को ऊर्ध्वगामी बनाकर योगमार्ग में आगे बढ़ते हैं, वे कई प्रकार की सिद्धियों के मालिक बन जाते हैं | ऊर्ध्वरेता योगी पुरुष के चरणों में समस्त सिद्धियाँ दासी बनकर रहती हैं | ऐसा ऊर्ध्वरेता पुरुष परमानन्द को जल्दी पा सकता है अर्थात् आत्म-साक्षात्कार जल्दी कर सकता है |
देवताओं को देवत्व भी इसी ब्रह्मचर्य के द्वारा प्राप्त हुआ है:
ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाघ्नत |
इन्द्रो ह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराभरत ||
‘ब्रह्मचर्यरूपी तप से देवों ने मृत्यु को जीत लिया है | देवराज इन्द्र ने भी ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही देवताओं से अधिक सुख व उच्च पद को प्राप्त किया है |’
(अथर्ववेद 1.5.19)
ब्रह्मचर्य बड़ा गुण है | वह ऐसा गुण है, जिससे मनुष्य को नित्य मदद मिलती है और जीवन के सब प्रकार के खतरों में सहायता मिलती है |
ऐसे तो तपस्वी लोग कई प्रकार के तप करते हैं, परन्तु ब्रह्मचर्य के बारे में भगवान शंकर कहते हैं:
न तपस्तप इत्याहुर्ब्रह्मचर्यं तपोत्तमम् |
ऊर्ध्वरेता भवेद्यस्तु स देवो न तु मानुषः ||
‘ब्रह्मचर्य ही उत्कृष्ट तप है | इससे बढ़कर तपश्चर्या तीनों लोकों में दूसरी नहीं हो सकती | ऊर्ध्वरेता पुरुष इस लोक में मनुष्यरूप में प्रत्यक्ष देवता ही है |’
जैन शास्त्रों में भी इसे उत्कृष्ट तप बताया गया है |
तवेसु वा उत्त्मं बंभचेरम् |
‘ब्रह्मचर्य सब तपों में उत्तम तप है |’
वीर्य इस शरीररूपी नगर का एक तरह से राजा ही है | यह वीर्यरूपी राजा यदि पुष्ट है, बलवान् है तो रोगरूपी शत्रु कभी शरीररूपी नगर पर आक्रमण नही करते | जिसका वीर्यरूपी राजा निर्बल है, उस शरीररूपी नगर को कई रोगरूपी शत्रु आकर घेर लेते हैं | इसीलिए कहा गया है :
मरणं बिन्दोपातेन जीवनं बिन्दुधारणात् |
‘बिन्दुनाश (वीर्यनाश) ही मृत्यु है और बिन्दुरक्षण ही जीवन है |’
जैन ग्रंथों में अब्रह्मचर्य को पाप बताया गया है :
अबंभचरियं घोरं पमायं दुरहिठ्ठियम् |
‘अब्रह्मचर्य घोर प्रमादरूप पाप है |’ (दश वैकालिक सूत्र: 6.17)
‘अथर्वेद’ में इसे उत्कृष्ट व्रत की संज्ञा दी गई है:
व्रतेषु वै वै ब्रह्मचर्यम् |
वैद्यकशास्त्र में इसको परम बल कहा गया है :
ब्रह्मचर्यं परं बलम् | ‘ब्रह्मचर्य परम बल है |’
वीर्यरक्षण की महिमा सभी ने गायी है | योगीराज गोरखनाथ ने कहा है :
कंत गया कूँ कामिनी झूरै | बिन्दु गया कूँ जोगी ||
‘पति के वियोग में कामिनी तड़पती है और वीर्यपतन से योगी पश्चाताप करता है |’
भगवान शंकर ने तो यहाँ तक कह दिया कि इस ब्रह्मचर्य के प्रताप से ही मेरी ऐसी महान् महिमा हुई है :
यस्य प्रसादान्महिमा ममाप्येतादृशो भवेत् |
यूरोप के प्रतिष्ठित चिकित्सक भी भारतीय योगियों के कथन का समर्थन करते हैं | डॉ. निकोल कहते हैं :
“यह एक भैषजिक और देहिक तथ्य है कि शरीर के सर्वोत्तम रक्त से स्त्री तथा पुरुष दोनों ही जातियों में प्रजनन तत्त्व बनते हैं | शुद्ध तथा व्यवस्थित जीवन में यह तत्त्व पुनः अवशोषित हो जाता है | यह सूक्ष्मतम मस्तिष्क, स्नायु तथा मांसपेशिय ऊत्तकों (Tissue) का निर्माण करने के लिये तैयार होकर पुनः परिसंचारण में जाता है | मनुष्य का यह वीर्य वापस ऊपर जाकर शरीर में विकसित होने पर उसे निर्भीक, बलवान्, साहसी तथा वीर बनाता है | यदि इसका अपव्यय किया गया तो यह उसको स्त्रैण, दुर्बल, कृशकलेवर एवं कामोत्तेजनशील बनाता है तथा उसके शरीर के अंगों के कार्यव्यापार को विकृत एवं स्नायुतंत्र को शिथिल (दुर्बल) करता है और उसे मिर्गी (मृगी) एवं अन्य अनेक रोगों और मृत्यु का शिकार बना देता है | जननेन्द्रिय के व्यवहार की निवृति से शारीरिक, मानसिक तथा अध्यात्मिक बल में असाधारण वृद्धि होती है |”
परम धीर तथा अध्यवसायी वैज्ञानिक अनुसंधानों से पता चला है कि जब कभी भी रेतःस्राव को सुरक्षित रखा जाता तथा इस प्रकार शरीर में उसका पुनर्वशोषण किया जाता है तो वह रक्त को समृद्ध तथा मस्तिष्क को बलवान् बनाता है |
डॉ. डिओ लुई कहते हैं : “शारीरिक बल, मानसिक ओज तथा बौद्धिक कुशाग्रता के लिये इस तत्त्व का संरक्षण परम आवश्यक है |”
एक अन्य लेखक डॉ. ई. पी. मिलर लिखते हैं : “शुक्रस्राव का स्वैच्छिक अथवा अनैच्छिक अपव्यय जीवनशक्ति का प्रत्यक्ष अपव्यय है | यह प्रायः सभी स्वीकार करते हैं कि रक्त के सर्वोत्तम तत्त्व शुक्रस्राव की संरचना में प्रवेश कर जाते हैं | यदि यह निष्कर्ष ठीक है तो इसका अर्थ यह हुआ कि व्यक्ति के कल्याण के लिये जीवन में ब्रह्मचर्य परम आवश्यक है |”
पश्चिम के प्रख्यात चिकित्सक कहते हैं कि वीर्यक्षय से, विशेषकर तरुणावस्था में वीर्यक्षय से विविध प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं | वे हैं : शरीर में व्रण, चेहरे पर मुँहासे अथवा विस्फोट, नेत्रों के चतुर्दिक नीली रेखायें, दाढ़ी का अभाव, धँसे हुए नेत्र, रक्तक्षीणता से पीला चेहरा, स्मृतिनाश, दृष्टि की क्षीणता, मूत्र के साथ वीर्यस्खलन, अण्डकोश की वृद्धि, अण्डकोशों में पीड़ा, दुर्बलता, निद्रालुता, आलस्य, उदासी, हृदय-कम्प, श्वासावरोध या कष्टश्वास, यक्ष्मा, पृष्ठशूल, कटिवात, शोरोवेदना, संधि-पीड़ा, दुर्बल वृक्क, निद्रा में मूत्र निकल जाना, मानसिक अस्थिरता, विचारशक्ति का अभाव, दुःस्वप्न, स्वप्न दोष तथा मानसिक अशांति |
उपरोक्त रोग को मिटाने का एकमात्र ईलाज ब्रह्मचर्य है | दवाइयों से या अन्य उपचारों से ये रोग स्थायी रूप से ठीक नहीं होते |
वीर्य शरीर की बहुत मूल्यवान् धातु है | भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है | श्री सुश्रुताचार्य ने लिखा है :
रसाद्रक्तं ततो मांसं मांसान्मेदः प्रजायते |
मेदस्यास्थिः ततो मज्जा मज्जाया: शुक्रसंभवः ||
जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है | पाँच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है | पाँच दिन बाद रक्त में से मांस, उसमें से 5-5 दिन के अंतर से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से अंत में वीर्य बनता है | स्त्री में जो यह धातु बनती है उसे ‘रज’ कहते हैं |
वीर्य किस प्रकार छः-सात मंजिलों से गुजरकर अपना यह अंतिम रूप धारण करता है, यह सुश्रुत के इस कथन से ज्ञात हो जाता है | कहते हैं कि इस प्रकार वीर्य बनने में करीब 30 दिन व 4 घण्टे लग जाते हैं | वैज्ञनिक लोग कहते हैं कि 32 किलोग्राम भोजन से 700 ग्राम रक्त बनता है और 700 ग्राम रक्त से लगभग 20 ग्राम वीर्य बनता है |
इस वीर्य के संयम से शरीर में एक अदभुत आकर्षक शक्ति उत्पन्न होती है जिसे प्राचीन वैद्य धन्वंतरि ने ‘ओज’ नाम दिया है | यही ओज मनुष्य को अपने परम-लाभ ‘आत्मदर्शन’ कराने में सहायक बनता है | आप जहाँ-जहाँ भी किसी व्यक्ति के जीवन में कुछ विशेषता, चेहरे पर तेज, वाणी में बल, कार्य में उत्साह पायेंगे, वहाँ समझो इस वीर्य रक्षण का ही चमत्कार है |
यदि एक साधारण स्वस्थ मनुष्य एक दिन में 700 ग्राम भोजन के हिसाब से चालीस दिन में 32 किलो भोजन करे, तो समझो उसकी 40 दिन की कमाई लगभग 20 ग्राम वीर्य होगी | 30 दिन अर्थात महीने की करीब 15 ग्राम हुई और 15 ग्राम या इससे कुछ अधिक वीर्य एक बार के मैथुन में पुरुष द्वारा खर्च होता है |
एक था माली | उसने अपना तन, मन, धन लगाकर कई दिनों तक परिश्रम करके एक सुन्दर बगीचा तैयार किया | उस बगीचे में भाँति-भाँति के मधुर सुगंध युक्त पुष्प खिले | उन पुष्पों को चुनकर उसने इकठ्ठा किया और उनका बढ़िया इत्र तैयार किया | फिर उसने क्या किया समझे आप …? उस इत्र को एक गंदी नाली ( मोरी ) में बहा दिया |
अरे ! इतने दिनों के परिश्रम से तैयार किये गये इत्र को, जिसकी सुगन्ध से सारा घर महकने वाला था, उसे नाली में बहा दिया ! आप कहेंगे कि ‘वह माली बड़ा मूर्ख था, पागल था …’ मगर अपने आपमें ही झाँककर देखें | वह माली कहीं और ढूँढ़ने की जरूरत नहीं है | हममें से कई लोग ऐसे ही माली हैं |
वीर्य बचपन से लेकर आज तक यानी 15-20 वर्षों में तैयार होकर ओजरूप में शरीर में विद्यमान रहकर तेज, बल और स्फूर्ति देता रहा | अभी भी जो करीब 30 दिन के परिश्रम की कमाई थी, उसे यूँ ही सामान्य आवेग में आकर अविवेकपूर्वक खर्च कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है ?
क्या यह उस माली जैसा ही कर्म नहीं है ? वह माली तो दो-चार बार यह भूल करने के बाद किसी के समझाने पर सँभल भी गया होगा, फिर वही-की-वही भूल नही दोहराई होगी, परन्तु आज तो कई लोग वही भूल दोहराते रहते हैं | अंत में पश्चाताप ही हाथ लगता है |
क्षणिक सुख के लिये व्यक्ति कामान्ध होकर बड़े उत्साह से इस मैथुनरूपी कृत्य में पड़ता है परन्तु कृत्य पूरा होते ही वह मुर्दे जैसा हो जाता है | होगा ही | उसे पता ही नहीं कि सुख तो नहीं मिला, केवल सुखाभास हुआ, परन्तु उसमें उसने 30-40 दिन की अपनी कमाई खो दी |
युवावस्था आने तक वीर्यसंचय होता है वह शरीर में ओज के रूप में स्थित रहता है | वह तो वीर्यक्षय से नष्ट होता ही है, अति मैथुन से तो हड्डियों में से भी कुछ सफेद अंश निकलने लगता है, जिससे अत्यधिक कमजोर होकर लोग नपुंसक भी बन जाते हैं | फिर वे किसी के सम्मुख आँख उठाकर भी नहीं देख पाते | उनका जीवन नारकीय बन जाता है |
वीर्यरक्षण का इतना महत्व होने के कारण ही कब मैथुन करना, किससे मैथुन करना, जीवन में कितनी बार करना आदि निर्देशन हमारे ॠषि-मुनियों ने शास्त्रों में दे रखे हैं |
शरीर से वीर्य-व्यय यह कोई क्षणिक सुख के लिये प्रकृति की व्यवस्था नहीं है | सन्तानोत्पत्ति के लिये इसका वास्तविक उपयोग है | यह प्रकृति की व्यवस्था है |
यह सृष्टि चलती रहे, इसके लिए सन्तानोत्पत्ति होना जरूरी है | प्रकृति में हर प्रकार की वनस्पति व प्राणीवर्ग में यह काम-प्रवृत्ति स्वभावतः पाई जाती है | इस काम- प्रवृत्ति के वशीभूत होकर हर प्राणी मैथुन करता है और उसका रतिसुख भी उसे मिलता है | किन्तु इस प्राकृतिक व्यवस्था को ही बार-बार क्षणिक सुख का आधार बना लेना कहाँ की बुद्धिमानी है ? पशु भी अपनी ॠतु के अनुसार ही इस कामवृति में प्रवृत होते हैं और स्वस्थ रहते हैं, तो क्या मनुष्य पशु वर्ग से भी गया बीता है ? पशुओं में तो बुद्धितत्व विकसित नहीं होता, परन्तु मनुष्य में तो उसका पूर्ण विकास होता है |
आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् |
भोजन करना, भयभीत होना, मैथुन करना और सो जाना यह तो पशु भी करते हैं | पशु शरीर में रहकर हम यह सब करते आए हैं | अब यह मनुष्य शरीर मिला है | अब भी यदि बुद्धि और विवेकपूर्ण अपने जीवन को नहीं चलाया और क्षणिक सुखों के पीछे ही दौड़ते रहे तो कैसे अपने मूल लक्ष्य पर पहुँच पायेंगे ?
कई लोग तर्क देने लग जाते हैं : “शास्त्रों में पढ़ने को मिलता है और ज्ञानी महापुरुषों के मुखारविन्द से भी सुनने में आता है कि सहज जीवन जीना चाहिए | काम करने की इच्छा हुई तो काम किया, भूख लगी तो भोजन किया, नींद आई तो सो गये | जीवन में कोई ‘टेन्शन’, कोई तनाव नहीं होना चाहिए | आजकल के तमाम रोग इसी तनाव के ही फल हैं … ऐसा मनोवैज्ञानिक कहते हैं | अतः जीवन सहज और सरल होना चाहिए | कबीरदास जी ने भी कहा है : साधो, सहज समाधि भली |”
ऐसा तर्क देकर भी कई लोग अपने काम-विकार की तृप्ति को सहमति दे देते हैं | परन्तु यह अपने आपको धोखा देने जैसा है | ऐसे लोगों को खबर ही नहीं है कि ऐसा सहज जीवन तो महापुरुषों का होता है, जिनके मन और बुद्धि अपने अधिकार में होते हैं, जिनको अब संसार में अपने लिये पाने को कुछ भी शेष नहीं बचा है, जिन्हें मान-अपमान की चिन्ता नहीं होती है | वे उस आत्मतत्त्व में स्थित हो जाते हैं जहाँ न पतन है न उत्थान | उनको सदैव मिलते रहने वाले आनन्द में अब संसार के विषय न तो वृद्धि कर सकते हैं न अभाव | विषय-भोग उन महान् पुरुषों को आकर्षित करके अब बहका या भटका नहीं सकते | इसलिए अब उनके सम्मुख भले ही विषय-सामग्रियों का ढ़ेर लग जाये किन्तु उनकी चेतना इतनी जागृत होती है कि वे चाहें तो उनका उपयोग करें और चाहें तो ठुकरा दें |
बाहरी विषयों की बात छोड़ो, अपने शरीर से भी उनका ममत्व टूट चुका होता है | शरीर रहे अथवा न रहे- इसमें भी उनका आग्रह नहीं रहता | ऐसे आनन्दस्वरूप में वे अपने-आपको हर समय अनुभव करते रहते हैं | ऐसी अवस्थावालों के लिये कबीर जी ने कहा है :
साधो, सहज समाधि भली |
हम यदि ऐसी अवस्था में हैं तब तो ठीक है | अन्यथा ध्यान रहे, ऐसे तर्क की आड़ में हम अपने को धोखा देकर अपना ही पतन कर डालेंगे | जरा, अपनी अवस्था की तुलना उनकी अवस्था से करें | हम तो, कोई हमारा अपमान कर दे तो क्रोधित हो उठते हैं, बदला तक लेने को तैयार हो जाते हैं | हम लाभ-हानि में सम नहीं रहते हैं | राग-द्वेष हमारा जीवन है | ‘मेरा-तेरा’ भी वैसा ही बना हुआ है | ‘मेरा धन … मेरा मकान … मेरी पत्नी … मेरा पैसा … मेरा मित्र … मेरा बेटा … मेरी इज्जत … मेरा पद …’ ये सब सत्य भासते हैं कि नहीं ? यही तो देहभाव है, जीवभाव है | हम इससे ऊपर उठ कर व्यवहार कर सकते हैं क्या ? यह जरा सोचें |
कई साधु लोग भी इस देहभाव से छुटकारा नहीं पा सके, सामान्य जन की तो बात ही क्या ? कई साधु भी ‘मैं स्त्रियों की तरफ देखता ही नहीं हूँ … मैं पैसे को छूता ही नहीं हूँ …’ इस प्रकार की अपनी-अपनी मन और बुद्धि की पकड़ों में उलझे हुए हैं | वे भी अपना जीवन अभी सहज नहीं कर पाए हैं और हम … ?
हम अपने साधारण जीवन को ही सहज जीवन का नाम देकर विषयों में पड़े रहना चाहते हैं | कहीं मिठाई देखी तो मुँह में पानी भर आया | अपने संबंधी और रिश्तेदारों को कोई दुःख हुआ तो भीतर से हम भी दुःखी होने लग गये | व्यापार में घाटा हुआ तो मुँह छोटा हो गया | कहीं अपने घर से ज्यादा दिन दूर रहे तो बार-बार अपने घरवालों की, पत्नी और पुत्रों की याद सताने लगी | ये कोई सहज जीवन के लक्षण हैं, जिसकी ओर ज्ञानी महापुरुषों का संकेत है ? नहीं |
आज कल के नौजवानों के साथ बड़ा अन्याय हो रहा है | उन पर चारों ओर से विकारों को भड़काने वाले आक्रमण होते रहते हैं |
एक तो वैसे ही अपनी पाशवी वृत्तियाँ यौन उच्छृंखलता की ओर प्रोत्साहित करती हैं और दूसरे, सामाजिक परिस्थितियाँ भी उसी ओर आकर्षण बढ़ाती हैं … इस पर उन प्रवृत्तियों को वौज्ञानिक समर्थन मिलने लगे और संयम को हानिकारक बताया जाने लगे … कुछ तथाकथित आचार्य भी फ्रायड जैसे नास्तिक एवं अधूरे मनोवैज्ञानिक के व्यभिचारशास्त्र को आधार बनाकर ‘संभोग से समाधि’ का उपदेश देने लगें तब तो ईश्वर ही ब्रह्मचर्य और दाम्पत्य जीवन की पवित्रता का रक्षक है |
16 सितम्बर , 1977 के ‘न्यूयॉर्क टाइम्स में छ्पा था:
“अमेरिकन पेनल कहती है कि अमेरिका में दो करोड़ से अधिक लोगों को मानसिक चिकित्सा की आवश्यकता है |”
उपरोक्त परिणामों को देखते हुए अमेरिका के एक महान् लेखक, सम्पादक और शिक्षा विशारद श्री मार्टिन ग्रोस अपनी पुस्तक ‘The Psychological Society’ में लिखते हैं : “हम जितना समझते हैं उससे कहीं ज्यादा फ्रायड के मानसिक रोगों ने हमारे मानस और समाज में गहरा प्रवेश पा लिया है | यदि हम इतना जान लें कि उसकी बातें प्रायः उसके विकृत मानस के ही प्रतिबिम्ब हैं और उसकी मानसिक विकृतियों वाले व्यक्तित्व को पहचान लें तो उसके विकृत प्रभाव से बचने में सहायता मिल सकती है | अब हमें डॉ. फ्रायड की छाया में बिल्कुल नहीं रहना चाहिए |”
आधुनिक मनोविज्ञान का मानसिक विश्लेषण, मनोरोग शास्त्र और मानसिक रोग की चिकित्सा … ये फ्रायड के रुग्ण मन के प्रतिबिम्ब हैं | फ्रायड स्वयं स्फटिक कोलोन, प्रायः सदा रहने वाला मानसिक अवसाद, स्नायविक रोग, सजातीय सम्बन्ध, विकृत स्वभाव, माईग्रेन, कब्ज, प्रवास, मृत्यु और धननाश भय, साईनोसाइटिस, घृणा और खूनी विचारों के दौरे आदि रोगों से पीडित था |
प्रोफेसर एडलर और प्रोफेसर सी. जी. जुंग जैसे मूर्धन्य मनोवैज्ञानिकों ने फ्रायड के सिद्धांतों का खंडन कर दिया है फिर भी यह खेद की बात है कि भारत में अभी भी कई मानसिक रोग विशेषज्ञ और सेक्सोलॉजिस्ट फ्रायड जैसे पागल व्यक्ति के सिद्धांतों को आधार लेकर इस देश के जवानों को अनैतिक और अप्राकृतिक मैथुन (Sex) का, संभोग का उपदेश वर्त्तमान पत्रों और सामयोकों के द्वारा देते रहते हैं | फ्रायड ने तो मृत्यु के पहले अपने पागलपन को स्वीकार किया था लेकिन उसके लेकिन उसके स्वयं स्वीकार न भी करें तो भी अनुयायी तो पागल के ही माने जायेंगे | अब वे इस देश के लोगों को चरित्रभ्रष्ट करने का और गुमराह करने का पागलपन छोड़ दें ऐसी हमारी नम्र प्रार्थना है | यह ‘यौवन सुरक्षा’ पुस्तक पाँच बार पढ़ें और पढ़ाएँ- इसी में सभी का कल्याण निहित है |
आँकड़े बताते हैं कि आज पाश्चात्य देशों में यौन सदाचार की कितनी दुर्गति हुई है ! इस दुर्गति के परिणामस्वरूप वहाँ के निवासियों के व्यक्तिगत जीवन में रोग इतने बढ़ गये हैं कि भारत से 10 गुनी ज्यादा दवाइयाँ अमेरिका में खर्च होती हैं जबकि भारत की आबादी अमेरिका से तीन गुनी ज्यादा है | मानसिक रोग इतने बढ़े हैं कि हर दस अमेरिकन में से एक को मानसिक रोग होता है | दुर्वासनाएँ इतनी बढ़ी है कि हर छः सेकण्ड में एक बलात्कार होता है और हर वर्ष लगभग 20 लाख कन्याएँ विवाह के पूर्व ही गर्भवती हो जाती हैं | मुक्त साहचर्य (free sex) का हिमायती होने के कारण शादी के पहले वहाँ का प्रायः हर व्यक्ति जातीय संबंध बनाने लगता है | इसी वजह से लगभग 65% शादियाँ तलाक में बदल जाती हैं | मनुष्य के लिये प्रकृति द्वारा निर्धारित किये गये संयम का उपहास करने के कारण प्रकृति ने उन लोगों को जातीय रोगों का शिकार बना रखा है | उनमें मुख्यतः एड्स (AIDS) की बीमारी दिन दूनी रात चौगुनी फैलती जा रही है | वहाँ के पारिवारिक व सामाजिक जीवन में क्रोध, कलह, असंतोष, संताप, उच्छृंखलता, उद्यंडता और शत्रुता का महा भयानक वातावरण छा गया है | विश्व की लगभग 4% जनसंख्या अमेरिका में है | उसके उपभोग के लिये विश्व की लगभग 40% साधन-सामग्री (जैसे कि कार, टी वी, वातानुकूलित मकान आदि) मौजूद हैं फिर भी वहाँ अपराधवृति इतनी बढ़ी है की हर 10 सेकण्ड में एक सेंधमारी होती है, हर लाख व्यक्तियों में से 425 व्यक्ति कारागार में सजा भोग रहे हैं जबकि भारत में हर लाख व्यक्ति में से केवल 23 व्यक्ति ही जेल की सजा काट रहे हैं |
कामुकता के समर्थक फ्रायड जैसे दार्शनिकों की ही यह देन है कि जिन्होंने पश्चात्य देशों को मनोविज्ञान के नाम पर बहुत प्रभावित किया है और वहीं से यह आँधी अब इस देश में भी फैलती जा रही है | अतः इस देश की भी अमेरिका जैसी अवदशा हो, उसके पहले हमें सावधान रहना पड़ेगा | यहाँ के कुछ अविचारी दार्शनिक भी फ्रायड के मनोविज्ञान के आधार पर युवानों को बेलगाम संभोग की तरफ उत्साहित कर रहे हैं, जिससे हमारी युवापीढ़ी गुमराह हो रही है | फ्रायड ने तो केवल मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के आधार पर व्यभिचार शास्त्र बनाया लेकिन तथाकथित दार्शनिक ने तो ‘संभोग से समाधि’ की परिकल्पना द्वारा व्यभिचार को आध्यात्मिक जामा पहनाकर धार्मिक लोगों को भी भ्रष्ट किया है | संभोग से समाधि नहीं होती, सत्यानाश होता है | ‘संयम से ही समाधि होती है …’ इस भारतीय मनोविज्ञान को अब पाश्चात्य मनोविज्ञानी भी सत्य मानने लगे हैं |
जब पश्चिम के देशों में ज्ञान-विज्ञान का विकास प्रारम्भ भी नहीं हुआ था और मानव ने संस्कृति के क्षेत्र में प्रवेश भी नहीं किया था उस समय भारतवर्ष के दार्शनिक और योगी मानव मनोविज्ञान के विभिन्न पहलुओं और समस्याओं पर गम्भीरता पूर्वक विचार कर रहे थे | फिर भी पाश्चात्य विज्ञान की छ्त्रछाया में पले हुए और उसके प्रकाश से चकाचौंध वर्त्तमान भारत के मनोवैज्ञानिक भारतीय मनोविज्ञान का अस्तित्त्व तक मानने को तैयार नहीं हैं | यह खेद की बात है | भारतीय मनोवैज्ञानिकों ने चेतना के चार स्तर माने हैं : जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय | पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक प्रथम तीन स्तर को ही जानते हैं | पाश्चात्य मनोविज्ञान नास्तिक है | भारतीय मनोविज्ञान ही आत्मविकास और चरित्र निर्माण में सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध हुआ है क्योंकि यह धर्म से अत्यधिक प्रभावित है | भारतीय मनोविज्ञान आत्मज्ञान और आत्म सुधार में सबसे अधिक सहायक सिद्ध होता है | इसमें बुरी आदतों को छोड़ने और अच्छी आदतों को अपनाने तथा मन की प्रक्रियाओं को समझने तथा उसका नियंत्रण करने के महत्वपूर्ण उपाय बताये गये हैं | इसकी सहायता से मनुष्य सुखी, स्वस्थ और सम्मानित जीवन जी सकता है |
पश्चिम की मनोवैज्ञानिक मान्यताओं के आधार पर विश्वशांति का भवन खड़ा करना बालू की नींव पर भवन-निर्माण करने के समान है | पाश्चात्य मनोविज्ञान का परिणाम पिछले दो विश्वयुद्धों के रूप में दिखलायी पड़ता है | यह दोष आज पश्चिम के मनोवैज्ञानिकों की समझ में आ रहा है | जबकि भारतीय मनोविज्ञान मनुष्य का दैवी रूपान्तरण करके उसके विकास को आगे बढ़ाना चाहता है | उसके ‘अनेकता में एकता’ के सिद्धांत पर ही संसार के विभिन्न राष्ट्रों, सामाजिक वर्गों, धर्मों और प्रजातियों में सहिष्णुता ही नहीं, सक्रिय सहयोग उत्पन्न किया जा सकता है | भारतीय मनोविज्ञान में शरीर और मन पर भोजन का क्या प्रभाव पड़ता है इस विषय से लेकर शरीर में विभिन्न चक्रों की स्थिति, कुण्डलिनी की स्थिति, वीर्य को ऊर्ध्वगामी बनाने की प्रक्रिया आदि विषयों पर विस्तारपूर्वक चर्चा की गई है | पाश्चात्य मनोविज्ञान मानव-व्यवहार का विज्ञान है | भारतीय मनोविज्ञान मानस विज्ञान के साथ-साथ आत्मविज्ञान है | भारतीय मनोविज्ञान इन्द्रियनियंत्रण पर विशेष बल देता है जबकि पाश्चात्य मनोविज्ञान केवल मानसिक क्रियाओं या मस्तिष्क-संगठन पर बल देता है | उसमें मन द्वारा मानसिक जगत का ही अध्ययन किया जाता है | उसमें भी प्रायड का मनोविज्ञान तो एक रुग्ण मन के द्वारा अन्य रुग्ण मनों का ही अध्ययन है जबकि भारतीय मनोविज्ञान में इन्द्रिय-निरोध से मनोनिरोध और मनोनिरोध से आत्मसिद्धि का ही लक्ष्य मानकर अध्ययन किया जाता है | पाश्चात्य मनोविज्ञान में मानसिक तनावों से मुक्ति का कोई समुचित साधन परिलक्षित नहीं होता जो उसके व्यक्तित्व में निहित निषेधात्मक परिवेशों के लिए स्थायी निदान प्रस्तुत कर सके | इसलिए प्रायड के लाखों बुद्धिमान अनुयायी भी पागल हो गये | संभोग के मार्ग पर चलकर कोई भी व्यक्ति योगसिद्ध महापुरुष नहीं हुआ | उस मार्ग पर चलनेवाले पागल हुए हैं | ऐसे कई नमूने हमने देखे हैं | इसके विपरीत भारतीय मनोविज्ञान में मानसिक तनावों से मुक्ति के विभिन्न उपाय बताये गये हैं यथा योगमार्ग, साधन-चतुष्टय, शुभ-संस्कार, सत्संगति, अभ्यास, वैराग्य, ज्ञान, भक्ति, निष्काम कर्म आदि | इन साधनों के नियमित अभ्यास से संगठित एवं समायोजित व्यक्तित्व का निर्माण संभव है | इसलिये भारतीय मनोविज्ञान के अनुयायी पाणिनि और महाकवि कालिदास जैसे प्रारम्भ में अल्पबुद्धि होने पर भी महान विद्वान हो गये | भारतीय मनोविज्ञान ने इस विश्व को हजारों महान भक्त समर्थ योगी तथा ब्रह्मज्ञानी महापुरुष दिये हैं |
अतः पाशचात्य मनोविज्ञान को छोड़कर भारतीय मनोविज्ञान का आश्रय लेने में ही व्यक्ति, कुटुम्ब, समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण निहित है |
भारतीय मनोविज्ञान पतंजलि के सिद्धांतों पर चलनेवाले हजारों योगासिद्ध महापुरुष इस देश में हुए हैं, अभी भी हैं और आगे भी होते रहेंगे जबकि संभोग के मार्ग पर चलकर कोई योगसिद्ध महापुरुष हुआ हो ऐसा हमने तो नहीं सुना बल्कि दुर्बल हुए, रोगी हुए, एड़स के शिकार हुए, अकाल मृत्यु के शिकार हुए, खिन्न मानस हुए, अशांत हुए | उस मार्ग पर चलनेवाले पागल हुए हैं, ऐसे कई नमूने हमने देखे हैं |
फ्रायड ने अपनी मनःस्थिति की तराजू पर सारी दुनिया के लोगों को तौलने की गलती की है | उसका अपना जीवन-क्रम कुछ बेतुके ढ़ंग से विकसित हुआ है | उसकी माता अमेलिया बड़ी खूबसूरत थी | उसने योकोव नामक एक अन्य पुरुष के साथ अपना दूसरा विवाह किया था | जब फ्रायड जन्मा तब वह २१ वर्ष की थी | बच्चे को वह बहुत प्यार करती थी |
ये घटनाएँ फ्रायड ने स्वयं लिखी हैं | इन घटनाओं के अधार पर फ्रायड कहता है: “पुरुष बचपन से ही ईडिपस कॉमप्लेक्स (Oedipus Complex) अर्थात अवचेतन मन में अपनी माँ के प्रति यौन-आकांक्षा से आकर्षित होता है तथा अपने पिता के प्रति यौन-ईर्ष्या से ग्रसित रहता है | ऐसे ही लड़की अपने बाप के प्रति आकर्षित होती है तथा अपनी माँ से ईर्ष्या करती है | इसे इलेक्ट्रा कोऊम्प्लेक्स (Electra Complex) कहते हैं | तीन वर्ष की आयु से ही बच्चा अपनी माँ के साथ यौन-सम्बन्ध स्थापित करने के लिये लालायित रहता है | एकाध साल के बाद जब उसे पता चलता है कि उसकी माँ के साथ तो बाप का वैसा संबंध पहले से ही है तो उसके मन में बाप के प्रति ईर्ष्या और घृणा जाग पड़ती है | यह विद्वेष उसके अवचेतन मन में आजीवन बना रहता है | इसी प्रकार लड़की अपने बाप के प्रति सोचती है और माँ से ईर्ष्या करती है |"
फ्रायड आगे कहता है: "इस मानसिक अवरोध के कारण मनुष्य की गति रुक जाती है | 'ईडिपस कोऊम्प्लेक्स' उसके सामने तरह-तरह के अवरोध खड़े करता है | यह स्थिति कोई अपवाद नहीं है वरन साधारणतया यही होता है |
यह कितना घृणित और हास्यास्पद प्रतिपादन है ! छोटा बच्चा यौनाकांक्षा से पीडित होगा, सो भी अपनी माँ के प्रति ? पशु-पक्षियों के बच्चे के शरीर में भी वासना तब उठती है जब उनके शरीर प्रजनन के योग्य सुदृढ हो जाते हैं | ... तो मनुष्य के बालक में यह वृत्ति इतनी छोटी आयु में कैसे पैदा हो सकती है ? ... और माँ के साथ वैसी तृप्ति करने कि उसकी शारिरिक-मानसिक स्थिति भी नहीं होती | फिर तीन वर्ष के बालक को काम-क्रिया और माँ-बाप के रत रहने की जानकारी उसे कहाँ से हो जाती है ? फिर वह यह कैसे समझ लेता है कि उसे बाप से ईर्ष्या करनी चाहिए ?
बच्चे द्वारा माँ का दूध पीने की क्रिया को ऐसे मनोविज्ञानियों ने रतिसुख के समकक्ष बतलाया है | यदि इस स्तनपान को रतिसुख माना जाय तब तो आयु बढ़ने के साथ-साथ यह उत्कंठा भी प्रबलतर होती जानी चाहिए और वयस्क होने तक बालक को माता का दूध ही पीते रहना चाहिए | किन्तु यह किस प्रकार संभव है ?
... तो ये ऐसे बेतुके प्रतिपादन हैं कि जिनकी भर्त्सना ही की जानी चाहिए | फ्रायड ने अपनी मानसिक विकृतियों को जनसाधारण पर थोपकर मनोविज्ञान को विकृत बना दिया |
जो लोग मानव समाज को पशुता में गिराने से बचाना चाहते हैं, भावी पीढ़ी का जीवन पिशाच होने से बचाना चाहते हैं, युवानों का शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक प्रसन्नता और बौद्धिक सामर्थ्य बनाये रखना चाहते हैं, इस देश के नागरिकों को एडस (AIDS) जैसी घातक बीमारियों से ग्रस्त होने से रोकना चाहते हैं, स्वस्थ समाज का निर्माण करना चाहते हैं उन सबका यह नैतिक कर्त्त्व्य है कि वे हमारी गुमराह युवा पीढ़ी को 'यौवन सुरक्षा' जैसी पुस्तकें पढ़ायें |
यदि काम-विकार उठा और हमने 'यह ठीक नहीं है ... इससे मेरे बल-बुद्धि और तेज का नाश होगा ...' ऐसा समझकर उसको टाला नहीं और उसकी पूर्ति में लम्पट होकर लग गये, तो हममें और पशुओं में अंतर ही क्या रहा ? पशु तो जब उनकी कोई विशेष ऋतु होती है तभी मैथुन करते हैं, बाकी ऋतुओं में नहीं | इस दृष्टि से उनका जीवन सहज व प्राकृतिक ढ़ंग का होता है | परंतु मनुष्य ... !
मनुष्य तो बारहों महीने काम-क्रिया की छूट लेकर बैठा है और ऊपर से यह भी कहता है कि यदि काम-वासना की पूर्ति करके सुख नहीं लिया तो फिर ईश्वर ने मनुष्य में जो इसकी रचना की है, उसका क्या मतलब ? ... आप अपने को विवेकपूर्ण रोक नहीं पाते हो, छोटे-छोटे सुखों में उलझ जाते हो- इसका तो कभी ख्याल ही नहीं करते और ऊपर से भगवान तक को अपने पापकर्मों में भागीदार बनाना चाहते हो ?
अभी कुछ समय पूर्व मेरे पास एक पत्र आया | उसमें एक व्यक्ति ने पूछा था: “आपने सत्संग में कहा और एक पुस्तिका में भी प्रकाशित हुआ कि : ‘बीड़ी, सिगरेट, तम्बाकू आदि मत पियो | ऐसे व्यसनों से बचो, क्योंकि ये तुम्हारे बल और तेज का हरण करते हैं …’ यदि ऐसा ही है तो भगवान ने तम्बाकू आदि पैदा ही क्यों किया ?”
अब उन सज्जन से ये व्यसन तो छोड़े नहीं जाते और लगे हैं भगवान के पीछे | भगवान ने गुलाब के साथ काँटे भी पैदा किये हैं | आप फूल छोड़कर काँटे तो नहीं तोड़ते ! भगवान ने आग भी पैदा की है | आप उसमें भोजन पकाते हो, अपना घर तो नहीं जलाते ! भगवान ने आक (मदार), धतूरे, बबूल आदि भी बनाये हैं, मगर उनकी तो आप सब्जी नहीं बनाते ! इन सब में तो आप अपनी बुद्धि का उपयोग करके व्यवहार करते हो और जहाँ आप हार जाते हो, जब आपका मन आपके कहने में नहीं होता। तो आप लगते हो भगवान को दोष देने ! अरे, भगवान ने तो बादाम-पिस्ते भी पैदा किये हैं, दूध भी पैदा किया है | उपयोग करना है तो इनका करो, जो आपके बल और बुद्धि की वृद्धि करें | पैसा ही खर्चना है तो इनमें खर्चो | यह तो होता नहीं और लगें हैं तम्बाकू के पीछे | यह बुद्धि का सदुपयोग नहीं है, दुरुपयोग है | तम्बाकू पीने से तो बुद्धि और भी कमजोर हो जायेगी |
शरीर के बल बुद्धि की सुरक्षा के लिये वीर्यरक्षण बहुत आवश्यक है | योगदर्शन के ‘साधपाद’ में ब्रह्मचर्य की महत्ता इन शब्दों में बतायी गयी है :
ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः ||37||
ब्रह्मचर्य की दृढ़ स्थिति हो जाने पर सामर्थ्य का लाभ होता है |
फिर भी यदि कोई जान-बूझकर अपने सामर्थ्य को खोकर श्रीहीन बनना चाहता हो तो यह यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात के इन प्रसिद्ध वचनों को सदैव याद रखे | सुकरात से एक व्यक्ति ने पूछा :
“पुरुष के लिए कितनी बार स्त्री-प्रसंग करना उचित है ?”
“जीवन भर में केवल एक बार |”
“यदि इससे तृप्ति न हो सके तो ?”
“तो वर्ष में एक बार |”
“यदि इससे भी संतोष न हो तो ?”
“फिर महीने में एक बार |”
इससे भी मन न भरे तो ?”
“तो महीने में दो बार करें, परन्तु मृत्यु शीघ्र आ जायेगी |”
“इतने पर भी इच्छा बनी रहे तो क्या करें ?”
इस पर सुकरात ने कहा :
“तो ऐसा करें कि पहले कब्र खुदवा लें, फिर कफन और लकड़ी घर में लाकर तैयार रखें | उसके पश्चात जो इच्छा हो, सो करें |”
सुकरात के ये वचन सचमुच बड़े प्रेरणाप्रद हैं | वीर्यक्षय के द्वारा जिस-जिसने भी सुख लेने का प्रयास किया है, उन्हें घोर निराशा हाथ लगी है और अन्त में श्रीहीन होकर मृत्यु का ग्रास बनना पड़ा है | कामभोग द्वारा कभी तृप्ति नहीं होती और अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ चला जाता है | राजा ययाति की कथा तो आपने सुनी होगी |
शुक्राचार्य के शाप से राजा ययाति युवावस्था में ही वृद्ध हो गये थे | परन्तु बाद में ययाति के प्रार्थना करने पर शुक्राचार्य ने दयावश उनको यह शक्ति दे दी कि वे चाहें तो अपने पुत्रों से युवावस्था लेकर अपना वार्धक्य उन्हें दे सकते थे | तब ययाति ने अपने पुत्र यदु, तर्वसु, द्रुह्यु और अनु से उनकी जवानी माँगी, मगर वे राजी न हुए | अंत में छोटे पुत्र पुरु ने अपने पिता को अपना यौवन देकर उनका बुढ़ापा ले लिया |
पुनः युवा होकर ययाति ने फिर से भोग भोगना शुरु किया | वे नन्दनवन में विश्वाची नामक अप्सरा के साथ रमण करने लगे | इस प्रकार एक हजार वर्ष तक भोग भोगने के बाद भी भोगों से जब वे संतुष्ट नहीं हुए तो उन्होंने अपना बचा हुआ यौवन अपने पुत्र पुरु को लौटाते हुए कहा :
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति |
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते ||
“पुत्र ! मैंने तुम्हारी जवानी लेकर अपनी रुचि, उत्साह और समय के अनुसार विष्यों का सेवन किया लेकिन विषयों की कामना उनके उपभोग से कभी शांत नहीं होती, अपितु घी की आहुति पड़ने पर अग्नि की भाँति वह अधिकाधिक बढ़ती ही जाती है |
रत्नों से जड़ी हुई सारी पृथ्वी, संसार का सारा सुवर्ण, पशु और सुन्दर स्त्रियाँ, वे सब एक पुरुष को मिल जायें तो भी वे सबके सब उसके लिये पर्याप्त नहीं होंगे | अतः तृष्णा का त्याग कर देना चाहिए |
छोटी बुद्धिवाले लोगों के लिए जिसका त्याग करना अत्यंत कठिन है, जो मनुष्य के बूढ़े होने पर भी स्वयं बूढ़ी नहीं होती तथा जो एक प्राणान्तक रोग है उस तृष्णा को त्याग देनेवाले पुरुष को ही सुख मिलता है |” (महाभारत : आदिपर्वाणि संभवपर्व : 12)
ययाति का अनुभव वस्तुतः बड़ा मार्मिक और मनुष्य जाति ले लिये हितकारी है | ययाति आगे कहते हैं :
“पुत्र ! देखो, मेरे एक हजार वर्ष विषयों को भोगने में बीत गये तो भी तृष्णा शांत नहीं होती और आज भी प्रतिदिन उन विषयों के लिये ही तृष्णा पैदा होती है |
पूर्णं वर्षसहस्रं मे विषयासक्तचेतसः |
तथाप्यनुदिनं तृष्णा ममैतेष्वभिजायते ||
इसलिए पुत्र ! अब मैं विषयों को छोड़कर ब्रह्माभ्यास में मन लगाऊँगा | निर्द्वन्द्व तथा ममतारहित होकर वन में मृगों के साथ विचरूँगा | हे पुत्र ! तुम्हारा भला हो | तुम पर मैं प्रसन्न हूँ | अब तुम अपनी जवानी पुनः प्राप्त करो और मैं यह राज्य भी तुम्हें ही अर्पण करता हूँ |
इस प्रकार अपने पुत्र पुरु को राज्य देकर ययाति ने तपस्या हेतु वनगमन किया | उसी राजा पुरु से पौरव वंश चला | उसी वंश में परीक्षित का पुत्र राजा जन्मेजय पैदा हुआ था |
राजा मुचकन्द गर्गाचार्य के दर्शन-सत्संग के फलस्वरूप भगवान का दर्शन पाते हैं | भगवान से स्तुति करते हुए वे कहते हैं :
“प्रभो ! मुझे आपकी दृढ़ भक्ति दो |”
तब भगवान कहते हैं : “तूने जवानी में खूब भोग भोगे हैं, विकारों में खूब डूबा है | विकारी जीवन जीनेवाले को दृढ़ भक्ति नहीं मिलती | मुचकन्द ! दृढ़ भक्ति के लिए जीवन में संयम बहुत जरूरी है | तेरा यह क्षत्रिय शरीर समाप्त होगा तब दूसरे जन्म में तुझे दृढ़ भक्ति प्राप्त होगी |”
वही राजा मुचकन्द कलियुग में नरसिंह मेहता हुए |
जो लोग अपने जीवन में वीर्यरक्षा को महत्व नहीं देते, वे जरा सोचें कि कहीं वे भी राजा ययाति का तो अनुसरण नहीं कर रहे हैं ! यदि कर रहे हों तो जैसे ययाति सावधान हो गये, वैसे आप भी सावधान हो जाओ भैया ! हिम्मत करो | सयाने हो जाओ | दया करो | हम पर दया न करो तो अपने-आप पर तो दया करो भैया ! हिम्मत करो भैया ! सयाने हो जाओ मेरे प्यारे ! जो हो गया उसकी चिन्ता न करो | आज से नवजीवन का प्रारंभ करो | ब्रह्मचर्यरक्षा के आसन, प्राकृतिक औषधियाँ इत्यादि जानकर वीर बनो | ॐ … ॐ … ॐ …
आज संसार में कितने ही ऐसे अभागे लोग हैं, जो शृंगार रस की पुस्तकें पढ़कर, सिनेमाओं के कुप्रभाव के शिकार होकर स्वप्नावस्था या जाग्रतावस्था में अथवा तो हस्तमैथुन द्वारा सप्ताह में कितनी बार वीर्यनाश कर लेते हैं | शरीर और मन को ऐसी आदत डालने से वीर्याशय बार-बार खाली होता रहता है | उस वीर्याशय को भरने में ही शारीरिक शक्ति का अधिकतर भाग व्यय होने लगता है, जिससे शरीर को कांतिमान् बनाने वाला ओज संचित ही नहीं हो पाता और व्यक्ति शक्तिहीन, ओजहीन और उत्साहशून्य बन जाता है | ऐसे व्यक्ति का वीर्य पतला पड़ता जाता है | यदि वह समय पर अपने को सँभाल नहीं सके तो शीघ्र ही वह स्थिति आ जाती है कि उसके अण्डकोश वीर्य बनाने में असमर्थ हो जाते हैं | फिर भी यदि थोड़ा बहुत वीर्य बनता है तो वह भी पानी जैसा ही बनता है जिसमें सन्तानोत्पत्ति की ताकत नहीं होती | उसका जीवन जीवन नहीं रहता | ऐसे व्यक्ति की हालत मृतक पुरुष जैसी हो जाती है | सब प्रकार के रोग उसे घेर लेते हैं | कोई दवा उस पर असर नहीं कर पाती | वह व्यक्ति जीते जी नर्क का दुःख भोगता रहता है | शास्त्रकारों ने लिखा है :
आयुस्तेजोबलं वीर्यं प्रज्ञा श्रीश्च महदयशः |
पुण्यं च प्रीतिमत्वं च हन्यतेऽब्रह्मचर्या ||
‘आयु, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, कीर्ति, यश तथा पुण्य और प्रीति ये सब ब्रह्मचर्य का पालन न करने से नष्ट हो जाते हैं |’
इसीलिए वीर्यरक्षा स्तुत्य है | ‘अथर्ववेद में कहा गया है :
अति सृष्टो अपा वृषभोऽतिसृष्टा अग्नयो दिव्या ||1||
इदं तमति सृजामि तं माऽभ्यवनिक्षि ||2||
अर्थात् ‘शरीर में व्याप्त वीर्य रूपी जल को बाहर ले जाने वाले, शरीर से अलग कर देने वाले काम को मैंने परे हटा दिया है | अब मैं इस काम को अपने से सर्वथा दूर फेंकता हूँ | मैं इस आरोग्यता, बल-बुद्धिनाशक काम का कभी शिकार नहीं होऊँगा |’
… और इस प्रकार के संकल्प से अपने जीवन का निर्माण न करके जो व्यक्ति वीर्यनाश करता रहता है, उसकी क्या गति होगी, इसका भी ‘अथर्ववेद’ में उल्लेख आता है :
रुजन् परिरुजन् मृणन् परिमृणन् |
म्रोको मनोहा खनो निर्दाह आत्मदूषिस्तनूदूषिः ||
यह काम रोगी बनाने वाला है, बहुत बुरी तरह रोगी करने वाला है | मृणन् यानी मार देने वाला है | परिमृणन् यानी बहुत बुरी तरह मारने वाला है |यह टेढ़ी चाल चलता है, मानसिक शक्तियों को नष्ट कर देता है | शरीर में से स्वास्थ्य, बल, आरोग्यता आदि को खोद-खोदकर बाहर फेंक देता है | शरीर की सब धातुओं को जला देता है | आत्मा को मलिन कर देता है | शरीर के वात, पित्त, कफ को दूषित करके उसे तेजोहीन बना देता है |
ब्रह्मचर्य के बल से ही अंगारपर्ण जैसे बलशाली गंधर्वराज को अर्जुन ने पराजित कर दिया था |
अर्जुन अपने भाईयों सहित द्रौपदी के स्वंयवर-स्थल पांचाल देश की ओर जा रहा था, तब बीच में गंगा तट पर बसे सोमाश्रयाण तीर्थ में गंधर्वराज अंगारपर्ण (चित्ररथ) ने उसका रास्ता रोक दिया | वह गंगा में अपनी स्त्रियों के साथ जलक्रिड़ा कर रहा था | उसने पाँचों पांडवों को कहा : “मेरे यहाँ रहते हुए राक्षस, यक्ष, देवता अथवा मनुष्य कोई भी इस मार्ग से नहीं जा सकता | तुम लोग जान की खैर चाहते हो तो लौट जाओ |”
तब अर्जुन कहता है :
“मैं जानता हूँ कि सम्पूर्ण गंधर्व मनुष्यों से अधिक शक्तिशाली होते हैं, फिर भी मेरे आगे तुम्हारी दाल नहीं गलेगी | तुम्हें जो करना हो सो करो, हम तो इधर से ही जायेंगे |”
अर्जुन के इस प्रतिवाद से गंधर्व बहुत क्रोधित हुआ और उसने पांडवों पर तीक्ष्ण बाण छोड़े | अर्जुन ने अपने हाथ में जो जलती हुई मशाल पकड़ी थी, उसीसे उसके सभी बाणों को निष्फल कर दिया | फिर गंधर्व पर आग्नेय अस्त्र चला दिया | अस्त्र के तेज से गंधर्व का रथ जलकर भस्म हो गया और वह स्वंय घायल एवं अचेत होकर मुँह के बल गिर पड़ा | यह देखकर उस गंधर्व की पत्नी कुम्मीनसी बहुत घबराई और अपने पति की रक्षार्थ युधिष्ठिर से प्रार्थना करने लगी | तब युधिष्ठिर ने अर्जुन से उस गंधर्व को अभयदान दिलवाया |
जब वह अंगारपर्ण होश में आया तब बोला ;
“अर्जुन ! मैं परास्त हो गया, इसलिए अपने पूर्व नाम अंगारपर्ण को छोड़ देता हूँ | मैं अपने विचित्र रथ के कारण चित्ररथ कहलाता था | वह रथ भी आपने अपने पराक्रम से दग्ध कर दिया है | अतः अब मैं दग्धरथ कहलाऊँगा |
मेरे पास चाक्षुषी नामक विद्या है जिसे मनु ने सोम को, सोम ने विश्वावसु को और विश्वावसु ने मुझे प्रदान की है | यह गुरु की विद्या यदि किसी कायर को मिल जाय तो नष्ट हो जाती है | जो छः महीने तक एक पैर पर खड़ा रहकर तपस्या करे, वही इस विद्या को पा सकता है | परन्तु अर्जुन ! मैं आपको ऐसी तपस्या के बिना ही यह विद्या प्रदान करता हूँ |
इस विद्या की विशेषता यह है कि तीनों लोकों में कहीं भी स्थित किसी वस्तु को आँख से देखने की इच्छा हो तो उसे उसी रूप में इस विद्या के प्रभाव से कोई भी व्यक्ति देख सकता है | अर्जुन ! इस विद्या के बल पर हम लोग मनुष्यों से श्रेष्ठ माने जाते हैं और देवताओं के तुल्य प्रभाव दिखा सकते हैं |”
इस प्रकार अंगारपर्ण ने अर्जुन को चाक्षुषी विद्या, दिव्य घोड़े एवं अन्य वस्तुएँ भेंट कीं |
अर्जुन ने गंधर्व से पूछा : गंधर्व ! तुमने हम पर एकाएक आक्रमण क्यों किया और फिर हार क्यों गये ?”
तब गंधर्व ने बड़ा मर्मभरा उत्तर दिया | उसने कहा :
“शत्रुओं को संताप देनेवाले वीर ! यदि कोई कामासक्त क्षत्रिय रात में मुझसे युद्ध करने आता तो किसी भी प्रकार जीवित नहीं बच सकता था क्योंकि रात में हम लोगों का बल और भी बढ़ जाता है |
अपने बाहुबल का भरोसा रखने वाला कोई भी पुरुष जब अपनी स्त्री के सम्मुख किसीके द्वारा अपना तिरस्कार होते देखता है तो सहन नहीं कर पाता | मैं जब अपनी स्त्री के साथ जलक्रीड़ा कर रहा था, तभी आपने मुझे ललकारा, इसीलिये मैं क्रोधाविष्ट हुआ और आप पर बाणवर्षा की | लेकिन यदि आप यह पूछो कि मैं आपसे पराजित क्यों हुआ तो उसका उत्तर है :
ब्रह्मचर्यं परो धर्मः स चापि नियतस्व्तयि |
यस्मात् तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मि विजितस्त्वया ||
“ब्रह्मचर्य सबसे बड़ा धर्म है और वह आपमें निश्चित रूप से विद्यमान है | हे कुन्तीनंदन ! इसीलिये युद्ध में मैं आपसे हार गया हूँ |”
(महाभारत : आदिपर्वणि चैत्ररथ पर्व : 71)
हम समझ गये कि वीर्यरक्षण अति आवश्यक है | अब वह कैसे हो इसकी चर्चा करने से पूर्व एक बार ब्रह्मचर्य का तात्त्विक अर्थ ठीक से समझ लें |
‘ब्रह्मचर्य’ शब्द बड़ा चित्ताकर्षक और पवित्र शब्द है | इसका स्थूल अर्थ तो यही प्रसिद्ध है कि जिसने शादी नहीं की है, जो काम-भोग नहीं करता है, जो स्त्रियों से दूर रहता है आदि-आदि | परन्तु यह बहुत सतही और सीमित अर्थ है | इस अर्थ में केवल वीर्यरक्षण ही ब्रह्मचर्य है | परन्तु ध्यान रहे, केवल वीर्यरक्षण मात्र साधना है, मंजिल नहीं | मनुष्य जीवन का लक्ष्य है अपने-आपको जानना अर्थात् आत्म-साक्षात्कार करना | जिसने आत्म-साक्षात्कार कर लिया, वह जीवन्मुक्त हो गया | वह आत्मा के आनन्द में, ब्रह्मानन्द में विचरण करता है | उसे अब संसार से कुछ पाना शेष नहीं रहा | उसने आनन्द का स्रोत अपने भीतर ही पा लिया | अब वह आनन्द के लिये किसी भी बाहरी विषय पर निर्भर नहीं है | वह पूर्ण स्वतंत्र है | उसकी क्रियाएँ सहज होती हैं | संसार के विषय उसकी आनन्दमय आत्मिक स्थिति को डोलायमान नहीं कर सकते | वह संसार के तुच्छ विषयों की पोल को समझकर अपने आनन्द में मस्त हो इस भूतल पर विचरण करता है | वह चाहे लँगोटी में हो चाहे बहुत से कपड़ों में, घर में रहता हो चाहे झोंपड़े में, गृहस्थी चलाता हो चाहे एकान्त जंगल में विचरता हो, ऐसा महापुरुष ऊपर से भले कंगाल नजर आता हो, परन्तु भीतर से शहंशाह होता है, क्योंकि उसकी सब वासनाएँ, सब कर्त्तव्य पूरे हो चुके हैं | ऐसे व्यक्ति को, ऐसे महापुरुष को वीर्यरक्षण करना नहीं पड़ता, सहज ही होता है | सब व्यवहार करते हुए भी उनकी हर समय समाधि रहती है | उनकी समाधि सहज होती है, अखण्ड होती है | ऐसा महापुरुष ही सच्चा ब्रह्मचारी होता है, क्योंकि वह सदैव अपने ब्रह्मानन्द में अवस्थित रहता है |
स्थूल अर्थ में ब्रह्मचर्य का अर्थ जो वीर्यरक्षण समझा जाता है, उस अर्थ में ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ व्रत है, श्रेष्ठ तप है, श्रेष्ठ साधना है और इस साधना का फल है आत्मज्ञान, आत्म-साक्षात्कार | इस फलप्राप्ति के साथ ही ब्रह्मचर्य का पूर्ण अर्थ प्रकट हो जाता है |
जब तक किसी भी प्रकार की वासना शेष है, तब तक कोई पूर्ण ब्रह्मचर्य को उपलब्ध नहीं हो सकता | जब तक आत्मज्ञान नहीं होता तब तक पूर्ण रूप से वासना निवृत्त नहीं होती | इस वासना की निवृत्ति के लिये, अंतःकरण की शुद्धि के लियí